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गुनाहों का देवता _ Gunahon Ka Devta ( PDFDrive.com )

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Published by arunyadavyes, 2020-10-08 14:06:48

गुनाहों का देवता _ Gunahon Ka Devta ( PDFDrive.com )

गुनाहों का देवता _ Gunahon Ka Devta ( PDFDrive.com )

हमारे सामने रहना, जो कहोगे वह हम करते जाएँगे ”

“हाँ, यह हम जानते ह ” च दर ने कहा और कु छ दरू हटकर घास पर लेट गया और आकाश
क ओर देखने लगा शाम हो गयी थी और िदन-भर क उड़ी हई धलू अब बहत कु छ बठै गयी
थी आकाश के बादल ठहरे हए थे और उन पर अ णाई झलक रही थी एक दुरं गी पतगं बहत
ऊँ चे पर उड़ रही थी च दर का मन भारी था हालाँिक जो तफू ान परस उठा था वह ख म हो
गया था, लेिकन च दर का मन अभी मरा-मरा हआ-सा था वह चुपचाप लेटा रहा िबनती
दवा और पानी ले आयी दवा पीकर सुधा बोली, “ य , चुप य हो, च दर?”
“कोई बात नह ”

“िफर बोलते य नह , देखा िबनती, अभी-अभी या कह रहे थे और अब देखो इ ह ” सुधा
बोली

“हम अभी बताते ह इ ह!” िबनती बोली और िगलास म थोड़ा-सा पानी लेकर च दर के ऊपर

फक िदया च दर च ककर उठ बठै ा और िबगड़क़र बोला, “यह या बदतमीजी ह?ै अपनी दीदी

को यह सब दुलार िदखाया करो ”
“तो य पड़े थे ऐसे? बात करगे ऋिष-मिु नय जसै े और उदास रहगे ब च क तरह! वाह रे च दर
बाब!ू ” िबनती ने हँसकर कहा, “दीदी, ठीक िकया न मने?”
“िब कु ल ठीक, ऐसे ही इनका िदमाग ठीक होगा ”
“इतने म डॉ टर शु ला आये और कु रसी पर बठै गये सुधा के माथे पर हाथ रखकर देखा,
“अब तो तू ठीक ह?ै ”
“हाँ, पापा!”

“िबनती, कल तु हारी माताजी आ रही ह अब बसै ाखी क तयै ारी करनी है सुधा के जेठ आ
रहे ह और सास ”

सुधा चुपचाप उठकर चली गयी च दर, िबनती और डॉ टर साहब बठै े उस िदन का बहत-सा
काय म बनाते रहे

17

च दर को सबसे बड़ा स तोष था िक सुधा ठीक हो गयी थी बसै ाख पनू ो के एक िदन पहले ही
से िबनती ने घर को इतना साफ कर डाला था िक घर चमक उठा था यह बात तो दसू री है िक
टडी- म क सफाई म िबनती ने च दर के बहत-से कागज बुहारकर फक िदये थे और आँगन
धोते व उसने च दर के कपड़ को छीट से तर कर िदया था उसके बदले म च दर ने िबनती
को डाँटा था और सुधा देख-देखकर हँस रही थी और कह रही थी, “तमु य िचढ़ रहे हो? तु ह
देखने थोड़े ही आ रही ह हमारी सास ”
बशै ाखी पनू ो क सुबह डॉ टर साहब और बुआजी गाड़ी लेकर उनको िलवा लाने गये थे च दर
बाहर बरामदे म बठै ा अखबार पढ़ रहा था और सुधा अ दर कमरे म बठै ी थी अब दो िदन उसे
बहत दब-ढँककर रहना होगा वह बाहर नह घमू सकती थी; य िक जाने कै से और कब
उसक सास आ जाएँ और देख ल बुआ उसे समझा गयी थ और उसने एक ग भीर आ ाकारी
लड़क क तरह मान िलया था और अपने कमरे म चुपचाप बठै ी थी िबनती कढ़ी के िलए
बेसन फट रही थी और महरािजन ने रसोई म दधू चढ़ा रखा था
सुधा चुपके से आयी, िकवाड़ क आड़ से देखा िक पापा और बुआ क मोटर आ तो नह रही ह!ै
जब देखा िक कोई नह है तो आकर चु पे से खड़ी हो गयी और पीछे से च दर के हाथ से
अखबार ले िलया च दर ने पीछे देखा तो सुधा एक ब चे क तरह मसु करा दी और बोली,
“ य च दर, हम ठीक ह न? ऐसे ही रह न? देखा तु हारा कहना मानते ह न हम?”
“हाँ सुधी, तभी तो हम तमु को इतना दुलार करते ह!”
“लेिकन च दर, एक बार आज रो लेने दो िफर उनके सामने नह रो सकगे ” और सुधा का
गला ँ ध गया और आँख छलछला आयी
“िछः, सुधा...” च दर ने कहा
“अ छा, नह -नह ...” और झटके से सुधा ने आँसू प छ िलये इतने म गेट पर िकसी कार का
भ पू सुनाई पड़ा और सुधा भागी
“अरे , यह तो प मी क कार है ” च दर बोला सुधा क गयी प मी ने पोिटको म आकर
कार रोक
“हलै ो, मेरे जुड़वा िम , या हाल है तमु लोग का?” और हाथ िमलाकर बेतक लुफ से कु स
ख चकर बठै गयी
“इ ह अ दर ले चलो, च दर! वरना अभी वे लोग आते ह गे!” सुधा बोली
“नह , मझु े बहत ज दी है आज शाम को बाहर जा रही हँ बट अब मसरू ी चला गया ह,ै वहाँ
से उसने मझु े भी बुलाया है उसके हाथ म कह िशकार म चोट लग गयी है म तो आज जा
रही हँ ”

सुधा बोली, “हम ले चिलएगा?”
“चिलए कपरू , तमु भी चलो, जुलाई म लौट आना!” प मी ने कहा
“जब अगले साल हम लोग क िम ता क वषगाँठ होगी तो म चलँगू ा ” च दर ने कहा
“अ छा, िवदा!” प मी बोली च दर और सुधा ने हाथ जोड़े तो प मी ने आगे बढक़र सुधा का
महँु हथेिलय म उठाकर उसक पलक चमू ल और बोली, “मझु े तु हारी पलक बहत अ छी लगती
ह अरे ! इनम आँसुओं का वाद ह,ै अभी रोयी थ या?” सुधा झप गयी
च दर के क धे पर हाथ रखकर प मी ने कहा, “कपरू , तमु खत ज र िलखते रहना चलते
तो बड़ा अ छा रहता अ छा, आप दोन िम का समय अ छी तरह बीते ” और प मी चल

दी

थोड़ी देर म डॉ टर साहब क कार आयी सुधा ने अपने कमरे के दरवाजे ब द कर िलये,
िबनती ने िसर पर प ला ढक िलया और च दर दौड़कर बाहर गया डॉ टर साहब के साथ जो

स जन उतरे वे िठगने-से, गोरे -से, गोल चेहरे के कु लीन स जन थे और ख र का कु रता और
धोती पहने हए थे हाथ म एक छोटा-सा सफरी बगै था च दर ने लेने को हाथ बढ़ाया तो

हँसकर बोले, “नह जी, या इतना-सा बगै ले चलने म मेरा हाथ थक जाएगा आप लोग तो
खाितर करके मझु े मह वपणू बना दगे!”
सब लोग टडी म म गये वह डॉ टर शु ला ने प रचय कराया-”यह हमारे िश य और
लड़के , ा त के होनहार अथशा ी च कु मार कपरू और आप शाहजहाँपुर के िस काँ ेसी
कायकता और युिनिसपल किम र ी शंकरलाल िम ”
“अब तू नहाय लेव संकरी, िफर चाय ठंडाय जइहै ” बुआजी ने आकर कहा आज बुआजी ने
बहत िदन पहले क बटू ीदार साड़ी पहन रखी थी और शायद वह खुश थ य िक िबनती को
डाँट नह रही थ
“नह , म तो वेिटंग- म म नहा चुका चाय म पीता नह खाना ही तयै ार कराइए ” और
घड़ी देखकर शंकर बाबू बोले, “मझु े जरा वरा य-भवन जाना है और दो बजे क गाड़ी से वापस
चले जाना है और शायद उधर से ही चला जाऊँ गा ” उ ह ने बहत मीठे वर से मसु कराते हए
कहा

“यह तो अ छा नह लगता िक आप आये भी और कु छ के नह ” डॉ टर शु ला बोले
“हाँ, म खुद कना चाहता था लेिकन माँजी क तबीयत ठीक नह है कै लाश भी कानपुर
गया हआ है मझु े ज दी जाना चािहए ”
िबनती ने लाकर थाली रखी च दर ने आ य से डॉ टर साहब क ओर देखा वे हँसकर
बोले, “भाई, यह लोग हमारी तरह छू त-पाक नह मानते शंकर तु हारे स दाय के ह, यह
क चा खाना खा लगे ”

“इ ह ा ïण कहत के ह,ै ई तो िक र तान ह,ै हमरो धरम िबगािडऩ िहंयाँ आय कै !” बुआजी
बोल बुआजी ने ही यह शादी तय करायी थी, लड़काबताया था और दरू के र ते से वे कै लाश
और शंकर क भाभी लगती थ

शंकर बाबू ने हाथ धोये और कु स ख चकर बठै गये च दर, क ओर देखकर बोले, “आइए,
होनहार डॉ टर साहब, आप तो मेरे साथ खा सकते ह?”

“नह , आप खाइए ” च दर ने तक लुफ करते हए कहा

“अजी वाह! म ा ïण हँ, शु ; मेरे साथ खाकर आपको ज दी मो िमल जाएगा कह हाथ म
तरकारी लगी रह गयी तो आपके िलए वग का फाटक फौरन खुल जाएगा! खाओ ”
दो कौर खाने के बाद शंकर बाबू ने बुआजी से कहा, “यही बह ह,ै जो लड़क थाली रख गयी
थी?”

“अरे राम कहौ, ऊ तो हमार छोरी है िबनती! पहचन यौ नै िपछले साल तो मु ने के िववाह म
देखे होबो!” बुआजी बोल
शंकर बाबू कै लाश से काफ बड़े थे लेिकन देखने म बहत बड़े नह लगते थे खाते-पीते बोले,
“डॉ टर साहब! लड़क से किहए, रोटी दे जाये म इसी तरह देख लँगू ा, और यादा तडक़-
भड़क क कोई ज रत नह !”

डॉ टर साहब ने बुआजी को इशारा िकया और वे उठकर चली गय थोड़ी देर म सुधा आयी
सादी सफे द धोती पहने, हाथ म रोटी िलये दरवाजे पर आकर िहचक , िफर आकर च दर से

बोली, “रोटी लोगे!” और िबना च दर क आवाज सुने रोटी च दर के आगे रखकर बोली, “और
या चािहए?”

“मझु े कढ़ी चािहए!” शंकर बाबू ने कहा सुधा गयी और कढ़ी ले आयी शंकर बाबू के सामने
रख दी शंकर बाबू ने आँख उठाकर सुधा क ओर देखा, सुधा ने िनगाह नीची कर ल और
चली गयी

“बहत अ छी है लड़क !” शंकर बाबू ने कहा “इतनी पढ़ी-िलखी लड़क म इतनी शम-िलहाज
नह िमलती सचमचु जसै े आपक एक ही लड़क थी, आपने उसे खबू बनाया है कै लाश के
िब कु ल यो य लड़क है यह तो किहए डॉ टर साहब िक िश ा बल होती है वरना हमारा
कहाँ सौभा य था! जब से मेरी प नी मरी तभी से माताजी कै लाश के िववाह क िजद कर रही

ह कै लाश अ तजातीय िववाह करना चाहता था, लेिकन हम तो अपनी जाित म ही इतना

अ छा स ब ध िमल गया ”

“तो तोहरे अबिहन कौन बसै ा गयी तहु ौ काहे नाही बह रया लै अउ यौ सुधी के अके ल मन
न लगी!” बुआजी बोल
शंकर बाबू कु छ नह बोले खाना खाकर उ ह ने हाथ धोये और घड़ी देखी
“अब थोड़ा सो लँ,ू या जाने दीिजए आइए, बात कर हम और आप,” उ ह ने च दर से कहा
एक बजे तक च दर शंकर बाबू से बात करता रहा और डॉ टर साहब और सुधा वगरै ह खाना
खाते रहे शंकर बाबू बहत हँसमखु थे और बहत बातनू ी भी च दर को तो कै लाश से भी
यादा शंकर बाबू पस द आये बात करने से मालमू हआ िक शंकर बाबू क आयु अभी तीस वष
से अिधक क नह है एक पाँच वष का ब चा है और उसी के होने म उनक प नी मर गयी

अब वे िववाह नह करगे, वे गाँधीवादी ह, काँ ेस के मखु थानीय कायकता ह और
युिनिसपल किम र ह घर के जम दार ह कै लाश बरे ली म पढ़ता था अब भी कै लाश का
कोई इरादा िकसी कार क नौकरी या यापार करने का नह ह,ै वह मजदरू के िलए सा ािहक
प िनकालने का इरादा कर रहा है वह सुधा को बजाय घर पर रखने के अपने साथ रखेगा
य िक वह सुधा को आगे पढ़ाना चाहता ह,ै सुधा को राजनीित े म ले जाना चाहता है
बीच म एक बार िबनती आयी और उसने च दर को बुलाया च दर बाहर गया तो िबनती ने
कहा, “दीदी पछू रही ह, ये िकतनी देर म जाएँगे?”

“ य ?”

“कह रही ह अब च दर को याद थोड़े ही है िक सुधा भी इसी घर म है उ ह से बात कर रहे
ह”

च दर हँस िदया और कु छ नह कहा िबनती बोली, “ये लोग तो बहत अ छे ह म तो कहँगी
सुधा दीदी को इससे अ छा प रवार िमलना मिु कल है हमारे ससुर क तरह नह ह ये लोग ”
“हाँ, िफर भी सुधा इतनी सेवा नह कर रही है इनक िबनती, तमु सुधा को कु छ िश ा दे दो
इस मामले म ”

“हाँ-हाँ, हम सेवा करने क िश ा दे दगे और याह करने के बाद क िश ा अपनी प मी से

िदलवा देना खुद तो उनसे ले ही चुके ह गे आप!”
च दर झप गया “पाजी कह क , बहत बेशरम हो गयी है पहले महँु से बोल नह िनकलता
था!”

“तमु ने और दीदी ने ही तो िकया बेशरम! हम या कर? पहले हम िकतना डरते थे!” िबनती ने
उसी तरह गदन टेढ़ी करके कहा और मसु कराकर भाग गयी
जब डॉ टर साहब आये तो शंकर बाबू ने कहा, “अब तो म जा रहा हँ, यह माला मेरी ओर से बह
को दे दीिजए ” और उ ह ने बड़ी सु दर मोितय क माला बगै से िनकाली और बुआजी के हाथ
म दे दी

“हाँ, एक बात ह!ै ” शंकर बाबू बोले, “ याह हम लोग महीने भर के अ दर ही करगे आपक
सब बात हमने मानी, यह बात आपको हमारी माननी होगी ”

“इतनी ज दी!” डॉ टर शु ला च क उठे, “यह अस भव ह,ै शंकर बाबू ! म अके ला हँ, आप
जानते ह ”

“नह , आपको कोई क न होगा ” शंकर बाबू बहत मीठे वर म बोले, “हम लोग रीित-रसम
के तो कायल ह नह आप िजतना चाहे रीित-रसम अपने मन से कर ल हम लोग तो िसफ

छह-सात आदिमय के साथ आएँगे सुबह आएँगे, अपने बँगले म एक कमरा खाली करा
दीिजएगा शाम को अगवानी और िववाह कर द दसू रे िदन दस बजे हम लोग चले जाएँगे ”
“यह नह होगा ” डॉ टर साहब बोले, “हमारी तो अके ली लड़क है और हमारे भी तो कु छ
हौसले ह और िफर लड़क क बुआ तो यह कभी भी नह वीकार करगी ”
“देिखए, म आपको समझा दँ,ू कै लाश शािदय म तड़क-भड़क के स त िखलाफ है पहले तो
वह इसिलए जाित म िववाह नह करना चाहता था, लेिकन जब मने उसे भरोसा िदलाया िक

बहत सादा िववाह होगा तभी वह राजी हआ इसीिलए इसे आप मान ही ल िफर िववाह के बाद

तो िजंदगी पड़ी है आपक अके ली लड़क है िजतना चािहए, क रए रहा कम समय का तो

शुभ य शी म!् िफर आपको कु छ खास इ तजाम भी नह करना, अगर कु छ हो तो किहए म यह
रह जाऊँ , आपका काम कर दँ!ू ” शंकर बाबू हँसकर बोले
कु छ देर तक बात होती रह , अ त म शंकर बाबू ने अपने सौज य और मीठे वभाव से सभी को
राजी कर ही िलया उसके बाद उ ह ने सबसे िवदा माँगी, चलते व बुआजी और डॉ टर साहब
के परै छु ए, च दर से हाथ िमलाया और शंकर बाबू सबका मन जीतकर चले गये
बुआजी ने माला हाथ म ली, उसे उलट-पलटकर देखा और बोल , “एक ऊ आये रहे जतू ाखोर!
एक ठो कागज थमाय के चले गये!” और एक गहरी साँस लेके चली गय

डॉ. साहब ने सुधा को बुलाया उसके हाथ म वह माला रखकर उसे िचपटा िलया सुधा पापा
क गोद म महँु िछपाकर रो पड़ी
उसके बाद सुधा चली गयी और च दर, डॉ टर साहब और बुआजी बठै े शादी के इ तजाम क बात
करते रहे यह तय हआ िक अभी तो इ ह क इ छानुसार िववाह कर िदया जाए िफर
यिू नविसटी खुलने पर सभी को बुलाकर अ छी दावत वगरै ह दे दी जाए यह भी तय हआ िक
बुआजी गाँव जाकर अनाज, घी, बिडय़ाँ और नौकर वगरै ह का इ तजाम कर लाएँ और प ह
िदन के अ दर लौट आएँ अगवानी ठीक छह बजे शाम को हो जाए और सुबह के ना ते म या
िदया जाए, यह सभी डॉ टर साहब ने तय कर डाला लेिकन िन य यह िकया गया िक चँिू क
आदमी बहत कम आ रहे ह, अत: सुबह-शाम के ना ते का काम यिू नविसटी के िकसी रे तराँ को
दे िदया जाए

इसी बीच म िबनती खरबजू ा और शरबत लाकर रख गयी और च दर ने बहत आराम से शरबत
पीते हए पछू ा, “िकसने बनाया ह?ै ”
“सुधा दीदी ने ”
“आज बड़ी खुश मालमू पड़ती ह,ै चीनी बहत कम छोड़ी ह!ै ” च दर बोला बुआ और िबनती
दोन हँस पड़

थोड़ी देर बाद च दर उठकर भीतर गया तो देखा िक सुधा अपने पलँग पर बठै ी सामने एक
िकताब रखे जाने या देख रही है और सामने वह माला पड़ी है च दर गया और बोला, “सुधा!
आज म बहत खुश हँ ”
सुधा ने आँख उठाय और च दर क ओर देखकर मसु कराने क कोिशश क और बोली, “म भी
बहत खुश हँ ”
“ य , तय हो गया इसिलए?” िबनती ने पछू ा
“नह , च दर बहत खुश ह इसिलए!” और एक गहरी साँस लेकर िकताब ब द कर दी
“कौन-सी िकताब ह,ै सुधा?” च दर ने पछू ा
“कु छ नह , इस पर उदू के कु छ अशआर िलखे ह जो गेसू ने सुनाये थे ” सुधा बोली
च दर ने िबनती क ओर देखा और कहा, “िबनती, कै लाश तो जसै ा है वसै ा ही ह,ै लेिकन

शंकरबाबू क तारीफ म कर नह सकता या राय है तु हारी?”
“हाँ, है तो सही; दीदी इतनी सुखी रहगी िक बस! दीदी, हम भलू मत जाना, समझ !” िबनती
बोली

“और हम भी मत भलू ना सुधा!” च दर ने सुधा क उदासी दरू करने के िलए छेड़ते हए कहा
“हाँ, तु ह भलू े िबना कै से काम चलेगा ” सुधा ने और भी गहरी साँस लेते हए कहा और एक
आँसू गाल पर िफसल ही आया
“अरे पगली, तमु सब कु छ अपने च दर के िलए कर रही हो, उसक आ ा मानकर कर रही हो
िफर यह आँसू कै से? िछः! और यह माला सामने रखे या कर रही हो?” च दर ने बहलाया
“माला तो दीदी इसिलए सामने रखे थ िक बतलाऊँ ...बतलाऊँ !” िबनती बोली, “असल म

रामायण क कहानी तो सुनी है च दर, तमु ने? रामच ने अपने एक भ को मोती क माला
दी तो वह उसे दाँत से तोडक़र देख रहा था िक उसके अ दर रामनाम है या नह सो यह माला

सामने रखकर देख रही थ , इसम कह च दर क झलक है या नह ?”

“चुप िगलहरी कह क ?” सुधा हँस पड़ी, “बहत बोलना आ गया ह!ै ” सुधा ने हँसते हए बनावटी
गु से से कहा िफर सुधा तिकये से िटककर बठै गयी-”आज गेसू नह है मझु े गेसू क बहत
याद आ रही है ”

“ य ?”

“इसिलए िक आज उसके कई शेर याद आ रहे ह एक दफे उसने सुनाया था-
ये आज िफजा खामोश है य , हर जर को आिखर होश है य ?

या तमु ही िकसी के हो न सके , या कोई तु हारा हो न सका '
इसी क अि तम पंि ह-ै

मौज भी हमारी हो न सक , तफू ाँ भी हमारा हो न सका'!”
“वाह! यह पंि बहत अ छी ह,ै ” च दर ने कहा

“आज गेसू होती तो बहत-सी बात करते!” सुधा बोली, “देखो च दर, िजंदगी भी या होती ह!ै
आदमी या सोचता है और या हो जाता है आज से तीन-चार महीने पहले मने या सोचा था!

लास- म से भागकर हम लोग पेड़ के नीचे लेटकर बात करते थे, तो म हमेशा कहती थी-म

शादी नह क ँ गी पापा को समझा लँगू ी उस िदन या मालमू था िक इतनी ज दी जुए के
नीचे गरदन डाल देनी होगी और पापा को भी जीतकर िकसी दसू रे से हार जाना होगा अभी
उसक तय भी नह हई और महीने-भर बाद मेरी...” सुधा थोड़ी देर चुप रही और िफर-”और दसू री
बात उसक , जो मने तु ह बतायी थी उसने कहा था जब िकसी के कदम हट जाते ह िसर के
नीचे से, तब मालमू होता है िक हम िकसका सपना देख रहे थे पहले हम भी नह मालमू होता
था िक हमारे िसर िकसके कदम पर झकु चुके ह याद ह?ै मने तु ह बताया था, तमु ने पछू ा
था!”

“याद है ” च दर ने कहा िबनती उठकर चली गयी लेिकन सुधा या च दर िकसी ने यान
भी नह िदया च दर बोला, “लेिकन सुधा, इन सब बात को सोचने से या फायदा, आगे का
रा ता सामने ह,ै बढ़ो ”

“हाँ, सो तो है ही देवता मेरे ! कभी-कभी जाने िकतनी पुरानी बात मन म आ ही जाती ह और मन
करता है िक म सोचती ही जाऊँ जाने य मन को बड़ा स तोष िमलता है और च दर, जब

म वहाँ रहँगी, तमु से दरू , तो इ ह मिृ तय के अलावा और या शेष रहेगा...तु ह वह िदन याद है
जब म गेसू के यहाँ नह जा पायी थी और उस थान पर हम लोग म झगड़ा हो गया था...च दर,
वहाँ सब कु छ है लेिकन म लड़ँगी-झगड़ँगी िकससे वहाँ?”
च दर एक फ क -सी हँसी हँसकर बोला, “अब या ज म-भर ब ची ही बनी रहोगी!”

“हाँ च दर, चाहती तो यही थी लेिकन िजंदगी तो जबरद ती सब सुख छीन लेती है और बदले म
कु छ भी नह देती आओ, चलो लॉन पर चल शाम को तमु से बात ही करगे!”
उसके बाद सुधा रात को आठ बजे उठी, जब बुआ तयै ार होकर टेशन जा रही थ और ाइवर
मोटर िनकाल रहा था और उदास िटमिटमाते हए िसतार ने देखा िक च दर और सुधा दोन
क आँख म आँसुओं क अवशेष नमी िझलिमला रही थी उठते हए सुधा ने ण-भर च दर क
ओर देखा, च दर ने िसर झकु ा िलया और बहत उदास आवाज म कहा, “चलो सुधा, बहत देर कर
दी हम लोग ने ”

18

प ह िदन बाद बुआ आय तो उ ह ने घर क श ल ही बदल दी दरवाजे पर और बरसाती म
ह दी के हाथ क छाप लग गयी, कमर का सभी सामान हटाकर द रयाँ िबछा दी गय और
सबसे अ दर वाले कमरे म सुधा का सब सामान रख िदया गया टडी- म क सभी िकताब
समेट दी गय और वहाँ एक बड़ी-सी मशीन लाकर रख दी गयी िजस पर बठै कर िबनती िसलाई
करती थी उसी को कपड़े और गहन का भंडार-घर बनाया गया और उसक चाबी िबनती या
बुआ के पास रहती थी गाँव से एक महरािजन, एक कहा रन और दो मजदरू आये थे, वे सभी
गरै े ज म सोते थे और िदन-भर काम करते थे और 'पानी पीने' को माँगते रहते थे सभी कु िसयाँ
और सोफासेट िनकलवाकर सायबान म लगवा िदये गये थे रसोई के पार वाली कोठरी म
कु हड़, प ल, याले वगरै ह रखे थे और पजू ा वाले कमरे म श कर, घी, तरकारी और अनाज
था िमठाई कहाँ रखी जाएगी, इस पर बुआजी, महरािजन और िबनती म घंटे-भर तक बहस हई
लेिकन जब बुआजी ने िबनती से कहा, “आपन लड़के -ब चे का िबयाह िकयो तो कतरनी अस
जबान चलाय िल ो, अबिहन हर काम म काहे टाँग अड़ावा करत हौ!” तो िबनती चुप हो गयी
और अ त म बुआजी क राय सव प र मानी गयी बुआजी क जबान िजतनी तेज थी, हाथ भी
उतने ही तेज चार बोरा गेहँ उ ह ने साफ करके कोठ रय म भरवा िदये कम-से-कम पाँच
तरह क दाल लायी थ बेसन िपसवाया, दाल दरवायी, पापड़ बनवाये, मदै ा छनवाया, सजू ी
दरवायी, बरी-मगँु ौरी डलवाय , चावल क कचौ रयाँ बनवाय और सबको अलग-अलग गठरी म
बाँधकर रख िदया रात को अकसर बुआजी, महरािजन तथा गाँव क मह रन ढोलक लेकर बठै
जात और गीत गात िबनती उनम भी शािमल रहती
सच पछू ो तो सुधा के याह का िजतना उछाह बुआ को नह था, उतना िबनती को था वह सुबह
से उठकर झाड़ लेकर सारा घर बुहार डालती थी, इसके बाद नहाकर तरकारी काटती, उसके बाद
िफर चाय चढ़ाती डॉ टर साहब, च दर, सुधा सभी को चाय देती, बठै कर च दर अगर कु छ
िहसाब िलखाता तो िहसाब िलखती, िफर अपनी मशीन पर बठै जाती और बारह-एक बजे तक
िसलाई करती रहती, िफर दोपहर को चावल और दाल बीनती, शाम को खरबजू े काटती, शरबत
बनाती और रात-भर जाग-जागकर गाती या दीदी को हँसाने क कोिशश करती एक िदन
सुधा ने कहा, “मेरे याह म तो इतनी खुश ह,ै अपने याह म या करे गी?” तो िबनती ने जवाब
िदया, “अपने याह म तो म खुद बड बजाऊँ गी, वद पहनकर!”
घर चमक उठा था जसै े रे शम! लेिकन रे शम के चमकदार, रं गीन उ लास भरे गोले के अ दर भी
एक ाणी होता ह,ै उदास त ध अपनी साँस रोककर अपनी मौत क ण- ण ती ा करने
वाला रे शम का क ड़ा घर के इस सारे उ लास और चहल-पहल से िघरा हआ िसफ एक ाणी
था िजसक साँस धीरे -धीरे डू ब रही थी, िजसक आँख क चमक धीरे -धीरे कु हला रही थी,

िजसक चंचलता ने उसक नजर से िवदा माँग ली थी, वह थी-सुधा सुधा बदल गयी थी
गोरा च पई चेहरा पीला पड़ गया था, और लगता था जसै े वह बीमार हो खाना उसे जहर लगने

लगा था, अपने कमरे को छोड़कर कह जाती न थी एक शीतलपाटी िबछाये उसी पर िदन-रात

पड़ी रहती थी िबनती जब हँसती हई खाना लाती और सुधा के इनकार पर िबनती के आँसू
छलछला आते तब सुधा पानी के घँटू के सहारे कु छ खा लेती और उदास, िफर अपनी शीतलपाटी
पर लेट जाती वग को कोई इ धनुष से भर दे और शची को जहर िपला दे, कु छ ऐसा ही लग
रहा था वह घर

डॉ टर शु ला का साहस न होता था सुधा से बोलने का वह रोज िबनती से पछू लेते-”सुधा
खाना खाती है या नह ?” िबनती कहती, “हाँ ” तो एक गहरी साँस लेकर अपने कमरे म चले
जाते

च दर परे शान था उसने इतना काम शायद कभी भी न िकया हो अपनी िजंदगी म सुनार के
यहाँ, कपड़े वाले के यहाँ, िफर राशिनंग अफसर के यहाँ, पुिलस बड ठीक कराने पुिलस लाइसं ,
अज देने मिै ज ेट के यहाँ, पया िनकालने बक, शािमयाने का इ तजाम, पलँग, कु स वगरै ह
का इ तजाम, खाने-परोसने के बरतन के इ तजाम और जाने या- या...और जब बुरी तरह
थककर आता, जेठ क तपती हई दोपहरी म, तब िबनती आकर बताती-सुधा ने आज िफर कु छ
नह खाया तो उसका मन होता था वह िसर पटक-पटक दे वह सुधा के पास जाता, सुधा आँसू
प छकर बठै ती, एक टू टी-फू टी मसु कान से च दर का वागत करती च दर उससे पछू ता,
“खाती य नह ?”

“खाती तो हँ च दर, इससे यादा गरिमय म म कभी नह खाती थी ” सुधा कहती और इतने
ढ़ वर से िक च दर से कु छ ितवाद नह करते बनता
अब बाहरी काम लगभग समा हो गये थे वसै े तो सभी जगह ह दी िछडक़कर प रवाना िकये

जा चुके थे लेिकन िनमं ण-प भी बहत सु दर छपकर आये थे, हालाँिक कु छ देर हो गयी थी
याह को अब कु ल सात िदन बचे थे च दर सुबह दस बजे एक िड बे म िनमं ण-प और
िलफाफा-भरे हए आया और टडी- म म बठै गया िबनती बठै ी हई कु छ िसल रही थी
“सुधा कहाँ ह?ै उसे बुला लाओ ”
सुधा आयी, सजू ी आँख, सखू े होठ, खे बाल, मलै ी धोती, िन ाण चेहरा और बीमार चाल
हाथ म पंखा िलये थी आयी और च दर के पास बठै गयी-”कहो, या कर आये, च दर! अब

िकतना इ तजाम बाक ह?ै ”

“अब सब हो गया, सुधा रानी! आज तो परै जवाब दे रहे ह साइिकल चलाते-चलाते परै म जसै े
गाँठ पड़ गयी ह ” च दर ने काड फै लाते हए कहा, “शादी तु हारी होगी और जान मेरी
िनकली जा रही है मेहनत से ”

“हाँ च दर, इतना उ साह तो और िकसी को नह है मेरी शादी का!” सुधा ने कहा और बहत
दुलार से बोली, “लाओ, परै दबा दँू तु हारे ?”
“अरे पागल हो गयी?” च दर ने अपने परै उठाकर ऊपर रख िलये

“हाँ, च दर!” गहरी साँस लेते हए सुधा बोली, “अब मेरा अिधकार भी या है तु हारे परै छू ने
का मा करना, म भलू गयी थी िक म पुरानी सुधा नह हँ ” और टप से दो आँसू िगर पड़े
सुधा ने पंखे क ओट कर आँख प छ ल

“तमु तो बुरा मान गय , सुधा!” च दर ने परै नीचे रखते हए कहा
“नह च दर, अब बुरा-भला मानने के िदन बीत गये अब गरै क बात का भी बुरा-भला नह
मान पाऊँ गी, िफर घर के लोग क बात का बुरा-भला या...छोड़ो ये सब बात ये या
िनमं ण-प छपा ह,ै देख!”

च दर ने एक िनमं ण-प उठाया, उसे िलफाफे म भरकर उस पर सुधा का नाम िलखकर कहा,
“लो, हमारी सुधा का याह ह,ै आइएगा ज र!”
सुधा ने िनमं ण प ले िलया-”अ छा!” एक फ क हँसी हँसकर बोली, “अ छा, अगर हमारे
पितदेव ने आ ा दे दी तो आऊँ गी आपके यहाँ उनका भी नाम िलख दीिजए वरना बुरा न मान
जाएँ ” और सुधा उठ खड़ी हई
“कहाँ चली?” च दर ने पछू ा
“यहाँ बहत रोशनी ह!ै मझु े अपना अँधेरा कमरा ही अ छा लगता है ” सुधा बोली
“चलो िबनती, वह काड ले चलो!” च दर ने कहा, “आओ सुधा, आज काड िलखते जाएँगे,
तमु से बात करते जाएँगे िजंदगी देखो, सुधी! आज प ह िदन से तमु से दो िमनट बठै कर बात
भी न कर सके ”

“अब या करना ह,ै च दर! जसै ा कह रहे हो वसै ा कर तो रही हँ अभी कु छ और बाक है या?
बता दो वह भी कर डालँू अब तो रो-पीटकर ऊँ चा बनना ही है ”
िबनती ने काड समेटे तो सुधा डाँटकर बोली-”रख इसे यह ; चली उठा के ! बड़ी च दर क
आ ाकारी बनी है ये भी हमारी जान क गाहक हो गयी अब! हमारे कमरे म लायी ये सब, तो

टाँग तोड़ दँगू ी! पाजी कह क !”
िबनती ने काड धर िदये नौकर ने आकर कहा, “बाबजू ी, कु हार अपना िहसाब माँगता ह!ै ”
“अ छा, अभी आया, सुधा!” और च दर चला गया

19

और इस तरह िदन बीत रहे थे शादी नजदीक आती जा रही थी और सभी का सहारा एक-दसू रे
से छू टता जा रहा था सुधा के मन पर जो कु छ भी धीरे -धीरे मरघट क उदासी क तरह बठै ता
जा रहा था और च दर अपने यार से, अपनी मसु कान से, अपने आँसुओं से धो देने के िलए
याकु ल हो उठा था, लेिकन यह िजंदगी थी जहाँ यार हार जाता ह,ै मसु कान हार जाती ह, आँसू
हार जाते ह-त तरी, याले, कु हड़, प ल, कालीन, द रयाँ और बाजे जीत जाते ह जहाँ अपनी
िजंदगी क ेरणा-मिू त के आँसू िगनने के बजाय कु हड़ और याले िगनवाकर रखने पड़ते ह
और जहाँ िकसी आ मा क उदासी को अपने आँसुओं से धोने के बजाय प ल धुलवाना यादा
मह वपणू होता ह,ै जहाँ भावना और अ त के सारे तफू ान सुनार और िबजलीवाल क बात म
डू ब जाते ह, और जहाँ दो आँसुओं म डू बते हए यि य क पुकार शहनाइय क आवाज म डू ब
जाती है और िजस व िक आदमी के दय का कण-कण तिव त हो जाता ह,ै िजस व
उसक नस म िसतारे टू टते ह, िजस व उसके माथे पर आग धधकती ह,ै िजस व उसके िसर
पर से आसमान और पाँव तले से धरती हट जाती ह,ै उस समय उसे शादी क सािड़य का मोल-
तोल करना पड़ता है और बाजे वाले को एडवा स पया देना पड़ता है
ऐसी थी उस व च दर क िजंदगी और उस िजंदगी ने अपना च परू ी तरह चला िदया था
करोड़ तफू ान घुमड़ाते हए उसे नचा रहे थे वह एक ण भी कह नह िटक पाता था एक
पल भी उसे चनै नह था, एक पल भी वह यह नह सोच पाता था िक उसके चार ओर या हो
रहा ह?ै वह बेहोशी म, मछू ा म मशीन क तरह काम कर रहा था आवाज थ िक उसके कान
से टकराकर चली जाती थ , आँसू थे िक दय को छू नह पाते थे, च उसे फँ साकर ख चे िलये
जा रहा था िबजली से भी यादा तेज, लय से भी यादा सश वह िखंचा जा रहा था िसफ
एक ओर शादी का िदन सुधा ने नथुनी पहनी, उसे नह मालमू सुधा ने कोरे कपड़े पहने,
उसे नह मालमू सुधा ने चड़ू े पहने, उसे नह मालमू घर म गीत हए, उसे नह मालमू सुधा
ने चू हा पजू ते व अपना िसर पटक िदया, उसे नह मालमू ...वह यि नह था, तफू ान म
उड़ता हआ एक पीला प ा था जो वा याच म उलझ गया था और झ के उसे नचाये जा रहे थे...
और उसे होश आया तब, जब िबनती जबरद ती उसका हाथ पकडक़र ख च ले गयी बारात आने
के एक िदन पहले उस छत पर, जहाँ सुधा पड़ी रो रही थी, च दर को ढके लकर चली आयी
च दर के सामने सुधा थी सुधा, िजससे वह पता नह य बचना चाहता था अपनी आ मा
के संघष से, अपने अ त:करण के घाव क कसक से घबराकर जसै े कोई आदमी एका त कमरे
से भागकर भीड़ म िमल जाता ह,ै भीड़ के िनरथक शोर म अपने को खो देना चाहता ह,ै बाहर के
शोर म अ दर का तफू ान भुला देना चाहता ह;ै उसी तरह च दर िपछले ह ते से सब कु छ भलू
गया; उसे िसफ एक चीज याद रहती थी-शादी का ब ध सुबह से लेकर सोने के व तक वह

इतना काम कर डालना चाहता था िक उसे एक ण भी बठै ने का मौका न िमले, और सोने से
पहले वह इतना थक जाये, इतना चरू -चरू हो जाये िक लेटते ही न द उसे जकड़ ले और उसे
बेहोश कर दे लेिकन उस व िबनती उसे उसके िव मरण- थल से ख चकर एका त म ले

आयी है जहाँ उसक ताकत और उसक कमजोरी, उसक पिव ता और उसका पाप, उसक

मसु कान और उसके आँस,ू उसक ितभा और उसक िव मिृ त; उसक सुधा अपनी िजंदगी के
िचर तन मोड़ पर खड़ी अपना सब कु छ लुटा रही थी च दर को लगा जसै े उसको अभी च कर
आ जाएगा वह अकु लाकर खाट पर बठै गया
शाम थी, सरू ज डू ब रहा था और िदन-भर क तपी हई छत पर जलती हई बरसाती के नीचे एक
खरहरी खाट पर सुधा लेटी थी एक महीन पीली धोती पहने, कोरी मारक न क कु त , पहने,

खे िचकटे हए बाल और नाक म बहत बड़ी-सी नथ प ह िदन के आँसुओं ने चेहरे को जाने
कै सा बना िदया न चेहरे पर सुकु मारता थी, न कठोरता न प था, न ताजगी िसफ ऐसा
लगता था िक जसै ा सुधा का सब कु छ लुट चुका है न के वल यार और िजंदगी लुटी ह,ै वरन
आवाज भी लुट गयी है और नीरवता भी वभै व भी लुट गया और याचना भी
सुधा ने अपने पीले प ले से आँसू प छे और उठकर बठै गयी दोन चुप पहले कौन बोले!
िबनती आयी, च दर और सुधा का खाना रखकर चली गयी “खाना खाओगी, सुधा?” च दर
ने पछू ा सुधा कु छ बोली नह िसफ िसर िहला िदया और डू बते हए सरू ज और उड़ते हए
बादल क ओर देखकर जाने या सोचने लगी च दर ने थाली िखसका दी और सुधा को
अपनी ओर ख चकर बोला, “सुधा, इस तरह कै से काम चलेगा तु ह को देखकर तो म अपना
धीरज सँभालँगू ा, बताओ और तु ह यह कर रही हो!” सुधा च दर के पास िखसक आयी और दो
िमनट तक चुपचाप च दर क ओर फटी हई पथरायी आँख से देखती रही और एकदम दय को
फाड़ देने वाली आवाज म चीखकर रो उठी-”च दर, अब या होगा!”

च दर क समझ म नह आया, वह या करे ! आँसू उसके सखू चुके थे वह रो नह सकता
था उसके मन पर कह कोई प थर रखा था जो आँसुओं क बँदू को बनने के साथ ही सोख
लेता था लेिकन वह तड़प उठा, “सुधा!” वह घबराकर बोला, “सुधा, तु ह हमारी कसम ह-ै चुप हो
जाओ! चुप...िब कु ल चुप...हाँ...ऐसे ही!” सुधा च दर के पाँव म महँु िछपाये थी-”उठकर बठै ो
ठीक से सुधा...इतना समझ-बझू कर यह सब करती हो, िछः! तु ह अपना िदल मजबतू करना
चािहए वरना पापा को िकतना दुख होगा ”
“पापा ने तो मझु से बोलना भी छोड़ िदया ह,ै च दर! पापा से कह दो आज तो बोल ल, कल से हम
उ ह परे शान करने नह आएँगे, कभी नह आएँगे अब उनक सुधा को सब ले जा रहे ह, जाने
कहाँ ले जा रहे ह!” और िफर वह फफक-फफककर रो पड़ी

च दर ने िबनती से पापा को बुलवाया सुधा को रोते हए देखकर िबनती खड़ी हो गयी, “दीदी,
रोओ मत दीदी, िफर हम िकसके भरोसे रहगे यहाँ?” और सुधा को चुप कराते-कराते िबनती भी
रोने लगी और आँसू प छते हए चली गयी
पापा आये सुधा चुप हो गयी और कु छ कहा नह , िफर रोने लगी डॉ टर शु ला भराये गले
से बोले, “मझु े यह रोआई अ छी नह लगती यह भावुकता य ? तमु पढ़ी-िलखी लड़क हो
इसी िदन के िलए तु ह पढ़ाया-िलखाया गया था! भावुकता से या फायदा?” कहते-कहते
डॉ टर शु ला खुद रोने लगे “चलो च दर यहाँ से! अभी जनवासा ठीक करवाना है ” च दर

और डॉ टर शु ला दोन उठकर चले गये
अपनी शादी के पहले, हमेशा के िलए अलग होने से पहले सुधा को इतना ही मौका िमला...उसके
बाद...

सुबह छह बजे गाड़ी आती थी, लेिकन खुशिक मती से गाड़ी लेट थी; डॉ टर शु ला तथा अ य
लोग बारात का वागत करने टेशन पर जा रहे थे और च दर घर पर ही रह गया था जनवासे

का इ तजाम करने जनवासा बगल म था माथुर साहब के बँगले के दोन हॉल और कमरा
खाली करवा िलये गये थे च दर सुबह छह ही बजे आ गया था और जनवासे म सब सामान
लगवा िदया था नहाने का पानी और बाक इ तजाम कर वह घर आया जलपान का

इ तजाम तो के दार के हाथ म था लेिकन कु छ तौिलये िभजवाने थे
“िबनती, कु छ तौिलये िनकाल दो ” च दर ने िबनती से कहा
िबनती उद क दाल धो रही थी उसने फौरन उठकर हाथ धोये और कमरे क ओर चली गयी

“ऐ िबनती...” बुआजी ने भंडारे के अ दर से आवाज लगायी-”जाने कहाँ मर गयी महँु झ सी! अरे
िसंगार-पटार बाद म कर िलयो, काम म तिनक दीदा नै लगते बेसन का कन टर कहाँ रखा
ह?ै ”

“अभी आये!” िबनती ने च दर से कहा और अपनी माँ के पास दौड़ी, प ह िमनट हो गये
लेिकन िबनती लौटी ही नह याह का घर! हर तरफ से िबनती क पुकार मचती और िबनती
पंख लगाये उड़ रही थी जब िबनती नह लौटी तो च दर ने सुधा को ढु ँढक़र कहा, “सुधी, एक
बहत बड़ा-सा तौिलया िनकाल दो ”

सुधा चुपचाप उठी और टडी- म म चली गयी च दर भी पीछे-पीछे गया
“बठै ो, अभी िनकालकर लाते ह!” सुधा ने भरी हई आवाज म कहा और बगल के कमरे म चली
गयी वहाँ से लौटी तो उसके हाथ म मीठे क त तरी थी
“अरे खाने का व नह ह,ै सुधा! आठ बजे लोग आ जाएँगे ”
“अभी दो घंटे ह, खा लो च दर! अब कभी तु हारे काम म हरजा करके खाने को नह कहँगी!”
सुधा बोली च दर चुप
“याद ह,ै च दर! इसी जगह आँचल म िछपाकर नानखटाई लायी थी आओ, आज अपने हाथ से
िखला दँू कल ये हाथ पराये हो जाएँगे और सुधा ने एक इमरती तोडक़र च दर के महँु म दे
दी च दर क आँख म दो आँसू छलक आये-सुधा ने अपने हाथ से आँसू प छ िदये और बोली,
“च दर, घर म कोई खाने का खयाल करने वाला नह है खाते-पीते जाना, तु ह हमारी कसम
है म शाहजहाँपुर से लौटकर आऊँ गी तो दुबले मत िमलना ” च दर कु छ बोला नह आँसू
बहते गये, सुधा िखलाती गयी, वह खाता गया सुधा ने िगलास म पानी िदया, उसने हाथ धोया
और जेब से माल िनकाला

“ य , आज आँचल म हाथ नह प छोगे?” सुधा बोली च दर ने आँचल हाथ म ले िलया और
पलक पर आँचल दबाकर फू ट-फू टकर रो पड़ा
“िछः, च दर! आज तो हम सँभल गये ह, हमने सब वीकार कर िलया चुपचाप अब तमु
कमजोर मत बनो, तमु ने कहा था, म शा त रहँ तो शा त हो गयी अब य मझु े भी लाओगे!
उठो ” च दर उठ खड़ा हआ

सुधा ने एक पान च दर के महँु म देकर क था उसक कमीज से लगा िदया च दर कु छ नह

बोला
“अरे , आज तो लड़ लो, च दर! आज से ख म कर देना ”
इतने म िबनती तौिलया ले आयी “दीदी, इ ह कु छ िखला दो ये खा नह रहे ह ” िबनती ने
कहा
“िखला िदया ” सुधा बोली, “देखो च दर, आज म नह रोऊँ गी लेिकन एक शत पर तमु
बराबर मेरे सामने रहना मडं प म रहोगे न?”
“हाँ, रहँगा ” च दर ने आँसू पीते हए कहा
“कह चले मत जाना! मेरी आिखरी िबनती है ” सुधा बोली च दर तौिलया लेकर चला
आया
चँिू क बारात म कु ल आठ ही लोग थे अत: घर क और माथुर साहब क दो ही कार से काम चल
गया जब ये लोग आये तो ना ते का सामान तयै ार था और च दर चुपचाप बठै ा था उसने
फौरन सबका सामान लगवाया और सामान रखवाकर वह जा ही रहा था िक कै लाश ने पीछे से
क धे पर हाथ रखकर उसे पीछे घुमा िलया और गले से लगकर बोला, “कहाँ चले कपरू साहब,
नम ते! चलो, पहले ना ता करो ” और ख चकर वह च दर को ले गया अपने बगल क मेज
पर िबठाकर, उसक चाय अपने हाथ से बनायी और बोला, “कु छ नाराज थे या, कपरू ? खत का
जवाब य नह देते थे?”
“हम तो बराबर खत का जवाब देते रहे, यार!” कपरू चाय पीते हए बोला
“अ छा तो हम घमू ते रहे इधर-उधर, खत गड़बड़ हो गये ह गे ...लो, समोसा खाओ!” कै लाश ने
कहा च दर ने िसर िहलाया तो बोला, 'अरे , वाह याँ? शादी तु हारी नह हो रही ह,ै हमारी हो
रही ह,ै समझे? तमु य तक लुफ कर रहे हो अ छा कपरू ...काम तो तु ह पर होगा सब!”
“हाँ!” कपरू बोला
“बड़ा अफसोस ह,ै यार!” जब हम लोग पहली दफा िमले थे तो यह नह मालमू था िक तमु और
डॉ टर साहब इतना अ छा इनाम दोगे, अपने को बचाने का हमारे लायक कोई काम हो तो

बताओ!”
“आपक दुआ ह!ै ” च दर ने िसर झकु ाकर कहा, और सभी हँस पड़े इतने म शंकर बाबू डॉ टर
साहब के साथ आये और सब लोग चुप हो गये

20

िदन भर के यवहार से च दर ने देखा िक कै लाश भी उतना ही अ छा हँसमखु और शालीन है
िजतने शंकर बाबू थे वह उसे राजनीितक े म िजतना फौलादी लगा था, घरे लू िजंदगी म
उतना ही अ छा लगा च दर का मन खुशी से नाच उठा सुधा क ओर से वह थोड़ा िनि त
हो गया अब सुधा िनभा ले जाएगी वह मौका िनकालकर घर म गया देखा, सुधा को
औरत घेरे हए बठै ी ह और महावर लगा रही ह िबनती कन तर म से घी िनकाल रही थी
च दर गया और िबनती क चोटी घसीटकर बोला, “ओ िगलहरी, घी पी रही है या?”
िबनती ने दंग होकर च दर क ओर देखा आज तक कभी अ छे-भले म तो च दर ने उसे नह
िचढ़ाया था आज या हो गया? आज जबिक िपछले प ह रोज से च दर के होठ मसु कराना
भलू गये ह
“आँख फाड़कर या देख रही ह?ै कै लाश बहत अ छा लड़का ह,ै बहत अ छा अब सुधा बहत
सुखी रहेगी िकतना अ छा होगा, िबनती! हँसती य नह िगलहरी!” और च दर ने िबनती
क बाँह म चुटक काट ली
“अ छा! हम दीदी समझा है या? अभी बताती हँ ” और घी भरे हाथ से च दर क बाँह
पकड़कर िबनती ने जोर से घुमा दी च दर ने अपने को छु ड़ाया और िबनती को चपत मारकर
गनु गनु ाता हआ चला गया
िबनती ने कन तर के महँु पर लगा घी प छा और मन म बोली, 'देवता और िकसे कहते ह?'
शाम को बारात चढ़ी सादी-सी बारात िसफ एक बड था कै लाश ने शेरवानी और पायजामा
पहना था, और टोपी िसफ एक माला गले म पड़ी थी और हाथ म कं गन बँधा था मौर पीछे
िकसी आदमी के हाथ म था जयमाला क र म होने वाली थी लेिकन बुआजी ने प कर
िदया िक हमारी लड़क कोई ऐसी-वसै ी नह िक याह के पहले भरी बारात म महँु खोलकर माला
पहनाये लेिकन घँघू ट के मामले पर सुधा ने ढ़ता से मना िकया था, वह घँघू ट िब कु ल नह
करे गी
अ त म पापा उसे लेकर मडं प म आये घर का काम-काज िनबट गया था सभी लोग आँगन
म बठै े थे कािमनी, भा, लीला सभी थ , एक ओर बाराती बठै े थे सुधा शा त थी लेिकन
उसका महँु हण के च मा क तरह िन तेज था मडं प का एक ब ब खराब हो गया था और
च दर सामने खड़ा उसे बदल रहा था सुधा ने जाते-जाते च दर को देखा और आँसू प छकर
मसु कराने लगी और मसु कराकर िफर आँसू प छने लग कािमनी, भा, लीला तमाम लड़िकयाँ
कै लाश पर फि तयाँ कस रही थ सुधा िसर झकु ाये बठै ी थी पापा से उसने कहा, “िबनती
को हमारे पास भेज दो ” िबनती आकर सुधा के पीछे बठै गयी कै लाश ने आँख के इशारे से
च दर को बुलाया च दर जाकर पीछे बठै ा तो कै लाश ने कहा, “यार, यहाँ जो लोग खड़े ह

इनका प रचय तो बता दो चुपके से!” च दर ने सभी का प रचय बताया कािमनी, भा, लीला
सभी के बारे म जब च दर बता रहा था तो िबनती बोली, “बड़े लालची मालमू देते ह आप? एक से
स तोष नह है या? वाह रे जीजाजी!” कै लाश ने मसु कराकर च दर से पछू ा, “इसका याह तय
हआ िक नह ?”

“हो गया ” च दर ने कहा

“तभी बोलने का अ यास कर रही ह; मडं प म भी इसीिलए बठै ी ह या?” कै लाश ने कहा

िबनती झप गयी और उठकर चली गयी

सं कार शु हआ कै लाश के हाथ म ना रयल और उसक मु ी पर सुधा के दोन हाथ सुधा
अब चुप थी इतनी चुप...इतनी चुप िक लगता था उसके होठ ने कभी बोलना जाना ही नह
सं कार के दौरान ही पार प रक वचन का समय आया कै लाश ने सभी ित ाएँ वयं कह
शंकरबाबू ने कहा, लड़क भी िशि त है और उसे भी वयं वचन करने ह गे सुधा ने िसर िहला
िदया एक अस तोष क लहर-सी बाराितय म फै ल गयी च दर ने िबनती को बुलाया
उसके कान म कहा, “जाकर सुधा से कह दो िक पागलपन नह करते इससे या फायदा?”
िबनती ने जाकर बहत धीरे से सुधा के कान म कहा सुधा ने िसर उठाकर देखा सामने
बरामदे क सीिढय़ पर च दर बठै ा हआ बड़ा िचि तत-सा कभी शंकरबाबू क ओर देखता और
कभी सुधा क ओर सुधा से उसक िनगाह िमली और वह िसहर-सा उठा, सुधा ण-भर उसक
ओर देखती रही च दर ने जाने या कहा और सुधा ने आँख -ही-आँख म उसे या जवाब दे
िदया उसके बाद सुधा नीचे रखे हए पजू ा के ना रयल पर लगे हए िस दरू को देखती रही िफर
एक बार च दर क ओर देखा िविच -सी थी वह िनगाह, िजसम कातरता नह थी, क णा

नह थी, आँसू नह थे, कमजोरी नह थी, था एक ग भीरतम िव ास, एक उपमाहीन नेह, एक
स पणू तम समपण लगा, जसै े वह कह रही हो-सचमचु तमु कह रहे हो, िफर सोच लो
च दर...इतने ढ़ हो...इतने कठोर हो...मझु से महँु से य कहलवाना चाहते हो... या सारा सुख
लटू कर थोड़ी-सी आ मवंचना भी मेरे पास नह छोड़ोगे?...अ छा लो, मेरे देवता! और उसने
हारकर िससिकय से सने वर म अपने को कै लाश को समिपत कर िदया ित ाएँ दोहरा द
और उसके बाद साड़ी का एक छोर ख चकर, नथ क डोरी ठीक करने के बहाने उसने आँसू प छ
िलये

च दर ने एक गहरी साँस ली और बगल म बठै ी हई बुआजी से कहा, “बुआजी, अब तो बठै ा नह
जाता आँख म जसै े िकसी ने िमच भर दी हो ”
“जाओ...जाओ, सोय रहो ऊपर, खाट िबछी है कल सुबह दस बजे िवदा करे को है कु छ
खायो िपयो न,ै तो पड़े रहबो!” बुआ ने बड़े नेह से कहा
च दर ऊपर गया तो देखा एक खाट पर िबनती औधं ी पड़ी िससक रही है “िबनती! िबनती!”

उसने िबनती को पकडक़र िहलाया िबनती फू ट-फू टकर रो पड़ी
“उठ पगली, हम तो समझाती ह,ै खुद अपने-आप पागलपन कर रही है ” च दर ने ँ धे गले से
कहा

िबनती उठकर एकदम च दर क गोद म समा गयी और ददनाक वर म बोली, “हाय

च दर...अब... या...होगा?”

च दर क आँख म आँसू आ गये, वह फू ट पड़ा और िबनती को एक डू बते हए सहारे क तरह

पकडक़र उसक माँग पर महँु रखकर फू ट-फू टकर रो पड़ा लेिकन िफर भी सँभल गया और
िबनती का माथा सहलाते हए और अपनी िससिकय को रोकते हए कहा, “रो मत पगली!”

धीरे -धीरे िबनती चुप हई और खाट के पास नीचे छत पर बठै गयी और च दर के घुटन पर
हाथ रखकर बोली, “च दर, तमु आना मत छोड़ना तमु इसी तरह आते रहना! जब तक दीदी
ससुराल से लौट न आएँ ”
“अ छा!” च दर ने िबनती क पीठ पर हाथ रखकर कहा, “घबराते नह तमु तो बहादुर
लड़क हो न! सब चीज बहादुरी से सहना चािहए कै सी दीदी क बहन हो? य ?”
िबनती उठकर नीचे चली गयी

च दर लेट रहा उसक पोर-पोर म दद हो रहा था नस-नस को जसै े कोई तोड़ रहा हो, ख च

रहा हो हड् िडय के रे शे-रे शे म थकान िमल गयी थी लेिकन उसे न द नही आयी आँगन म
पुरोिहतजी के मं -पाठ का वर और बीच-बीच म आने वाले िकसी बाराती या औरत क आवाज
उसके मन को अ त- य त कर देती थ उसक थकान और उसक अशाि त ही उसको बार-

बार झटके से जगा देती थी वह करवट बदलता, कभी ऊपर देखता, कभी आँख ब द कर लेता
िक शायद न द आ जाए लेिकन न द नह ही आयी धीरे -धीरे नीचे का रव भी शा त हो गया

सं कार भी समा हआ बाराती उठकर चलने लगे और वह आवाज से यह पहचानने क

कोिशश करने लगा िक अब कौन या कर रहा है धीरे -धीरे सब शोर शा त हो गया

च दर ने िफर करवट बदली और आँख ब द कर ली धीरे -धीरे एक कोहरा उसके मन पर छा
गया वह इतना जागा िक अब अगर वह आँख भी ब द करता तो जब पलक पुतिलय से छा
जात तो एक बहत कड़आ दद होने लगा था जसै े-तसै े उसक थोड़ी-सी आँख लगी...
िकसी ने सहसा जगा िदया पलक ब द करने म िजतना दद हआ था उतना ही पलक खोलने

म उसने पलक खोल -देखा सामने सुधा खड़ी थी...
माँग और माथे म िस दरू , कलाई म कं गन, हाथ म अँगिू ठयाँ, कड़े, चड़ू े, गले म गहने, बड़ी-सी
नथुनी डोरे के सहारे कान म बँधी हई, आँख-िजनम भाद क घटाओं क गरज खामोश हो रही
बरसात-सी हो गयी थी

वह ण-भर पतै ाने खड़ी रही च दर उठकर बठै गया! उसका िदल इस तरह धडक़ रहा था

जसै े िकसी के सामने भा य का ठा हआ देवता खड़ा हो सुधा कु छ बोली नह उसने दोन
हाथ जोड़े और झकु कर च दर के परै पर माथा टेक िदया च दर ने उसके िसर पर हाथ
रखकर कहा, “ई र तु हारा सुहाग अटल करे ! तमु बहत महान हो मझु े तमु पर आज से गव
है आज तक तमु जो कु छ थी उससे कह यादा हो मेरे िलए, सुधा!”
सुधा कु छ बोली नह आँचल से आँसू प छती हई पायताने जमीन पर बठै गयी और अपने गले
से एक बेले का हार उतारा उसे तोड़ डाला और च दर के पाँव ख चकर खाट के नीचे जमीन
पर रख िलये

“अरे यह या कर रही हो, सुधा ” च दर ने कहा
“जो मेरे मन म आएगा!” बहत मिु कल से ँ धे गले से सुधा बोली, “मझु े िकसी का डर नह , तमु
जो कु छ दंड दे चुके हो, उससे बड़ा दंड तो अब भगवान भी नह दे सकगे?” सुधा ने च दर के
पाँव पर फू ल रखकर उ ह चमू िलया और अपनी कलाई म बँधी हई एक पुिड़या खोलकर उसम से
थोड़ा-सा िस दरू उन फू ल पर िछडक़कर, च दर के पाँव पर िसर रखकर चुपचाप रोती रही

थोड़ी देर बाद उठी और उन फू ल को समेटा अपने आँचल के छोर म उ ह बाँध िलया और
उठकर चली...धीमे-धीमे िन:श द...

“कहाँ चली, सुधा?” च दर ने सुधा का हाथ पकड़ िलया
“कह नह !” अपना हाथ छु ड़ाते हए सुधा ने कहा
“नह -नह , सुधा, लाओ ये हम रखगे!” च दर ने सुधा को रोकते हए कहा
“बेकार ह,ै च दर! कल तक, परस तक ये जठू े हो जाएँगे, देवता मेरे !” और सुधा िससकते हए
चली गयी

एक चमकदार िसतारा टू टा और परू े आकाश पर िफसलते हए जाने िकस ि ितज म खो गया

21

दसू रे िदन आठ बजे तक सारा सामान टेशन पहँच गया था शंकर बाबू और डॉ टर साहब
पहले ही टेशन पहँच गये थे बाराती भी सब वह चले गये थे कै लाश और सुधा को टेशन
तक लाने का िज मा च दर पर था बहत ज दी करते-कराते भी सवा नौ बजे गये थे उसने
िफर जाकर कहा कै लाश और सुधा खड़े हए थे पीछे से नाइन सुधा के िसर पर पंखा रखी
थी और बुआजी रोचना कर रही थ च दर के ज दी मचाने पर अ त म उ ह फु रसत िमली और
वह आगे बढ़े मोटर पर सुधा ने य ही पाँव रखा िक िबनती पाँव से िलपट गयी और रोने
लगी सुधा जोर से िबलख-िबलखकर रो पड़ी च दर ने िबनती को छु ड़ाया सुधा पीछे
बठै कर िखड़क पर महँु रखकर िससकती रही मोटर चल दी सुधा मडु क़र अपने घर क ओर
देख रही थी िबनती ने हाथ जोड़े तो सुधा चीखकर रो पड़ी िफर चुप हो गयी
टेशन पर भी सुधा िब कु ल शा त रही सुधा और कै लाश के िलए सेकड लास म एक बथ
सुरि त थी बाक लोग ड् योढ़े म थे शंकर बाबू ने दोन को उस िड बे म पहँचाया और बोले,
“कै लाश, तमु जरा हमारे साथ आओ िम टर कपरू , जरा बह के पास आप रिहए म डॉ टर
साहब को यहाँ भेज रहा हँ ”
च दर िखडक़ के पास खड़ा हो गया शंकर बाबू का छोटा ब चा आकर अपनी नयी चाची के
पास बठै गया और उनक रे शमी चादर से खेलने लगा च दर चुपचाप खड़ा था
सहसा सुधा ने उसके हाथ पर अपना मेहँदी लगा हाथ रख िदया और धीमे से कहा, “च दर!”
च दर ने मडु क़र देखा तो बोली, “अब कु छ सोचो मत इधर देखो!” और सुधा ने जाने िकतने
दुलार से च दर से कहा, “देखो, िबनती का यान रखना उसे तु हारे ही भरोसे छोड़ रही हँ
और सुनो, पापा को रात को सोते व दधू म ओव टीन ज र दे देना खाने-पीने म गड़बड़ी
मत करना, यह मत समझना िक सुधा मर गयी तो िफर िबना दधू क चाय पीने लगो हम
ज दी से आ जाएँगे प मी का कोई खत आये तो हम िलखना ”
इतने म डॉ टर साहब और कै लाश आ गये कै लाश क पाटमट के बाथ म म चला गया
डॉ टर साहब आये और सुधा के िसर पर हाथ रखकर बोले, “बेटा! आज तेरी माँ होती तो िकतना
अ छा होता और देख, महीने-भर म बुला लगे तझु े! वहाँ घबराना मत ”
गाड़ी ने सीटी दी
पापा ने कहा, “बेटा, अब ठीक से रहना और भावुकता या बचपना मत करना समझी!” पापा
ने आँख से माल लगा िलया-”िववाह बहत बड़ा उ रदािय व है अब तु हारी नयी िजंदगी है
अब तक बेटी थी, अब बह हो... ”
सुधा बोली, “पापा, तु हारा ओव टीन का िड बा शीशे वाली मेज पर है उसे पी िलया करना
और पापा, िबनती को गाँव मत भेजना च दर को अब घर पर ही बुला लो तमु अके ले पड़

गये! और हम ज दी बुला लेना...”
गाड ने सीटी दी कै लाश ने ज दी से डॉ टर साहब के परै छु ए च दर से हाथ िमला िलया
सुधा बोली, “च दर, ये पुजा िबनती को देना और देखो मेरा नतीजा िनकले तो तार देना ”
गाड़ी चल पड़ी “अ छा पापा, अ छा च दर...” सुधा ने हाथ जोड़े और िखडक़ पर िटककर
रोने लगी और बार-बार आँसू प छ-प छकर देखने लगी ...
गाड़ी लेटफाम के बाहर चली गयी तब च दर मड़ु ा उसके बदन म पोर-पोर म दद हो रहा था
वह कै से घर पर पहँचा उसे मालमू नह

ि तीय ख ड

22

च दर को ह ते-भर तक होश नह रहा शादी के िदन म उसे एक नशा था िजसके बल पर वह
मशीन क तरह काम करता गया शादी के बाद इतनी भयंकर थकावट उसक नस म कसक
उठी िक उसका चलना-िफरना मिु कल हो गया था वह अपने घर से होटल तक खाना खाने
नह जा पाता था बस पड़ा-पड़ा सोता रहता सुबह नौ बजे सोता; पाँच बजे उठता; थोड़ी देर
होटल म बठै कर िफर वापस आ जाता चुपचाप छत पर लेटा रहता और िफर सो जाता उसका
मन एक उजड़े हए नीड़ क तरह था िजसम से िवचार, अनुभिू त, प दन और रस के िवहंगम
कह दरू उड़ गये थे लगता था, जसै े वह सब कु छ भलू गया है सुधा, िबनती, प मी, डॉ टर
साहब, रसच, थीिसस, सभी कु छ! ये सब चीज कभी-कभी उसके मन म नाच जात लेिकन
च दर को ऐसा लगता िक ये िकसी ऐसी दुिनया क चीज ह िजसको वह भलू गया ह,ै जो उसके
मिृ त-पटल से िमट चुक ह,ै कोई ऐसी दुिनया जो कभी थी, कह थी, लेिकन िकसी भयंकर
जल लय ने िजसका कण-कण व त कर िदया था उसक दुिनया अपनी छत तक सीिमत थी,
छत के चार ओर क ऊँ ची दीवार और उन चारदीवार से बँधे हए आकाश के चौकोर टु कड़े तक
ही उसके मन क उड़ान बँध गयी थी उजाला पाख था पहले वह लु धक तारे क रोशनी
देखता िफर धीरे -धीरे चाँद क दिू धया रोशनी सफे द कफन क तरह छा जाती और वह मन म
थके हए वर जसै े चाँदनी को ओढ़ता हआ-सा कहता, “सो जा मरु दे...सो जा ”
छठे िदन उसका मन कु छ ठीक हआ थकावट, जो एक कचुल क तरह उस पर छायी हई थी,
धीरे -धीरे उतर गयी और उसे लगा जसै े मन म कु छ टू टा हआ-सा दद कसक रहा है यह दद य
ह,ै कै सा ह,ै यह उसके कु छ समझ म नह आता था पाँच बजे थे लेिकन धपू िब कु ल नह थी
पीले उदास बादल क एक झीनी तह ने ढलते हए आषाढ़ के सरू ज को ढँक िलया था हवा म
एक ठंडक आ गयी थी; लगता था िक झ के िकसी वषा के देश से आ रहे ह वह उठा, नहाया
और िबनती के घर चल पड़ा
डॉ टर शु ला लॉन पर हाथ म िकताब िलये टहल रहे थे पाँच िदन म जसै े वह बहत बढ़ू े हो
गये थे बहत झकु े हए-से िन तेज चेहरा, डबडबायी आँख और चाल म जसै े उ थक गयी हो
उ ह ने च दर का वागत भी उस तरह नह िकया जसै े पहले करते थे िसफ इतना बोले,
“च दर, दो दफे ाइवर को भेजकर बुलाया तो मालमू हआ तमु सो रहे हो अब अपना सामान

यह ले आओ ” और वे बठै कर िकताब उलट-पलट कर देखने लगे अभी तक वे बढ़ू े थे, उनका
यि व त ण था आज लगता था जसै े उनके यि व पर झु रयाँ पडऩे लगी ह, उनके
यि व क कमर भी झकु गयी है च दर कु छ नह बोला चुपचाप खड़ा रहा सामने
आकाश पर एक अजब-सी जद छा रही थी डॉ टर साहब ने िकताब ब द क और बोले, “सुना
ह.ै ..कॉलेज के ि ि सपल आ गये ह जाऊँ जरा उनसे तु हारे बारे म बात कर आऊँ तमु जाओ,
सुधा का खत आया है िबनती के पास ”
“बुआजी ह?” च दर ने पछू ा
“नह , आज ही सुबह तो गय हम लोग िकतना रोकते रहे लेिकन उ ह कह और चनै ही नह
पड़ता िबनती को बड़ी मिु कल से रोका मने ” और डॉ टर साहब गरै े ज क ओर चल पड़े
च दर भीतर गया सारा घर इतना सुनसान था, इतना भयंकर स नाटा िक च दर के रोएँ-रोएँ
खड़े हो गये शायद मौत के बाद का घर भी इतना नीरव और इतना भयानक न लगता होगा

िजतना यह शादी के बाद का घर िसफ रसोई से कु छ खटपट क आवाज आ रही थी
“िबनती!” च दर ने पुकारा िबनती चौके म थी वह िनकल आयी िबनती को देखते ही
च दर दंग हो गया वह लड़क इतनी दुबली हो गयी थी िक जसै े बीमार हो रो-रोकर उसक
आँख सजू गयी थ और होठ मोटे पड़ गये थे च दर को देखते ही उसने कड़ाही उतारकर नीचे
रख दी और िबखरी हई लट सुधारकर, आँचल ठीक कर बाहर िनकल आयी कमरे से ख चकर
एक चौक आँगन म डालकर च दर से बहत उदास वर म बोली, “बिै ठए!”

“घर िकतना सनू ा लग रहा है िबनती, तमु अके ले कै से रहती होगी?” च दर ने कहा िबनती
क आँख म आँसू छलछला आये
“िबनती, रोती य हो? िछः! मझु े देखो म कै से प थर बन गया हँ य ? तमु तो इतनी
अ छी लड़क हो ” च दर ने िबनती के क धे पर हाथ रखकर कहा

िबनती ने आँसू भरी पलक च दर क ओर उठाय और बड़े ही कातर वर म कहा, “आप देवता
हो सकते ह, लेिकन हरे क तो देवता नह है िफर आपने कहा था आप आएँगे बराबर िपछले

ह ते से आये भी नह यह भी नह सोचा िक हमारा या हाल होगा! रोज सुबह-शाम कोई भी
आता तो हम दौडक़र देखते िक आप आये ह या नह दीदी आपक थ ! बस उन तक आपका

र ता था हम तो आपके कोई नह ह ”

“नह िबनती! इतने थक गये थे िक हम कह आने-जाने क िह मत ही नह पड़ती थी बुआजी
को जाने य िदया तमु ने? उ ह रोक लेती!” च दर ने कहा
“अरे , वह थ तो रोने भी नह देती थ म दो-तीन िदन तक रोयी तो मझु पर बहत िबगड़ और
महरािजन से बोल , “हमने तो ऐसी लड़क ही नह देखी बड़ी बहन का याह हो गया तो मारे

जलन के िदन-रात आँसू बहा-बहाकर अमगं ल बनाती है जब बखत आएगा तभी शादी करगे
िक अभी ही िकसी के साथ िनकाल दँू ” िबनती ने एक गहरी साँस लेकर कहा, “आप समझ
नह सकते िक िजंदगी िकतनी खराब है अब तो हमारी तबीयत होती है िक मर जाएँ अभी

तक दीदी थ , सहारा िदये रहती थ िह मत बँधाये रहती थ , अब तो कोई नह हमारा ”

“िछः, ऐसी बात नह करते, िबनती! महीने-भर म सुधा आ जाएगी और माँ क बात का या
बुरा मानना?”
“आप लड़क होते तो समझते, च दर बाब!ू ” िबनती बोली और जाकर एक त तरी म ना ता ले

आयी, “लो, दीदी कह गयी थ िक च दर के खाने-पीने का खयाल रखना लेिकन यह िकसको

मालमू था िक दीदी के जाते ही च दर गरै हो जाएँगे ”
“नह िबनती, तमु गलत समझ रही हो जाने य एक अजीब-सी िख नता मन म आ गयी
थी कु छ करने क तबीयत ही नह होती थी आज कु छ तबीयत ठीक हई तो सबसे पहले
तु हारे ही पास आया िबनती! अब सुधा के बाद मेरा है ही कौन, िसवा तु हारे ?” च दर ने बहत
उदास वर म कहा

“तभी न! उस िदन म बुलाती रह गयी और आप यह गये, वह गये और आँख से ओझल! मने तो
उसी िदन समझ िलया था िक अब पुराने च दर बाबू बदल गये ” िबनती ने रोते हए कहा
च दर का मन भर आया था, गले म आँसू अटक रहे थे लेिकन आदमी क िजंदगी भी कै सी अजब
होती है वह रो भी नह सकता था, माथे पर दुख क रे खा भी झलकने नह दे सकता था,
इसिलए िक सामने कोई ऐसा था, जो खुद दुखी था और सुधा क थाती होने के नाते िबनती को
समझाना उसका पहला कत य था िबनती के आँसू रोकने के िलए वह खुद अपने आँसू पी
गया और िबनती से बोला, “लो, कु छ तमु भी खाओ ” िबनती ने मना िकया तो उसने अपने
हाथ से िबनती को िखला िदया िबनती चुपचाप खाती रही और रह-रहकर आँसू प छती रही
इतने म महरािजन आयी िबनती ने चौके के काम समझा िदये और च दर से बोली, “चिलए,

ऊपर चल ” च दर ने चार ओर देखा घर का स नाटा वसै ा ही था सहसा उसके मन म

एक अजीब-सी बात आयी सुधा के साथ कभी भी कह भी वह जा सकता था, लेिकन िबनती
के साथ छत पर अके ले जाने म य उसके अ त:करण ने गवाही नह दी वह चुपचाप बठै ा
रहा िबनती कु छ भी हो, िकतनी ही समीप य न हो, िबनती सुधा नह थी, सुधा नह हो
सकती थी “नह , यह ठीक है ” च दर बोला

िबनती गयी सुधा का प ले आयी च दर का मन जाने कै सा होने लगा लगता था जसै े
अब आँसू नह कगे उसके मन म िसफ इतना आया िक अभी बह र घंटे पहले सुधा यह थी,
इस घर क ाण थी; आज लगता है जसै े इस घर म सुधा थी ही नह ...
आँगन म अँधेरा होने लगा था वह उठकर सुधा के कमरे के सामने पड़ी हई कोच पर बठै गया
और िबनती ने ब ी जला दी खत छोटा-सा था-

“डॉ टर च दर बाब,ू
या तमु कभी सोचते थे िक तमु इतनी दरू होगे और म तु ह खत िलखँगू ी लेिकन खरै !

अब तो घर म चनै क बंसी बजाते ह गे एक अके ले म ही काँटे-जसै ी खटक रही थी, उसे भी

तमु ने िनकाल फका अब तु ह न कोई परे शान करता होगा, न तु हारे पढ़ने-िलखने म बाधा
पहँचती होगी अब तो तमु एक महीने म दस-बारह थीिसस िलख डालोगे
जहाँ िदन म चौबीस घंटे तमु आँख के सामने रहते थे, वहाँ अब तु हारे बारे म एक श द सुनने के
िलए तड़प उठती हँ कई दफे तबीयत आती है िक जसै े िबनती से तु हारे बारे म बात करती थी
वसै े ही इनसे (तु हारे िम से) तु हारे बारे म बात क ँ लेिकन ये तो जाने कै सी-कै सी बात करते


और सब ठीक है यहाँ बहत आजादी है मझु े माँजी भी बहत अ छी ह परदा िब कु ल नह
करत अपने पजू ा के सारे बरतन पहले ही िदन हमसे मजँ वाये
देखो, पापा का यान रखना और िबनती को जसै े म छोड़ आयी हँ उतनी ही मोटी रहे म

महीने-भर बाद आकर तु ह से िबनती को वापस लँगू ी, समझे? यह न करना िक म न रहँ तो मेरे
बजाय िबनती को ला- लाकर, कु ढ़ा-कु ढ़ाकर मार डालो, जसै ी तु हारी आदत है
चाय यादा मत पीना-खत का जवाब फौरन!

तु हारी-सुधा ”
च दर ने िच ी एक बार िफर पढ़ी, दो बार पढ़ी, और बार-बार पढ़ता गया हलके हरे कागज पर
छोटे-छोटे काले अ र जाने कै से लग रहे थे जाने या कह रहे थे, छोटे-छोटे अथात कु छ उनम
अथ था जो श द से भी यादा ग भीर था युग पहले वयै ाकरण ने उन श द के जो अथ
िनि त िकये थे, सुधा क कलम से जसै े उन श द को एक नया अथ िमल गया था च दर
बेसुध-सा त मय होकर उस खत को बार-बार पढ़ता गया और िकस समय वे छोटे-छोटे नादान
अ र उसके दय के चार ओर कवच-जसै े बौि कता और स तलु न के लौह प को चीरकर
अ दर िबंध गये और दय क धड़कन को मरोडऩा शु कर िदया, यह च दर को खुद नह
मालमू हआ जब तक िक उसक पलक से एक गरम आँसू खत पर नह टपक पड़ा लेिकन
उसने िबनती से वह आँसू िछपा िलया और खत मोड़क़र िबनती को दे िदया िबनती ने खत
लेकर रख िलया और बोली, “अब चिलए खाना खा लीिजए!” च दर इनकार नह कर सका
महरािजन ने थाली लगायी और बोली, “भइया, नीचे अबिहन आँगन धोवा जाई, आप जाय के
ऊपर खाय लेव ”
च दर को मजबरू न ऊपर जाना पड़ा िबनती ने खाट िबछा दी एक टू ल डाल िदया पानी
रख िदया और नीचे थाली लाने चली गयी च दर का मन भारी हो गया था यह वही जगह
ह,ै वही खाट है िजस पर शादी क रात वह सोया था इसी के पतै ाने सुधा आकर बठै ी थी अपने
नये सुहाग म िलपटी हई-सी यही पर सुधा के आँसू िगरे थे...
िबनती थाली लेकर आयी और नीचे बठै कर पंखा करने लगी
“हमारी तबीयत तो है ही नह खाने क , िबनती!” च दर ने भराये हए वर म कहा
“अरे , िबना खाये-पीये कै से काम चलेगा? और िफर आप ऐसा करगे तो हमारी या हालत होगी?
दीदी के बाद और कौन सहारा ह!ै खाइए!” और िबनती ने अपने हाथ से एक कौर बनाकर
च दर को िखला िदया! च दर खाने लगा च दर चुप था, वह जाने या सोच रहा था
िबनती चुपचाप बठै ी पंखा झल रही थी
“ या सोच रहे ह आप?” िबनती ने पछू ा
“कु छ नह !” च दर ने उतनी ही उदासी से कहा
“नह बताइएगा?” िबनती ने बड़े कातर वर से कहा
च दर एक फ क मसु कान के साथ बोला, “िबनती! अब तमु इतना यान न रखा करो! तमु
समझती नह , बाद म िकतनी तकलीफ होती है सुधा ने या कर िदया है यह वह खुद नह
समझती!”
“कौन नह समझता!” िबनती एक गहरी साँस लेकर बोली, “दीदी नह समझती या हम नह
समझते! सब समझते ह लेिकन जाने मन कै सा पागल है िक सब कु छ समझकर धोखा खाता
है अरे दही तो आपने खाया ही नह ” वह पड़ू ी लाने चली गयी

23

और इस तरह िदन कटने लगे जब आदमी अपने हाथ से आँसू मोल लेता ह,ै अपने-आप दद का
सौदा करता ह,ै तब दद और आँसू तकलीफ-देह नह लगते और जब कोई ऐसा हो जो आपके
दद के आधार पर आपको देवता बनाने के िलए तयै ार हो और आपके एक-एक आँसू पर अपने
सौ-सौ आँसू िबखेर दे, तब तो कभी-कभी तकलीफ भी भली मालमू देने लगती है लेिकन िफर
भी च दर के िदन कै से कट रहे थे यह वही जानता था लेिकन अकबर के महल म जलते हए
दीपक को देखकर अगर िकसी ने जाड़े क रात जमनु ा के घुटन -घुटन पानी म खड़े होकर
काट दी, तो च दर अगर सुधा के यारे - यारे खत के सहारे समय काट रहा था तो कोई ता जुब
नह अपने अ ययन म ौढ़, अपने िवचार म उदार होने के बावजदू च दर अपने वभाव म
ब चा था, िजससे िजंदगी कु छ भी करवा सकती थी बशत िजंदगी को यह आता हो िक इस भोले-
भाले ब चे को कै से बहलावा िदया जाये
बहलावे के िलए मसु कान ही ज री नह होती ह, शायद आँसुओं से मन ज दी बहल जाता है
िबनती के आँसुओं म च दर सुधा क तसवीर देखता था और बहल जाता था वह रोज शाम को
आता और िबनती से सुधा क बात करता, जाने िकतनी बात, जाने कै सी बात और िबनती के
मा यम से सुधा म डू बकर चला आता था चँिू क सुधा के िबना उसका िदन कटना मिु कल था,
एक ण कटना मिु कल था इसिलए िबनती उसक एक ज रत बन गयी थी वह जब तक
िबनती से सुधा क बात नह कर लेता था, तब तक जसै े वह बेचनै रहता था, तब तक उसक
िकसी काम म तबीयत नह लगती थी
जब तक सुधा सामने रही, कभी भी उसे यह नह मालमू हआ िक सुधा का या मह व है उसक
िजंदगी म आज जब सुधा दरू थी तो उसने देखा िक सुधा उसक साँस से भी यादा आव यक
थी उसक िजंदगी के िलए लगता था वह एक ण सुधा के िबना िज दा नह रह सकता
सुधा के अभाव म िबनती के मा यम से वह सुधा को ढूँढ़ता था और जसै े सरू ज के डू ब जाने पर
चाँद सरू ज क रोशनी उधार लेकर रात को उिजयारा कर देता है उसी तरह िबनती सुधा क याद
से च दर के ाण पर उिजयारी िबखेरती रही च दर िबनती को इस तरह अपनी साँस क
छाँह म दुबकाये रहा जसै े िबनती सुधा का पश हो, सुधा का यार हो
िबनती भी च दर के माथे पर उदासी के बादल देखते ही तड़प उठती थी लेिकन िफर भी
िबनती च दर को हँसा नह पायी च दर का पुराना उ लास लौटा नह साँप का काटा हआ
जसै े लहर लेता है वसै े ही च दर क नस म फै ला हआ उदासी का जहर रह-रहकर च दर को
झकझोर देता था उन िदन दो-दो तीन-तीन िदन तक च दर कु छ नह करता था, िबनती के
पास भी नह जाता था, िबनती के आँसुओं क भी परवाह नह करता था खाना नह खाता
था, और अपने को िजतनी तकलीफ हो सकती थी, देता था िफर य ही सुधा का कोई खत

आता था, वह उसे चमू लेता और िफर व थ हो जाता था िबनती चाहे िजतना करे लेिकन
च दर क इन भयंकर उदासी क लहर को च दर से छीन नह पायी थी चाँद िकतनी

कोिशश य न करे , वह रात को िदन नह बना सकता

लेिकन आदमी हँसता ह,ै दुख-दद सभी म आदमी हँसता है जसै े हँसते-हँसते आदमी क
स नता थक जाती है वसै े ही कभी-कभी रोते-रोते आदमी क उदासी थक जाती है और आदमी

करवट बदलता है तािक हँसी क छाँह म कु छ िव ाम कर िफर वह आँसुओं क कड़ी धपू म चल
सके

ऐसी ही एक सुबह थी जबिक च दर के उदास मन म आ रहा था िक वह थोड़ी देर हँस भी ले
बात य हई थी िक उसे शेली क एक किवता बहत पस द आयी थी िजसम शलै ी ने भारतीय

मलयज को स बोिधत िकया है उसने अपना शेली-क ट् स का थ उठाया और उसे खोला तो
वही आम के अचार के दाग सामने पड़ गये जो सुधा ने शरारतन डाल िदये थे बस वह शेली क
किवता तो भलू गया और उसे याद आ गयी आम क फाँक और सुधा क शरारत से भरी शोख
आँख िफर तो एक के बाद दसू री शरारत ाण म उठ-उठकर च दर क नस को गदु गदु ाने
लगी और च दर उस िदन जाने य हँसने के िलए याकु ल हो उठा उसे ऐसा लगा जसै े सुधा
क यह दरू ी, यह अलगाव सभी कु छ झठू है सच तो वे सुनहले िदन थे जो सुधा क शरारत से
मसु कराते थे, सुधा के दुलार म जगमगाते थे और कु छ भी हो जाये, सुधा उसके जीवन का एक
ऐसा अमर स य है जो कभी भी डगमगा नह सकता अगर वह उदास होता ह,ै दु:खी होता है
तो वह गलत है वह अपने ही आदश को झठू ा बना रहा ह,ै अपने ही सपने का अपमान कर रहा
है और उसी िदन सुधा का खत भी आया िजसम सुधा ने साफ-साफ तो नह पर इशारे से
िलखा था िक वह च दर के भरोसे ही िकसी तरह िदन काट रही थी उसने सुधा को एक प
िलखा, िजसम वही शरारत, वही िखझाने क बात थ जो वह हमेशा सुधा से करता था लेिकन
िजसे वह िपछले तीन महीने म भलू गया था
उसके बाद वह िबनती के यहाँ गया

िबनती अपनी धोती म ोिशया क बेल टाँक रही थी “ले िगलहरी, तेरी दीदी का खत! लाओ,

िमठाई िखलाओ ”

“हम काहे को िखलाएँ! आप िखलाइए जो िखले पड़े ह आज!” िबनती बोली

“हम! हम य िखलाएँगे! यहाँ तो सुधा का नाम सुनते ही तबीयत कु ढ़ जाती ह!ै ”
“अरे चिलए, आपका घर मेरा देखा है मझु से नह बन सकते आप!” िबनती ने महँु िचढ़ाकर
कहा, “आज बड़े खुश ह!”
“हाँ, िबनती...” एक गहरी साँस लेकर च दर चुप हो गया, “कभी-कभी उदासी भी थक जाती
ह!ै ” और महँु झकु ाकर बठै गया
“ य , या हआ?” िबनती ने च दर क बाँह म सुई चुभो दी-च दर च क उठा “हमारी श ल
देखते ही आपके चेहरे पर महु रम छा जाता ह!ै ”
“अजी नह , आपका मखु -मडं ल देखकर तो आकाश म च मा भी लि जत हो जाता होगा,

ीमती िबनती िवदुषी!” च दर ने हँसकर कहा आज च दर बहत खुश था
िबनती लजा गयी और िफर उसके गाल म फू ल के कटोरे िखल गये और उसने च दर के क धे
से िफर सईू चुभोकर कहा, “आपको एक बड़े मजे क बात बतानी है आज!”

“ या?”

“िफर हँिसएगा मत! और िचढ़ाइएगा नह !” िबनती बोली

“कु छ तेरे याह क बात होगी!” च दर ने कहा
“नह , याह क नह , ेम क !” िबनती ने हँसकर कहा और झप गयी

“अ छा, िगलहरी को यह रोग कब सेï?” च दर ने हँसकर पछू ा, “अपनी माँजी क शकल देखी
है न, काटकर कु एँ म फक दगी तझु े!”
“अब या कर, कोई िसर पर ेम मढ़ ही दे तो!” िबनती ने बड़े आ मिव ास से कहा थी बड़ी

खुले वभाव क लड़क
“आिखर कौन अभागा है वह! जरा नाम तो सुन ” च दर बोला
“हमारे महाकिव मा टर साहब ” िबनती ने हँसकर कहा

“अ छा, यह कब से! तनू े पहले तो कभी बताया नह ”
“अब तो जाकर हम मालमू हआ पहले सोचा दीदी को िलख द िफर कहा वहाँ जाने िकसके
हाथ म िच ी पड़े तो सोचा तु ह बता द!”
“हआ या आिखर?” च दर ने पछू ा
“बात यह हई िक पहले तो हम दीदी के साथ पढ़ते थे तब तो मा टर साहब कु छ नह बोलते थे,
इधर जबसे हम अके ले पढऩे लगे तब से किवताएँ समझाने के बहाने दुिनया-भर क बात करते
रहे एक बार क दगु पढ़ाते-पढ़ाते बड़ी ठंडी साँस लेकर बोले, काश िक आप भी देवसेना
बन सकत बड़ा गु सा आया मझु े मन म आया कह दँू िक म तो देवसेना बन जाती लेिकन
आप अपना किव स मेलन का पेशा छोड़कर क दगु कै से बन पाएँगे लेिकन िफर मने कु छ
कहा नह दीदी से सब बात कह दी दीदी तो ह ही लापरवाह कु छ कहा ही नह उ ह ने
और मा टर साहब वसै े अ छे ह, पढ़ाते भी अ छा ह, लेिकन यह िफतरू जाने कै से उनके िदमाग म
चढ़ गया ” िबनती बड़े सहज वभाव से बोली

“लेिकन इधर या हआ?” च दर ने पछू ा
“अभी कल आये, एक हाथ म उनके एक मोटी-सी कॉपी थी दे गये तो देखा वह उनक

किवताओं का सं ह है और उसका नाम उ ह ने रखा है 'िबनती' अभी आते ह गे या कर

कु छ समझ म नह आता अभी तक दीदी के भरोसे हमने सब छोड़ िदया था वह पता नह
कब आएँगी ”

“अ छा लाओ, वह सं ह हम दे दो ” च दर ने कहा, “और िबस रया से कह देना वह च दर के

हाथ पड़ गया िफर कल सुबह तु ह मजा िदखलाएँगे लेिकन हाँ, यह पहले बता दो िक
तु हारा तो कु छ झकु ाव नह है उधर, वरना बाद म हम कोसो?” च दर ने छेड़ते हए कहा
“अरे हाँ, मसु लमान भी हो तो बेहना के संग! किवय से यार लगाकर कौन बवालत पाले!”
िबनती ने झपते हए कहा

24

दसू रे िदन सुबह पहँचा तो िबस रया साहब पढ़ा रहे थे िबस रया क श ल पर कु छ मायसू ी,
कु छ परे शानी, कु छ िच ता थी उसको िबनती ने बता िदया िक सं ह च दर के पास पहँच गया
है च दर को देखते ही वह बोला, “अरे कपरू , या हाल ह?ै ” और उसके बाद अपने को िनद ष
बताने के िलए फौरन बोला, “कहो, हमारा सं ह देखा ह?ै ”
“हाँ देखा ह,ै जरा आप इ ह पढ़ा लीिजए आपसे कु छ ज री बात करनी ह ” च दर ने इतने
कठोर वर म कहा िक िबस रया के िदल क धडक़न डू बने-सी लग वह काँपती हई आवाज म
बहत मिु कल से अपने को स हालते हए बोला, “कै सी बात? कपरू , तमु कु छ गलत समझ रहे
हो ”
कपरू एक उपे ा क हँसी हँसा और चला गया डॉ टर साहब पजू ा करके उठे थे दोन म बात
होती रह उनसे मालमू हआ िक अगले महीने म स भवत: च दर क िनयुि हो जाएगी और
तीन िदन बाद डॉ टर साहब खुद सुधा को लाने के िलए शाहजहाँपुर जाएँगे उ ह ने बुआजी
को प िलखा है िक यिद वह आ जाएँ तो अ छा ह,ै वरना च दर को दो-तीन िदन बाद यह
रहना पड़ेगा य िक िबनती अके ली है च दर क बात दसू री है लेिकन और लोग के भरोसे
डॉ टर साहब िबनती को अके ले नह छोड़ सकते
अिव ास आदमी क विृ य को िजतना िबगाड़ता ह,ै िव ास आदमी को उतना ही बनाता है
डॉ टर साहब च दर पर िजतना िव ास करते थे, सुधा च दर पर िजतना िव ास करती थी
और इधर िबनती उस पर िजतना िव ास करने लगी थी उसके कारण च दर के च र म इतनी
ढ़ता आ गयी थी िक वह फौलाद बन गया था ऐसे अवसर पर जब मनु य को ग भीरतम
उ रदािय व स पा जाता है तब वभावत: आदमी के च र म एक िविच -सा िनखार आ जाता
है यह िनखार च दर के च र म बहत उभरकर आया था और यहाँ तक िक बुआजी अपनी
लड़क पर अिव ास कर सकती थ , वह भी च दर को देवता ही मानती थ , िबनती पर और
चाहे जो ब धन हो लेिकन च दर के हाथ म िबनती को छोड़कर वे िनि त थ
डॉ टर साहब और च दर बठै े बात कर ही रहे थे िक िबनती ने आकर कहा, “चिलए, मा टर
साहब आपका इ तजार कर रहे ह!” च दर उठ खड़ा हआ रा ते म िबनती बोली, “हमसे बहत
नाराज ह कहते ह तु ह हम ऐसा नह समझते थे!” च दर कु छ नह बोला जाकर िबस रया
के सामने कु स पर बठै गया “तमु जाओ, िबनती!” िबनती चली गयी तो च दर ने कहा, बहत
ग भीर वर म, “िबस रया साहब, आपका सं ह देखकर बहत खुशी हई लेिकन मेरे मन म िसफ
एक शंका है यह 'िबनती' नाम के या माने ह?”
िबस रया ने अपने गले क टाई ठीक क , वह गरमी म भी टाई लगाता था, और िदन म नाइट कै प
पहनता था टाई ठीक कर, खँखारकर बोला, “म भी यही समझता था िक आपको यह गलत-

फहमी होगी लेिकन वा तिवक बात यह है िक मझु े म यकाल क किवता बहत पस द ह,ै
खासतौर म उसम िबनती ( ाथना) श द बड़ा मधुर है मने यह सं ह तो बहत पहले तयै ार
िकया था मझु े बड़ा ता जुब हआ जब म िबनती से िमला मने उनसे कहा िक यह सं ह भी
िबनती नाम का है िफर मने उ ह लाकर िदखला िदया ”

च दर मसु कराया और मन-ही-मन कहा, 'है िबस रया बहत चालाक लेिकन खरै म हार नह
मान सकता ' और बहत ग भीर होकर बठै गया

“तो यह सं ह इस लड़क के नाम पर नह ह?ै ”

“िब कु ल नह ”
“और िबनती के िलए आपके मन म कह कोई आकषण नह ?”

“िब कु ल नह िछः, आप मझु े या समझते ह ” िबस रया बोला
“िछः, म भी कै सा आदमी हँ, माफ करना िबस रया! मने यथ म शक िकया ”
िबस रया यह नह जानता था िक यह दाँव इतना सफल होगा वह खुशी से फू ल उठा सहसा
च दर ने एक गहरी साँस ली
“ या बात है च दर बाब?ू ” िबस रया ने पछू ा
“कु छ नह िबस रया, आज तक मझु े तु हारी ितभा, तु हारी भावना, तु हारी कला पर िव ास
था, आज से उठ गया ”

“ य ?”

“ य या? अगर िबनती-जसै ी लड़क के साथ रहकर भी तमु उसके आ त रक सौ दय से
अपनी कला को अिभिसंिचत न कर सके तो तु हारे मन म कला मकता ह;ै यह म िव ास नह
कर पाता तमु जानते हो, म पुराने िवचार का संक ण, बड़ा बुजुग तो हँ नह , म भी भावनाओं
को समझता हँ म सौ दय-पजू ा या यार को पाप नह समझता और मझु े तो बहत खुशी होती
यह जानकर िक तमु ने ये किवताएँ िबनती पर िलखी ह, उसक ेरणा से िलखी ह यह मत
समझना िक मझु े इससे जरा भी बुरा लगता यह तो कला का स य है पा ा य देश म तो
लोग हर किव को ेरणा देने वाली लड़िकय क खोज म वष िबता देते ह, उसक किवता से

यादा मह व उसक किवता के पीछे रहने वाले यि व को देते ह िह दो तान म पता नह

य हम नारी को इतना मह वहीन समझते ह, या डरते ह, या हमम इतना निै तक साहस नह

है तु हारा वभाव, तु हारी ितभा िकसी हालत म मझु े िवदेश के िकसी किव से कम नह
लगती मने सोचा था, जब तमु अपनी किवताओं के ेरणा मक यि व का नाम घोिषत
करोगे तो सारी दुिनया िबनती को और हमारे प रवार को जान जाएगी लेिकन खरै , मने गलत
समझा था िक िबनती तु हारी ेरणा-िब दु थी ” और च दर चुपचाप ग भीरता से िबस रया के
सं ह के पृ उलटने लगा
िबस रया के मन म िकतनी उथल-पुथल मची हई थी च दर का मन इतना िवशाल ह,ै यह उसे
कभी नह मालमू था यहाँ तो कु छ िछपाने क ज रत ही नह और जब च दर इतनी प
बात कर रहा है तो िबस रया य िछपाये

“कपरू , म तमु से कु छ नह िछपाऊँ गा म कह नह सकता िक िबनती जी मेरे िलए या ह
शे सिपयर क िमरा डा, साद क देवसेना, दाँते क बीएि स, क ट् स क फै नी और सरू क
राधा से बढ़कर माधुय अगर मझु े कह िमला है तो िबनती म इतना, इतना डू ब गया म िबनती

म िक एक किवता भी नह िलख पाया मेरा सं ह छपने जा रहा था तो मने सोचा िक इसका

नाम ही य न 'िबनती' रखँू ”
च दर ने बड़ी मिु कल से अपनी हँसी रोक दरवाजे के पास िछपी खड़ी हई िबनती
िखलिखलाकर हँस पड़ी च दर बोला, “नाम तो 'िबनती' बहत अ छा सोचा तमु ने, लेिकन
िसफ एक बात है मेरे जसै े िवचार के लोग सभी नह होते अगर घर के और लोग को यह

मालमू हो गया, मसलन डॉ टर साहब को, तो वह न जाने या कर डालगे इन लोग को
किवता और उसक ेरणा का मह व ही नह मालमू उस हालत म अगर तु हारी बहत बेइ जती
हई तो न हम कु छ बोल पाएँगे न िबनती डॉ टर साहब पुिलस को स प द, यह अ छा नह
लगता वसै े मेरी राय है िक तमु िबनती ही नाम रखो; बड़ा नया नाम ह;ै लेिकन यह समझ लो
िक डॉ टर साहब बहत स त ह इस मामले म ”

िबस रया क समझ म नह आता था िक वह या करे थोड़ी देर तक िसर खुजलाता रहा, िफर
बोला, “ या राय है कपरू , तु हारी? अगर म कोई दसू रा नाम रख दँू तो कै सा रहेगा?”
“बहत अ छा रहेगा और सुरि त रहेगा अभी अगर तमु बदनाम हो गये तो आगे तु हारी उ नित
के सभी माग ब द हो जाएँगे आदमी ेम करे मगर जरा सोच-समझकर; म तो इस प म हँ ”

“भावना को कोई नह समझता इस दुिनया म कोई नह समझता, हम कलाकार क िकतनी
मसु ीबत है ” एक गहरी साँस लेकर िबस रया बोला, “लेिकन खरै ! अ छा तो कपरू , या राय है
तु हारी? म या नाम रखँू इसका?”
च दर ग भीरता से िसर झकु ाये थोड़ी देर तक सोचता रहा िफर बोला, “तु हारी किवताओं म
बहत रस है कै सा रहे अगर तमु इसका नाम 'गड़े रयाँ' रखो!”
“ या?” िबस रया ता जुब से बोला
“हाँ-हाँ गड़े रयाँ, मेरा मतलब है ग ने क गड़े रयाँ!” दरवाजे के पीछे िबनती से न रहा गया और

िखलिखलाकर हँस पड़ी और सामने आ गयी च दर भी अ ïहास कर पड़ा

िबस रया ण-भर आँख फाड़े दोन क ओर देखता रहा उसके बाद वह य ही मजाक समझा,

उसका चेहरा लाल हो गया हटै उठाकर बोला, “अ छा, आप लोग मजाक बना रहे थे मेरा

कोई बात नह , म देखँगू ा िम टर कपरू , आप अपने को या समझते ह?” वह चल िदया
“अरे , सुनो िबस रया!” च दर ने पुकारा, वह हँसी नह रोक पा रहा था िबस रया मड़ु ा
मड़ु कर बोला, “कल से म पढ़ाने नह आ सकता म आपक शकल भी नह देखना चाहता ”
उसने िबनती से कहा

“तो महँु फे रकर पढ़ा दीिजएगा ” च दर बोला िबनती िफर हँस पड़ी िबस रया ने मडु क़र
बड़े गु से से देखा और परै पटकते हए चला गया
“बेचारे किव, कलाकार आज क दुिनया म यार भी नह कर पाते ” च दर ने कहा और दोन
क हँसी बहत देर तक गजँू ती रही

25

अग त क उदास शाम थी, पानी रमिझमा रहा था और डॉ टर शु ला के सनू े बँगले म बरामदे म
कु स डाले, लॉन पर छोटे-छोटे गड् ढ म पंख धोती और कु लेल करती हई गौरैय क तरफ
अपलक देखता हआ च दर जाने िकन खयाल म डू बा हआ था डॉ टर साहब सुधा को िलवाने
के िलए शाहजहाँपुर गये थे िबनती भी िजद करके उनके साथ गयी थी वहाँ से ये लोग
िद ली घमू ने के िलए चले गये थे लेिकन आज प ह रोज हो गये उन लोग का कोई भी खत
नह आया था डॉ टर साहब ने यरू ो को महज एक अज भेज दी थी च दर को डॉ टर
साहब के जाने के पहले ही कॉलेज म जगह िमल गयी थी और उसने लास लेने शु कर िदये
थे वह अब इसी बँगले म आ गया था सुबह तो लास के पाठ क तयै ारी करने और नोट् स
बनाने म कट जाती थी, दोपहर कॉलेज म कट जाती थी लेिकन शाम बड़ी उदास गजु रती थ और
िफर प ह िदन से सुधा का कोई भी खत नह आया वह उदास बठै ा सोच रहा था
लेिकन यह उदासी थी, दुख नह था और वह भी उदासी, एक देवता क उदासी जो दुख भरी न
होकर सु दर और सुकु मार अिधक होती है एक बात ज र थी जब कभी वह उदास होता था
तो जाने य वह यह हमेशा सोचने लगता था िक उसके जीवन म जो कु छ हो गया है उस पर उसे
गव करना चािहए जसै े वह अपनी उदासी को अपने गव से िमटाने का यास करता था लेिकन
इस व एक बात रह-रहकर उभर आती थी उसके मन म, 'सुधा ने खत य नह िलखा?'
पानी िब कु ल ब द हो गया था पि म के दो-एक बादल खुल गये थे और पके जामनु के रं ग
के एक बहत बड़े बादल के पीछे से डू बते सरू ज क उदास िकरण झाँक रही थ इधर क ओर
एक इ धनुष िखल गया था जो मोटर गरै े ज क छत से उठकर दरू पर युि ल टस क ल बी
शाख म उलझ गया था
इतने म छाता लगाये पो टमनै आया, उसने पोिटको म अपने जतू म लगी क चड़ झाड़ी, परै
पटके और िकरिमच के झोले से खत िनकाले और सीढ़ी पर फै ला िदये उनम से ढूँढ़कर तीन
िलफाफे िनकाले और च दर को दे िदये च दर ने लपककर िलफाफे ले िलये पहला िलफाफा
बुआ का था िबनती के नाम, दसू रा था ओ रयंटल इ योरे स का िलफाफा डॉ टर साहब के नाम
और तीसरा एक सु दर-सा नीला िलफाफा यह सुधा का होगा पो टमनै जा चुका था
उसने इतने यार से िलफाफे को चमू ा िजतने यार से डू बता हआ सरू ज नीली घटाओं को चमू रहा
था “पगली कह क ! परे शान कर डालती है यहाँ थी तो वही आदत, वहाँ है तो वही आदत
!” च दर ने मन म कहा और िलफाफा खोल डाला
िलफाफा प मी का था, मसरू ी से आया उसने झ लाकर िलफाफा फक िदया सुधा िकतनी
लापरवाह है वह जानती है िक च दर को यहाँ कै सा लग रहा होगा िबनती ने बता िदया
होगा िफर भी वही लापरवाही! मारे गु से के ...

थोड़ी देर बाद उसने प मी का खत पढ़ा छोटा-सा खत था प मी अभी मसरू ी म ही ह,ै
अ टू बर तक आएगी लगभग सभी या ी जा चुके ह लेिकन उसे पहाड़ क बरसात बहत अ छी
लग रही है बट इलाहाबाद चला गया है उसके साथ वहाँ से एक पहाड़ी ईसाई लड़क भी
गयी है बट कहता है िक वह उसके साथ शादी करे गा बट अब बहत व थ है च दर चाहे

तो जाकर बट से िमल ले

सुधा के खत के न आने से च दर के मन म बहत बेचनै ी थी उसे ठीक से मालमू भी नह हो पा
रहा था िक ये लोग ह कहाँ? बट के आने क खबर िमलने पर उसे स तोष हआ, चलो एक िदन
बट से ही िमल आएँगे, अब देख कै से ह वह?
तीसरे या चौथे िदन जब अक मात पानी ब द था तो वह कार लेकर बट के यहाँ गया बरसात
म इलाहाबाद क िसिवल लाइ स का सौ दय और भी िनखर आता है खे-सखू े फु टपाथ और
मदै ान पर घास जम जाती ह;ै बँगले क उजाड़ चहारदीवा रय तक हरी-भरी हो जाती ह ल बे
और घने पेड़ और झािडय़ाँ िनखरकर, धुलकर हरे मखमली रं ग क हो जाती ह और कोलतार क
सडक़ पर थोड़ी-थोड़ी पानी क चादर-सी लहरा उठती है िजसम पेड़ क हरी छायाएँ िबछ जाती
ह बँगले म पली हई ब ख के दल सड़क पर चलती हई मोटर को रोक लेते ह और हर बँगले
म से रे िडयो या ामोफोन के संगीत क लहर मचलती हई वातावरण पर छा जाती ह

कॉलेज से लौटकर, एक याला चाय पीकर, कार लेकर च दर बट के यहाँ चल िदया वह बहत
िदन बाद बट को देखने जा रहा है िजन यि य को उसने अपने जीवन म देखा था, बट

शायद उन सभी से िनराला था, अ ुत था लेिकन िकतना अभागा था नह , अभागा नह
कमजोर था बट और वही या कमजोर था यह सारी दुिनया िकतनी कमजोर है
बट का बँगला आ गया था वह उतरकर अ दर गया बाहर कोई नह था बरामदे म एक
िपंजरा टँगा हआ था िजसम एक बहत छोटा तोते का ब चा टँगा था च दर भीतर जाने म
िहचक रहा था य िक एक तो प मी नह थी और दसू रे कोई और लड़क भी बट के साथ आयी
थी, बट क भावी प नी च दर ने आवाज दी अ दर कोई बहत भारी पु ष- वर म एक
साधारण गीत गा रहा था च दर ने िफर आवाज दी बट बाहर आया च दर उसे देखकर

दंग रह गया, बट का चेहरा भर गया था, जवानी लौट आयी थी, पीलेपन क बजाय चेहरे पर

खनू दौड़ गया था, सीना उभर आया था बट खाक रं ग का कोट, बहत मोटा खाक हटै ,
खाक ि चेज, िशकारी बटू पहने हए था और क धे पर ब दकू लटक रही थी वह आया

ाइगं म के दरवाजे पर पीठ झकु ाकर एक हाथ से ब दकू पकडक़र और एक हाथ आँख के
आगे रखकर उसने इस तरह देखा जसै े वह िशकार ढूँढ़ रहा हो च दर के ाण सखू गये
उसने मन-ही-मन सोचा, पहली बार तो वह कु ती म बट से जीत गया था, लेिकन अबक बार
जीतना मिु कल है कहाँ बेकार फँ सा आकर उसने घबरायी हई आवाज म कहा-
“यह म हँ िम टर बट , च दर कपरू , प मी का िम !”
“हाँ-हाँ, म जानता हँ ” बट तनकर खड़ा हो गया और हँसकर बोला, “म आपको भलू ा नह ; म
तो आपको यह िदखला रहा था िक म पागल नह हँ, िशकारी हो गया हँ ” और उसने च दर के
क धे पकड़कर इतना जोर से झकझोर िदया िक च दर क पसिलयाँ चरमरा उठ “आओ!”
उसने च दर के क धे दबाकर बरामदे क ही कोच पर िबठा िदया और सामने कु स पर बठै ता
हआ बोला, “म तु ह अ दर ले चलता, लेिकन अ दर जेनी है और एक मेरा िम दोन बात कर

रहे ह आज जेनी क सालिगरह है तमु जेनी को जानते हो न? वह तराई के क बे म रहती
थी मझु े िमल गयी बहत खराब औरत ह!ै म त दु त हो गया हँ न!”
“बहत, मझु े ता जुब है िक त दु ती के िलए तमु ने या िकया तीन महीने तक!”
“नफरत, िम टर कपरू ! औरत से नफरत उससे यादा अ छा टॉिनक त दु ती के िलए कोई
नह है ”

“लेिकन तमु तो शादी करने जा रहे हो, लड़क ले आये हो वहाँ से ”
“अके ली लड़क नह , िम टर! म वहाँ से दो चीज लाया हँ एक तो यह तोते का ब चा और एक

जेनी, वही लड़क तोते को म बहत यार करता हँ, यह बड़ा हो जाएगा, बोलने लगेगा तो इसे

गोली मार दँगू ा और लड़क से म बहत नफरत करता हँ, इससे शादी कर लँगू ा! य , है न ठीक?
इसको िशकार का चाव कहते ह और अब म िशकारी हँ न!”

च दर हाँ कहे या न कहे अभी बट का िदमाग िब कु ल वसै ा ही ह,ै इसम कोई शक नह वह
या बात करे ? अ त म बोला-

“यह ब दकू तो उतारकर रिखए हमेशा बाँधे रहते ह!”
“हाँ, और या? िशकार का पहला िस ा त है िक जहाँ खतरा हो, जंगली जानवर ह वहाँ कभी

िबना ब दकू के नह जाना चािहए?” और बहत धीमे से च दर के कान म बट बोला, “तमु
जानते हो च दर, एक औरत है जो चौबीस घंटे घर म रहती है म तो एक ण को ब दकू अलग
नह रखता ”

सहसा अ दर से कु छ िगरने क आवाज आयी, कोई चीखा और लगा जसै े कोई चीज िपयानो पर
िगरी और परद को तोड़ती हई नीचे आ गयी िफर कु छ झगड़ क आवाज आयी
च दर च क उठा, “ या बात है बट , देखो तो!”

बट ने हाथ पकडक़र च दर को ख च िलया-”बठै ो, बठै ो! अ दर मेरे िम और जेनी सालिगरह

मना रहे ह, अ दर मत जाना!”

“लेिकन यह आवाज कै सी ह?” च दर ने िच ता से पछू ा
“शायद वे लोग ेम कर रहे ह गे!” बट बोला और िनि तता से बठै गया

और ण-भर बाद उसने अजब-सा य देखा एक बट का ही हमउ आदमी हाथ से माथे का

खनू प छता हआ आया वह नशे म चरू था और बहत भ ी गािलयाँ देता हआ चला जा रहा
था वह िगरता-पड़ता आया और उसने बट को देखते ही घँसू ा ताना-”तमु ने मझु े धोखा िदया
मझु से पचास पये उपहार ले िलया...म अभी तु ह बताता हँ ” च दर त ध था या करे या
न करे ? इतने म अ दर से जेनी िनकली ल बी-तगड़ी, कम-से-कम तीस वष क औरत

उसने आते ही पीछे से उस आदमी क कमीज पकड़ी और उसे सीढ़ी से नीचे क चड़ म ढके ल

िदया और सकै ड़ गाली देते हए बोली, “जा सीधे, वरना हड् डी नह बचेगी यहाँ ” वह िफर उठा
तो खुद भी नीचे कू द पड़ी और घसीटती हई दरवाजे के बाहर ढके ल आयी
बट साँस रोके अपराधी-सा खड़ा था वह लौटी और बट का कालर पकड़ िलया-”म िनद ष हँ!

म कु छ नह जानता!” सहसा जेनी ने च दर क ओर देखा-”हँ, यह भी तु हारा दो त है अभी
बताती हँ!” और जो वह च दर क ओर बढ़ी तो च दर ने मन-ही-मन प मी का मरण िकया

कहाँ फँ साया उस क ब त ने खत िलखकर य ही जेनी ने च दर का कालर पकड़ा िक बट

बड़े कातर वर म बोला, “उसे छोड़ दो! वह मेरा नह प मी का िम ह!ै ” जेनी क गयी “तमु

प मी के िम हो? अ छा बठै जाओ, बठै जाओ, तमु शरीफ आदमी मालमू पड़ते हो मगर आगे से
तु हारा कोई िम आया तो म उसक ह या कर डालँगू ी समझे िक नह , बट ?”
बट ने िसर िहलाया, “हाँ, समझ गये!” जेनी अ दर चल दी, िफर सहसा बाहर आयी और बट

को पकडक़र घसीटती हई बोली, “पानी बरस रहा ह,ै इतनी सद बढ़ रही है और तमु ने वेटर
नह पहना, चलो पहनो, मरने क ठानी है म साफ बताये देती हँ चाहे दुिनया इधर क उधर हो
जाये, म िबना शादी िकये मरने नह दँगू ी तु ह ” और वह बकरे क तरह बट का कान
पकडक़र अ दर घसीट ले गयी

च दर ने मन म कहा, यह कु छ इस रह यमय बँगले का असर है िक हरे क का िदमाग खराब ही
मालमू देता है दो िमनट बाद जब बट लौटा तो उसके गले म गलु ब द, ऊनी वेटर, ऊनी मोजे
थे वह हाँफता हआ आकर बठै गया

“िम टर कपरू ! तु ह मानना होगा िक यह लड़क , यह डाइन जेनी बहत ू र है ”
“मानता हँ, बट ! सोलह आने मानता हँ ” च दर ने मसु कराहट रोककर कहा, “लेिकन यह
झगड़ा या ह?ै ”

“झगड़ा या होता ह?ै औरत को समझना बहत मिु कल है ”
“इस औरत के फ दे म फँ से कै से तमु ?” च दर ने पछू ा
“शी! शी!” होठ पर हाथ रखकर धीरे बोलने का इशारा करते हए बट ने कहा, “धीरे बोलो

बात ऐसी हई िक जब म तराई म िशकार खेल रहा था तो एक बार अके ले छू ट गया! यह एक
पशनर फॉरे ट गाड क अन याही लड़क थी िशकार म बहत होिशयार म भटकते हए

पहँचा तो इसका बाप बीमार था म क गया तीसरे िदन वह मर गया उसे जाने कौन-सा

रोग था िक उसका चेहरा बहत डरावना हो गया था और पेट फू ल गया था रात को इसे बहत डर
लगा तो यह मेरे पास आकर लेट गयी बीच म ब दकू रखकर हम लोग सो गये रात को
इसने बीच से ब दकू हटा दी और अब वह कहती है िक मझु से याह करे गी और नह क ँ गा तो
मार डालेगी प मी भी मझु से बोली-तु ह अब याह करना ही होगा अब मजबरू ी ह,ै िम टर
कपरू !”
च दर चुप बठै ा सोच रहा था, कै सी िविच िजंदगी है इस अभागे क ! मानो कृ ित ने सारे आ य
इसी क िक मत के िलए छोड़ रखे थे िफर बोला-

“यह आज या झगड़ा था?”

“कु छ नह आज इसक सालिगरह थी यह बोली, “मझु े कु छ उपहार दो " म बहत देर तक
सोचता रहा या दँू इसे? कु छ समझ ही म नह आया बहत देर सोचने के बाद मने सोचा-म
तो इसका पित होने जा रहा हँ इसे एक ेमी उपहार म दे दँू मने एक िम से कहा िक तमु
मेरी भावी प नी से आज शाम को ेम कर सकते हो? वह राजी हो गया, म ले आया ”

च दर जोर से हँस पड़ा

“हँसो मत, हँसो मत, िम टर कपरू !” बट बहत ग भीर बनकर बोला, “इसका मतलब यह है िक
तमु औरत को समझते नह देखो, एक औरत उसी चीज को यादा पस द करती ह,ै उसी के
ित समपण करती है जो उसक िजंदगी म नह होता मसलन एक औरत है िजसका याह हो

गया ह,ै या होने वाला ह,ै उसे यिद एक नया ेमी िमल जाये तो उसक स नता का िठकाना

नह रहता वह अपने पित क बहत कम परवा करे गी अपने ेमी के सामने और अगर वाँरी

लड़क है तो वह अपने ेमी क भावनाओं क परू ी तौर से ह या कर सकती है यिद उसे एक पित
िमल जाये तो! म तो समझता हँ िक कोई भी पित अपनी प नी को यिद कोई अ छा उपहार दे
सकता है तो वह है एक नया ेमी और कोई भी ेमी अपनी रानी को यिद कोई अ छा उपहार दे
सकता है तो वह यह िक उसे एक पित दान कर दे तु हारी अभी शादी तो नह हई?”
“न!”
“तो तमु ेम तो ज र करते ह गे...न, िसर मत िहलाओ...म यक न नह कर सकता... म
इतनी सलाह तु ह दे रहा हँ, िक अगर तमु िकसी लड़क से यार करते हो तो ई र के वा ते
उससे शादी मत करना-तमु मेरा िक सा सुन चुके हो अगर िदल से यार करना चाहते हो और
चाहते हो िक वह लड़क जीवन-भर तु हारी कृ त रहे तो तमु उसक शादी करा देना...यह
लड़िकय के से स जीवन का अि तम स य ह.ै ..! हा! हा! हा!” बट हँस पड़ा
च दर को लगा जसै े आग क लपट उसे तपा रही है उसने भी तो यही िकया है सुधा के साथ
िजसे बट िकतने िविच वर म कह रहा है उसे लगा जसै े इस ेत-लोक म सारा जीवन
िवकृ त िदखाई देता है वहाँ साधना क पिव ता भी क चड़ और पागलपन म उलझकर गदं ी हो
जाती है िछः, कहाँ बट क बात और कहाँ उसक सुधा...
वह उठ खड़ा हआ ज दी से िवदा माँगकर इस तरह भागा जसै े उसके परै के नीचे अंगारे िछपे


िफर उसे न द नह आयी चनै नह आया रात को सोया तो वह बार-बार च क-सा उठा
उसने सपना देखा, एक बहत ब ा कपरू का पहाड़ है बहत बड़ा मलु ायम कपरू क बड़ी-बड़ी
च ान और इतनी पिव खुशबू िक आदमी क आ मा बेले का फू ल बन जाये वह और सुधा उन
सौरभ क च ान के बीच चढ़ रहे ह के वल वह है और सुधा...सुधा सफे द बादल क साड़ी
पहने है और च दर िकरन क चादर लपेटे है जहाँ-जहाँ च दर जाता ह,ै कपरू क च ान पर
इ धनुष िखल जाते ह और सुधा अपने बादल के आँचल म इ धनुष के फू ल बटोरती चलती
है
सहसा एक च ान िहली और उसम से एक भयंकर ेत िनकाला एक सफे द कं काल-िजसके
हाथ म अपनी खोपड़ी और एक हाथ म जलती मशाल और उस मडुं हीन कं काल ने खोपड़ी हाथ
म लेकर च दर को िदखायी खोपड़ी हँसी और बोली, “देखो, िजंदगी का अि तम स य यह
है यह!” और उसने अपने हाथ क मशाल ऊँ ची कर दी “यह कपरू का पहाड़, यह बादल क
साड़ी, यह िकरन का प रधान, यह इ धनुष के फू ल, यह सब झठू े ह और यह मशाल, जो
अपने एक पश म इस सबको िपघला देगी ”
और उसने अपनी मशाल एक ऊँ चे िशखर से छु आ दी वह िशखर धधक उठा िपघलती हई
आग क एक धार बरसाती नदी क तरह उमडक़र बहने लगी
“भागो, सुधा!” च दर ने चीखकर कहा, “भागो!”
सुधा भागी, च दर भागा और वह िपघली हई आग क महानदी लहराते हए अजगर क तरह उ ह
अपनी गजुं िलका म लपेटने के िलए चल पड़ी शतै ान हँस पड़ा, “हा! हा! हा!” च दर ने देखा,
सुधा शतै ान क गोद म थी
च दर च ककर जाग गया पानी बंद था लेिकन घनघोर अँधेरा था और िपशाचनी क तरह
पागल हवा पेड़ को झकझोर रही थी जसै े युग के जमे हए िव ास को उखाड़ फकना चाहती

हो च दर काँप रहा था, उसका माथा पसीने से तर था
वह उठकर नीचे आया उसके कदम ठीक नह पड़ रहे थे बरामदे क ब ी जलायी
महरािजन उठी-”का है भइया!” उसने पछू ा
“कु छ नह , अ दर सोऊँ गा ” च दर ने कहा और सुधा के कमरे म जाकर ब ी जलायी सुधा
क चारपाई पर लेट गया िफर उठा, चार ओर के दरवाजे ब द कर िदये िक कह कोई िफर
ऐसा सपना बाहर के भयंकर अँधेरे म से न चला आये

26

लेिकन बट क बात से अ दर-ही-अ दर उसके मन म जाने कहाँ या टू ट गया जो िफर बन
नह पाया अभी तक उसे अपने पर गव था, िव ास था, अब कभी-कभी वह अपने यि व
का िव े षण करने लगा था अब वह कभी-कभी अपने िव ास पर िसर ऊँ चा करने के बजाय
उ ह सामने फक देता और एक िनरपे वै ािनक क तरह उनक चीर-फाड़ करता, उनक शव-
परी ा िकया करता अभी तक उसके िव ास का स बल था, अब िकसी ने उसे तक का अ -
श दे िदया था जाने िकस रा सी ेरणा से उसने अपनी आ मा को चीरना शु िकया
और इस तक-िवतक और अिव ास के भयंकर जल- लय क एक लहर ने उसे एक िदन नरक
के िकनारे ले जा पटका
सुधा का खत आया था िद ली म पापा अपने कु छ काम से के थे और सुधा क तबीयत खराब
हो गयी थी अब वह दो-तीन रोज म आ जाएगी
लेिकन च दर के मन पर एक अजब-सा असर हआ था इस खत का सुधा का प नह आया
था, सुधा दरू थी तब वह खुश था, वह उ लिसत था सुधा का प आते ही सहसा वह उदास हो
गया उदास तो या उसे उबकाई-सी आने लगी उसे यह सब सहसा, पता नह एक नाटक-
सा लगने लगा था, एक बहत स ता, नीचे तर का नाटक उसे लगता था-ये सब चार ओर
का याग, साधन, सौ दय, यह सब झठू है सुधा भी अ ततोग वा वही साधारण लड़क है जो

वाँरे जीवन म पित और िववािहत जीवन म ेमी क भखू ी होती है
वह भी शतै ान से पणू तया हारा नह था वह लड़ने क कोिशश करता था लेिकन वह हार
रहा था, यह भी उसे मालमू था और च दर के िजस गव ने उसक जीत म साथ िदया था, वही
गव उसक हार म साथ दे रहा था उसने मन म सोच िलया िक वह सुधा से, सभी लड़िकय से,
इस सारे नाटक से नफरत करता है सुधा का िववाह होना ही था, सुधा को िववाह करना था,
सुधा के आँसू झठू े थे, अगर च दर सुधा को न भी समझाता तो घमू -िफर सुधा िववाह करती ही
तब िफर िव ास काहे का? याग काहे का?
िव ास टू ट चुका था, गव िजंदा था, गव घमडं म बदल गया था, घमडं नफरत म, और नफरत
नस को चरू -चरू कर देने वाली उदासी म
सुधा जब आयी तो उसने च दर को िब कु ल बदला हआ पाया एक बात और हई िजसने और भी
आग सुलगा दी यह लोग दोपहर को एक बजे के लगभग आये जबिक च दर कॉलेज गया
था पापा तो आते ही नहा-धोकर सोने चले गये सुधा और िबनती ने आते ही अपने कमरे क
सफाई शु क ; कमरे क सारी िकताब झाड़ , कपड़े ठीक िकये, मेज साफ क और उसके बाद
कमरा धोने म लग गय िबनती बा टी म पानी भर-भर लाने लगी और सुधा झाड़ से फश धोने
लगी हाथ म चड़ू े अब भी थे, पाँव म िबिछया और माँग म िस दरू -चेहरा बहत पीला पड़ गया था

सुधा का; चेहरे क हड् िडïयाँ िनकल आयी थ और आँख क रोशनी भी मलै ी पड़ गयी थी वह
जाने य कमजोर भी हो गयी थी

झाड़ लगाते-लगाते सुधा िबनती से बोली, “आज मालमू पड़ता है िक म आदमी हँ! कल तक तो
हवै ान थी पापा को भी जाने या सझू ा िक इ ह भी साथ िद ली ले गये म तो शरम से मरी
जाती थी ”

थोड़ी देर बाद च दर आया बाहर ही उसे मालमू हो गया था िक सब लोग आ गये ह उसे जाने
य ऐसा लग रहा था िक वह उलटे लौट जाये, वह अगर इस घर म गया तो जाने उससे या

अनथ हो जाएगा, लेिकन वह बढ़ता ही गया टडी- म म डॉ टर साहब सो रहे थे वह लौटा

और अपने कपड़े उतारने के िलए ाइगं - म क ओर चला सुधा ने य ही आहट पायी, वह
फौरन झाड़ फककर भागी, िसर खुला, धोती कमर म खँुसी हई, हाथ ग दे, बाल िबखरे और
बेतहाशा दौड़कर च दर से िलपट गयी और ब च क भोली हँसी हँसकर बोली, “च दर, च दर!

हम आ गये, अब बताओ!” और च दर को इस तरह कस िलया िक अब कभी छोड़ेगी नह

“िछः, दरू हटो, सुधा! यह या नाटक करती हो! आज तमु ब ची नह हो!” और सुधा को बड़ी
खाई से परे हटाकर अपने कोट पर से सुधा के हाथ से लगी हई िम ी झाड़ते हए च दर चुपचाप

अपने कमरे म चला गया

सुधा पर जसै े िबजली िगर पड़ी हो वह प थर क तरह खड़ी रही िफर जसै े लडख़ड़ाती हई
अपने कमरे म गयी और चारपाई पर लेटकर फू ट-फू टकर रोने लगी च दर सुधा से नह ही
बोला डॉ टर साहब के जगते ही उनसे बात करने लगा, शाम को वह साइिकल लेकर घमू ने
िनकल गया लौटकर ऊपर छत पर चला गया और िबनती को पुकारकर कहा, “अगर
तकलीफ न हो तो जरा ऊपर खाना दे जाओ ” िबनती ने थाली लगायी और सुधा से कहा, “लो
दीदी! दे आओ!” सुधा ने िसर िहलाकर कहा, “तू ही दे आ! म अब कौन रह गयी उनक ”
िबनती के बहत समझाने पर सुधा ऊपर खाना ले गयी च दर लेटा था गमु सुम सुधा ने टू ल
ख चकर खाना रखा च दर कु छ नह बोला उसने पानी रखा च दर कु छ नह बोला
“खाओ न!” सुधा ने कहा और एक कौर बनाकर च दर को देने लगी
“तमु जाओ!” च दर ने बड़े खे वर म कहा, “म खा लँगू ा!”
सुधा ने कौर थाली म रख िदया और च दर के पायताने बठै कर बोली, “च दर, तमु य नाराज
हो, बताओ हमसे या पाप हो गया ह?ै िपछले डेढ़ महीने हमने एक-एक ण िगन-िगनकर

काटे ह िक कब तु हारे पास आएँ हम या मालमू था िक तमु ऐसे हो गये हो मझु े जो चाहे
सजा दे लो लेिकन ऐसा न करो तमु तो कु छ भी नह समझते ” और सुधा ने च दर के परै
पर िसर रख िदया च दर ने परै झटक िदये, “सुधा, इन सब बात से फायदा नह है अब इस
तरह क बात करना और सुनना म भलू गया हँ कभी इस तरह क बात करते अ छा लगता
था अब तो िकसी सोहािगन के महँु से यह शोभा नह देता!”
सुधा ितलिमला उठी, “तो यह बात है तु हारे मन म! म पहले से समझती थी लेिकन तु ह ने
तो कहा था, च दर! अब तु ह ऐसे कह रहे हो? शरम नह आती तु ह ” और सुधा ने हाथ से
याह वाले चड़ू े उतारकर छत पर फक िदये, िबिछया उतारने लगी-और पागल क तरह फटी
आवाज म बोली, “जो तमु ने कहा, मने िकया, अब जो कहोगे वह क ँ गी यही चाहते हो न!”
और अ त म उसने अपनी िबिछया उतारकर छत पर फक दी

च दर काँप गया उसने इस य क क पना भी नह क थी “िबनती! िबनती!” उसने

घबराकर पुकारा और सुधा से बोला, “अरे , यह या कर रही हो! कोई देखेगा तो या सोचेगा!
पहनो ज दी से ”

“मझु े िकसी क परवा नह तु हारा तो जी ठंडा पड़ जाएगा!”
च दर उठा उसने जबरद ती सुधा के हाथ पकड़ िलये िबनती आ गयी थी
“लो, इ ह चड़ू े तो पहना दो!” िबनती ने चुपचाप चड़ू े और िबिछया पहना दी सुधा चुपचाप उठी
और नीचे चली गयी

च दर अपनी खाट पर िसर झकु ाये लि जत-सा बठै ा था
“लीिजए, खाना खा लीिजए ” िबनती बोली

“म नह खाऊँ गा ” च दर ने ँ धे गले से कहा

“खाइए, वरना अ छी बात नह होगी आप दोन िमलकर मझु े मार डािलए बस िक सा ख म
हो जाए न आप सीधे महँु से बोलते ह, न दीदी पता नह आप लोग को या हो गया ह?ै ”
च दर कु छ नह बोला
“खाइए, आपको हमारी कसम है वरना दीदी खाना नह खाएँगी! आपको मालमू नह , दीदी
क तबीयत इधर बहत खराब है उ ह सुबह-शाम बुखार रहता है िद ली म तबीयत बहत
खराब हो गयी थी आप ऐसे कर रहे ह बताइए, उनका या हाल होगा आप समझते ह गे

यह बहत सुखी ह गी लेिकन आपको या मालमू !...पहले आप दीदी के एक आँसू पर पागल हो
उठते थे, अब आपको या हो गया ह?ै ”

च दर ने िसर उठाया-और गहरी साँस लेकर बोला, “जाने या हो गया ह,ै िबनती! म कभी नह

सोचता था िक सुधा को म इतना दु:ख दे सकँू गा इतना अभागा हँ िक म खुद भी इधर घुलता
रहा और सुधा को भी इतना दुखी कर िदया और सचमचु च दर क आँख म आँसू भर आये
िबनती च दर के पीछे खड़ी थी च दर का िसर अपनी छाती म लगाकर आँसू प छती हई बोली,
“िछः, अब और दु:खी होइएगा तो दीदी और भी रोएँगी लीिजए, खाइए!”
“जाओ, दीदी को बुला लो और उ ह भी िखला दो!” च दर ने कहा िबनती गयी िफर
लौटकर बोली, “बहत रो रही ह अब आज उनका नशा उतर जाने दीिजए, तब कल बात

क िजएगा ”

“िफर सुधा ने न खाया तो?”
“नह , आप खा लीिजएगा तो वे खा लगी उनको िखलाए िबना म नह खाऊँ गी ” िबनती

बोली और अपने हाथ से कौर बनाकर च दर को देने लगी च दर ने खाना शु िकया और
धीरे -से गहरी साँस-लेकर बोला, “िबनती! तमु हमारी और सुधा क उस जनम क कौन हो?”
सुबह के व च दर जब ना ता करने बठै ा तो डॉ टर साहब के साथ ही बठै ा सुधा आयी और
याला रखकर चली गयी वह बहत उदास थी च दर का मन भर आया सुधा क उदासी
उसे िकतना लि जत कर रही थी, िकतना दुखी कर रही थी िदन-भर िकसी काम म उसक
तबीयत नह लगी उसने लास छोड़ िदये लाइ रे ी म भी जाकर िकताब उलट-पलटकर चला

आया उसके बाद ेस गया जहाँ उसे अपनी थीिसस छपने को देनी थी, उसके बाद ठाकु र साहब
के यहाँ गया लेिकन कह भी वह िटक नह पाया जब तक वह सुधा को हँसा न ले, सुधा के
आँसू सुखा न दे; उसे चनै नह िमलेगा

शाम को वह लौटा तो खाना तयै ार था िबनती से उसने पछू ा, “कहाँ है सुधा?” “अपनी छत
पर ” िबनती ने कहा च दर ऊपर गया पानी परस से बंद था और बादल भी खुले हए थे
लेिकन तेज पुरवयै ा चल रही थी तीज का चाँद शरमीली दु हन-सा बादल म महँु िछपा रहा
था हवा के तेज झकोर पर बादल उड़ रहे थे और कचनार बादल म तीज का धनुषाकार चाँद
आँखिमचौली खेल रहा था सुधा ने अपनी खाट बरसाती के बाहर ख च ली थी छत पर
धँुधला अँधेरा था और रह-रहकर सुधा पर चाँदनी के फू ल बरस जाते थे सुधा चुपचाप लेटी हई
बादल को देखती हई जाने या सोच रही थी

च दर गया च दर को देखते ही सुधा उठ खड़ी हई और उसने िबजली जला दी और चुपचाप
बठै गयी च दर बठै गया वह कु छ भी नह बोली बगल म िबछी हई िबनती क खाट पर
सुधा बठै गयी
च दर को समझ नह आता था िक वह या कहे सुधा को इतना दु:ख िदया उसने सुधा
उससे कल शाम से बोली तक नह

“सुधा, तमु नाराज हो गयी! मझु े जाने या हो गया था लेिकन माफ नह करोगी?” च दर ने
बहत काँपती हई आवाज म कहा सुधा कु छ नह बोली-चुपचाप बादल क ओर देखती रही
“सुधा?” च दर ने सुधा के दो कबतू र जसै े उजले मासमू परै को लेकर अपनी गोद म रख िलया
और भरे हए गले से बोला, “सुधा, मझु े जाने या हो जाता है कभी-कभी! लगता है वह पहले
वाली ताकत टू ट गयी म िबखर रहा हँ तमु आयी और तु हारे सामने मन का जाने कौन-सा
तफू ान फू ट पड़ा! तमु ने उसका इतना बुरा मान िलया बताओ, अगर तमु ही ऐसा करोगी तो मझु े
सँभालने वाला िफर कौन ह,ै सुधा?” और च दर क आँख से एक बँदू आँसू सुधा के पाँव पर चू
पड़ा सुधा ने च ककर अपने पाँव ख च िलये और उठकर च दर क खाट पर बठै गयी और
च दर के क धे पर िसर रखकर फू ट-फू टकर रो पड़ी बहत रोयी...बहत रोयी उसके बाद उठी
और सामने बठै गयी

“च दर! तमु ने गलत नह िकया म सचमचु िकतनी अपरािधन हँ मने तु हारी िजंदगी चौपट
कर दी है लेिकन म या क ँ ? िकसी ने तो मझु े कोई रा ता नह बताया था अब हो ही या
सकता ह,ै च दर! तमु भी बदा त करो और हम भी कर ” च दर नह बोला उसने सुधा के
हाथ अपने होठ से लगा िलये “लेिकन म तु ह इस तरह िबखरने नह दँगू ी! तमु ने अब अगर
इस तरह िकया तो अ छी बात नह होगी िफर हम तो बराबर हर पल तु हारे ही बारे म सोचते
रहे और तु हारी ही बात सोच-सोचकर अपने को धीरज देते रहे और तमु इस तरह करोगे तो...”
“नह सुधा, म अपने को टू टने नह दँगू ा तु हारा यार मेरे साथ है लेिकन इधर मझु े जाने

या हो गया था!”

“हाँ, समझ लो, च दर! तु ह हमारे सुहाग क लाज ह,ै हम िकतने दुखी ह, तमु समझ नह
सकते एक तु ह को देखकर हम थोड़ा-सा दुख-दद भलू जाते ह, सो तमु भी इस तरह करने
लगे! हम लोग िकतने अभागे ह!” और वह िफर चुपचाप लेटकर ऊपर देखती हई जाने या
सोचने लगी च दर ने एक बार धँुधली रे शमी चाँदनी म मरु झाये हए सोनजुही के फू ल-जसै े महँु
क ओर देखा और सुधा के नरम गलु ाबी होठ पर ऊँ गिलयाँ रख द थोड़ी देर वह आँसू म भीगे
हए गलु ाब क दुख-भरी पंख रय से उँगिलयाँ उलझाये रहा और िफर बोला-
“ या सोच रही थ ?” च दर ने बहत दुलार से सुधा के माथे पर हाथ फे रकर कहा सुधा एक

फ क हँसी हँसकर बोली-

“जसै े आज लेटी हई बादल को देख रही हँ और पास तमु बठै े हो, उसी तरह एक िदन कॉलेज म
दोपहर को म और गेसू लेटे हए बादल को देख रहे थे उस िदन उसने एक शेर सुनाया था
'कै फ बरदोश बादल को न देख, बेखबर तू कु चल न जाए कह ' उसका कहना िकतना सच
िनकला! भा य ने कहाँ ले जा पटका मझु े!”
“ य , वहाँ तु ह कोई तकलीफ तो नह ?” च दर ने पछू ा
“हाँ, समझते तो सब यही ह, लेिकन जो तकलीफ है वह म जानती हँ या िबनती जानती है ”

सुधा ने गहरी साँस लेकर कहा, “वहाँ आदमी भी बने रहने का अिधकार नह ”
“ य ?” च दर ने पछू ा
“ या बताएँ तु ह च दर! कभी-कभी मन म आता है िक डू ब म ँ ऐसा भी जीवन होगा मेरा,
यह कभी म नह सोचती थी ” सुधा ने कहा
“ या बात ह?ै बताओ न!” च दर ने पछू ा
“बता दँगू ी, देवता! तमु से भला या िछपाऊँ गी लेिकन आज नह , िफर कभी!”
सुधा ने कहा, “तमु परे शान मत हो कहाँ तमु , कहाँ दुिनया! काश िक कभी तु हारी गोद से
अलग न होती म!” और सुधा ने अपना महँु च दर क गोद म िछपा िलया चाँदनी क पंख रयाँ
बरस पड़

27

उ लास और रोशनी का मलय पवन िफर लौट आया था, िफर एक बार च दर, सुधा और िबनती
के ाण को िवभोर कर गया था िक सुधा को महीने-भर बाद ही जाना है और सुधा भलू गयी थी
िक शाहजहाँपुर से भी उसका कोई नाता है िबनती का इ तहान हो गया था और अकसर
च दर और सुधा िबनती के याह के िलए गहने और कपड़े खरीदने जाते िजंदगी िफर खुशी के
िह कोर पर झलू ने लगी थी िबनती का याह उतरते अगहन म होने वाला था अब दो-ढाई
महीने रह गये थे सुधा और च दर जाकर कपड़े खरीदते और लौटकर िबनती को जबरद ती
पहनाते और गिु डय़ा क तरह उसे सजाकर खबू हँसते दोन के बड़े-बड़े हौसले थे िबनती के
िलए सुधा िबनती को सलवार और चु नी का एक सेट और गरारा और कु रते का एक सेट देना
चाहती थी च दर िबनती को एक हीरे क अँगठू ी देना चाहता था च दर िबनती को बहत
नेह करने लगा था वह िबनती के याह म भी जाना चाहता था लेिकन गाँव का मामला,
का यकु ज क बारात शहर म सुधा, िबनती और च दर को िजतनी आजादी थी उतनी वहाँ
भला य कर हो सकती थी! िफर कहने वाल क जबान, कोई या कह बठै े! यही सब सोचकर
सुधा ने च दर को मना कर िदया था इसीिलए च दर यह िबनती को िजतने उपहार और
आशीवाद देना चाहता था, दे रहा था सुधा का बचपन लौट आया था और िदन-भर उसक
शरारत और िकलका रय से घर िहलता था सुधा ने च दर को इतनी ममता म डु बो िलया था
िक एक ण वह च दर को अपने से अलग नह रहने देती थी िजतनी देर च दर घर म रहता,
सुधा उसे अपने दुलार म, अपनी साँस क गरमाई म समेटे रहती थी, च दर के माथे पर हर ण
वह जाने िकतना नेह िबखेरती रहती थी!
एक िदन च दर आया तो देखा िक िबनती कह गयी है और सुधा चुपचाप बठै ी हई बहत-से पुराने
खत को सँभाल रही है एक ग भीर उदासी का बादल घर म छाया हआ है च दर आया
देखा, सुधा आँख म आँसू भरे बठै ी है
“ या बात ह,ै सुधा?”
“ खसती क िच ी आ गयी च दर, परस शंकर बाबू आ रहे ह ”
च दर के दय क धडक़न पर जसै े िकसी ने हथौड़ा मार िदया वह चुपचाप बठै गया “अब
सब ख म हआ, च दर!” सुधा ने बड़ी ही क ण मु कान से कहा, “अब साल-भर के िलए िवदा
और उसके बाद जाने या होगा?”
च दर कु छ नह बोला वह लेट गया और बोला, “सुधा, दु:खी मत हो आिखर कै लाश इतना
अ छा ह,ै शंकर बाबू इतने अ छे ह दुख िकस बात का? रहा म तो अब म सश रहँगा तमु
मेरे िलए मत घबराओ!”
सुधा एकटक च दर क ओर देखती रही िफर बोली, “च दर! तु हारे जसै े सब य नह होते?

तमु सचमचु इस दुिनया के यो य नह हो! ऐसे ही बने रहना, च दर मेरे ! तु हारी पिव ता ही मझु े
िज दा रख सके गी वना म तो िजस नरक म जा रही हँ...”

“तमु उसे नरक य कहती हो! मेरी समझ म नह आता!”
“तमु नह समझ सकते तमु अभी बहत दरू हो इन सब बात से, लेिकन...” सुधा बड़ी देर तक
चुप रही िफर खत सब एक ओर िखसका िदये और बोली, “च दर, उनम सबकु छ है वे बहत
अ छे ह, बहत खुले िवचार के ह, मझु े बहत चाहते ह, मझु पर कह से कोई ब धन नह , लेिकन
इस सारे वग का मोल जो देकर चुकाना पड़ता है उससे मेरी आ मा का कण-कण िव ोह कर
उठता है ” और सहसा घुटन म महँु िछपाकर रो पड़ी
च दर उठा और सुधा के माथे पर हाथ रखकर बोला, “िछः, रोओ मत सुधा! अब तो जसै ा ह,ै जो
कु छ भी ह,ै बदा त करना पड़ेगा ”
“कै से क ँ , च दर! वह इतने अ छे ह और इसके अलावा इतना अ छा यवहार करते ह िक म

उनसे या कहँ? कै से कहँ?” सुधा बोली
“जाने दो सुधी, जसै ी िजंदगी हो वसै ा िनबाह करना चािहए, इसी म सु दरता है और जहाँ तक
मेरा खयाल है ववै ािहक जीवन के थम चरण म ही यह नशा रहता ह,ै िफर िकसको यह सझू ता
है आओ, चलो चाय पीएँ! उठो, पागलपन नह करते परस चली जाओगी, लाकर नह

जाना होता उठो!” च दर ने अपने मन क जुगु सा पीकर ऊपर से बहत नेह से कहा
सुधा उठी और चाय ले आयी च दर ने अपने हाथ से एक कप म चाय बनायी और सुधा को
िपलाकर उसी म पीने लगा चाय पीते-पीते सुधा बोली-
“च दर, तमु याह मत करना! तमु इसके िलए नह बने हो ”
च दर सुधा को हँसाना चाहता था-”चल वाथ कह क ! य न क ँ याह? ज र क ँ गा!
और जनाब, दो-दो क ँ गा! अपने आप तो कर िलया और मझु े उपदेश दे रही ह!”
सुधा हँस पड़ी च दर ने कहा-
“बस ऐसे ही हँसती रहना हमेशा, हमारी याद करके और अगर रोयी तो समझ लो हम उसी तरह

िफर अशा त हो उठगे जसै े अभी तक थे!...” िफर याला सुधा के होठ से लगाकर बोला, “अ छा
सुधी, कभी तमु सुनो िक म उतना पिव नह रहा िजतना िक हँ तो तमु या करोगी? कभी मेरा
यि व अगर िबगड़ गया, तब या होगा?”

“होगा या? म रोकने वाली कौन होती हँ! म खुद ही या रोक पायी अपने को! लेिकन च दर,
तमु ऐसे ही रहना तु ह मेरे ाण क सौग ध ह,ै तमु अपने को िबगाडऩा मत ”
च दर हँसा, “नह सुधा, तु हारा यार मेरी ताकत है म कभी िगर नह सकता जब तक तमु
मेरी आ मा म गथँु ी हई हो ”
तीसरे िदन शंकर बाबू आये और सुधा च दर के परै क धलू माथे पर लगाकर चली गयी...इस
बार वह रोयी नह , शा त थी जसै े वध थल पर जाता हआ बेबस अपराधी

28

जब तक आसमान म बादल रहते ह तब तक झील म बादल क छाँह रहती है बादल के खुल
जाने के बाद कोई भी झील उनक छाँह को सुरि त नह रख पाती जब तक सुधा थी, च दर
क िजंदगी का िफर एक बार उ लास और उसक ताकत लौट आयी थी, सुधा के जाते ही वह िफर
सबकु छ खो बठै ा उसके मन म कोई थािय व नह रहा लगता था जसै े वह एक जलागार है
जो बहत गहरा ह,ै लेिकन िजसम हर चाँद, सरू ज, िसतारे और बादल क छाँह पड़ती है और उनके
चले जाने के बाद िफर वह उनका ितिब ब धो डालता है और बदलकर िफर वसै ा ही हो जाता
है कोई भी चीज पानी को रँ ग नह पाती, उसे छू नह पाती, हाँ, लहर म उनक छाया का प
िवकृ त हो जाता है
च दर को चार ओर क दुिनया सहज गजु रते हए बादल का िन सार तमाशा-सी लग रही थी
कॉलेज क चहल-पहल, ढलती हई बरसात का पानी, थीिसस और िड ी, बट का पागलपन और
प मी के खत-ये सभी उसके सामने आते और सपन क तरह गजु र जाते कोई चीज उसके
दय को छू न पाती ऐसा लगता था िक च दर एक खोखला यि है िजसम िसफ एक
सापे अ त:करण मा ह,ै कोई िनरपे आ मा नह और दय भी जसै े समा हो गया था एक
जलहीन ह के बादल क तरह वह हवा के हर झ के पर तरै रहा था लेिकन िटकता कभी भी
नह था उसक भावनाएँ, उसका मन, उसक आ मा, उसके ाण, उसका सबकु छ सो गया था
और वह जसै े न द म चल-िफर रहा था, न द म सबकु छ कर रहा था जाने के आठ-नौ रोज बाद
सुधा का खत आया-
“मेरे भा य!
म इस बार तु ह िजस तरह छोड़ आयी हँ उससे मझु े पल-भर को चनै नह िमलता अपने को तो
बेच चुक , अपने मन के मोती को क चड़ म फक चुक , तु हारी रोशनी को ही देखकर कु छ
स तोष है मेरे दीपक, तमु बुझना मत तु ह मेरे नेह क लाज है
मेरी िजंदगी का नरक िफर मेरे अंग म िभदना शु हो गया है तमु कहते हो िक जसै े हो िनबाह
करना चािहए तमु कहते हो िक अगर मने उनसे िनबाह नह िकया तो यह तु हारे यार का
अपमान होगा ठीक ह,ै म अपने िलए नह , तु हारे िलए िनबाह क ँ गी, लेिकन म कै से सँभालँू
अपने को? िदल और िदमाग बेबस हो रहे ह, नफरत से मेरा खनू उबला जा रहा है कभी-कभी
जब तु हारी सरू त सामने होती है तो जसै े अपना सुख-दुख भलू जाती हँ, लेिकन अब तो िजंदगी
का तफू ान जाने िकतना तेज होता जा रहा है िक लगता है तु ह भी मझु से ख चकर अलग कर
देगा
लेिकन तु ह अपने देव व क कसम ह,ै तमु मझु े अब अपने दय से दरू न करना तमु नह
जानते िक तु हारी याद के ही सहारे म यह नरक झेलने म समथ हँ तमु मझु े कह िछपा लो-म

या क ँ , मेरा अगं -अंग मझु पर यं य कर रहा ह,ै आँख क न द ख म है पाँव म इतना
तीखा दद है िक कु छ कह नह सकती उठते-बठै ते च कर आने लगा है कभी-कभी बदन
काँपने लगता है आज वह बरे ली गये ह तो लगता है म आदमी हँ तभी तु ह िलख भी रही
हँ तमु दुखी मत होना चाहती थी िक तु ह न िलखँू लेिकन िबना िलखे मन नह मानता
मेरे अपने! तमु ने तो यही सोचकर यहाँ भेजा था िक इससे अ छा लड़का नह िमलेगा लेिकन
कौन जानता था िक फू ल म क ड़े भी ह गे
अ छा, अब माँजी नीचे बुला रही ह...चलती हँ...देखो अपने िकसी खत म इन सब बात का िज
मत करना! और इसे फाड़कर फक देना

तु हारी अभािगन-सुधी ”
च दर को खत िमला तो एक बार जसै े उसक मू छा टू ट गयी उसने खत िलया और िबनती को
बुलाया िबनती हाथ म साग और डिलया िलये आयी और पास बठै गयी च दर ने वह खत
िबनती को दे िदया िबनती ने पढ़ा और च दर को वापस दे िदया और चुपचाप तरकारी काटने
लगी

वह उठा और चुपचाप अपने कमरे म चला गया थोड़ी देर बाद िबनती चाय लेकर आयी और
चाय रखकर बोली, “आप दीदी को कब खत िलख रहे ह?”

“म नह िलखँगू ा!” च दर बोला
“ य ?”

“ या िलखँू िबनती, कु छ समझ म नह आता!” कु छ झ लाकर च दर ने कहा िबनती चुपचाप
बठै गयी थोड़ी देर बाद च दर बड़े मलु ायम वर म बोला, “िबनती, एक िदन तमु ने कहा था
िक म देवता हँ, तु ह मझु पर गव है आज भी तु ह मझु पर गव ह?ै ”
“पहले से यादा!” िबनती बोली

“अ छा, ता जुब ह!ै ” च दर बोला, “अगर तमु जानती िक आजकल कभी-कभी म या सोचता हँ
तो तु ह ता जुब होता! तमु जानती तो, सुधा के इस खत से मझु े जरा-सा भी दुख नह हआ,
िसफ झ लाहट ही हई है म सोच रहा था िक य सुधा इतना वाँग भरती है दुख और अंत
का! िकस लड़क को यह सब पस द नह ? िकस लड़क के यार म शरीर का अशं नह होता?

लाख ितभाशािलनी लड़िकयाँ ह लेिकन अगर वे िकसी को यार करगी तो उसे अपनी ितभा

नह दगी, अपना शरीर ही दगी और यिद वह अ वीकार कर िलया जाय तो शायद ितिहंसा से

तड़प भी उठगी अब तो मझु े ऐसा लगने लगा िक से स ही यार ह,ै यार का मु य अशं ह,ै
बाक सभी कु छ उसक तयै ारी ह,ै उसके िलए एक समिु चत वातावरण और िव ास का िनमाण
करना ह.ै ..जाने य मझु े इस सबसे बहत नफरत होती जाती है अभी तक म से स और यार
को दो चीज समझता था, यार पर िव ास करता था, से स से नफरत, अब मझु े दोन ही एक
चीज लगती ह और जाने कै से अ िच-सी हो गयी है इस िजंदगी से तु हारी या राय ह,ै
िबनती?”

“मेरी? अरे , हम बे-पढ़े-िलखे आदमी, हम या आपसे बात करगे! लेिकन एक बात है यादा

पढऩा-िलखना अ छा नह होता ”

“ य ?” च दर ने पछू ा
“पढ़ने-िलखने से ही आप और दीदी जाने या- या सोचते ह! हमने देहात म देखा है िक वहाँ

लड़िकयाँ समझती ह िक उ ह या करना है इसिलए कभी इन सब बात पर अपना मन नह

िबगाड़त बि क मने तो देखा है सभी शादी के बाद मोटी होकर आती ह और दीदी अब

छोटी-सी नह िक ऐसी उनक तबीयत खराब हो जाय यह सब मन म घुटने का नतीजा है
जब यह होना ही है तो य दीदी दु:खी होती ह? उ ह तो और मोटी होना चािहए ” िबनती
बोली

इस सम या का इतना सरल समाधान सुनकर च दर को हँसी आ गयी
“अब तमु ससुराल जा रही हो मोटी होकर आना!”
“धत,् आप तो मजाक करने लगे!”
“लेिकन िबनती, तमु इस मामले म बड़ी िव ान मालमू देती हो अभी तक यह िव ा कहाँ
िछपा रखी थी?”

“नह , आप मजाक न बनाइए तो म सच बताऊँ िक देहाती लड़िकयाँ शहर क लड़िकय से

यादा होिशयार होती ह इन सब मामल म ”

“सच?” च दर ने पछू ा वह गाँव क िजंदगी को बेहद िनरीह समझता था
“हाँ और या? वहाँ इतना दुराव, इतना गोपन नह है सभी कु छ उनके जीवन का उ मु है
और याह के पहले ही वहाँ लड़िकयाँ सबकु छ...”
“अरे नह !” च दर ने बेहद ता जुब से कहा
“लो यक न नह होता आपको? मझु े कै से मालमू हआ इतना म आपसे कु छ नह िछपाती, वहाँ
तो सब लोग इसे इतना वाभािवक समझते ह िजतना खाना-पीना, हँसना-बोलना बस

लड़िकयाँ इस बात म सचेत रहती ह िक िकसी मसु ीबत म न फँ स!”
च दर चुपचाप बठै चाय पीता रहा आज तक वह िजंदगी को िकतना पिव मानता रहा था
लेिकन िजंदगी कु छ और ही है िजंदगी अब भी वह है जो सिृ के आर भ म थी...और दुिनया
िकतनी चालाक ह!ै िकतनी भुलावा देती ह!ै अ दर से मन म जहर िछपाकर भी होठ पर कै सी
अमतृ मयी मसु कान झलकाती रहती ह!ै यह िबनती जो इतनी शा त, संयत और भोली लगती थी,
इसम भी सभी गनु भरे ह इस दुिनया म? च दर ने िजंदगी को परखने म िकतना बड़ा धोखा
खाया है ...िजंदगी यह ह-ै मांसलता और यास और उसके साथ-साथ अपने को िछपाने क

कला

वह बठै ा-बठै ा सोचता रहा सहसा उसने पछू ा-
“िबनती, तमु भी देहात म रही हो और सुधा भी तमु लोग क िजंदगी म वह सब कभी आया?”
िबनती ण-भर चुप रही, िफर बोली, “ य , या नफरत करोगे सुनकर!”
“नह िबनती, िजतनी नफरत और अ िच िदल म आ गयी है उससे यादा आ सकती है भला!

बताना चाहो तो बता दो अब म िजंदगी को समझना चाहता हँ, वा तिवकता के तर पर!”

च दर ने ग भीरता से पछू ा
“मने आपसे कु छ नह िछपाया, न अब िछपाऊँ गी पता नह य दीदी से भी यादा आप पर
िव ास जमता जा रहा है सुधा दीदी क िजंदगी म तो यह सब नह आ पाया वे बड़ी िविच -
सी थ सबसे अलग रहती थ और पढ़त और कमल के पोखरे म फू ल तोड़ती थ , बस! मेरी
िजंदगी म...”

च दर ने चाय का याला िखसका िदया जाने िकस भाव से उसने िबनती के चेहरे क ओर

देखा वह शा त थी, िनिवकार थी और िबना िकसी िहचक के कहती जा रही थी

च दर चुप था िबनती ने अपने पाँव से च दर के पाँव क उँगिलयाँ दबाते हए पछू ा, “ या
सोच रहे ह आप? सुन रहे ह आप?”
“जाने दो, म नह सुनँगू ा लेिकन तमु मझु पर इतना िव ास य करती हो?” च दर ने
पछू ा
“जाने य ? यहाँ आकर मने दीदी के साथ आपका यवहार देखा िफर प मी वाली घटना

हई मेरे तन-मन म एक िविच -सी ा आपके िलए छा गयी जाने कै सी अ िच मेरे मन म

दुिनया के िलए थी, आपको देखकर म िफर व थ हो गयी ”
“ता जुब ह!ै तु हारे मन क अ िच दरू हो गयी दुिनया के ित और मेरे मन क अ िच बढ़
गयी कै से अ तिवरोध होते ह मन क िति याओं म! एक बात पछू ू ँ, िबनती! तमु मेरे इतने
समीप रही हो सकै ड़ बार ऐसा हआ होगा जो मेरे िवषय म तु हारे मन म शंका पदै ा कर देता,
तमु सकै ड़ बार मेरे िसर को अपने व पर रखकर मझु े सा वना दे चुक हो तमु मझु े बहत
यारी हो, लेिकन तमु जानती हो म तु ह यार नह करता हँ, िफर यह सब या ह,ै य ह?ै ”
िबनती चुप रही-”पता नह य ह?ै मझु े इसम कभी कोई पाप नह िदखा और कभी िदखा भी तो
मन ने कहा िक आप इतने पिव ह, आपका च र इतना ऊँ चा है िक मेरा पाप भी आपको छू कर
पिव हो जाएगा ”

“लेिकन िबनती...”

“बस?” िबनती ने च दर को टोककर कहा, “इससे अिधक आप कु छ मत पिू छए, म हाथ जोड़ती
हँ!”

च दर चुप हो गया

29

च दर िजतना सुलझाने का यास कर रहा था, चीज उतनी ही उलझती जा रही थ सुधा ने
िजंदगी का एक प च दर के सामने रखा था िबनती उसे दसू री दुिनया म ख च लायी
कौन सच ह,ै कौन झठू ? वह िकसका ितर कार करे , िकसको वीकार करे अगर सुधा गलती
पर है तो च दर का िज मा ह,ै च दर ने सुधा क ह या क ह.ै ..लेिकन िकतनी िभ न ह दोन
बहन! िबनती िकतनी यावहा रक, िकतनी यथाथ, संयत और सुधा िकतनी आदश, िकतनी
क पनामयी, िकतनी सू म, िकतनी ऊँ ची, िकतनी सुकु मार और पिव
जीवन क सम याओं के अ तिवरोध म जब आदमी दोन प को समझ लेता है तब उसके मन
म एक ठहराव आ जाता है वह भावना से ऊपर उठकर व छ बौि क धरातल पर िजंदगी को
समझने क कोिशश करने लगता है च दर अब भावना से हटकर िजंदगी को समझने क
कोिशश करने लगा था वह अब भावना से डरता था भावना के तफू ान म इतनी ठोकर
खाकर अब उसने बुि क शरण ली थी और एक पलायनवादी क तरह भावना से भाग कर बुि
क एकांिगता म िछप गया था कभी भावुकता से नफरत करता था, अब वह भावना से ही
नफरत करने लगा था इस नफरत का भोग सुधा और िबनती दोन को ही भुगतना पड़ा
सुधा को उसने एक भी खत नह िलखा और िबनती से एक िदन भी ठीक से बात नह क
जब भावना और सौ दय के उपासक को बुि और वा तिवकता क ठेस लगती है तब वह सहसा
कटु ता और यं य से उबल उठता है इस व च दर का मन भी कु छ ऐसा ही हो गया था
जाने िकतने जहरीले काँटे उसक वाणी म उग आये थे, िज ह वह कभी भी िकसी को चुभाने से
बाज नह आता था एक िनमम िनरपे ता से वह अपने जीवन क सीमा म आने वाले हर
यि को कटु ता के जहर से अिभिष करता चलता था सुधा को वह कु छ िलख नह सकता
था प मी यहाँ थी नह , ले-देकर बची अके ली िबनती िजसे इन जहरीले वाण का िशकार होना
पड़ रहा था िसत बर बीत रहा था और अब वह गाँव जाने क तयै ारी कर रही थी डॉ टर
साहब ने िदस बर तक क छु ी ली थी और वे भी गाँव जाने वाले थे शादी के महीने-भर पहले
से उनका जाना ज री था
च दर खुश नह था, नाराज नह था एक वग देवदतू िजसे िपशाच ने खरीद िलया हो,
उ ह क तरह वह िजंदगी के सुख-दु:ख को ठोकर मारता हआ िकनारे खड़ा सभी पर हँस रहा
था खास तौर से नारी पर उसके मन का सारा जहर िबखरने लगा था और उसम उसे यह भी
अकसर यान नह रहता था िक वह िकससे या बात कर रहा है िबनती सबकु छ चुपचाप
सहती जा रही थी, िबनती को सुधा क तरह रोना नह आता था; न उसक च दर इतनी परवा
ही करता था िजतनी सुधा क दोन म बात भी बहत कम होती थ , लेिकन िबनती मन-ही-
मन दु:खी थी वह या करे ! एक िदन उसने च दर के परै पकड़कर बहत अनुनय से

कहा-”आपको यह या होता जा रहा ह?ै अगर आप ऐसे ही करगे तो हम दीदी को िलख दगे!”
च दर बड़ी भयावनी हँसी हँसा-”दीदी को या िलखोगी? मझु े अब उसक परवा नह वह िदन
गये, िबनती! बहत बन िलये हम ”

“हाँ, च दर बाब,ू आप लड़क होते तो समझते!”
“सब समझता हँ म, कै सा दोहरा नाटक खेलती ह लड़िकयाँ! इधर अपराध करना, उधर मखु िबरी
करना ”

िबनती चुप हो गयी एक िदन जब च दर कॉलेज से आया तो उसके िसर म दद हो रहा था
वह आकर चुपचाप लेट गया िबनती ने आकर पछू ा तो बोला, “ य , य म बतलाऊँ िक या
ह,ै तमु िमटा दोगी?”
िबनती ने च दर के िसर पर हाथ रखकर कहा, “च दर, तु ह या होता जा रहा ह?ै देखो कै सी
हड् िडयाँ िनकल आयी ह इधर इस तरह अपने को िमटाने से या फायदा?”
“िमटाने से?” च दर उठकर बठै गया-”म िमटाऊँ गा अपने को लड़िकय के िलए? िछः, तमु लोग
अपने को या समझती हो? या है तमु लोग म िसवा एक नशीली मांसलता के ? इसके िलए म
अपने को िमटाऊँ गा?”

िबनती ने च दर को िफर िलटा िदया

“इस तरह अपने को धोखा देने से या फायदा, च दर बाब?ू म जानती हँ दीदी के न होने से
आपक िजंदगी म िकतना बड़ा अभाव है लेिकन...”

“दीदी के न होने पर? या मतलब है तु हारा?”
“मेरा मतलब आप खबू समझते ह म जानती हँ, दीदी होत तो आप इस तरह न िमटाते अपने
को म जानती हँ दीदी के िलए आपके मन म या था?” िबनती ने िसर म तेल डालते हए

कहा

“दीदी के िलए या था?” च दर हँसा, बड़ी िविच हँसी-”दीदी के िलए मेरे मन म एक

आदशवादी भावुकता थी जो अधकचरे मन क उपज थी, एक ऐसी भावना थी िजसके औिच य
पर ही मझु े िव ास नह , वह एक सनक थी ”
“सनक!” िबनती थोड़ी देर तक चुपचाप िसर म तेल ठ कती रही िफर बोली, “अपनी साँस से
बनायी देवमिू त पर इस तरह लात तो न मा रए आपको शोभा नह देता!” िबनती क आँख म
आँसू आ गये, “िकतनी अभागी ह दीदी!”
च दर एकटक िबनती क ओर देखता रहा और िफर बोला, “म अब पागल हो जाऊँ गा, िबनती!”

“म आपको पागल नह होने दँगू ी म आपको छोडक़र नह जाऊँ गी ”
“मझु े छोडक़र नह जाओगी!” च दर िफर हँसा-”जाइए आप! अब आप ीमती िबनती होने वाली
ह आपका याह होगा म पागल हो रहा हँ, इससे या हआ? इन सब बात से दुिनया नह

कती, शहनाइयाँ नह बंद होत , ब दनवार नह तोड़े जाते!”

“म नह जाऊँ गी च दर अभी, तमु मझु े नह जानते तु हारी इतनी ताड़ना और यं य सहकर
भी तु हारे पास रही, अब दुिनया-भर क लांछना और यं य सहकर तु हारे पास रह सकती
हँ ” िबनती ने तीखे वर म कहा

“ य ? तु हारे रहने से या होगा? तमु सुधा नह हो तमु सुधा नह हो सकती! जो सुधा है मेरी
िजंदगी म, वह कोई नह हो सकता समझ ? और मझु पर एहसान मत जताओ! म मर जाऊँ , म

पागल हो जाऊँ , िकसी का साझा! य तमु मझु पर इतना अिधकार समझने लग -अपनी सेवा के
बल पर? म इसक र ी-भर परवा नह करता जाओ, यहाँ से!” और उसने िबनती को धके ल

िदया, तेल क शीशी उठाकर बाहर फक दी

िबनती रोती हई चली गयी च दर उठा और कपड़े पहनकर बाहर चल िदया, “हँ, ये लड़िकयाँ

समझती ह अहसान कर रही ह मझु पर!”
िबनती के जाने क तयै ारी हो गयी थी और िलया-िदया जाने वाला सारा सामान पकै हो रहा

था डॉ टर साहब भी महीने-भर क छु लेकर साथ जा रहे थे उस िदन क घटना के बाद
िफर िबनती च दर से िब कु ल ही नह बोली थी च दर भी कभी नह बोला
ये लोग कार पर जाने वाले थे सारा सामान पीछे-आगे लादा जाने वाला था डॉ टर साहब

कार लेकर बाजार गये थे च दर उनका हो डॉल सँभाल रहा था िबनती आयी और बोली, “म

आपसे बात कर सकती हँ?”

“हाँ, हाँ! तमु उस िदन क बात का बुरा मान गय ! अममू न लड़िकयाँ स ची बात का बुरा मान
जाती ह! बोलो, या बात ह?ै ” च दर ने इस तरह कहा जसै े कु छ हआ ही न हो
िबनती क आँख म आँसू थे, “च दर, आज म जा रही हँ!”
“हाँ, यह तो मालमू ह,ै उसी का इ तजाम कर रहा हँ!”
“पता नह मने या अपराध िकया च दर िक तु हारा नेह खो बठै ी ऐसा ही था च दर तो
आते ही आते इतना नेह तमु ने िदया ही य था?...म तमु से कभी भी दीदी का थान नह माँग
रही थी...तमु ने मझु े गलत य समझा?”
“नह , िबनती! म अब नेह इ यािद पस द नह करता हँ पणू प रप व मनु य हँ और ये सब
भावनाएँ अब अ छी नह लगत मझु े नेह वगरै ह क दुिनया अब मझु े बड़ी उथली लगती ह!ै ”
“तभी च दर! इतने िदन मने रोते-रोते िबताये तमु ने एक बार पछू ा भी नह िजंदगी म िसवा
दीदी और तु हारे , कौन था? तमु ने मेरे आँसुओं क परवा नह क तु ह कसरू नह देती; कसरू
मेरा ही होगा, च दर!”

“नह , कसरू क बात नह िबनती! औरत के रोने क कहाँ तक परवा क जाए, वे कु े, िब ली
तक के िलए उतने ही दु:ख से रोती ह ”
“खरै , च दर! ई र करे तमु जीवन-भर इतने मजबतू रहो मने अगर कभी तु हारे िलए कु छ
िकया, वसै े िकया भी या, लेिकन अगर कु छ भी िकया तो िसफ इसिलए िक मेरे मन क जाने
िकतनी ममता तमु ने जीत ली, या म हमेशा इस बात के िलए पागल रहती थी िक तु ह जरा-सी
भी ठेस न पहँचे, म या कर डालँू तु हारे िलए तमु ने, तु हारे यि व ने मझु े जादू म बाँध
िलया था तमु मझु से कु छ भी करने के िलए कहते तो म िहचक नह सकती थी-लेिकन खरै ,
तु ह मेरी ज रत नह थी तमु पर भार हो उठती थी म मने अपने को ख च िलया, अब कभी
तु हारे जीवन म आने का साहस नह क ँ गी यह भी कै से कहँ िक कभी तु ह मेरी ज रत
पड़ेगी म जानती हँ िक तु हारे तफू ानी यि व के सामने म बहत तु छ हँ, ितनके से भी
तु छ लेिकन आज जा रही हँ, अब कभी यहाँ आने का साहस न क ँ गी लेिकन या चलते
व आशीवाद भी न दोगे? कु छ आगे का रा ता न बताओगे?”
िबनती ने झकु कर च दर के परै पकड़ िलये और िससक-िससककर रोने लगी च दर ने
िबनती को उठाया और पास क कु स पर िबठा िदया और िसर पर हाथ रखकर बोला, “आशीवाद


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