101 आधुलनक लििा पद्धलि गुरूकु ल से लेकर आज के आधुगनक गशक्षा पद्धगत तक गशक्षा के गर्षय में बहुत बदलार् आ गया है। उन गदनों में गुरूकु ल में सीगमत अर्स्था में गशक्षा प्राप्त होती थी। लेगकन अब सर्व गशक्षा अगभयान के द्वारा साब को गशक्षा का अर्सर गमल रहा है। आधुगनक गशक्षा पद्धगत कु छ अच्छे गर्षयो से प्राप्त है। हमारे देश के संगर्धान के अनुसार गर्श्वमान्य गशक्षा सब का अगधकार है। इसी गदशा में आज का आधगिक गशक्षा पद्धगत अर्लंगबत है। परंतु आज जीर्न मूल्ों की कमी गदखाई दे रही है। गशक्षा का आदशव सो रहा है। आज कल जीर्न के पररस्क्रस्थगतयों का सामना करने की गशक्षा नहीं गमल रहा है। आधगनक गशक्षा पद्धगत में सब कु छ गबना मेहनत से गमल रहा है। आजकल हम आधुगनक गशक्षा पद्धगत के द्वारा पाश्चात्य देश को अनुसरण कर रहे है पर हम प्राचीन गशक्षा पद्धगत को गतलांजली दे रहे हैं। हमें तत्व ज़ान नहीं चागहए। हमें अंकों के दर्ारा प्राप्त पदर्ी चागहए। गशक्षा के र्ल अंकों के सीगमत होता जा रहा है। कम अंक आने पर माूँ- बाप बच्चों को डाूँटते हैं गजससे बच्चे पररर्ार के गर्रुद्ध जाने लगते हैं। गशक्षा का व्यापारीकरण भी हो रहा है। हर जगह गशक्षा का मतलब पैसा ही है। गशक्षकों को बच्चों को समझाना चागहए गक र्े पाठ कं ठपाठ न करें पर समझे। उनको बच्चों को समझकर उन्ें प्यार से पाठ पढाना चागहए और बच्चों के मुस्क्रिलों को हल करना चागहए। अंत में यह चाहती हूँ गक हर एक बच्चा अलग है और हर एक बच्चे में अपने आप में ही एक जादू है। इन बच्चो की यह जादुई खूबी को बाहर लाने के गलए एक बड़ा माघ्यम है- आधुगनक गशक्षा पद्धगत। हर एक बच्चों को अपने सुगर्धाओं को लेकर अपनी प्रगगत के बारे में सोचना चागहए और हमेशा गशक्षा के साथ जुडे रहना चागहए। डॉ. प्रलिमा गुप्ता प्रलिलिि स्नािकोत्तर लिलिका, लहन्दी
102 मेरी चाह कटुर्ाणी, बचकानी बातों से, इस जीर्न में क्या रखा है, मृदुभाषी र्चनाओं में, खो जाने को मन करता है। आधुगनक यंत्रो पर गनभवर होकर,इस जीर्न में क्या रखा है, प्रेम भरे आचरणों में ,न्योछार्र हो जाने को मन करता है। परगनंदा, ईर्ष्ाव के अफसानों के , इस जीर्न में क्या रखा है, समभार्,कु शल व्यर्हारों में, खो जाने को मन करता है। छल, कपट,घृणा, चोरी के , इस जीर्न में क्या रखा है, दयाभार् रख करके , बगलहारी हो जाने को मन करता है। सोच गर्चारो के ख्यालो के , इस जीर्न में क्या रखा है, कु छ कर गुजर के मुकाम को, पा लेने का मन करता है। कठोर गनयम आड़ंबर के , इस जीर्न में क्या रखा है, मधुर मस्त सरल बन कर, घुल जाने को मन करता है। खुद के गलए जीकर, खुदगजी के , इस जीर्न में क्या रखा है, देश की सेर्ा में रंगकर मातृभूगम पर, तर जाने को मन करता है। डॉ. प्रलिमा गुप्ता िस्शस्क्त स्नषतकोत्तर स्शस्क्कष (स्हन्दी)
103