The words you are searching are inside this book. To get more targeted content, please make full-text search by clicking here.

गुनाहों का देवता _ Gunahon Ka Devta ( PDFDrive.com )

Discover the best professional documents and content resources in AnyFlip Document Base.
Search
Published by arunyadavyes, 2020-10-08 14:06:48

गुनाहों का देवता _ Gunahon Ka Devta ( PDFDrive.com )

गुनाहों का देवता _ Gunahon Ka Devta ( PDFDrive.com )

गनु ाह का दवे ता

धमवीर भारती

धमवीर भारती के इस उप यास का काशन और इसके ित पाठक का अटू ट स मोहन िह दी
सािह य-जगत् क एक बड़ी उपलि ध बन गये ह दरअसल, यह उप यास हमारे समय म
भारतीय भाषाओं क सबसे अिधक िबकने वाली लोकि य सािहि यक पु तक म पहली पंि म
है लाख -लाख पाठक के िलए ि य इस अनठू े उप यास क माँग आज भी वसै ी ही बनी हई है
जसै ी िक उसके काशन के ारि भक वष म थी –और इस सबका बड़ा कारण शायद एक
समथ रचनाकार क कोई अ य पीड़ा और एका त आ था ह,ै िजसने इस उप यास को एक
अि तीय कृ ित बना िदया है

थम ख ड

1

अगर पुराने जमाने क नगर-देवता क और ाम-देवता क क पनाएँ आज भी मा य होत तो म
कहता िक इलाहाबाद का नगर-देवता ज र कोई रोमिै टक कलाकार है ऐसा लगता है िक इस
शहर क बनावट, गठन, िजंदगी और रहन-सहन म कोई बँधे-बँधाये िनयम नह , कह कोई
कसाव नह , हर जगह एक व छ द खुलाव, एक िबखरी हई-सी अिनयिमतता बनारस क
गिलय से भी पतली गिलयाँ और लखनऊ क सडक़ से चौड़ी सडक़ याकशायर और ाइटन
के उपनगर का मकु ाबला करने वाले िसिवल लाइ स और दलदल क ग दगी को मात करने
वाले महु ले मौसम म भी कह कोई सम नह , कोई स तलु न नह सुबह मलयजी, दोपहर
अगं ारी, तो शाम रे शमी! धरती ऐसी िक सहारा के रे िग तान क तरह बालू भी िमले, मालवा क
तरह हरे -भरे खेत भी िमल और ऊसर और परती क भी कमी नह सचमचु लगता है िक याग
का नगर-देवता वग-कंु ज से िनवािसत कोई मनमौजी कलाकार है िजसके सजृ न म हर रं ग के
डोरे ह
और चाहे जो हो, मगर इधर वार, काितक तथा उधर वस त के बाद और होली के बीच के मौसम
से इलाहाबाद का वातावरण नै टिशयम और पजी के फू ल से भी यादा खबू सरू त और आम के
बौर क खुशबू से भी यादा महकदार होता है िसिवल लाइ स हो या अ े ड पाक, गगं ातट
हो या खुस बाग, लगता है िक हवा एक नटखट दोशीजा क तरह किलय के आँचल और लहर
के िमजाज से छेडख़ानी करती चलती है और अगर आप सद से बहत नह डरते तो आप जरा
एक ओवरकोट डालकर सुबह-सुबह घमू ने िनकल जाएँ तो इन खुली हई जगह क िफजाँ
इठलाकर आपको अपने जादू म बाँध लेगी खासतौर से पौ फटने के पहले तो आपको एक
िब कु ल नयी अनुभिू त होगी वस त के नये-नये मौसमी फू ल के रं ग से मकु ाबला करने वाली
ह क सुनहली, बाल-सयू क अँगिु लयाँ सुबह क राजकु मारी के गलु ाबी व पर िबखरे हए
भ राले गेसुओं को धीरे -धीरे हटाती जाती ह और ि ितज पर सुनहली त णाई िबखर पड़ती है
एक ऐसी ही खुशनुमा सुबह थी, और िजसक कहानी म कहने जा रहा हँ, वह सुबह से भी यादा
मासमू युवक, भाती गाकर फू ल को जगाने वाले देवदतू क तरह अ े ड पाक के लॉन पर
फू ल क सरजम के िकनारे -िकनारे घमू रहा था क थई वीटपी के रं ग का प मीने का ल बा
कोट, िजसका एक कालर उठा हआ था और दसू रे कालर म सरो क एक प ी बटन होल म लगी
हई थी, सफे द म खन जीन क पतली पट और परै म सफे द जरी क पेशावरी सिै डल, भरा हआ
गोरा चेहरा और ऊँ चे चमकते हए माथे पर झलू ती हई एक खी भरू ी लट चलते-चलते उसने
एक रं ग-िबरं गा गु छा इक ा कर िलया था और रह-रह कर वह उसे सँघू लेता था

परू ब के आसमान क गलु ाबी पाँखु रयाँ िबखरने लगी थ और सुनहले पराग क एक बौछार
सुबह के ताजे फू ल पर िबछ रही थी “अरे सुबह हो गयी?” उसने च ककर कहा और पास क
एक बच पर बठै गया सामने से एक माली आ रहा था “ य जी, लाइ रे ी खुल गयी?” “अभी
नह बाबजू ी!” उसने जवाब िदया वह िफर स तोष से बठै गया और फू ल क पाँखु रयाँ
नोचकर नीचे फकने लगा जमीन पर िबछाने वाली सोने क चादर परत पर परत िबछाती जा

रही थी और पेड़ क छायाओं का रं ग गहराने लगा था उसक बच के नीचे फू ल क चुनी हई
पि याँ िबखरी थ और अब उसके पास िसफ एक फू ल बाक रह गया था हलके फालसई रं ग के
उस फू ल पर गहरे बजनी डोरे थे
“हलो कपरू !” सहसा िकसी ने पीछे से क धे पर हाथ रखकर कहा, “यहाँ या झक मार रहे हो
सुबह-सुबह?”
उसने मडु क़र पीछे देखा, “आओ, ठाकु र साहब! आओ बठै ो यार, लाइ रे ी खुलने का इ तजार कर
रहा हँ ”
“ य , यिू नविसटी लाइ रे ी चाट डाली, अब इसे तो शरीफ लोग के िलए छोड़ दो!”
“हाँ, हाँ, शरीफ लोग ही के िलए छोड़ रहा हँ; डॉ टर शु ला क लड़क है न, वह इसक मे बर
बनना चाहती थी तो मझु े आना पड़ा, उसी का इ तजार भी कर रहा हँ ”
“डॉ टर शु ला तो पॉिलिट स िडपाटमट म ह?”
“नह , गवनमट साइकोलॉिजकल यरू ो म ”
“और तमु पॉिलिट स म रसच कर रहे हो?”
“नह , इकनॉिम स म!”

“बहत अ छे! तो उनक लड़क को सद य बनवाने आये हो?” कु छ अजब वर म ठाकु र ने
कहा

“िछः!” कपरू ने हँसते हए, कु छ अपने को बचाते हए कहा, “यार, तमु जानते हो िक मेरा उनसे
िकतना घरे लू स ब ध है जब से म याग म हँ, उ ह के सहारे हँ और आजकल तो उ ह के
यहाँ पढ़ता-िलखता भी हँ... ”
ठाकु र साहब हँस पड़े, “अरे भाई, म डॉ टर शु ला को जानता नह या? उनका-सा भला
आदमी िमलना मिु कल है तमु सफाई यथ म दे रहे हो ”
ठाकु र साहब यिू नविसटी के उन िव ािथय म से थे जो बरायनाम िव ाथ होते ह और कब तक वे
यिू नविसटी को सुशोिभत करते रहगे, इसका कोई िन य नह एक अ छे-खासे पये वाले
यि थे और घर के ता लुके दार हँसमखु , फि तयाँ कसने म मजा लेने वाले, मगर िदल के
साफ, िनगाह के स चे बोले-

“एक बात तो म वीकार करता हँ िक तु हारी पढ़ाई का सारा ये डॉ. शु ला को ह!ै तु हारे घर
वाले तो कु छ खचा भेजते नह ?”
“नह , उनसे अलग ही होकर आया था समझ लो िक इ ह ने िकसी-न-िकसी बहाने मदद क

है ”

“अ छा, आओ, तब तक लोटस-प ड (कमल-सरोवर) तक ही घमू ल िफर लाइ रे ी भी खुल
जाएगी!”

दोन उठकर एक कृ ि म कमल-सरोवर क ओर चल िदये जो पास ही म बना हआ था सीिढय़ाँ

चढक़र ही उ ह ने देखा िक एक स जन िकनारे बठै े कमल क ओर एकटक देखते हए यान म

त लीन ह िछपकली से दुबले-पतले, बाल क एक लट माथे पर झमू ती हई-
“कोई ेमी ह, या कोई िफलासफर ह, देखा ठाकु र?”
“नह यार, दोन से िनकृ कोिट के जीव ह-ये किव ह म इ ह जानता हँ ये रवी
िबस रया ह एम. ए. म पढ़ता है आओ, िमलाएँ तु ह!”
ठाकु र साहब ने एक बड़ा-सा घास का ितनका तोडक़र पीछे से चुपके -से जाकर उसक गरदन
गदु गदु ायी िबस रया च क उठा-पीछे मडु क़र देखा और िबगड़ गया-”यह या बदतमीजी ह,ै
ठाकु र साहब! म िकतने ग भीर िवचार म डू बा था ” और सहसा बड़े िविच वर म आँख ब द
कर िबस रया बोला, “आह! कै सा मनोरम भात ह!ै मेरी आ मा म घोर अनुभिू त हो रही थी... ”
कपरू िबस रया क मु ा पर ठाकु र साहब क ओर देखकर मसु कराया और इशारे म बोला, “है
यार शगल क चीज छेड़ो जरा!”

ठाकु र साहब ने ितनका फक िदया और बोले, “माफ करना, भाई िबस रया! बात यह है िक हम
लोग किव तो ह नह , इसिलए समझ नह पाते या सोच रहे थे तमु ?”
िबस रया ने आँख खोल और एक गहरी साँस लेकर बोला, “म सोच रहा था िक आिखर ेम या
होता ह,ै य होता ह?ै किवता य िलखी जाती ह?ै िफर किवता के सं ह उतने य नह

िबकते िजतने उप यास या कहानी-सं ह?”

“बात तो ग भीर है ” कपरू बोला, “जहाँ तक मने समझा और पढ़ा ह-ै ेम एक तरह क बीमारी
होती ह,ै मानिसक बीमारी, जो मौसम बदलने के िदन म होती ह,ै मसलन वार-काितक या

फागनु -चतै उसका स ब ध रीढ़ क हड् डी से होता है और किवता एक तरह का सि नपात
होता है मेरा मतलब आप समझ रहे ह, िम. िसब रया?”

“िसब रया नह , िबस रया?” ठाकु र साहब ने टोका
िबस रया ने कु छ उजलत, कु छ परे शानी और कु छ गु से से उनक ओर देखा और बोला, “ मा
क िजएगा, आप या तो ायडवादी ह या गितवादी और आपके िवचार सवदा िवदेशी ह म इस

तरह के िवचार से घणृ ा करता हँ... ”
कपरू कु छ जवाब देने ही वाला था िक ठाकु र साहब बोले, “अरे भाई, बेकार उलझ गये तमु लोग,
पहले प रचय तो कर लो आपस म ये ह ी च कु मार कपरू , िव िव ालय म रसच कर रहे ह
और आप ह ी रवी िबस रया, इस वष एम. ए. म बठै रहे ह बहत अ छे किव ह ”

कपरू ने हाथ िमलाया और िफर ग भीरता से बोला, “ य साहब, आपको दुिनया म और कोई
काम नह रहा जो आप किवता करते ह?”

िबस रया ने ठाकु र साहब क ओर देखा और बोला, “ठाकु र साहब, यह मेरा अपमान ह,ै म इस
तरह के सवाल का आदी नह हँ ” और उठ खड़ा हआ
“अरे बठै ो-बठै ो!” ठाकु र साहब ने हाथ ख चकर िबठा िलया, “देखो, कपरू का मतलब तमु समझे
नह उसका कहना यह है िक तमु म इतनी ितभा है िक लोग तु हारी ितभा का आदर करना
नह जानते इसिलए उ ह ने सहानुभिू त म तमु से कहा िक तमु और कोई काम य नह
करते वरना कपरू साहब तु हारी किवता के बहत शौक न ह मझु से बराबर तारीफ करते
ह”

िबस रया िपघल गया और बोला, “ मा क िजएगा मने गलत समझा, अब मेरा किवता-सं ह

छप रहा ह,ै म आपको अव य भट क ँ गा ” और िफर िबस रया ठाकु र साहब क ओर मडु क़र
बोला, “अब लोग मेरी किवताओं क इतनी माँग करते ह िक म परे शान हो गया हँ अभी कल
'ि वेणी' के स पादक िमले कहने लगे अपना िच दे दो मने कहा िक कोई िच नह है तो
पीछे पड़ गये आिखरकार मने आइडेि टटी काड उठाकर दे िदया!”
“वाह!” कपरू बोला, “मान गये आपको हम! तो आप रा ीय किवताएँ िलखते ह या ेम क ?”
“जब जसै ा अवसर हो!” ठाकु र साहब ने जड़ िदया, “वसै े तो यह वार ट का किव-स मेलन,
शराबब दी कॉ े स का किव-स मेलन, शादी- याह का किव-स मेलन, सािह य-स मेलन
का किव-स मेलन सभी जगह बुलाये जाते ह बड़ा यश है इनका!”
िबस रया ने शंसा से मु ध होकर देखा, मगर िफर एक गव का भाव महँु पर लाकर ग भीर हो
गया
कपरू थोड़ी देर चुप रहा, िफर बोला, “तो कु छ हम लोग को भी सुनाइए न!”
“अभी तो मडू नह है ” िबस रया बोला
ठाकु र साहब िबस रया को िपछले पाँच साल से जानते थे, वे अ छी तरह जानते थे िक िबस रया
िकस समय और कै से किवता सुनाता है अत: बोले, “ऐसे नह कपरू , आज शाम को आओ
ज़रा गगं ाजी चल, कु छ बोिटंग रहे, कु छ खाना-पीना रहे तब किवता भी सुनना!”
कपरू को बोिटंग का बेहद शौक था फौरन राजी हो गया और शाम का िव ततृ काय म बन
गया
इतने म एक कार उधर से लाइ रे ी क ओर गजु री कपरू ने देखा और बोला, “अ छा, ठाकु र
साहब, मझु े तो इजाजत दीिजए अब चलँू लाइ रे ी म वो लोग आ गये आप कहाँ चल रहे
ह?”
“म ज़रा िजमखाने क ओर जा रहा हँ अ छा भाई, तो शाम को प क रही ”

“िब कु ल प क !” कपरू बोला और चल िदया
लाइ रे ी के पोिटको म कार क थी और उसके अ दर ही डॉ टर साहब क लड़क बठै ी थी
“ य सुधा, अ दर य बठै ी हो?”
“तु ह ही देख रही थी, च दर ” और वह उतर आयी दुबली-पतली, नाटी-सी, साधारण-सी
लड़क , बहत सु दर नह , के वल सु दर, लेिकन बातचीत म बहत दुलारी
“चलो, अ दर चलो ” च दर ने कहा
वह आगे बढ़ी, िफर िठठक गयी और बोली, “च दर, एक आदमी को चार िकताब िमलती ह?”

“हाँ! य ?”
“तो...तो...” उसने बड़े भोलेपन से मसु कराते हए कहा, “तो तमु अपने नाम से मे बर बन जाओ
और दो िकताब हम दे िदया करना बस, यादा का हम या करगे?”
“नह !” च दर हँसा, “तु हारा तो िदमाग खराब है खुद य नह बनत मे बर?”
“नह , हम शरम लगती ह,ै तमु बन जाओ मे बर हमारी जगह पर ”
“पगली कह क !” च दर ने उसका क धा पकडक़र आगे ले चलते हए कहा, “वाह रे शरम!
अभी कल याह होगा तो कहना, हमारी जगह तमु बठै जाओ च दर! कॉलेज म पहँच गयी
लड़क ; अभी शरम नह छू टी इसक ! चल अ दर!”
और वह िहचकती, िठठकती, झपती और मड़ु -मडु क़र च दर क ओर ठी हई िनगाह से देखती

हई अ दर चली गयी
थोड़ी देर बाद सुधा चार िकताब लादे हए िनकली कपरू ने कहा, “लाओ, म ले लँ!ू ” तो बाँस
क पतली टहनी क तरह लहराकर बोली, “सद य म हँ तु ह य दँू िकताब?” और जाकर
कार के अ दर िकताब पटक द िफर बोली, “आओ, बठै ो, च दर!”

“म अब घर जाऊँ गा ”
“ऊँ हँ, यह देखो!” और उसने भीतर से कागज का एक बंडल िनकाला और बोली, “देखो, यह
पापा ने तु हारे िलए िदया है लखनऊ म कॉ े स है न वह पढऩे के िलए यह िनब ध
िलखा है उ ह ने शाम तक यह टाइप हो जाना चािहए जहाँ सं याएँ ह वहाँ खुद आपको
बठै कर बोलना होगा और पापा सुबह से ही कह गये ह समझे जनाब!” उसने िब कु ल
अ हड़ ब च क तरह गरदन िहलाकर शोख वर म कहा
कपरू ने बंडल ले िलया और कु छ सोचता हआ बोला, “लेिकन डॉ टर साहब का ह तलेख, इतने
पृ , शाम तक कौन टाइप कर देगा?”
“इसका भी इ तजाम ह,ै ” और अपने लाउज म से एक प िनकालकर च दर के हाथ म देती हई
बोली, “यह कोई पापा क पुरानी ईसाई छा ा है टाइिप ट इसके घर म तु ह पहँचाये देती
हँ मकु ज रोड पर रहती है यह उसी के यहाँ टाइप करवा लेना और यह खत उसे दे देना ”
“लेिकन अभी मने चाय नह पी ”
“समझ गये, अब तमु सोच रहे होगे िक इसी बहाने सुधा तु ह चाय भी िपला देगी सो मेरा काम
नह है जो म चाय िपलाऊँ ? पापा का काम है यह! चलो, आओ!”
च दर जाकर भीतर बठै गया और िकताब उठाकर देखने लगा, “अरे , चार किवता क िकताब
उठा लायी-समझ म आएँगी तु हारे ? य , सुधा?”
“नह !” िचढ़ाते हए सुधा बोली, “तमु कहो, तु ह समझा द इकनॉिम स पढऩे वाले या जान
सािह य?”
“अरे , मकु ज रोड पर ले चलो, ाइवर!” च दर बोला, “इधर कहाँ चल रहे हो?”
“नह , पहले घर चलो!” सुधा बोली, “चाय पी लो, तब जाना!”
“नह , म चाय नह िपऊँ गा ” च दर बोला

“चाय नह िपऊँ गा, वाह! वाह!” सुधा क हँसी म दिू धया बचपन छलक उठा-”महँु तो सखू कर
गोभी हो रहा ह,ै चाय नह िपएँगे ”
बँगला आया तो सुधा ने महरािजन से चाय बनाने के िलए कहा और च दर को टडी म म
िबठाकर याले िनकालने के िलए चल दी

2

वसै े तो यह घर, यह प रवार च कपरू का अपना हो चुका था; जब से वह अपनी माँ से झगडक़र
याग भाग आया था पढऩे के िलए, यहाँ आकर बी. ए. म भरती हआ था और कम खच के
खयाल से चौक म एक कमरा लेकर रहता था, तभी डॉ टर शु ला उसके सीिनयर टीचर थे और
उसक प रि थितय से अवगत थे च दर क अँ ेजी बहत ही अ छी थी और डॉ. शु ला उससे
अ सर छोटे-छोटे लेख िलखवाकर पि काओं म िभजवाते थे उ ह ने कई प के आिथक
त भ का काम च दर को िदलवा िदया था और उसके बाद च दर के िलए डॉ. शु ला का थान
अपने संर क और िपता से भी यादा हो गया था च दर शरमीला लड़का था, बेहद शरमीला,
कभी उसने यिू नविसटी के वजीफे के िलए भी कोिशश न क थी, लेिकन जब बी. ए. म वह सारी
यिू नविसटी म सव थम आया तब वयं इकनॉिम स िवभाग ने उसे यिू नविसटी के आिथक
काशन का वतै िनक स पादक बना िदया था एम. ए. म भी वह सव थम आया और उसके
बाद उसने रसच ले ली उसके बाद डॉ. शु ला यिू नविसटी से हटकर यरू ो म चले गये थे
अगर सच पछू ा जाय तो उसके सारे कै रयर का ये डॉ. शु ला को था िज ह ने हमेशा उसक
िह मत बढ़ायी और उसको अपने लड़के से बढक़र माना अपनी सारी मदद के बावजदू डॉ.
शु ला ने उससे इतना अपनापन बनाये रखा िक कै से धीरे -धीरे च दर सारी गै रयत खो बठै ा;
यह उसे खुद नह मालमू यह बँगला, इसके कमरे , इसके लॉन, इसक िकताब, इसके िनवासी,
सभी कु छ जसै े उसके अपने थे और सभी का उससे जाने िकतने ज म का स ब ध था
और यह न ही दुबली-पतली रं गीन च िकरन-सी सुधा जब आज से वष पहले यह सातव
पास करके अपनी बुआ के पास से यहाँ आयी थी तब से लेकर आज तक कै से वह भी च दर क
अपनी होती गयी थी, इसे च दर खुद नह जानता था जब वह आयी थी तब वह बहत शरमीली
थी, बहत भोली थी, आठव म पढऩे के बावजदू वह खाना खाते व रोती थी, मचलती थी तो
अपनी कॉपी फाड़ डालती थी और जब तक डॉ टर साहब उसे गोदी म िबठाकर नह मनाते थे,
वह कू ल नह जाती थी तीन बरस क अव था म ही उसक माँ चल बसी थी और दस साल
तक वह अपनी बुआ के पास एक गाँव म रही थी अब तेरह वष क होने पर गाँव वाल ने
उसक शादी पर जोर देना और शादी न होने पर गाँव क औरत ने हाथ नचाना और महँु
मटकाना शु िकया तो डॉ टर साहब ने उसे इलाहाबाद बुलाकर आठव म भत करा िदया
जब वह आयी थी तो आधी जंगली थी, तरकारी म घी कम होने पर वह महरािजन का चौका जठू ा
कर देती थी और रात म फू ल तोडक़र न लाने पर अकसर उसने माली को दाँत भी काट खाया
था च दर से ज र वह बेहद डरती थी, पर न जाने य च दर भी उससे नह बोलता था
लेिकन जब दो साल तक उसके ये उप व जारी रहे और अ सर डॉ टर साहब गु से के मारे उसे
न साथ िखलाते थे और न उससे बोलते थे, तो वह रो-रोकर और िसर पटक-पटककर अपनी
जान आधी कर देती थी तब अ सर च दर ने िपता और पु ी का समझौता कराया था, अ सर

सुधा को डाँटा था, समझाया था, और सुधा, घर-भर से अ हड़ पुरवाई और िव ोही झ के क तरह
तोड़-फोड़ मचाती रहने वाली सुधा, च दर क आँख के इशारे पर सुबह क नसीम क तरह
शा त हो जाती थी कब और य उसने च दर के इशार का यह मौन अनुशासन वीकार कर
िलया था, यह उसे खुद नह मालमू था, और यह सभी कु छ इतने वाभािवक ढंग से, इतना
अपने-आप होता गया िक दोन म से कोई भी इस ि या से वािकफ नह था, कोई भी इसके

ित जाग क न था, दोन का एक-दसू रे के ित अिधकार और आकषण इतना वाभािवक था
जसै े शरद क पिव ता या सुबह क रोशनी
और मजा तो यह था िक च दर क श ल देखकर िछप जाने वाली सुधा इतनी ढीठ हो गयी थी
िक उसका सारा िव ोह, सारी झझँु लाहट, िमजाज क सारी तेजी, सारा तीखापन और सारा
लड़ाई-झगड़ा, सभी क तरफ से हटकर च दर क ओर के ि त हो गया था वह िव ोिहनी अब

शा त हो गयी थी इतनी शा त, इतनी सुशील, इतनी िवन , इतनी िम भािषणी िक सभी को
देखकर ता जुब होता था, लेिकन च दर को देखकर जसै े उसका बचपन िफर लौट आता था और
जब तक वह च दर को िखझाकर, छेडक़र लड़ नह लेती थी उसे चनै नह पड़ता था अ सर

दोन म अनबोला रहता था, लेिकन जब दो िदन तक दोन महँु फु लाये रहते थे और डॉ टर
साहब के लौटने पर सुधा उ साह से उनके यरू ो का हाल नह पछू ती थी और खाते व दुलार
नह िदखाती थी तो डॉ टर साहब फौरन पछू ते थे, “ या... च दर से लड़ाई हो गयी या?” िफर
वह महँु फु लाकर िशकायत करती थी और िशकायत भी या- या होती थ , च दर ने उसक हेड
िम ेस का नाम एलीफटा ( ीमती हिथनी) रखा था, या च दर ने उसको िडबेट के भाषण के

वाइटं नह बताये, या च दर कहता है िक सुधा क सिखयाँ कोयला बेचती ह, और जब डॉ टर
साहब कहते ह िक वह च दर को डाँट दगे तो वह खुशी से फू ल उठती और च दर के आने पर
आँख नचाती हई िचढ़ाती थी, “कहो, कै सी डाँट पड़ी?”

वसै े सुधा अपने घर क पुरिखन थी िकस मौसम म कौन-सी तरकारी पापा को मािफक पड़ती
ह,ै बाजार म चीज का या भाव ह,ै नौकर चोरी तो नह करता, पापा िकतने सोसायिटय के

मे बर ह, च दर के इ नॉिम स के कोस म या ह,ै यह सभी उसे मालमू था मोटर या िबजली
िबगड़ जाने पर वह थोड़ी-बहत इजं ीिनय रं ग भी कर लेती थी और मातृ व का अंश तो उसम
इतना था िक हर नौकर और नौकरानी उससे अपना सुख-दु:ख कह देते थे पढ़ाई के साथ-
साथ घर का सारा काम-काज करते हए उसका वा य भी कु छ िबगड़ गया था और अपनी उ
के िहसाब से कु छ अिधक शा त, संयम, ग भीर और बुजुग थी, मगर अपने पापा और च दर, इन
दोन के सामने हमेशा उसका बचपन इठलाने लगता था दोन के सामने उसका दय उ मु
था और नेह बाधाहीन

लेिकन हाँ, एक बात थी उसे िजतना नेह और नेह-भरी फटकार और वा य के ित

िच ता अपने पापा से िमलती थी, वह सब बड़े िन: वाथ भाव से वह च दर को दे डालती थी

खाने-पीने क िजतनी परवाह उसके पापा उसक रखते थे, न खाने पर या कम खाने पर उसे

िजतने दुलार से फटकारते थे, उतना ही याल वह च दर का रखती थी और वा य के िलए
जो उपदेश उसे पापा से िमलते थे, उसे और भी नेह म पागकर वह च दर को दे डालती थी

च दर कै बजे खाना खाता ह,ै यहाँ से जाकर घर पर िकतनी देर पढ़ता ह,ै रात को सोते व दधू
पीता है या नह , इन सबका लेखा-जोखा उसे सुधा को देना पड़ता, और जब कभी उसके खाने-

पीने म कोई कमी रह जाती तो उसे सुधा क डाँट खानी ही पड़ती थी पापा के िलए सुधा अभी
ब ची थी; और वा य के मामले म सुधा के िलए च दर अभी ब चा था और कभी-कभी तो
सुधा क वा य-िच ता इतनी यादा हो जाती थी िक च दर बेचारा जो खुद त दु त था,
घबरा उठता था एक बार सुधा ने कमाल कर िदया उसक तबीयत खराब हई और डॉ टर ने
उसे लड़िकय का एक टॉिनक पीने के िलए बताया इ तहान म जब च दर कु छ दुबला-सा हो
गया तो सुधा अपनी बची हई दवा ले आयी और लगी च दर से िजद करने िक “िपयो इसे!”
जब च दर ने िकसी अखबार म उसका िव ापन िदखाकर बताया िक लड़िकय के िलए ह,ै तब

कह जाकर उसक जान बची

इसीिलए जब आज सुधा ने चाय के िलए कहा तो उसक ह काँप गयी य िक जब कभी सुधा
चाय बनाती थी तो याले के महँु तक दधू भरकर उसम दो-तीन च मच चाय का पानी डाल देती
थी और अगर उसने यादा ांग चाय क माँग क तो उसे खािलस दधू पीना पड़ता था और
चाय के साथ फल और मेवा और खुदा जाने या- या, और उसके बाद सुधा का इसरार, न खाने
पर सुधा का गु सा और उसके बाद क ल बी-चौड़ी मनुहार; इस सबसे च दर बहत घबराता
था लेिकन जब सुधा उसे टडी म म िबठाकर ज दी से चाय बना लायी तो उसे मजबरू होना
पड़ा, और बठै े-बठै े िनहायत बेबसी से उसने देखा िक सुधा ने याले म दधू डाला और उसके बाद
थोड़ी-सी चाय डाल दी उसके बाद अपने याले म चाय डालकर और दो च मच दधू डालकर
आप ठाठ से पीने लगे, और बेतक लुफ से दिू धया चाय का याला च दर के सामने िखसकाकर
बोली, “पीिजए, ना ता आ रहा है ”

च दर ने याले को अपने सामने रखा और उसे चार तरफ घुमाकर देखता रहा िक िकस तरफ से
उसे चाय का अशं िमल सकता है जब सभी ओर से याले म ीरसागर नजर आया तो उसने

हारकर याला रख िदया

“ य , पीते य नह ?” सुधा ने अपना याला रख िदया
“पीएँ या? कह चाय भी हो?”

“तो और या खािलस चाय पीिजएगा? िदमागी काम करने वाल को ऐसी ही चाय पीनी

चािहए ”

“तो अब मझु े सोचना पड़ेगा िक म चाय छोड़ँ या रसच न ऐसी चाय मझु े पस द, न ऐसा
िदमागी काम!”

“लो, आपको िव ास नह होता मेरी लासफे लो है गेसू काजमी; सबसे तेज लड़क ह,ै उसक
अ मी उसे दधू म चाय उबालकर देती है ”
“ या नाम है तु हारी सखी का?”
“गेस!ू ”
“बड़ा अ छा नाम ह!ै ”

“और या! मेरी सबसे घिन िम है और उतनी ही अ छी है िजतना अ छा नाम!”

“ज र-ज र,” महँु िबचकाते हए च दर ने कहा, “और उतनी ही काली होगी, िजतने काले
गेसू ”
“धत,् शरम नह आती िकसी लड़क के िलए ऐसा कहते हए!”
“और हमारे दो त क बुराई करती हो तब?”

“तब या! वे तो सब ह ही बुरे ! अ छा तो ना ता, पहले फल खाओ,” और वह लेट म छील-
छीलकर स तरा रखने लगी इतने म य ही वह झकु कर एक िगरे हए स तरे को नीचे से
उठाने लगी िक च दर ने झट से उसका याला अपने सामने रख िलया और अपना याला उधर

रख िदया और शा त िच से पीने लगा स तरे क फाँक उसक ओर बढ़ाते हए य ही उसने
एक घँटू चाय ली तो वह च ककर बोली, “अरे , यह या हआ?”
“कु छ नह , हमने उसम दधू डाल िदया तु ह िदमागी काम बहत रहता ह!ै ” च दर ने ठाठ से
चाय घँटू ते हए कहा सुधा कु ढ़ गयी कु छ बोली नह चाय ख म करके च दर ने घड़ी
देखी

“अ छा लाओ, या टाइप कराना ह?ै अब बहत देर हो रही है ”

“बस यहाँ तो एक िमनट बठै ना बुरा लगता है आपको! हम कहते ह िक ना ते और खाने के व
आदमी को ज दी नह करनी चािहए बिै ठए न!”

“अरे , तो तु ह कॉलेज क तयै ारी नह करनी ह?ै ”
“करनी य नह है आज तो गेसू को मोटर पर लेते हए तब जाना ह!ै ”
“तु हारी गेसू और कभी मोटर पर चढ़ी ह?ै ”
“जी, वह सािबर हसनै काजमी क लड़क ह,ै उसके यहाँ दो मोटर ह और रोज तो उसके यहाँ

दावत होती रहती ह ”

“अ छा, हमारी तो दावत कभी नह क ?”

“अहा हा, गेसू के यहाँ दावत खाएँगे! इसी महँु से! जनाब उसक शादी भी तय हो गयी ह,ै अगले
जाड़ तक शायद हो भी जाय ”

“िछः, बड़ी खराब लड़क हो! कहाँ रहता है यान तु हारा?”
सुधा ने मजाक म परािजत कर बहत िवजय-भरी मसु कान से उसक ओर देखा च दर ने
झपकर िनगाह नीची कर ली तो सुधा पास आकर च दर का क धा पकडक़र बोली-”अरे उदास
हो गये, नह भइया, तु हारा भी याह तय कराएँगे, घबराते य हो!” और एक मोटी-सी
इकनॉिम स क िकताब उठाकर बोली, “लो, इस मटु क से याह करोगे! लो बातचीत कर लो,
तब तक म वह िनब ध ले आऊँ , टाइप कराने वाला ”
च दर ने िखिसयाकर बड़ी जोर से सुधा का हाथ दबा िदया “हाय रे !” सुधा ने हाथ छु ड़ाकर
महँु बनाते हए कहा, “लो बाबा, हम जा रहे ह, काहे िबगड़ रहे ह आप?” और वह चली गयी!
डॉ टर साहब का िलखा हआ िनब ध उठा लायी और बोली, “लो, यह िनब ध क पा डु िलिप
है ” उसके बाद च दर क ओर बड़े दुलार से देखती हई बोली, “शाम को आओगे?”
“न!”

“अ छा, हम परे शान नह करगे तमु चुपचाप पढऩा जब रात को पापा आ जाएँ तो उ ह
िनब ध क ितिलिप देकर चले जाना!”

“नह , आज शाम को मेरी दावत है ठाकु र साहब के यहाँ ”
“तो उसके बाद आ जाना और देखो, अब फरवरी आ गयी ह,ै मा टर ढूँढ़ दो हम ”
“नह , ये सब झठू ी बात है हम कल सुबह आएँगे ”
“अ छा, तो सुबह ज दी आना और देखो, मा टर लाना मत भलू ना ाइवर तु ह मकु ज रोड
पहँचा देगा ”

वह कार म बठै गया और कार टाट हो गयी िक िफर सुधा ने पुकारा वह िफर उतरा सुधा
बोली, “लो, यह िलफाफा तो भलू ही गये थे पापा ने िलख िदया है उसे दे देना ”
“अ छा ” कहकर िफर च दर चला िक िफर सुधा ने पुकारा, “सुनो!”
“एक बार म य नह कह देती सब!” च दर ने झ लाकर कहा

“अरे बड़ी ग भीर बात है देखो, वहाँ कु छ ऐसी-वसै ी बात मत कहना लड़क से, वरना उसके
यहाँ दो बड़े-बड़े बुलडॉग ह ” कहकर उसने गाल फु लाकर, आँख फै लाकर ऐसी बुलडॉग क
भंिगमा बनायी िक च दर हँस पड़ा सुधा भी हँस पड़ी
ऐसी थी सुधा, और ऐसा था च दर

3

िसिवल लाइ स के एक उजाड़ िह से म एक पुराने-से बँगले के सामने आकर मोटर क
बँगले का नाम था 'रोजलान' लेिकन सामने के क पाउंड म जंगली घास उग रही थी और गलु ाब
के फू ल के बजाय अहाते म मरु गी के पंख िबखरे पड़े थे रा ते पर भी घास उग आयी थी और
और फाटक पर, िजसके एक ख भे क कॉिनस टू ट चुक थी, बजाय लोहे के दरवाजे के दो आड़े
बाँस लगे हए थे फाटक के एक ओर एक छोटा-सा लकड़ी का नामपटल लगा था, जो कभी
काला रहा होगा, लेिकन िजसे धलू , बरसात और हवा ने िचतकबरा बना िदया था च दर मोटर
से उतरकर उस बोड पर िलखे हए अधिमटे सफे द अ र को पढऩे क कोिशश करने लगा, और
जाने िकसका महँु देखकर सुबह उठा था िक उसे सफलता भी िमल गयी उस पर िलखा था, 'ए.
एफ. िड ू ज' उसने जेब से िलफाफा िनकाला और पता िमलाया िलफाफे पर िलखा था, 'िमस
पी. िड ू ज' यही बँगला ह,ै उसे स तोष हआ
“हॉन दो!” उसने ाइवर से कहा ाइवर ने हॉन िदया लेिकन िकसी का बाहर आना तो दरू ,
एक मरु गा, जो अहाते म कु डक़ु ड़ा रहा था, उसने मडु क़र बड़े स देह और ास से च दर क ओर
देखा और उसके बाद पंख फडफ़ड़ाते हए, चीखते हए जान छोडक़र भागा “बड़ा मनहस बँगला
ह,ै यहाँ आदमी रहते ह या ेत?” कपरू ने ऊबकर कहा और ाइवर से बोला, “जाओ तमु , हम
अ दर जाकर देखते ह!”
“अ छा हजरू , सुधा बीबी से या कह दगे?”
“कह देना, पहँचा िदया ”
कार मड़ु ी और कपरू बाँस फाँदकर अ दर घुसा आगे का पोिटको खाली पड़ा था और नीचे क
जमीन ऐसी थी जसै े कई साल से उस बँगले म कोई सवारी गाड़ी न आयी हो वह बरामदे म
गया दरवाजे ब द थे और उन पर धलू जमी थी एक जगह चौखट और दरवाजे के बीच म
मकड़ी ने जाला बुन रखा था 'यह बँगला खाली है या?' कपरू ने सोचा सुबह साढ़े आठ
बजे ही वहाँ ऐसा स नाटा छाया था िक िदल घबरा जाय आस-पास चार ओर आधी फलाग
तक कोई बँगला नह था उसने सोचा बँगले के पीछे क ओर शायद नौकर क झ पिडय़ाँ ह
वह दाय बाजू से मड़ु ा और खुशबू का एक तेज झ का उसे चमू ता हआ िनकल गया 'ता जुब ह,ै
यह स नाटा, यह मनहसी और इतनी खुशब!ू ' कपरू ने कहा और आगे बढ़ा तो देखा िक बँगले
के िपछवाड़े गलु ाब का एक बहत खबू सरू त बाग है क ची रिवश और बड़े-बड़े गलु ाब, हर रं ग
के वह सचमचु 'रोजलान' था
वह बाग म पहँचा उधर से भी बँगले के दरवाजे ब द थे उसने खटखटाया लेिकन कोई जवाब
नह िमला वह बाग म घुसा िक शायद कोई माली काम कर रहा हो बीच-बीच म ऊँ चे-ऊँ चे
जंगली चमेली के झाड़ थे और कह -कह लोहे क छड़ के कटघरे बेगमबेिलया भी फू ल रही थी
लेिकन चार ओर एक अजब-सा स नाटा था और हर फू ल पर िकसी खामोशी के फ र ते क

छाँह थी फू ल म रं ग था, हवा म ताजगी थी, पेड़ म ह रयाली थी, झ क म खुशबू थी, लेिकन
िफर भी सारा बाग एक ऐसे िसतार का गलु द ता लग रहा था िजनक चमक, िजनक रोशनी
और िजनक ऊँ चाई लुट चुक हो लगता था जसै े बाग का मािलक मौसमी रं गीनी भलू चुका
हो, य िक नै टिशयम या वीटपी या ला स, कोई भी मौसमी फू ल न था, िसफ गलु ाब थे और
जंगली चमेली थी और बेगमबेिलया थी जो साल पहले बोये गये थे उसके बाद उ ह क काट-

छाँट पर बाग चल रहा था बागबानी म कोई नवीनता और मौसम का उ लास न था

च दर फू ल का बेहद शौक न था सुबह घमू ने के िलए उसने द रया िकनारे के बजाय अ े ड
पाक चुना था य िक पानी क लहर के बजाय उसे फू ल के बाग के रं ग और सौरभ क लहर से
बेहद यार था और उसे दसू रा शौक था िक फू ल के पौध के पास से गजु रते हए हर फू ल को
समझने क कोिशश करना अपनी नाजुक टहिनय पर हँसते-मसु कराते हए ये फू ल जसै े अपने
रं ग क बोली म आदमी से िजंदगी का जाने कौन-सा राज कहना चाहते ह और ऐसा लगता है

िक जसै े हर फू ल के पास अपना यि गत स देश है िजसे वह अपने िदल क पाँखु रय म
आिह ते से सहेज कर रखे हए ह िक कोई सुनने वाला िमले और वह अपनी दा ताँ कह जाए
पौधे क ऊपरी फु नगी पर मसु कराता हआ आसमान क तरफ महँु िकये हए यह गलु ाब जो रात-
भर िसतार क मसु कराहट चुपचाप पीता रहा ह,ै यह अपने मोितय -पाँखु रय के होठ से जाने

य िखलिखलाता ही जा रहा है जाने इसे कौन-सा रह य िमल गया है और वह एक नीचे

वाली टहनी म आधा झकु ा हआ गलु ाब, झकु हई पलक -सी पाँखु रयाँ और दोहरे मखमली तार-
सी उसक डंडी, यह गलु ाब जाने य उदास ह?ै और यह दुबली-पतली ल बी-सी नाजुक कली
जो बहत सावधानी से हरा आँचल लपेटे है और थम ात-यौवना क तरह लाज म जो िसमटी तो

िसमटी ही चली जा रही ह,ै लेिकन िजसके यौवन क गलु ाबी लपट सात हरे परद म से झलक
ही पड़ती ह, झलक ही पड़ती ह और फारस के शाहजादे जसै ा शान से िखला हआ पीला

गलु ाब! उस पीले गलु ाब के पास आकर च दर क गया और झकु कर देखने लगा काितक
पनू ो के चाँद से झरने वाले अमतृ को पीने के िलए याकु ल िकसी सुकु मार, भावुक परी क फै ली
हई अजं िल के बराबर बड़ा-सा वह फू ल जसै े रोशनी िबखेर रहा था बेगमबेिलया के कंु ज से
छनकर आनेवाली तोतापंखी धपू ने जसै े उस पर धान-पान क तरह खुशनुमा ह रयाली िबखेर
दी थी च दर ने सोचा, उसे तोड़ ल लेिकन िह मत न पड़ी वह झकु ा िक उसे सँघू ही ल
सँघू ने के इरादे से उसने हाथ बढ़ाया ही था िक िकसी ने पीछे से गरजकर कहा, “हीयर यू आर,
आई हवै काट रे ड-है डेड टु डे!” (यह तमु हो; आज तु ह मौके पर पकड़ पाया हँ)
और उसके बाद िकसी ने अपने दोन हाथ म जकड़ िलया और उसक गरदन पर सवार हो

गया वह उछल पड़ा और अपने को छु ड़ाने क कोिशश करने लगा पहले तो वह कु छ समझ
नह पाया अजब रह यमय है यह बँगला एक अ य भय और एक िसहरन म उसके हाथ-

पाँव ढीले हो गये लेिकन उसने िह मत करके अपना एक हाथ छु ड़ा िलया और मडु क़र देखा तो
एक बहत कमजोर, बीमार-सा, पीली आँख वाला गोरा उसे पकड़े हए था च दर के दसू रे हाथ
को िफर पकडऩे क कोिशश करता हआ वह हाँफता हआ बोला (अँ ेजी म), “रोज-रोज यहाँ से

फू ल गायब होते थे म कहता था, कहता था, कौन ले जाता है हो...हो...,” वह हाँफता जा
रहा था, “आज मने पकड़ा तु ह रोज चुपके से चले जाते थे...” वह च दर को कसकर पकड़े
था लेिकन उस बीमार गोरे क साँस जसै े छू टी जा रही थी च दर ने उसे झटका देकर धके ल

िदया और डाँटकर बोला, “ या मतलब है तु हारा! पागल है या! खबरदार जो हाथ बढ़ाया, अभी
ढेर कर दँगू ा तझु े! गोरा सुअर!” और उसने अपनी आ तीन चढ़ाय
वह ध के से िगर गया था, धलू झाड़ते उठ बठै ा और बड़ी ही रोनी आवाज म बोला, “िकतना
जु म ह,ै िकतना जु म ह!ै मेरे फू ल भी तमु चुरा ले गये और मझु े इतना हक भी नह िक तु ह
धमकाऊँ ! अब तमु मझु से लड़ोगे! तमु जवान हो, म बढ़ू ा हँ हाय रे म!” और सचमचु वह जसै े
रोने लगा हो

च दर ने उसका रोना देखा और उसका सारा गु सा हवा हो गया और हँसी रोककर बोला,
“गलतफहमी ह,ै जनाब! म बहत दरू रहता हँ म िच ी लेकर िमस िड ू ज से िमलने आया
था ”

उसका रोना नह का, “तमु बहाना बनाते हो, बहाना बनाते हो और अगर म िव ास नह
करता तो तमु मारने क धमक देते हो? अगर म कमजोर न होता...तो तु ह पीसकर खा जाता
और तु हारी खोपड़ी कु चलकर फक देता जसै े तमु ने मेरे फू ल फके ह गे?”
“िफर तमु ने गाली दी! म उठाकर तु ह अभी नाले म फक दँगू ा!”
“अरे बाप रे ! दौड़ो, दौड़ो, मझु े मार डाला...पॉपी...टॉमी...अरे दोन कु े मर गये... ” उसने डर
के मारे चीखना शु िकया
“ या ह,ै बट ? य िच ला रहे हो?” बाथ म के अ दर से िकसी ने िच लाकर कहा

“अरे मार डाला इसने...दौड़ो-दौड़ो!”

झटके से बाथ म का दरवाजा खुला बेिदङ् -गाउन पहने हए एक लड़क दौड़ती हई आयी और
च दर को देखकर क गयी

“ या ह?ै ” उसने डाँटकर पछू ा
“कु छ नह , शायद पागल मालमू देता ह!ै ”
“जबान सँभालकर बोलो, वह मेरा भाई ह!ै ”

“ओह! कोई भी हो म िमस िड ू ज से िमलने आया था मने आवाज दी तो कोई नह बोला
म बाग म घमू ने लगा इतने म इसने मेरी गरदन पकड़ ली यह बीमार और कमजोर है वरना
अभी गरदन दबा देता ”

गोरा उस लड़क के आते ही िफर तनकर खड़ा हो गया और दाँत पीसकर बोला, “अरे म तु हारे
दाँत तोड़ दँगू ा बदमाश कह का, चुपके -चुपके आया और गलु ाब तोडऩे लगा म चमेली के
झाड़ के पीछे िछपा देख रहा था ”

“अभी म पुिलस बुलाती हँ, तमु देखते रहो बट इसे म फोन करती हँ ”
लड़क ने डाँटते हए कहा

“अरे भाई, म िमस िड ू ज से िमलने आया हँ ”
“म तु ह नह जानती, झठू ा कह का म िमस िड ू ज हँ ”
“देिखए तो यह खत!”

लड़क ने खत खोला और पढ़ा और एकदम उसने आवाज बदल दी

“िछः बट , तमु िकसी िदन पागलखाने जाओगे आपको डॉ. शु ला ने भेजा है तमु तो मझु े
बदनाम करा डालोगे!”

उसक श ल और भी रोनी हो गयी , “म नह जानता था, म जानता नह था ” उसने और भी

घबराकर कहा

“माफ क िजएगा!” लड़क ने बड़े मीठे वर म साफ िह दु तानी म कहा, “मेरे भाई का िदमाग
ज़रा ठीक नह रहता, जब से इनक प नी क मौत हो गयी ”

“इसका मतलब ये नह िक ये िकसी भले आदमी क इ जत उतार ल ” च दर ने िबगडक़र

कहा

“देिखए, बुरा मत मािनए म इनक ओर से माफ माँगती हँ आइए, अ दर चिलए ” उसने
च दर का हाथ पकड़ िलया उसका हाथ बेहद ठ डा था वह नहाकर आ रही थी उसके

हाथ के उस तषु ार पश से च दर िसहर उठा और उसने हाथ झटककर कहा, “अफसोस, आपका
हाथ तो बफ ह?ै ”

लड़क च क गयी वह स : नाता सहसा सचेत हो गयी और बोली, “अरे शतै ान तु ह ले जाए,
बट ! तु हारे पीछे म बेिदङ् गाउन म भाग आयी ” और बेिदङ् गाउन के दोन कालर पकडक़र
उसने अपनी खुली गरदन ढँकने का यास िकया और िफर अपनी पोशाक पर लि जत होकर
भागी

अभी तक गु से के मारे च दर ने उस पर यान ही नह िदया था लेिकन उसने देखा िक वह
तेईस बरस क दुबली-पतली त णी है लहराता हआ बदन, गले तक कटे हए बाल एं लो-
इिं डयन होने के बावजदू गोरी नह है चाय क तरह वह ह क , पतली, भरू ी और तशु थी
भागते व ऐसी लग रही थी जसै े छलकती हई चाय

इतने म वह गोरा उठा और च दर का क धा छू कर बोला, “माफ करना, भाई! उससे मेरी
िशकायत मत करना असल म ये गलु ाब मेरी मतृ प नी क यादगार ह जब इनका पहला पेड़
आया था तब म इतना ही जवान था िजतने तमु , और मेरी प नी उतनी ही अ छी थी िजतनी
प मी ”

“कौन प मी?”

“यह मेरी बहन िमला िड ू ज!”
“ओह! कब मरी आपक प नी?ï माफ क िजएगा मझु े भी मालमू नह था!”
“हाँ, म बड़ा अभागा हँ मेरा िदमाग कु छ खराब ह;ै देिखए!” कहकर उसने झकु कर अपनी
खोपड़ी च दर के सामने कर दी और बहत िगड़िगड़ाकर बोला, “पता नह कौन मेरे फू ल चुरा ले
जाता ह!ै अपनी प नी क मृ यु के बाद पाँच साल से म इन फू ल को सँभाल रहा हँ हाय रे म!
जाइए, प मी बुला रही है ”
िपछवाड़े के सहन का बीच का दरवाजा खुल गया था और प मी कपड़े पहनकर बाहर झाँक रही
थी च दर आगे बढ़ा और गोरा मडु क़र अपने गलु ाब और चमेली क झाड़ी म खो गया च दर
गया और कमरे म पड़े हए एक सोफा पर बठै गया प मी ट् वायलेट कर चुक थी और एक
ह क ा सीसी खुशबू से महक रही थी शै पू से धुले हए खे बाल जो मचले पड़ रहे थे,
खुशनुमा आसमानी रं ग का एक पतला िचपका हआ झीना लाउज और लाउज पर एक लनै ेल
का फु लपट िजसके दो गेिलस कमर, छाती और क धे पर िचपके हए थे होठ पर एक ह क
िलपि टक क झलक मा थी, और गले तक बहत ह का पाउडर, जो बहत नजदीक से ही मालमू
होता था ल बे नाखनू पर ह क गलु ाबी पट वह आयी, िन संकोच भाव से उसी सोफे पर
कपरू के बगल म बठै गयी और बड़ी मलु ायम आवाज म बोली, “मझु े बड़ा दु:ख ह,ै िम टर कपरू !

आपको बहत तवालत उठानी पड़ी चोट तो नह आयी?”

“नह , नह , कोई बात नह !” कपरू का सारा गु सा हवा हो गया कोई भी लड़क िन:संकोच
भाव से, इतनी अपनायत से सहानुभिू त िदखाये और माफ माँगे, तो उसके सामने कौन पानी-
पानी नह हो जाएगा, और िफर वह भी तब जबिक उसके होठ पर न के वल बोली अ छी लगती
हो, वरन िलपि टक भी इतनी यारी हो लेिकन च दर क एक आदत थी और चाहे कु छ न
हो, कम-से-कम वह यह अ छी तरह जानता था िक नारी जाित से यवहार करते समय कहाँ पर
िकतनी ढील देनी चािहए, िकतना कसना चािहए, कब सहानुभिू त से उ ह झकु ाया जा सकता
ह,ै कब अकड़कर इस व जानता था िक इस लड़क से वह िजतनी सहानुभिू त चाहे, ले
सकता ह,ै अपने अपमान के हजाने के तौर पर इसिलए कपरू साहब बोले, “लेिकन िमस
िड ू ज, आपके भाई बीमार होने के बावजदू बहत मजबतू ह उफ! गरदन पर जसै े अभी तक
जलन हो रही है ”
“ओहो! सचमचु म बहत शिम दा हँ देखँ!ू ” और कालर हटाकर उसने गरदन पर अपनी बफ ली
अँगिु लयाँ रख द , “लाइए, लोशन मल दँू म!”
“ध यवाद, ध यवाद, इतना क न क िजए आपक अँगिु लयाँ ग दी हो जाएँगी!” कपरू ने
बड़ी शालीनता से कहा
प मी के होठ पर एक ह क -सी मु कराहट, आँख म ह क -सी लाज और व म एक ह का-
सा क पन दौड़ गया यह वा य कपरू ने चाहे शरारत म ही कहा हो, लेिकन कहा इतने शा त
और संयत वर म िक प मी कु छ ितवाद भी न कर सक और िफर छह बरस से साठ बरस तक
क कौन ऐसी ी है जो अपने प क शंसा पर बेहोश न हो जाए
“अ छा लाइए, वह पीच कहाँ है जो मझु े टाइप करनी है ” उसने िवषय बदलते हए कहा
“यह लीिजए ” कपरू ने दे दी
“यह तो मिु कल से तीन-चार घ टे का काम ह?ै ” और प मी पीच को उलट-पुलटकर देखने
लगी
“माफ क िजएगा, अगर म कु छ यि गत सवाल पछू ू ँ; या आप टाइिप ट ह?” कपरू ने बहत
िश ता से पछू ा
“जी नह !” प मी ने उ ह कागज पर नजर गड़ाते हए कहा, “मने कभी टाइिपंग और शाटहड
सीखी थी, और तब म सीिनयर के ि ज पास करके यिू नविसटी गयी थी यिू नविसटी मझु े
छोडऩी पड़ी य िक मने अपनी शादी कर ली ”
“अ छा, आपके पित कहाँ ह?”

“रावलिपंडी म, आम म ”
“लेिकन िफर आप िड ू ज य िलखती ह, और िफर िमस?”
“ य िक हमलोग अलग हो गये ह ” और पीच के कागज को िफर तह करती हई बोली-

“िम टर कपरू , आप अिववािहत ह?”
“जी हाँ?”
“और िववाह करने का इरादा तो नह रखते?”

“नह ”
“बहत अ छे तब तो हम लोग म िनभ जाएगी म शादी से बहत नफरत करती हँ शादी

अपने को िदया जानेवाला सबसे बड़ा धोखा है देिखए, ये मेरे भाई ह न, कै से पीले और बीमार-
से ह ये पहले बड़े त दु त और टेिनस म ा त के अ छे िखलािडय़ म से थे एक िबशप क
दुबली-पतली भावुक लड़क से इ ह ने शादी कर ली, और उसे बेहद यार करते थे सुबह-शाम,
दोपहर, रात कभी उसे अलग नह होने देते थे हनीमनू के िलए उसे लेकर सीलोन गये थे
वह लड़क बहत कलाि य थी बहत अ छा नाचती थी, बहत अ छा गाती थी और खुद गीत
िलखती थी यह गलु ाब का बाग उसी ने बनवाया था और इ ह के बीच म दोन बठै कर घंट
गजु ार देते थे
“कु छ िदन बाद दोन म झगड़ा हआ लब म बॉल डा स था और उस िदन वह लड़क बहत
अ छी लग रही थी बहत अ छी डा स के व इनका यान डा स क तरफ कम था, अपनी
प नी क तरफ यादा इ ह ने आवेश म उसक अँगिु लयाँ जोर से दबा द वह चीख पड़ी और
सभी इन लोग क ओर देखकर हँस पड़े
“वह घर आयी और बहत िबगड़ी, बोली, 'आप नाच रहे थे या टेिनस का मचै खेल रहे थे, मेरा
हाथ था या टेिनस का रैकट?' इस बात पर बट भी िबगड़ गया, और उस िदन से जो इन लोग म
खटक तो िफर कभी न बनी धीरे -धीरे वह लड़क एक साजट को यार करने लगी बट को
इतना सदमा हआ िक वह बीमार पड़ गया लेिकन बट ने तलाक नह िदया, उस लड़क से
कु छ कहा भी नह , और उस लड़क ने साजट से यार जारी रखा लेिकन बीमारी म बट क बहत
सेवा क बट अ छा हो गया उसके बाद उसको एक ब ची हई और उसी म वह मर गयी
हालाँिक हम लोग सब जानते ह िक वह ब ची उस साजट क थी लेिकन बट को यक न नह
होता िक वह साजट को यार करती थी वह कहता ह,ै 'यह दसू रे को यार करती होती तो मेरी
इतनी सेवा कै से कर सकती थी भला!' उस ब ची का नाम बट ने रोज रखा और उसे लेकर
िदनभर उ ह गलु ाब के पेड़ के बीच म बठै ा करता था जसै े अपनी प नी को लेकर बठै ता था
दो साल बाद ब ची को साँप ने काट िलया, वह मर गयी और तब से बट का िदमाग ठीक नह
रहता खरै , जाने दीिजए आइए, अपना काम शु कर चिलए, अ दर के टडी- म म
चल!”
“चिलए!” च दर बोला और प मी के पीछे-पीछे चल िदया मकान बहत बड़ा था और पुराने
अँ ेज के ढंग पर सजा हआ था बाहर से िजतना पुराना और ग दा नजर आता था, अ दर से
उतना ही आलीशान और सुथरा ई ट इिं डया क पनी के जमाने क छाप थी अ दर यहाँ तक
िक िबजली लगने के बावजदू अ दर पुराने बड़े-बड़े हाथ से ख चे जाने वाले पंखे लगे थे दो
कमर को पार कर वे लोग टडी- म म पहँचे बड़ा-सा कमरा िजसम चार तरफ आलमा रय
म िकताब सजी हई थ चार कोने म चार मेज लगी हई थ िजनम कु छ ब ट और कु छ त वीर
टड के सहारे रखी हई थ एक आलमारी म नीचे खाने म टाइपराइटर रखा था प मी ने
िबजली जला दी और टाइपराइटर खोलकर साफ करने लगी च दर घमू कर िकताब देखने
लगा एक कोने म कु छ मराठी क िकताब रखी थ उसे बड़ा ता जुब हआ-”अ छा प मी,
ओह, माफ क िजएगा, िमस िड ू ज...”
“नह , आप मझु े प मी पुकार सकते ह मझु े यही नाम अ छा लगता ह-ै हाँ, या पछू रहे थे
आप?”

“ या आप मराठी भी जानती ह?”

“नह , म तो नह , मेरी नानीजी जानती थ या आपको डॉ टर शु ला ने हमलोग के बारे म
कु छ नह बताया?”
“नह !” कपरू ने कहा
“अ छा! ता जुब ह!ै ” प मी बोली, “आपने ेनाली िड ू ज का नाम सुना है न?”
“हाँ हाँ, िड ू ज िज ह ने कौशा बी क खुदाई करवायी थी वह तो बहत बड़े पुरात ववे ा थे?”
कपरू ने कहा
“हाँ, वही वह मेरे सगे नाना थे और वह अँ ेज नह थे, मराठा थे और उ ह ने मेरी नानी से

शादी क थी जो एक क मीरी ईसाई मिहला थ उनके कारण भारत म उ ह ईसाइयत अपनानी

पड़ी यह मेरे नाना का ही मकान है और अब हम लोग को िमल गया है डॉ. शु ला के दो त
िम टर ीवा तव बै र टर ह न, वे हमारे खानदान के ऐटन थे उ ह ने और डॉ. शु ला ने ही
यह जायदाद हम िदलवायी लीिजए, मशीन तो ठीक हो गयी ” उसने टाइपराइटर म काबन

और कागज लगाकर कहा, “लाइए िनब ध!”

इसके बाद घंटे-भर तक टाइपराइटर का नह कपरू ने देखा िक यह लड़क जो यवहार म
इतनी सरल और प ह,ै फै शन म इतनी नाजुक और शौक न ह,ै काम करने म उतनी ही
मेहनती और तेज भी है उसक अँगिु लयाँ मशीन क तरह चल रही थ और तेज इतनी िक
एक घंटे म उसने लगभग आधी पांडु िलिप टाइप कर डाली थी ठीक एक घ टे के बाद उसने
टाइपराइटर ब द कर िदया, बगल म बठै े हए कपरू क ओर झकु कर कहा, “अब थोड़ी देर
आराम ” और अपनी अँगिु लयाँ चटखाने के बाद वह कु रसी िखसकाकर उठी और एक भरपरू
अँगड़ाई ली उसका अगं -अंग धनुष क तरह झकु गया उसके बाद कपरू के क धे पर
बेतक लुफ से हाथ रखकर बोली, “ य , एक याला चाय मगँ वायी जाय?”
“म तो पी चुका हँ ”
“लेिकन मझु से तो काम होने से रहा अब िबना चाय के ” प मी एक अ हड़ ब ची क तरह
बोली, और अ दर चली गयी कपरू ने टाइप िकये हए कागज उठाये और कलम िनकालकर
उनक गलितयाँ सुधारने लगा चाय पीकर थोड़ी देर म प मी वापस आयी और बठै गयी
उसने एक िसगरे ट के स कपरू के सामने िकया
“ध यवाद, म िसगरे ट नह पीता ”

“अ छा, ता जुब ह,ै आपक इजाजत हो तो म िसगरे ट पी लँ!ू ”
“ या आप िसगरे ट पीती ह? िछः, पता नह य औरत का िसगरे ट पीना मझु े बहत ही नासप द
है ”

“मेरी तो मजबरू ी है िम टर कपरू , म यहाँ के समाज म िमलती-जुलती नह , अपने िववाह और
अपने तलाक के बाद मझु े ऐं लो-इिं डयन समाज से नफरत हो गयी है म अपने िदल से
िह दु तानी हँ लेिकन िह दु तािनय से घुलना-िमलना हमारे िलए स भव नह घर म
अके ले रहती हँ िसगरे ट और चाय से तबीयत बदल जाती है िकताब का मझु े शौक नह ”
“तलाक के बाद आपने पढ़ाई जारी य नह रखी?” कपरू ने पछू ा
“मने कहा न, िक िकताब का मझु े शौक नह िब कु ल!” प मी बोली “और म अपने को
आदिमय म घुलने-िमलने के लायक नह पाती तलाक के बाद साल-भर तक म अपने घर म
ब द रही म और बट िसफ बट से बात करने का मौका िमला बट मेरा भाई, वह भी

बीमार और बढ़ू ा कह कोई तक लुफ क गजुं ाइश नह अब म हरे क से बेतक लुफ से बात
करती हँ तो कु छ लोग मझु पर हँसते ह, कु छ लोग मझु े स य समाज के लायक नह समझते,
कु छ लोग उसका गलत मतलब िनकालते ह इसिलए मने अपने को अपने बँगले म ही कै द कर
िलया है अब आप ही ह, आज पहली बार मने देखा आपको म समझी ही नह िक आपसे

िकतना दुराव रखना चािहए अगर आप भलेमानस न ह तो आप इसका गलत मतलब िनकाल
सकते ह ”

“अगर यही बात हो तो...” कपरू हँसकर बोला, “स भव है िक म भलेमानस बनने के बजाय
गलत मतलब िनकालना यादा पस द क ँ ”
“तो स भव है म मजबरू होकर आपसे भी न िमलँ!ू ” प मी ग भीरता से बोली
“नह , िमस िड ू ज...”
“नह , आप प मी किहए, िड ू ज नह !”
“प मी सही, आप गलत न समझ, म मजाक कर रहा था ” कपरू बोला उसने इतनी देर म
समझ िलया था िक यह साधारण ईसाई छोकरी नह है

इतने म बट लडख़ड़ाता हआ, हाथ म धलू सना खुरपा िलये आया और चुपचाप खड़ा हो गया
और अपनी धँुधली पीली आँख से एकटक कपरू को देखने लगा कपरू ने एक कु रसी िखसका
दी और कहा, “आइए!” प मी उठी और बट के क धे पर एक हाथ रखकर उसे सहारा देकर

कु रसी पर िबठा िदया बट बठै गया और आँख ब द कर ल उसका बीमार कमजोर यि व
जाने कै सा लगता था िक प मी और कपरू दोन चुप हो गये थोड़ी देर बाद बट ने आँख खोल
और बहत क ण वर म बोला, “प मी, तमु नाराज हो, मने जान-बझू कर तु हारे िम का
अपमान नह िकया था?”

“अरे नह !” प मी ने उठकर बट का माथा सहलाते हए कहा, “म तो भलू गयी और कपरू भी
भलू गये?”
“अ छा, ध यवाद! प मी, अपना हाथ इधर लाओ!” और वह प मी के हाथ पर िसर रखकर पड़

रहा और बोला, “म िकतना अभागा हँ! िकतना अभागा! अ छा प मी, कल रात को तमु ने सुना
था, वह आयी थी और पछू रही थी, बट तु हारी तबीयत अब ठीक ह,ै मने झट अपनी आँख ढँक
ल िक कह आँख का पीलापन देख न ले मने कहा, तबीयत अब ठीक ह,ै म अ छा हँ तो उठी
और जाने लगी मने पछू ा, कहाँ चली, तो बोली साजट के साथ ज़रा लब जा रही हँ तमु ने
सुना था प मी?”
कपरू त ध-सा उन दोन क ओर देख रहा था प मी ने कपरू को आँख का इशारा करते हए
कहा, “हाँ, हमसे िमली थी वह, लेिकन बट , वह साजट के साथ नह गयी थी!”
“हाँ, तब?” बट क आँख चमक उठ और उसने उ लास-भरे वर म पछू ा
“वह बोली, बट के ये गलु ाब साजट से यादा यारे ह ” प मी बोली
“अ छा!” मसु कराहट से बट का चेहरा िखल उठा, उसक पीली-पीली आँख और धँस गय और
दाँत बाहर झलकने लगे, “हँ! या कहा उसने, िफर तो कहो!”
उसने कहा, “ये गलु ाब साजट से यादा यारे ह, िफर इ ह गलु ाब पर नाचती रही और सुबह
होते ही इ ह फू ल म िछप गयी! तु ह सुबह िकसी फू ल म तो नह िमली?”
“उहँ, तु ह तो िकसी फू ल म नह िमली?” बट ने ब च के -से भोले िव ास के वर म कपरू से

पछू ा
च दर च क उठा प मी और बट क इन बात पर उसका मन बेहद भर आया था बट क

मसु कराहट पर उसक नस थरथरा उठी थ
“नह ; मने तो नह देखा था ” च दर ने कहा

बट ने िफर मायसू ी से िसर झकु ा िलया और आँख ब द कर ल और कराहती हई आवाज म
बोला, “िजस फू ल म वह िछप गयी थी, उसी को िकसी ने चुरा िलया होगा!” िफर सहसा वह
तनकर खड़ा हो गया और पुचकारते हए बोला, “जाने कौन ये फू ल चुराता ह!ै अगर मझु े एक बार
िमल जाए तो म उसका खनू ऐसे पी लँ!ू ” उसने हाथ क अँगलु ी काटते हए कहा और उठकर
लडख़ड़ाता हआ चला गया

वातावरण इतना भारी हो गया था िक िफर प मी और कपरू ने कोई बात नह क प मी ने
चुपचाप टाइप करना शु िकया और कपरू चुपचाप बट क बात सोचता रहा घंटा-भर बाद
टाइपराइटर खामोश हआ तो कपरू ने कहा-
“प मी, मने िजतने लोग देखे ह उनम शायद बट सबसे िविच है और शायद सबसे दयनीय!”

प मी खामोश रही िफर उसी लापरवाही से अँगड़ाई लेते हए बोली, “मझु े बट क बात पर ज़रा
भी दया नह आती म उसको िदलासा देती हँ य िक वह मेरा भाई है और ब चे क तरह

नासमझ और लाचार है ”

कपरू च क गया वह प मी क ओर आ य से चुपचाप देखता रहा; कु छ बोला नह
“ य , तु ह ता जुब य होता ह?ै ” प मी ने कु छ मसु कराकर कहा, “लेिकन म सच कहती हँ”-
वह बहत ग भीर हो गयी, “मझु े जरा तरस नह आता इस पागलपन पर ” ण-भर चुप रही,
िफर जसै े बहत ही तेजी से बोली, “तमु जानते हो उसके फू ल कौन चुराता ह?ै म, म उसके फू ल
तोडक़र फक देती हँ मझु े शादी से नफरत ह,ै शादी के बाद होने वाली आपसी धोखेबाजी से
नफरत ह,ै और उस धोखेबाजी के बाद इस झठू मठू क यादगार और बेईमानी के पागलपन से
नफरत है और ये गलु ाब के फू ल, ये य मू यवान ह, इसिलए न िक इसके साथ बट क
िजंदगी क इतनी बड़ी ेजेडी गथँु ी हई है अगर एक फू ल के खबू सरू त होने के िलए आदमी क
िजंदगी म इतनी बड़ी ेजेडी आना ज री है तो लानत है उस फू ल क खबू सरू ती पर! म उससे
नफरत करती हँ इसीिलए म िकताब से नफरत करती हँ एक कहानी िलखने के िलए

िकतनी कहािनय क ेजेडी बदा त करनी होती है ”

प मी चुप हो गयी उसका चेहरा सुख हो गया था थोड़ी देर बाद उसका तशै उतर गया और
वह अपने आवेश पर खुद शरमा गयी उठकर वह कपरू के पास गयी और उसके क ध पर हाथ
रखकर बोली, “बट से मत कहना, अ छा?”

कपरू ने िसर िहलाकर वीकृ ित दी और कागज समेटकर खड़ा हआ प मी ने उसके क ध पर
हाथ रखकर उसे अपनी ओर घुमाकर कहा, “देखो, िपछले चार साल से म अके ली थी, और िकसी
दो त का इ तजार कर रही थी, तमु आये और दो त बन गये तो अब अ सर आना, ऐ?ं ”
“अ छा!” कपरू ने ग भीरता से कहा
“डॉ. शु ला से मेरा अिभवादन कहना, कभी यहाँ ज र आएँ ”
“आप कभी चिलए, वहाँ उनक लड़क है आप उससे िमलकर खुश ह गी ”
प मी उसके साथ फाटक तक पहँचाने चली तो देखा बट एक चमेली के झाड़ म टहिनयाँ हटा-

हटाकर कु छ ढूँढ़ रहा था प मी को देखकर पछू ा उसने-”तु ह याद ह;ै वह चमेली के झाड़ म तो
नह िछपी थी?” कपरू ने पता नह य ज दी प मी को अिभवादन िकया और चल िदया उसे
बट को देखकर डर लगता था

4

सुधा का कॉलेज बड़ा एका त और खबू सरू त जगह बना हआ था दोन ओर ऊँ ची-सी मेड़ और
बीच म से कं कड़ क एक खबू सरू त घुमावदार सड़क दाय ओर चने और गेहँ के खेत, बेर और
शहततू के झाड़ और बाय ओर ऊँ चे-ऊँ चे टीले और ताड़ के ल बे-ल बे पेड़ शहर से काफ
बाहर देहात का-सा नजारा और इतना शा त वातावरण लगता था िक यहाँ कोई उथल-पुथल,
कोई शोरगलु है ही नह जगह इतनी हरी-भरी िक दज के कमर के पीछे ही महआ चतू ा था
और ल बी-ल बी घास क दुपह रया के नीले फू ल क जंगली लतर उलझी रहती थ
और इस वातावरण ने अगर िकसी पर सबसे यादा भाव डाला था तो वह थी गेसू उसे अ छी
तरह मालमू था िक बाँस के झाड़ के पीछे िकस चीज के फू ल ह पुराने पीपल पर िगलोय क
लतर चढ़ी है और कर दे के झाड़ के पीछे एक साही क माँद है नागफनी क झाड़ी के पास
एक बार उसने एक लोमड़ी भी देखी थी शहर के एक मशहर रईस सािबर हसनै काजमी क
वह सबसे बड़ी लड़क थी उसक माँ, िज ह उसके िपता अदन से याह कर लाये थे, शहर क
मशहर शायरा थ हालाँिक उनका दीवान छपकर मशहर हो चुका था, मगर वह िकसी भी
बाहरी आदमी से कभी नह िमलती-जुलती थ , उनक सारी दुिनया अपने पित और अपने ब च
तक सीिमत थी उ ह शायराना नाम रखने का बहत शौक था अपनी दोन लड़िकय का
नाम उ ह ने गेसू और फू ल रखा था और अपने छोटे ब चे का नाम हसरत हाँ, अपने पितदेव
सािबर साहब के ह के से बेहद िचढ़ती थ और उनका नाम उ ह ने रखा था, 'आितश-िफजाँ '
घास, फू ल, लतर और शायरी का शौक गेसू ने अपनी माँ से िवरासत म पाया था िक मत से
उसका कॉलेज भी ऐसा िमला िजसम दज क िखड़िकय से आम क शाख झाँका करती थ
इसिलए हमेशा जब कभी मौका िमलता था, लास से भाग कर गेसू घास पर लेटकर सपने
देखने क आदी हो गयी थी लास के इस महािभिन मण और उसके बाद लतर क छाँह म
जाकर यान-योग क साधना म उसक एकमा सािथन थी सुधा आम क घनी छाँह म हरी-
हरी दबू म दोन िसर के नीचे हाथ रखकर लेट रहत और दुिनया-भर क बात करत बात म
छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी िकस तरह क बात करती थ , यह वही समझ सकता है िजसने
कभी दो अिभ न सहेिलय क एका त वाता सुनी हो गािलब क शायरी से लेकर, उनके छोटे
भाई हसरत ने एक कु े का िप ला पाला ह,ै यह गेसू सुनाया करती थी और शरत के उप यास
से लेकर यह िक उसक मािलन ने िगलट का कड़ा बनवाया ह,ै यह सुधा बताया करती थी
दोन अपने-अपने मन क बात एक-दसू रे को बता डालती थ और िजतना भावुक, यारा,
अनजान और सुकु मार दोन का मन था, उतनी ही भावुक और सुकु मार दोन क बात हाँ
भावुक, सुकु मार दोन ही थ , लेिकन दोन म एक अ तर था गेसू शायर होते हए भी इस
दुिनया क थी और सुधा शायर न होते हए भी क पनालोक क थी गेसू अगर झािड़य म से

कु छ फू ल चुनती तो उ ह सँघू ती, उ ह अपनी चोटी म सजाती और उन पर च द शे'र कहने के
बाद भी उ ह माला म िपरोकर अपनी कलाई म लपेट लेती सुधा लतर के बीच म िसर रखकर
लेट जाती और िनिनमेष पलक से फू ल को देखती रहती और आँख से न जाने या पीकर उ ह
उ ह क डाल पर फू लता हआ छोड़ देती गेसू हर चीज का उिचत इ तेमाल जानती थी, िकसी
भी चीज को पस द करने या यार करने के बाद अब उसका या उपयोग ह,ै ि या मक यथाथ

जीवन म उसका या थान ह,ै यह गेसू खबू समझती थी लेिकन सुधा िकसी भी फू ल के जादू
म बँध जाना चाहती थी, उसी क क पना म डू ब जाना जानती थी, लेिकन उसके बाद सुधा को
कु छ नह मालमू था गेसू क क पना और भावुक सू मता शायरी म य हो जाती थी, अत:
उसक िजंदगी म काफ यावहा रकता और यथाथ था, लेिकन सुधा, जो शायरी िलख नह
सकती थी, अपने वभाव और गठन म खुद ही एक मासमू शायरी बन गयी थी वह भी िपछले
दो साल म तो सचमचु ही इतनी ग भीर, सुकु मार और भावनामयी बन गयी थी िक लगता था
िक सरू के गीत से उसके यि व के रे शे बुन गये ह
लड़िकयाँ, गेसू और सुधा के इस वभाव और उनक अिभ नता से वािकफ थ और इसिलए
जब आज सुधा क मोटर आकर सायबान म क और उसम से सुधा और गेसू हाथ म फाइल िलये
उतर तो कािमनी ने हँसकर भा से कहा, “लो, च दा-सरू ज क जोड़ी आ गयी!” सुधा ने सुन
िलया मसु कराकर गेसू क ओर िफर कािमनी और भा क ओर देखकर हँस दी सुधा बहत
कम बोलती थी, लेिकन उसक हँसी ने उसे खुशिमजाज सािबत कर रखा था और वह सभी क
यारी थी भा ने आकर सुधा के गले म बाँह डालकर कहा, “गेसू बानो, थोड़ी देर के िलए
सुधारानी को हम दे दो जरा कल के नोट् स उतारने ह इनसे पछू कर ”
गेसू हँसकर बोली, “उसके पापा से तय कर ले, िफर तू िजंदगी भर सुधा को पाल-पोस, मझु े या
करना है ”

जब सुधा भा के साथ चली गयी तो गेसू ने कािमनी के क धे पर हाथ रखा और कहा, “क मो
रानी, अब तो तु ह हमारे िह से म पड़ी, आओ चलो, देख लतर म कु द ह?”
“कु द तो नह , अब चने का खेत ह रया आया है ” क मो बोली
गहृ -िव ान का पी रयड था और िमस उमालकर पढ़ा रही थ बीच क कतार क एक बच पर
कािमनी, भा, गेसू और सुधा बठै ी थ िह सा बाँट अभी तक कायम था, अत: कािमनी के
बगल म गेस,ू गेसू के बगल म भा और भा के बाद बच के कोने पर सुधा बठै ी थी िमस
उमालकर रोिगय के खान-पान के बारे म समझा रही थ मेज के बगल म खड़ी हई, हाथ म

एक िकताब िलये हए, उसी पर िनगाह लगाये वह बोलती जा रही थ शायद अँगरे जी क

िकताब म जो कु छ िलखा हआ था, उसी का िह दी म उ था करते हए बोलती जा रही थ , “आलू
एक नुकसानदेह तरकारी ह,ै रोग क हालत म वह खु क होता ह,ै गरम होता है और हजम
मिु कल से होता ह.ै .. ”
सहसा गेसू ने एकदम बीच से पछू ा, “गु जी, गाँधी जी आलू खाते ह या नह ?” सभी हँस पड़े
िमस उमालकर ने बहत गु से से गेसू क ओर देखा और डाँटकर कहा, “ हाइ टॉक ऑव गाँधी?
आई वा ट नो पोिलिटकल िड शन इन लास (गाँधी से या मतलब? म दज म राजनीितक

बहस नह चाहती )” इस पर तो सभी लड़िकय क दबी हई हँसी फू ट पड़ी िमस उमालकर
झ ला गय और मेज पर िकताब पटकते हए बोल , “साइले स (खामोश)!” सभी चुप हो गये

उ ह ने िफर पढ़ाना शु िकया
“िजगर के रोिगय के िलए हरी तरका रयाँ बहत फायदेम द होती ह लौक , पालक और हर

िक म के हरे साग त दु ती के िलए बहत फायदेम द होते ह ”
सहसा भा ने कु हनी मारकर गेसू से कहा, “ले, िफर या ह,ै िनकाल चने का हरा साग, खा-
खाकर मोटे ह िमस उमालकर के घंटे म!”

गेसू ने अपने कु रते क जेब से बहत-सा साग िनकालकर कािमनी और भा को िदया
िमस उमालकर अब श कर के हािन-लाभ बता रही थ , “ल बे रोग के बाद रोगी को श कर कम

देनी चािहए दधू या साबदू ाने म ताड़ क िम ी िमला सकते ह दधू तो लकू ोज के साथ बहत
वािद लगता है ”

इतने म जब तक सुधा के पास साग पहँचा िक फौरन िमस उमालकर ने देख िलया वह समझ
गय , यह शरारत गेसू क होगी, “िमस गेस,ू बीमारी क हालत म दधू काहे के साथ वािद
लगता ह?ै ”

इतने म सुधा के महँु से िनकला, “साग काहे के साथ खाएँ?” और गेसू ने कहा, “नमक के
साथ!”

“हँ? नमक के साथ?” िमस उमालकर ने कहा, “बीमारी म दधू नमक के साथ अ छा लगता है
खड़ी हो! कहाँ था यान तु हारा?”
गेसू स न िमस उमालकर का चेहरा मारे गु से के लाल हो रहा था
“ या बात कर रही थ तमु और सुधा?”
गेसू स न!
“अ छा, तमु लोग लास के बाहर जाओ, और आज हम तु हारे गािजयन को खत भेजगे चलो,
जाओ बाहर ”

सुधा ने कु छ मसु कराते हए भा क ओर देखा और भा हँस दी गेसू ने देखा िक िमस
उमालकर का पारा और भी चढऩे वाला है तो वह चुपचाप िकताब उठाकर चल दी सुधा भी
पीछे-पीछे चल दी कािमनी ने कहा, “खत-वत भेजती रहना, सुधा!” और लास ठठाकर हँस
पड़ी िमस उमालकर गु से से नीली पड़ गय , “ लास अब ख म होगी ” और रिज टर
उठाकर चल द गेसू अभी अ दर ही थी िक वह बाहर चली गय और उनके जरा दरू पहँचते ही
गेसू ने बड़ी अदा से कहा, “बड़े बेआब होकर तेरे कू चे से हम िनकले!” और सारी लास िफर
हँसी से गजँू उठी लड़िकयाँ िचिड़य क तरह फु र हो गय और थोड़ी ही देर म सुधा और गेसू
बडै िमटं न फ ड के पास वाले छतनार पाकड़ के नीचे लेटी हई थ

बड़ी खुशनुमा दोपहरी थी खुशबू से लदे ह के -ह के झ के गेसू क ओढ़नी और गरारे क
िसलवट से आँखिमचौली खेल रहे थे आसमान म कु छ ह के पहले बादल उड़ रहे थे और
जमीन पर बादल क साँवली छायाएँ दौड़ रही थ घास के ल बे-चौड़े मदै ान पर बादल क

छायाओं का खेल बड़ा मासमू लग रहा था िजतनी दरू तक छाँह रहती थी, उतनी दरू तक घास
का रं ग गहरा काही हो जाता था, और जहाँ-जहाँ बादल से छनकर धपू बरसने लगती थी वहाँ-
वहाँ घास सुनहरे धानी रं ग क हो जाती थी दरू कह पर पानी बरसा था और बादल ह के
होकर खरगोश के मासमू व छ द ब च क तरह दौड़ रहे थे सुधा आँख पर फाइल क छाँह
िकये हए बादल क ओर एकटक देख रही थी गेसू ने उसक ओर करवट बदली और उसक

वेणी म लगे हए रे शमी फ ते को उँगली म उमेठते हए एक ल बी-सी साँस भरकर कहा-

बादशाह क मअु र वाबगाह म कहाँ
वह मजा जो भीगी-भीगी घास पर सोने म ह,ै

मतु मइन बेिफ लोग क हँसी म भी कहाँ
लु फ जो एक-दसू रे को देखकर रोने म है
सुधा ने बादल से अपनी िनगाह नह हटायी, बस एक क ण सपनीली मसु कराहट िबखेरकर
रह गयी

या देख रही ह,ै सुधा?” गेसू ने पछू ा
“बादल को देख रही हँ ” सुधा ने बेहोश आवाज म जवाब िदया गेसू उठी और सुधा क छाती
पर िसर रखकर बोली-

कै फ बरदोश, बादल को न देख,

बेखबर, तू न कु चल जाय कह !
और सुधा के गाल म जोर क चुटक काट ली “हाय रे !” सुधा ने चीखकर कहा और उठ बठै ी,
“वाह वाह! िकतना अ छा शेर ह!ै िकसका ह?ै ”

“पता नह िकसका है ” गेसू बोली, “लेिकन बहत सच है सुधी, आ माँ के बादल के दामन म
अपने वाब टाँक लेना और उनके सहारे िजंदगी बसर करने का खयाल है तो बड़ा नाजुक,
मगर रानी बड़ा खतरनाक भी है आदमी बड़ी ठोकर खाता है इससे तो अ छा है िक आदमी

को नाजुकखयाली से सािबका ही न पड़े खाते-पीते, हँसते-बोलते आदमी क िजंदगी कट
जाए ”

सुधा ने अपना आँचल ठीक िकया, और लट म से घास के ितनके िनकालते हए कहा, “गेस,ू
अगर हम लोग को भी शादी- याह के झझं ट म न फँ सना पड़े और इसी तरह िदन कटते जाएँ तो
िकतना मजा आए हँसते-बोलते, पढ़ते-िलखते, घास म लेटकर बादल से यार करते हए
िकतना अ छा लगता ह,ै लेिकन हम लड़िकय क िजंदगी भी या! म तो सोचती हँ गेस;ू कभी
याह ही न क ँ हमारे पापा का यान कौन रखेगा?”
गेसू थोड़ी देर तक सुधा क आँख म आँख डालकर शरारत-भरी िनगाह से देखती रही और
मसु कराकर बोली, “अरे , अब ऐसी भोली नह हो रानी तमु ! ये शबाब, ये उठान और याह नह
करगी, जोगन बनगी ”

“अ छा, चल हट बेशरम कह क , खुद याह करने क ठान चुक है तो दुिनया-भर को य
तोहमत लगाती ह!ै ”

“म तो ठान ही चुक हँ, मेरा या! ि क तो तमु लोग क है िक याह नह होता तो लेटकर
बादल देखती ह ” गेसू ने मचलते हए कहा
“अ छा अ छा,” गेसू क ओढ़नी ख चकर िसर के नीचे रखकर सुधा ने कहा, “ या हाल है तेरे
अ तर िमयाँ का? मगँ नी कब होगी तेरी?”
“मगँ नी या, िकसी भी िदन हो जाय, बस फू फ जान के यहाँ आने-भर क कसर है वसै े अ मी
तो फू ल क बात उनसे चला रही थ , पर उ ह ने मेरे िलए इरादा जािहर िकया बड़े अ छे ह, आते
ह तो घर-भर म रोशनी छा जाती है ” गेसू ने बहत भोलेपन से गोद म सुधा का हाथ रखकर
उसक उँगिलयाँ िचटकाते हए कहा

“वे तो तेरे चचाजाद भाई ह न? तझु से तो पहले उनसे बोल-चाल रही होगी ” सुधा ने पछू ा
“हाँ-हाँ, खबू अ छी तरह से मौलवी साहब हम लोग को साथ-साथ पढ़ाते थे और जब हम
दोन सबक भलू जाते थे तो एक-दसू रे का कान पकडक़र साथ-साथ उठते-बठै ते थे ” गेसू कु छ
झपते हए बोली

सुधा हँस पड़ी, “वाह रे ! ेम क इतनी िविच शु आत मने कह नह सुनी थी तब तो तमु
लोग एक-दसू रे का कान पकडऩे के िलए अपने-आप सबक भलू जाते ह गे?”
“नह जी, एक बार िफर पढक़र कौन सबक भलू ता है और एक बार सबक याद होने के बाद
जानती हो इ क म या होता ह-ै

मकतबे इ क म इक ढंग िनराला देखा,

उसको छु ी न िमली िजसको सबक याद हआ"
“खरै , यह सब बात जाने दे सुधा, अब तू कब याह करे गी?”
“ज दी ही क ँ गी ” सुधा बोली
“िकससे?”

“तझु से ” और दोन िखलिखलाकर हँस पड़
बादल हट गये थे और पाकड़ क छाँह को चीरते हए एक सुनहली रोशनी का तार िझलिमला
उठा हँसते व गेसू के कान के टॉप चमक उठे और सुधा का यान उधर िखंच गया “ये कब
बनवाया तनू े?”
“बनवाया नह ”

“तो उ ह ने िदये ह गे, य ?”

गेसू ने शरमाकर िसर िहला िदया
सुधा ने उठकर हाथ से छू ते हए कहा, “िकतने सु दर कमल ह! वाह! य , गेस!ू तनू े सचमचु के
कमल देखे ह?”

“न ”

“मने देखे ह ”

“कहाँ?”
“असल म पाँच-छह साल पहले तक तो म गाँव म रहती थी न! ऊँ चाहार के पास एक गाँव म मेरी
बुआ रहती ह न, बचपन से म उ ह के पास रहती थी पढ़ाई क शु आत मने वह क और
सातव तक वह पढ़ी तो वहाँ मेरे कू ल के पीछे के पोखरे म बहत-से कमल थे रोज शाम
को म भाग जाती थी और तालाब म घुसकर कमल तोड़ती और घर से बुआ एक ल बा-सा स टा
लेकर गािलयाँ देती हई आती थ मझु े पकड़ने के िलए जहाँ वह िकनारे पर पहँचत तो म
कहती, अभी डू ब जाएँगे बुआ, अभी डू बे, तो बहत रबड़ी-मलाई क लालच देकर वह िम नत
करत -िनकल आओ, तो म िनकलती थी तमु ने तो कभी देखा नह होगा हमारी बुआ को?”
“न, तनू े कभी िदखाया ही नह ”
“इधर बहत िदन से आय ही नह वे आएँगी तो िदखाऊँ गी तझु े और उनक एक लड़क
है बड़ी यारी, बहत मजे क है उसे देखकर तो तमु उसे बहत यार करोगी वो तो अब यह
आने वाली है अब यह पढ़ेगी ”

“िकस दज म पढ़ती ह?ै ”

“ ाइवेट िवदुषी म बठै ेगी इस साल खबू गोल-मटोल और हँसमखु है ” सुधा बोली
इतने म घंटा बोला और गेसू ने सुधा के परै के नीचे दबी हई अपनी ओढ़नी ख ची
“अरे , अब आिखरी घंटे म जाकर या पढ़ोगी! हािजरी कट ही गयी अब बठै ो यह बातचीत कर,
आराम कर ” सुधा ने अलसाये वर म कहा और खड़ी होकर एक मदमाती हई अँगड़ाई ली-गेसू
ने हाथ पकडक़र उसे िबठा िलया और बड़ी ग भीरता से कहा, “देखो, ऐसी अरसौह अँगड़ाई न
िलया करो, इससे लोग समझ जाते ह िक अब बचपन करवट बदल रहा है ”
“धत!् ” बेहद झपकर और फाइल म महँु िछपाकर सुधा बोली
“लो, तमु मजाक समझती हो, एक शायर ने तु हारी अँगड़ाई के िलए कहा ह-ै
कौन ये ले रहा है अँगड़ाई
आसमान को न द आती ह”ै
“वाह!” सुधा बोली, “अ छा गेस,ू आज बहत-से शेर सुनाओ ”
“सुनो-
इक रदायेतीरगी है और खाबेकायनात
डू बते जाते ह तारे , भीगती जाती है रात!”
“पहली लाइन के या मतलब ह?” सुधा ने पछू ा
“ रदायेतीरगी के माने ह अँधेरे क चादर और खाबेकायनात के माने ह िजंदगी का सपना-अब
िफर सुनो शेर-
इक रदायेतीरगी है और खाबेकायनात
डू बते जाते ह तारे , भीगती जाती है रात!”
“वाह! िकतना अ छा ह-ै अ धकार क चादर ह,ै जीवन का व न ह,ै तारे डू बते जाते ह, रात
भीगती जाती ह.ै ..गेस,ू उदू क शायरी बहत अ छी है ”
“तो तू खुद उदू य नह पढ़ लेती?” गेसू ने कहा
“चाहती तो बहत हँ, पर िनभ नह पाता!”
“िकसी िदन शाम को आओ सुधा तो अ मीजान से तझु े शेर सुनवाएँ यह ले तेरी मोटर तो आ
गयी ”
सुधा उठी, अपनी फाइल उठायी गेसू ने अपनी ओढऩी झाड़ी और आगे चली पास आकर
उचककर उसने ि ंिसपल का म देखा वह खाली था उसने दाई को खबर दी और मोटर पर
बठै गयी
गेसू बाहर खड़ी थी “चल तू भी न!”
“नह , म गाड़ी पर चली जाऊँ गी ”
“अरे चलो, गाड़ी साढ़े चार बजे जाएगी अभी घंटा-भर है घर पर चाय िपएँगे, िफर मोटर
पहँचा देगी जब तक पापा नह ह, तब तक िजतना चाहो कार िघसो!”
गेसू भी आ बठै ी और कार चल दी

5

दसू रे िदन जब च दर डॉ. शु ला के यहाँ िनब ध क ितिलिप लेकर पहँचा तो आठ बज चुके
थे सात बजे तो च दर क न द ही खुली थी और ज दी से वह नहा-धोकर साइिकल दौड़ाता
हआ भागा था िक कह भाषण क ितिलिप पहँचने म देर न हो जाए
जब वह बँगले पर पहँचा तो धपू फै ल चुक थी अब धपू भली नह मालमू देती थी, धपू क तेजी
बदा त के बाहर होने लगी थी, लेिकन सुधा नीलकाँटे के ऊँ चे-ऊँ चे झाड़ क छाँह म एक छोटी-
सी कु रसी डाले बठै ी थी बगल म एक छोटी-सी मेज थी िजस पर कोई िकताब खुली हई रखी
थी, हाथ म ोिशया थी और उँगिलयाँ एक नाजुक तेजी से डोरे से उलझ-सुलझ रही थ ह के
बादामी रं ग क इकलाई क लहराती हई धोती, नारं गी और काली ितरछी धा रय का कलफ
िकया चु त लाउज और एक क धे पर उभरा एक उसका पफ ऐसा लग रहा था जसै े िक बाँह पर
कोई रं गीन िततली आकर बठै ी हई हो और उसका िसफ एक पंख उठा हो! अभी-अभी शायद
नहाकर उठी थी य िक शरद क खुशनुमा धपू क तरह हलके सुनहले बाल पीठ पर लहरा रहे
थे नीलकाँटे क टहिनयाँ उनको सुनहली लहर समझकर अठखेिलयाँ कर रही थ
च दर क साइिकल जब अ दर िदख पड़ी तो सुधा ने उधर देखा लेिकन कु छ भी न कहकर िफर
अपनी ोिशया बुनने म लग गयी च दर सीधा पोिटको म गया और अपनी साइिकल रखकर
भीतर चला गया डॉ. शु ला के पास टडी- म म, बठै क म, सोने के कमरे म कह भी डॉ.
शु ला नजर नह आये हारकर वह बाहर आया तो देखा मोटर अभी गरै ज म है तो वे जा
कहाँ सकते? और सुधा को तो देिखए! या अकड़ी हई है आज, जसै े च दर को जानती ही
नह च दर सुधा के पास गया सुधा का महँु और भी लटक गया
“डॉ टर साहब कहाँ ह?” च दर ने पछू ा
“हम या मालमू ?” सुधा ने ोिशया पर से िबना िनगाह उठाये जवाब िदया
“तो िकसे मालमू होगा?” च दर ने डाँटते हए कहा, “हर व का मजाक हम अ छा नह
लगता काम क बात का उसी तरह जवाब देना चािहए उनके िनब ध क िलिप देनी है या
नह !”
“हाँ-हाँ, देनी है तो म या क ँ ? नहा रहे ह गे अभी कोई ये तो है नह िक तमु िनब ध क
िलिप लाये हो तो कोई नहाये-धोये न, बस सुबह से बठै ा रहे िक अब िनब ध आ रहा ह,ै अब आ
रहा ह!ै ” सुधा ने महँु बनाकर आँख नचाते हए कहा
“तो सीधे य नह कहती िक नहा रहे ह ” च दर ने सुधा के गु से पर हँसकर कहा च दर
क हँसी पर तो सुधा का िमजाज और भी िबगड़ गया और अपनी ोिशया उठाकर और िकताब
बगल म दबाकर, वह उठकर अ दर चल दी उसके उठते ही च दर आराम से उस कु रसी पर बठै
गया और मेज पर टाँग फै लाकर बोला-”आज मझु े बहत गु सा चढ़ा ह,ै खबरदार कोई बोलना

मत!”
सुधा जाते-जाते मडु क़र खड़ी हो गयी
“हमने कह िदया च दर एक बार िक हम ये सब बात अ छी नह लगत जब देखो तमु िचढ़ाते
रहते हो!” सुधा ने गु से से कहा
“नह ! िचढ़ाएँगे नह तो पजू ा करगे! तमु अपने मौके पर छोड़ देती हो!” च दर ने उसी
लापरवाही से कहा

सुधा गयी नह वह घास पर बठै गयी और िकताब खोलकर पढऩे लगी जब पाँच िमनट
तक वह कु छ नह बोली तो च दर ने सोचा आज बात कु छ ग भीर है
“सुधा!” उसने बड़े दुलार से पुकारा “सुधा!”
सुधा ने कु छ नह कहा मगर दो बड़े-बड़े आँसू टप से नीचे िकताब पर िगर गये
“अरे या बात है सुधा, नह बताओगी?”
“कु छ नह ”
“बता दो, तु ह हमारी कसम है ”
“कल शाम को तमु आये नह ...” सुधा रोनी आवाज म बोली
“बस इस बात पर इतनी नाराज हो, पागल!”

“हाँ, इस बात पर इतनी नाराज हँ! तमु आओ चाहे हजार बार न आओ; इस पर हम य नाराज
ह गे! बड़े कह के आये, नह आएँगे तो जसै े हमारा घर-बार नह है अपने को जाने या समझ

िलया ह!ै ” सुधा ने िचढक़र जवाब िदया
“अरे तो तु ह तो कह रही थी, भाई ” च दर ने हँसकर कहा
“तो बात परू ी भी सुनो शाम को गेसू का नौकर आया था उसके छोटे भाई हसरत क
सालिगरह थी सुबह 'कु रानखानी' होने वाली थी और उसक माँ ने बुलाया था ”
“तो गयी य नह ?”

“गयी य नह ! िकससे पछू कर जाती? आप तो इस व आ रहे ह जब सब ख म हो गया!”
सुधा बोली
“तो पापा से पछू के चली जाती!” च दर ने समझाकर कहा, “और िफर गेसू के यहाँ तो य
अकसर जाती हो तमु !”
“तो? आज तो डा स भी करने के िलए कहा था उसने िफर बाद म तमु कहते, 'सुधा, तु ह ये
नह करना चािहए, वो नह करना चािहए लड़िकय को ऐसे रहना चािहए, वसै े रहना

चािहए ' और बठै के उपदेश िपलाते और नाराज होते िबना तमु से पछू े हम कह िसनेमा,
िपकिनक, जलस म गये ह कभी?” और िफर आँसू टपक पड़े
“पगली कह क ! इतनी-सी बात पर रोना या? िकसी के हाथ कु छ उपहार भेज दो और िफर
िकसी मौके पर चली जाना ”

“हाँ, चली जाना! तु ह कहते या लगता ह!ै गेसू ने िकतना बुरा माना होगा!” सुधा ने िबगड़ते
हए ही कहा “इ तहान आ रहा ह,ै िफर कब जाएँगे?”

“कब है इ तहान तु हारा?”
“चाहे जब हो! मझु े पढ़ाने के िलए कहा िकसी से?”
“अरे भलू गये! अ छा, आज देखो कहगे!”

“कहगे-कहगे नह , आज दोपहर को आप बुला लाइए, वरना हम सब िकताब म लगाये देते ह
आग समझे िक नह !”
“अ छा-अ छा, आज दोपहर को बुला लाएँगे ठीक, अ छा याद आया िबस रया से कहँगा तु ह
पढ़ाने के िलए उसे पये क ज रत भी है ” च दर ने छु टकारे का कोई रा ता न पाकर
कहा
“आज दोपहर को ज र से ” सुधा ने िफर आँख नचाकर कहा “लो, पापा आ गये नहाकर,
जाओ!”

च दर उठा और चल िदया सुधा उठी और अ दर चली गयी
डॉ. शु ला ह के -साँवले रं ग के जरा थलू काय-से थे बहत ग भीर अ ययन और अ यापन और
उ के साथ-साथ ही उनक न ता और भी बढ़ती जा रही थी
लेिकन वे लोग से िमलते-जुलते कम थे यि गत दो ती उनक िकसी से नह थी लेिकन
उ र भारत के मखु िव ान् होने के नाते का े स म, मौिखक परी ाओं म, सरकारी
कमेिटय म वे बराबर बुलाये जाते थे और इसम मखु िदलच पी से िह सा लेते थे ऐसी जगह
म च दर अ सर उनका मखु सहायक रहता था और इसी नाते च दर भी ा त के बड़े-बड़े
लोग से प रिचत हो गया था जब वह एम. ए. पास हआ था तब से फाइने स िवभाग म उसे कई
बार ऊँ चे-ऊँ चे पद का 'ऑफर' आ चुका था लेिकन डॉ. शु ला इसके िखलाफ थे वे चाहते थे
िक पहले वह रसच परू ी कर ले स भव हो तो िवदेश हो आये, तब चाहे कु छ काम करे अपने
यि गत जीवन म डॉ. शु ला अ तिवरोध के यि थे पािटय म मसु लमान और ईसाइय
के साथ खाने म उ ह कोई एतराज नह था लेिकन क चा खाना वे चौके म आसन पर बठै कर,
रे शमी धोती पहनकर खाते थे सरकार को उ ह ने सलाह दी िक साधुओं और सं यािसय को
जबरद ती काम म लगाया जाए और मि दर क जायदाद ज त कर ली जाएँ, लेिकन सुबह घंटे-
भर तक पजू ा ज र करते थे पजू ा-पाठ, खान-पान, जात-पाँत के प के हामी, लेिकन
यि गत जीवन म कभी यह नह जाना िक उनका कौन िश य ा ण ह,ै कौन बिनया, कौन

ख ी, कौन काय थ!
नहाकर वे आ रहे थे और दुगास शती का कोई ोक गनु गनु ा रहे थे कपरू को देखा तो क
गये और बोले, “हलै ो, हो गया वह टाइप!”

“जी हाँ ”
“कहाँ कराया टाइप?”
“िमस िड ू ज के यहाँ ”
“अ छा! वह लड़क अ छी है अब तो बहत बड़ी हई होगी? अभी शादी नह हई? मने तो सोचा
वह िमले या न िमले!”
“नह , वह यह है शादी हई िफर तलाक हो गया ”
“अरे ! तो अके ले रहती ह?ै ”
“नह , अपने भाई के साथ ह,ै बट के साथ!”
“अ छा! और बट क प नी अ छी तरह ह?ै ”

“वह मर गयी ”

“राम-राम, तब तो घर ही बदल गया होगा ”

“पापा, पजू ा के िलए सब िबछा िदया है ” सहसा सुधा बोली
“अ छा बेटी, अ छा च दर, म पजू ा कर आऊँ ज दी से तमु चाय पी चुके ?”
“जी हाँ ”
“अ छा तो मेरी मेज पर एक चाट ह,ै जरा इसको ठीक तो कर दो तब तक म अभी आया ”

च दर टडी- म म गया और मेज पर बठै गया कोट उतारकर उसने खँटू ी पर टाँग िदया और
न शा देखने लगा पास म एक छोटी-सी चीनी क याली म चाइना इकं रखी थी और मेज पर

पानी उसने दो बँदू पानी डालकर चाइना इकं िघसनी शु क , इतने म सुधा कमरे म दािखल,
“ऐ सुनो!” उसने चार ओर देखकर बड़े सशंिकत वर म कहा और िफर झकु कर च दर के
कान के पास महँु लगाकर कहा, “चावल क नानखटाई खाओगे?”
“ये या बला ह?ै ” च दर ने इकं िघसते-िघसते पछू ा
“बड़ी अ छी चीज होती ह;ै पापा को बहत अ छी लगती है आज हमने सुबह अपने हाथ से
बनायी थी ऐ,ं खाओगे?” सुधा ने बड़े दुलार से पछू ा
“ले आओ ” च दर ने कहा

“ले आये हम, लो!” और सुधा ने अपने आँचल म िलपटी हई दो नानखटाई िनकालकर मेज पर
रख दी

“अरे त तरी म य नह लायी? सब धोती म घी लग गया इतनी बड़ी हो गयी, शऊर नह

जरा-सा ” च दर ने िबगडक़र कहा

“िछपा करके लाये ह, िफर ये सकरी होती ह िक नह ? चौके के बाहर कै से लाते! तु हारे िलये तो
लाये ह और तु ह िबगड़ रहे हो अ धे को नोन दो, अ धा कहे मेरी आँख फोड़ ” सुधा ने महँु
बनाकर कहा, “खाना है िक नह ?”

“हाथ म तो हमारे याही लगी है ” च दर बोला

“हम अपने हाथ से नह िखलाएँगे, हमारा हाथ जठू ा हो जाएगा और राम राम! पता नह तमु
रे तराँ म मसु लमान के हाथ का खाते होगे थ-ू थ!ू ”
च दर हँस पड़ा सुधा क इस बात पर और उसने पानी म हाथ डु बोकर िबना पछू े सुधा के आँचल
म हाथ प छ िदये याही के और बेतक लुफ से नानखटाई उठाकर खाने लगा
“बस, अब धोती का िकनारा रं ग िदया और यही पहनना है हम िदनभर ” सुधा ने िबगडक़र
कहा

“खुद नानखटाई िछपाकर लायी और घी लग गया तो कु छ नह और हमने याही प छ दी तो महँु
िबगड़ गया ” च दर ने मिै पंग पेन म इकं लगाते हए कहा

“हाँ, अभी पापा देख तो और िबगड़ िक धोती म घी, याही सब लगाये रहती है तु ह या?”
और उसने याही लगा हआ छोर कसकर कमर म ख स िलया

“िछः, वही घी म तर छोर कमर म ख स िलया ग दी कह क !” च दर ने चाट क लाइन ठीक

करते हए कहा

“ग दी ह तो, तमु से मतलब!” और महँु िचढ़ाते हए सुधा कमरे से बाहर चली गयी
च दर चुपचाप बठै ा चाट दु त करता रहा उ र देश के पवू िजला-बिलया, आजमगढ़,
ब ती, बनारस आिद म ब च क मृ यु-सं या का ाफ बनाना था और एक ओर उनके न शे
पर िब दुओं क एक सघनता से मृ यु-सं या का िनदश करना था च दर क एक आदत थी

वह काम म लगता था तो भतू क तरह लगता था िफर उसे दीन-दुिनया, िकसी क खबर नह
रहती थी खाना-पीना, तन-बदन, िकसी का होश नह रहता था इसका एक कारण था

च दर उन लड़क म से था िजनक िजंदगी बाहर से बहत ह क -फु क होते हए भी अ दर से
बहत ग भीर और अथमयी होती ह,ै िजनके सामने एक प उ े य, एक ल य होता है बाहर

से चाहे जसै े होने पर भी अपने आ त रक स य के ित घोर ईमानदारी यह इन लोग क

िवशेषता होती है और सारी दुिनया के ित अग भीर और उ छृंखल होने पर भी जो चीज इनक
ल यप रिध म आ जाती ह, उनके ित उनक ग भीरता, साधना और पजू ा बन जाती है
इसिलए बाहर से इतना यि वादी और सारी दुिनया के ित िनरपे और लापरवाह िदख पडऩे
पर भी वह अ तरतम से समाज और युग और अपने आसपास के जीवन और यि य के ित
अपने को बेहद उ रदायी अनुभव करता था वह देशभ भी था और शायद समाजवादी भी, पर
अपने तरीके से वह ख र नह पहनता था, कां ेस का सद य नह था, जेल नह गया था,

िफर भी वह अपने देश को यार करता था बेहद यार उसक देशभि , उसका समाजवाद,

सभी उसके अ ययन और खोज म समा गया था वह यह जानता था िक समाज के सभी त भ

का थान अपना अलग होता है अगर सभी मि दर के कं गरू े का फू ल बनने क कोिशश करने
लग तो न व क ईटं और सीढ़ी का प थर कौन बनेगा? और वह जानता था िक अथशा वह

प थर है िजस पर समाज के सारे भवन का बोझ है और उसने िन य िकया था िक अपने देश,

अपने युग के आिथक पहलू को वह खबू अ छी तरह से अपने ढंग से िव े षण करके देखेगा और
उसे आशा थी िक वह एक िदन ऐसा समाधान खोज िनकालेगा िक मानव क बहत-सी

सम याएँ हल हो जाएँगी और आिथक और राजनीितक े म अगर आदमी खँखू ार जानवर बन
गया है तो एक िदन दुिनया उसक एक आवाज पर देवता बन सके गी इसिलए जब वह बठै कर
कानपुर क िमल के मजदरू के वेतन का चाट बनाता था, या उपयु साधन के अभाव म मर
जाने वाली गरीब औरत और ब च का लेखा-जोखा करता था तो उसके सामने अपना कै रयर,

अपनी ित ा, अपनी िड ी का सपना नह होता था उसके मन म उस व वसै ा स तोष

होता था जो िकसी पुजारी के मन म होता ह,ै जब वह अपने देवता क अचना के िलए धपू , दीप,
नवै े सजाता है बि क च दर थोड़ा भावुक था, एक बार तो जब च दर ने अपने रसच के
िसलिसले म यह पढ़ा िक अँगरे ज ने अपनी पँजू ी लगाने और अपना यापार फै लाने के िलए
िकस तरह मिु शदाबाद से लेकर रोहतक तक िह दु तान के गरीब से गरीब और अमीर से अमीर
बािश दे को अमानुिषकता से लटू ा, तब वह फू ट-फू टकर रो पड़ा था लेिकन इसके बावजदू उसने
राजनीित म कभी डू बकर िह सा नह िलया य िक उसने देखा िक उसके जो भी िम राजनीित
म गये, वे थोड़े िदन बाद बहत िसि और ित ा पा गये मगर आदमीयत खो बठै े

अपने अथशा के बावजदू वह यह समझता था िक आदमी क िजंदगी िसफ आिथक पहलू तक
सीिमत नह और वह यह भी समझता था िक जीवन को सुधारने के िलए िसफ आिथक ढाँचा
बदल देने-भर क ज रत नह है उसके िलए आदमी का सुधार करना होगा, यि का सुधार
करना होगा वरना एक भरे -परू े और वभै वशाली समाज म भी आज के -से अ व थ और
पाशिवक विृ य वाले यि रहगे तो दुिनया ऐसी ही लगेगी जसै े एक खबू सरू त सजा-सजाया
महल िजसम क ड़े और रा स रहते ह

वह यह भी समझता था िक वह िजस तरह क दुिनया का सपना देखता, वह दुिनया आज िकसी

भी एक राजनीितक ाि त या िकसी भी िवशेष पाट क सहायता मा से नह बन सकती है

उसके िलए आदमी को अपने को बदलना होगा, िकसी समाज को बदलने से काम नह चलेगा

इसिलए वह अपने यि के संसार म िनर तर लगा रहता था और समाज के आिथक पहलू को
समझने क कोिशश करता रहता था यही कारण है िक अपने जीवन म आनेवाले यि य के

ित वह बेहद ईमानदार रहता था और अपने अ ययन और काम के ित वह सचेत और जाग क

रहता था और वह अ छी तरह समझता था िक इस तरह वह दुिनया को उस ओर बढ़ाने म थोड़ी-
सी मदद कर रहा है चँिू क अपने म भी वह स य क वही िचनगारी पाता था इसिलए किव या
दाशिनक न होते हए भी वह इतना भावुक, इतना ढ़-च र , इतना सश और इतना ग भीर
था और काम तो अपना वह इस तरह करता था जसै े वह िकसी क एका उपासना कर रहा हो

इसिलए जब वह चाट के न शे पर कलम चला रहा था तो उसे मालमू नह हआ िक िकतनी देर
से डॉ. शु ला आकर उसके पीछे खड़े हो गये
“वाह, न शे पर तो तु हारा हाथ बहत अ छा चलता है बहत अ छा! अब उसे रहने दो लाओ,
देख, तु हारा काम कै सा चल रहा है आज तो इतवार है न?”
डॉ. शु ला पास क कु रसी पर बठै कर बोले, “च दर! आजकल म एक िकताब िलखने क सोच
रहा हँ मने सोचा िक भारतवष क जाित- यव था का नये वै ािनक ढंग से अ ययन और

िव े षण िकया जाए तमु इसके बारे म या सोचते हो?”
“ यथ ह!ै जो यव था आज नह तो कल चरू -चरू होने जा रही ह,ै उसके बारे म तमू ार बाँधना
और समय बरबाद करना बेकार है ” च दर ने बहत आ मिव ास से कहा

“यही तो तमु लोग म खराबी है कु छ थोड़ी-सी खरािबयाँ जाित- यव था क देख ल और
उसके िखलाफ हो गये एक रसच कॉलर का ि कोण ही दसू रा होना चािहए िफर हमारे
भारत क ाचीन सां कृ ितक पर पराओं को तो बहत ही सावधानी से समझने क आव यकता
है यह समझ लो िक मानव जाित दुबल नह है अपने िवकास- म म वह उ ह सं थाओ,ं
रीित- रवाज और पर पराओं को रहने देती है जो उसके अि त व के िलए बहत आव यक होती

है अगर वे आव यक न हई ं तो मानव उससे छु टकारा माँग लेता है यह जाित- यव था जाने
िकतने साल से िह दु तान म कायम ह,ै या यही इस बात का माण नह िक यह बहत सश
ह,ै अपने म बहत ज री ह?ै ”

“अरे िह दु तान क भली चलायी ” च दर बोला, “िह दु तान म तो गलु ामी िकतने िदन से
कायम है तो या वह भी ज री है ”

“िब कु ल ज री है ” डॉ. शु ला बोले, “मझु े भी िह दु तान पर गव है मने कभी कां ेस का
काम िकया, लेिकन म इसे नतीजे पर पहँचा हँ िक जरा-सी आजादी अगर िमलती है

िह दु तािनय को, तो वे उसका भरपरू दु पयोग करने से बाज नह आते और कभी भी ये लोग
अ छे शासक नह िनकलगे ”

“अरे नह ! ऐसी बात नह िह दु तािनय को ऐसा बना िदया है अँगरे ज ने वरना
िह दु तान ने ही तो च गु और अशोक पदै ा िकये थे और रही जाित- यव था क बात तो मझु े
तो प िदख रहा है िक जाित- यव था टू ट रही है ” कपरू बोला, “रोटी-बेटी क कै द थी
रोटी क कै द तो करीब-करीब टू ट गयी, अब बेटी क कै द भी... याह-शािदयाँ भी दो-एक पीढ़ी
के बाद व छ दता से होने लगगी ”

“अगर ऐसा होगा तो बहत गलत होगा इससे जाितगत पतन होता है याह-शादी को कम-
से-कम म भावना क ि से नह देखता यह एक सामािजक त य है और उसी ि कोण से
हम देखना चािहए शादी म सबसे बड़ी बात होती है सां कृ ितक समानता और जब अलग-
अलग जाित म अलग-अलग रीित- रवाज ह तो एक जाित क लड़क दसू री जाित म जाकर कभी
भी अपने को ठीक से स तिु लत नह कर सकती और िफर एक बिनया क यापा रक विृ य
क लड़क और एक ा ïण का अ ययन विृ का लड़का, इनक स तान न इधर िवकास कर
सकती है न उधर यह तो सामािजक यव था को यथ के िलए अस तिु लत करना हआ ”
“हाँ, लेिकन िववाह को आप के वल समाज के ि कोण से य देखते ह? यि के ि कोण
से भी देिखए अगर दो िविभ न जाित के लड़के -लड़क अपना मानिसक स तलु न यादा
अ छा कर सकते ह तो य न िववाह क इजाजत दी जाए!”
“ओह, एक यि के सुझाव के िलए हम समाज को य नुकसान पहँचाएँ! और इसका या
िन य िक िववाह के समय यिद दोन म मानिसक स तलु न है तो िववाह के बाद भी रहेगा ही
मानिसक स तलु न और ेम िजतना अपने मन पर आधा रत होता है उतना ही बाहरी
प रि थितय पर या जाने याह के व क प रि थित का दोन के मन पर िकतना भाव है
और उसके बाद स तलु न रह पाता है या नह ? और मने तो लव-मै रजेज ( ेम-िववाह) को
असफल ही होते देखा है बोलो है या नह ?” डॉ. शु ला ने कहा
“हाँ, ेम-िववाह अकसर असफल होते ह, लेिकन स भव है वह ेम न होता हो जहाँ स चा ेम
होगा वहाँ कभी असफल िववाह नह ह गे ” च दर ने बहत साहस करके कहा
“ओह! ये सब सािह य क बात ह समाजशा क ि से या वै ािनक ि से देखो! अ छा
खरै , अभी मने उसक प-रे खा बनायी है िलखँगू ा तो तमु सुनते चलना लाओ, वह िनब ध
कहाँ ह!ै ” डॉ. शु ला बोले
च दर ने उ ह टाइप क हई ितिलिप दे दी उलट-पुलटकर डॉ. शु ला ने देखा और कहा,
“ठीक है अ छा च दर, अपना काम इधर ठीक-ठीक कर लो, अगले इतवार को लखनऊ
कॉ े स म चलना है ”
“अ छा! कार पर चलगे या ेन से?”
“ ेन से अ छा ” घड़ी देखते हए उ ह ने कहा, “अब जरा म काम से चल रहा हँ तमु यह
चाट बना डालो और एक िनब ध िलख डालना - 'पवू िजल म िशशु मृ यु ' ा त के वा य
िवभाग ने एक पुर कार घोिषत िकया है ”
डॉ. शु ला चले गये च दर ने िफर चाट म हाथ लगाया

6

च दर के जाने के जरा ही देर बाद पापा आये और खाने बठै े सुधा ने रसोई क रे शमी धोती
पहनी और पापा को पंखा झलने बठै गयी सुधा अपने पापा क िसरचढ़ी दुलारी बेिटय म से
थी और इतनी बड़ी हो जाने पर भी वह दुलार िदखाने से बाज नह आती थी िफर आज तो
उसने पापा क ि य नानखटाई अपने हाथ से बनायी थी आज तो दुलार िदखाने का उसका
हक था और भली-बुरी हर तरह क िजद को मान लेना करना, यह पापा क मजबरू ी थी
मिु कल से डॉ. साहब ने अभी दो कौर खाये ह गे िक सुधा ने कहा, “नानखटाई खाओ, पापा!”
डॉ. शु ला ने एक नानखटाई तोडक़र खाते हए कहा, “बहत अ छी ह!ै ” खाते-खाते उ ह ने
पछू ा, “सोमवार को कौन िदन ह,ै सुधा!”
“सोमवार को कौन िदन ह?ै सोमवार को 'म डे' है ” सुधा ने हँसकर कहा डॉ. शु ला भी
अपनी भलू पर हँस पड़े “अरे देख तो म िकतना भुल कड़ हो गया हँ मेरा मतलब था िक
सोमवार को कौन तारीख ह?ै ”
“11 तारीख ” सुधा बोली, “ य ?”
“कु छ नह , 10 को कॉ े स है और 14 को तु हारी बुआ आ रही ह ”
“बुआ आ रही ह, और िबनती भी आएगी?”
“हाँ, उसी को तो पहँचाने आ रही ह िवदुषी का के यह तो है ”
“आहा! अब तो िबनती तीन महीने यह रहेगी, पापा अब िबनती को यह बुला लो म बहत
अके ली रहती हँ ”
“हाँ, अब तो जनू तक यह रहेगी िफर जुलाई म उसक शादी होगी ” डॉ. शु ला ने कहा
“अरे , अभी से? अभी उसक उ ही या ह!ै ” सुधा बोली
“ य , तेरे बराबर है अब तेरे िलए भी तेरी बुआ ने िलखा है ”
“नह पापा, हम याह नह करगे ” सुधा ने मचलकर कहा
“तब?”
“बस हम पढ़गे एफ.ए. कर लगे, िफर बी.ए., िफर एम.ए., िफर रसच, िफर बराबर पढ़ते जाएँगे,
िफर एक िदन हम भी तु हारे बराबर हो जाएँगे य , पापा?”
“पागल नह तो, बात तो सुनो इसक ! ला, दो नानखटाई और दे ” शु ला हँसकर बोले
“नह , पहले तो कबलू दो तब हम नानखटाई दगे बताओ याह तो नह करोगे ” सुधा ने दो
नानखटाइयाँ हाथ म उठाकर कहा
“ला, रख ”
“नह , पहले बता दो ”
“अ छा-अ छा, नह करगे ”

सुधा ने दोन नानखटाइयाँ रखकर पंखा झलना शु िकया इतने म िफर नानखटाइयाँ खाते
हए डॉ. शु ला बोले, “तेरी सास तझु े देखने आएगी तो यही नानखटाइयाँ तमु से बनवा कर
िखलाएँगे ”

“िफर वही बात!” सुधा ने पंखा पटककर कहा, “अभी तमु वादा कर चुके हो िक याह नह
करगे ”

“हाँ-हाँ, याह नह क ँ गा, यह तो कह िदया मने लेिकन तेरा याह नह क ँ गा, यह मने

कब कहा?”

“हाँ आँ, ये तो िफर झठू बोल गये तमु ...” सुधा बोली
“अ छा, ए! चलो ओहर ” महरािजन ने डाँटकर कहा, “ए ी बड़ी िबिटया हो गयी, मारे दुलारे
के बररानी जात है ” महरािजन पुरानी थी और सुधा को डाँटने का परू ा हक था उसे, और सुधा
भी उसका बहत िलहाज करती थी वह उठी और चुपचाप जाकर अपने कमरे म लेट गयी
बारह बज रहे थे

वह लेटी-लेटी कल रात क बात सोचने लगी लास म या मजा आया था कल; गेसू िकतनी
अ छी लड़क ह!ै इस व गेसू के यहाँ खाना-पीना हो रहा होगा और िफर सब लोग िमलकर
गाएँगे कौन जाने शायद दोपहर को क वाली भी हो इन लोग के यहाँ क वाली इतनी

अ छी होती है सुधा सुन नह पाएगी और गेसू ने भी िकतना बुरा माना होगा और यह सब
च दर क वजह से च दर हमेशा उसके आने-जाने, उठने-बठै ने म कतर- य त करता रहता

है एक बार वह अपने मन से लड़िकय के साथ िपकिनक म चली गयी वह च दर के बहत-

से दो त भी थे एक दो त ने जाकर च दर से जाने या कह िदया िक च दर उस पर बहत

िबगड़ा और सुधा िकतनी रोयी थी उस िदन यह च दर बहत खराब है सच पछू ो तो अगर
कभी-कभी वह सुधा का कहना मान लेता है तो उससे दुगनु ा सुधा पर रोब जमाता है और सुधा
को ला- लाकर मार डालता है और खुद अपने-आप दुिनयाभर म घमू गे अपना काम होगा
तो 'चलो सुधा, अभी करो, फौरन ' और सुधा का काम होगा तो-'अरे भाई, या कर, भलू गये '
अब आज ही देखो, सुबह आठ बजे आये और अब देखो दो बजे भी जनाब आते ह या नह ? और
कह गये ह दो बजे तक के िलए तो दो बजे तक सुधा को चनै नह पड़ेगी न न द आएगी, न
िकसी काम म तबीयत लगेगी लेिकन अब ऐसे काम कै से चलेगा इ तहान को िकतने थोड़े

िदन रह गये ह और सुधा क तबीयत िसवा पोय ी (किवता) के और कु छ पढऩे म लगती ही
नह कब से वह च दर से कह रही है थोड़ा-सा इकनािम स पढ़ा दो, लेिकन ऐसा वाथ है

िक बस चाय पी ली, नानखटाई खा ली, ला िलया और िफर अपने म त साइिकल पर घमू रहे


यही सब सोचते-सोचते सुधा को न द आ गयी
और तीन बजे जब गेसू आयी तो भी सुधा सो रही थी पलंग के नीचे डी.एम.सी. का गोला खुला
हआ था और तिकये के पास ोिशया पड़ी थी सुधा थी बड़ी यारी बड़ी खबू सरू त और
खासतौर से उसक पलक तो अपरािजता के फू ल को मात करती थ और थी इतनी गोरी
गदु कारी िक कह पर दबा दो तो फू ल िखल जाए मिँू गया ह ठ पर जाने कै सा अछू ता गलु ाब
मसु कराता था और बाँह तो जसै े बेले क पाँखु रय क बनी ह गेसू आयी उसके हाथ म
िमठाई थी जो उसक माँ ने सुधा के िलए भेजी थी वह पल-भर खड़ी रही और िफर उसने मेज

पर िमठाई रख दी और ोिशया से सुधा क गदन गदु गदु ाने लगी सुधा ने करवट बदल ली
गेसू ने नीचे पड़ा हआ डोरा उठाया और आिह ते से उसका चुटीला डोरे के एक छोर से बाँधकर
दसू रा छोर मेज के पाये से बाँध िदया और उसके बाद बोली, “सुधा, सुधा उठो ”
सुधा च ककर उठ गयी और आँख मलते-मलते बोली, “अब दो बजे ह? लाये उ ह या नह ?”
“ओहो! उ ह लाये या नह िकसे बुलाया था रानी, दो बजे; जरा हम भी तो मालमू हो?” गेसू ने
बाँह म चुटक काटते हए पछू ा
“उ फोह!” सुधा बाँह झटककर बोली, “मार डाला! बेदद कह क ! ये सब अपने उ ह अ तर
िमयाँ को िदखाया कर!” और य ही सुधा ने िसर ढँकने के िलए प ला उठाया तो देखा िक
चोटी डोर म बँधी हई है इसके पहले िक सुधा कु छ कहे, गेसू बोली, “या सनम! जरा पढ़ाई तो
देखो, मने तो सुना था िक न द न आये इसिलए लड़के अपनी चोटी खँटू ी म बाँध लेते ह पर यह
नह मालमू था िक लड़िकयाँ भी अब वही करने लगी ह ”
सुधा ने चोटी से डोर खोलते हए कहा, “म ही सताने को रह गयी हँ अ तर िमयाँ क चोटी
बाँधकर नचाना उ ह अभी से बेताब य हई जाती ह?ै ”

“अरे रानी, उनके चोटी कहाँ? िमयाँ ह िमयाँ?”

“चोटी न सही, दाढ़ी सही ”

“दाढ़ी, खुदा खरै करे , मगर वो दाढ़ी रख ल तो म उनसे मोह बत तोड़ लँू ”
सुधा हँसने लगी
“ले, अ मी ने तेरे िलए िमठाई भेजी है तू आयी य नह ?”
“ या बताऊँ ?”

“बताऊँ -वताऊँ कु छ नह अब कब आएगी त?ू ”
“गेस,ू सुनो, इसी मगं ल, नह -नह बहृ पित को बुआ आ रही ह वो चली जाएँगी तब आऊँ गी
म”

“अ छा, अब म चलँू अभी कािमनी और भा के यहाँ िमठाई पहँचानी है ”
गेसू मड़ु ते हए बोली
“अरे बठै ो भी ” सुधा ने गेसू क ओढऩी पकडक़र उसे ख चकर िबठलाते हए कहा, “अभी आये
हो, बठै े हो, दामन सँभाला है ”

“आहा अब तो तू भी उदू शायरी कहने लगी ” गेसू ने बठै ते हए कहा
“तेरा ही मज लग गया ” सुधा ने हँसकर कहा
“देख कह और भी मज न लग जाए, वरना िफर तेरे िलए भी इ तजाम करना होगा!” गेसू ने
पलंग पर लेटते हए कहा

“अरे ये वो गड़ु नह िक च टे खाएँ ”
“देखँगू ी, और देखँगू ी या, देख रही हँ इधर िपछले दो साल से िकतनी बदल गयी है तू
पहले िकतना हँसती-बोलती थी, िकतनी लड़ती-झगड़ती थी और अब िकतना हँसने-बोलने पर

भी गमु सुम हो गयी है तू और वसै े हमेशा हँसती रहे चाहे लेिकन जाने िकस खयाल म डू बी
रहती है हमेशा ” गेसू ने सुधा क ओर देखते हए कहा
“धत् पगली कह क ” सुधा ने गेसू के एक ह क -सी चपत मारकर कहा, “यह सब तेरे अपने
खयाली-पुलाव ह म िकसी के यान म डू बँगू ी, ये हमारे गु ने नह िसखाया ”

“गु तो िकसी के नह िसखाते सुधा रानी, िब कु ल सच-सच, या कभी तु हारे मन म िकसी
के िलए मोह बत नह जागी?” गेसू ने बहत ग भीरता से पछू ा
“देख गेस,ू तझु से मने आज तक तो कभी कु छ नह िछपाया, न शायद कभी िछपाऊँ गी अगर
कभी कोई बात होती तो तझु से िछपी न रहती और रहा महु बत का, तो सच पछू तो मने जो कु छ
कहािनय म पढ़ा है िक िकसी को देखकर म रोने लग,ँू गाने लग,ँू पागल हो जाऊँ यह सब कभी
मझु े नह हआ और रह किवताएँ तो उनम क बात मझु े बहत अ छी लगती ह क ट् स क
किवताएँ पढक़र ऐसा लगा है अ सर िक मेरी नस का कतरा-कतरा आँसू बनकर छलकने वाला
है लेिकन वह महज किवता का असर होता है ”

“महज किवता का असर,” गेसू ने पछू ा, “कभी िकसी खास आदमी के िलए तेरे मन म हँसी या
आँसू नह उमड़ते! कभी अपने मन को जाँचकर तो देख, कह तेरी नाजुक-खयाली के परदे म
िकसी एक क सरू त तो नह िछपी है ”
“नह गेसू बानो, नह , इसम मन को जाँचने क या बात है ऐसी बात होती और मन िकसी
के िलए झकु ता तो या खुद मझु े नह मालमू होता?” सुधा बोली, “लेिकन तमु ऐसा य सोचती
हो?”

“बात यह ह,ै सुधी!” गेसू ने सुधा को अपनी गोद म ख चते हए कहा, “देखो, तमु मझु से इ म म
ऊँ ची हो, तमु ने अँ ेजी शायरी छान डाली है लेिकन िजंदगी से िजतना मझु े सािबका पड़ चुका ह,ै
अभी तु ह नह पड़ा अ सर कब, कहाँ और कै से मन अपने को हार बठै ता ह,ै यह खुद हम पता
नह लगता मालमू तब होता है जब िजसके कदम पर हमने िसर रखा ह,ै वह झटके से अपने
कदम घसीट ले उस व हमारी न द टू ट जाती है और तब हम जाकर देखते ह िक अरे हमारा
िसर तो िकसी के कदम पर रखा हआ था और उनके सहारे आराम से सोते हए हम सपना देख

रहे थे िक हमारा िसर कह झकु ा ही नह और मझु े जाने तेरी आँख म इधर या दीख रहा है
िक म बेचनै हो उठी हँ तनू े कभी कु छ नह कहा, लेिकन मने देखा िक नाजुक अशआर तेरे
िदल को उस जगह छू लेते ह िजस जगह उसी को छू सकते ह जो अपना िदल िकसी के कदम पर
चढ़ा चुका हो और म यह नह कहती िक तनू े मझु से िछपाया है कौन जानता है तेरे िदल ने
खुद तझु से यह राज िछपा रखा हो ” और सुधा के गाल थपथपाते हए गेसू बोली, “लेिकन मेरी
एक बात मानेगी त?ू तू कभी इस दद को मोल न लेना, बहत तकलीफ होती है ”
सुधा हँसने लगी, “तकलीफ क या बात? तू तो है ही तझु से पछू लँगू ी उसका इलाज ”
“मझु से पछू कर या कर लेगी-
दद िदल या बाँटने क चीज ह?ै

बाँट ल अपने पराये दद िदल?

नह , तू बड़ी सुकु वाँर है तू इन तकलीफ के िलए बनी नह मेरी च पा!” और गेसू ने उसका
िसर अपनी छाती म िछपा िलया

टन से घड़ी ने साढ़े तीन बजाये

सुधा ने अपना िसर उठाया और घड़ी क ओर देखकर कहा-
“ओ फोह, साढ़े तीन बजे गये और अभी तक गायब!”

“िकसके इ तजार म बेताब है त?ू ” गेसू ने उठकर पछू ा
“बस दद िदल, महु बत, इ तजार, बेताबी, तेरे िदमाग म तो यही सब भरा रहता है आज कल,

वही तू सबको समझती है इ तजार-िव तजार नह , च दर अभी मा टर लेकर आएँगे अब
इ तहान िकतना नजदीक है ”

“हाँ, ये तो सच है और अभी तक मझु से पछू , या पढ़ाई हई है असल बात तो यह है िक कॉलेज
म पढ़ाई हो तो घर म पढऩे म मन लगे और राजा कॉलेज म पढ़ाई नह होती इससे अ छा सीधे

यिू नविसटी म बी.ए. करते तो अ छा था मेरी तो अ मी ने कहा िक वहाँ लड़के पढ़ते ह, वहाँ
नह भेजँगू ी, लेिकन तू य नह गयी, सुधा?”
“मझु े भी च दर ने मना कर िदया था ” सुधा बोली
सहसा गेसू ने एक ण को सुधा क ओर देखा और कहा, “सुधी, तझु से एक बात पछू ू ँ!”
“हाँ!”
“अ छा जाने दे!”

“पछू ो न!”
“नह , पछू ना या, खुद जािहर है ”
“ या?”

“कु छ नह ”
“पछू ो न!”
“अ छा, िफर कभी पछू लगे! अब देर हो रही है आधा घंटा हो गया कोचवान बाहर खड़ा
है ”

सुधा गेसू को पहँचाने बाहर तक आयी
“कभी हसरत को लेकर आओ ” सुधा बोली
“अब पहले तमु आओ ” गेसू ने चलते-चलते कहा
“हाँ, हम तो िबनती को लेकर आएँगे और हसरत से कह देना तभी उसके िलए तोहफा
लाएँ गे!”

“अ छा, सलाम...”

और गेसू क गाड़ी मिु कल से फाटक के बाहर गयी होगी िक साइिकल पर च दर आते हए दीख
पड़ा सुधा ने बहत गौर से देखा िक उसके साथ कौन ह,ै मगर वह अके ला था
सुधा सचमचु झ ला गयी आिखर लापरवाही क हद होती है च दर को दुिनया भर के काम
याद रहते ह, एक सुधा से जाने या खार खाये बठै ा है िक सुधा का काम कभी नह करे गा
इस बात पर सुधा कभी-कभी दु:खी हो जाती है और घर म िकससे वह कहे काम के िलए खुद
कभी बाजार नह जाती नतीजा यह होता है िक वह छोटी-से-छोटी चीज के िलए मोहताज

होकर बठै जाती है और काम नौकर से करवा भी ले, पर अब मा टर तो नौकर से नह

ढु ँढ़वाया जा सकता? ऊन तो नौकर नह पस द कर सकता? िकताब तो नौकर नह ला
सकता? और च दर का यह हाल है इसी बात पर कभी-कभी उसे लाई आ जाती है

च दर ने आकर बरामदे म साइिकल रखी और सुधा का चेहरा देखते ही वह समझ गया “काहे
महँु बना रखा ह,ै पाँच बजे मा टर साहब आएँगे तु हारे अभी उ ह के यहाँ से आ रहे ह
िबस रया को जानती हो, वही आएँगे ” और उसके बाद च दर सीधा टडी- म म पहँच गया
वहाँ जाकर देखा तो आराम-कु स पर बठै े-ही-बठै े डॉ. शु ला सो रहे ह, अत: उसने अपना चाट
और पेन उठाया और ाइगं म म आकर चुपचाप काम करने लगा

बड़ा ग भीर था वह जब इकं घोलने के िलए उसने सुधा से पानी नह माँगा और खुद िगलास
लाकर आँगन म पानी लेने लगा, तब सुधा समझ गयी िक आज िदमाग कु छ िबगड़ा है वह
एकदम तड़प उठी या करे वह! वसै े चाहे वह च दर से िकतना ही ढीठ य न हो पर च दर

गु सा रहता था तब सुधा क ह काँप उठती थी उसक िह मत नह पड़ती थी िक वह कु छ
भी कहे लेिकन अ दर-ही-अ दर वह इतनी परे शान हो उठती थी िक बस
कई बार वह िकसी-न-िकसी बहाने से ाइगं म म आयी, कभी गलु द ता बदलने, कभी मेजपोश
बदलने, कभी आलमारी म कु छ रखने, कभी आलमारी म से कु छ िनकालने, लेिकन च दर अपने
चाट म िनगाह गड़ाये रहा उसने सुधा क ओर देखा तक नह सुधा क आँख म आँसू छलक
आये और वह चुपचाप अपने कमरे म चली गयी और लेट गयी थोड़ी देर वह पड़ी रही, पता नह

य वह फू ट-फू टकर रो पड़ी खबू रोयी, खबू रोयी और िफर महँु धोकर आकर पढऩे क
कोिशश करने लगी जब हर अ र म उसे च दर का उदास चेहरा नजर आने लगा तो उसने
िकताब ब द करके रख दी और ाइगं म म गयी च दर ने चाट बनाना भी ब द कर िदया था
और कु रसी पर िसर टेके छत क ओर देखता हआ जाने या सोच रहा था
वह जाकर सामने बठै गयी तो च दर ने च ककर िसर उठाया और िफर चाट को सामने िखसका
िलया सुधा ने बड़ी िह मत करके कहा-
“च दर!”
“ या!” बड़े भराये गले से च दर बोला
“इधर देखो!” सुधा ने बहत दुलार से कहा
“ या ह!ै ” च दर ने उधर देखते हए कहा, “अरे सुधा! तमु रो य रही हो?”
“हमारी बात पर नाराज हो गये तमु हम या कर, हमारा वभाव ही ऐसा हो गया पता नह

य तमु पर इतना गु सा आ जाता है ” सुधा के गाल पर दो बड़े-बड़े मोती ढलक आये
“अरे पगली! मालमू होता है तु हारा तो िदमाग बहत ज दी खराब हो जाएगा, हमने तमु से कु छ
कहा ह?ै ”
“कह लेते तो हम स तोष हो जाता हमने कभी कहा तमु से िक तमु कहा मत करो गु सा मत
हआ करो मगर तमु तो िफर गु सा मन-ही-मन म िछपाने लगते हो इसी पर हम लाई आ
जाती है ”
“नह सुधी, तु हारी बात नह थी और हम गु सा भी नह थे पता नह य मन बड़ा भारी-सा
था ”
“ या बात ह,ै अगर बता सको तो बताओ, वरना हम कौन ह तमु से पछू ने वाले ” सुधा ने बड़े
क ण वर म कहा
“तो तु हारा िदमाग खराब हआ हमने कभी तमु से कोई बात िछपायी? जाओ, अ छी लड़क क
तरह महँु धो आओ ”
सुधा उठी और महँु धोकर आकर बठै गयी
“अब बताओ, या बात थी?”
“कोई एक बात हो तो बताएँ पता नह तु हारे घर से गये तो एक-न-एक ऐसी बात होती गयी
िक मन बड़ा उदास हो गया ”

“आिखर िफर भी कोई बात तो हई ही होगी!”

“बात यह हई िक तु हारे यहाँ से म घर गया खाना खाने वहाँ देखा चाचाजी आये हए ह, उनके
साथ एक कोई साहब और ह खरै बड़ी खुशी हई खाना-वाना खाकर जब बठै े तब मालमू
हआ िक चाचाजी मेरा याह तय करने के िलए आये ह और साथ वाले साहब मेरे होनेवाले ससुर
ह जब मने इनकार कर िदया तो बहत िबगडक़र चले गये और बोले हम आज से तु हारे िलए
मर गये और तमु हमारे िलए मर गये ”
“तु हारी माताजी कहाँ ह?”
“ तापगढ़ म, लेिकन वो तो सौतेली ह और वे तो चाहती ही नह िक म घर लौटूँ, लेिकन
चाचाजी ज र आज तक मझु से कु छ महु बत करते थे आज वह भी नाराज होकर चले गये ”
सुधा कु छ देर तक सोचती रही, िफर बोली, “तो च दर, तमु शादी कर य नह लेते?”
“नह सुधा, शादी नह करनी है मझु े मने देखा िक िजसक शादी हई, कोई भी सुखी नह
हआ सभी का भिव य िबगड़ गया और य एक तवालत पाली जाए? जाने कै सी लड़क हो,

या हो?”

“तो उसम या? पापा से कहो उस लड़क को जाकर देख ल हम भी पापा के साथ चले

जाएँगे अ छी हो तो कर लो न, च दर िफर यह रहना हम अके ला भी नह लगेगा

य ?”

“नह जी, तमु तो समझती नह हो िजंदगी िनभानी है िक कोई गाय-भस खरीदना ह!ै ” च दर
ने हँसकर कहा, “आदमी एक-दसू रे को समझे, बझू े, यार करे , तब याह के भी कोई माने ह ”
“तो उसी से कर लो िजससे यार करते हो!”

च दर ने कु छ जवाब नह िदया
“बोलो! चुप य हो गये! अ छा, तमु ने िकसी को यार िकया, च दर!”
“ य ?”

“बताओ न!”

“शायद नह !”

“िब कु ल ठीक, हम भी यही सोच रहे थे अभी ” सुधा बोली
“ य , ये य सोच रही थी?”

“इसिलए िक तमु ने िकया होता तो तमु हमसे थोड़े़ ही िछपाते, हम ज र बताते, और नह बताया
तो हम समझ गये िक अभी तमु ने िकसी से यार नह िकया ”
“लेिकन तमु ने यह पछू ा य , सुधा! यह बात तु हारे मन म उठी कै से?”
“कु छ नह , अभी गेसू आयी थी वह बोली-सुधा, तमु ने िकसी से कभी यार िकया ह,ै असल म
वह अ तर को यार करती है उससे उसका िववाह होनेवाला है हाँ, तो उसने पछू ा िक तनू े
िकसी से यार िकया ह,ै हमने कहा, नह बोली, तू अपने से िछपाती है तो हम मन-ही-मन
म सोचते रहे िक तमु आओगे तो तमु से पछू गे िक हमने कभी यार तो नह िकया है य िक
तु ह एक हो िजससे हमारा मन कभी कोई बात नह िछपाता, अगर कोई बात िछपाई भी होती
हमने, तो तु ह ज र बता देती िफर हमने सोचा, शायद कभी हमने यार िकया हो और तु ह
बताया हो, िफर हम भलू गये ह अभी उसी िदन देखो, हम पापा क दवाई का नाम भलू गये
और तु ह याद रहा शायद हम भलू गये ह और तु ह मालमू हो कभी हमने यार तो नह
िकया न?”

“नह , हम तो कभी नह बताया ” च दर बोला

“तब तो हमने यार-वार नह िकया गेसू यँू ही ग प उड़ा रही थी ” सुधा ने स तोष क साँस
लेकर कहा, “लेिकन बस! चाचाजी के नाराज होने पर तमु इतने दु:खी हो गये हो! हो जाने दो
नाराज पापा तो ह अभी, या पापा महु बत नह करते तमु से?”
“सो य नह करते, तमु से यादा मझु से करते ह लेिकन उनक बात से मन तो भारी हो ही
गया उसके बाद गये िबस रया के यहाँ िबस रया ने कु छ बड़ी अ छी किवताएँ सुनाय और
भी मन भारी हो गया ” च दर ने कहा

“लो, तब तो च दर, तमु यार करते होगे! ज र से?” सुधा ने हाथ पटककर कहा
“ य ?”

“गेसू कह रही थी-शायरी पर जो उदास हो जाता है वह ज र महु बत-वुह बत करता है ” सुधा
ने कहा, “अरे यह पोिटको म कौन ह?ै ”

च दर ने देखा, “लो िबस रया आ गया!”

च दर उसे बुलाने उठा तो सुधा ने कहा, “अभी बाहर िबठलाना उ ह, म तब तक कमरा ठीक कर
लँू ”
िबस रया को बाहर िबठाकर च दर भीतर आया, अपना चाट वगरै ह समेटने के िलए, तो सुधा ने
कहा, “सुनो!”
च दर क गया

सुधा ने पास आकर कहा, “तो अब तो उदास नह हो तमु नह चाहते मत करो शादी, इसम
उदास या होना और किवता-विवता पर महँु बनाकर बठै े तो अ छी बात नह होगी ”
“अ छा!” च दर ने कहा

“अ छा-व छा नह , बताओ, तु ह मेरी कसम ह,ै उदास मत हआ करो िफर हमसे कोई काम नह
होता ”

“अ छा, उदास नह ह गे, पगली!” च दर ने ह क -सी चपत मारकर कहा और बरबस उसके महँु
से एक ठ डी साँस िनकली उसने चाट उठाकर टडी म म रखा देखा डॉ टर साहब अभी
सो ही रहे ह सुधा कमरा ठीक कर रही थी वह आकर िबस रया के पास बठै गया
थोड़ी देर म कमरा ठीक करके सुधा आकर कमरे के दरवाजे पर खड़ी हो गयी च दर ने
पछू ा-” य , सब ठीक ह?ै ”
उसने िसर िहला िदया, कु छ बोली नह
“यही ह आपक िश या सु ी सुधा शु ला इस साल बी.ए. फाइनल का इ तहान दगी ”
िबस रया ने िबना आँख उठाये ही हाथ जोड़ िलये सुधा ने हाथ जोड़े िफर बहत सकु चा-सी
गयी च दर उठा और िबस रया को लाकर उसने अ दर िबठा िदया िबस रया के सामने सुधा
और उसक बगल म च दर

चुप सभी चुप
अ त म च दर बोला-”लो, तु हारे मा टर साहब आ गये अब बताओ न, तु ह या- या पढऩा
ह?ै ”

सुधा चुप िबस रया कभी यह पु तक उलटता, कभी वह थोड़ी देर बाद वह बोला-”आपके
या िवषय ह?”

“जी!” बड़ी कोिशश से बोलते हए सुधा ने कहा-”िह दी, इकनॉिम स और गहृ -िव ान ” और
उसके माथे पर पसीना झलक आया
“आपको िह दी कौन पढ़ाता ह?ै ” िबस रया ने िकताब म ही िनगाह गड़ाये हए कहा
सुधा ने च दर क ओर देखा और मु कराकर िफर महँु झकु ा िलया
“बोलो न तमु खुद, ये राजा ग स कॉलेज म ह शायद िमस पवार िह दी पढ़ाती ह ” च दर ने
कहा-”अ छा, अब आप पढ़ाइए, म अपना काम क ँ ” च दर उठकर चल िदया टडी म म
मिु कल से च दर दरवाजे तक पहँचा होगा िक सुधा ने िबस रया से कहा-
“जी, म पेन ले आऊँ !” और लपकती हई च दर के पास पहँची
“ए सुनो, च दर!” च दर क गया और उसका कु रता पकडक़र छोटे ब च क तरह मचलते हए
सुधा बोली-”तमु चलकर बठै ो तो हम पढ़गे ऐसे शरम लगती है ”
“जाओ, चलो! हर व वही बचपना!” च दर ने डाँटकर कहा-”चलो, पढ़ो सीधे से इतनी बड़ी

हो गयी, अभी तक वही आदत!”
सुधा चुपचाप महँु लटकाकर खड़ी हो गयी और िफर धीरे -धीरे पढ़ने लग गयी च दर डटी म
म जाकर चाट बनाने लगा डॉ टर साहब अभी तक सो रहे थे एक म खी उडक़र उनके गले
पर बठै गयी और उ ह ने बाय हाथ से म खी मारते हए न द म कहा-”म इस मामले म सरकार

क नीित का िवरोध करता हँ ”
च दर ने च ककर पीछे देखा डॉ टर साहब जग गये थे और जमहु ाई ले रहे थे
“जी, आपने मझु से कु छ कहा?” च दर ने पछू ा
“नह , या मने कु छ कहा था? ओह! म सपना देख रहा था कै बज गये?”
“साढ़े पाँच ”
“अरे िब कु ल शाम हो गयी!” डॉ टर साहब ने बाहर देखकर कहा-”अब रहने दो कपरू , आज
काफ काम िकया है तमु ने चाय मगँ वाओ सुधा कहाँ ह?ै ”
“पढ़ रही है आज से उसके मा टर साहब आने लगे ह ”
“अ छा-अ छा, जाओ उ ह भी बुला लाओ, और चाय भी मगँ वा लो उसे भी बुला लो-सुधा
को ”
च दर जब ाइगं म म पहँचा तो देखा सुधा िकताब समेट रही है और िबस रया जा चुका है
उसने सुधा से कहना चाहा लेिकन सुधा का महँु देखते ही उसने अनुमान िकया िक सुधा लड़ने
के मडू म ह,ै अत: वह वयं ही जाकर महरािजन से कह आया िक तीन याला चाय पढ़ने के
कमरे म भेज दो जब वह लौटने लगा तो खुद सुधा ही उसके रा ते म खड़ी हो गयी और धमक
के वर म बोली-”अगर कल से साथ नह बठै ोगे तमु , तो हम नह पढ़गे ”
“हम साथ नह बठै सकते, चाहे तमु पढ़ो या न पढ़ो ” च दर ने ठंडे वर म कहा और आगे
बढ़ा
“तो िफर हम नह पढ़गे ” सुधा ने जोर से कहा
“ या बात ह?ै य लड़ रहे हो तमु लोग?” डॉ. शु ला अपने कमरे से बोले च दर कमरे म
जाकर बोला, “कु छ नह , ये कह रही ह िक...”
“पहले हम कहगे,” बात काटकर सुधा बोली-”पापा, हमने इनसे कहा िक तमु पढ़ाते व बठै ा
करो, हम बहत शरम लगती ह,ै ये कहते ह पढ़ो चाहे न पढ़ो, हम नह बठै गे ”

“अ छा-अ छा, जाओ चाय लाओ ”
जब सुधा चाय लाने गयी तो डॉ टर साहब बोले-”कोई िव ासपा लड़का ह?ै अपने घर क
लड़क समझकर सुधा को स पना पढ़ने के िलए सुधा अब ब ची नह है ”
“हाँ-हाँ, अरे यह भी कोई कहने क बात ह!ै ”
“हाँ, वसै े अभी तक सुधा तु हारी ही िनगहबानी म रही है तमु खुद ही अपनी िज मेवारी
समझते हो लड़का िह दी म एम.ए. ह?ै ”
“हाँ, एम.ए. कर रहा है ”
“अ छा ह,ै तब तो िबनती आ रही ह,ै उसे भी पढ़ा देगा ”
सुधा चाय लेकर आ गयी थी
“पापा, तमु लखनऊ कब जाओगे?”
“शु वार को, य ?”
“और ये भी जाएँगे?”
“हाँ ”
“और हम अके ले रहगे?”
“ य , महरािजन यह सोएगी और अगले सोमवार को हम लौट आएँगे ”
डॉ. शु ला ने चाय का याला महँु से लगाते हए कहा

7

एक गमकदे क शाम, मन उदास, तबीयत उचटी-सी, िसतार क रोशनी फ क लग रही थी
माच क शु आत थी और िफर भी जाने शाम इतनी गरम थी, या सुधा को ही इतनी बेचनै ी लग
रही थी पहले वह जाकर सामने के लॉन म बठै ी लेिकन सामने के मौलिसरी के पेड़ म छोटी-
छोटी गौरैय ने िमलकर इतनी जोर से चहचहाना शु िकया िक उसक तबीयत घबरा उठी वह
इस व एका त चाहती थी और सबसे बढ़कर स नाटा चाहती थी जहाँ कोई न बोले, कोई बात
न करे , सभी खामोशी म डू बे हए ह
वह उठकर टहलने लगी और जब लगा िक परै म ताकत ही नह रही तो िफर लेट गयी, हरी-हरी
घास पर मगं लवार क शाम थी और अभी तक पापा नह आये थे आना तो दरू , पापा या
च दर के हाथ के एक पुरजे के िलए तरस गयी थी िकसी ने यह भी नह िलखा िक वे लोग
कहाँ रह गये ह, या कब तक आएँगे िकसी को भी सुधा का खयाल नह शिनवार या इतवार
को तो वह हर रोज खाना खाते व रोयी, चाय पीना तो उसने उसी िदन से छोड़ िदया था और
सोमवार को सुबह पापा नह आये तो वह इतना फू ट-फू टकर रोयी िक महरािजन को िसंकती हई
रोटी छोड़कर चू हे क आँच िनकालकर सुधा को समझाने आना पड़ा और सुधा क लाई
देखकर तो महरािजन के हाथ-पाँव ढीले हो गये थे उसक सारी डाँट हवा हो गयी थी और वह
सुधा का महँु -ही-महँु देखती थी कल से कॉलेज भी नह गयी थी और दोन िदन इ तजार
करती रही िक कह दोपहर को पापा न आ जाएँ गेसू से भी दो िदन से मलु ाकात नह हई थी
लेिकन मगं ल को दोपहर तक जब कोई खबर न आयी तो उसक घबराहट बेकाबू हो गयी इस
व उसने िबस रया से कोई भी बात नह क आधा घंटा पढऩे के बाद उसने कहा िक उसके
िसर म दद हो रहा है और उसके बाद खबू रोयी, खबू रोयी उसके बाद उठी, चाय पी, महँु -हाथ
धोया और सामने के लॉन म टहलने लगी और िफर लेट गयी हरी-हरी घास पर
बड़ी ही उदास शाम थी और ि ितज क लाली के होठ भी याह पड़ गये थे बादल साँस रोके
पड़े थे और खामोश िसतारे िटमिटमा रहे थे बगलु क धँुधली-धँुधली कतार पर मारती हई गजु र
रही थ सुधा ने एक ल बी साँस लेकर सोचा िक अगर वह िचिडय़ा होती तो एक ण म
उडक़र जहाँ चाहती वहाँ क खबर ले आती पापा इस व घमू ने गये ह गे च दर अपने
दो त क टोली म बठै ा रँ गरे िलयाँ कर रहा होगा वहाँ भी दो त बना ही िलये ह गे उसने बड़ा
बातनू ी है च दर और बड़ा मीठे वभाव का आज तक िकसी से सुधा ने उसक बुराई नह
सुनी सभी उसको यार करते थे यहाँ तक िक महरािजन, जो सुधा को हमेशा डाँटती रहती
थी, च दर का हमेशा प लेती थी और सुधा हरे क से पछू लेती थी िक च दर के बारे म उसक

या राय ह?ै लेिकन सब लोग िजतनी च दर क तारीफ करते वह उतना अ छा उसे नह
समझती थी आदमी क परख तब होती है जब िदन-रात बरते च दर उसका ऊन कभी नह

लाकर देता था, बादामी रं ग का रे शम मगँ ाओ तो के स रया रं ग का ला देता था इतने न शे
बनाता रहता था, और सुधा ने हमेशा उससे कहा िक मेजपोश क कोई िडजाइन बना दो तो
उसने कभी नह बनायी एक बार सुधा ने बहत अ छी वायल कानपुर से मगँ वायी और च दर
ने कहा, “लाओ, यह बहत अ छी ह,ै इस पर हम िकनारे क िडजाइन बना दगे ” और उसके

बाद उसने उसम तमाम पान-जसै ा जाने या बना िदया और जब सुधा ने पछू ा, “यह या ह?ै ” तो
बोला, “लंका का न शा है ” जब सुधा िबगड़ी तो बोला, “लड़ि़ कय के दय म रावण से
मेघनाद तक करोड़ रा स का वास होता ह,ै इसिलए उनक पोशाक म लंका का न शा यादा

सुशोिभत होता है ” मारे गु से के सुधा ने वह धोती अपनी मािलन को दे डाली थी यह सब
बात तो िकसी को मालमू नह उनके सामने तो जरा-सा कपरू साहब हँस िदये, चार मजाक क
बात कर द , छोटे-मोटे उनके काम कर िदये, मीठी बात कर ल और सब समझे कपरू साहब तो
िब कु ल गलु ाब के फू ल ह लेिकन कपरू साहब एक तीखे काँटे ह जो िदन-रात सुधा के मन म
चुभते रहते ह, यह तो दुिनया को नह मालमू दुिनया या जाने िक सुधा िकतनी परे शानी
रहती है च दर क आदत से! अगर दुिनया को मालमू हो जाए तो कोई च दर क जरा भी तारीफ
न करे , सब सुधा को ही यादा अ छा कह, लेिकन सुधा कभी िकसी से कु छ नह कहती, मगर
आज उसका मन हो रहा था िक िकसी से च दर क जी भरकर बुराई कर ले तो उसका मन बहत
ह का हो जाए

“चलो िबिटया रानी, तई खाय लेव, िफर भीतर लेटो अबिहन लेटे का बखत नह आवा!”

सहसा महरािजन ने आकर सुधा क व न-शंखृ ला तोड़ते हए कहा
“अब हम नह खाएँगे, भखू नह ” सुधा ने अपने सुनहले सपन म ही डू बी हई बेहोश आवाज
म जवाब िदया

“खाय लेव िबिटया, खाय-िपयै छोड़ै से कसस काम चली, आव उठौ!” महरािजन ने बड़े दुलार से
कहा सुधा पीछा छू टने क कोई आशा न देखकर उठ गयी और चल दी खाने कौर उठाते ही
उसक आँख म आँसू छलक आये, लेिकन अपने को रोक िलया उसने दसू र के सामने अपने
को बहत शा त रखना आता था उसे दो कौर खाने के बाद वह महरािजन से बोली, “आज

कोई िच ी तो नह आयी?”

“नह िबिटया, आज तो िदन भर घरै म र ो!” महरािजन ने पराठे उलटते हए जवाब िदया-”काहे

िबिटया, बाबजू ी कु छौ नाही िलिखन तो छोटे बाबू तो िलख देते ”
“अरे महरािजन, यही तो हमारी जान का रोना है हम चाहे रो-रोकर मर जाएँ मगर न पापा को

खयाल, न पापा के िश य को और च दर तो ऐसे खराब ह िक हम या कर ऐसे वाथ ह,

अपने मतलब के िक बस! सुबह-शाम आएँ और हम या पापा न िमल तो आफत ढा दगे-बहत
घमू ने लगी हो तमु , बहत बाहर कदम िनकल गया है तु हारा-और सच पछू ो तो च दर क वजह
से हमने सब जगह आना-जाना ब द कर िदया और खुद ह िक आज लखनऊ, कल कलक ा
और एक िच ी भेजने तक का व नह िमलता! अभी हम ऐसा करते तो हमारी जान नोच खाते!

और पापा को देखो, उनके दुलारे उनके साथ ह तो बस और िकसी क िफ ही नह अब तमु
महरािजन, च दर को तो कभी कु छ चाय-वाय बना के मत देना ”
“काहे िबिटया, काहे कोसत हो कै सा चाँद-से तो ह छोटे बाब,ू और कै सा हँस के बात करत
ह माई का जाने कै से िहयाव पड़ा िक उ ह अलग कै िदिहस बेचारा होटल म जाने कै से रोटी

खात होई उ ह िहंयई बुलाय लेव तो अपने हाथ क िखलाय के दुई महीना माँ मोटा कै देई ं
हम तोसे यादा उसक ममता लगत है ”
“बीबीजी, बाहर एक मेम पछू त ह-िहंया कोनो डाकदर रहत ह? हम कहा, नाह , िहंया तो बाबजू ी
रहत ह तो कहत ह, नह यही मकान आय ” मािलन ने सहसा आकर बहत वतं वर म

कहा
“बठै ाओ उ ह, हम आते ह ” सुधा ने कहा और ज दी-ज दी खाना शु िकया और ज दी-
ज दी ख म कर िदया
बाहर जाकर उसने देखा तो नीलकाँटे के झाड़ से िटक हई एक बाइिसिकल रखी थी और एक
ईसाई लड़क लॉन पर टहल रही है होगी करीब चौबीस-प चीस बरस क , लेिकन बहत अ छी

लग रही थी
“किहए, आप िकसे पछू रही ह?” सुधा ने अँ ेजी म पछू ा
“म डॉ टर शु ला से िमलने आयी हँ ” उसने शु िह दु तानी म कहा
“वे तो बाहर गये ह और कब आएँगे, कु छ पता नह कोई खास काम है आपको?” सुधा ने
पछू ा
“नह , यँू ही िमलने आ गयी आप उनक लड़क ह?” उसने साइिकल उठाते हए कहा
“जी हाँ, लेिकन अपना नाम तो बताती जाइए ”
“मेरा नाम कोई मह वपणू नह म उनसे िमल लँगू ी और हाँ, आप उसे जानती ह, िम टर
कपरू को?”
“आहा! आप प मी ह, िमस िड ू ज!” सुधा को एकदम खयाल आ गया-”आइए, आइए; हम
आपको ऐसे नह जाने दगे चिलए, बिै ठए ” सुधा ने बड़ी बेतक लुफ से उसक साइिकल
पकड़ ली
“अ छा-अ छा, चलो!” कहकर प मी जाकर ाइगं म म बठै गयी
“िम टर कपरू रहते कहाँ ह?” प मी ने बठै ने से पहले पछू ा
“रहते तो वे चौक म ह, लेिकन आजकल तो वे भी पापा के साथ बाहर गये ह वे तो आपक एक
िदन बहत तारीफ कर रहे थे, बहत तारीफ इतनी तारीफ िकसी लड़क क करते तो हमने सुना
नह ”
“सचमचु !” प मी का चेहरा लाल हो गया “वह बहत अ छे ह, बहत अ छे ह!”
थोड़ी देर प मी चुप रही, िफर बोली-” या बताया था उ ह ने हमारे बारे म?”
“ओह तमाम! एक िदन शाम को तो हम लोग आप ही के बारे म बात करते रहे आपके भाई के
बारे म बताते रहे िफर आपके काम के बारे म बताया िक आप िकतना तेज टाइप करती ह, िफर
आपक िचय के बारे म बताया िक आपको सािह य से बहत शौक नह है और आप शादी से
बेहद नफरत करती ह और आप यादा िमलती-जुलती नह , बाहर आती-जाती नह और िमस
िड ू ज...”
“न, आप प मी किहए मझु े?”
“हाँ, तो िमस प मी, शायद इसीिलए आप उसे इतनी अ छी लग िक आप कह आती-जाती नह ,
वह लड़िकय का आना-जाना और आजादी बहत नापस द करता है ” सुधा बोली
“नह , वह ठीक सोचता है ” प मी बोली-”म शादी और तलाक के बाद इसी नतीजे पर पहँची हँ

िक चौदह बरस से च तीस बरस तक लड़िकय को बहत शासन म रखना चािहए ” प मी ने
ग भीरता से कहा
एक ईसाई मेम के महँु से यह बात सुनकर सुधा दंग रह गयी
“ य ?” उसने पछू ा
“इसिलए िक इस उ म लड़िकयाँ बहत नादान होती ह और जो कोई भी चार मीठी बात करता ह,ै
तो लड़िकयाँ समझती ह िक इससे यादा यार उ ह कोई नह करता और इस उ म जो कोई
भी ऐरा-गरै ा उनके संसग म आ जाता ह,ै उसे वे यार का देवता समझने लगती ह और नतीजा
यह होता है िक वे ऐसे जाल म फँ स जाती ह िक िजंदगी भर उससे छु टकारा नह िमलता मेरा
तो यह िवचार है िक या तो लड़िकयाँ च तीस बरस के बाद शािदयाँ कर जब वे अ छा-बुरा समझने
के लायक हो जाएँ, नह तो मझु े तो िह दुओं का कायदा सबसे यादा पस द आता है िक चौदह
वष के पहले ही लड़क क शादी कर दी जाए और उसके बाद उसका संसग उसी आदमी से रहे
िजससे उसे िजंदगी भर िनबाह करना है और अपने िवकास- म से दोन ही एक-दसू रे को
समझते चल लेिकन यह तो सबसे भ ा तरीका है िक चौदह और च तीस बरस के बीच म
लड़क क शादी हो, या उसे आजादी दी जाए मने तो वयं अपने ऊपर ब धन बाँध िलये
थे ....तु हारी तो शादी अभी नह हई?”
“नह ”
“बहत ठीक, तमु च तीस बरस के पहले शादी मत करना, अ छा हाँ, और या बताया च दर ने
मेरे बारे म?”
“और तो कु छ खास नह ; हाँ, यह कह रहा था, आपको चाय और िसगरे ट बहत अ छी लगती है
ओहो, देिखए म भलू ही गयी, लीिजए िसगरे ट मगँ वाती हँ ” और सुधा ने घंटी बजायी
“रहने दीिजए, म िसगरे ट छोड़ रही हँ ”

“ य ?”
“इसिलए िक कपरू को अ छा नह लगता और अब वह मेरा दो त बन गया ह,ै और दो ती म
एक-दसू रे से िनबाह ही करना पड़ता है उसने आपसे यह नह बताया िक मने उसे दो त मान
िलया ह?ै ” प मी ने पछू ा
“जी हाँ, बताया था, अ छा तो चाय लीिजए!”
“हाँ-हाँ, चाय मगँ वा लीिजए आपका कपरू से या स ब ध ह?ै ” प मी ने पछू ा
“कु छ नह मझु से भला या स ब ध होगा उनका, जब देिखए तब िबगड़ते रहते ह मझु पर;
और बाहर गये ह और आज तक कोई खत नह भेजा ये कह स ब ध ह?”
“नह , मेरा मतलब आप उनसे घिन ह!”
“हाँ, कभी वह िछपाते तो नह मझु से कु छ! य ?”
“तब तो ठीक ह,ै स चे िदल के आदमी मालमू पड़ते ह आप तो यह बता सकती ह िक उ ह

या- या चीज पस द ह?”
“हाँ...उ ह किवता पस द है बस किवता के बारे म बात न क िजए, किवता सुना दीिजए उ ह
या किवता क िकताब दे दीिजए उ ह और उनको सुबह घमू ना पस द है रात को गगं ाजी क
सरै करना पस द है िसनेमा तो बेहद पस द है और, और या, चाय क प ी का हलुआ
पस द है ”

“यह या होता ह?ै ”

“मेरा मतलब िबना दधू क चाय उ ह पस द है ”
“अ छा, अ छा देिखए आप सोचगी िक म इस तरह से िम. कपरू के बारे म पछू रही हँ जसै े म
कोई जाससू होऊँ , लेिकन असल बात म आपको बता दँू म िपछले दो-तीन साल से अके ली
रहती रही िकसी से भी नह िमलती-जुलती थी उस िदन िम टर कपरू गये तो पता नह य
मझु पर भाव पड़ा उनको देखकर ऐसा लगा िक यह आदमी है िजसम िदल क स चाई ह,ै जो
आदिमय म िब कु ल नह होती तभी मने सोचा, इनसे दो ती कर लँू लेिकन चँिू क एक बार
दो ती करके िववाह, और िववाह के बाद अलगाव, म भोग चुक हँ इसिलए इनके बारे म परू ी
जाँच-पड़ताल कर लेना चाहती हँ लेिकन दो त तो अब बना ही चुक हँ ” चाय आ गयी थी
और प मी ने सुधा के याले म चाय ढाली
“न, म तो अभी खाना खा चुक हँ ” सुधा बोली
“प मी ने दो-तीन चुि कय के बाद कहा-”आपके बारे म च दर ने मझु से कहा था ”
“कहा होगा!” सुधा महँु िबगाडक़र बोली-”मेरी बुराई कर रहे ह गे और या?”
प मी चाय के याले से उठते हए धुएँ को देखती हई अपने ही खयाल म डू बी थी थोड़ी देर बाद
बोली, “मेरा अनुमान गलत नह होता मने कपरू को देखते ही समझ िलया था िक यही मेरे
िलए उपयु िम ह मने किवता पढऩी बहत िदन से छोड़ दी लेिकन िकसी कविय ी ने,
शायद िमसेज ाउिनंग ने कह िलखा था, िक वह मेरी िजंदगी म रोशनी बनकर आया, उसे

देखते ही म समझ गयी िक यह वह आदमी है िजसके हाथ म मेरे िदल के सभी राज सुरि त
रहगे वह खेल नह करे गा, और यार भी नह करे गा िजंदगी म आकर भी िजंदगी से दरू और
सपन म बँधकर भी सपन से अलग...यह बात कपरू पर बहत लागू होती है माफ करना िमस
सुधा, म आपसे इसिलए कह रही हँ िक आप इनक घिन ह और आप उ ह बतला दगी िक मेरा

या खयाल है उनके बारे म अ छा, अब म चलँगू ी ”
“बिै ठए न!” सुधा बोली
“नह , मेरा भाई अके ला खाने के िलए इ तजार कर रहा होगा ” उठते हए प मी ने कहा

“आप बहत अ छी ह इस व आप आय तो म थोड़ी-सी िच ता भलू गयी वरना म तीन िदन
से उदास थी बिै ठए, कु छ और च दर के बारे म बताइए न!”
“अब नह वह अपने ढंग का अके ला आदमी ह,ै यह म कह सकती हँ...ओह तु हारी आँख बड़ी
सु दर ह देखँू ” और छोटे ब चे क तरह उसके महँु को हथेिलय से ऊपर उठाकर प मी ने
कहा, “बहत सु दर आँख ह माफ करना, म कपरू से भी इतनी ही बेतक लुफ हँ!”
सुधा झप गयी उसने आँख नीची कर ल
प मी ने अपनी साइिकल उठाते हए कहा-”कपरू के साथ आप आइएगा और आपने कहा था
कपरू को किवता पस द है ”
“जी हाँ, गडु नाइट ”
जब प मी बँगले पर पहँची तो उसक साइिकल के कै रयर म अँगरे जी किवता के पाँच-छह थ

बँधे थे

आठ बज चुके थे सुधा जाकर अपने िब तरे पर लेटकर पढऩे लगी अँगरे जी किवता पढ़ रही
थी अँगरे जी लड़िकयाँ िकतनी आजाद और व छ द होती ह गी! जब प मी, जो ईसाई ह,ै


Click to View FlipBook Version