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गुनाहों का देवता _ Gunahon Ka Devta ( PDFDrive.com )

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Published by arunyadavyes, 2020-10-08 14:06:48

गुनाहों का देवता _ Gunahon Ka Devta ( PDFDrive.com )

गुनाहों का देवता _ Gunahon Ka Devta ( PDFDrive.com )

के वल आदमी को समझाकर, उसक कमजो रयाँ समझकर उसे मा करने और उसे यार करने

क बात कहते ह, च दर! वहाँ निै तकता-अनिै तकता का ही नह ”

“तब? यह लािन िकस बात क तु ह!” च दर ने पछू ा
“ लािन तो मझु े अपने पर थी, च दर! रहा तु हारा प मी से स ब ध तो म िबनती क तरह नह
सोचती, इतना िव ास रखो मेरी पाप और पु य क तराजू ही दसू री है िफर कम-से-कम अब
इतना देख-सुनकर म यह नह मानती िक शरीर क यास ही पाप ह!ै नह च दर, शरीर क
यास भी उतनी ही पिव और वाभािवक है िजतनी आ मा क पजू ा आ मा क पजू ा और
शरीर क यास दोन अिभ न ह आ मा क अिभ यि शरीर से ह,ै शरीर का सं कार, शरीर

का स तलु न आ मा से है जो आ मा और शरीर को अलग कर देता ह,ै वही मन के भयंकर
तफू ान म उलझकर चरू -चरू हो जाता है च दर, म तु हारी आ मा थी तमु मेरे शरीर थे पता
नह कै से हम लोग अलग हो गये! तु हारे िबना म के वल सू म आ मा रह गयी शरीर क
यास, शरीर क रं गीिनयाँ मेरे िलए अप रिचत हो गय पित को शरीर देकर भी म स तोष न दे

पायी...और मेरे िबना तमु के वल शरीर रह गये शरीर म डू ब गये...पाप का िजतना िह सा
तु हारा उतना ही मेरा...पाप क वतै रणी के इस िकनारे जब तक तमु तड़पोगे, तभी तक म भी
तड़पँगू ी...दोन म से िकसी को भी चनै नह और कभी चनै नह िमलेगा...”
“लेिकन िफर...”

“हटाओ इन सब बात को, च दर! तमु ने यथ यह बात उठायी म अब बात करना भलू ती जा
रही हँ म तो आयी थी तु ह देखकर कु छ मन का ताप िमटाने उठो, खाना खाएँ!” सुधा
बोली

“नह , म चाहता हँ, बात सुलझ जाएँ, सुधा!” च दर ने सुधा के हाथ पर अपना िसर रखकर
कहा, “मेरी तकलीफ अब बेहद बढ़ती जा रही है म पागल न हो जाऊँ !”

“िछः, ऐसी बात नह सोचते उठो!” च दर को उठाकर सुधा बोली दोन ने खाना खाया
महरािजन बड़े दुलार से परसती रह और सुधा से बात करती रह खाना खाकर च दर लेट
गया और सोचने लगा, अब या सचमचु उसके और सुधा के बीच म कोई इतना भयंकर अ तर
आ गया है िक दोन पहले जसै े नह हो सकते?

43

लगभग चार बजे वह जागा तो उसने देखा िक उसके पाँव के पास िसर रखकर सुधा सो रही
है पंखे क हवा वहाँ तक नह पहँचती वह पसीने से तर-बतर हो रही है च दर उठा, उसे
न द म ऐसा लगा िक जसै े इधर कु छ हआ ही नह है सुधा वही सुधा ह,ै च दर वही च दर है
उसने सुधा के प ले से सुधा के माथे और गले का पसीना प छ िदया और हाथ बढ़ाकर पंखा
उसक ओर घुमा िदया सुधा ने आँख खोल , एक अजीब-सी िनगाह से च दर क ओर देखा
और च दर के पाँव को ख चकर व से लगा िफर आँख ब द करके लेट गयी च दर ने अपना
एक हाथ सुधा के माथे पर रख िलया और वह चुपचाप बठै ा सोचने लगा, आज से लगभग साल-
भर पहले क बात, जब उसने पहले-पहल सुधा को कै लाश का िच िदखाया था, और सुधा रो-
धोकर उसके पाँव म इसी तरह महँु िछपाकर सो गयी थी...और आज...सुधा साल-भर म कहाँ से
कहाँ जा पहँची ह!ै च दर कहाँ से कहाँ पहँच गया ह!ै काश िक कोई उनक िजंदगी क लेट से
इस वष-भर म ख ची हए मानिसक रे खाओं को िमटा सके तो िकतने सुखी हो जाएँ दोन ! च दर
ने सुधा को िहलाया और बोला-
“सुधा, सो रही हो?”
“नह ”
“उठो ”
“नह च दर, पड़ी रहने दो तु हारे चरण म सबकु छ भलू कर एक ण के िलए भी सो सकँू गी,
मझु े इसका िव ास नह था सबकु छ छीन िलया है तमु ने, एक ण क आ म- वंचना य
छीनते हो?” सुधा ने उसी तरह पड़े हए जवाब िदया
“अरी, उठ पगली!” च दर के मन म जाने कहाँ मरा पड़ा हआ उ लास िफर से िज दा हो उठा
था उसने सुधा क बाँह म जोर से चुटक काटते हए कहा, “उठती है या नह , आलसी कह
क !”
सुधा उठकर बठै गयी ण-भर च दर क ओर पथरायी हई िनगाह से देखती रही और बोली,
“च दर, म जाग रही हँ तु ह ने उठाया है मझु े...च दर कह सपना तो नह है िक िफर टू ट
जाए!” और सुधा िससक-िससक कर रो पड़ी च दर क आँख म आँसू आ गये थोड़ी देर
बाद वह बोला, “सुधा, कोई जादगू र अगर हम लोग के मन से यह काँटा िनकाल देता तो म
िकतना सुखी होता! लेिकन सुधा, अब म तु ह दुखी नह क ँ गा ”
“यह तो तमु ने पहले भी कहा था, च दर! लेिकन इधर जाने कै से हो गये लगता है तु हारे
च र म कह थािय व नह ...इसी का तो मझु े दुख ह,ै च दर!”
“अब रहेगा, सुधा! तु ह खोकर, तु हारे यार को खोकर म देख चुका हँ िक म आदमी नह रह
पाता, जानवर बन जाता हँ सुधा, अगर तमु आज से महीन पहले िमल जात तो जो जहर मेरे

मन म घुट रहा ह,ै वह तहु ारे सामने य करके म िब कु ल िनि त हो जाता अ छा सुधा,
यहाँ आओ चुपचाप लेट जाओ, म तमु से सबकु छ कह डालँ,ू िफर सब भलू जाऊँ बोलो,
सुनोगी?”
सुधा चुपचाप लेट गयी और बोली, “च दर! या तो मत बताओ या िफर सभी प बता दो...”
“हाँ, िब कु ल प सुधी; तमु से कु छ िछपा सकता हँ भला!” च दर ने ह क -सी चपत मारकर
कहा, “आज मन जसै े पागल हो रहा है तु हारे चरण पर िबखर जाने के िलए...जादगू रनी कह
क ! देखो सुधा-िपछली दफे तमु ने मझु े बहत कु छ बताया था, कै लाश के बारे म!”
“हाँ ”

“बस, उसके बाद से एक अजीब-सी अ िच मेरे मन म तु हारे िलए होने लगी थी; म तमु से कु छ
िछपाऊँ गा नह तु हारे जाने के बाद बट आया उसने मझु से कहा िक औरत के वल नयी
संवेदना, नया वाद चाहती है और कु छ नह , अिववािहत लड़िकयाँ िववाह, और िववािहत
लड़िकयाँ नये ेमी...बस यही उनका चरम ल य है लड़िकयाँ शरीर क यास के अलावा और

कु छ नह चाहत ...जसै े अराजकता के िदन म िकसी देश म कोई भी चालाक नेता शि छीन
लेता ह,ै वसै े ही मानिसक शू यता के ण म बट जसै े मेरा दाशिनक गु हो गया उसके बाद
आयी प मी उससे मने कहा िक या आव यक है िक पु ष और नारी के स ब ध म से स हो
ही? उसने कहा, 'हाँ, और यिद नह है तो लेटािनक (आदशवादी) यार क िति या से स क

ही यास म होती है ' अब म तु ह अपने मन का चोर बतला दँू मने सोचा िक तमु भी अपने
ववै ािहक जीवन म रम गयी हो शरीर क यास ने तु ह अपने म डु बा िदया है और जो अ िच
तमु मेरे सामने य करती हो वह के वल िदखावा है इसिलए मन-ही-मन मझु े तमु से िचढ़-सी
हो गयी पता नह य यह सं कार मझु म ढ़-सा हो गया और इसी के पीछे म तु ह को नह ,
प मी को छोड़कर सभी लड़िकय से नफरत-सी करने लगा िबनती को भी मने बहत दुख
िदया याह म जाने के पहले ही बहत दुखी होकर गयी रही प मी क बात तो म उस पर
इसिलए खुश था िक उसने बड़ी यथाथ-सी बात कही थी लेिकन उसने मझु से कहा िक
आदशवादी यार क िति या शारी रक यास म होती है तमु को इसका अपराधी मानकर
तमु से तो नाराज हो गया लेिकन अ दर-ही-अ दर वह सं कार मेरा यि व बदलने लगा
सुधा, पता नह , तु हारे जीवन म िति या के प म शारी रक यास जागी या नह पर मेरे मन
के गनु ाह तो तफू ान क तरह लहरा उठे लेिकन तमु से एक बात नह िछपाऊँ गा वह यह िक
ऐसे भी ण आये ह जब प मी के समपण ने मेरे मन क सारी कटु ता धो दी ह.ै ...बोलो, तमु कु छ
तो बोलो, सुधा!”
“तमु कहते चलो, च दर! म सुन रही हँ ”
“हाँ...लेिकन उस िदन गेसू आयी उसने मझु े िफर पुराने िदन क याद िदला दी और िफर जसै े
प मी के िलए आकषण उखड़-सा गया अ छा सुधा, एक बात बताओ तमु यह मानती हो िक
कभी-कभी एक यि के मा यम से दसू रे यि क भावनाओं क अनुभिू त होने लगती ह?ै ”
“ या मतलब?”

“मेरा मतलब जसै े मझु े गेसू क बात म उस िदन ऐसा लगा, जसै े तमु बोल रही हो और दसू री
बात तु ह बताऊँ तु हारे पीछे िबनती रही मेरे पास सारे अँधेरे म वही एक रोशनी थी, बड़ी

ीण, िटमिटमाती हई, सारहीन-सी बि क मझु े तो लगता था िक वह रोशन ही इसिलए थी िक

उसम रोशनी तु हारी थी मने कु छ िदन िबनती को बहत यार िकया मझु े ऐसा लगता था िक
अभी तक तमु मेरे सामने थ , अब तमु उसके मा यम से आती हो लगता था जसै े वह एक
यि व नह ह,ै तु हारे यि व का ही अशं है उस लड़क म िजस अशं तक तमु थ वह अंश
बार-बार मेरे मन म रस उभार देता था य सुधा! मन क यह भी कै सी अजब-सी गित ह!ै ”
सुधा थोड़ी देर चुप रही, िफर बोली, “भागवत म एक जगह एक टीका म हमने पढ़ा था च दर िक
िजसको भगवान बहत यार करते ह, उसम उनक अशं ािभ यि होती है बहत बड़ा वै ािनक

स य है यह! म िबनती को बहत यार करती हँ, च दर!”

“समझ गया म ” च दर बोला, “अब म समझा, मेरे मन म इतने गनु ाह कहाँ से आये तमु ने
मझु े बहत यार िकया और वही तु हारे यि व के गनु ाह मेरे यि व म उतर आये!”
सुधा िखलिखलाकर हँस पड़ी च दर के क धे पर हाथ रखकर बोली, “इसी तरह हँसते-बोलते
रहते तो य यह हाल होता? मनमौजी हो जब चाहो खुश हो गये, जब चाहो नाराज हो गये!”
उसके बाद वह उठी और बाहर से एक त तरी म कु छ फल काटकर लायी च दर ने देखा-
आम “अरे आम! अभी कहाँ से आम ले आयीï? कौन लाया?”

“लखनऊ उतरी थी? वहाँ से तु हारे िलए लेती आयी ”
च दर ने एक आम क फाँक उठाकर खायी और िकसी पुरानी घटना क याद िदलाने के िलए
आँचल से हाथ प छ िदये सुधा हँस पड़ी और बड़ी दुलार-भरी ताडऩा के वर म बोली, “बोलो,
अब तो िदमाग नह िबगाड़ोगे अपना?”

“कभी नह सुधी, लेिकन प मी का या होगा? प मी से म स ब ध नह तोड़ सकता यवहार
चाहे िजतना सीिमत कर दँू ”
“म कब कहती हँ, म तु ह कह से कभी बाँधना ही नह चाहती जानती हँ िक अगर चाहँ भी
तो कभी अपने मन के बाहपाश ढीले कर तु ह िचरमिु तो म न दे पाऊँ गी, तो भला ब धन ही

य बाँधँ!ू प मी शाम को आएगी?”
“शायद...”

दरवाजा खटका और गेसू ने वेश िकया आकर, दौडक़र सुधा से िलपट गयी च दर उठकर
चला आया “चले कहाँ भाईजान, बिै ठए न ”

“नहा लँ,ू तब आता हँ...” च दर चल िदया वह इतना खुश था, इतना खुश िक बाथ- म म
खबू गाता रहा और नहा चुकने के बाद उसे खयाल आया िक उसने बिनयाइन उतारी ही नह
थी नहाकर कपड़े बदलकर वह आया तब भी गनु गनु ा रहा था कमरे म आया तब देखा गेसू
अके ली बठै ी है

“सुधा कहाँ गयी?” च दर ने नाचते हए वर म कहा
“गयी है शरबत बनाने ” गेसू ने चु नी से िसर ढँकते हए और पाँव को सलवार से ढँकते हए
कहा च दर इधर-उधर ब स म माल ढूँढऩे लगा
“आज बड़े खुश ह, च दर भाई! कोई खायी हई चीज िमल गयी है या? अरे , म बहन हँ कु छ
इनाम ही दे दीिजए ” गेसू ने चुटक ली
“इनाम क बात या, कहो तो वह चीज ही तु ह दे दँ!ू ”
“हाँ, कै लाश बाबू के िदल से पिू छए ” गेसू बोली
“उनके िदल से तु ह बात कर सकती हो!”

गेसू ने झपकर महँु फे र िलया
सुधा हाथ म दो िगलास िलए आयी “लो गेस,ू िपयो ” एक िगलास गेसू को देकर बोली,
“च दर, लो ”

“तमु िपयो न!”
“नह , म नह िपऊँ गी बफ मझु े नुकसान करे गी!” सुधा ने चुपचाप कहा च दर को याद आ
गया पहले सुधा िचढ़-िचढ़कर अपने आप चाय, शरबत पी जाती थी...और आज...
“ या ढूँढ़ रहे हो, च दर?” सुधा बोली
“ माल, कोई िमल ही नह रहा!”

“साल-भर म माल खो िदये ह गे! म तो तु हारी आदत जानती हँ आज कपड़ा ला दो, कल
सुबह माल सी दँू तु हारे िलए ” और उठकर उसने कै लाश के ब स से एक माल
िनकालकर दे िदया

44

उसके बाद च दर बाजार गया और कै लाश के िलए तथा सुधा के िलए कु छ कपड़े खरीद लाया
इसके साथ ही कु छ नमक न जो सुधा को पस द था, पेठा, एक तरबजू , एक बोतल गलु ाब का
शरबत, एक सु दर-सा पेन और जाने या- या खरीद लाया सुधा ने देखकर कहा, “पापा
नह ह, िफर भी लगता है म मायके आयी हँ!” लेिकन वह कु छ खा-पी नह सक
च दर खाना खाकर लॉन म बठै गया, वह उसने अपनी चारपाई डलवा ली सुधा के िब तर
छत पर लगे थे उसके पास महरािजन सोनेवाली थ सुधा एक त तरी म तरबजू काटकर ले
आयी और कु स डालकर च दर भी चारपाई के पास बठै गया च दर तरबजू खाता रहा...थोड़ी
देर बाद सुधा बोली-
“च दर, िबनती के बारे म तु हारी या राय ह?ै ”
“राय? राय या होती? बहत अ छी लड़क ह!ै तमु से तो अ छी ही ह!ै ” च दर ने छेड़ा
“अरे , मझु से अ छी तो दुिनया ह,ै लेिकन एक बात पछू ? बहत ग भीर बात ह!ै ”
“ या?”
“तमु िबनती से याह कर लो ”
“िबनती से? कु छ िदमाग तो नह खराब हो गया ह?ै ”
“नह ! इस बारे म पहले-पहले 'ये' बोले िक च दर से िबनती का याह य नह करती, तो मने
चुपचाप पापा से पछू ा पापा िब कु ल राजी ह, लेिकन बोले मझु से िक तु ह कहो च दर से
कर लो; च दर! बुआजी अब दखल नह दगी ”
च दर हँस पड़ा, “अ छी खुराफात तु हारे िदमाग म उठती ह! याद ह,ै एक बार और तमु ने याह
करने के िलए कहा था?”
सुधा के महँु से एक ह का िन: ास िनकल पड़ा-”हाँ, याद ह!ै खरै , तब क बात दसू री थी, अब
तो तु ह कर लेना चािहए ”
“नह सुधा, शादी तो मझु े नह ही करनी है तमु कह य रही हो? तमु मेरे -िबनती के स ब ध
को कु छ गलत तो नह समझ रही हो?”
“नह जी, लेिकन यह जानती हँ िक िबनती तमु पर अ ध ा रखती है उससे अ छी लड़क
तु ह िमलेगी नह कम-से-कम िजंदगी तु हारी यवि थत हो जाएगी ”
च दर हँसा, “मेरी िजंदगी शादी से नह , यार से सुधरे गी, सुधा! कोई ऐसी लड़क ढूँढ़ दो जो
तु हारी जसै ी हो और यार करे तो म समझँू भी िक तमु ने कु छ िकया मेरे िलए शादी-वादी
बेकार है और कोई बात करनी है या नह ?”
“नह च दर, शादी तो तु ह करनी ही होगी अब म ऐसे तु ह नह रहने दँगू ी िबनती से न
करो तो दसू री लड़क ढूँढूँगी लेिकन शादी करनी होगी और मेरी पस द से करनी होगी ”

च दर एक उपे ा क हँसी हँसकर रह गया

सुधा उठ खड़ी हई
“ य , चल द ?”

“हाँ, अब न द आ रही होगी तु ह, सोओ ”
च दर ने रोका नह उसने सोचा था, सुधा बठै ेगी जाने िकतनी बात करगे! वह सुधा से
उसका सब हाल पछू ेगा, लेिकन सुधा तो जाने कै सी तट थ, िनरपे और अपने म सीिमत-सी हो
गयी है िक कु छ समझ म नह आता उसने च दर से सबकु छ जान िलया लेिकन च दर के
सामने उसने अपने मन को कह जािहर ही नह होने िदया, सुधा उसके पास होकर भी जाने
िकतनी दरू थी! सरोवर म डू बकर पंछी यासा था
करीब घंटा-भर बाद सुधा दधू का िगलास लेकर आयी च दर को न द आ गयी थी वह च दर
के िसरहाने बठै गयी-”च दर, सो गये या?”

“ य ?” च दर घबराकर उठ बठै ा

“लो, दधू पी लो ” सुधा बोली
“दधू हम नह िपएँगे ”
“पी लो, देखो बफ और शरबत िमला िदया ह,ै पीकर तो देखो!”

“नह , हम नह िपएँगे अब जाओ, हम न द लग रही है ” च दर गु सा था
“पी लो मेरे राजदुलारे , चमक रहे ह चाँद-िसतारे ...” सुधा ने लोरी गाते हए च दर को अपनी गोद
म ख चकर ब च क तरह िगलास च दर के महँु से लगा िदया च दर ने चुपचाप दधू पी
िलया सुधा ने िगलास नीचे रखकर कहा, “वाह, ऐसे तो म नीलू को दधू िपलाती हँ ”
“नीलू कौन?”
“अरे मेरा भतीजा! शंकर बाबू का लड़का ”
“अ छा!”

“च दर, तमु ने पंखा तो छत पर लगा िदया है तमु कै से सोओगे?”
“मझु े न द आ जाएगी ”
च दर िफर लेट गया सुधा उठी नह वह दसू री पाटी से हाथ टेककर च दर के व के आर-
पार फू ल के धनुष-सी झकु कर बठै गयी एकादशी का ि न ध पिव च मा आसमान क
नीली लहर पर अधिखले बेल के फू ल क तरह काँप रहा था दधू म नहाये हए झ के चाँदनी से
आँख-िमचौली खेल रहे थे च दर आँख ब द िकये पड़ा था और उसक पलक पर, उसके माथे

पर, उसके होठ पर चाँदी क पाँखु रयाँ बरस रही थ सुधा ने च दर का कॉलर ठीक िकया
और बड़े ही मधुर वर म पछू ा, “च दर, न द आ रही ह?ै ”
“नह , न द उचट गयी!” च दर ने आँख खोलकर देखा एकादशी का पिव च मा आकाश

म था और पजू ा से अिभिष एकादशी क उदास चाँदनी उसके व पर झकु बठै ी थी उसे लगा
जसै े पिव ता और अमतृ का च पई बादल उसके ाण म िलपट गया है
उसने करवट बदलकर कहा, “सुधा, िजंदगी का एक पहलू ख म हआ दद क एक मिं जल
ख म हो गयी थकान भी दरू हो गयी, लेिकन अब आगे का रा ता समझ म नह आता या
क ँ ?”

“करना बहत ह,ै च दर! अपने अ दर क बुराई से लड़ िलये, अब बाहर क बुराई से लड़ो मेरा

तो सपना था च दर िक तमु बहत बड़े आदमी बनोगे अपने बारे म तो जो कु छ सोचा था वह
सब नसीब ने तोड़ िदया अब तु ह को देखकर कु छ स तोष िमलता है तमु िजतने ऊँ चे
बनोगे, उतना ही चनै िमलेगा वना म तो नरक म भुन रही हँ ”
“सुधा, तु हारी इसी बात से मेरी सारी िह मत, सारा बल टू ट जाता है अगर तमु अपने प रवार
म सुखी होती तो मेरा भी साहस बँधा रहता तु हारा यह हाल, तु हारा यह वा य, यह
असमय वरै ा य और पजू ा, यह घुटन देखकर लगता है या क ँ ? िकसके िलए क ँ ?”
“म भी या क ँ , च दर! म यह जानती हँ िक अब ये भी मेरा बहत खयाल रखते ह, लेिकन इस
बात पर मझु े और भी दुख होता है म इ ह स तिु लत नह कर पाती और उनक खुलकर उपे ा
भी नह कर पाती यह अजब-सा नरक है मेरा जीवन भी, लेिकन यह ज र है च दर िक तु ह
ऊँ चा देखकर म यह नरक भी भोग ले जाऊँ गी तमु िदल मत छोटा करो एक ही िजंदगी क
तो बात ह,ै उसके बाद...”

“लेिकन म तो पुनज म म िव ास ही नह करता ”
“तब तो और भी अ छा ह,ै इसी ज म म जो सुख दे सकते हो, दे लो िजतना ऊँ चे उठ सकते हो,
उठ लो ”

“तमु जो रा ता बताओ वह म अपनाने के िलए तयै ार हँ म सोचता हँ, अपने यि व से ऊपर
उठूँ...लेिकन मेरे साथ एक शत है तु हारा यार मेरे साथ रहे!”
“तो वह अलग कब रहा, च दर! तु ह ने जब चाहा महँु फे र िलया लेिकन अब नह काश िक
तमु एक ण का भी अनुभव कर पाते िक तमु से दरू वहाँ, वासना के क चड़ म फँ सी हई म
िकतनी याकु ल, िकतनी यिथत हँ तो तमु ऐसा कभी न करते! मेरे जीवन म जो कु छ अपणू ता
रह गयी है च दर, उसक पणू ता, उसक िसि तु ह हो तु ह मेरे ज म-ज मा तर क शाि त
क सौग ध ह,ै तमु अब इस तरह न करना! बस याह कर लो और ढ़ता से ऊँ चाई क ओर
चलो ”

“ याह के अलावा तु हारी सब बात वीकार ह लेिकन िफर भी तमु अपना यार वापस नह
लोगी कभी?”

“कभी नह ”

“और हम कभी नाराज भी हो जाएँ तो बुरा नह मानोगी?”
“नह !”

“और हम कभी िफसल तो तमु तट थ होकर नह बठै ोगी बि क िबना डरे हए मझु े ख च लाओगी
उस दलदल से?”

“यह किठन है च दर, आिखर मेरे भी ब धन ह लेिकन खरै ...अ छा यह बताओ, तमु िद ली
कब आओगे?”

“अब िद ली तो दशहरे म आऊँ गा गिमय म यह रहँगा ...लेिकन हो सका तो लौटने के बाद

शाहजहाँपुर आऊँ गा ”
सुधा चुपचाप बठै ी रही च दर भी चुपचाप लेटा रहा थोड़ी देर बाद च दर ने सुधा क हथेली
अपने हाथ पर रख ली और आँख ब द कर ल जब वह सो गया तो सुधा ने धीरे -से हाथ
उठाया, खड़ी हो गयी थोड़ी देर अपलक उसे देखती रही और धीरे -धीरे चली आयी

45

दसू रे िदन सुबह सुधा ने आकर च दर को जगाया च दर उठ बठै ा तो सुधा बोली-”ज दी से
नहा लो, आज तु हारे साथ पजू ा करगे!”
च दर उठ बठै ा नहा-धोकर आया तो सुधा ने चौक के सामने दो आसन िबछा रखे थे चौक
पर धपू सुलग रही थी और फू ल गमक रहे थे ढेर-के -ढेर बेल और अग त के फू ल च दर को
िबठाकर सुधा बठै ी उसने िफर वही वेश धारण कर िलया था रे शम क धोती और रे शम का
एक अ तवासक, गीले बाल पीठ पर लहरा रहे थे
“लेिकन म बठै ा-बठै ा या क ँ गा?” उसने पछू ा
सुधा कु छ नह बोली चुपचाप अपना काम करती गयी थोड़ी देर बाद उसने भागवत खोली
और बड़े मधुर वर म गोिपका-गीत पढ़ती रही च दर सं कृ त नह समझता था, पजू ा म
िव ास नह करता था, लेिकन वह ण जाने कै सा लग रहा था! च दर क साँस म धपू क
पावन सौरभ के डोरे गथँु गये थे उसके घुटन पर रह-रहकर स : नाता सुधा के भीगे के श से
गीले मोती चू पड़ते थे कृ शकाय, उदास और पिव सुधा के पजू ा के साद जसै े मधुर वर म

ीम ागवत के ोक उसक आ मा को अमतृ से धो रहे थे लगता था, जसै े इस पजू ा क
ाि वत बेला म उसके जीवन-भर क भलू , कमजो रयाँ, गनु ाह सभी धुलता जा रहा था ...जब

सुधा ने भागवत ब द करके रख िदया तो पता नह य च दर ने णाम कर िलया-भागवत को
या भागवत क पुजा रन को, यह नह मालमू
थोड़ी देर बाद सुधा ने पजू ा क थाली उठायी और उसने च दर के माथे पर रोली लगा दी
“अरे म!”
“हाँ तमु ! और कौन...मेरे तो दसू रा न कोई!” सुधा बोली और ढेर-के -ढेर फू ल च दर के चरण पर
चढ़ाकर, झकु कर च दर के चरण को णाम कर िलया च दर ने घबराकर पाँव ख च िलए,
“म इस यो य नह हँ, सुधा! य लि जत कर रही हो?”
सुधा कु छ नह बोली...अपने आँचल से एक छलकता हआ आँसू प छकर ना ता लाने चली
गयी
जब वह यिू नविसटी से लौटा तो देखा, सुधा मशीन रखे कु छ िसल रही है च दर ने कपड़े
बदलकर पछू ा, “कहो, या िसल रही हो?”
“ माल और बिनयाइन! कै से काम चलता था तु हारा? न स दकू म एक भी माल ह,ै न एक
भी बिनयाइन लापरवाही क भी हद है तभी कहती हँ याह कर लो!”
“हाँ, िकसी दज क लड़क से याह करवा दो!” च दर खाट पर बठै गया और सुधा मशीन पर
बठै ी-बठै ी िसलती रही थोड़ी देर बाद सहसा उसने मशीन रोक दी और एकदम से घबरा कर
उठी

“ या हआ, सुधा...”
“बहत दद हो रहा ह.ै ...” वह उठी और खाट पर बेहोश-सी पड़ रही च दर दौडक़र पंखा उठा

लाया और झलने लगा “डॉ टर बुला लाऊँ ?”
“नह , अभी ठीक हो जाऊँ गी उबकाई आ रही ह!ै ” सुधा उठी
“जाओ मत, म पीकदान उठा लाता हँ ” च दर ने पीकदान उठाकर रख िदया और सुधा क
पीठ सहलाने लगा िफर सुधा हाँफती-सी लेट गयी च दर दौड़कर इलायची और पानी ले
आया सुधा ने इलायची खायी और िफर पड़ रही उसके माथे पर पसीना झलक आया
“अब कै सी तबीयत ह,ै सुधा?”
“बहत दद है अंग-अंग म...मशीन चलाना नुकसान कर गया ” सुधा ने बहत ीण वर म
कहा

“जाऊँ िकसी डॉ टर को बुला लाऊँ ?”
“बेकार ह,ै च दर! म तो लखनऊ म िदखा आयी इस रोग का या इलाज है यह तो िजंदगी-

भर का अिभशाप ह!ै ”

“ या बीमारी बतायी तु ह?”
“कु छ नह ”
“बताओ न?”

“ या बताऊँ , च दर!” सुधा ने बड़ी कातर िनगाह से च दर क ओर देखा और फू ट-फू टकर रो
पड़ी बुरी तरह िससकने लगी सुधा चुपचाप पड़ी कराहती रही च दर ने अटचै ी म से दवा
िनकालकर दी कॉलेज नह गया दो घंटे बाद सुधा कु छ ठीक हई उसने एक गहरी साँस
ली और तिकये के सहारे उठकर बठै गयी च दर ने और कई तिकये पीछे रख िदये दो ही घंटे

म सुधा का चहेरा पीला पड़ा गया च दर चुपचाप उदास बठै ा रहा
उस िदन सुधा ने खाना नह खाया िसफ फल िलये दोपहर को दो बजे भयंकर लू म कै लाश
वापस आया और आते ही च दर से पछू ा, “सुधा क तबीयत तो ठीक रही?” यह जानकर िक
सुबह खराब हो गयी थी, वह कपड़े उतारने के पहले सुधा के कमरे म गया और अपने हाथ से
दवा देकर िफर कपड़े बदलकर सुधा के कमरे म जाकर सो गया बहत थका मालमू पड़ता था
च दर आकर अपने कमरे म कॉिपयाँ जाँचता रहा शाम को कािमनी, भा तथा कई लड़िकयाँ,
िज ह गेसू ने खबर दे दी थी, आय और सुधा और कै लाश को घेरे रह च दर उनक खाितर-
तव जो म लगा रहा रात को कै लाश ने उसे अपनी छत पर बुला िलया और च दर के भिव य
के काय म के बारे म बात करता रहा जब कै लाश को न द आने लगी, तब वह उठकर लॉन

पर लौट आया और लेट गया

बहत देर तक उसे न द नह आयी वह सुधा क तकलीफ के बारे म सोचता रहा उधर सुधा
बहत देर तक करवट बदलती रही यह दो िदन सपन क तरह बीत गये और कल वह िफर

चली जाएगी च दर से दरू , न जाने कब तक के िलए!
सुबह से ही सुधा जसै े बुझ गयी थी कल तक जो उसम उ लास वापस आ गया था, वह जसै े
कै लाश क छाँह ने ही स िलया था च दर के कॉलेज का आिखरी िदन था च दर कै लाश
को ले गया और अपने िम से, ोफे सर से उसका प रचय करा लाया एक ोफे सर, िजनक

आदत थी िक वे कां ेस सरकार से स बि धत हर यि को दावत ज र देते थे, उ ह ने कै लाश

को भी दावत दी य िक वह सां कृ ितक िमशन म जा रहा था
वापस जाने के िलए रात क गाड़ी तय रही ह ते-भर बाद ही कै लाश को जाना था अत: वह

यादा नह क सकता था दोपहर का खाना दोन ने साथ खाया सुधा महरािजन का
िलहाज करती थी, अत: वह कै लाश के साथ खाने नह बठै ी िन य हआ िक अभी से सामान

बाँध िलया जाए तािक पाट के बाद सीधे टेशन जा सक
जब सुधा ने च दर के लाये हए कपड़े कै लाश को िदखाये तो उसे बड़ा ता जुब हआ लेिकन
उसने कु छ नह कहा, कपड़े रख िलये और च दर से जाकर बोला, “अब जब तमु ने लेने-देने का
यवहार ही िनभाया है तो यह बता दो, तमु बड़े हो या छोटे?”
“ य ?” च दर ने पछू ा
“इसिलए िक बड़े हो तो परै छू कर जाऊँ , और छोटे हो तो पया देकर जाऊँ !” कै लाश बोला
च दर हँस पड़ा
घर म दोपहर से ही उदासी छा गयी न च दर दोपहर को सोया, न कै लाश और न सुधा शाम
क पाट म सब लोग गये वहाँ से लौटकर आये तो सुधा को लगा िक उसका मन अभी डू ब
जाएगा उसे शादी म भी जाना इतना नह अखरा था िजतना आज अखर रहा था मोटर पर

सामान रखा जा रहा था तो वह ख भे से िटककर खड़ी रो रही थी महरािजन एक टोकरी म

खाने का सामान बाँध रही थी
कै लाश ने देखा तो बोला, “रो य रही हो? छोड़ जाएँ तु ह यह ? च दर से सँभलेगा!” सुधा ने
आँसू प छकर आँख से डाँटा-”महरािजन सुन रही ह िक नह ” मोटर तक पहँचते-पहँचते सुधा
फू ट-फू टकर रो पड़ी और महरािजन उसे गले से लगाकर आँसू प छने लग िफर बोल , “रोवौ न
िबिटया! अब छोटे बाबू का िबयाह कर देव तो दुई-तीन महीना आयके रह जाव तोहार सास
छोिड़ ह िक न?”
सुधा ने कु छ जवाब नह िदया और पाँच पये का नोट महरािजन के हाथ म थमाकर आ बठै ी
ेन लेटफाम पर आ गयी थी सेकड लास म च दर ने इन लोग का िब तर लगवा िदया

सीट रजव करवा दी गाड़ी छू टने म अभी घंटा-भर देर थी सुधा क आँख म िविच -सा भाव
था कल तक क ढ़ता, तेज, उ लास बुझ गया था और अजब-सी कातरता आ गयी थी वह
चुप बठै ी थी च दर से जब नह देखा गया तो वह उठकर लेटफाम पर टहलने लगा कै लाश
भी उतर गया दोन बात करने लगे सहसा कै लाश ने च दर के क धे पर हाथ रखकर कहा,

“हाँ यार, एक बात बहत ज री थी ”

“ या?”

“इ ह ने तमु से िबनती के बारे म कु छ कहा?”
“कहा था!”

“तो या सोचा तमु ने?”
“म शादी-वादी नह क ँ गा ”
“यह सब आदशवाद मझु े अ छा नह लगा, और िफर उससे शादी करके सच पछू ो तो बहत बड़ी
बात करोगे तमु ! उस घटना के बाद अब ा ïण म तो वर उसे िमलने से रहा और ये कह रही
थ िक वह तु ह मानती भी बहत है ”
“हाँ, लेिकन इसके मतलब यह नह िक म शादी कर लँू मझु े बहत कु छ करना है ”

“अरे जाओ यार, तमु िसवा बात के कु छ नह कर सकते ”
“हो सकता है ” च दर ने बात टाल दी वह शादी तो नह ही करे गा
थोड़ी देर बाद च दर ने पछू ा, “इ ह िद ली कब भेजोगे?”
“अभी तो िजस िदन म जाऊँ गा, उस िदन ये िद ली मेरे साथ जाएँगी, लेिकन दसू रे िदन
शाहजहाँपुर लौट जाएँगी ”
“ य ?”
“अभी माँ बहत िबगड़ी हई ह वह इ ह आने थोड़े ही देती थ वह तो लखनऊ के बहाने म
इ ह ले आया तमु शंकर भइया से कभी िज मत करना-अब िद ली तो इसिलए चली जाएँ िक
म दो-तीन महीने बाद लौटूँगा...िफर शायद िसत बर, अ टू बर म ये तीन-चार महीने के िलए
िद ली जाएँगी यू नो शी इज कै रीइङ् !”
“हाँ, अ छा!”
“हाँ, यही तो बात ह,ै पहला मौका है ”
दोन लौटकर क पाटमट म बठै गये
सुधा बोली, “तो िसत बर म आओगे न, च दर?”
“हाँ-हाँ!”
“ज र से? िफर व कोई बहाना न बना देगा ”

“ज र आऊँ गा!”
कै लाश उतरकर कु छ लेने गया तो सुधा ने अपनी आँख से आँसू प छकर झकु कर च दर के पाँव
छू िलये और रोकर बोली, “च दर, अब बहत टू ट चुक हँ...अब हाथ न ख च लेना...” उसका
गला ँ ध गया
च दर ने सुधा के हाथ को अपने हाथ म ले िलया और कु छ भी नह बोला सुधा थोड़ी देर चुप
रही, िफर बोली-
“च दर, चुप य हो? अब तो नफरत नह करोगे? म बहत अभागी हँ, देवता! तमु ने या बनाया
था और अब या हो गयी!...देखो, अब िच ी िलखते रहना नह तो सहारा टू ट जाता ह.ै ..” और
िफर वह रो पड़ी
कै लाश कु छ िकताब और पि काएँ खरीदकर वापस आ गया दोन बठै कर बात करते रहे यह
िन य हआ िक जब कै लाश लौटेगा तो बजाय ब बई से सीधे िद ली जाने के , वह याग से होता

हआ जाएगा
गाड़ी चली तो च दर ने कै लाश को बहत यार से गले लगा िलया जब तक गाड़ी लेटफॉम के
अ दर रही, सुधा िसर िनकाले झाँकती रही लेटफाम के बाहर भी पीली चाँदनी म सुधा का
फहराता हआ आँचल िदखता रहा धीरे -धीरे वह एक सफे द िब दु बनकर अ य हो गया
गाड़ी एक िवशाल अजगर क तरह चाँदनी म रगती चली जा रही थी

46

जब मन म यार जाग जाता है तो यार क िकरन बादल म िछप जाती है अजब थी च दर क
िक मत! इस बार तो, सुधा गयी थी तो उसके तन-मन को एक गलु ाबी नशे म सराबोर कर गयी
थी च दर उदास नह था वह बेहद खुश था खबू घमू ता था और गरमी के बावजदू खबू
काम करता था अपने पुराने नोट् स िनकाल िलये थे और एक नयी िकताब क परे खा सोच
रहा था उसे लगता था िक उसका पौ ष, उसक शि , उसका ओज, उसक ढ़ता, सभी कु छ
लौट आया है उसे हरदम लगता िक गलु ाबी पाँखु रय क एक छाया उसक आ मा को चमू ती
रहती है वह जब कभी लेटता तो उसेलगता िक सुधा फू ल के धनुष क तरह उसके पलँग के
आर-पार पाटी पर हाथ टेके बठै ी है उसे लगता-कमरे म अब भी धपू क सौरभ लहरा रही है और
हवाओं म सुधा के मधुर कं ठ के ोक गजँू रहे ह
दो ही िदन म च दर को लग रहा था िक उसक िजंदगी म जहाँ जो कु छ टू ट-फू ट गया ह,ै वह सब
सँभल रहा है वह सब अभाव धीरे -धीरे भर रहा है उसके मन का पजू ा-गहृ खँडहर हो चुका
था, सहसा उस पर जसै े िकसी ने आँसू िछड़ककर जीवन के वरदान से अिभिष कर िदया था
प थर के बीच दबकर िपसे हए पजू ा-गीत िफर से स वर हो उठे थे मरु झाये हए पजू ा-फू ल क
पाँखु रय म िफर रस छलक आया था और रं ग चमक उठे थे धीरे -धीरे मि दर का कँ गरू ा िफर
िसतार से समझौता करने क तयै ारी करने लगा था च दर क नस म वेद-म क पिव ता
और ज क वंशी क मधुराई पलक म पलक डालकर नाच उठी थी सारा काम जसै े वह िकसी
अ य आ मा क आ मा क आ ा से करता था वह आ मा िसवा सुधा के और भला िकसक
थी! वह सुधामय हो रहा था उसके कदम-कदम म, बात-बात म, साँस-साँस म सुधा का यार
िफर से लौट आया था
तीसरे िदन िबनती का एक प आया िबनती ने उसे िद ली बुलाया था और मामाजी (डॉ टर
शु ला) भी चाहते थे िक च दर कु छ िदन के िलए िद ली चला आये तो अ छा है च दर के िलए
कु छ कोिशश भी कर रहे थे उसने िलख िदया िक वह मई के अ त म या जनू के ार भ म
आएगा और िबनती को बहत, बहत-सा नेह उसने सुधा के आने क बात नह िलखी

य िक कै लाश ने मना कर िदया था
सुबह च दर गगं ा नहाता, नयी पु तक पढ़ता, अपने नोट् स दोहराता दोपहर को सोता और
रे िडयो बजाता, शाम को घमू ता और िसनेमा देखता, सोते व किवताएँ पढ़ता और सुधा के यार
के बादल म महँु िछपाकर सो जाता िजस िदन कै लाश जाने वाला था, उसी िदन उसका एक
प आया िक वह और सुधा िद ली आ गये ह शंकर भइया और नीलू उसे पहँचाने ब बई
जाएँगे च दर सुधा के इलाहाबाद जाने का िज िकसी को भी न िलखे यह उसके और
च दर के बीच क बात थी खत के नीचे सुधा क कु छ लाइन थ

“च दर,
राम-राम तमु ने मझु े जो साड़ी दी थी वह या अपनी भावी ीमती के नाप क थी? वह मेरे
घुटन तक आती है बढ़ू ी होकर िघस जाऊँ गी तो उसे पहना क ँ गी-अ छा नेह और जो
तमु से कह आयी हँ उन बात का यान रहेगा न? मेरी त दु ती ठीक है इधर मने गाँधीजी
क आ मकथा पढ़नी शु क है
तु हारी-सुधा
“...और हाँ, लालाजी! िमठाई िखलाओ, िद ली म बहत खबर है िक शरणाथ िवभाग म याग के
एक ोफे सर आने वाले ह!”
कै लाश तो अब ब बई चल िदया होगा ब बई के पते से उसने बधाई का एक तार भेज िदया और
सुधा को एयर मेल से उसने एक खत भेजा िजसम उसने बहत-सी िमठाइय का िच बना िदया
था
लेिकन वह पसोपेश म पड़ गया िद ली जाए या न जाए वह अपने अ तमन से सरकारी
नौकरी का िवरोधी था उसे त कालीन भारतीय सरकार और ि िटश सरकार म यादा अ तर
नह लगता था िफर हर ि कोण से वह समाजवािदय के अिधक समीप था और अब वह
सुधा से वायदा कर चुका था िक वह काम करे गा ऊँ चा बनेगा िस होगा, लेिकन पद
वीकार कर ऊँ चा बनना उसके च र के िव था िक तु डॉ टर शु ला कोिशश कर कर
रहे थे च दर के ीय सरकार के िकसी ऊँ चे पद पर आए, यह उनका सपना था च दर को
कॉलेज क व छ द और ढीली नौकरी पस द थी अ त म उसने यह सोचा िक पहले नौकरी
वीकार कर लेगा बाद म िफर कॉलेज चला आएगा-एक िदन रात को जब वह िबजली
बुझाकर, िकताब ब द कर सीने पर रखकर िसतार को देख रहा था और सोच रहा था िक अब
सुधा िद ली लौट गयी होगी, अगर िद ली रह गया तो बँगले म िकसे िटकाया जाएगा...इतने म
िकसी यि ने फाटक खोलकर बँगले म वेश िकया उसे ता जुब हआ िक इतनी रात को
कौन आ सकता ह,ै और वह भी साइिकल लेकर! उसने िबजली जला दी तार वाला था
साइिकल खड़ी कर, तार वाला लॉन पर चला गया और तार दे िदया द तखत करके उसने
िलफाफा फाड़ा तार डॉ टर साहब का था िलखा था िक “अगली ेन से फौरन चले आओ
टेशन पर सरकारी कार होगी सलेटी रं ग क ” उसके मन ने फौरन कहा, च दर, हो गये तमु
के म!
उसक आँख से न द गायब हो गयी वह उठा, अगली ेन सुबह तीन बजे जाती थी यारह
बजे थे अभी चार घंटे थे उसने एक अटचै ी म कु छ अ छे-से-अ छे सटू रखे, िकताब रख , और
माली को सहेजकर चल िदया मोटर को टेशन से वापस लाने क िद कत होती, ाइवर अब
था नह , अत: नौकर को अटचै ी देकर पदै ल चल िदया राह म िसनेमा से लौटता हआ र शा

िमल गया
च दर ने सेकड लास का िटकट िलया और ठाठ से चला कानपुर म उसने सादी चाय पी और
इटावा म रे तराँ-बार म जाकर खाना खाया उसके बगल म मारवाड़ी द पित बठै े थे जो सेकड

लास का िकराया खच करके ायि त व प एक आने क पकौड़ी और दो आने क दालमोठ
से उदर-पिू त कर रहे थे हाथरस टेशन पर एक मजेदार घटना घटी हाथरस म छोटी और
बड़ी लाइन ॉस करती ह छोटी लाइन ऊपर पुल पर खड़ी होती है टेशन के पास जब ेन

धीमी हई तो सेठजी सो रहे थे सेठानी ने बाहर झाँककर देखा और िन संकोच उनके पथृ ुल
उदर पर कर- हार करके कहा, “हो! देखो रे लगाड़ी के िसर पर रे लगाड़ी!” सेठ एकदम च ककर
जागे और उछलकर बोले, “बाप रे बाप! उलट गयी रे लगाड़ी ज दी सामान उतार लुट गये
राम! ये तो जंगल है कहते थे जेवर न ले चल ”
च दर िखलिखलाकर हँस पड़ा सेठजी ने प रि थित समझी और चुपचाप बठै गये च दर
करवट बदलकर िफर पढ़ने लगा
इतने म ऊपर क गाड़ी से उतर कर कोई औरत हाथ म एक गठरी िलये आयी और अ दर य ही
घुसी िक मारवाड़ी बोला, “बुड् ढी, यह सेकड लास है ”
“होई! सेके ड-थड तो सब गोिव द क माया ह,ै ब चा!”
च दर का महँु दसू री ओर था, लेिकन उसने सोचा गोिव दजी क माया का वणन और िव े षण
करते हए रे ल के ड ब के वग करण को भी मायाजाल बताना शायद भागवतकार क िद य ि
से स भव होगा लेिकन यह भी मारवाड़ी कोई सुधा तो था नह िक वै णव सािह य और
गोिव दजी क माया का भ होता जब उसने कहा-गाड साहब को बुलाऊँ ? तो बुिढ़या गरज
उठी-”बस-बस, चल हआँ से, गाड का तोर दमाद लगत है जौन बुलाइहै मोटका क !ू ”
च दर हँस पड़ा, कम-से-कम गाली क नवीनता पर दसू री बात; गाड़ी उस समय ज े म
थी, वहाँ यह अवधी का सफल व ा कौन ह!ै उसने घमू कर देखा एक बुिढ़या थी, िसर मड़ु ाये
उसने कह देखा है इसे!

“कहाँ जाओगी, माई?”
“कानपुर जाबै ”
“लेिकन यह गाड़ी तो िद ली जाएगी?”
“तहु ँ बो यो टु प से! हम ऐसे धमकावे म नै आइत ई कानपुर जइह!ै ” उसने हाथ नचाकर
च दर से कहा और िफर जाने य क गयी और च दर क ओर देखने लगी िफर बोली,
“अरे च दर बेटवा, कहाँ से आवत हौ त!ू ”
“ओह! बुआजी ह िसर मड़ु ा िलया तो पहचान म ही नह आत !” च दर ने फौरन उठकर पाँव
छु ए बुआजी वृ दावन से आ रही थ वह बठै गय , बोल , “ऊ निटिनयाँ मर गयी िक अबिहन
ह?ै ”

“कौन?”

“ओही िबनती!”
“मरे गी य ?”
“भइया! सुकु ल तो हमार कु ल डु बोय िदिहन लेिकन जसै े ऊ हमरी िबिटया के मड़वा तरे से
उठाय िलिहन वसै े भगवान चाही तो उनह का लड़क से समझी!”
च दर कु छ नह बोला थोड़ी देर बाद खुद बड़बड़ाती हई बुआजी बोल , “अब हम का करै को
है हम सब मोह-माया याग िदया लेिकन हमरे याग म कु छौ समरथ है तो सुकु ल को
बदला िमिलह!ै ”
कानपुर क गाड़ी आयी तो च दर खुद उ ह िबठाल आया िविच थ बुआजी, बेचारी कभी
समझ ही नह पाय िक िबनती को उठाकर डॉ टर साहब ने उपकार िकया या अपकार और मजा
तो यह है िक एक ही वा य के पवू ा म मायामोह से िवरि क घोषणा और उ रा म दुवासा

का शाप...िह दु तान के िसवा ऐसे नमनू े कह भी िमलने मिु कल ह इतने म च दर क गाड़ी
ने सीटी दी वह भागा बुआजी ने च दर का खयाल छोड़कर अपने बगल के मसु ािफर से
लड़ना शु कर िदया
वह िद ली पहँचा दो-तीन साल पहले भी वह िद ली आया था लेिकन अब िद ली टेशन क
चहल-पहल ही दसू री थी गाड़ी घंटा-भर लेट थी नौ बज चुके थे अगर मोटर न िमली तो
भी इतनी मशहर सड़क पर डॉ टर साहब का बँगला था िक च दर को िवशेष िद कत न होती
लेिकन य ही वह लेटफॉम से बाहर िनकला तो उसने देखा िक जहाँ मरकरी क बड़ी
सचलाइट लगी ह,ै ठीक उसी के नीचे सलेटी रं ग क शानदार कार खड़ी थी िजसके आगे-पीछे

ाउन लगा था और सामने ितरं गा, आगे लाल वद पहने एक खानसामा बठै ा है और पीछे एक
िसख ाइवर खड़ा है च दर का सटू चाहे िजतना अ छा हो लेिकन इस शान के लायक तो
नह ही था िफर भी वह बड़े रोब से गया और ाइवर से बोला, “यह िकसक मोटर ह?ै ”
“सकारी गड् डी है जी ” िसख ने अपनी ितभा का प रचय िदया
“ या यह डॉ टर शु ला ने भेजी ह?ै ”
“जी हाँ, हजरू !” एकदम उसका वर बदल गया-”आप ही उनके लड़के ह-च दर बहादुर साहब?”
उसने उतरकर सलाम िकया दरवाजा खोला, च दर बठै गया कु ली को एक अटचै ी के िलए
एक अठ नी दी मोटर उड़ चली
च दर बहत उदार िवचार का था लेिकन आज तक वह डॉ टर साहब क उ नीसव सदी वाली
पुरानी कार पर ही चढ़ा था इस राजमकु ु ट और रा ीय वज से सुशोिभत मोटर पर खानसामे
के साथ चढऩे का उसका पहला ही मौका था उसे लगा जसै े इस समय ितरं गे का गौरव और
महान ि िटश सा ा य के इस ाउन का शासनद भ उसके मन को उड़ाये िलये जा रहा है
च दर तनकर बठै ा लेिकन थोड़ी देर बाद वयं उसे अपने मन पर हँसी आ गयी िफर वह
सोचने लगा िक िजन लोग के हाथ म आज शासन-स ा ह;ै मोटर और खानसाम ने उनके
दय को इस तरह बदल िदया है वे भी तो बेचारे आदमी ह, इतने िदन से भुता के यासे
बेकार हम लोग उ ह गाली देते ह िफर च दर उन लोग का खयाल करके हँस पड़ा
िद ली म इलाहाबाद क अपे ा कम गरमी थी कार एक बँगले के अ दर मड़ु ी और पोिटको म

क गयी बँगला नये सादे अमे रकन ढंग का बना हआ था खानसामे ने उतरकर दरवाजा
खोला च दर उतर पड़ा ाइवर ने हॉन िदया दरवाजा खुला और िबनती िनकली उसका
महँु सखू ा हआ था, बाल अ त- य त थे और आँख जसै े रो-रोकर सजू गयी थ च दर का िदल
धक् -से हो गया, राह-भर के सुनहरे सपने टू ट गये
“ या बात ह,ै िबनती? अ छी तो हो?” च दर ने पछू ा
“आओ, च दर?” िबनती ने कहा और अ दर जाते ही दरवाजा ब द कर िदया और च दर क बाँह
पकडक़र िससक-िससककर रो पड़ी च दर घबरा गया “ या बात ह?ै बताओ न! डॉ टर

साहब कहाँ ह?”

“अ दर ह ”
“तब या हआ? तमु इतनी दु:खी य हो?” च दर ने िबनती के िसर पर हाथ रखकर पछू ा...उसे
लगा जसै े इस सम त वातावरण पर िकसी बड़े भयानक मृ यु-दतू के पंख क काली छाया
ह.ै ..” या बात ह?ै बताती य नह ?”

िबनती बड़ी मिु कल से बोली, “दीदी...सुधा दीदी...”
च दर को लगा जसै े उस पर िबजली टू ट पड़ी-” या हआ सुधा को?” िबनती कु छ नह बोली, उसे
ऊपर ले गयी और कमरे के पास जाकर बोली, “उसी म ह दीदी!”

47

कमरे के अ दर क रोशनी उदास, फ क और बीमार थी एक नस सफे द पोशाक पहने पलँग
के िसरहाने खड़ी थी, और कु स पर िसर झकु ाये डॉ टर साहब बठै े थे पलँग पर चादर ओढ़े
सुधा पड़ी थी नस सामने थी, अत: सुधा का चेहरा नह िदखाई पड़ रहा था च दर के भीतर
पाँव रखते ही नस ने आँख के इशारे से कहा, “बाहर जाइए ” च दर िठठककर खड़ा हो गया,
डॉ टर साहब ने देखा और वे भी उठकर चले आये
“ या हआ सुधा को?” च दर ने बहत याकु ल, बहत कातर वर म पछू ा डॉ टर साहब कु छ
नह बोले चुपचाप च दर के क धे पर हाथ रखे हए अपने कमरे म आये और बहत भारी वर म
बोले, “हमारी िबिटया गयी, च दर!” और आँसू छलक आये
“ या हआ उसे?” च दर ने िफर उतने ही दु:खी वर म पछू ा
डॉ टर साहब ण-भर पथराई आँख से च दर क ओर देखते रहे, िफर िसर झकु ाकर बोले,
“एबॉशन!” थोड़ी देर बाद िसर उठाकर याकु ल क तरह च दन का क धा पकडक़र बोले,
“च दर, िकसी तरह बचाओ सुधा को, या कर कु छ समझ म नह आता...अब बचेगी
नह ...परस से होश नह आया जाओ कपड़े बदलो, खाना खा लो, रात-भर जागरण होगा...”
लेिकन च दर उठा नह , कु स पर िसर झकु ाये बठै ा रहा
सहसा नस आकर बोली, “ लीिडंग िफर शु हो गयी और नाड़ी डू ब रही है डॉ टर को
बुलाइए...फौरन!” और वह लौट गयी
डॉ टर साहब उठ खड़े हए उनक आँख म बड़ी िनराशा थी बड़ी उदासी से बोले, “जा रहा
हँ, च दर! अभी आता हँ!” च दर ने देखा, कार बड़ी तेजी से जा रही है िबनती आकर बोली,
“खाना खा लो, च दर!” च दर ने सुना ही नह
“यह या हआ, िबनती!” उसने घबराई आवाज म पछू ा
“कु छ समझ म नह आता, उस िदन सुबह जीजाजी गये दोपहर म पापा ऑिफस गये थे म सो
रही थी, सहसा जीजी चीखी म जागी तो देखा दीदी बेहोश पड़ी ह मने ज दी से फोन
िकया पापा आये, डॉ टर आये उसके बाद से पापा और नस के अलावा िकसी को नह जाने
देते दीदी के पास मझु े भी नह ”
और िबनती रो पड़ी च दर कु छ नह बोला चुपचाप प थर क मिू त-सा कु स पर बठै ा रहा
िखडक़ से बाहर क ओर देख रहा था
थोड़ी देर म डॉ टर साहब वापस आये उनके साथ तीन डॉ टर थे और एक नस डॉ टर ने
करीब दस िमनट देखा, िफर अलग कमरे म जाकर सलाह करने लगे जब लौटे तो डॉ टर
साहब ने बहत िव ïल होकर कहा, “ या उ मीद ह?ै ”
“घबराइए मत, घबराइए मत-अब तो जब तक अ द नी सब साफ नह हो जाएगा तब तक खनू

जाएगा न ज के िलए और होश के िलए एक इजं े शन देते ह-अभी ”
इजं े शन देने के बाद डॉ टर चले गये पापा वह जाकर बठै गये िबनती और च दर चुपचाप
बठै े रहे करीब पाँच िमनट के बाद सुधा ने भयंकर वर म कराहना शु िकया उन कराह म
जसै े उनका कलेजा उलटा आता हो डॉ टर साहब उठकर यहाँ चले आये और च दर से बोले,
“वेहीमट लीिडंग...” और कु स पर िसर झकु ाकर बठै गये बगल के कमरे से सुधा क
ददनाक कराह उठती थ और स नाटे म छटपटाने लगती थ अगर आपने िकसी िज दा मगु
के पंख और पँछू नोचे जाते हए देखा हो तभी आप उसका अनुमान कर सकते ह; उस भयानकता
का, जो उन कराह म थी थोड़ी देर बाद कराह ब द हो गय , िफर सहसा इस बुरी तरह से सुधा
चीखी जसै े गाय डकार रही हो पापा उठकर भागे-वह भयंकर चीख उठी और स नाटे म
मडँ राने लगी-िबनती रो रही थी-च दर का चेहरा पीला पड़ गया था और पसीने से तर हो गया

था वह
पापा लौटकर आये, “हम लोग देख सकते ह?” च दर ने पछू ा
“अभी नह -अब लीिडंग ख म है ...नस अभी कपड़े बदल दे तो चलगे ”

48

थोड़ी देर म तीन गये और जाकर खड़े हो गये अब च दर ने सुधा को देखा उसका चेहरा
सफे द पड़ गया था जसै े जाड़े के िदन म थोड़ी देर पानी म रहने के बाद उँगिलय का रं ग
र हीन ेत हो जाता है गाल क हड् िडïयाँ िनकल आयी थ और होठ काले पड़ गये थे
पलक के चार ओर कालापन गहरा गया था और आँख जसै े बाहर िनकली पड़ती थ खनू
इतना अिधक गया था िक लगता था बदन पर चमड़े क एक ह क िझ ली मढ़ दी गयी हो
यहाँ तक िक भीतर क हड् डी के उतार-चढ़ाव तक प िदख रहे थे च दर ने डरते-डरते माथे
पर हाथ रखा सुधा के होठ म कु छ हरकत हई, उसने महँु खोल िदया और आँख ब द िकये हए
ही उसने करवट बदली, िफर कराही और िसर से परै तक उसका बदन काँप उठा नस ने नाड़ी
देखी और कहा, अब ठीक है कमजोरी बहत है थोड़ी देर बाद पसीना िनकलना शु हआ
पसीना प छते-प छते एक बज गया िबनती बोली डॉ टर साहब से-”मामाजी, अब आप सो
जाइए च दर देख लगे आज नस है ही ”
डॉ टर साहब क आँख लाल हो रही थ सबके कहने पर वह अपनी सीट पर लेट रहे नस
बोली, “म बाहर आराम कु स पर थोड़ा बठै लँू कोई ज रत हो तो बुला लेना ” च दर जाकर
सुधा के िसरहाने बठै गया िबनती बोली, “तमु थके हए आये हो चलो तमु भी सो रहो म
देख रही हँ!”
च दर ने कु छ जवाब नह िदया चुपचाप बठै ा रहा िबनती ने सभी िखड़िकयाँ खोल द और
च दर के पास ही बठै गयी सुधा सो रही थी चुपचाप थोड़ी देर बाद िबनती उठी, घड़ी देखी,
महँु खोलकर दवा दी सहसा डॉ टर साहब घबराये हए-से आये-” या बात ह,ै सुधा य
चीखी!”
“कु छ नह , सुधा तो सो रही है चुपचाप!” िबनती बोली
“अ छा, मझु े न द म लगा िक वह चीखी है ” िफर वह खड़े-खड़े सुधा का माथा सहलाते रहे
और िफर लौट गये नस अ दर थी िबनती च दर को बाहर ले आयी और बोली, “देखो, तमु
कल जीजाजी को एक तार दे देना!”
“लेिकन अब वह ह गे कहाँ?”
“िवजगाप म या कोल बो म जहाजी क पनी के पते से िदलवा देना तार ”
दोन िफर जाकर सुधा के पास बठै गये नस बाहर सो रही थी साढ़े तीन बज गये थे ठंडी
हवा चल रही थी िबनती च दर के क धे पर िसर रखकर सो गयी सहसा सुधा के होठ िहले
और उसने कु छ अ फु ट वर म कहा च दर ने सुधा के माथे पर हाथ रखा माथा सहसा
जलने लगा था; च दर घबरा उठा उसने नस को जगाया नस ने बगल म थमामीटर
लगाया ताप म एक सौ पाँच था सारा बदन जल रहा था और रह-रहकर वह काँप उठती

थी च दर ने िफर घबराकर नस क ओर देखा “घबराइए मत! डॉ टर अभी आएगा ”
लेिकन थोड़ी देर म हालत और िबगड़ गयी और िफर उसी तरह ददनाक कराह सुबह क हवा
म िसर पटकने लग नस ने इन लोग को बाहर भेज िदया और बदन अँगोछने लगी

थोड़ी देर म सुधा ने चीखकर पुकारा-”पापा...” इतनी भयानक आवाज थी िक जसै े सुधा को
नरक के दतू पकड़े ले जा रहे ह पापा गये सुधा का चेहरा लाल था और वह हाथ पटक रही
थी ...पापा को देखते ही बोली, “पापा...च दर को इलाहाबाद से बुलवा दो ”
“च दर आ गया बेटा, अभी बुलाते ह ” य ही पापा ने माथे पर हाथ रखा िक सुधा चीख
उठी-”तमु पापा नह हो...कौन हो तमु ?...दरू हटो, छु ओ मत...अरे िबनती...”
डॉ टर शु ला ने नस क ओर देखा नस बोली-
सुधा ने िफर करवट बदली और नस को देखकर बोली, “कौन गेस.ू ..आओ बठै ो च दर नहा
रहा है अभी बुलाती हँ अरे च दर...” और िफर हाँफने लगी, आँख ब द कर ल और रोकर
बोली, “पापा, तमु कहाँ चले गये?”
नस ने च दर और िबनती को बुलाया िबनती पास जाकर खड़ी हो गयी-आँसू प छकर बोली,
“दीदी, हम आ गये ” और सुधा क बाँह पर हाथ रख िदया सुधा ने आँख नह खोल , िबनती
के हाथ पर हाथ रखकर बोली, “िबनती, पापा कहाँ गये ह?”

“खड़े तो ह मामाजी!”

“झठू मत बोल क ब त...अ छा ले, शरबत तयै ार ह,ै जा च दर टडी म म पढ़ रहा है बुला ला,
जा!”

िबनती फफककर रो पड़ी

“रोती य ह?ै ” सुधा ने कराहकर कहा, “म जाऊँ गी तो च दर को तेरे पास छोड़ जाऊँ गी जा
च दर को बुला ला, नह बफ घुल जाएगी-शरबत छान िलया ह?ै ”
च दर आगे आया ँ धे गले से आँसू पीते हए बोला, “सुधा, आँख खोलो हम आ गये, सुधी!”
डॉ टर साहब कु स पर पड़े िससक रहे थे...सुधा ने आँख खोल और च दर को देखते ही िफर
बहत जोर से चीखी...”तमु ...तमु ऑ ेिलया से लौट आये? झठू े! तमु च दर हो? या म तु ह
पहचानती नह ? अब या चािहए? इतना कहा, तमु से हाथ जोड़ा, मेरी या हालत ह?ै लेिकन
तु ह या? जाओ यहाँ से वना म अभी िसर पटक दँगू ी...” और सुधा ने िसर पटक िदया-”नह
गये?” नस ने इशारा िकया-च दर कमरे के बाहर आया और कु स पर िसर झकु ाकर बठै गया
सुधा ने आँख खोल और फटी-फटी आँख से चार ओर देखने लगी िफर नस से बोली-
“गेस,ू तमु बहत बहादुर हो! तमु ने अपने को बेचा नह ; अपने परै पर खड़ी हो िकसी के आ य
म नह हो कोई खाना-कपड़ा देकर तु ह खरीद नह सकता, गेसू िबनती कहाँ गयी...?”
“म खड़ी हँ, दीदी?”

“ह...अ छा, पापा कहाँ ह?” सुधा ने कराहकर पछू ा
डॉ टर साहब उठकर आ गये-”बेटा!” बड़े दुलार से सुधा के माथे पर हाथ रखकर बोले सुधा रो
पड़ी-”कहाँ थे पापा, अभी तक तमु ? हमने इतना पुकारा, न तमु बोले न च दर बोला...हम तो डर
लग रहा था, इतना सनू ा था...जाओ महरािजन ने रोटी सक ली ह-ै खा लो हाँ, ऐसे बठै
जाओ लो पापा, हमने नानखटाई बनायी...”

डॉ टर शु ला रोते हए चले गये-िबनती ने च दर को बुलाया देखा च दर कु स पर हथेली म

महँु िछपाये बठै ा था िबनती गयी और च दर के क धे पर हाथ रखा च दर ने देखा और िसर
झकु ा िलया, “चलो च दर, दीदी िफर बेहोश हो गय ”
इतने म नस बोली “वह िफर होश म आयी ह; आप लोग वह चिलए ”

सुधा ने आँख खोल दी थ -च दर को देखते ही बोली, “च दर आओ, कोई मा टर ठीक िकया
तमु ने? जो कु छ पढ़ा था वह भलू रही हँ अब इ तहान म पास नह होऊँ गी ”
“डेली रयम अब भी है ” नस बोली सहसा सुधा ने च दर का हाथ छोड़ िदया और झट से
हथेिलयाँ आँख पर रख ल और बोली, “ये कौन आ गया? यह च दर नह है च दर नह है
च दर होता तो मझु े डाँटता- य बीमार पड़ ? अब बताओ म च दर को या जवाब दँगू ी...च दर
को बुला दो, गेस!ू िजंदगी म दु मनी िनभायी, अब मौत म तो न िनभाए ”
“उफ! मरीज के पास इतने आदमी? तभी डेली रयम होता है ” सहसा डॉ टर ने वेश िकया

कोई दसू रा डॉ टर था, अँ ेज था िबनती और च दर बाहर चले आये िबनती बोली, “ये
िसिवल सजन ह ” उसने खनू मगँ वाया, देखा, िफर डॉ टर शु ला को भी हटा िदया िसफ
नस रह गयी थोड़ी देर बाद वह िनकला तो उसका चेहरा याह था “ या यह ै ने सी

पहली मतबा थी?”

“जी हाँ?”
डॉ टर ने िसर िहलाया और कहा, “अब मामला हाथ से बाहर है इजं े शन लगगे अ पताल

ले चिलए ”

“डॉ टर शु ला, मवाद आ रहा ह,ै कल तक सारे बदन म फै ल जाएगा, िकस बेवकू फ डॉ टर ने
देखा था...”

च दर ने फोन िकया ऐ बुले स कार आ गयी सुधा को उठाया गया...
िदन बड़ी ही िच ता म बीता तीन-तीन घंटे पर इजं े शन लग रहे थे दोपहर को दो बजे

इजं े शन ख म कर डॉ टर ने एक गहरी साँस ली और बोला, “कु छ उ मीद ह-ै अगर बारह घंटे
तक हाट ठीक रहा तो म आपक लड़क आपको वापस दँगू ा ”

49

बड़ा भयानक िदन था बहत ऊँ ची छत का कमरा, दालान म टाट के परदे पड़े थे और बाहर
गम क भयानक लू ह-ह करती हई दानव क तरह महँु फाड़े दौड़ रही थी डॉ टर साहब
िसरहाने बठै े थे, पथरीली िनगाह से सुधा के पीले मतृ ाय चेहरे क ओर देखते हए...िबनती और
च दर िबना कु छ खाये-पीये चुपचाप बठै े थे-रह-रहकर िबनती िससक उठती थी, लेिकन च दर
ने मन पर प थर रख िलया था वह एकटक एक ओर देख रहा था...कमरे म वातावरण शा त
था-रह-रहकर िबनती क िससिकयाँ, पापा क िन: ास तथा घड़ी क िनर तर िटक-िटक
सुनाई पड़ रही थी
च दर का हाथ िबनती क गोद म था एक मकू संवेदना ने िबनती को सँभाल रखा था
च दर कभी िबनती क ओर देखता, कभी घड़ी क ओर सुधा क ओर नह देख पाता था
दुख अपनी परू ी चोट करने के व अकसर आदमी क आ मा और मन को लोरोफाम सँुघा देता
है च दर कु छ भी सोच नह पा रहा था सं ा-हत, नीरव, िन े ...
घड़ी क सुई अिवराम गित से चल रही थी सजन कई दफे आये नस ने आकर टे परे चर
िलया रात को यारह बजे टे परे चर उतरने लगा डॉ टर शु ला क आँख चमक उठ ठीक
बाहर बजकर पाँच िमनट पर सुधा ने आँख खोल द च दर ने िबनती का हाथ मारे खुशी से
दबा िदया
“िबनती कहाँ ह?ै ” बड़े ीण वर म पछू ा
सुधा ने आँख घुमाकर देखा पापा को देखते ही मु करा पड़ी
िबनती और च दर उठकर आ गये
“आहा, च दर तमु आ गये? हमारे िलए या लाये?”
“पगली कह क !” मारे खुशी के च दर का गला भर गया
“लेिकन तमु इतनी देर म य आये, च दर!”
“कल रात को ही आ गये थे हम ”
“चलो-चलो, झठू बोलना तो तु हारा धम बन गया कल रात को आ गये होते तो अभी तक हम
अ छे भी हो गये होते ” और वह हाँफने लगी
सजन आया, “बात मत करो...” उसने कहा
उसने एक िम सचर िदया िफर आला लगाकर देखा, और डॉ टर शु ला को अलग ले जाकर
कहा, “अभी दो घंटे और खतरा है लेिकन परे शान मत होइए अब स र ितशत आशा है
मरीज जो कहे, उसम बाधा मत दीिजएगा उसे जरा भी परे शानी न हो ”
सुधा ने च दर को बुलाया, “च दर, पापा से मत कहना अब म बचँगू ी नह अब कह मत
जाना, यह बठै ो ”

“िछः पगली! डॉ टर कह रहा है अब खतरा नह है ” च दर ने बहत यार से कहा, “अभी तो

तमु हमारे िलए िज दा रहोगी न!”
“कोिशश तो कर रही हँ च दर, मौत से लड़ रही हँ! च दर, उ ह तार दे दो! पता नह देख

पाऊँ गी या नह ”
“दे िदया, सुधा!” च दर ने कहा और िसर झकु ाकर सोचने लगा
“ या सोच रहे हो, च दर! उ ह इसीिलए देखना चाहती हँ िक मरने के पहले उ ह मा कर दँ,ू
उनसे मा माँग लँ!ू ...च दर, तमु तकलीफ का अ दाजा नह कर सकते ”
डॉ टर शु ला आये सुधा ने कहा, “पापा, आज तु हारी गोद म लेट ल ” उ ह ने सुधा का
िसर गोद म रख िलया “पापा, च दर को समझा दो, ये अब अपना याह तो कर ले ...हाँ

पापा, हमारी भागवत मगँ वा दो...”
“शाम को मगँ वा दगे बेटी, अब एक बज रहा ह.ै ..”
“देखा...” सुधा ने कहा, “िबनती, यहाँ आओ!”
िबनती आयी सुधा ने उसका माथा चमू कर कहा, “रानी, जो कु छ तझु े आज तक समझाया वसै ा
ही करना, अ छा! पापा तेरे िज मे ह ”

िबनती रोकर बोली, “दीदी, ऐसी बात य करती हो...”

सुधा कु छ न बोली, गोद से हटाकर िसर तिकये पर रख िलया
“जाओ पापा, अब सो रहो तमु ”
“सो लँगू ा, बेटी...”
“जाओ नह िफर हम अ छे नह ह गे! जाओ...”

सजन का आदेश था िक मरीज के मन के िव कु छ नह होना चािहए-डॉ टर शु ला चुपचाप
उठे और बाहर िबछे पलँग पर लेट रहे
सुधा ने च दर को बुलाया, बोली, “म झकु नह सकती-िबनती यहाँ आ-हाँ, च दर के परै छू ...अरे
अपने माथे म नह पगली मेरे माथे से लगा दे मझु से झकु ा नह जाता ” िबनती ने रोते हए
सुधा के माथे म चरण-धलू लगा दी, “रोती य ह,ै पगली! म मर जाऊँ तो च दर तो है ही अब
च दर तझु े कभी नह लाएँगे...चाहे पछू लो! इधर आओ, च दर! बठै जाओ, अपना हाथ मेरे
होठ पर रख दो...ऐसे...अगर म मर जाऊँ तो रोना मत, च दर! तमु ऊँ चे बनोगे तो मझु े बहत चनै
िमलेगा म जो कु छ नह पा सक , वह शायद तु हारे ही मा यम से िमलेगा मझु े और देखो,
पापा को अके ले िद ली म न छोडऩा...लेिकन म म ँ गी नह , च दर...यह नरक भोगकर भी
तु ह यार क ँ गी...म मरना नह चाहती, जाने िफर कभी तमु िमलो या न िमलो, च दर...उफ
िकतनी तकलीफ ह,ै च दर! हम लोग ने कभी ऐसा नह सोचा था...अरे हटो-हटो...च दर!”

सहसा सुधा क आँख म िफर अँधेरा छा गया-”भागो, च दर! तु हारे पीछे कौन खड़ा ह?ै ” च दर
घबराकर उठ गया-पीछे कोई नह था... “अरे च दर, तु ह पकड़ रहा है च दर, तमु मेरे पास
आओ ” सुधा ने च दर का हाथ पकड़ िलया-िबनती भागकर डॉ टर साहब को बुलाने गयी
नस भी भागकर आयी सुधा चीख रही थी-”तमु हो कौन? च दर को नह ले जा सकते म
चल तो रही हँ च दर, म जाती हँ इसके साथ, घबराना मत म अभी आती हँ तमु तब तक
चाय पी लो-नह , म तु ह उस नरक म नह जाने दँगू ी, म जा तो रही हँ-िबनती, मेरी च पल ले
आ...अरे पापा कहाँ ह...पापा...”

और सुधा का िसर च दर क बाँह पर लुढ़क गया-िबनती को नस ने सँभाला और डॉ टर शु ला
पागल क तरह सजन के बँगले क ओर दौड़े...घड़ी ने टन-टन दो बजाये...
जब ए बुले स कार पर सुधा का शव बँगले पहँचा तो शंकर बाबू आ गये थे-बह को िवदा कराने...

उपसहं ार

50

िजंदगी का य णा-च एक वृ परू ा कर चुका था िसतारे एक ि ितज से उठकर, आसमान
पार कर दसू रे ि ितज तक पहँच चुके थे साल-डेढ़ साल पहले सहसा िजंदगी क लहर म
उथल-पुथल मच गयी थी और िव ु ध महासागर क तरह भखू ी लहर क बाँह पसारकर वह
िकसी को दबोच लेने के िलए हंकार उठी थी अपनी भयानक लहर के िशकं जे म सभी को
झकझोरकर, सभी के िव ास और भावनाओं को चकनाचरू कर अ त म सबसे यारे , सबसे
मासमू और सबसे सुकु मार यि व को िनगलकर अब धरातल शा त हो गया-तफू ान थम गया
था, बादल खुल गये थे और िसतारे िफर आसमान के घ सल से भयभीत िवहंग-शावक क तरह
झाँक रहे थे
डॉ टर शु ला छु ी लेकर याग चले आये थे उ ह ने पजू ा-पाठ छोड़ िदया था उ ह कभी
िकसी ने गाते हए नह सुना था अब वह सुबह उठकर लॉन पर टहलते और एक भजन गाते
थे िबनती, जो इतनी सु दर थी, अब के वल खामोश पीड़ा और अवशेष मिृ त क छाया मा
थी च दर शा त था, प थर हो गया था, लेिकन उसके माथे का तेज बुझ गया था और वह
बढ़ू ा-सा लगने लगा था और यह सब के वल प ह िदन म
जेठ दशहरे के िदन डॉ टर साहब बोले, “च दर, आज जाओ, उसके फू ल छोड़ आओ, लेिकन
देखो, शाम को जाना जब वहाँ भीड़-भाड़ न हो, अ छा!” और चुपचाप टहलकर गनु गनु ाने
लगे
शाम को च दर चला तो िबनती भी चुपचाप साथ हो ली; न िबनती ने आ ह िकया न च दर ने
वीकृ ित दी दोन खामोश चल िदये कार पर च दर ने िबनती क गोद म गठरी रख दी
ि वेणी पर कार क गयी ह क चाँदनी मलै े कफन क तरह लहर क लाश पर पड़ी हई
थी िदन-भर कमाकर म लाह थककर सो रहे थे एक बढ़ू ा बठै ा िचलम पी रहा था चुपचाप
उसक नाव पर च दर बठै गया िबनती उसक बगल म बठै गयी दोन खामोश थे, िसफ
पतवार क छप-छप सुन पड़ती थी म लाह ने त त के पास नाव बाँध दी और बोला, “नहा ल
बाब!ू ” वह समझता था बाबू िसफ घमू ने आये ह
“जाओ!”
वह दरू त त क कतार के उस छोर पर जाकर खो गया िफर दरू -दरू तक फै ला संगम...और
स नाटा...च दर िसर झकु ाये बठै ा रहा...िबनती िसर झकु ाये बठै ी रही थोड़ी देर बाद िबनती
िससक पड़ी च दर ने िसर उठाया और फौलादी हाथ से िबनती का कं धा झकझोरकर बोला,

“िबनती, यिद रोयी तो यही फक दगे उठाकर क ब त, अभागी!”
िबनती चुप हो गयी
च दर चुपचाप बठै ा त त के नीचे से गजु रती हई लहर को देखता रहा थोड़ी देर बाद उसने
गठरी खोली...िफर क गया, शायद फकने का साहस नह हो रहा था...िबनती ने पीछे से
आकर एक मु ी राख उठा ली और अपने आँचल म बाँधने लगी च दर ने चुपचाप उसक ओर
देखा, िफर झपटकर उसने िबनती का आँचल पकडक़र राख छीन ली और गरु ाता हआ बोला,
“बदतमीज कह क !...राख ले जाएगी-अभागी!” और झट से कपड़े सिहत राख फक दी और
आ नेय ि से िबनती क ओर देखकर िफर िसर झकु ा िलया लहर म राख एक जहरीले
पिनयाले साँप क तरह लहराती हई चली जा रही थी
िबनती चुपचाप िससक रही थी
“नह चुप होगी!” च दर ने पागल क तरह िबनती को ढके ल िदया, िबनती ने बाँस पकड़
िलया और चीख पड़ी
चीख से च दर जसै े होश म आ गया थोड़ी देर चुपचाप रहा िफर झकु कर अजं िल म पानी लेकर
महँु धोया और िबनती के आँचल से प छकर बहत मधुर वर म बोला, “िबनती, रोओ मत! मेरी
समझ म नह आता कु छ भी! रोओ मत!” च दर का गला भर आया और आँख म आँसू छलक
आये-”चुप हो जाओ, रानी! म अब इस तरह कभी नह क ँ गा-उठो! अब हम दोन को िनभाना
ह,ै िबनती!” च दर ने त त पर छीना-झपटी म िबखरी हई राख चुटक म उठायी और िबनती
क माँग म भरकर माँग चमू ली उसके होठ राख म सन गये
िसतारे टू ट चुके थे तफू ान ख म हो चुका था
नाव िकनारे पर आकर लग गयी थी-म लाह को चुपचाप पये देकर िबनती का हाथ थामकर
च दर ठोस धरती पर उतर पड़ा...मदु ा चाँदनी म दोन छायाएँ िमलती-जुलती हई चल द
गगं ा क लहर म बहता हआ राख का साँप टू ट-फू टकर िबखर चुका था और नदी िफर उसी तरह
बहने लगी थी जसै े कभी कु छ हआ ही न हो

समा


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