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Published by sangam.singapore, 2023-09-30 22:02:17

Singapore Sangam July-September 2023

Singapore Sangam July-September 2023

त्रैमासिक सिन्दी पसत्रका जलु ाई-सितम्बर 2023 - वर्ष-6, अक ं 23 ISSN: 25917773 www.singaporesangam.com वर्ष-6, अंक 23 स िंगाप ु र ेसिकलि ेवाली पहली सहन्दी पसिका www.singaporesangam.com


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 1 सि िंगापुर िंगम िम्पादक: डॉ िंध्या सि िंह तकनीकी िहयोग: अनमोल सि िंह युवराज आयषन आवरण सित्र: ररततका िौधरी िंपकष : Email: [email protected] Facebook- https://www.facebook.com/singapore.sangam.3 , Page- sangam Singapore संगम ससगं ापुर sinagpore sangam Instagram: https://www.instagram.com/singaporesangamhindi/?hl=en YouTube: https://tinyurl.com/singaporesangamhindi Website: www.singaporesangam.com , Magazine- https://www.singaporesangam.com/magazines/ स िंगाप ु र प्रकासित रचनाओं के विचार लेखकों के अपने हैं| आिश्यक नह ं कक पत्रिका के संपादक या प्रबंधन सदस्य इससे सहमत हों। सिााधधकार सुरक्षित © Singaporesangam ▪ वर्ष6 ▪ अकं 23 ▪ जलु ाई-सितम्बर 2023 स िंगापुर ेसिकलिेवाली पहली सहिंदी पसिका ISSN: 25917773


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 2 िम्पादकीय सि िंगापुर िेनमस्कार! सििंगापुर िंगम की ओर िे आगामी िमस्त पवों की हार्दिक शुभकामनाएँप्रेषर्त है| हमेशा की तरह षपछले तीन महीनों में भी सििंगापुर िंगम ने सििंगापुर की र्ह िंदी दुननया में खूब धूम मिाई है सजिकी झलक आपको रपट और सित्रों के माध्यम िे देखने को नमलेगी| कई पुस्तकों का षवमोिन, र्ह िंदी िम्मान का प्रारंभ, अपने अग्रज िार्हत्यकारों के रिना -िंिार को याद करना जैिे कई महत्वपूणष कायषहुए हैं| सििंगापुर िंगम के फेिबुक पर सित्रों की पूणषवीतिका है| बाल िार्हत्य पर षवशेर्ांक काफी िमय िेलंबबत िा| प्रिन्नता है षक इि अंक मेंइि पर कायषषकया जा िका| इि अंक के सलए षवशेर् आभार र्दषवक रमेश जी का है| उन्होंने न सिफष रिनात्मक योगदान र्दया बल्कि कई िंपकष िूत्र और षविार भी र्दए, सजनिे यह अंक िमृद्ध हो िका| इि अंक मेंबाल िार्हत्य के सलए भारत, प्रवािी रिनाकर, सि िंगापुर के रिनाकारों के िाि ही अनुवाद के क्षेत्र को भी िुना गया है| कहानी कहनेकी कला िेलेकर षवभभन्न षवधाओ ं िेयह अंक िमृद्ध है| इि अंक िे जुड़े िभी रिनाकारों के प्रतत आभार व्यक्त करती हँषक आपने िमय ननकालकर सि िंगापुर िंगम के अंक को िमृद्ध षकया है| भषवष्य मेंभी इिी प्रकार का स्नेह बना रहे! इि अंक का आवरण सित्र बनाया है सिगिं ापुर िे ररततका िौधरी ने| उन्होंने बाल िार्हत्य की िहजता को कै नवि पर उके रा है ताषक स्वत: पाठक तक पहुँिे| अगले अंक के सलए रिनाएँ, सित्र, पेंषटग आर्द आमंबत्रत हैं| आपकी प्रततषियाएँ हमारे सलए बहुत ख़ाि हैंअत: आपकी प्रततषियाओं का इंतज़ार रहेगा! धन्यवाद िर्हत डॉ िंध्या सि िंह


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 3 आवरण पृष्ठ ररततका िौधरी -सि िंगापुर बाल िार्हत्य षवशेर्ांक भारतीय कला और िंस्कृसत की गिरी परख और िमझ रखनेवाली ररसतका चौधरी नेबनस्थली सवद्यापीठ, राजस्थान िे कला की पढाई की िै। उन्िेंकागज़ और कैनवाि पर रंगों िेनए प्रयोग करनेमेंअत्यंत िंतोर् समलता िै। उनकेअनिुार कला ध्यान और सचसकत्िा भी ि,ैएक जादईु और्सध िैजो उन्िेंिकारात्मक और प्ररेरत रखती ि,ैऔर िभी तनावों को दरूकरनेमेंमदद करती िै। मााँऔर सििु- यि सचत्र भारतीय पारंपररक केरल म्यरूल कला िैली िेप्रेररत ि,ैजिााँमााँयिोदा भगवान श्रीकृष्ण केिाथ ि।ैं यिााँउन्िोंनेमााँ और बच्चे के बीच के प्यार और लगाव को सदखाने का प्रयाि सकया िै। दोनों का िाथ सििुकेसलए सकतना िरुसित िोता िै, यि स्पष्ट झलक रिा िै| बाल िासित्य भी तो बालकों को ऐिेिी ििज प्रेम के रूप मेंआकसर्षत करे, तभी िाथषक िोगा|


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 4 इि अंक में भारत बाल हास्य उपन्या झगड़ा सिपटाकर दफ़्तर डॉ. यूयबाला 5 भारत आलेख जरा कहािी कह कर तो देखो पिंकज चतुवेदी 13 भारत बाल कसवता छाता अगर सदया होता िा दादी जी िेमुझेबताया रहिा हैब हमेंप्यार े सदसवक रमेश 18 भारत बाल कसवता चींटी की चाल प्यार करोगेप्यार समलेगा प्रो. राजेश कुमार 21 भारत आलेख भाषा ेप्रेम की कला डॉ. वेन्र सवक्रम स िंह 23 बाल कसवता सबल्ली , बादल डॉ. िंजीव कुमार 26 सिटेि बाल उपन्या -अिंश फ़ौ फ़र (सबन्िी बुआ का सबल्ला) सदव्या माधुर 27 न्यज़ू ीलडैं बाल लोक कथा किं गारू केपेट की थलै ी रोसहत कुमार हप्ैपी 29 ऑस्रेसलया आलेख सवसभन्ि देशों की िववषय परम्पराएँ रीता कौशल 32 भारत कन्िड़ ेअिसूदत आलेख कन्िड़ बाल कसवता डॉ. टी जी प्रभाशिंकर प्रेमी 35 भारत बाल कहािी मलू अ समया - र राज लक्ष्मीिाथ बेजबरूआ द्वारा मुसि कसवता कमयकार 39 भारत बाल कसवता मलू मराठी कसवता (ताई ) ेअिसूदत दीदी हेमिंत गोसविंद जोगलेकर 44 भारत बाल कहािी राजस्थािी ेसहन्दी मेंअिुसदत च्चाई की जीत दीिदयाल शमाय 46 भारत िंस्मरण अपिी- अपिी लड़ाई डॉ उषा सकरण 49 भारत बाल कथा दोस्ती का धमय अलका प्रमोद 51 भारत बाल िाटक बाघूिेगधे े ीखा सदशा ग्रोवर 54 भारत बाल कथा फल देिेवाले, अिुभवी वक्षृ हम डॉ. रमेश यादव 63 स िंगापुर बाल कसवता िन्ही सगलहरी सचिा गुप्ता 67 स िंगापुर बाल कसवता प्यार कभी िा होगा कम आलोक समश्रा 69 स िंगापुर बाल कथा हृदय पररवतयि इिंसदरा अग्रवाल 71 बाल कथा लिू ा और सलयो की दोस्ती हेमा कृपलािी 73 स िंगापुर रपट पुस्तक सवमोचि 76 स िंगापुर सचि ासहत्य केख़ज़ािे े– ५ 77 स िंगापुर रपट सहिंदी सदव स िंगापुर २०२३ 83


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 5 झगड़ा ननपटाकर दफ़्तर बाल हास्य उपन्याि डॉ. िय ू बष ाला, भारत वाराणिी मेंजन्मीं डॉ. ियूषबाला आधसुनक सिदं ी िासित्य की प्रसतसित उपन्यािकार, व्यंग्यकार और किानीकार िैं। उनकी पिली किानी 1972 मेंिाररका मेंप्रकासित िईु थी। ियूषबाला जी की अब तक पच्चीि िेभी ज़्यादा कृसतयााँ, छि उपन्याि, बारि कथा िंग्रि, चार व्यंग्य िंग्रि केअलावा डायरी व िंस्मरण, प्रकासित िो चकुेि।ैंउनकी अनेक रचनाएाँपाठ्यक्रमों मेंिंकसलत ि।ैंियूबष ाला जी को देि-सवदेि में सवसभन्न िम्मानों िे अलंकृत सकया जा चकुा िैसजनमेंकुछ नाम; सप्रयदसिषनी परुस्कार, व्यंग्य श्री परुस्कार, िररिंकर परिाई स्मसृत िम्मान, भारत भारती परुस्कार, िरद जोिी िासित्य िम्मान, आसद प्रमखु ि।ैं िपं कष : [email protected] मोना अके ल ‘झगड़ा ननपटाकर दफ़्तर’ की सदस्य नह ं बनी। बोल -“तुम तीन लड़कों के साथ मैं अकेल बोर हो जाऊँगी, ऐसा करँगी अपने साथ बबल और कुन्नी को भी लाऊँगी।” “पर तीन लड़ककयों के साथ हम तीनों बोर नह ं हो जाएँगे?” धगट्टू अकड़ा। “तो ऐसा करते हैंलड़ककयों के झगड़े का दफ़्तर थोड़ा अलग बना देंगे।” मटं ू ने सझु ाया। “हाँ हाँ यह ठीक रहेगा।” मोना खुि होकर बोल - लड़कों के झगड़े इधर, लड़ककयों के उधर। लेककन तुम लोगों को मूढ़े, बेंच िगरैह कहाँसे समलेंगे। बैठोगी कहाँ? उसकी किक्र तुम लोग मत करो, हम तीनों लड़ककयाँइंतजाम कर लेंगी।” अरे दसू रे ददन देखते क्या है कक तीनों लड़ककयाँबदढ़या-बदढ़या फ्रॉक पहने अपने अपने घरों से बदढ़या मढ़ूे और एक छोटा स्टूल सलए चल आ रह है। और तो और स्टूल पर उन्होंने एक िूलदार टेबल क्लॉथ भी त्रबछा ददया। इस पर त्रबल्लूबहुत धचढ़ गया। फ़ौरन जाकर बोला-“इतने अच्छे मढ़ूे ओर टेबल क्लॉथ लाने की तुम लोगों को क्या ज़ररत थी?” कुन्नी ऐंठकर बोल —“तुमसे मतलब? हमार मम्मी ने ददया, हम ले आए।”


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 6 बाल हास्य उपन्याि — भारत िे “झठू ! तुम सब चुरा कर लाई हो!” त्रबल्लूज़ोर से बोला। “झठूे तुम—चोर तुम---धचढ़ने तुम !” बबल धचल्लाई। बात बढ़ गई तो मटं ू-धगट्टू त्रबल्लूको समझा बुझाकर लाए। लेककन दसू रे ददन िे सब एक सरुाह भर पानी और एक धगलास भी ले आईं। “ज़रर बेसन के लड्डूया आम की मीठी चटनी भी लाई होंगी।” त्रबल्लूकुड़बुड़ाया। “लाई हों तो लाई हों – हमसे क्या ! देख पराई चुपड़ी मत ललचािे जीि।” धगट्टू ने समझाया। मटं ू को भी गस्ुसा आ रहा था —“लेककन हमी ने तो उन्हें अपने दफ़्तर में रखा--िे तीनों हमसे जनूनयर हुई न! मैंपहले ह कहता था लड़ककयों को मत लाओ अब लो मज़ा! मैं1 ददन इनकी सरुाह उठाकर न िोड़ दँूतो मेरा नाम त्रबल्लूमनै ेजर नह ं। त्रबल्लूत्रबगड़ा-“सब लड़के कहने लगे हैंकक लड़ककयों का दफ़्तर लड़कों के दफ़्तर से ज़्यादा अच्छा है।” “उनके पास िूलदार फ्राकें होती हैं।” “मोना तो हर ददन मैक्सी पहनकर आती है।” “मझु े 1 ददन सेंट भी नह ं लगाया।” त्रबल्लूसबसे ज़्यादा इसी बात पर नाराज़ था। एक बात और भी। लड़ककयों के पास जब झगड़े के के स आते तो लड़ककयाँ िान मारने लगतीं। इससलए अब जैसे ह लड़कों के दफ़्तर में झगड़े आते, त्रबल्लूया तो अगं ठू ा ददखा देता या जीभ भी ननकाल देता। इससे थोड़ी तनातनी भी बढ़ गई थी। लड़के इससलए नाराज़ थे कक लड़ककयाँदबकर जनूनयरों की तरह क्यों नह ं रहतीं, लेककन लड़ककयों की सज-धज और दफ़्तर देख कर कोई उन्हें जनूनयर समझता ह नह ं। “कल से मैंअपनी नील िुल पटैं और टाई लगाकर आऊँगा।” त्रबल्लूबोला। “मेरे पास कुछ पैसे हैं।” धगट्टू बोला, “तुम लोग भी थोड़ा समलाओ तो एक सरुाह खर द ल जाए।” “त्रबल्कुल ठीक।”


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 7 बाल हास्य उपन्याि — भारत िे “उनके पास जब लड़ककयाँझगड़े लेकर आती हैंतो िे अपने-अपने गालों पर हाथ रखकर बैठ जाती हैं। हम लोगों को भी िैसा ह करना चादहए।” त्रबल्लूहर तरह से लड़ककयों की बराबर करना चाहता था। “चोप्प! नकल और लड़ककयों की? छी-छी-छी !” धगट्टू बोला। इतने में लड़ककयों के दफ़्तर की तरि दो लड़ककयाँआती ददखाई द ं। इन लड़ककयों के नाम धचक्की ओर सोनूथे तथा ये बेहद बातूनी और झगड़ालूलड़ककयाँथी।ं तीसर जो इन्हें समझा बुझाकर ला रह हैउसका नाम र ता था। हुआ यह था कक ये लड़ककयाँखो-खो खेल रह थीं। इसी में दौड़ते हुए सोनूका पैर दो दो बार धचक्की के पैर पर पड़ गया धचक्की बुर तरह धचढ़ गई। पहल बार तो िह ककसी तरह सोनूको ‘मैड’ ह कह कर रह गई पर दसू र बार सोनूका पैर किर पड़ा तो धचक्की बुर तरह धचक-धचका उठी| उसने सोनुकी चोदटयाँइतनी ज़ोर से खींची कक उनके ररबन ननकाल कर अलग हो गए। मारा-पीट में खेल बंद हो गया और उन दोनों को र ता के साथ ‘झगड़ा ननपटाकर दफ़्तर’ भेज ददया गया। ये लड़ककयाँकॉलोनी में नई आई थी।ं कुन्नी बबल ने इनके झगड़ालूस्िभाि के बारे में कािी सनु रखा था, इससलए पहले तो उन तीनों की ससट्ट -वपट्ट गमु हो गई किर ककसी तरह बबल ने ज़रा रोब लाकर पूछा..... “आप दोनों यहाँझगड़ा ननपटाने आई हैं?” “और नह ं तो क्या मक्खी मारने आए हैं?” धचक्की ने धचढ़कर जिाब ददया। इस पर कुन्नी और मोना को भी गस्ुसा आया। दफ़्तर में थीं नह ं तो बताती इस िैतान लड़की को! और धचक्की की तो आदत ह यह थी। अगर उसे पूछा जाता, ‘तुमने खाना खा सलया?’ तो िह हाँ कहने के बदले कहती, ‘और नह ं तो क्या मैंभखू ी बैठी हूँ!’ अगर सिाल होता-‘क्या तुम आज अपनी मम्मी के साथ बाज़ार गई थी?’ तो िह जिाब देती-‘और नह ं तो क्या तुम्हार मम्मी के साथ जाऊँगी?’ कोई पूछता- ‘धचक्की! ये तुम्हारे कान के बुंदे सोने के हैं?’ तो फ़ौरन कहती-‘और नह ं तो क्या तुम्हार तरह पीतल के हैं?’ मतलब िह , हर बात में, हर िब्द में झगड़े का इंजेक्िन सलए रहती।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 8 बाल हास्य उपन्याि — भारत िे इस बार कुन्नी बोल -“पूर बात बताइए झगड़े की।” धचक्की ह किर बोल -“बताना क्या है, इसने मेरे पैर की चटनी बना द तो मैंइसे पीटूँगी ह ।” दसू रे दफ़्तर में बैठे त्रबल्लूने ससिा चटनी ह सनु ा, िौरन बोला-“देखो, कहता था न आम की मीठी चटनी है इनके पास।” इस पर सोनूगरुााई-“मनैं े जानबूझकर इसका पैर नह ं कुचला था।” धचक्की गस्ुसाई-“जानबूझकर नह ं कुचला था तो क्या अनजाने कुचला था? मेरा पैर कोई सईू धागा था, जो तुझे ददखता नह ं था?” सोनूभी चीखी-“तेरा पैर कुचल कर क्या मझु े लड्डू समलने िाले थे?” त्रबल्लूने लड्डू भी सनु ा तो बोला-“देखो, बेसन के लड्डू भी है--मैंकल से लड़ककयों के पास दफ़्तर में बैठूँगा।“ “लालची कह ं का!” धगट्टू और मटं ू ने उसे डाँटा। उधर बबल उन लोगों पर गस्ुसाई-“आप लोग िांत होकर बैठती है या नह ं?” सोनुधचल्लाई- “यह धचक-धचकी िांनत से बैठ सकती है कभी...” “तुम मझु े गाल देती हैमझु े धचक धचकी कहती है?” “तूने ह तो िुर िुर में मझु े बताया था कक तूछोट थी तो मम्मी डडै ी को इतना तंग करती थी कक उन्होंने तेरा धचक्की नाम रख ददया...” “गलत, त्रबल्कुल गलत। उन्होंने तो मेरा नाम लोनािाला की मिहूर धचक्की के ऊपर रखा है यानी मैंधचक्की तरह मीठी हूँ।” इस पर सब लड़ककयाँखखलखखलाकर हँसने लगीं, लेककन धचक्की बहुत गस्ुसाई। िह ज़ोर-ज़ोर से लड़ती, अगं ठू ा ददखाती अकेले ह चल गई। सब लड़ककयों ने उसे इतना बलु ाया कक झगड़ा तो ननपटाती जा, पर उसने दफ़्तरिासलयों की एक न सनु ी, उल्टे जाते-जाते सोनूको धचढ़ाती गई – “सोनूमोनूकी दकु ान, कौआ ले गया उसके कान।” पर सोनूक्यों पीछे रहती! जल्द से जजतने भी अिर मँहु में आए, उनमें ‘इक्की’ जोड़ती गई- जैसे


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 9 बाल हास्य उपन्याि — भारत िे जा-जा- धचक्की-समक्की-धगक्की-ककक्की..... बबल , मोना, कुन्नी ने देखा कक धचक्की तो हाथ आएगी नह ं, सो सोनूको ह समझा ददया। उसे एक खट्ट मीठी गोल भी दे द । इससे सोनूमान गई। यह भी तय हुआ कक धचक्की को यह सजा द जाए कक उसके साथ हफ्तेभर तक कोई लड़की नह ं खेलेगी, जब तक िह अपनी आदत ना सधु ार ले। किर तीनों लड़ककयाँचनै की साँस लेकर एक के बाद एक सरुाह से पानी ननकाल-ननकालकर पीने लगीं। मटं ू, धगट्टू, और खासकर त्रबल्लूको यह सिं ाद सनु कर बड़ा मज़ा आया। फ़ौरन बोला-“िाह! जैसे हल्द घाट में झाँसी की रानी लड़ी थीं िैसे ह लड़ककयाँलड़ रह थीं।” धगट्टू ने टोका-“त्रबल्ल,ू तूबहुत गलत बोलता है- हल्द घाट में झाँसी की रानी नह ,ं राणा प्रताप लड़े थे।” “एक ह बात है।” त्रबल्लूझेंपकर बोला। “एक ह बात कै से है?” मटं ू त्रबगड़ा- “राणा प्रताप मगु लों के खखलाफ़ लड़े थे, झाँसी की रानी अग्रं ेजों के खखलाफ़।” “हाँहाँ, मालमू है।” त्रबल्लूसयानों की तरह बोला-“उन ददनों बहुत लड़ाइयाँहोती थीं, बहुत झगड़े होते थे। असल में झगड़ा ननपटाकर दफ़्तर नह ं होते थे न, इससलए।” लड़ककयों ने यह सनु ा तो िे ज़ोर से हँस द । असल में िे सब त्रबल्लूसे ऊँची क्लासों में थीं, और उन्हें राणा प्रताप, लक्ष्मीबाई आदद का इनतहास पढ़ाया जाता था। िे बोल ं-“त्रबल्लूमनै ेजर, तुम हमारे स्कूल में होते तो हमार ट चर रोज़ तुम्हें मगु ाा बनाती-और इनतहास में तो हमेिा अडं ा ह समलता।” त्रबल्लूचढ़कर बोला-“तुम लोग भी हमारे स्कूल में होती तो रोज़ मधुगया ाँबनायी जाती।” हा-हा .... एक झगड़ा तक तो ननपटा नह ं पाई।”


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 10 बाल हास्य उपन्याि — भारत िे बबल धचढ़ कर बोल ,” ननपटाएँ या ना ननपटाएँ हमारा मन।” इस पर मटं ू को ताि आ गया-“, िाह! तुम्हारा मन कैसा? हमने तुम्हें झगड़ा ननपटाने के सलए रखा है, न कक सरुाह से उड़ले कर पानी पीने के सलए?” “पीएँगे- पीएँगे ---100 बार पीएँगे ... क्या कर लोगे तुम लोग!” तीनों लड़ककयाँ एक साथ बोल ं| “हम? हम तुम्हें दफ़्तर से ननकाल देंगे!” धगट्टू नाराज़ होकर बोला-“हम आलसी और ननकम्मी लड़ककयों को नह ं रखेंगे।” इस पर तीनों लड़ककयाँ ज़ोर-ज़ोर से रोती हुई बोल -असल में तो तुम ह तीनों बुद्धू, बेिकूि और मखू ा हो!” धगट्टू ने रुआब से कहा- “देखो, हम लोग लड़ककयों से मारपीट नह ं करत!े लेककन तमु लोगों के इस तरह लड़ने-सभड़ने और रोने से हमारे दफ़्तर की बदनामी होती है।” “िाह रे तुम्हारा दफ़्तर!” लड़ककयाँमँहु धचढ़ाकर बोल - “ना टेबल-क्लॉथ, न सरुाह , गदं े गदं े मढ़ूे, ईंट लगी बेंच...” मटं ू अकड़कर बोला- “हम... हम लोग सादगी पसदं करते हैं.... हमारे दफ़्तर की बदनामी करोगी तो ठीक नह ं होगा।” लेककन लड़ककयाँनह ं मानी.... टूट बेंच और मढू ों पर ‘ट ल ल ल ’ करके हँसती रह ं और अपने स्टूल, टेबल क्लॉथ ददखाकर धचढ़ाने लगी.... “देखो, दफ़्तर ऐसा होता है, तुम लोग हमें क्या ननकालोगे-हमने तो दफ़्तर अलग बनाया है । ह ह ..। बस त्रबल्लूके सलए गस्ुसे पर काबूपाना मजुश्कल हो गया। उसे इतना गस्ुसा आया कक िह लड़ककयों के दफ़्तर की तरि दौड़ा और उनकी सरुाह उठाकर िोड़ द । तीनों लड़ककयाँ रोने लगी, “ऊँ ऊँ ऊँ... तुमने हमार सरुाह क्यों िोड़ी?” त्रबल्लूने जिाब ददया-“तुम सारे समय ठंडा पानी क्यों पीती रहती थी?’ लेककन लड़ककयाँ बार-बार रोकर यह पूछती-“ ऊँ ऊँ ऊँ.. तुमने हमार सरुाह क्यों िोड़ी?”


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 11 बाल हास्य उपन्याि — भारत िे “तुमने हम लोगों को बुद्धू, बेिकूि और मखू ा क्यों कहा?” “लेककन तुमने सरुाह क्यों िोड़ी?’ “तुमने हमारे दफ़्तर की बेइज्जती जो की।” दफ़्तर िाल बात पर जाने क्यों बबल तैि खाकर दौड़ी और लड़कों की बेंच से ईंट ननकालकर इधरउधर त्रबखेर द । किर कुन्नी और मोना के साथ समलकर उनके मढ़ूे भी गोल चक्करदार पदहये की तरह चला ददए। इस सब के जिाब में त्रबल्लूने उनके टेबल क्लॉथ से नाक पोंछ ल । किर तो बड़ा हंगामा मचा। सब तरि िोर हो गया कक ‘झगड़ा ननपटाकर दफ़्तर’ में जबरदस्त झगड़ा हो गया, आस-पास के सब बच्चे दौड़ आए और दफ़्तर के झगड़े में बीचबचाि करने लगे। लेककन तीनों लड़ककयाँअभी तक ऊँ ऊँ ऊँ करती हुई बस एक ह प्रश्न दोहराये जा रह थी..... “उन्होंने हमार सरुाह क्यों िोड़ी? ऊँ ऊँ ऊँ..” लड़के कहते-“जाने भी दो, गस्ुसे में नादानी कर बैठा।” लड़ककयाँ रोती-“ ऊँ ऊँ ऊँ सरुाह क्यों िोड़ी?” लड़के समझते-“उससे गलती हो गई..” ये िैसे ह रोतीं.. ऊँ ऊँ ऊँ... सरुाह क्यों िोड़ी..” मटं ू ने खीजकर कहा-“क्योंकक त्रबल्लूअव्िल नंबर का गधा हैजाकर सरुाह िोड़ द ”।- बस इस बात में जाने क्या जादूथा कक लड़ककयाँचुप हो गई और खिु होकर मस्ुकुराने लगी, यह सनु कर त्रबल्लू गस्ुसाने ह िाला था कक मटं ू ने उसके कान में िुसिुसाकर कहा- “मनैं े तो मजाक ककया है, तूगधा थोड़े ह है, पर इन मखू ा लड़ककयों को िुसलाने का यह उपाय था।” उधर कुछ लड़ककयाँबबल , कुन्नी को समझने लगी कक कल ह गड़ुड़या की िाद है, तम्ुहार मम्मी मठररयाँभी तल रह हैं, तुमने इतनी तैयार की है। लड्डू भी बन गए हैं, इस तरह झगड़े से तो सभी का बड़ा नुकसान होगा। समठाई नमकीन पर चींदटयाँलग जाएँगी।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 12 बाल हास्य उपन्याि — भारत िे लड़के भी धगट्टू, मटं ू और त्रबल्लूको समझा रहे थे कक भाइयो! लड्डुओ,ं समठाइयों और दालसेि पर हाथ साि करने का यह सनु हरा अिसर हाथ से मत जाने दो। त्रबल्लूिौरन मान गया। दोनों दल मान गए तो समझौता हो गया, लेककन दफ़्तर का सामान कािी टूट िूट गया था। किलहाल तो नह ं ह खुल सकता था और किर इधर िाद िगरैह में नगाड़ा, त्रबगलु िगरैह बजाने में सब व्यस्त रहेंगे, झगड़ा करने का टाइम ककसके पास रहेगा? इससलए कुछ लड़के दौड़कर एक बड़ी दफ़्ती लाए और उस पर लाल स्याह से सलखकर टाँग ददया गया— “दखु द सचू ना : अत्यंत दखु के साथ सधूचत ककया जाता है कक आप लोगों का वप्रय ‘झगड़ा ननपटाकर दफ़्तर’ कुछ आपसी परेिाननयों के कारण बंद कर ददया गया है। खास चेतावनी : हमार नकल पर खुले दसू रे झठूे दफ़्तरों से अपने झगड़े ननपटाने का जोखखम न ल जजए िरना हम जज़म्मेदार न होंगे। नक्कालों से सािधान! नोट : दफ़्तर जसै े ह किर चालूककया जाएगा, सभी झगड़ा करने िाले साधथयों को समय से सचू ना द जाएगी। तब तक के सलए हमें आज्ञा द जजए, नमस्ते।” ****************


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 13 जरा कहानी कह कर तो देखो पकं ज चतव ुदेी, भारत मध्यप्रदिे के झबआु मेंजन्मेपंकज चतवुेदी सिदं ी के प्रसिद्ध लेखक, अनवुादक, िम्पादक ि।ैं वे नेिनल बकु ट्रस्ट में िंपादक केपद पर कायषरत ि|ैं नेिनल बकु ट्रस्ट िेजड़ुनेपर पंकज जी का बच्चों केलेखन िेजड़ुाव और प्रगाढ िोता गया| उनकी दो दजषन िेज़्यादा बाल पस्ुतकेंआ चकुी ि।ैं उन्िोंनेबिुत िी पस्ुतकों का िंपादन और अनवुाद भी सकया ि।ै वेसनयसमत रूप मित्वपणूषपत्रपसत्रकाओंमेंभी लेखन करतेि|ैंउनके बीि िज़ार िेभी असधक आलेख और रपट प्रकासित ि|ैं उन्िोंनेसििकों केसलए 125 िेभी असधक और यसूनिेफ केसलए बच्चों केसलए कायषिालाओंका आयोजन सकया| उन्िेंकई मित्वपणूष िम्मानों िेपरुस्कृत सकया जा चकुा िैसजनमेंमाखनलाल चतवुेदी परुस्कार, एन िी आर टी व एन बी टी िेपरुस्कृत, उत्तर प्रदिे िािन िेिरू परुस्कार, पत्रकाररता िम्मान आसद कुछ नाम ि|ै िपं कष – [email protected] रंग, स्पिा, ध्िनन और िब्द - इन सभी के व्यजक्तगत अनुभि, जो बचपन की सबसे बड़ी पँूजी होते हैं, बालक के जीिन से दलु भा होते जा रहे हैं । एक जजरा समाज व्यिस्था के बीच जीिन के सलए संघर्ा करती परंपराएँ इन ननहायत ज़रर अनुभिों को महुैया कराने में सिम नह ं रह पा रह हैं। बालक बड़े अिश्य हो रहे हैं, लेककन अनभु ि जगत के नाम पर एक बड़े िून्य के बीच । स्पि,ा ध्िनन, दृजटट के बुननयाद अनुभिों की गर बी, बच्चों की नैसधगाक िमताओं को खोखला ककए दे रह है । स्कूल में पढ़ाई का बोझ बढ़ता जा रहा है- ऐसी पढ़ाई का बोझा , जजनका बच्चों की जज़ंदगी , भार्ा और संिेदना से कोई सरोकार नह ं है । ऐसी पढ़ाई समाज के िय को रोक नह ं सकती, उसे बढ़ािा ह दे सकती है । उन ददनों को याद करें जब तारों भरे आकाि के तले दाद - नाननयाँ पररयों की ऐसी कहाननयाँ सनु ाया करती थीं, जजनसे चररि और व्यजक्तत्ि के विकास की प्रेरणा समलती थी । आज ‘‘कथा-कहने’’ को बालकों के मानससक विकास का सिााधधक सिक्त तर का माना जा रहा है । इन ददनों जब प्रत्येक पालक अपने बच्चों के िार ररक, मानससक और नैनतक विकास के सलए जागरक है, ऐसे में ‘‘कथा - िाचन’’ की प्रकक्रया खासी महत्िपूणा हो गई है। अमेररकी मनोिैज्ञाननक डा. के .एल.रेड्डी और डा. के मनूता व्दारा ककए गए िोधों से पता चला है कक बच्चों को रोज कहानी सनु ाने से उनमें अदं रनी ‘‘प्रनतरिा यांत्रिकी’’ (Defence


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 14 आलेख— भारत िे Mechanism) ननसमता होती है । यह यांत्रिकी, बालकों को विर्म पररजस्थनतयों से जझू ने की िजक्त देती है । पहले तो सयं ुक्त पररिार थे और बच्चों को कहानी कहने के सलए घर में बड़-ेबूढ़े होते थे । आज माता-वपता जीिकोपाजना में व्यस्त हैंऔर पररिार त्रबखर रहे हैं। ऐसे में खाल समय व्यतीत करने के सलए बच्चे दरूदिना के भरोसे अधधक हैं। इसके दटुपररणाम समाज में तेजी से सामने आ रहे हैं। ऐसी पररजस्थनतयों में कथा िाचन एक साजत्िक और सरल माध्यम है । इसके सलए कुछ आिश्यक सझु ाि इस प्रकार हैं- 1. कहानी का चुनाव : कहानी का चुनाि बालकों के आयुिगा और िैक्षिक स्तर को ध्यान में रख कर करना चादहए। बच्चों की मानससक जस्थनत और सामाजजक पररिेि के अनुरप सनु ाई जाने िाल कहाननयाँ उन पर स्थाई प्रभाि छोड़ती हैं। आयुिगा के अनुसार ननम्नानुसार कहाननयों का चयन करना चादहए :- 3-5 वर्ष इस आयु िगा का विर्य स्ियं केंदित होता है । उसका ससं ार उसके आसपास तक ह सीसमत होता है । िह मेर माँ, मेरा घर, मेरे खखलौने जसै े विर्यों से बाहर नह ं सोच पाता हैं। अिर ज्ञान होता नह ं है और िब्द ज्ञान बेहद सीसमत होता है । इन्हें ऐसे कविता या गीत सनु ाएँ, जजनसे इनकी जबु ान पलटे, उच्चारण स्िस्थ हो । या किर चाटा, मखु ौटे, धचिों के व्दारा छोट -छोट काल्पननक घटनाएँ सनु ाएँ , जजनके विर्य उनके पररिेि के ह हों । बालकों को छोट कहानी सनु ानी चादहए । कहानी में घटना और काया की प्रधानता हो तथा िणना बहुत साधारण और सरल हो । भार्ा सरल और अच्छी हो, बड़े-बड़े, द्विअथी िाक्यों का प्रयोग न करें ।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 15 आलेख— भारत िे छोटे बच्चों की कहाननयाँ हमेिा सरल और छोट हों । ज़्यादा लबं ी कहाननयाँ सनु ाने से बच्चे थक जाते हैं, उनकी रुधच समाप्त हो जाती है । बच्चे स्िभाि से चंचल होते हैं, अतः लबं ी कहानी सनु ने का धैया उनमें नह ं होता है । बच्चों की कहाननयों का अतं हमेिा सखु ांत हो । 6-8 वर्ष बालक अब बड़े होने लगते हैं। िह विद्यालय जाने लगते हैंतथा पड़ोस में दसू रे बालकों के साथ खेलने लगते हैं। उनकी रुधच स्ियं से ननकल कर दनुनया में हो जाती है । िह अपने आसपास की दनुनया के प्रनत जजज्ञासुहो जाते हैं। जानिर, आकृनतयाँ, रंग उन्हें मोदहत करते हैं। उनके मन में भांनत-भांनत की कल्पनाएँ जन्म लेती हैं । िे विज्ञान गल्प, पररकथा, पंचतंि, उपननर्दों की कहाननयाँआदद को पसदं करने लगते हैं। कहानी के पािों से बालक भल -भांनत पररधचत हो , जजन्हें िह रोज देखता है जसै े कुत्ता, त्रबल्ल , गाय, घोड़ा, धचड़ड़या तोता, मनै ा, बालक, बूढ़ा, नौकर, सभखार , दकु ानदार, डाक्टर, इंजीननयर, ट चर, बैलगाड़ी, कार, हिाई जहाज आदद-आदद । ऐसे बालकों को कहानी कहते समय संिाद प्रकक्रया को अपनाना चादहए, यानन कथा के प्रत्येक पहलूमें बच्चों की भागीदार हो । जसै े कक पाि या स्थान का नाम उन्हें तय करने दें, किर क्या हुआ ? या ऐसे ह प्रश्न बीच-बीच में पूछते चलें । 8-12 वर्ष अब बालक खुद को दनुनया का एक दहस्सा मानने लगता है । िह िास्तविक और आदिा की बातें पसदं करता है । रोमांच, रोमासं , ककस्से-कहानी, ज्िलतं विर्यों से जड़ुे विर्यों पर पढ़ना पसदं करता है । इस आयु में बच्चे अपने जीिन का आदिा चररि तलािने लगते हैं, िे कुछ लोगों से प्रभावित होते हैंऔर उनके जसै ा बनना चाहते हैं। साथ ह कुछ व्यजक्तयों, मान्यताओं ि ससद्धांतों के प्रनत उनकी अरुधच भी होती है । ऐसे बच्चे बेहतर पाठक होते हैं, अतः उन्हें कहानी सनु ाते समय पाठक की मनोजस्थनत का आकलन अत्यािश्यक है ।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 16 आलेख— भारत िे 13 वर्ष से अधिक यह बच्चों की ककिोरिय अिस्था है । उन्हें यािा ितृ ांत, रुधचयों ,कैररयर जसै े विर्यों पर सनु ना पसदं होता है । इन्हें सनु ाने के सलए कुछ लबं े या धारािादहक कथानकों का चुनाि ककया जा सकता है । ध्यान रहे कक कहानी की विर्य िस्तु जहाँ तक हो िास्तविक हो, क्योंकक इस आयु िगा के बच्चे ताककाक होते हैंि अत्यधधक कल्पनािील कथा में िे िास्तविकता को तलािने लगते हैं। ऐसे में बीच कथानक में बहस नछड़ जाती हैऔर कथा िाचन का मजा समाप्त हो जाता है । 2. कहानी की प्रस्तुतत प्रयास होना चादहए कक कहानी के पािों/स्थानों के नाम, विसभन्न पािों की आिाज़ या बोसलयों और सिं ाद के रप में कम से कम एक चौथाई भागीदार बच्चों की हो । यह ना लगे कक केिल एक कथानक चल रहा हैऔर बच्चे मँहु पर अगं लु रख कर चुप बैठे हैं। बच्चों की जजज्ञासाओं और प्रश्नों को संयम के साथ तत्काल उत्तर देना चादहए । ककसी ऊटपटांग सिाल को गुस्से से नह ं बजल्क हँसी में ह टाल दें । हो सकता है कक ककसी कहानी की ककसी बात को समझने के सलए एक नई कहानी सनु ानी पड़े । कहानी के बीच में कह ं-कह ं कविता हो तो बच्चों को अधधक भाती है, इस प्रकार उन्हें कविता याद भी हो जाती है । इस बात का ध्यान रखें कक कहानी के बीच की कविताएँबहुत छोट , सरल और केिल तुकबंद सलए हुए हों और कहानी से संबंधधत हों । कहानी की भार्ा सरल और बच्चों की समझ के अनुरप होनी चादहए । उसमें सज्ञं ा, कक्रया और रोजमराा के वििेर्ण तथा कक्रयावििेर्ण का ह प्रयोग हो तभी बच्चे उसे समझ सकेंगे, आनंददत होने के साथ-साथ कुछ सीख भी सकेंगे । 3. अभिनय बहुत छोटे बच्चों को कहानी सनु ाने में धचत्रित पस्ुतकें, चाटा आदद प्रयोग में लाएँ । हमारा उद्देश्य यह होना चादहए कक असभनय या अन्य माध्यमों से कहानी का हर िब्द बच्चों को जीिंत होता उसी प्रकार ददखे जसै े उन्हें ट िी/किल्म में उन्हें मजा आता है ।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 17 आलेख— भारत िे कई कहाननयाँ असभनयपरक बनाई जा सकती हैंजसै े बालगोपाल की बाल ल ला, ध्रुि, प्रह्लाद, पांडिों का बचपन, महाराणा प्रताप, झाँसी की रानी, िसतं ऋतुका उत्सि आदद अनेक प्रसगं हैं जजनको सरल भार्ा में तैयार कर बाल-पािों के माध्यम से प्रस्तुत ककया जा सकता है । इस प्रकार खेल-खेल में मनोरंजन के साथ बच्चों में सहयोग, सहनिजक्त, समिता, प्रेम, स्मरण िजक्त आदद का विकास होगा । कथा वाचन के लाि 1. बच्चे में नछपी नैसधगका प्रनतभाओं को उभरने का मौका समलता है । 2. िब्द ससं ार में बढ़ोतर 3. बातचीत और सािात्कार के सलए आत्म विश्िास में बढ़ोतर 4. पढ़ने की आदत बढ़ती है 5. समहू में काम करने तथा नेतत्ृि िमता विकससत होती है । 6. अपने पालकों/ सििकों से िैचाररक अंतरंगता बढ़ती है । ज़रूरी ककताब – कहानी कहने की कला . प्रकािक- नेिनल बुक ट्रस्ट इंड़डया , नई ददल्ल खरीदने का भलिंक https://www.nbtindia.gov.in/books_detail__4__creative-learningseries__1675__kahani-kahne-ki-kala.nbt *****


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 18 िुदक रहा छोटू-सा मेंढक िर्ाा में भीगे टुपुर टुपुर। ओढ़ के अपना नन्हा छाता मन्ुनूदेखे टुकुर-टुकुर। सोच रहा मन्ुनू कैसे मैं इस छोटू की मदद करँ अब! खाँसी, छींक, बुखार हुआ तो करेगा क्या भई मेंढक तब! इसकी अम्मा ने इसको भी छाता अगर ददया होता ना, मेंढक को भी मझु जसै ा ह बोलो मजा बहुत आता ना! सदसवक रमेि (वास्तसवक नाम रमिे चदं िमाष), भारत उत्तर सदल्ली में जन्मे सदसवक रमेि जी सिदं ी केिप्रुसतसित कसव, बाल-िासित्यकार, अनवुादक और सचतं क ि।ैंउनकी सवसवध सवधाओंमेंलगभग 85 पस्ुतकेंप्रकासित िैंसजनमें14 कसवता-िग्रं ि, काव्य -नाटक ‘खण्ड-खण्ड असग्न’, बाल िासित्य (कसवता किानी, नाटक, िस्ं मरण) की लगभग 50 पस्ुतकें, एक किानी िग्रं ि और आलोचना-िोध की 8 पस्ुतकेंि|ैंदिे -सवदेि के सवश्वसवद्यालयों के पाठयक्रमों में रचनाएाँ िसम्मसलत िैं। वे िासित्य अकादेमी का बाल-िासित्य परुस्कार, िोसवयत लेंड नेिरू परुस्कार, सगररजा कुमार स्मसृत राष्ट्रीय परुस्कार, सिदं ी अकादमी, सदल्ली का िासित्यकार िम्मान, कोररयाई दतूावाि का प्रििं ा-पत्र, एन.िी.ई.आर.टी का राष्ट्रीय बाल-िासित्य परुस्कार, उ.प्र.सिदं ी िस्ं थान का बाल भारती परुस्कार आसद राष्ट्रीय- अतं रराष्ट्रीय परुस्कार-िम्मानों िे िम्मासनत िैं। िपं कष – [email protected] छाता अगर र्दया होता ना माँसे पूछा तो माँबोल तू मेरा अच्छा बेटू है। सबकी धचतं ा करता हैतू इसीसलए प्यारा बेटू है। पर मन्ुनूछोटू मेंढक को मजा बहुत बाररि में आता। उछल कूद कर तभी न देखो बाररि में इतना टरााता। *******


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 19 बाल कषवता— भारत िे कभी-कभी कविता में ककस्सा हो तो मजा बहुत आता है। नानी / दाद अगर सनु ाए तब तो मजा बहुत आता है। एक बार तो दाद जी ने गांधी जी की बात बताई। एक सीक्रे ट उनकी बदढ़या बड़े मजे की हमको भाई। बचपन में गांधी जी अपने पाठ्य पुस्तकें ह पढ़ते थे। और पुस्तकों को पढ़ने से िे तो बस बचते रहते थे। बोलो-बोलो बात जान यह कैसा लगा, अरे कुछ बोलो! नह ं पसदं न तुमको पढ़ना राज जरा अपना भी खोलो! दादी जी ने मुझे बताया पर अचानक हुआ क्या आगे कान लगाकर िह भी सनु लो! गांधी जी की नजर पड़ी थी इक पुस्तक पर यह भी सनु लो! वपता ने पुस्तक थी खर द नाटक की थी प्यार -प्यार । सत्यिाद हररश्चंि की कथा बहुत थी न्यार -न्यार । पढ़ कर चककत हुए गांधी जी अच्छी लगी बहुत ह पुस्तक! सीखा कभी न सच को छोड़ें आए चाहे बड़ी मसु ीबत। किर तो पढ़ना इतना भाया हुआ प्रेम पुस्तक से भार । दाद जी ने हमें बताया पुस्तक सच्ची दोस्त हमार । **********


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 20 बाल कषवता— भारत िे रहना है बि हमें प्यार ि े दरिाजा बोला खखड़की से कहो तो पूछूँ एक सिाल! पर नाराज नह ं जी होना नह ं जी काटना तुम बिाल! खखड़की बोल पूछो, पूछो मत इतना भी घबराओ जी। िान हमेिा मारा करते, मत इतना भी इतराओ जी! तो बताओ कहाँ पे रहती?- हँस कर बोला यूँदरिाज़ा। लगी सोचने खखड़की तो किर मन ह मन नाचा दरिाज़ा। बोला, खखड़की मैंबतलाऊँ- अजी द िार में रहती तुम, लगती हो द िार मझु े तो बोलो-बोलो, क्या कहती तुम! समझदार मत समझो खुद को इतना भी दरिाज़े भाई! तुम भी तो द िार में रहते, बात समझ में तुमको आई! अच्छा तुम भी समझदार हो- दरिाज़े ने कहा प्यार से। हँसे जोर से, बोले समलकररहना हैबस हमें प्यार से। ********


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 21 िींटी की िाल प्रो. राजेि क ु मार, भारत उत्तर प्रदिे के मज़ुफ़्फ़र नगर मेंजन्मेप्रो. राजेि कुमार सवसभन्न िम्मानों िेअलंकृत िप्रुसतसित िासित्यकार और केंद्रीय सिदं ी िस्ं थान, सििा सवभाग, भारत िरकार मेंप्रधान िपं ादक ि|ैंवेपवूषमें भारत िरकार केिस्ं थान राष्ट्रीय मक्तु सवद्यालयी सििण िस्ं थान केसनदिे क, रूि और अमरीका में सवसज़सटंग प्रो़ेिर रि चकुेि|ैंउनकी लगभग 100 पस्ुतकेंसभन्न सवर्यों और सवधाओंमेंप्रकासित ि|ैं सिदं ी के100 प्रमखु िासित्यकारों की सवसभन्न िसूचयों मेंउनका नाम िासमल सकया जाता ि।ैसििण में प्रौद्योसगकी, िम्पादन के िेत्र में उनके कायष उल्लेखनीय िैं| िपं कष – [email protected] उस ददन ऐसी आँधी आई तड़तड़ िड़िड़ धूल उड़ाई। टूटे पेड़ धगर पड़े खंभे बाररि ने की खूब दढठाई। रानी के आँगन में आकर तना धगरा के ले का भार । गमले उसने तोड़ ददए सब ऐसी की उसने मक्कार । रानी ने आकर जब देखा गस्ुसा उसको इतना आया। अभी उठाकर िेंकँू इसको एड़ी-चोट ज़ोर लगाया। लेककन तना बहुत था भार रानी उसको दहला न पाई। करँ मैंइसका क्या अब देखो रानी खूब-खूब झल्लाई। तभी एक कोने में उसको नतलचट्टा एक पड़ा ददखाई। नघसट रहा पीठ के बल था पैर पड़े ऊपर ददखलाई। डरकर एक क़दम पीछे हट देखा उसने हो भौंचक्का। कई चींदटयाँ समल-जलु करके सलए खींच जाती नतलचट्टा। "चीनू, मीनू, वपकं ी, रेखा झटपट आओ दौड़ लगाओ। तना यहाँआ पड़ा ननखट्टू समलजलु कर सब इसे हटाओ।" सबने समलकर ज़ोर लगाया चुटकी में िो तना उठाया। दरू उसे ले जाकर पटका हँसते-हँसते सब हो आया।। *****


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 22 प्यार करोगे प्यार नमलेगा बाल कषवता— भारत िे प्यार करोगे प्यार समलेगा दखु दोगे तो दखु बरसेगा। ककतनी चीज़ें इस दनुनया में प्यार प्यार बहन और भाई दोस्त हैंररश्ते इतना सखु अब कहाँ समलेगा। िूल हैंपौधे कोयल गाती मोर नाचता ककरणें उज्ज्िल हिा की ससहरन पिात अंबर हररयाले िन नद झील भी िै ला सागर जजतना चाहो और खुलेगा। पुस्तक नाटक मिू ी ट िी िब्दों का सखु बंसी की धुन नत्ृय नादटका धचिों का रुख डूबो जजतना और नतरेगा। समय कहाँ है दखु बोने का गस्ुसा करना और जलन का धचड़धचड़ मन है और उदासी धचत विचसलत है बात अहं की सोचो जजतना और िँसेगा। प्यार करो तमु प्यार िलेगा खुि होगे जग सखु ी बनेगा। ******


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 23 डॉ. िवेन्द्र सवक्रम सििं , भारत उत्तर प्रदिे मेंजन्मेडॉ. िवेन्द्र सवक्रम सििं उत्तर प्रदिे राज्य िैसिक अनिुधं ान एवं प्रसििण पररर्द् और बेसिक सििा सवभाग के सनदिे क रि चकुेि|ैं वेपवूषमेंराष्ट्रीय माध्यसमक सििा असभयान (आरएमएिए) के असतररक्त राज्य पररयोजना सनदेिक, माध्यसमक सििा सनदेिालय, उत्तर प्रदेि, यपूी भारत सलटरिी बोडषकेउपाध्यि जैिेमित्वपणूषपदों पर अपनी िवे ाएाँदेचकुेि|ैंउनकी आठ पस्ुतकेंप्रकासित िैंसजनमेंकई बाल िासित्य पर आधाररत ि|ैंउनकेकई आलेख व पत्र प्रकासित ि|ैं िवन्ेद्र जी को उत्तर प्रदिे सिदं ी िस्ं थान के िाथ िी कई अन्य िस्ं थाओंद्वारा िममासनत सकया जा चकुा ि|ै िपं कष – [email protected] भार्ा िे प्रेम की कला भार्ा एक माध्यम है, उपाय और औजार हैः सिं ाद का, सोचने के सलए, दसू रे के विचार और भाि समझने के सलए। सीखने का माध्यम है भार्ा। बच्चे जहाँ जन्म लेते हैंिहाँ की भार्ा सनु ते सनु ते एक ददन अस्पटट, किर साि साि बोलना िुर कर देते हैं। व्याकरण के दहसाब से भी सह सह । किर िे एक ददन स्कूल आते हैं। जहाँ उनका सामना छपे हुए िब्दों से होता है। किा की ककताबों से। लाइब्रेर में कहानी और कविता की ककताबों से। यह सह है कक कहाननयाँ, ससखाने के सबसे पुराने और प्रमखु औजारों में से एक है- हर घर में, हर पररिेि में, हर समाज में हर सस्ं कृनत में। इस पटृठभसूम में, किाओं में भार्ा ससखाने के सलए जो ककताबें हैंऔर पढ़ने के प्रनत रुधच जगाने के सलए बच्चों को जो ककताबें द जाती हैंउनके बारे में थोड़ी सी बातचीत ज़रर है। किा में भार्ा ससखाने के सलए जो ककताबें बच्चों के सलए बनाई गयी हैंउनकी एक खास तरह की बनािट होती है। कविता, कहानी, और भी कई चीज़ें उनमें िासमल होती हैं। किा एक से पाँच की पढ़ाई के दौरान िे औसतन पचास साठ कविताओं और कहाननयों से गजु रते हैं। लेककन उनमें पठन के प्रनत, कविता कहानी के प्रनत कोई रुधच नह ं जग पाती। किर अक्सर सनु ने को समलता है कक आजकल के बच्चे पढ़ना नह ं चाहते। जागरक असभभािक और महँगे स्कूल, बच्चों को अपनी ओर से बहुत कुछ उपलब्ध कराने लगे हैंः आनलाइन पठन सामग्री, आड़डयो-िीड़डयो, स्माटा किाएँ, िोन और टैबलेट, लपै टाप, तरह तरह के ऐप्प। लेककन ये सारे उपाय भी बच्चों में छपे हुए िब्दों के प्रनत आकर्णा नह ं पैदा कर पाते। तो सोचने िाल बात है कक समस्या बच्चों में है या सामग्री में या पढ़ाने के तर कों में? इस बात की भी पड़ताल करना ज़रर है कक बच्चे क्यों अच्छी तरह पढ़ना नह ं सीख पाते? उनमें पठन के प्रनत रुधच क्यों नह ं जग पाती?


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 24 आलेख— भारत िे यहााँकुछ बबन्दुमहत्वपूर्ष हैं- • बच्चों का छपे हुए िब्दों से पररचय ककस तरह होता है? उन्हें पढ़ना ककस तरह ससखाया जाता है? • ककताबों के पाठ, उनका कथ्य और उनकी भार्ा कै सी है? किानुक्रम के दहसाब से भार्ा की ककताबों में जो कथ्य ददया जाता है उनमें इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कक िे बच्चों की आयुके दहसाब से उपयुक्त हों, पररधचत हों। यह कािी हद तक सह है कक हम अपने से समलते जलु ते लोगों और पररजस्थनतयों के बारे में पढ़ना पसदं करते हैं। इस कोसिि में कथ्य अक्सर ऐसा बन पड़ता है जो बच्चों के सलए उनके रोजमराा के जीिन से कािी समलता जलु ता होता है। लेककन उनसे कुछ तो नया पता चले! िहाँउनके सलए नया जानने सीखने के सलए कोई अथपा ूणा चुनौती नह ं है। उनकी आयुके पाि, जसै ा उनके जीिन में हेा रहा है उसी तरह की घटनाएँ। पररधचत सिं ाद और पररजस्थनतयाँ। ककसी तरह के नयेपन के अभाि में बच्चे उनमें अपने सलए कोई आकर्णा नह ं पाते। जसै े जसै े ककताबें नीरस होती जाती हैं, बच्चे पढ़ना उतना ह कम अच्छी तरह सीख पाते हैं। प्रारंसभक किाओं में पाठों को धचिों से सजा-धजाकर प्रस्तुत ककया जाता है। यह पाया गया है कक िे स्कूल आने की उम्र तक धचिों को ड़डकोड करना सीख चुके होते हैं। उन्हें धचि आकवर्ता तो करते हैं लेककन यह उनके सीखने में व्यिधान भी पैदा करता है और अक्सर सीखने की गनत को कम कर देता है। ककताब के आिरण और अदं र के पन्नों पर छपे हुए िब्दों को ड़डकोड करने, उनका अथा अपने अनुमान से समझने की कोसिि गायब हो जाती है। बच्चों के सलए सलखी कहानी की ककताबों की भी दिा कमोबेि यह बन जाती है। बच्चे अक्सर िे कहाननयाँ देखते हैंजजनमें उनकी तरह के बच्चे हैं, भाई बहन हैं, पररिार है, दोस्त हैंऔर उनमें उन चीज़ों का बखान है जो समस्याओं से मक्ुत हैं। उनमें नकल से स्ट ररयोटाइप हैं। उनमें उन समस्याओं का कोई जजक्र नह ं होता जजनसे बच्चे कई बार जझू रहे होते हैं, तनाि में रहते हैंऔर ककसी से साझा नह ं कर पाते। तका यह होता है कक बच्चों को पररधचत चीज़ें, सरल चीज़ें आकवर्ता करती हैं। गभं ीर सिाल, चुनौनतयों से उनको बचा कर रखा जाता है। इसके अलािा िे कौन सी चीज़ें हैंजो बच्चों को मजेदार लगेंगी, ऐसा सोचकर घटनाओं और पािों की रचना की जाती है। ऐसी गनतविधध जो िांनत से एकाग्र होकर की जाये, जसै े ककताबें पढ़ना, या जजनमें पढ़कर सनु ाये जाने का जजक्र हो, पाठों और कहाननयों से पूर तरह से गायब हैं। महज इस आधार पर कक कोई गनतविधध बच्चों के सलए बहुत मनोरंजक है इसका यह अथा नह ं ननकाला जाना चादहये कक उसके बारे में बहुत सरल कृत ढंग से सलखा हुआ वििरण भी बच्चों के सलए उतना ह आकर्का होगा। खेल और मजे का यह ससद्धांत बच्चों को िास्तविक चुनौनतयों से जझू ने से िंधचत कर


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 25 आलेख— भारत िे देता है। ऐसे में बच्चे कब सीखेंगे, जझू ना। पररजस्थनतयों और समस्याओं से। कब हम उन्हें इस लायक समझेंगे कक िे नया सीखने के सलए तैयार हैं! बच्चे के िुरुआती दौर का पढ़ना सीखने का अनुभि ककस तरह का है इससे यह ननधााररत होगा कक िे सामान्य रप से सीखने को ककस तरह लेंगे। एक पाठक के रप में या कहें कक आगे चलकर िे एक व्यजक्त के रप में अपने आप को ककस तरह देखेंगे। क्या कर सकते हैं? • अच्छे कथ्य और पाठ की प्रासंधगकता और ज़ररत है, इसे तैयार ककया जाय, कराया जाय। ऐसी कथायें जो उनके पूरे व्यजक्तत्ि को सकारात्मक रप से अपील करें। बच्चों के सलए सलखना कदठन है। इससलए उनके सलए सलखने िालों को बच्चों के बारे में अपने नजररये की जांच-पड़ताल करने की ज़ररत है। • हर अच्छे सादहत्य की भांनत बच्चों की कहाननयाँभी उन्हें जीिन के बारे में और इसमें उनकी भसूमका के बारे में सोचने, मनन करने के सलए प्रेररत करें। जीिन बहुत सरल नह ं है। जदटल है। हालाँकक ज़रर नह ं है कक ककसी बच्चे का जीिन दसू रों के मुकाबले बहुत कदठन और जदटल हो और अगर कदठन हो भी या ददखता हो तो भी यह भािना जगे कक ननराि होने के बजाय उससे पार पाने और बाहर आने के सलए और रास्ते भी हैं। • बच्चों को ज़्यादा ककताबें दे देने भर से काम नह ं बनेगा। उनका इस्तमे ाल कैसे हो, इस पर ध्यान ज़रर है। • बच्चे जब पढ़ रहे होते हैंतो अपनी गलती पकडे े़ जाने, दसू रों के टोकाटाकी करने और सधु ारने को लेकर बहुत धचजन्तत रहते हैं। इससलए ऐसा करने के बजाय उन्हें पढ़ने भर ददया जाये, पढ़ने के सलए उत्सादहत ककया जाये। • बच्चे बहुत ध्यान से सनु ते हैं। िे रोज के अपने अनुभिों, आसपास के लोगों को सनु ते हुए, उनसे बातचीत करते हुए अपनी दनुनया के बारे में धारणाएँ बनाते रहते हैं। उन्हें बोलने, व्यक्त करने का अिसर ददया जाये। हालाँकक यह कदठन है, लेककन उन्हें ध्यान से और धयै ा से सनु ा जाए। ****


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 26 त्रबल्ल मेर सखी सहुािन मेरे बेड पर सोती है मेरे साथ खेलती है म्याऊं-म्याऊं गाती है मेरे साथ नाचती है चूहों िेि पीछे भागती है पुिदक-पुिदक कर आती है कभी कभी सताती है मेर त्रबल्ल , मेर प्यार मेर त्रबल्ल प्यार है।। **** मन करता है मेरा मैंबादल बन जाऊँ! हिा िेि साथ कह ं भी घूमँू मस्ती में लहराऊँ। मैंबादल बन जाऊँ।। सब जग घूम-घूम िेि मैं हररयाल पैिलाऊँ । सखू ी बधगया देखूँतो खूब पानी बरसाऊँ मैंबादल बन जाऊँ।। तेज धुप में छाया बनकर सरूज कह ं छुपाऊँ। बरस-बरस सार दनुनया पर गरमी मैंहटिाऊँ। मैंबादल बन जाऊँ।। **** बबल्ली बादल डॉ. िजं ीव क ु मार, भारत कानपरुमेंजन्मेडॉ. िंजीव कुमार बी पी ए एडवाइजरी सलसमटेड एवंइसंडया नेटबक्ुि मेंअध्यि एवं प्रबंध सनदिे क तथा उच्चतम न्यायालय मेंअसधवक्ता ि।ैंवेिासिसत्यक पसत्रका ‘अनस्ुवार’ के मख्ुय िंपादक ि|ैंउनका लेखन कई सवधाओंमेंि|ै उनकी काननू सवर्यों पर 36 पस्ुतकें तथा सिदं ी िासित्य में107 पस्ुतकेंप्रकासित िो चकुी ि|ैंबाल िासित्य पर उनकी लगभग 20 पस्ुतकें प्रकासित ि|ैंउन्िेंिासित्य भर्ूण परुस्कार, सिदं ी भार्ा भर्ूण िम्मान, मिादवे ी वमाष िासित्य भारतीय परुस्कार जैिेकई परुस्कारों िेिम्मासनत सकया जा चकुा ि|ै प्रसतसित िासित्यकार िम्मान रािी रैंसकंग मेंउन्िेंस्थानसमला ि|ै िपं कष – [email protected]


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 27 सदव्या माथरु, सिटेन सिटेन की वररि िासित्यकार सदव्या माथरु वातायन िंस्था की िंस्थापक िैंऔर नेिरु केन्द्र लन्दन मेंवररि कायषक्रम असधकारी केरुप मेंऔर सवश्व सिन्दी िम्मेलन 2000 की िांस्कृसतक उपाध्यि के रुप मेंअपनी िेवाएाँ प्रदान कर चकुी ि।ैं सदव्या जी को पद्मभर्ूण मोटुरी ित्यनारायण िम्मान, वनमाली कथा िम्मान और आट्षि-काउन्ििल औ़ इगं लैण्ड के आट्षि-अचीवर जैिेपरुस्कारों िेअलंकृत सकया जा चकुा ि।ैिाल िी मेंप्रकासित उपन्याि ‘सतसलस्म’ और बाल उपन्याि ‘सबन्नी बआु का सबल्ला’ काफी चसचषत रिेिैं| सदव्या जी की कई पस्ुतकों पर स्नातकोत्तर िोध िो चकुेि।ैं िपं कष - [email protected] फ़ौिफ़र बबन्नी बुआ का बबल्ला (बाल उपन्याि) त्रबन्नी बुआ का सह नाम त्रबनीता है पर सब उन्हें प्यार से त्रबन्नी कहते हैं। त्रबन्नी बुआ के पालतू त्रबल्ले का नाम फ़ौसफ़र है और फ़ौसफ़र के नाम के पीछे भी एक मज़ेदार कहानी है। जब त्रबन्नी बुआ उसे पहल बार घर में लाई थीं तो उसके चमकते हुए सफ़ेद और काले कोट को देख कर ईिा ने चहकते हुए कहा था। 'अरे, यह त्रबल्ला तो मेरे खखलौने लगं रू जसै ा चमक रहा है,' ईिा की बात सनु कर त्रबन्नी बुआ ने फ़ौरन उस त्रबल्ले का नाम फ़ौसफ़र रख ददया। 'फ़ौसफ़र क्या होता है?' ईिा ने पूछा। 'अधं ेरे में चमकने िाले खखलौनों में फ़ौसफ़र नाम की एक सामग्री होती है, जो सरूज या ककसी और रौिनी से एनजी यानन ऊजाा लेकर चमकने लगती है,' त्रबन्नी बुआ ने बताया। 'ओह! अब समझी कक मेरे बहुत से खखलौने क्यों चमकते हैं। तो किर, त्रबन्नी बुआ, क्या जगु नू भी इसीसलये चमकते हैं?' ईिा ने पछू ा। 'तुमने अच्छा सिाल पूछा, ईिा, ऐसा तब होता हैजब दो कैसमकल्स आपस में समलने पर ऊजाा पैदा करते हैं। जगु नूमें भी ऐसा ह एक कैसमकल होता हैजो अधँ ेरे में चमकता है। याद हैजब


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 28 बाल उपन्याि— बिटेन िे हम एक्िेररयम गए थे! िहाँ हमने चमकने िाल मछसलयाँ और के कड़े देखे थे, जजनके िर र से रौिनी ननकल रह थी,' 'हाँ, िो मैंकैसे भलू सकती हूँ, बहुत सदुं र लग रहे थे। तब मैंआप से यह पूछना भलू गयी थी, त्रबन्नी बुआ, कक जगु नूहमेिा दटमदटमाते क्यों रहते हैं? अगर हमेिा चमकते रहते तो मैंइन्हें अपने कमरे में लाइट की जगह इस्तेमाल कर लेती, मम्मी-पापा का बहुत सा खचाा बच जाता,' 'त्रबलकुल सह कहा तुमने, ईिा, जजस ज़माने में त्रबजल नह ं थी, बहुत से लोग ऐसा ह करते थे। छोटे-छोटे छेद िाले बतना में िे ढेर सारे जुगनुओं को बंद कर देते थे। जगु नुओं के साँस लेने और छोड़ने पर लाइट जलती बुझती है और तुम्हें यह जान कर हैरानी होगी कक दटमदटमाने के ज़ररये जगु नूआपस में बातें भी करते हैं। कैसमस्ट्र की क्लास में तुम्हें इस बारे में और भी ज़्यादा जानकार समलेगी,' 'जब मैंबड़ी क्लास में आ जाऊँगी न, त्रबन्नी बआु , तो मैंकैसमस्ट्र ज़रर पढूँगी,' 'तुम्हारे सलए यह विर्य बहुत मनोरंजक होगा, ईिा, यदद तुम कैसमस्ट्र यानन कक रसायन-िास्र के बारे में जान लोगी तो तुम्हें बहुत सी बातें समझ आ जाएँगी जसै े चाँद की समट्ट कैसी है, पथ्ृिी और पेड़-पौधों का ज्ञान, ओज़ोन कै से बनता है, दिाइयाँकैसे काम करती हैं, िगरैह िगरैह,' 'त्रबन्नी बआु , मैंजल्द से बड़ी हो जाऊँ तो ककतना अच्छा हो? अभी तो सब मझु से यह कहते रहते हैं, अभी तुम छोट हो, जब बड़ी हो जाओगी तो जान जाओगी,' 'ईिा, धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माल सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए िल होय,' दाद ने समझाया। 'दाद , मझु े पता था आप यह कहेंगी। मझु े कबीर जी यह दोहा रट चुका है,' अपना हाथ माथे पर रखते हुए ईिा ने दोहा ज्यों का त्यों दोहरा ददया। सबने तासलयाँबजा कर ईिा की तार फ़ की। ईिा की छोट बहन मीिा, जो ईिा से तीन साल छोट है, को कुछ भी समझ नह ं आया था पर सबकी नकल करते हुए िह भी तासलयाँबजा रह थी। *****


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 29 रोसित क ु मार िप्ैपी , न्यज़ ू ीलडैं मध्य प्रदिे िरकार द्वारा राष्ट्रीय सनमषल वमाष िम्मान प्राप्त रोसित कुमार ‘िैप्पी’ न्यज़ूीलैंड िे प्रकासित िोनेवाली इटं रनेट पर सवश्व की िबिेपिली सिन्दी िासिसत्यक पसत्रका भारत-दिषन के िम्पादक िैंव सनरंतर सिदं ी-कमष में अग्रिर िैं। रोसित जी सिदं ी न्यूमीसडया केिाधक ि।ैं न्यज़ूीलैंड िे पत्रकाररता में प्रसिसित िैं व सविेर् रूप िे िोध, वेब पत्रकाररता व खोजी पत्रकाररता के सलए जाने जाते िैं। िाल िी मेंकेन्द्रीय सिन्दी िंस्थान, आगरा द्वारा इनकी दो मित्त्वपणूषपस्ुतकों का प्रकािन सकया गया िै - न्यज़ूीलैंड की सिन्दी यात्रा एवं प्रिान्त की लोक कथाएाँ। िपं कष – [email protected] कं गारू के पेट की िैली बहुत पुरानी बात है। उस समय कंगार के पेट पर थैल नह ं होती थी। विज्ञान इस बारे में जो भी कहे लेककन इस बारे में ऑस्ट्रेसलया में एक रोचक लोक-कथा है। बहुत पहले की बात है। एक ददन एक मादा कंगार अपने बच्चे के साथ जगं ल में घूम रह थी। बाल कंगार पूर मस्ती में था। िह जगं ल में पूर उछल-कूद कर रहा था। “दरू मत जाना।" कंगार माँने कहा। बाल कंगार रुकने का जैसे नाम ह न ले रहा था। कभी इधर तो कभी उधर, खूब उछल-कूद कर रहा था। कंगार माँकी नज़रें रह-रह कर अपने बच्चे पर जाती कक कह ं बहुत दरू न ननकल जाए। ‘यहाँऔर जगं ल जानिर भी तो हैंऔर सिकाररयों का भी डर रहता है।' यह सोचकर िह ससहर उठती। तभी उसने एक बूढ़ा जानिर आते हुए देखा। मादा कंगार उसे बड़े ध्यान से देखने लगी, उस जानिर की त्िचा कािी िुटक ददखाई पड़ती थी। िह बहुत धीमे-धीमे चल रहा था। िायद िह कािी बूढ़ा था। मादा कंगार को उस पर बड़ी दया आई। उसने थोड़ी ननकट जाकर पूछा, “आप कैसे हैं?” बूढ़े जानिर ने थोड़ा सतका होते हुए कहा, “ककसी ने मझु े पुकारा?” मादा कं गार ने उत्तर ददया, “जी, मनैंे आपको बुलाया।" “तुम कौन हो? कहाँहो? मझु े ददखाई नह ं देता। मैंदेख नह ं पाता हूँ।" मादा कंगार ने पूछा, “क्या मैंआपकी कोई मदद करँ?” “आजकल सब मझु े नकारा समझने लगे हैं। मैंजसै े अपने पररिार पर भी बोझ बन गया हूँ।" “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?” मादा कंगार ने करुणा से भर आिाज़ में पूछा। उसे बूढ़े जानिर पर बहुत दया आ रह थी।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 30 बाल लोक किा — न्यूज़ीलैंड िे “बस, बुढ़ापे में जीिन कुछ इसी तरह का होता है।" तभी मादा कं गार को अपने बच्चे ‘जॉय' का ध्यान आया। उसका बच्चा आसपास कह ं ददखाई नह ं पड़ रहा था। "अरे, ये जॉय कहाँ चला गया?" "जॉय, जॉय।" उसने दो-तीन बार आिाज़ लगाई। “क्या हुआ?” बूढ़े जानिर ने पूछा। “मेरा बेटा ‘जॉय’ कह ं ददखाई नह ं दे रहा। अभी तो यह ं था।" मादा कं गार धच ंनतत थी। “यह ं कह ं खेल रहा होगा। ज़रा ध्यान से देखो।“ “मैंअभी लौटती हूँ।“ कहकर मादा कं गार पास की झड़ड़यों की ओर चल गई। थोड़ी दरू गई तो एक बड़े से पेड़ के नीचे बाल कंगार ‘जॉय’ समल गया। “अरे, जॉय तुम यहाँ हो! मनैं े तुम्हें ककतना ढूंढा! ककतनी बार कहा है, जब भी कह ं जाओ, बताकर जाया करो।“ किर उसने अपने बच्चे का मासमू चेहरा देखकर थोड़ी सहज होते हुए कहा, “अच्छा चलो। आगे से ध्यान रखना। दरू मत जाना।" नन्हें कंगार ने माससूमयत से ससर दहला ददया। तभी मादा कंगार ने देखा कक दरू से एक भील उस बूढ़े जानिर पर अपना ननिाना साध रहा है। कंगार सोचने लगी, िह उस बढ़ूे जानिर को कैसे बचाए। उस बेचारे को तो ददखाई भी नह ं देता। िह ‘जॉय’ को िह ं घनी झाड़ड़यों में त्रबठाकर, “कह ं मत जाना। खतरा है। मैंअभी आती हूँ।" कहकर, उस बूढ़े जानिर की सरुिा करने के सलए दसू र ओर चल द ं। इधर भील उस जानिर पर अपना ननिाना लगाने ह िाला था। मादा दरू से धचल्लाई, “भागो, भागो।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 31 बाल लोक किा — न्यूज़ीलैंड िे सिकार तुम्हें ननिाना बनाए हुए है। जल्द से कह ं भाग जाओ।" बूढ़ा जानिर जजतनी तेजी से हो सका झाड़ड़यों की ओर भाग गया। अब भील अपना ननिाना मादा कं गार की ओर साधने लगा। ककसी तरह अपनी जान बचाकर मादा कंगार भाग ननकल । किर उसने देखा कक भील िापस लौट गया है। तभी उसने पास में छुपे बूढ़े जानिर की ओर देखा और पूछा, “क्या आप ठीक हैं?” बूढ़े जानिर ने मसु कुरा कर कहा, “हाँ, मैं ठीक हूँ। आपने मेर जान बचाई, धन्यिाद।" “ईश्िर का धन्यिाद है कक आप सह सलामत हैं।" मादा कंगार ने प्रसन्नता से उसकी ओर देखा। आश्चय!ा िह जानिर अपना रप बदल चुका था। िास्ति में िह कोई जानिर न होकर देिता था। िह तो धरती पर सबसे दयालुजीि की खोज में आया था और अब उसकी खोज पूर हो चुकी थी। िायद कंगार ह सबसे दयालुजीि था। उसने अपने िास्तविक रप में आकर मादा कंगार को कोई उपहार देने की इच्छा जताई। “प्यारे कंगार, तुम इस धरती के सबसे दयालुजीि हो। मैंधरती के अनेक दहस्सों पर घूमा लेककन मझु े तुम जजतना दयालुकोई और ददखाई नह ं ददया। तुम धन्य हो।“ यह कहकर, देिता किर बोला, “मैंतुम्हें उपहार स्िरप एक ऐसी चीज़ देता हूँ, जो तुम्हारे बहुत काम आएगी।“ यह कह कर देिता ने कं गार के पेट पर एक थैल उत्पन्न कर द । “इस थैल में तुम अपने बच्चों को सरुक्षित रख सकोगी।" मादा कंगार बहुत खुि हुई लेककन अगले ह पल बोल , “मेरे बच्चे तो सरुक्षित हो जाएंगे लेककन अन्य कं गारुओं का क्या?" मादा कंगार की इस दयालतु ा और अन्य जीिों के प्रनत उसकी भािना का सम्मान करते हुए, देिता ने सभी कं गारुओं और उनकी आने िाल पीदढ़यों को यह िरदान दे ददया कक उनके पेट पर एक थैल होगी। बस तभी से सभी कं गारुओं के पेट पर यह थैल होती है। *****


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 32 षवभभन्न देशों की नववर् षपरम्पराए ँ रीता कौिल, ऑस्ट्रेसलया मिात्मा गााँधी िंस्थान मॉरीिि द्वारा िम्मासनत रीता कौिल वर्ष2011 िेऑस्ट्रेसलयन गवनषमेंट की स्थानीय पररर्द्मेंसवत्तीय असधकारी केरुप मेंकायषरत ि।ैं उन्िेंसिदं ूकाउसन्िल ऑफ ऑस्ट्रेसलया द्वारा भार्ा व िासित्य के ‘गागी अवाडष 2023 िेिम्मासनत सकया गया िै| सवश्व सिन्दी िसचवालय मॉरीिि द्वारा आयोसजत प्रसतयोसगता मेंपरुस्कृत रीता जी की किासनयों, कसवताओ,ं बाल किासनयों की पस्ुतक िसित एक उपन्याि भी प्रकासित िो चकुा िै। िपं कष - [email protected] विश्ि भर में नििर्ा का स्िागत नत्ृय-संगीत, िोर-िराबे, उल्लास, आनतिबाजी, खाने-पीने, उत्सि मनाने से होता है। सभी बीते साल की धचतं ाओं और दखु ों को भलु ा कर आने िाले िर्ा में सखु - सम्पवत्त ि अच्छे स्िस्थ की कामना करते हैं। इन समानताओं के बािजदू प्रत्येक राटट्र के अपने तौरतर के और परंपराएँ होती हैं। इसी कारण से विश्ि के विसभन्न देिों में नििर्ा को मनाने के तर कों में भी सभन्नता पाई जाती है। स्पेन में नए साल की एक परंपरा 12 अगं रू खाने की है। 31 ददसम्बर की रात को जब 12 बजने में 12 सेकंड रह जाते हैंतो आने िाले िर्ा में समद्ृधध की कामना करते हुए हर व्यजक्त घड़ी की दटकदटक के साथ 12 अगं रू खाने की कोसिि करता है। ये 12 अगं रू साल के 12 मह नों के प्रतीक होते हैं। यदद कोई व्यजक्त इस चुनौती को पूरा कर लेता है तो ये माना जाता है कक आने िाला पूरा साल उसके सलए िुभ रहेगा। इस चुनौती को पूरा न करने का अथा है जजतने अगं रू छूट गए हैं साल के अतं के उतने ह मह ने बहुत अच्छे नह ं होंगे। इन लकी अंगरूों के स्िाद के खट्टे-मीठे होने के आधार पर भी आने िाले िर्ा के िुभ-अिुभ होने का अनुमान लगाया जाता है। कहा जाता है कक यह परंपरा 1909 में िुर हुई थी जब एक स्पेननि िेि में असाधारण रप से अंगरू की बहुत ह अच्छी िसल हुई थी। उस समय अगं रूों की खेती करने िालों ने अपनी अनतररक्त िसल को दठकाने लगाने के सलए जो तर क़ा ढूँढा था, िो समय के साथ एक मजेदार स्पेननि परंपरा में बदल गया। िैसे नििर्ा मनाने की यह परम्परा स्पेन के अलािा िेनेजएुला, मेजक्सको, पेर आदद देिों में भी देखने को समलती है।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 33 आलेख— ऑस्ट्रेसलया िे िेनेजएुला में 12 लकी अगं रूों को बीतने िाले साल के अनं तम 12 सेकंड में चबाने के अलािा, और भी कई मज़ेदार चीजें की जाती हैं। नििर्ा की पूिा सध्ं या पर यहाँके लोग पीले रंग का अडं रवियर पहनते हैं। इससे भी ज़्यादा रोचक बात ये है कक कुछ लोग एक सटूकेस या बैग घसीटते हुए अपने आस-पड़ोस में भागते-दौड़ते हैं। इस परंपरा को अक्सर िह लोग ननभाते हैं जो नििर्ा में बहुत सी यािाएँ करने की चाहत रखते हैं। इक्िेडोर और कोलत्रं बया देिों में भी इसी मनौती के साथ नििर्ा पर आस-पड़ोस में सटूकेस या बैग घसीटते हुए दौड़ने का चलन है। मजैक्सको, बोल विया और ब्राजील जसै े लदैटन अमेररकी देिों में भी नििर्ा पर धन ि समद्ृधध के सलए पीले रंग, िांनत और सद्भाि के सलए सिेद, प्रकृनत ि सभी की भलाई के सलए हरे, ि प्रेमप्यार के सलए लाल रंग का अंडरवियर पहनने की परम्परा है। टकी में एक िुभकार नए साल की मनौती के रुप में उपहार में लाल अडं रवियर ददये जाते हैं। डने माका में पररिार के सभी लोग नििर्ा की पूिा सध्ं या पर बारह बजने के थोड़ा पहले अपने एक हाथ में एक ससक्का लेकर कुससया ों पर खड़े हो जाते हैं। और मध्यरात्रि में 12 बजते ह ‘गॉडट नायर’ कहते हुए सौभाग्य की उम्मीद में जनिर में ‘छलांग’ लगाने के सलए एक साथ ििा पर कूद पड़ते हैं। ‘गॉडट नायर’ का डनेनि में अथा होता है ‘नया साल मबु ारक हो’। जापान के पारंपररक नए साल के र नत-ररिाजों में से एक ‘हत्समु ोड’ है। यह नए साल की पहल - धासमका यािा होती है। बहुत से लोग 1, 2 या 3 जनिर को पूजा करने के सलए जाते हैंऔर एक खुिहाल और स्िस्थ िर्ा की कामना करते हैं। ‘मीजी-जजगं ू’ जैसे बड़े मंददर आमतौर पर नए साल की पूिा सध्ं या पर परू रात खुलते हैंताकक लोग नए साल के पहले कुछ घंटों में अपनी प्राथना ा कर सकें। ‘जोया नो के न’ नए साल की पूिा सध्ं या पर पूरे जापान में आयोजजत घंट बजने का पारंपररक समारोह है। पुराने िर्ा के बीतने और नए की िुरुआत का जश्न मनाने के सलए पूरे देि के सभी मंददरों की घंदटयों को 108 बार बजाया जाता है। ऐसा बौद्ध धमा में बताई गई 108 सांसाररक इच्छाओं को दरू करने के सलए ककया जाता है। जापाननयों का मानना है कक इन घंदटयों का बजना उन्हें बीते साल के पापों से मक्ुत कर देगा। आमतौर पर 31 ददसम्बर की रात को 12 बजने तक 107 बार घंट बज जानी चादहए, जबकक 108 िीं बार घंट बारह बजे के ठीक बाद नए साल में बजाई जाती है।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 34 आलेख— ऑस्ट्रेसलया िे किल पींस में आने िाले िर्ा के समद्ृधधिाल होने की उम्मीद में िहाँ के नागररक अपने आसपास गोल चीज़ें रखते हैं, जो कक धन का प्रनतननधधत्ि करती हैं। इससलए िे जेब में ससक्के रखते हैंऔर उन ससक्कों को लगातार खनकाते रहते हैं। इसके अनतररक्त िे डॉट्स वप्रटं के कपड़े पहनते हैं। यह सब नए िर्ा में धन का प्रिाह बनाए रखने के सलए ककया जाता है। इसके अलािा 31 ददसंबर की रात को किल पींस के लोग आधी रात से पहले घर की हर लाइट जला देते हैं। अपने घर की नकारात्मक ऊजाा से छुटकारा पाने के सलए घर का हर दरिाज़ा और खखड़की खोल कर ट्रम्पेट और बतना बजाते हैं। जसै े ह घड़ी की सुई रात के बारह बजाती है, पररिार के सभी सदस्य दरिाज़े-खखड़ककयाँ बंद करने के सलए दौड़ पड़ते हैं। सबसे मज़ेदार बात ये है कक कफ़ल पीनो नए साल पर सीदढ़यों पर कूदते हैं। उनका मानना है कक ऐसा करने से भाग्य में िद्ृधध होती है और लोगों की लम्बाई बढ़ती है। ग्रीस में नए साल की पूिा सध्ं या पर एक वििेर् केक बनाया जाता है। इसमें एक ससक्का नछपा ददया जाता है। जजस ककसी के दहस्से में केक का ससक्के िाला टुकड़ा आता है उसके सलए आने िाला साल िुभ माना जाता है। कोररया में लोग नए साल का पहला सयू ोदय देखकर आने िाले िर्ा में सखु िांनत की कामना करते हैं। तो बच्चो, विश्ि के कई अन्य देिों में नििर्ा मनाने की ऐसी और भी बहुत सी विधचि परम्पराएँहैं। समय आने पर उनके बारे में भी हम आपको बताएँगे। अभी के सलए आप सभी को नििर्ा 2023 की हाददाक िुभकामनाएँ! *******


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 35 keÀVeæ[ yeeue keÀefJelee डॉ. टी जी प्रभािकं र प्रमेी , भारत कनाषटक मेंजन्मेडॉ. टी जी प्रभािंकर प्रेमी सिदं ी कन्नड़ केिप्रुसिद्ध लेखक अनवुादक ि।ैंसिदं ी कन्नड़ भार्ा मेंतलुनात्मक अध्ययन एवंअनवुाद सवज्ञान मेंइनकी सविेर्ज्ञता ि।ैइन्िोंनेअनेक सवधाओं मेंप्रचरु काम सकया ि|ैसिदं ी मेंिोध िेिंबंसधत 4 पस्ुतकें, 3 कसवता िंग्रि, 2 आलोचना पस्ुतक िसित पाठ्यक्रमों िेिंबंसधत 33 पस्ुतकों का िंपादन भी सकया ि|ैसवसभन्न परुस्कारों िेिम्मासनत प्रभािंकर जी सिदं ीत्रमैासिक बािव मागषकेप्रधान िम्पादक भीि|ैं िपं कष - [email protected] yeeue meeefnl³e keÀer HeefjkeÀuHevee DeeOegefvekeÀ nesves Hej Yeer FmekeÀe Fefleneme Glevee ner Hegjevee nw efpelevee meeefnl³e~ ueeskeÀ meeefnl³e lees efueefKele meeefnl³e mes Yeer Hegjevee nw Deewj GmekeÀer HejbHeje ceewefKekeÀ jner~ keÀVeæ[ meeefnl³e Yeer yengle Òee®eerve nw~ Jen êefJeæ[ Yee<eeDeeW ceW SkeÀ Deewj ÒeeefleefveefOekeÀ nw~ keÀVeæ[ meeefnl³e SkeÀ npeej Je<e& mes Yeer Hegjevee nw~ 9JeeR Meleeyoer mes ner FmekeÀe Òee®eerve ªHe efceuelee nw~ keÀVeæ[ ceW yeeue meeefnl³e keÀer peæ[W ueeskeÀ meeefnl³e leLee HeewjeefCekeÀ ûebLeeW ceW efceueleer nQ~ efHeÀj Yeer yeeue meeefnl³e keÀes SkeÀ J³eJeefmLele ªHe DeeOegefvekeÀ keÀeue ceW efye´efìMe Meemeve ceW ye®®eeW kesÀ efueS efMe#ee kesÀ DeejbYe kesÀ meeLe `yeeue yeesOe' kesÀ ªHe ceW efceuee~ 1130 F&. ceW ner ogiee&eEmen ves `mebmke=Àle Heb®eleb$e' keÀes `keÀvee&ìkeÀ Heb®eleb$e' kesÀ Meer<e&keÀ mes keÀVeæ[ kesÀ ye®®eeW kesÀ efueS Òemlegle efkeÀ³ee ³en keÀVeæ[ Yeeef<e³eeW kesÀ efueS ieJe& keÀe efJe<e³e nw~ Deeies 1794 F&. mes 1898 F&. mes yeer®e cewmetj kesÀ cenejepee cegcceeæ[ ke=À<Cejepe Dees[s³ej ves Heb®eleb$e keÀer keÀneefve³eeW keÀes ÒekeÀeefMele efkeÀ³ee~ ueeskeÀieerleeW ceW yeeue meeefnl³e ö ueeskeÀieerle efkeÀmeer Yeer Yee<ee ceW nes, keÀye efueKee ie³ee Deewj efkeÀmeves efueKee keÀnvee keÀefþve nw~ ³en ceewefKekeÀ ªHe ceW nesves mes mece³e mece³e Hej FmekeÀe ªHe yeouelee Yeer jnlee nw~ ceeB Deewj ye®®es keÀe mebyebOe osefKeS ö leeef³e cekeÌkeÀU oefve³eg leeU yeeefjefmeobie peesæ[ efkeÀVetefj vegef[efmeoebie......~ (ceeB Deewj ye®®es keÀer DeeJee]pe leeue yepeeves kesÀ meceeve Deewj peesæ[er efkeÀVejer (JeeÐe) SkeÀ meeLe yepeeves kesÀ meceeve nw.......) ye®®ee jeslee lees ueeskeÀpeve kesÀ efueS efkeÀlevee megboj ueielee nw ö `DeUgJe kebÀove legefì³eg nJeUo kegÀef[³eebie kegÀef[ ngyyeg yesefJeve SkeÀUbie ~ keÀCCeesì efMeJeve kewÀ³eueieg nesUsobie~' (jesles ye®®es kesÀ neWþ leepes cetBies kesÀ meceeve~ YeeQJes veerce keÀer HebKeg[er kesÀ meceeve~ DeeBKe keÀe osKevee efMeJe kesÀ neLe kesÀ leueJeej keÀer ®ecekeÀ kesÀ meceeve~ keÀVe[ ceW ieesefJeve ne[g (iee³e keÀe ieerle) cetueleë ueeskeÀieerle nw~ ³en keÀLeve ieerle efkeÀmemes keÀye efueKee ie³ee, Helee veneR~ ³en ieerle Deepe Yeer ye®®eeW kesÀ cegBn ceW nw~ Deewj megveles megveeles DeeBKeeW mes DeeBmet ueieeleej yen peeles nQ~ ³en SkeÀ iee³e keÀer keÀLee nw~ yeeue meeefnl³e YeefkeÌle kesÀ meboYe& ceW ö ke=À<Ce YeefkeÌle meeefnl³e Jeelmeu³e jme ÒeOeeve nw~ ³eMeesoe-ke=À<Ce keÀe Jeelmeu³e SkeÀ DeveesKee Òemebie nw~ keÀVeæ[ ceW Yeer ³es yeeueHeve kesÀ Òemebie oeme meeefnl³e ceW efceueles nQ~


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 36 कन्नड़ िे अनूर्दत — भारत िे Hegjbojoeme kesÀ ef®eef$ele Deewj SkeÀ Òemebie ceW yeeuekeÀ ke=À<Ce ceeB mes keÀnlee nw ceeB newJee (Yetle) keÀes cele yegueeDees, ceQ ®egHe jntBiee~ mleve Heeve kesÀ efueS nþ ve keÀªbiee~ ceQ legcnejs keÀns Devegmeej DeVe KeeTBiee~ ``iegcceve keÀjs³eefojs~ Deccee veerveg, iegcceve keÀjs³eefojs~ megcceves FÎsveg~ Deefcce³e yes[sveg~ cecceg GCegÊesves Deccee DeUgJegefouuee~' (Deccee legce newJee (Yetle) cele yegueeDees~ ®egHe jntBiee mleveHeeve kesÀ efueS nþ ve keÀªBiee~ DeVe KeeTBiee~ ceQ jesTBiee veneR ceeB~ cegefêle yeeue meeefnl³e keÀe DeejbYe cegefêle yeeue meeefnl³e DeeOegefvekeÀ ³egie keÀer osve nw~ JeemleJe ceW yeeue meeefnl³e ye®®eeW ceW Heæ{ves keÀer DeemeefkeÌle keÀes mebmkeÀej osves keÀe HetjkeÀ meeefnl³e nw~ Deleë efmeHe&À yeæ[s De#ejeW ceW íeHeves cee$e mes yeeue meeefnl³e veneR yevelee~ GmekeÀe ue#³e ye®®eeW keÀes ceeveJe yeveevee nw, GvnW efJeMJe kesÀ Jewef®e$³e keÀes KeesuekeÀj efoKeevee nw Deewj ef®e$e, keÀeìt&ve Deeefo kesÀ ceeO³ece mes GmekesÀ kegÀletnue Deewj efpe%eemee keÀes le=Hle keÀjvee nw~ FmeefueS yeeue meeefnl³e efvel³e-vetleve neslee nw~ DebûespeeW kesÀ Meemeve ceW ³en yeeue meeefnl³e, meeefnl³e keÀer SkeÀ Deueie efJeOee kesÀ ªHe ceW efJekeÀefmele ngDee~ nceejs Òee®eerve meeefnl³e ceW GHejeskeÌle GoenjCe kesÀ Devegmeej ueeskeÀ ieerleeW ceW YeefkeÌle meeefnl³e ceW FmekeÀer peæ[s efceueves Hej Yeer GmekeÀe J³eJeefmLele ªHe ceW efJekeÀeme DeeOegefvekeÀ keÀeue ceW ner ngDee~ mJeeleb$e HetJe& keÀeue ceW yeeueieerle ö keÀVeæ[ ceW ye®®eeW kesÀ efueS meJe&ÒeLece mebkeÀueve `yeeue ieerlesieUg' nw, pees meved 1862 ceW ÒekeÀeefMele ngDee~ Fme ÒekeÀej efMeMeg ieerleeW keÀer HeefjkeÀuHevee HeeM®eel³e meeefnl³e kesÀ ÒeYeeJe mes veme&jer `jwcme' kesÀ ªHe ceW keÀVeæ[ ceW Dee³eer~ meved 1895 ceW Þeer Sme. peer. vejeEmene®ee³e& ves `ieesefJeve ®eefj$e' Deewj `®ebê' Meer<e&keÀ mes oes ieerle ye®®eeW kesÀ efueS ÒekeÀeefMele efkeÀS Les ~ ³eLee ö neefo yeerefo³eefueªJe keÀmeo nguueveg cesog~ yebog cevesies veeveg Dece=leJeerJes, Deovegb[g veveiesj[g yeieso ceeveJe veerveg ~ veerveeefjieeos³ees Sues ceeveJee~ (ieesefJeve ®eefj$e) (iee³e keÀe keÀLeve nw efkeÀ jemles ceW efceues ketÀæ[s kesÀ Ieeme-Hetme KeekeÀj, Iej DeekeÀj ceQ Dece=le osleer ntB~ Gmes HeerkeÀj cegPes ner OeesKee osvesJeeuee ceeveJe nes legce~ yeleeDees legce efkeÀmes GHe³eesieer nes?) keÀeJesjer veoer Hej j®es `keÀeJesjer ceefnces', `keÀeceve efyeuueg' (Fbê Oeveg<e), jsue ieeæ[er Hej `nesies³e ieeæ[er' (OegSB keÀer ieeæ[er) vejeEmene®ee³e& peer kesÀ Dev³e GuuesKeveer³e yeeueieerle nQ~ Hebpes cebiesMejeJe peer yeeue meeefnl³e pevekeÀ keÀnueeles nQ~ GvneWves meved 1896 mes ner yeeueieerle j®evee Meg© efkeÀ³ee Lee~ GvekesÀ `leWkeÀCeieeefU³eeì' (leWkeÀCe nJee keÀe Kesue), pees Frolic in the wind keÀe ªHeeblej nw. `Go³ejeie', `veeiej neJes' (veeie meHe&), `pesvengUg (ceOegcekeÌKeer) Deewj `veoer' ieerle ies³elee, mejuelee Deewj megyeesOelee kesÀ keÀejCe ye®®eeW ceW Deepe Yeer ueeskeÀefÒe³e nQ~ Hebpes cebiesMejeJe peer ves yeeue meeefnl³e kesÀ Òeefle Gve efoveeW efJeMes<e ©ef®e efoKeeF& Deewj GvneWves yeeue-ceveesOece& kesÀ Devegmeej, yeeue ceve keÀes ítvesJeeueer yeeueYee<ee ceW ÒeyeesOe osves keÀe efJeefMeä leb$e DeHevee³ee~ `veeiejneJes' keÀer ³es HebefkeÌle³eeB megefveS ö veeiej neJes neJeesUg ntJes yeeefieue efyeueoefue efveVe³e þeJes


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 37 कन्नड़ िे अनूर्दत — भारत िे kewÀieU cegefieJes neueVeerJe yee yee yee yee yee yee yee yee~ (ns veeiemeHe&, meHeeX ceW HetÀue~ ojJeepes kesÀ efyeue ceW legcneje mLeeve~ neLe peesæ[lee ntB, otOe oslee ntB~ Dee Dee Dee Dee Dee Dee Dee Dee~ ieeseEJeo Hew peer keÀe mebkeÀueve `efieefUeEJe[g' (leesles keÀe mecetn) meved 1930 ceW ÒekeÀeefMele ngDee~ Hejbleg GmeceW meved 1900 kesÀ Deeme -Heeme kesÀ j®es ieerle Les~ veJeeso³e HetJe& ceW keÀVeæ[ ceW yeeueieerle keÀes ueeskeÀefÒe³e yeveeves ceW FvekeÀe ³eesieoeve cenlJeHetCe& nw~ veJeeso³e ³egie ceW, nes³meue, ieewjerMe, keÀefJeJejeW ceW kegÀJeWHeg, yeWê, peer. Heer. jepejlce, ceOegj ®esVe, ìer. Heer. kewÀueemeced, DeevebokebÀo Deeefo ves yeeueieerle HejbHeje keÀes mece=× efkeÀ³ee~ ³eneB ìer. Heer. kewÀueemeced keÀe `keÀeefMeies neso veced YeeJe' (keÀeMeer ie³ee nceejs peerpee) yeWês peer kesÀ keÀj[er kegÀefCele' (Yeeuet keÀe vee®e), `kegÀefCe³eesCe yeeje' (DeeDees vee®es) Deewj efMeJejece keÀejble peer kesÀ `keÀHHes YeÆ' (ceW{keÀ YeÆ), `efleVeo osJe©' (ve Keeves Jeeuee YeieJeeve) Deeefo ieerle efJeMes<e cenlJe jKeles nQ~ yeeue ieerleeW ceW kegÀJeWHeg kesÀ `efkeÀvojer peesieer' keÀe mLeeve meJeexHejer nw~ ³en jeyeì& ye´eweEveie kesÀ Pipers pipe keÀe keÀVeæ[ ªHeeblej nw~ ³en Flevee ueeskeÀefÒe³e ngDee efkeÀ ye®®eeW kesÀ kebÀþ ceW Deepe Yeer jejeefpele nw~ yeescceve nefÈU ceW ueesie ®etneW mes lebie Dee ieS nQ~ efkeÀvojer peesieer mes ieewæ[e ÒeeLe&vee keÀjlee nw efkeÀ ®etneW mes cegkeÌle keÀjes lees cegBn ceebiee otbiee~ Hejbleg peye ieew[e Je®eve keÀe Heeueve ve keÀjlee nw, efkeÀvojer peesieer efkeÀvojer veeo keÀer ceebef$ekeÀ MeefkeÌle mes ye®®eeW keÀes DeekeÀef<e&le keÀj ues peelee nw~ yeescceve nefÈU³e efkeÀvojer peesieer DeuuesefveefueieU keÀeìJes keÀeì Deefuue³e peveieU ieefle ieesUeì (yeescceve nefÈU veecekeÀ ieeBJe ceW efkeÀvojer peesieer Dee³ee nw~ JeneB lees ueesie ®egneW mes lebie Deeie³es nQ~ FmeefueS ueesie ogKeer nQ~) mJeleb$³eesÊej keÀeue ë mJeeleb$³eesÊej keÀeue ceW yeeueieerleeW ceW keÀesF& Keeme efJeMes<elee ve Heeles nQ ~ keÀefJe³eeW ves ieeBOeer, vesnª, jeä^OJepe, Yeejleceelee, efkeÀmeeve, osMeYeefkeÌle, l³eeie, peel³eeleerlelee Deeefo keÀes Jemleg yeve efue³ee~ Deleë yeeueieerleeW kesÀ efueS keÀesF& veF& ÒesjCee veneR efceueer~ meved 1950 lekeÀ efMeMeg mebiecesMe mJe³eced yeeuemeeefnl³e j®eves ueies~ GvneWves DeHevee ner ÒekeÀeMeve KeesuekeÀj ³egJee yeeuemeeefnl³ekeÀejeW kesÀ efueS Òeeslmeenve Yeer efo³ee~ Fme ³egie kesÀ ÒecegKe yeeue ieerlekeÀejeW ceW efme׳³ee HegjeefCekeÀ, Meb. ieg. efyejeoej, kegÀ. veeje³eCe jeJe Deeefo mcejCeer³e nQ~ jefmekeÀ HegefÊeies ke=Àle `cebieHHeepeer HegjeCe' Deewj ìer. Sme. veeiejepeMesÆer ke=Àle mekeÌkeÀjs yeeWyes (MekeÌkeÀj keÀer iegef[³ee) efJeefMeä yeeueieerle mebûen nQ~ ìer. Sme. veeiejepeMesÆer Fme #es$e ceW keÀeHeÀer me¬eÀer³e jns nQ~ efJe%eeve ieerleeW kesÀ Debleie&le Þeer kesÀ. ef®eoevebo peer keÀe `®ebefoj ceecee' ieerle ¢äJ³e nw ö megboj ceecee ®ebefoj ceecee cee[gJes veervesveg? Yetefce³eg met³e&ve megÊegJe neies Yetefce³e megÊegJesveg~ (ns, megboj ®eboe ceecee legce ke̳ee keÀjles nes? leye ®eboe keÀnlee nw efkeÀ pewmes Yetefce met³e& kesÀ ®eejeW Deesj Iegceleer nw Jewmes ner ceQ Yetefce kesÀ


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 38 कन्नड़ िे अनूर्दत — भारत िे ®eejeW Deesj Ietcelee ntB) veJ³e ³egie kesÀ Òeefme× keÀefJe³eeW ves Yeer yeeueieerle efueKekeÀj ye®®eeW keÀe ceve yenuee³ee nw~ GmekesÀ GuuesKeveer³e ieerle nQ ö Þeer peer. Sme. efMeJe©êHHee peer kesÀ `ve#e$e' Deewj `ÒeMves' leLee Þeer ®esVeJeerj keÀCeJeer peer keÀe `efieefj efieefj eEie[er'~ DeepekeÀue ieÐeue³e ceW (Speech rythm) ieerle efueKeves ueies nQ~ veeìkeÀer³elee ner FmekeÀer efJeMes<elee nw~ Fme ¢efä mes Þeer Sve. Sme. ue#ceerveeje³eCe YeÆ keÀe ieerle `YeeUJeesÈUs³ees© veced efcemmeg' (yengle De®íer nw nceejer efceme) O³eeve DeekeÀef<ele keÀjlee nw~ ³eLee ö yeeUJeesÈUs³ees© veced efcemmeg / Sve nsefUêg Smmesmleg~ veielee veielee ceeleeæ[leejs / mketÀefueiesuue HesÀmemmeg~ (yengle De®íer nw nceejer efcemed (ces[ced) pees Yeer keÀefnS keÀnleer Sme Sme~ nBmeleer nBmeleer yeesueleer nQ Hetjs mketÀue ceW HesÀcemes nw~) meved 1980 kesÀ yeeo yeeue ieerle Ketye efueKes ieS~ DeekeÀeMeJeeCeer, He$e-Heef$ekeÀeDeeW Deewj Heeþîe HegmlekeÀeW cesW GmekeÀer ceeBie yeæ {er~ ceveesjbpeve ÒeOeeve ieerle efvekeÀues~ jefmekeÀ HegefÊeies keÀer ueeskeÀefÒe³e keÀefJelee osefKeS ö HeÀeefjved keÀeskeÌkeÀjs³ebles / jskeÌkesÀieUsj[g Fefo&ês / iekeÌves neefj / ieievekeÌkesÀjer / veevet otj nesefileÎs~ (efJeosMeer yeleKe keÀer lejn oes Hej nesles lees Gæ[ keÀj ceQ Yeer ieieve ceW otj ®euee peelee~) *****


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 39 मुनक्त मूल अिनमया -रिराज लक्ष्मीनाि बेजबरूआ र्ह िंदी अनुवाद -कषवता कमषकार कसवता कमषकार , भारत कसवता कमषकार कसवताओंकेिाथ िाथ किानीकार और अनवुादक भी िैं। अिसमया,सिन्दी और अंग्रेज़ी भार्ा मेंिमान असधकार िेसलखती ि|ैंउनकेअिसमया भार्ा में2 कसवता िंग्रि प्रकासित ि|ैंअभी तक उन्िोंने17 पस्ुतकों का अनवुाद सकया िैजो नेिनल बकु ट्रस्ट ऑफ इसंडया और िासित्य अकादमी द्वारा प्रकासित िैं। उनको अिसमया कसवता के सलए 'बंिी गोगोई ममे ोररयल अवाडष2010' िेिम्मासनत सकया जा चकुा िै। कई अन्य िम्मानों के िाथ िी गररमामय 'गररयोिी चंद्र प्रिाद िैसकया और लखनऊ िे'अंतरराष्ट्रीय तथागत िजृ न िम्मान' िेिम्मासनत िुई िैं। िपं कष - [email protected] सकुुमार सम्पन्न पररिार का बेटा है । खाने पीने की कोई धचतं ा नह ं , हर सखु सवुिधा उनके पास हैं । स्िभाि से िह बड़ा बुद्धधमान है , लेककन पढ़ाई-सलखाई में उसका मन नह ं लगता । िह चौदह िर्ा का है ; लेककन अग्रं ेजी स्कूल में चौथी क्लास में ह है । उसके वपता उसे पढ़ो पढ़ो कहते रहते हैंपर िह है कक सामने ककताब रखकर जग जहान की बातें सोचता रहता । ककस पेड़ में पके हुए आम हैं, कहाँ अमरद, ककसके घर के पीछे ततैया ने घर बांधा है और उसके अंडे से ककस तालाब में मछल पकड़ने जाना है । ककस जगं ल में ककस पेड़ की डाल पर धचड़ड़या का घोंसला है , ककतनी नन्ह धचड़ड़या हैं, िह कैसे घर लाकर उन्हें पालेगा , त्रबल्ल , कुत्तो के साथ कै से खेलना है इन्ह ं सब बातों से उसका ददमाग भरा हुआ है। उसके ददमाग में पढ़ाई और कक़ताबों की बातों के सलए जगह बहुत कम है । घर से गरमा गमा खाना खाकर िह स्कूल के सलए चला जाता है लेककन होमिका पूरे न कर पाने और प्रश्नोत्तर न दे पाने की िजह से मास्टर जी की गाल और छड़ी की मार खाकर िापस आता । घर लौटकर माँ के हाथ का स्िाददटट नाश्ता करके स्कूल िाल गाल -गलौच भलु ाकर अपने दोस्तों के साथ खेल में मगन हो जाता । एक ददन मास्टर जी ने सकुुमार की पढ़ाई में ध्यान न देने िाल बात के सलए उसके वपता से उसकी सिकायत की । उसके वपता ने इस बात पर उसे छड़ी से खूब पीटा । िह मार खाकर असभमान करके घर से भाग गया और एक इमल के पेड़ पर चढ़कर नछपकर िह ं सो गया । पूरा ददन पूर रात िह घर नह ं लौटा । दसू र तरि माँ की हालत खराब हो रह थी उसे ढूंढते ढूंढते । " मेरा बेटा कहाँचला गया " बोलकर िह खूब रोने लगी । ये देखकर उसके वपता को भी बुरा लगा और पश्चाताप करने लगे । िे भी उसे पुकारते हुए बोलने लगे " सकुू कहाँ हो बेटा,िापस आ जा,


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 40 अिनमया िे अनूर्दत कहानी— भारत िे आज से किर कभी नह ं मारँगा तुझे ।" ऐसे पुकारते पुकारते िह थक-हार धचतं ा में त्रबस्तर पर सो गए । अगले ददन भखू प्यास से बेहाल होकर सकुुमार अपनी माँ के पास आ खड़ा हुआ । उसकी माँ ने उसे गले लगाकर प्यार से थोड़ा डांटा किर उसे नहला धुलाकर अच्छे से खाना खखलाया । वपता ने भी उसे दरू से ह दलु ार कर समझाया । उसे देखकर वपता को िांनत समल । सकुुमार के वपता पुराने जमाने के इंसान हैं । ककस रास्ते से सािधानीपूिका अपने बेटे का मन पढ़ाई की तरि लाया जाए यह सोचकर धच ंनतत हो रहे थे, लेककन कोई हल नह ं समल रहा था । िे जानते थे , बजल्क िे यह सोचते थे कक स्कूल में पैसे देकर अगर अपने बच्चों को पढ़ने भेजा है तो स्कूल के मास्टर तो उसे सब ससखाकर सिाविद्या वििारद के रप में िापस भेजेंगे। िे नह ं जानते थे कक आजकल के स्कूल पहले की तरह पविि िैल से विद्याधथया ों को स्कूल में विद्या दान करने िाले पाठिाला नह ं रह । िह बेंच - डस्े क, घड़ी , चौकीदार से विभवूर्त और गरु सिटय के आतंररकता िून्य िखणक सबं ंध से जड़ुे बस एक कारखाना है । िहाँ छािों के मानससक रप से सिम बनाने या उनके कला- कौिलों के सलए कोई नई राह या सििा नह ं समलती । जब एक ददन सकुुमार की पढ़ाई के प्रनत कोई रुधच न होने िाल बात उन्हें पता चला तो हताि होकर सब दोर् सकुुमार को देते हुए ननटठुरता से उस पर प्रहार ककया । ददन रात के बीच का समय सबके सलए भयानक होता है सकं टपूणा होता है । ददन रात के सधं धकाल में ह दहरण्यकसिपु का विनाि हुआ था । पुरानी सभ्यता या असभ्यता और नई सभ्यता या असभ्यता के बीच की दरूदृजटट के सलए इस भिजनको इस प्रकार की मानससक विपदा ने ग्रससत ककया था । सिं ेप में बात यह है । उनके दो पुि सकुुमार और सकुुमार का बड़ा भाई देिकुमार। देिकुमार कलकत्ता से बी .एल पर िा खत्म करके ड़डब्रूगढ़ में िकालत करता है। िह एक कात्रबल िकील है , इसी कारण उसका सम्मान और आय भी अच्छी है । वपता और माता बेटे का यि और प्रनतपवत्त देखकर स्िाभाविक रप से गौरिाजन्ित हैं । ककसी भिजन से मलु ाकात होते ह कुछ देर के सिं ाद के बाद वपता के मखु से बड़े बेटे का यिगान करना सयू ोदय होने जसै ी बात है । िकील बेटे का असीम प्रभाि है माता वपता पर । उसी प्रभाि और प्रताप को बात बात पर व्यक्त करने में िे कोई कंजसू ी नह ं करते थे । देिकुमार साल भर में एक दो बार घर आते थे और बड़े भाई के घर आने की खबर से सकुुमार खुिी से उछलता है । लेककन बड़े भाई के घर आने पर सकुुमार उनके सामने खड़ा भी नह ं हो पाता था । क्योंकक उसका बड़े भाई से सबसे पहले डांट खाना ननधााररत है । एक बार ऐसी घटना पर माँ ने बड़े बेटे से बोला , " तेरा भाई


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 41 अिनमया िे अनूर्दत कहानी— भारत िे तेरे आने की खुिी में ककतना उछल रहा था और तूआते ह उसे क्यों डांट रहा है ? " माँ की इस बात पर इसके जिाब में उसने कहाँ - "आप लोगों ने सकुुमार को सर चढ़ाकर त्रबगाड़ ददया है। प्यार के कारण कुछ नह ं बोलते । इतना बड़ा हो गया है पर पढ़ाई में त्रबल्कुल ध्यान नह ं देता और कुछ ददन के बाद उसे गाय बकर चरानी पड़ेगी । या किर ककसी के घर पर चोर करेगा िरना कमाएगा कै से, खाएगा क्या ?" बड़े बेटे की इतनी कठोर ननममा बात सनु कर माँकी आँखों से आँसूबहने लगे । उन्हें सम्भलने में कुछ समय लगा किर िह बेटे के पास जा सकी । एक बार दगु ाा पूजा की छुट्ट में िकील बेटा घर आया । आते ह माता वपता को साि साि िब्दों में बोला , "इस बार मैंइस गधे को साथ लेकर जाऊँगा। मैं उसे पढ़ाऊँगा , मेरे देखरेख में रहेगा अब से ये । इसे यहाँ रखकर आप लोग इसी का भविटय खराब कर रहे हो । मैं कल जाऊँगा, इसका सामान पेक कर द जजए। " ये आदेि पाकर माँने आँसूबहाए । वपता ने अनेक सोच विचार कर उस ननणाय को मानने का ननश्चय ककया । इस अभािनीय ननणया को सनु कर सकुुमार का गला सखू रहा था । लेककन उसे पता था कक उसके पास और कोई रास्ता नह ं बचा । इस बार उसे अपने बड़े भाई के साथ उनके अनुिासन में रहकर पढ़ाई करने जाना ह होगा । इससलए उपायह न होकर उसने इस नई पररजस्थनत के सामने झकु कर आत्मसमपाण करने का ननणाय सलया । उसके बाद िह इमल का पेड़, आम का पेड़, कटहल का पेड़ , बड़े तालाब, बाग बगीचा , मक्ुत आकाि, खेत खसलहान, उड़ती नततल या और पालतू जानिर, चरते हुए गाय -भसैं और साथ खेलने िाले सभी साधथयों से िोकाकुल लेककन अत्यंत दृढ़संकल्प से विदा लेकर उन परम आत्मीयों को पररत्याग कर विदेि जाने के सलए तैयार हुआ । सकुुमार को साथ लेकर देिकुमार माता -वपता को प्रणाम करके विदा लेते समय माँने सकुुमार के माथे को चुमकर बोला - बेटा अपने बड़े भाई की बात मानना और ध्यान लगाकर पढ़ाई करना ।" और बड़े बेटे के सर पर हाथ किराकर बोला -" देि ,उसे ज्यादा तंग मत करना ,िह धीरे धीरे सब सीखेगा, पढ़ेगा भी, ये एकदम भोला है,एक ह बार में उसे ज्यादा कठोर अनुिासन मत करना ।" यह बोलकर उन्होंने आँचल से अपने आँसूपोछे । बड़े बेटे ने माँ की बात सनु कर मस्ुकराकर बोला - "ठीक है , ठीक है अब इसके बारे में आप लोग मत सोधचये,सर चढ़ाकर िेसे ह बबााद कर ददया ।" सकुुमार को ड़डब्रूगढ़ में उसके भाई ने एक अग्रं ेजी स्कूल में दाखखला करिा ददया और सबुह िाम उसे अपनी देखरेख में पढ़ाना िुर कर ददया । खलु े आसमान में उड़ान भरने िाला पंछी लोहे के वपजं रे में बंद हो गया । कठोर


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 42 अिनमया िे अनूर्दत कहानी— भारत िे अनुिासन का भार पत्थर सकुुमार के ददल में बोझ बन गया । सकुुमार ने भी वििोह न होकर इस िासन को मान सलया, क्योंकक उसके पढ़ाई में कमजोर की बात को लेकर उसके मन में भी अब खुद के सलए धधक्कार का जन्म हो रहा था । उसका बड़ा भाई स्िभाि से ननटठुर है ऐसा नह ं है,लेककन उसने सोचा था छोटे भाई को कुछ ददन कठोर अनुिासन में रखकर जल्द ह अपने माता-वपता और सबको चककत कर देगा । लेककन कठोर अवििेकी िासन का िल जल्द ह समला ! सकुुमार अपनी इच्छा के विरुद्ध ह स्िभाि वििोह हो उठा । तीक्ष्ण बुद्धध िाले सकुुमार की बुद्धध जल्द ह क्लांत हो गई और िह नकारा होने लगा । पूरा ददन िह पढ़ाई करता पर उसे पाठ याद नह ं रहता , कुछ भी सीख नह ं पाता। िलस्िरप बड़े भाई का िासन कठोर से कठोर होने लगा,प्रहार और कटु िाक्य ददन ब ददन बढ़ता गया उसके साथ -साथ सकुुमार की बुद्धध स्मनृत और पाठ ग्रहण करने की िमता भी कम से कमतर होने लगी । एक ददन िाम को सकुुमार को पढ़ाते समय देिकुमार ने देखा कक िह एक भी प्रश्न का सट क उत्तर नह ं दे पा रहा बजल्क पहले उसे जो भी आता था,जो भी सीखा था िह सब भी िह भलु ा चुका था । गुस्से में आकर उन्होंने उसे खूब पीटा, बहुत डांटा और बाद में खुद थककर ये बोलकर उठकर चला गया - " तू हमारे िंि का कंलक है । तू मेरा भाई है ये बोलने, ये पररचय देने में भी मझु े िमा आती है । तुझे माँ वपताजी के पास जल्द ह भेज दँगू ा, माँ िह ं तुझे प्यार से बड़ा करें उसके बाद दसू रों के घर मजदरू करके अपना पेट पालना ।" सकुुमार ननिाका ननस्तब्ध होकर बस सनु ता रहा । रात कर ब नौ बजे उसकी भाभी उसे खाने के सलए बुलाने आयी तो उसने धीरे से बोला - भाभी,आज तबीयत खराब लग रह है ,मैंखाना नह ं खाऊँगा। " सकुुमार को खाना खाने न आते देख देिकुमार ने उसे आदेि ददया गस्ुसे से खाने के सलए पर सकुुमार ने अत्यंत कोमल लेककन कमज़ोर स्िर से बोला - भाईया सच में मेर तबीयत खराब है ,मैंखाना खाने नह ंआ सकता ।" ये सनु कर बड़े भाई ने उसके माथे को छूकर देखा तो पता चला कक सकुुमार बुखार से तप रहा है । आज सात ददन हो गये ,सकुुमार का बुखार कम होने का नाम ह नह ं ले रहा । बीच-बीच में नींद में ह िह कुछ बड़बड़ा रहा है । बड़ा भाई जजला के बड़े डॉक्टर से उसका इलाज करिा रहा है , लेककन उसने अपने माता-वपता को उसकी तबीयत के बारे में खबर नह ं द । आठ ददन बाद डॉक्टर के परामिा अनुसार तत्काल न रप से माता वपता तक खबर सभजिाई गई । खबर समलते ह दोनों विचसलत होने लगे ।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 43 अिनमया िे अनूर्दत कहानी— भारत िे इस अिस्था में जब िह नींद में ह प्रलाप कर रहा था और बार-बार एक ह बात बोल रहा था - "माँ आप आ गई ? मेरे पाल हुई सार धचड़ड़या कैसी हैं, और बाकी के जानिर ? क्या िह मझु े ढूंढते हैं? मैंिापस आकर उनके साथ खूब खेलँगू ा । माँ , आप मत सोचना कक मैंपढ़ाई नह ं करँगा। मैंमन लगाकर पढूँगा। भाईया बहुत गस्ुसा हैंमेरे न पढ़ने से । मैंखूब पढूँगा ,बड़ा आदमी बनँूगा । भाईया भईया मझु े और मत मारो, मैंअब से पाठ याद रखूगँ ा, मन लगाकर पढ़ाई करँगा । मैंअच्छा बनँूगा । मेरे सलए आपको और िसमदिं ा नह ं होना पड़गे ा । " बीमार होने के चौदह ददन बाद सकुुमार के देह से उसका प्राण पिी ननकल गया । ननकलकर हमेिा के सलए मक्ुत हो गया । **********


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 44 िमे तं गोसवदं जोगलके र ,भारत राष्ट्रीय रािायसनक प्रयोगिाला, पनुेिेउपसनदिे क पद िेिेवासनवतृ िमे तं गोसवन्द जोगलेकर जी मलू त: मराठी कसव ि|ैंउनकेअब तक 8 कसवता िंग्रि प्रकासित ि|ैंउनकी कसवताओंका अनेक भारतीय भार्ाओंमेंअनवुाद भी िआु िैऔर उन्िोंनेभी काफी अनवुाद कायषसकया ि|ै उन्िोंनेराष्ट्रीय स्तर के कसव िम्मेलनों में मराठी का प्रसतसनसधत्व भी सकया िै| उन्िें 2 राज्य परुस्कार और कई अन्य परुस्कारों िेिम्मासनत सकया जा चकुा ि|ै िपं कष - [email protected] दीदी द द इतनी तेजतराार, अड़ोस-पड़ोस के सभी बच्चे उसे ह कहा करते थे द द लेककन मझु े मालमू था, िो तो ससिा थी मेर द द . माँभी मझु े बताती रहती, “द द की तरह सयानी होना”. मैंहमेिा द द के ह पीछे-पीछे रहा करती थी. उस ददन लंगडतंगडी खेलते मनैं े उसका ह पीछा पकड़ा लेककन ककतनी भी कोसिि की तो भी मेरे हाथ न आई. मूल मराठी कषवता ( ताई ) : हेमतं गोषवदिं जोगलके र र्ह िंदी अनुवाद : हेमतं गोषवदिं जोगलेकर


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 45 मराठी िे अनूर्दत कषवता — भारत िे मेर आँखें भर आई तो द द मेरे पास आई बोल ,” ऐसा करते हैंअब तुम हो मैंऔर मैंहूँतमु . भागो” . जोर िोर से मैंभागी पर किर द द के पकड़ में आई किर से मेर आँख भर आई लेककन उसने कहा कक, “देखो 'तुम' ने ‘मझु ’ े आऊट ककया !” खुि होकर मनैं े सलये उसके हाथ मेरे हाथ किर सोच में पड़ी कक, अब की मैंजीती उसका जश्न मनाऊँ या पहल िाल मैंहार उसका दखु ? किर छूटने से रहे 'मेरे' हाथ से 'उस' के हाथ और 'उस'के हाथ से 'मेरे' हाथ. *****


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 46 दीनदयाल िमाष , भारत राजस्थान मेंजन्मेश्री दीनदयाल िमाष1975 िेराजस्थानी और सिन्दी दोनों भार्ाओंमेंितत्िजृ न कर रिे िैं| वे ‘टाबर टोली’ (पासिक) (2003 िे सनयसमत प्रकासित बच्चों का सिन्दी अखबार) के िंस्थापक / िासित्य िम्पादक ि|ैंउनकी सविेर् रुसच सिन्दी-राजस्थानी बाल िासित्य की सवसवध सवधाओंमेंि|ैउनकी राजस्थानी-सिन्दी बाल िासित्य में अब तक 56 पस्ुतकेंप्रकासित िैंऔर मराठी, अंग्रेज़ी व पंजाबी में24 पस्ुतकेंअनसूदत ि|ैं उन्िेंकई िम्मानों िेअलंकृत सकया गया िै सजनमेंिेबाल िासित्य मनीर्ी िम्मान, मोिनलाल ओझा ग्रामीण बाल िासित्य परुस्कार, केन्द्रीय िासित्य अकादमेी, नई सदल्ली िेराजस्थानी बाल सनबंध/िंस्मरण िंग्रि ‘बाळपणैरी बातां’ पर राजस्थानी बाल िासित्य केराष्ट्रीय परुस्कार आसद कुछ नाम ि|ैं िपं कष - [email protected] िच्चाई की जीत राजस्थानी िे र्हन्दी में अनुर्दत बाल कहानी-दीनदयाल शमाष एक गाँि में साजनससहं नाम का एक पहलिान रहता था। साजनससहं से गाँि के सब लोग डरते थे। िह सबुह-िाम कसरत करता, दण्ड पेलता और अपनी भसैं ों का दधू पीता। साजनससहं के पास चार भसैं े थी। भसैं ों को चरने के सलए िह खुल छोड़ देता था। चारों भसैं े अपनी मनमजी से कभी ककसी के खेत में चल जाती तो कभी ककसी के खेत में। गाँि में ककसी भी आदमी की दहम्मत नह ं होती थी कक िह साजनससहं की भसैं ों को अपने खेत से बाहर ननकाल दे। गाँि के सब लोग पहलिान की भसैं ों से बहुत द:ुखी थे। एक ददन पहलिान की भसैं े जयससहं के खेत में चल गई। जयससहं ने देखा कक साजनससहं पहलिान की भसैं े उसके खेत को चर कम रह हैऔर खराब ज़्यादा कर रह है। उसने सोचा कक भसैं े तो पिुहैं। इन्हें क्या पता कक ककसके खेत में जाना है और ककसके खेत में नह ं जाना। किर जयससहं भसैं ों को अपने खेत से बाहर ननकालने के सलए उनकी तरि भागा तो एक भसैं ने उसे मारने के सलए सामना ककया। किर जयसस ंह आगे-आगे और भसैं पीछे-पीछे । खेत पड़ोसी यह देखकर तासलयाँ बजाने लगे।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 47 राजस्थानी िे अनूर्दत कहानी— भारत िे अचानक ह जयससहं एक झोंपड़ी में घुसा और िहाँसे एक लाठी उठा लाया। उसने लाठी से अपना बचाि करना िुर ककया। लेककन भसैं गस्ुसे में थी। भसैं उसे मारने लगी तो जयससहं ने लाठी आगे कर द । अपना बचाि करते हुए जयससहं की लाठी भसैं के मँहु पर लग गई। भसैं के मँहु से खनू आने लगा। जयसस ंह एक बार तो डर गया कक कह ं यह मर नह ं जाए। लेने के देने पड़ जाएँगे। लेककन किर िह सोचने लगा कक इसमें उसका तो कोई कसरू नह ं है। थोड़ी देर बाद जयससहं के खेत पड़ोसी हरजीराम ने हँसकर कहा, ‘जयससहं , अब तूअपना मँहु िुड़िाने के सलए तैयार हो जा। तूजानता हैन कक ये ककसकी भसैं ें हैं? ‘मैंअच्छी तरह जानता हूँ कक ये भसैं ें साजनससहं पहलिान की हैं। पर मेरा खेत उनकी भसैं ों के सलए नह ं है। साजनससहं यदद लड़ाई करेगा तो मेरे हाथ में भी लाठी है।’ जयसस ंह ने लाठी ददखाते हुए कहा। ‘भाई जयससहं , मैंजानता हूँ कक तूिर र में साजनससहं से कम नह ं है, लेककन िह थाने में ररपोटा सलखिा देगा तो किर तूक्या करेगा?’ हरजीराम बोला। ‘सलखा देगा तो सलखा देने दे। िह रहा थाना और िह रह तहसील। मझु े भी डर नह ं लगता। मेहनत की खाता हूँ। गेहूँकी बोर साजन मेरे घर में डालने नह ं आता!’ ‘थाना-तहसील के चक्कर में तो भाई घाटा ह घाटा है। बड़-ेबड़े लोगों के घुटने दटका ददए इन थाना -तहसीलों ने। मेरा कहना मानो, तुम साजन से मािी माँग लो।’ उस ददन गािँ की गिाड़ में साजनससहं पहलिान और जयससहं के बीच बहुत देर तक बहस चल । गाँि के लोग बीच-बचाि नह ं करते तो लादठयाँ भी चलती। दसू रे ददन साजनससहं पहलिान ने िहर जाकर थाने में जयससहं के खखलाि मकु दमा दजा करिा ददया। िहर का थानेदार विधचिकुमार बहुत ह नेक और ईमानदार व्यजक्त था। एक पैसा भी ररश्ित नह ं लेता। थाने के सभी ससपाह भी ईमानदार थे।


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 48 राजस्थानी िे अनूर्दत कहानी— भारत िे थानेदार ने गाँि में ससपाह भेजकर झगड़े की अच्छी तरह जाँच करिाई और किर पिुधचककत्सक से भसैं की मेड़डकल ररपोटा मांगी। दोनों ससपाह िाम को घटना की जाँच करके थाने में आ गए। डॉक्टर की ररपोटा भी आ गई। थानेदार ने मौके की गिाह और डॉक्टर की ररपोटा पढक़र साजनसस ंह को दोर्ी करार ददया। साजनससहं ने थाने में ररपोटा सलखिाई थी कक जयससहं ने उसकी भसैं के मँहु पर इतनी लादठयाँ मार कक उसके ऊपर िाले सारे दाँत तोड़ ददए। लेककन डॉक्टर की ररपोटा में सलखा हुआ था कक भसैं के ऊपर िाले दाँत होते ह नह ं हैं। थानेदार विधचिकुमार ने मकु दमें की िाइल कोटा में भेज द । कोटा में जज साहब ने मकु दमें की िाइल पढ़ तो देखा कक साजनससहं पहलिान दोर्ी है। इसने जयससहं के खखलाि झठू ा मकु दमा दजा करिाकर पुसलस को गमु राह करने की कोसिि की है। इस कारण जज साहब ने पहलिान साजनसस ंह को भारतीय दण्ड संदहता की धारा 182 के तहत छ: मह ने की सजा सनु ाई। *******


जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 49 अपनी- अपनी लड़ाई डॉ उर्ा सकरण, भारत तसूलका एवम् लेखनी पर िमान असधकार रखने वाली डॉ. उर्ा सकरण लगभग चालीि वर्ों केअध्यापन अनभुव के िाथ िी मेरठ कॉलेज में लसलतकला सवभाग की सवभागाध्यिा रि चकुी ि।ैंउनका एक कसवता िंग्रि, िाझा-िंग्रिों में रचनाएाँ और एक आत्म-कथ्यात्मक उपन्याि प्रकासित िै| वे अनेक लब्ध प्रसतसित िंस्थाओंिेिम्मासनत व परुस्कृत िुई िैं। िपं कष - [email protected] दो बच्चे मेरे और दोनों जसै े उत्तर घ्रुि और दक्षिणी ध्रुि। बेट नसरा में थी तो प्राय: िेिाल की सताई हुई त्रबसरूती हुई घर आती। "आज िेिाल ने थप्पड़ मारा।” "आज िेिाल ने नोचा।” “आज िेिाल ने पेंससल छीन ल ।” "आज िेिाल ने मेरा दटकिन खा सलया।” मेरा ददल डूब-डूब जाता अपनी मासमू राजकुमार के आँसओु ं में। मैंकहती "उसकी सिकायत ममै से कर ददया करो।”पर िो कहती कक- "मम्मी उसे कोई कुछ नह ं कह सकता ममै भी नह ं, क्योंकक उसकी दाद का ह तो स्कूल हैऔर दाद ह तो वप्रसंसपल हैं। िो सभी बच्चों को मारती है।” िो बेहद माससूमयत से हाथ नचा कर कहती। मझु े बहुत ह गस्ुसा आता कक ये क्या बात है? बच्ची की सििा की िुरुआत ह एक गलत व्यिस्था और अन्याय सहने से हो रह है। मैंबेहद टेंिन में आ गई। कई बार स्कूल में जाकर ट चर को सिकायत भी की, परन्तुिो आँखें िै ला बेचारगी से एक ह बात दोहरातीं कक "क्या करें िो तो वप्रसंसपल की पोती है…!” खैर किर नसरा के बाद एल के जी में दोनों का दसू रे स्कूल में एडसमिन हुआ।दोनों एक ह ररक्िे से जाती थीं।परन्तुउसकी हाथ चलाने की इतनी आदत थी कक िो ररक्िे में भी दादाधगर करती। सब बच्चों को चाँटे मारती रहती थी। एक ददन किर बेट रोते हुए घर आई, क्योंकक गेम्स पीररयड के बाद उसका नया ब्लेजर छीन कर


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