और उधर िडप्टी जल्दी मचा रहा ह। देखिती नहीं हो, द्वार पर डोली खिड़ी ह। इस वक्त खिाने की िकसे सूझती ह-
नैना प्रमे -िवह्नल कंठ से बोली-तुम अनपना काम करती रहो, मैं तमु ्हें कौर बनाकर िखिलाती जाऊंगी।
जसै े माता खेलते बच्चे के पीछे दौड़-दौड़कर उसे िखिलाती ह, उसी तरह ननै ा भाभी को िखिलाने लगी।
सुखिदा कभी इस अनलमारी के पास जाती, कभी उस संदूक के पास। िकसी संदूक से िसदूर की िडिबया िनकालती,
िकसी से सािड़यां। ननै ा एक कौर िखिलाकर िफर थाल के पास जाती और दूसरा कौर लेकर दौड़ती।
सखु िदा ने पांच-छ: कौर खिाकर कहा-बस, अनब पानी िपला दो।
ननै ा ने उसके मुहं के पास कौर ले जाकर कहा-बस यही कौर ले लो, मेरी अनच्छी भाभी।
सुखिदा ने मुहं खिोल िदया और ग्रास के साथ आसं ू भी पी गई।
'बस एक और।'
'अनब एक कौर भी नहीं।'
'मेरी खिाितर से।'
सुखिदा ने ग्रास ले िलया।
'पानी भी दोगी या िखिलाती ही जाओगी।'
'बस, एक ग्रास भैया के नाम का और ले लो।'
'ना। िकसी तरह नहीं।'
नैना की आखं िों में आसं ू थ प्रत्यक्ष, सखु िदा की आखं िों में भी आंसू थ मगर िछपे हुए। ननै ा शोक से िवह्नल थी,
सखु िदा उसे मनोबल से दबाए हुए थी। वह एक बार िनष्ठरु बनकर चलते-चलते ननै ा के मोह-बधं न को तोड़ देना
चाहती थी, पैने शब्दों से हृदय के चारों ओर खिाई खिोद देना चाहती थी, मोह और शोक और िवयोग-व्यथा के
आक्रमणों से उसकी रक्षा करने के िलए पर ननै ा की छलछलाती हुई आंखें, वह कांपते हुए होंठ, वह िवनय-दीन
मखु िश्री उसे िन:शस्त्र िकए देती थी।
ननै ा ने जल्दी-जल्दी पान के बीड़े लगाए और भाभी को िखिलाने लगी, तो उसके दबे हुए आंसू गव्वारे की
तरह उबल पड़े। मंहु ढांपकर रोने लगी। िससिकयां और गहरी होकर कंठ तक जा पहुचं ीं।
सुखिदा ने उसे गले से लगाकर सजल शब्दों में कहा-क्यों रोती हो बीबी, बीच-बीच में मलु ाकात तो होती
ही रहेगी। जेल में मुझसे िमलने आना, तो खिबू अनच्छी-अनच्छी चीजें बनाकर लाना। दो-चार महीने में तो मैं िफर
आ जाऊंगी।
ननै ा ने जैसे डूबती हुई नाव पर से कहा-मैं ऐसी अनभािगन हूं िक आप तो डूबी ही थीं, तमु ्हें भी ले डूबी।
ये शब्द फोड।े की तरह उसी समय से उसके हृदय में टीस रहे थ, जब से उसने सुखिदा की िगरफ्तारी की
खिबर सनु ी थी, और यह टीस उसकी मोह-वेदना को और भी दुदाऊत बना रही थी।
सखु िदा ने आश्चियर्य से उसके मंहु की ओर देखिकर कहा-यह तमु क्या कह रही हो बीबी, क्या तमु ने पुिलस
बुलाई ह-
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नैना ने गाल् िन से भरे कठं से कहा-यह पत्थर की हवेली वालों का कचु क्र ह (सेठ धानीराम शहर में इसी
नाम से प्रिस' थध्द मैं िकसी को गािलयां नहीं देती पर उनका िकया उनके आगे आएगा। िजस आदमी के िलए एक
महंु से भी आशीवाद न िनकलता हो, उसका जीना वथृ ा ह।
सखु िदा ने उदास होकर कहा-उनका इसमें क्या दोष ह, बीबी- यह सब हमारे समाज का, हम सबों का दोष
ह। अनच्छा आओ, अनब िवदा हो जाए।ं वादा करो, मेरे जाने पर रोओगी नहीं।
ननै ा ने उसके गले से िलपटकर सजू ी हुई आंखिों से मसु ्कराकर कहा-नहीं रोऊंगी, भाभी।
'अनगर मैंने सनु ा िक तुम रो रही हो, तो मैं अनपनी सजा बढ़वा लगूं ी।'
'भयै ा को यह समाचार देना ही होगा।'
'तुम्हारी जसै ी इच्छा हो करना। अनम्मां को समझाती रहना।'
'उनके पास कोई आदमी भेजा गया या नहीं?'
'उन्हें बुलाने से और देर ही तो होती। घंटों न छोड़तीं।'
'सुनकर दौड़ी आएगं ी।'
'हां, आएंगी तो पर रोएगं ी नहीं। उनका प्रमे आंखिों में ह। हृदय तक उसकी जड़ नहीं पहुंचती।'
दोनों द्वार की ओर चलीं। ननै ा ने मुन्ने को मां की गोद से उतारकर प्यार करना चाहा पर वह न उतरा।
नैना से बहुत िहला था पर आज वह अनबोध आखं िों से देखि रहा था-माता कहीं जा रही ह। उसकी गोद से कैसे
उतरे- उसे छोड़कर वह चली जाए, तो बेचारा क्या कर लेगा-
नैना ने उसका चबंु न लेकर कहा-बालक बड़े िनरद् यर्यी होते हैं।
सखु िदा ने मुस्कराकर कहा-लड़का िकसका ह ।
द्वार पर पहुचं कर िफर दोनों गले िमलीं। समरकान्त भी डयोढ़ी पर खिड़े थ। सुखिदा ने उसके चरणों पर िसर
झुकाया। उन्होंने कांपते हुए हाथों से उसे उठाकर आशीवाद िदया। िफर मुन्ने को कलेजे से लगाकर ठ्ठक -ठठ् टकर
रोने लगे। यह सारे घर को रोने का िसग्नल था। आसं ू तो पहले ही से िनकल रहे थ। वह मूक रूदन अनब जैसे
बंधनो से मुक्त हो गया। शीतल, धीर, गभं ीर बढु ़ापा जब िवह्नल हो जाता ह, तो मानो िपजरे के द्वार खिलु जाते
हैं और पिक्षयों को रोकना अनसंभव हो जाता ह। जब सत्तर वषरय् तक ससं ार के समर में जमा रहने वाला नायक
हिथयार डाल दे, तो रंगईटों को कौन रोक सकता ह-
सुखिदा मोटर में बठै ी। जय-जयकार की ध्विन हुई। फलू ों की वषा की गई।
मोटर चल दी।
हजारों आदमी मोटर के पीछे दौड़ रहे थ और सखु िदा हाथ उठाकर उन्हें प्रणाम करती जाती थी। यह श्रध्दा ,
यह प्रेम, यह सम्मान क्या धन से िमल सकता ह- या िवद्या से- इसका केवल एक ही साधन ह, और वह सेवा ह,
और सुखिदा को अनभी इस क्षेत्र में आए हुए ही िकतने िदन हुए थ-
सड़क के दोनों ओर नर-नािरयों की दीवार खिड़ी थी और मोटर मानो उनके हृदय को कचु लती-मसलती
चली जा रही थी।
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