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Published by arunyadavyes, 2020-10-07 08:47:24

Copy of कर्मभूमि

Copy of कर्मभूमि

कर्मभर्मभमूिमभ

प्रेमभचदं

1 www.hindustanbooks.com

हमारे स्कलू ों और कॉलेजों में िजस तत्परता से फीस वसूल की जाती ह, शायद मालगुजारी भी उतनी

सख्ती से नहीं वसलू की जाती। महीने में एक िदन िनयत कर िदया जाता ह। उस िदन फीस का दािखिला होना
अनिनवायर्य ह। या तो फीस दीिजए, या नाम कटवाइए, या जब तक फीस न दािखिल हो, रोज कुछ जमु ाना दीिजए।
कहीं-कहीं ऐसा भी िनयम ह िक उसी िदन फीस दुगनु ी कर दी जाती ह, और िकसी दूसरी तारीखि को दुगनु ी फीस
न दी तो नाम कट जाता ह। काशी के क्वीन्स कॉलेज में यही िनयम था। सातवीं तारीखि को फीस न दो , तो
इक्कीसवीं तारीखि को दुगुनी फीस देनी पड़ती थी, या नाम कट जाता था। ऐसे कठोर िनयमों का उद्देश्य इसके
िसवा और क्या हो सकता था, िक गरीबों के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जाएं- वही हृदयहीन दफ्तरी शासन, जो
अनन्य िवभागों में ह, हमारे िशक्षालयों में भी ह। वह िकसी के साथ िरयायत नहीं करता। चाहे जहां से लाओ, कजय्र
लो, गहने िगरवी रखिो, लोटा-थाली बेचो, चोरी करो, मगर फीस जरूर दो, नहीं दूनी फीस देनी पड़गे ी, या नाम
कट जाएगा। जमीन और जायदाद के कर वसूल करने में भी कुछ िरयायत की जाती ह। हमारे िशक्षालयों में नमी
को घुसने ही नहीं िदया जाता। वहां स्थायी रूप से माश्रलय -लॉ का व्यवहार होता ह। कचहरी में पैसे का राज ह,
हमारे स्कूलों में भी पसै े का राज ह, उससे कहीं कठोर, कहीं िनदर्यय । देर में आइए तो जुमाना न आइए तो जुमाना
सबक न याद हो तो जुमाना िकताबें न खिरीद सिकए तो जुमाना कोई अनपराध हो जाए तो जमु ाना िशक्षालय क्या
ह, जुमानालय ह। यही हमारी पिश्चिमी िशक्षा का आदशय्र ह, िजसकी तारीफों के पलु बांधे जाते हैं। यिद ऐसे
िशक्षालयों से पसै े पर जान देने वाले, पैसे के िलए गरीबों का गला काटने वाले, पैसे के िलए अनपनी आत्मा बेच
देने वाले छात्र िनकलते हैं, तो आश्चिय्यर क्या ह-

आज वही वसलू ी की तारीखि ह। अनधयापकों की मेजों पर रुपयों के ढरे लगे हैं। चारों तरफ खिनाखिन की
आवाजें आ रही हैं। सराफे में भी रुपये की ऐसी झंकार कम सुनाई देती ह। हरेक मास्टर तहसील का चपरासी
बना बठै ा हुआ ह। िजस लड़के का नाम पुकारा जाता ह, वह अनधयापक के सामने आता ह, फीस देता ह और
अनपनी जगह पर आ बैठता ह। माच्रय का महीना ह। इसी महीने में अनप्रलै , मई और जनू की फीस भी वसलू की जा
रही ह। इम्तहान की फीस भी ली जा रही ह। दसवें दजर्जे में तो एक-एक लड़के को चालीस रुपये देने पड़ रहे हैं।

अनधयापक ने बीसवें लड़के का नाम पकु ारा-अनमरकान्त

अनमरकान्त गैरहािजर था।

अनधयापक ने पछू ा-क्या अनमरकान्त नहीं आया?

एक लड़के ने कहा-आए तो थ, शायद बाहर चले गए हों।

'क्या फीस नहीं लाया ह?'

िकसी लड़के ने जवाब नहीं िदया।

अनधयापक की मदु ्रा पर खेद की रेखिा झलक पड़ी। अनमरकान्त अनच्छे लड़कों में था। बोले-शायद फीस लाने
गया होगा। इस घंटे में न आया, तो दूनी फीस देनी पड़ेगी। मेरा क्या अनिख्तयार ह- दूसरा लड़का चले-
गोवध्रनय दास

सहसा एक लड़के ने पछू ा-अनगर आपकी इजाजत हो, तो मैं बाहर जाकर देखिंू?

अनधयापक ने मसु ्कराकर कहा-घर की याद आई होगी। खिरै , जाओ मगर दस िमनट के अनदं र आ जाना।

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लडकों को बलु ा-बलु ाकर फीस लेना मेरा काम नहीं ह।

लड़के ने नम्रता से कहा-अनभी आता हूं। कसम ले लीिजए, जो हाते के बाहर जाऊ।ं

यह इस कक्षा के संपन्न लड़कों में था, बड़ा िखिलाड़ी, बड़ा बठै कबाज। हािजरी देकर गायब हो जाता, तो
शाम की खिबर लाता। हर महीने फीस की दूनी रकम जुमाना िदया करता था। गोरे रगं का , लबं ा, छरहरा शौकीन
युवक था। िजसके प्राण खेल में बसते थ। नाम था मोहम्मद सलीम।

सलीम और अनमरकान्त दोनों पास-पास बठै ते थ। सलीम को िहसाब लगाने या तज्मरुय ा करने में अनमरकान्त
से िवशेष सहायता िमलती थी। उसकी कापी से नकल कर िलया करता था। इससे दोनों में दोस्ती हो गई थी।
सलीम किव था। अनमरकान्त उसकी गजलें बड़े चाव से सुनता था। मैत्री का यह एक और कारण था।

सलीम ने बाहर जाकर इधर-उधर िनगाह दौड़ाई, अनमरकान्त का कहीं पता न था। जरा और आगे बढ।े , तो
देखिा, वह एक वृक्ष की आड़ में खिड़ा ह। पुकारा-अनमरकान्त ओ बधु ्दू लाल चलो, फीस जमा कर। पंिडतजी िबगड़
रहे हैं।

अनमरकान्त ने अनचकन के दामन से आंखें पोंछ लीं और सलीम की तरफ आता हुआ बोला-क्या मेरा नबं र आ
गया?

सलीम ने उसके महुं की तरफ देखिा, तो उसकी आंखें लाल थीं। वह अनपने जीवन में शायद ही कभी रोया हो
चौंककर बोला-अनरे तुम रो रहे हो क्या बात ह-

अनमरकान्त सांवले रंग का, छोटा-सा दुबला-पतला कुमार था। अनवस्था बीस की हो गई थी पर अनभी मस
भी न भीगी थीं। चौदह-पदं ्रह साल का िकशोर-सा लगता था। उसके मखु ि पर एक वेदनामय दढृ ़ता, जो िनराशा से
बहुत कुछ िमलती-जुलती थी, अनंिकत हो रही थी, मानो संसार में उसका कोई नहीं ह। इसके साथ ही उसकी मुद्रा
पर कुछ ऐसी प्रितभा, कछु ऐसी मनिस्वता थी िक एक बार उसे देखिकर िफर भलू जाना किठन था।

उसने मसु ्कराकर कहा-कछु नहीं जी, रोता कौन ह-

'आप रोते हैं, और कौन रोता ह। सच बताओ क्या हुआ?'

अनमरकान्त की आंखें िफर भर आइ।ं लाखि यत्न करने पर भी आंसू न रूक सके। सलीम समझ गया। उसका
हाथ पकड़कर बोला-क्या फीस के िलए रो रहे हो- भले आदमी, मुझसे क्यों न कह िदया- तुम मझु े भी गैर
समझते हो। कसम खिदु ा की, बड़े नालायक आदमी हो तुम। ऐसे आदमी को गोली मार देनी चािहए दोस्तों से भी
यह गिै रयत चलो कल्ास में, मैं फीस िदए देता हूं। जरा-सी बात के िलए घटं े-भर से रो रहे हो। वह तो कहो मैं आ
गया, नहीं तो आज जनाब का नाम ही कट गया होता।

अनमरकान्त को तसल्ली तो हुई पर अननुग्रह के बोझ से उसकी गद्नरय दब गई। बोला -पंिडतजी आज मान न
जाएगं े?

सलीम ने खिड़े होकर कहा-पिं डतजी के बस की बात थोड़े ही ह। यही सरकारी कायदा ह। मगर हो तुम बड़े
शैतान, वह तो खिैिरयत हो गई, मैं रुपये लेता आया था, नहीं खिूब इम्तहान देते। देखिो, आज एक ताजा गजल कही
ह। पीठ सहला देना :

आपको मेरी वफा याद आई,

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खिैर ह आज यह क्या याद आई।
अनमरकान्त का व्यिथत िचत्ता इस समय गजल सुनने को तयै ार न था पर सुने बगरै काम भी तो नहीं चल
सकता। बोला-नाजकु चीज ह। खिबू कहा ह। मैं तुम्हारी जबान की सफाई पर जान देता हू।ं
सलीम-यही तो खिास बात ह, भाई साहब लफ्जों की झंकार का नाम गजल नहीं ह। दूसरा शेर सनु ो :
िफर मेरे सीने में एक हूक उठी,
िफर मझु े तेरी अनदा याद आई।
अनमरकान्त ने िफर तारीफ की-लाजवाब चीज ह। कसै े तुम्हें ऐसे शेर सूझ जाते हैं-
सलीम हसं ा-उसी तरह, जसै े तमु ्हें िहसाब और मजमून सूझ जाते हैं। जसै े एसोिसएशन में स्पीचें दे लेते हो।
आओ, पान खिाते चलें।
दोनों दोस्तों ने पान खिाए और स्कलू की तरफ चले। अनमरकान्त ने कहा-पिं डतजी बड़ी डांट बताएंगे।
'फीस ही तो लेंगे'
'और जो पूछें, अनब तक कहां थ?'
'कह देना, फीस लाना भलू गया था।'
'मझु से न कहते बनेगा। मैं साफ-साफ कह दूंगा।'
तो तुम िपटोगे भी मेरे हाथ से'
संध्या समय जब छुट्टी हुई और दोनों िमत्र घर चले, अनमरकान्त ने कहा-तुमने आज मुझ पर जो एहसान
िकया ह...
सलीम ने उसके मुहं पर हाथ रखिकर कहा-बस खिबरदार, जो मुंह से एक आवाज भी िनकाली। कभी
भलू कर भी इसका िजक्र न करना।
'आज जलसे में आओगे?'
'मजमनू क्या ह, मझु े तो याद नहीं?'
'अनजी वही पिश्चिमी सभ्यता ह।'
'तो मुझे दो-चार प्वाइंट बता दो, नहीं तो मैं वहां कहूंगा क्या?'
'बताना क्या ह- पिश्चिमी सभ्यता की बुराइयां हम सब जानते ही हैं। वही बयान कर देना।'
'तमु जानते होगे, मझु े तो एक भी नहीं मालमू ।'
'एक तो यह तालीम ही ह। जहां देखिो वहीं दूकानदारी। अनदालत की दूकान, इल्म की दूकान, सेहत की
दूकान। इस एक प्वाइटं पर बहुत कछु कहा जा सकता ह।'
'अनच्छी बात ह, आऊंगा।

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