भोजन आ गया। दोनों खिाने लगे।
अनभी दो-चार कौर ही खिाए होंगे िक दरबान ने लाला समरकान्त के आने की खिबर दी। अनमरकान्त झट मेज
पर से उठ खिड़ा हुआ, कुल्ला िकया, अनपने प्लेट मेज के नीचे िछपाकर रखि िदए और बोला-इन्हें कसै े मेरी खिबर
िमल गई- अनभी तो इतनी देर भी नहीं हुई। जरूर बुिढ़या ने आग लगा दी।
सलीम मसु ्करा रहा था।
अनमर ने त्यौिरयां चढ़ाकर कहा-यह तमु ्हारी शरारत मालूम होती ह। इसीिलए तमु मुझे यहां लाए थ-
आिखिर क्या नतीजा होगा- मिु त की िजल्लत होगी मेरी। मुझे जलील कराने से तमु ्हें कुछ िमल जाएगा- मैं इसे
दोस्ती नहीं, दुश्मनी कहता हू।ं
तांगा द्वार पर रूका और लाला समरकान्त ने कमरे में कदम रखिा।
सलीम इस तरह लालाजी की ओर देखि रहा था, जैसे पूछ रहा हो, मैं यहां रहूं या जाऊं- लालाजी ने उसके
मन का भाव ताड़कर कहा-तमु क्यों खिड़े हो बेटा, बठै जाओ। हमारी और हािफजजी की परु ानी दोस्ती ह। उसी
तरह तमु और अनमर भाई-भाई हो। तमु से क्या परदा ह- मैं सब सुन चकु ा हूं लल्लू बिु ढ़या रोती हुई आई थी। मैंने
बरु ी तरह फटकारा। मैंने कह िदया, मझु े तेरी बात का िवश्वास नहीं ह। िजसकी स्त्री लक्ष्मी का रूप हो, वह क्यों
चुड़ैलों के पीछे प्राण देता िफरेगा लेिकन अनगर कोई बात ही ह, तो उसमें घबराने की कोई बात नहीं, बेटा। भलू -
चकू सभी से होती ह। बिु ढ़या को दो-चार सौ रुपये दे िदए जाएगं े। लड़की की िकसी भर ले घर में शादी हो
जाएगी। चलो झगड़ा पाक हुआ। तुम्हें घर से भागने और शहर में िढढोरा पीटने की क्या जरूरत ह- मेरी परवाह
मत करो लेिकन तमु ्हें ईश्वर ने बाल-बच्चे िदए हैं। सोचो, तमु ्हारे चले जाने से िकतने प्राणी अननाथ हो जाएंगे-
स्त्री तो स्त्री ही ह, बहन ह वह रो-रोकर मर जाएगी। रेणकु ादेवी हैं, वह भी तमु ्हीं लोगों के प्रमे से यहां पड़ी हुई
हैं। जब तमु ्हीं न होगे, तो वह सखु िदा को लेकर चली जाएंगी, मेरा घर चौपट हो जाएगा। मैं घर में अनकेला भतू
की तरह पड़ा रहूगं ा। बेटा सलीम, मैं कुछ बेजा तो नहीं कह रहा हूं- जो कछु हो गया, सो हो गया। आगे के िलए
ऐहितयात रखिो। तुम खिदु समझदार हो, मैं तुम्हें क्या समझाऊं- मन कोर् कतर्वय ्य की डोरी से बधं ाना पड़ता ह,
नहीं तो उसकी चंचलता आदमी को न जाने कहां िलए-िलए िफरे- तमु ्हें भगवान् ने सब कुछ िदया ह। कुछ घर
का काम देखिो, कुछ बाहर का काम देखिो। चार िदन की िजदगी ह, इसे हंस-खेलकर काट देना चािहए। मारे-मारे
िफरने से क्या फायदा-
अनमर इस तरह बैठा रहा, मानो कोई पागल बक रहा ह। आज तुम यहां िचकनी-चुपड़ी बातें कहके मुझे
फंसाना चाहते हो। मेरी िजदगी तमु ्हीं ने खिराब की। तमु ्हारे ही कारण मेरी यह दशा हुई। तुमने मुझे कभी अनपने
घर को घर न समझने िदया। तमु मझु े चक्की का बैल बनाना चाहते हो। वह अनपने बाप का अनदब उतना न करता
था, िजतना दबता था, िफर भी उसकी कई बार बीच में टोकने की इच्छा हुई। ज्योंही लालाजी चपु हुए, उसने
दढृ ़ता के साथ कहा-दादा, आपके घर में मेरा इतना जीवन नष्टि हो गया, अनब मैं उसे और नष्टि नहीं करना चाहता।
आदमी का जीवन खिाने और मर जाने के िलए नहीं होता, न धान-सचं य उसका उद्दशे ्य ह। िजस दशा में मैं हूं, वह
मेरे िलए अनसहनीय हो गई ह। मैं एक नए जीवन का सूत्रपात करने जा रहा हूं, जहां मजदूरी लज्जा की वस्तु
नहीं, जहां स्त्री पित को केवल नीचे नहीं घसीटती, उसे पतन की ओर नहीं ले जाती बिल्क उसके जीवन में आनंद
और प्रकाश का सचं ार करती ह। मैं रूिढ़यों और मयादाआं का दास बनकर नहीं रहना चाहता। आपके घर में मझु े
िनत्य बाधाआंका सामना करना पड़गे ा और उसी सघं षर्य में मेरा जीवन समाप्त हो जाएगा। आप ठंडे िदल से कह
94 www.hindustanbooks.com
सकते हैं, आपके घर में सकीना के िलए स्थान ह-
लालाजी ने भीत नेत्रों से देखिकर पूछा-िकस रूप में-
'मेरी पत्नी के रूप में ।'
'नहीं, एक बार नहीं, सौ बार नहीं ।'
'तो िफर मेरे िलए भी आपके घर में स्थान नहीं ह।'
'और तो तुम्हें कुछ नहीं कहना ह?'
'जी नहीं।'
लालाजी कसु ी से उठकर द्वार की ओर बढ़े। िफर पलटकर बोले-बता सकते हो, कहां जा रहे हो-
'अनभी तो कछु ठीक नहीं ह।'
'जाओ, ईश्वर तमु ्हें सखु िी रखे। अनगर कभी िकसी चीज की जरूरत हो, तो मुझे िलखिने में सकं ोच न करना।'
'मुझे आशा ह, मैं आपको कोई कष्टि न दूंगा।'
लालाजी ने सजल नेत्र होकर कहा-चलते-चलते घाव पर नमक न िछड़को, लल्लू बाप का हृदय नहीं
मानता। कम-से-कम इतना तो करना िक कभी-कभी पत्र िलखिते रहना। तुम मेरा महंु न देखिना चाहो लेिकन मुझे
कभी-कभी आने-जाने से न रोकना। जहां रहो, सुखिी रहो, यही मेरा आशीवाद ह।
95 www.hindustanbooks.com
दूसरा भाग
उत्तर की पवर्यत-श्रेिणयों के बीच एक छोटा-सा रमणीक गांव ह। सामने गंगा िकसी बािलका की भांित
हंसती, उछलती, नाचती, गाती, दौड़ती चली जाती ह। पीछे ऊचं ा पहाड़ िकसी वृध्द योगी की भांित जटा बढ़ाए
शांत, गभं ीर, िवचारमग्न खिड़ा ह। यह गांव मानो उसकी बाल-स्मिृ त ह, आमोद-िवनोद से रंिजत, या कोई
यवु ावस्था का सुनहरा मधरु स्वप्न। अनब भी उन स्मिृ तयों को हृदय में सुलाए हुए, उस स्वप्न को छाती से
िचपकाए हुए ह।
इस गांव में मुिश्कल से बीस-पच्चीस झोंपड़े होंगे। पत्थर के रोड़ों को तले-ऊपर रखिकर दीवारें बना ली गई
हैं। उन पर छप्पर डाल िदया गया ह। द्वारों पर बनकट की टिट्टयां हैं। इन्हीं काबकु ों में इस गांव की जनता अनपने
गाय-बलै ों, भेड़-बकिरयों को िलए अननतं काल से िवश्राम करती चली आती ह।
एक िदन संध्या समय एक सांवला-सा, दुबला-पतला युवक मोटा कुता, ऊचं ी धोती और चमरौधो जतू े
पहने, कंधो पर लुिटया-डोर रखे बगल में एक पोटली दबाए इस गांव में आया और एक बुिढ़या से पूछा-क्यों
माता, यहां परदेशी को रात भर रहने का िठकाना िमल जाएगा-
बुिढ़या िसर पर लकड़ी का गट्ठा रखे, एक बूढ़ी गाय को हार की ओर से हांकती चली आती थी। यवु क को
िसर से पांव तक देखिा, पसीने में तर, िसर और मंहु पर गदयर् जमी हुई, आंखें भखू िी, मानो जीवन में कोई आश्रय
ढंूढ़ता िफरता हो। दयाद्रर्य होकर बोली-यहां तो सब रैदास रहते हैं, भयै ा ।
अनमरकान्त इसी भांित महीनों से देहातों का चक्कर लगाता चला आ रहा ह। लगभग पचास छोटे-बड़े
गांवों को वह देखि चुका ह, िकतने ही आदिमयों से उसकी जान-पहचान हो गई ह, िकतने ही उसके सहायक हो
गए हैं, िकतने ही भक्त बन गए हैं। नगर का वह सुकुमार यवु क दुबला तो हो गया ह पर धूप और लू , आधं ी और
वषा, भखू ि और प्यास सहने की शिक्त उसमें प्रखिर हो गई ह। भावी जीवन की यही उसकी तयै ारी ह, यही तपस्या
ह। वह ग्रामवािसयों की सरलता और सहृदयता, प्रमे और संतोष से मगु ्ध हो गया ह। ऐसे सीधे-सादे, िनष्कपट
मनषु ्यों पर आए िदन जो अनत्याचार होते रहते हैं उन्हें देखिकर उसका खिनू खिौल उठता ह। िजस शांित की आशा
उसे देहाती जीवन की ओर खिींच लाई थी, उसका यहां नाम भी न था। घोर अनन्याय का राज्य था और झडं ा
उठाए िफरती थी।
अनमर ने नम्रता से कहा-मैं जात-पांत नहीं मानता, माताजी जो सच्चा ह, वह चमार भी हो, तो आदर के
योग्य ह जो दगाबाज, झूठा, लपं ट हो वह ब्राह्यण भी हो तो आदर के योग्य नहीं। लाओ, लकिड़यों का गट्ठा मैं
लेता चल।ंू
उसने बुिढ़या के िसर से गट्ठा उतारकर अनपने िसर पर रखि िलया।
बुिढ़या ने आशीवाद देकर पूछा-कहां जाना ह, बेटा-
'यों ही मांगता-खिाता हूं माता, आना-जाना कहीं नहीं ह। रात को सोने की जगह तो िमल जाएगी?'
'जगह की कौन कमी ह भैया, मंिदर के चौंतरे पर सो रहना। िकसी साधु-सतं के फरे े में तो नहीं पड़ गए
हो- मेरा भी एक लड़का उनके जाल में फसं गया। िफर कछु पता न चला। अनब तक कई लड़कों का बाप होता।'
दोनों गांव में पहुंच गए। बुिढ़या ने अनपनी झोपडी की टट्टी खिोलते हुए कहा-लाओ, लकड़ी रखि दो यहां। थक
96 www.hindustanbooks.com
गए हो, थोड़ा-सा दूध रखिा ह, पी लो। और सब गोई तो मर गए, बेटा यही गाय रह गई ह। एक पाव भर दूध दे
देती ह। खिाने को तो पाती नहीं, दूध कहां से दे।
अनमर ऐसे सरल स्नहे के प्रसाद को अनस्वीकार न कर सका। झोपडी में गया तो उसका हृदय कांप उठा। मानो
दिरद्रता छाती पीट-पीटकर रो रही ह। और हमारा उन्नत समाज िवलास में मग्न ह। उसे रहने को बंगला चािहए
सवारी को मोटर। इस संसार का िवधवंस क्यों नहीं हो जाता।
बिु ढ़या ने दूध एक पीतल के कटोरे मे उडं ़ले िदया और आप घड़ा उठाकर पानी लाने चली। अनमर ने कहा-मैं
खिींचे लाता हूं माता, रस्सी तो कएु ं पर होगी-
'नहीं बेटा, तुम कहां जाओगे पानी भरने- एक रात के िलए आ गए, तो मैं तमु से पानी भराऊं?'
बिु ढ़या हां, हां, करती रह गई। अनमरकान्त घड़ा िलए कएु ं पर पहुंच गया। बिु ढ़या से न रहा गया। वह भी
उसके पीछे-पीछे गई।
कएु ं पर कई औरतें पानी खिींच रही थीं। अनमरकान्त को देखिकर एक युवती ने पछू ा-कोई पाहुने हैं क्या,
सलोनी काकी-
बुिढ़या हसं कर बोली-पाहुने होते, तो पानी भरने कसै े आते तेरे घर भी ऐसे पाहुने आते हैं-
युवती ने ितरछी आंखिों से अनमर को देखिकर कहा-हमारे पाहुने तो अनपने हाथ से पानी भी नहीं पीते, काकी
ऐसे भोले-भाले पाहुने को मैं अनपने घर ले जाऊगं ी।
अनमरकान्त का कलेजा धक-धक-से हो गया। वह यवु ती वही मनु ्नी थी, जो खिनू के मकु दमे से बरी हो गई
थी। वह अनब उतनी दुबयलर् , उतनी िचितत नहीं ह। रूप माधुय्रय ह, अनंगों में िवकास, मुखि पर हास्य की मधुर छिव ।
आनंद जीवन का तत्व ह। वह अनतीत की परवाह नहीं करता पर शायद मुन्नी ने अनमरकान्त को नहीं पहचाना।
उसकी सूरत इतनी बदल गई ह। शहर का सुकुमार यवु क देहात का मजूर हो गया ह।
अनमर झंपते हुए कहा-मैं पाहुना नहीं हूं देवी, परदेशी हूं। आज इस गांव में आ िनकला। इस नाते सारे गांव
का अनितिथ हू।ं
यवु ती ने मसु ्कराकर कहा-तब एक-दो घड़ों से िपड न छूटेगा। दो सौ घड़े भरने पड़गं े, नहीं तो घड़ा इधर
बढ़ा दो। झूठ तो नहीं कहती, काकी ।
उसने अनमरकान्त के हाथ से घड़ा ले िलया और चट फंदा लगा, कुंए में डाल, बात-की-बात में घड़ा खिींच
िलया।
अनमरकान्त घड़ा लेकर चला गया, तो मनु ्नी ने सलोनी से कहा-िकसी भले घर का आदमी ह, काकी देखिा
िकतना शरमाता था। मेरे यहां से अनचार मगं वा लीिजयो, आटा-वाटा तो ह-
सलोनी ने कहा-बाजरे का ह, गेहूं कहां से लाती-
'तो मैं आटा िलए आती हूं। नहीं, चलो दे दू।ं वहां काम-धधं ो में लग जाऊगं ी, तो सुरित न रहेगी।'
मुन्नी को तीन साल हुए मिु खिया का लड़का हिरद्वार से लाया था। एक सप्ताह से एक धम्रशय ाला के द्वार पर
जीणर्य दशा में पड़ी थी। बड़े-बड़े आदमी धमयर्शाला में आते थ, सकै ड़ों-हजारों दान करते थ पर इस दुिखिया पर
97 www.hindustanbooks.com