जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 50 िंस्मरण— भारत िे िेिाल ने अपना पुराना ब्लेजर उसे दे ददया था। उसने कािी कहा पर िो कहती रह ये ह मेरा है। यूँ तो मैं रोज रात को सोने से पहले उसे कहाननयों में लपेट कर दया, अदहसं ा,करुणा, िमा, सहनिीलता, देिभजक्त, भगिान पर आस्था, जसै े मानिीय मल्ूयों की घुट्ट वपलाती थी, लेककन मनैं े उस ददन उसको बैठा कर िो समझाया जो मैं त्रबल्कुल नह ं चाहती थी।मनैं े सख्ती से कहा - "तुम वपटती क्यों रहती हो, तुम्हारे हाथ नह ं हैं क्या? तुम भी मारो उसको पलट कर। और एक हाथ पकड़ कर दसू रे गाल पर लगाना थप्पड़ जोर से। यदद कोई कुछ कहे तो कह देना ये रोज मारती है इसीसलए मारा।डरना मत कोई कुछ कहेगा तो मैंदेख लँगू ी।” खूब ससखा- पढ़ा कर भेजा। चाह तो यह रह थी कक मैं ह जाकर मसला ननबटाऊँ, लेककन मझु े खुद अपनी जॉब पर जाना होता था। किर लगा कक मैंकहाँ तक इसको सपोटा करँगी, कब तक दनुनया से बचाऊँगी आखखर में तो इसे अपनी लड़ाई अपने िस्िों से खुद ह लड़नी होगी। दसू रे ददन िो बहुत खुि कूदती- िाँदती आई "मम्मा ले आई अपना कोट।पता है आज जब उसने मारा तो मनैं े उसका हाथ पकड़ कर जोर से चाँटा मारा और कहा मेरे हाथ नह ं हैं क्या ? तुम मारोगी तो मैंभी मारँगी। मम्मी िो एकदम से डर गई। किर मनैं े उसके पापा से भी कहा कक अकं ल ये मुझे रोज मारती हैऔर मेरा कोट नह ं दे रह जबकक अन्दर मेरा नाम सलखा है आप देख ल जजए। पता है मम्मी किर उसके पापा ने उसको डाँटा और एक चाँटा भी मारा और कहा सॉर बोलो उसे और कोट िावपस करो ...मम्मी बड़ा मजा आया आज!” मन कुछ कुड़बुड़ाया -गलत सििा नह ं दे रह हो तुम बच्ची को ? दहसं क होना ससखा रह हो ...तुमको तो ये कहना था न कक, कोई एक चाँटा मारे तो बेटा दसू रा गाल भी आगे कर दो। दरु् कह कर मनैं े मन को घुड़की द और राहत की साँस ल । िैसे बाद में िे दोनों बहुत अच्छी दोस्त बनीं, आज भी हैं। उस ददन मेर बेट ने मझु से बेददा , असभ्य , अधधकारों का हनन करने िाले समाज के बीच सिााइि करने का पहला पाठ पढ़ा। और जाना कक आप ककतनी भी मजबूत या कमजोर जमीन पर क्यों न खड़े हों लेककन अपनी लड़ाई आपको अपने हौसलों से खुद तो लड़नी ह पड़ेगी। त्रबना लड़े जीत कोई दसू रा आपको तश्तर में रख कर भेंट नह ं कर सकता । किर उसके बाद जज़न्दगी में िो कभी भी, ककसी से भी नह ं वपट । ********
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 51 दोस्ती का धमष अलका प्रमोद, भारत वनस्पसत सवज्ञान मेंस्नातकोत्तर उपासध केिाथ िी पत्रकाररता, वेब सडजाइसनंग मेंसडप्लोमा प्राप्त अलका प्रमोद की सभन्न सवधाओंमें25 िेभी असधक पस्ुतकेंप्रकासित ि|ैंउन्िोंनेलगभग 20 िंकलनों का िि िम्पादन भी सकया िैऔर उनकी रचनाएाँसभन्न पत्र-पसत्रकाओंमेंप्रकासित िो चकुी ि|ैंउन्िेंकई प्रसतसित िम्मानों िेभी िम्मासनत सकया जा चकुाि|ै िपं कष - [email protected] दादा जी कानपुर से अखणमा के पास आये थे। एक ददन दादा जी ने कहा, ‘‘अखणमा मैं पाका जा रहा हूँतुम चलोगी क्या?’’ अखणमा ने कहा, ‘‘हाँदादा जी मैंभी चलँगू ी, मझु े झलू ा झूलना बहुत अच्छा लगता हैऔर मैं बॉल भी खेलँगू ी।’’ अखणमा ने झट से जतू े पहने, बाल ठीक ककये और गेंद ले कर दादा जी के साथ पाका चल द । पाका पहुँच कर दादा जी ने उससे कहा, ‘‘तुम यहाँझलू ा झलू ो तब तक मैंपाका का चक्कर लगा कर आता हूँ।’’ अखणमा दौड़ कर झलू े के पास पहुँच गयी। झलू े पर पहले से ह बच्चे झलू रहे थे अतः िह उनके झलू े से उतरने की प्रतीिा करने लगी। तभी एक कुत्ता उसके पास आ कर उसे सँघू ने लगा। प्यारा सा भरूा कुत्ता उसे बहुत प्यारा लगा। िह त्रबस्कुट खा रह थी उसने एक त्रबस्कुट उसे भी दे ददया। िह कँू-कँू करने लगा। उसी समय झलू ा खाल हो गया और िह झलू ा झलू ने लगी। दादा जी तो रोज िाम को पाका में टहलने जाते थे। अगले ददन भी िह दादा जी के साथ पाका गयी। आज िह अपने साथ खेलने के सलये एक गेंद भी ले गयी थी। आज भी झलू े पर बच्चे पहले से ह झलू ा झलू रहे थे। जब तक झलू ा खाल हो िह गेंद खेलने लगी। तभी िह भरूा कुत्ता आ गया। आज िह अखणमा के पैर चाटने लगा। लगता हैिह उसे पहचान गया था। अखणमा ने उसे प्यार से सहलाते हुए कहा, ‘‘अरे िाह, तुम तो मझु े पहचान गये।’’ ‘‘चलो आज से हम तुम दोस्त हो गये, अब मैंतुम्हे जोजो कहूँगी।’’
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 52 बाल किा — भारत िे अखणमा किर गेंद ले कर खेलने लगी। अखणमा ने गेंद िेंकी तो जोजो दौड़ कर गेंद के पास पहुँच गया। अखणमा ने गेंद उठाया तो िह किर से अखणमा के पास आ गया। उसने किर से गेंद िेंका तो कुत्ता किर गेंद के पास पहुँच गया। जब कई बार ऐसा हुआ तो अखणमा को उसके इस खेल में मज़ा आने लगा। अगल बार अखणमा ने गेंद िेंका तो उसे उठाने नह ं गयी। जोजो दौड़ कर गेंद के पास पहुँच गया था और मडु-मड़ु कर देख रहा था कक अखणमा गेंद के पास आये। िह किर दौड़ कर अखणमा के पास आया और किर िहाँ दौड़ कर गया जहांँँगेंद थी। उसे समझ नह ं आ रहा था कक अखणमा गेंद के पास क्यों नह ं आ रह है। अखणमा ने उसे इिारा ककया और कहा, ‘‘जोजो गेंद तुम लाओ।’’ कई बार ऐसा करने के बाद लगता है जोजो को समझ में आ गया, िह गेंद अपने मँहु में पकड़ कर ले आया। अखणमा को अपनी सिलता पर बहुत प्रसन्नता हुई। अब िह बारबार गेंद िेंकती और जोजो उठा कर लाता। अखणमा और जोजो दोनांँे को बहुत मजा आ रहा था। कुछ देर में दादा जी पाका के चक्कर लगा कर आ गये। उन्होंने अखणमा से कहा, ‘‘चलो अखणमा अब घर चलें।’’ अखणमा ने कहा, ‘‘दादा जी क्या आप मझु े कुछ रुपये दे सकते हैं?’’ दादा जी ने कहा, ‘‘हाँहाँ, दे सकता हूँपर तुम्हें बताना होगा कक उन पसै ों से तुम क्या करोगी।’’ अखणमा ने कहा, ‘‘दादा जी मझु े अपने दोस्त को त्रबस्कुट खखलाना है।’’ दादा जी ने इधर-उधर देखते हुए कहा, ‘‘पर यहाँ तो मझु े तुम्हारा कोई भी दोस्त नह ं ददखायी दे रहा है।’’ अखणमा ने जोजो की ओर इिारा करते हुए कहा, ‘‘यह मेरा दोस्त है जोजो।’’ दादा जी ने कहा, ‘‘अरे यह तो सड़क का कुत्ता हैइससे दरू रहो नह ं तो तुम्हें काट लेगा।’’ अखणमा ने जोजो को सहलाते हुए कहा, ‘‘नह ं नह ं, दादा जी यह मेरा दोस्त है हम दोनों रोज गेंद खेलते हैं।’’ जोजो भी अखणमा के पाँि चाटने लगा मानो िह दादा जी को बता रहा हो कक हम दोनों दोस्त हैं। दादा जी ने अखणमा को दस रुपये दे ददये। अखणमा दौड़ कर पाका के सामने िाल दकु ान से त्रबस्कुट ले आयी। उसने जोजोँे को एक-एक करके त्रबस्कुट खखलाये। िह पूरा एक पैकेट त्रबस्कुट खा गया। दादा जी ने कहा, ‘‘लगता है तुम्हारे दोस्त को बहुत भखू लगी थी। अच्छा हुआ तुमने त्रबस्कुट खखला ददये।’’
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 53 बाल किा — भारत िे अखणमा को भी बहुत अच्छा लगा। अब िह रोज ह दादा जी के साथ पाका आती किर िह और जोजो खेलते। अखणमा भी जोजो को रोज कुछ न कुछ खखलाती। धीरे-धीरे जोजो उसके पीछे-पीछे उसके घर तक भी आने लगा। कुछ ददनों बाद दादा जी िापस कानपुर चले गये। पर जोजो उसके घर के आस-पास ह घूमता रहता। अखणमा भी रोज ह कुछ न कुछ उसे खाने को देती थी। एक ददन अखणमा पेजन्सल लेने घर के पास की दकु ान पर गयी। िह दकु ान से लौट रह थी कक ककसी आदमी ने उसे जबरदस्ती अपनी मोटर साइककल पर बैठा कर मोटर साइककल दौड़ा द । उसी समय पता नह ं कहा से जोजो आ गया। िह भौंकता हुआ मोटर सइककल के पीछे दौड़ा। थोड़ी ह दरू पर ट्रैकिक के कारण मोटर साइककल धीमी हुई तो जोजो ने उस आदमी के पैर को अपने मँहु में पकड़ सलया उस आदमी ने बहुत कोसिि की पर छुड़ा नह ं पाया। अखणमा के एक अकं ल उस समय बाजार में ह थे। उन्होंने उस आदमी के द्िारा अखणमा को उठाते हुए देख सलया था। िह पैदल ह उसका पीछा कर रहे थे। कुछ ह देर में िह हाँिते-हाँिते िहाँ तक पहुँच गये। अकं ल ने िोर मचाया तो िहाँ पर भीड़ इकठ्ठा हो गयी। िह आदमी भीड़ देख कर भाग गया। अखणमा रोते-रोते जोजो से सलपट गयी। उसी के कारण िह बच पायी थी। सब लोग जोजो की तार ि कर रहे थे। आज जोजो ने अपनी दोस्ती का धमा ननभा ददया था। ***********
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 54 सदिा ग्रोवर , भारत सदल्ली में जन्मीं सदिा ग्रोवर िीईईआरआई (सवज्ञान और प्रौसद्यसगकी मंत्रालय, भारत िरकार ) मेंफेलो िाई ं सटस्ट रिी ि|ैं1987 के जनित्ता मेंउनकी पिली बाल कसवता ‘जल की सततली मछली’ प्रकासित िुई थी। वेसनयसमत रूप िेबाल-नाटक और बाल कसवताएाँ सविेर् रूप िे सलख रिी ि।ैं केंद्रीय िासित्य अकादमेी, नई सदल्ली िसित अनेक िंस्थानों द्वारा प्रकासित पस्ुतकों मेंउनकी रचनाएाँप्रकासित िुई ि।ैं िपं कष - [email protected] बाघू ने गधे िे िीखा (बाल नाटक) (कुछ समय पहले की बात है, एक घने जगं ल में एक बाघ का पररिार रहता था । कुछ समय पहले बानघन ने 5 बच्चों को जन्म ददया था । सभी बच्चे बहुत ह प्यारे और स्िस्थ थे । बाघ और बानघन उन्हें बहुत प्यार करते थे। उनका एक बच्चा- जजस का नाम बाघूथा – बहुत नादान था, ददल का कोमल और बहुत उदार तो था लेककन जजद्द भी बहुत था । मनमानी करने के कारण रोज उसके साथ कोई न कोई नया अनोखा ककस्सा होता था । बानघन माँ बहुत परेिान थी कक उसे कैसे समझाए।) दृश्य-1: यह ढेंचूकौन हैं? बाघू– माँ, मैंआज थोड़ा जगं ल और देखना चाहता हूँ। क्या मैंजाऊँ ? बानघन माँ – तुम अकेले कैसे जा सकते हो बेटा ? बाघू– मझु े जाने दो ना माँ ! मैंपूरा ध्यान रखगूँ ा और कोई िैतानी भी नह ं करँगा। पक्का ! बानघन – लेककन बाघ…. ू बाघू- (बाहर भागते हुए) माँ इतनी बार आपके साथ जाकर मझु े सब समझ आ गई है। और आप ह तो कहतीं हैंन कक मैंसबसे ज़्यादा साहसी हूँ। हैना, हैना ! तो मैंजाऊँ? बानघन माँ - (बाघूकी तरि भागते हुए) हाँ, हाँमेरे साहसी बाघू,तुम तो मानोगे नह ं ? बहुत दरू नह ं जाना। अपना ध्यान रखना।
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 55 बाल नाटक— भारत िे बानघन माँ – (उत्सादहत होकर, भागते भागते) हाँमाँपक्का! पक्का! मैंजा रहा हूँ । (जगं ल का मज़ा लेते हुए आगे बढ़ने लगा । थोड़ी दरू चलने पर कुछ हलकी-हलकी आिाज़ सनु ाई पड़ती है) ढेंचू! ढेंचू!ढेंचू! ( रुक कर सनु ने की कोसिि करता है) ढेंचू! ढेंच!ू ढेंचू! बाघू– (हैरानी से मन ह मन) यह कैसी अजीब सी आिाज़ है । ऐसी आिाज़ तो पहले कभी नह ं सनु ी ! चल कर देखता हूँकौन है ! (आिाज़ की तरि बढ़ने लगता है ) ढेंचू! ढेंच!ू ढेंचू! (धीरे धीरे आिाज़ तेज होगे लगती है) ढेंचू! ढेंचू! ढेंच!ू (कतार में आते हुए कुछ जानिर नज़र आते हैं) बाघू– अरे यह कौन हैं? पहले तो कभी नह ं देखा ? माँ ने भी कभी इनके बारे में नह ं बताया । बाघू– अरे यह इन सब की पीठ पर क्या है ? (उत्सकु ता से देखने के सलए िह ं झाड़ी में छुप कर बैठ गया) यह सब क्या कर रहे हैंकुछ समझ नह ं आ रहा है। (बाघूकी जजज्ञासा बढ़ने लगती है, छलांग लगाकर आगे की झाड़ी में छुपकर देखने लगता है) बाघू– (देखते- देखते िाम हो गई थी) ऊि मेर तो समझ में कुछ नह ं आ रहा ये ‘ढेंचू’ क्या कर रहे हैं। ककतनी गमी हैऔर भखू से भी मेरा ससर चकरा रहा है। घर चलता हूँ, बाद में किर से आऊँगा। (पूरे रास्ते अलग-अलग ढंग से ढेंचू, ढेंचूबोलते हुए अपनी गिु ा तक पहुँच जाता है । बाघू– माँ , ढेंचू, मझु े भखू , ढेंचू, लगी है। कुछ खाने को , ढेंचू, दो। (ऐसे बाघूको बोलते देख उसके सभी भाई-बदहन हँसते -हँसते लोट-पोट हो रहे थे) बानघन माँ – ( हँसी नछपाते हुए) बाघूयह क्या कर रहे हो ? बाघू– माँ मझु ,े ढेंचू, बहुत भखू लगी है, ढेंचू, मझु े खाना दो, ढेंचू। बानघन माँ –अच्छा देती हूँ। बाहर से आए हो ना, पहले थोड़ा साि हो कर आओ !
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 56 बाल नाटक— भारत िे (सभी भाई-बदहन की ओर देखते हुए) चलो तुम सब भी आओ ! (सभी बच्चे खुद को साि कर के खाना खाने बैठ गए और धीरे-धीरे ढेंचू-ढेंचूदोहराते हुए हँसने लगे। बानघन माँ –(थोड़ा गस्ुसे से) ऐसे ककसी का मज़ाक उड़ाना अच्छी बात नह ं है। जल्द से खाना खाओ ! बाघू- (खाना खत्म कर के ) माँ आप ढेंचूको जानती हैं? बानघन माँ - (मस्ुकुराते हुए ) हाँमैंपहचानती हूँ। उनका नाम ढेंचूनह ं है। उन्हें गधा कहते हैं। बाघूऔर सभी बच्चे- गधा ! गधा ! ढेंचूगधा ! बाघूके भाई-बदहन – (एक साथ)यह कौन है ? कै सा होता है ? क्या करता है? कहाँ रहता है ? बाघू– ( सभी भाई-बदहन कानािूसी करते हुए) श्श्ि, कल तुम सबको ढेंचूगधा ददखाने ले चलँगू ा । बानघन माँ – चलो अब यह मस्ती बदं करो । मुझे और तुम्हारे पापा को कल के भोजन की खोज में जाना है। तुम सब गुिा में ह रहना। (बाघूसे गधों के बारे में सनु ने के बाद, सब समल कर अगले ददन उन्हें देखने के सलए योजना बनाते हुए सो गए) दृश्य-2: ढेंचूकहाँहै? (सबुह उठते ह सभी किर से अपनी योजना के बारे में चचाा करने लगे) बानघन माँ -यह क्या हो रहा है? बाघू– माँ , माँ हम नद पर पानी पीने जाएँ ? बानघन माँ – (ध्यान से देखते हुए) पानी पीने ह जाना हैना, कोई और योजना तो नह ं बना रहे ! बाघूऔर उसके भाई-बदहन – त्रबलकुल नह ं माँ। देखो ना ककतनी गमी है । बानघन माँ – अच्छा ठीक है जाओ। लेककन सब साथ-साथ रहना और समय से लौट आना। बाघू– धन्यिाद माँ। हम ध्यान रखेंगे और समय से लौट आएँगे। (सभी बाहर नद की ओर भागने लगते हैं) (नद पर पहुँच कर सभी पानी पीकर खेलने लगते हैं) (कुछ समय पश्चात) बाघूका भाई 2- बाघूढेंचूकहाँहैं? हम ढेंचूदेखने कब जाएँगे ? हम कब जाएँगे ? बाघ-ू ढेंचूयहाँनह ं हैंिह कुछ दरू पर जगं ल के कोने पर आएँगे।
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 57 बाल नाटक— भारत िे बाघूका भाई 3 – इतनी दरू ! क्या िहाँ जाना ठीक होगा ? बाघूका भाई 2- चुप रहो । सब ठीक है । मझु े ढेंचूदेखने ह हैं। (बाघूकी ओर देखते हुए) बाघूहम ढेंचूदेखने कब जाएँगे ? हम कब जाएँगे ? बाघू- अभी समय है । िह कुछ देर बाद आएँगे, तभी हम जाएँगे । बाघूकी बदहन – बाघूलेककन िह आते कहाँसे हैं। बाघू– यह तो मझु े भी नह ं पता । (सभी ढेचू, ढेंचूबोलते बोलते पानी उड़ाने लगते हैं) (थोड़ी देर नद के ठंडे- ठंडे पानी में खेलने के बाद) बाघू– चलो अब चलते हैंसभी गधे आ रहे होंगे। बाघूका भाई 1- सभी गधे ? ककतने ? बाघू– बहुत सारे ! बाघूका भाई 1- कह ं िो खतरनाक तो नह ं हैं? बाघू- लगते तो नह ं हैं। लेककन बहुत अजीब से हैं। अपनी पीठ पर न जाने क्या लाते हैं, आकर धगरा देते हैंऔर सारा ददन िह ं खड़े रहते हैं। बाघूका भाई 3- चलो चलकर देख लेते हैं। (सभी साथ-साथ दौड़ने लगते हैं) दृश्य-3: बाघूका गधों से आमना-सामना (रास्ते में चलते-चलते बाघूगधों की मन घड़तं कहाननयाँगढ़ने लगा। कभी डराता, कभी हँसाता। ) (कुछ दरू चलने पर बाघूको गधे की आिाज़ सनु ाई देती है। बाघू– (रुक कर) क्या तुम सब को कुछ सनु ाई दे रहा है? भाई-बदहन- (ध्यान से सनु ते हुए) हा,ँ हाँ। (जैसे-जसै े आिाज़ की ओर बढ़ने लगे , आिाज़ और साि सनु ाई देने लगी) ढेंचू! ढेंच!ू ढेंचू! बाघूका भाई 1 – ककतनी भद्द आिाज़ है।
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 58 बाल नाटक— भारत िे बाघू– देखो, उधर देखो, िह रहे ढेंचू! बाघूका भाई 3- यह तो बहुत सारे हैं! कैसे कतार में आ रहे हैं। बाघूका भाई 2 – ढेंचू! ढेंचू! बाघूकी बदहन – श्श्ि ! िोर नह ं मचाओ। बाघू– हाँचुपचाप झाड़ी में बैठ जाओ । उन्होंने हमें देख सलया तो कह ं लेने के देने न पड़ जाएँ। बाघूका भाई 1- अरे इनकी पीठ पर क्या है? और यह इंसान के साथ क्यों हैं? बाघू– हाँकल जब मनैं े इन्हें पहल बार देखा था तब भी इंसान के ह साथ थे। और पीठ पर न जाने क्या ले कर आते हैं, कुछ समझ नह ं आ रहा। बार-बार लाते हैंऔर िहाँढेर लगाते जाते हैं। बाघूका भाई 3- देखो ज़रा इनके पैर तो देखो, कुछ के पैर तो आपस में बांधे हुए हैं। बाघूकी बदहन - अरे हाँ, लेककन क्यों ? बाघू– पता नह ं मझु े तो यह बहुत ह अजीब लग रहें हैं। बाघूका भाई 3- हाँअजीब तो हैं। बाघूका भाई 2 – हाँ, हाँअजीब हैं! बाघूकी बदहन – देखो अपनी पीठ का सामान धगरा कर कब से त्रबना दहले खड़े हुए है । और देखो उस सामान से इंसान क्या कर रहे हैं? बाघूका भाई 2 – बाघूबताओ न क्या कर रहे हैं। बाघू– हाँ , यहाँकल तो कुछ भी नह ं था ! बाघूका भाई 2 – चलो न आगे चलकर गधों से ह पूछते हैं। (भागने लगता हैलेककन बाघूकी बदहन लपक कर उसे रोक लेती है ) बाघूकी बदहन – चुपचाप बैठे रहो। हम सबको मुसीबत में डालोगे। बाघू– यह इंसान सिकार भी हो सकते हैं। थोड़ी देर में जब इंसान चले जाएँगे तब आगे चलेंगे । बाघूका भाई 1 – तब तक यह ं इंतजार करते है । (दोपहर में सभी इंसान काम छोड़कर कह ं चले जाते हैं)
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 59 बाल नाटक— भारत िे (बाघ के बच्चे उछलते हुए गधों के पास पहुँचते हैं) (उन्हें देखते ह सभी गधे डर से धचल्लाने लगे ढेंचू! ढेंच!ू ढेंचू!) बाघू- अरे चुप हो जाओ, कोई आ जाएगा । डरो नह ं, हम तो तुमसे दोस्ती करने आए हैं। (लेककन गधे कहाँसनु ने िाले थे, बाघ को देखकर उनकी ससट्ट -वपट्ट गमु थी। िह सभी और ज़ोर से धचल्लाने लगे) ढेंचू! ढेंच!ू ढेंचू! ढेंच!ू ढेंच!ू ढेंचू! ढेंचू! (बाघ के बच्चे भी डरने लगे, तभी.. ) बाघूकी बदहन – (रौबदार आिाज़ में) चुप ! एकदम चुप हो जाओ, नह ं तो हम तुम सब का सिकार कर लेंगे! (सभी गधे त्रबलकुल िांत खड़े हो गए और बाघ के बच्चों को घूरने लगे) (दोनों तरि डर का माहौल था । ककसी में भी आगे बढ़कर बात करने की दहम्मत नह ं हो रह थी। तभी गधों के झडुं में से धीरे से आिाज़ आती है ) गधा 1 – तुम हमे खाने आए हो ? बाघू– (दहम्मत करते हुए ) नह ं, नह ं। हम तुम्हें खाने नह ं आए । बाघूकी बदहन – अरे नह ं ! हम सिकार करने नह ं आए । गधा 2 - किर ककस सलए आए हो ? बाघूका भाई 1- िो तो तुम्हें पहले जगं ल में कभी नह ं देखा इससलए तुम्हारे बारे में जानने आए हैं। बाघूका भाई 2 – (एक सांस में) बोलो-बोलो, तुम कौन हो? कहाँसे आए हो? क्यों आए हो ? क्या कर रहे हो? इंसान से डर नह ं लगता? तुम्हार पीठ पर क्या.. गधा 1– बस-बस ! इतने सिाल ! साँस तो ले लो ज़रा । िैसे तो हम गधों का कोई मखुखया नह ं होता लेककन तुम्हें जानकार हम सबसे सदुं र और समझदार गधा “चमचम” देगा। क्यों चमचम ?
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 60 बाल नाटक— भारत िे दृश्य-4: सीख (एक गधा बाघ के बच्चों की ओर थोड़ा बढ़ाने लगता है ) चमचम - ( कुछ आगे बढ़कर रुक जाता है) बोलो हमारे बारे में क्या जानना चाहते हो? लेककन एक-एक करके । बाघू–(इधर उधर देखते हुए ) तुम कौन हो, कहाँसे आए हो? हमें तुम्हारे बारे में सब जानना है । चमचम – हम्म्म ्ठीक हैबताता हूँ । हमें गधा कहते हैंऔर हम जगं ल के बाहर िहर में रहते हैं। जसै े पहले बताया हमारा कोई मखुखया नह ं होता। हम बहुत बड़े झडुं में नह ं रहते। बाघू– िहर ! ये िहर क्या होता है? चमचम – जैसे जानिरों के रहने के सलए जंगल होता है िैसे ह इंसान के रहने के सलए गाँि और िहर होते हैं। बाघूकी बदहन– तुम भी तो जानिर हो किर तुम िहर में क्यों रहते हो, इंसानों के साथ ? चमचम – हाँहम भी जानिर हैंलेककन हम इंसानों के बहुत काम आते हैं। हम िाकाहार हैंऔर उनके आदेि आसानी से समझ लेते हैं। हमसे उनको कोई खतरा नह ं होता इससलए हमें िह अपने पास रखते हैं। बदले में िह हमारा ध्यान रखते हैं, हमें खाना देते हैंऔर प्यार भी करते हैं। बाघूका भाई 1 – ऐसा कैसे हो सकता है? इंसान तो बस जगं ल में आकर सिकार ह करते हैं! बाघू– नह ं भाई , सब इंसान बुरे नह ं होते। मनैं े िन अधधकार के बारे में बताया था ना ? बाघूका भाई 1 – ( सोचते हुए ) हम्म्म.्. गधा – िन अधधकार … क्या तुम जानते हो, हमें भी िन अधधकार ने ह बुलाया है। हम यहाँउनका ह मकान बनाने में सहायता करने आए हैं। बाघूका भाई 2 – मकान क्या होता है ? चमचम – जैसे तुम्हारा घर गिु ा होती है, इंसानों के घर को मकान कहते हैं। (इतने में िन अधधकार अपनी जीप में िहाँआ जाते हैं) ( बाघूके भाई बदहन सभी इधर उधर दौड़ने लगते हैं) बाघूऔर चमचम – ठहरो- ठहरो ! यह तो अपने िन अधधकार हैं। तुम सब डरो नह ं !
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 61 बाल नाटक— भारत िे (सब ठहर तो जाते हैंलेककन डर की िजह से कुछ कदम पीछे हट जाते हैं) बाघू– आओ मैंतुम सब को िन अधधकार से समलिाता हूँ । (िन अधधकार की ओर देखते हुए ) आपने पहचाना मझु े । िन अधधकार – अरे बाघूतुम । कैसे हो ? किर से कोई िरारत तो नह ं सझू रह न ? क्या ये सब तुम्हारे भाई-बदहन हैं? बाघू– हाँ हाँ, ये सब मेरे भाई-बदहन हैं। हम सब यहाँगधों को देखने आए थे। उनके बारे में जानना चाहते थे । िन अधधकार – बहुत अच्छे । किर अभी तक क्या जाना तुमने ? बाघू– यह कक ये सब आपका मकान बनाने िहर से आए हैं। िन अधधकार – त्रबलकुल ठीक । आओ मैंतुम्हें गधों की कुछ खास बातें बताता हूँ । (सब िह ं बठै कर िन अधधकार के बोलने का इंतजार करते हैं) (उनकी उत्सकु ता देख मस्ुकुराते हुए) ये सब गधे बहुत ह मेहनती और ििादार होते हैं। उनकी याद रखने की और सीखने की िमता बहुत अधधक होती है । सामान उठाने में बहुत मादहर । त्रबना थके ढेर सारा सामान अपनी पीठ पर लादकर इधर से उधर पहुँचा देते हैं। यहाँभी मकान बनाने का सामान जसै े ईंट, रोड़ी, िगरैा लाद कर लाए हैं। बाघू– हाँ हमने देखा और इन्होंने बताया भी । िन अधधकार – क्या तुम इनका सबसे खास गणु जानना चाहते हो । बाघूऔर सभी – हाँ हाँ, बताइए ना ? िन अधधकार – जानते हो गधों को मखू ा समझा जाता हैलेककन िो मखू ा त्रबलकुल नह ं होते । (अपनी तार ि सनु सभी गधे खुिी से िूले नह ं समा रहे थे) िह अन्य जीिों की तरह, मजुश्कल समय में, एकदम से घबरा नह ं जाते और होि नह ं खो बैठते। िह जस्थनत को समझने का पूरा समय लेते हैंओर उसके बाद ह कुछ काया करते हैं।
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 62 बाल नाटक— भारत िे अगर उन्हें कह ं ले जाया जा रहा हो और उन्हें खतरा लगे तो िो िह ं रुक जाते हैं। पूर सािधानी से ह प्रनतकक्रया देते हैं। जल्द िैसला न करने के कारण उन्हें मदं बद्ुधध समझा जाता है जबकक ऐसा नह ं है। इनके कान देख रहे हो, ककतने बड़े हैं। इनको ककसी और गधे की पुकार बहुत दरू से भी सनु ाई दे देती है। बाघू– िाह गधे तो बहुत समझदार होते हैं। आपने हमें बहुत अच्छी जानकार द है । हम हमेिा याद रखेंगे लेककन इनके पैर क्यों बाँध रखे हैं? िन अधधकार – (सोच कर बोलते हुए) अपने बचाि के सलए ये अपने पैरों से दलु त्ती मारते हैं, जो जानलेिा हो सकती है । कह ं कभी गलती से भी ककसी को लग न जाए इससलए इनके मासलक पैर बाँध देते हैं। अच्छा बताओ गधों से तुमने क्या सीखा । बाघू– सीखा ! (सोचते हुए) हमेिा जल्दबाजी से काम नह ं लेना चादहए। िांत रहने िाला हमेिा मदं बुद्धध नह ं होता, िह समझदार और साहसी भी हो सकता है । हर ककसी में कोई न कोई खाससयत ज़रर होती है । बाघूका भाई 2 - और अगर गधे के पैर न बंधे हो तो उनके पीछे नह ं खड़ा होना चादहए । (सभी ज़ोर से हँसने लगे) िन अधधकार – बाघूतुम्हारे भाई बदहन भी तुम्हार तरह बहुत प्यारे हैं। चलो अब तुम सबको जाना चादहए । सभी मज़दरू काम पर िापस आ रहे है । तुम्हें देखकर िह डर जाएँगे। (बाघ के बच्चों और गधों ने एक दसू रे से विदाई ल । गधों ने बाघ के बच्चों को िहर आने का न्योता भी ददया) (बाधूमन ह मन िहर देखने की नई योजना बनाते हुए सबके साथ गिु ा की ओर भागने लगा।) ***********
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 63 फल देने वाले, अनुभवी वृक्ष हम डॉ. रमेि यादव , भारत डॉ. रमेि यादव वररि िासित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार एवं बिुआयामी व्यसक्तत्व के धनी ि।ैं सवसवध सवधाओंमेंउनकी अब तक 14 पस्ुतकेंप्रकासित ि।ैंदिे -सवदिे की सवसवध िस्ं थाओं द्वारा उन्िें कई मान-िम्मान एवंपरुस्कार प्राप्त ि,ैंसजनमेंप्रमखु िैं- उत्तर प्रदिे सिदं ी िस्ं थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर का िौिादषिम्मान, मिाराष्ट्र राज्य िासित्य अकादमी परुस्कार,सवश्व सिदं ी िसचवालय (मॉरीिि) द्वारा काव्य का प्रथम परुस्कार आसद| िपं कष - [email protected] गाँि से दादा-दाद आ रहे हैं, इस खबर से तनु (तननटका) खुि थी मगर कुछ परेिान भी थी। उसने अपने दादा-दाद को ठीक से देखा नह ं था। वपछल बार जब िे मुंबई आये थे तब िह ससिा चार साल की थी। ऐसा उसकी मम्मी ने बताया था। अब िह दस साल की हो गई है। तनुके मन में कई प्रश्न उठ रहे थे जसै े कक - मेरे दादा-दाद कै से होंगे? कै से ददखते होंगे? व्हाटसअप और िेसबुक की दनुनया से तो दादा-दाद कोसों दरू हैं, उनके पास आधुननक मोबाइल जो नह ं है। ऐसे में विड़डओ कॉसलगं का तो सिाल ह नह ं उठता! अब िह अपने मन में दादा–दाद की भला क्या तस्िीर बनाए! अपनी इस समस्या का समाधान के सलए तनुने बड़े भाई आकाि से पूछा – “भैया, हमारे दादा-दाद कैसे ददखते हैं? क्या िे लोग बड़े सख़्त हैं?” आकाि जो कक बारहिीं में पढ़ता है, उसने उसकी बात को मजाक में टाल द । अपनी जजज्ञासा को िांत करने के सलए रात में सोने से पहले उसने मम्मी से भी पूछा, पर मम्मी का भी मडू ठीक नह ं था। उसने जिाब ददया, “कल िे लोग आएँगे तो तुम खुद ह देख लेना, अब सो जाओ चुपचाप।” पापा देर से आने िाले थे। सबुह तनुको स्कूल जाना था अत: िह तुरंत सो गई। आखखर िह ददन आ ह गया जब दादा–दाद घर पधार चुके थे। तनुस्कूल से आयी तो दाद ने उसे प्यार से गले लगा सलया और दादाजी ने पास बुलाकर चूम सलया। दादाजी ने कहा, “देखो, तो हमार पर रानी ककतनी बड़ी और सयानी हो गई है!” तनुने तुरंत दादा–दाद के पाँि छुए और आिीिााद सलया। दादाजी ने उसे दलु राया और कहा, “बेटे आज से हम आपके दोस्त हैं। दाद के इलाज के सलए हम कुछ मह नों तक यह ं आपके साथ रहेंगे, ठीक हैना! आप हमें घुमाओगे ना?” तनुने हाथ समलाया और कहा, “जी, हमें आपकी दोस्ती मजं रू है, हम आप लोगों को खूब घुमाएंगे, आप लोग ककसी बात की धचतं ा मत करना दाद।ू” उसकी इस बात पर सभी ने जोर का ठहाका लगाया।
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 64 बाल कहानी— भारत िे “दादाजी, हमने जान-बूझकर तनु को आप लोगों के बारे में कुछ भी नह ं बताया था क्योंकक हम इसे स्िीट सरप्राइज देना चाहते थे।” आकाि की इस बात पर पनु : ठहाका लगा। दादा–दाद से समलकर तनुबहुत खुि थी। कल तक उनके बारे में िह न जाने क्या-क्या कयास लगाए जा रह थी! दादाजी तो लंबे–चौड़े कद के सेिा ननित्तृ प्राध्यापक ननकले। उन्हें धचिकार का बड़ा िौक था। दाद भी एकदम प्यार थीं, उसके मन से सारे भ्रम दरू हो गए थे। खैर, उस ददन तो इधर–उधर की बातें होती रह ं। दसू रे ददन से स्कूल, कॉलेज, क्लास, होमिका, मम्मी की बकैं की नौकर और पापा का ऑकिस इत्यादद का ससलससला िुर हो गया। सब लोग अपने–अपने काम में व्यस्त हो गए। दाद के आ जाने से तनुकी मम्मी को कािी राहत समल गई थी। दाद सबुह-िाम ककचन में मदद कर देती थीं। रात में सभी समलकर एक साथ खाना खाते थे। तनु और आकाि के आपसी झगड़े भी कम हो गए थे। दादाजी होमिका के साथ-साथ प्रश्नोत्तर करिाने में उनकी मदद कर देते थे। दोनों ने दादाजी से िादा ककया था कक इस साल िे अपनी-अपनी किा में टॉप करेंगे। घर एकदम से खखल उठा था। ककतनी आसान और सहज हो गई थी जज़ंदगी, है ना! एक ददन िाम को तनु अपने दादा-दाद के साथ इतराती हुई पाका में टहलने गई। अचानक सामने से आ रहे एक व्यजक्त ने पान की जोरदार वपचकार पाका की पक्की जमीन पर मार । दादाजी ने तुरंत उसे टोक ददया, “भाई समझदार होते हुए भी सािजा ननक जगह पर थूकते हो! इससे गदं गी िैलती है।” इस पर िह व्यजक्त गरुाया ा और जोर से बोला, “ये आपकी जगह है क्या?” “नह ं भाई, यह हम सबकी जगह है। यहाँ लोग अपने पररिार और बच्चों के साथ घूमने-टहलने आते हैं। आपका पररिार भी तो आता होगा! गंदगी से रोग िै लता है। पाका की स्िच्छता और सिाई हम सबकी जज़म्मेदार है।” और दादाजी ने उस व्यजक्त से थूकी हुई जगह को साि करने को कहा पर िह नह ं माना। बहस बढ़ जाने के कारण लोग तमािा देखने जमा हो गए। कोई कुछ बोल नह ं रहा है, यह देखकर दादाजी ने पास धगरे एक अखबार के टुकड़े को उठाया और खुद ज़मीन साि करने लगे। यहाँ तक कक ििा को अपने बोतल के पानी से धोया भी। यह देखकर लोग चककत हो गए। िह व्यजक्त भी िसमिंदा हो गया। अब िह भी इधर–उधर धगरे कचरे और कागज के टुकडों को उठाकर कूड़दे ान में डालने लगा। दादाजी ने इस काम में उसका साथ ददया। दाद और तनु भी कचरा उठाकर कूड़दे ान में डालने लगीं। पास खड़े लोग भी त्रबना एक दसू रे से कुछ बोले सिाई के काम में लग गए। कई बच्चे और बुजगु ा इस समिन
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 65 बाल कहानी— भारत िे कब िासमल हो गए, पता ह नह ं चला। देखते ह देखते पाका साि हो गया और लोगों की आँखें खुल गईं। सबने दादाजी को बधाई द । एक बुजगु ा व्यजक्त आगे बढ़कर बोला, “स्िच्छता के महत्त्ि को तो हम सभी जानते हैं पर आपने अगिु ाई की और यह बात बन गई। आपका व्यजक्तत्त्ि कररश्माई है।” यह सनु ते ह सबने हाँमें हाँसमलाई। दादाजी ने कहा, “ भाइयों, हमारा काम अभी खत्म नह ं हुआ है। आखखर यह पाका हमार कॉलनी का एक अहम दहस्सा है, तो क्यों ना हम सब समलकर इन द िारों की रंगाई– पुताई करके पाका को और भी सदुं र बनाएं? आप लोग तो जानते होंगे हैंकक 1 अक्तूबर का ददन ‘विश्ि िररटठ नागररक ददिस’ के रप में मनाया जाता है। इस बार हम इसे अनोखे ढंग से मनाएंगे और कॉलनी िालों को अपनी तरि से एक अनूठी सौगात पेि करेंगे! क्या ऐसा नह ं हो सकता है?” सबने एक सरु में हामी भर और अपना-अपना योगदान देने का िादा ककया। सरो-सामान लाने की सार जज़म्मेदाररयाँ सबने आपस में बांट ल । पैसों का भी इंतजाम हो गया। तब दादाजी ने कहा, “उस ददन हम सभी को अपने पररिार और बच्चों के साथ आना है ताकक हमार नई पीढ़ भी इसके महत्त्ि को जाने।” तीसरे ददन तय समय पर दादा-दाद , तनु, उसका भैया, उनके समि-सहेसलयां, तनु के मम्मी–पापा पाका पहुँच गए। मगर पाका में कुछ धगने-चुने लोग ह आए थे। कुल समलाकर सख्ं या में ससिा 15-16 लोग ह थे। अच्छी बात तो यह थी कक रंग-रोगन का सामान आ गया था। दादाजी ननराि नह ं हुए, जजतने लोग थे, उन्हें लेकर द िारों पर सिेद लगाने का काम आरंभ कर ददया। बड़े–बड़े धचि बनाकर दादाजी ने बच्चों को उसमें रंग भरने का काम दे ददया। दादाजी की धचिकार देखकर बच्चे एकदम खुि हो गए। धचिों में काटूान के पाि स्िच्छता और सदुं रता का सदं ेि दे रहे थे। बच्चे तुरंत अपने पसदं के काम में लग गए। हिा की तरह यह खबर कॉलनी में िैल गई। धीरे-धीरे कारिाँ बढ़ता गया और सैकड़े की संख्या कब पार हो गई, पता ह नह ं चला। मदहलाओं ने घर से चाय-नास्ते का इंतजाम ककया। सामाजजक कायाकतााओं ने भी रंग-रोगन, सजािट के सामान देने तथा श्रमदान में अपना योगदान ददया। लगातार पाँच ददनों तक यह काम चलता रहा। लोगों की खुिी का कोई दठकाना नह ं था। द िारों पर सलखे सवुिचारों को पढ़कर लोग सदाचार की भािना से गद्गद हो रहे थे। दादाजी की पूिा सचू ना के अनुसार पूर कॉलनी और पाका में ििृ ारोपण का कायक्रा म भी सम्पन्न हुआ। बच्चों ने इस काम में भी खूब आनंद सलया। उनके सलए यह सब नया और अनोखा था। अब तक िे इसे ससिा ट िी, अखबारों और ककताबों में देखते-पढ़ते रहे थे मगर यहाँ तो िे अपने हाथों से पौधे लगाकर उन्हें सींच रहे थे। उनके इस काया को देखकर नगर पासलका ने भी अपनी तरि से खेल–कूद और व्यायाम के सामान पाका में लगिा ददए।
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 66 बाल कहानी— भारत िे पाका अब सजकर तैयार हो गया था। ‘विश्ि िररटठ नागररक ददिस’ के औधचत्य पर गणमान्य लोगों की उपजस्थनत में िररटठ नागररकों का पाका में सम्मान ककया गया। तनु के दादाजी का भी वििेर् सम्मान ककया गया। उनकी स्तुनत में िब्दों की बरसात हो रह थी। समारोह के प्रमखु अनतधथ ने अतं रराटट्र य िद्ृ ध ददिस के बारे में विस्ततृ जानकार देते हुए कहा कक सयं ुक्त राटट्र ने विश्ि में बुजगु ों के प्रनत हो रहे दव्ुयिा हार और अन्याय को समाप्त करने के सलए और लोगों में इसको लेकर जागरुकता िै लाने के सलए 14 ददसम्बर, 1990 को यह ननणया सलया कक हर साल 1 अक्टूबर को अतं रराटट्र य बुजगु ा ददिस के रप में मनाकर हम बुजगु ों को उनका सह स्थान ददलाने की कोसिि करेंगे। तत्पश्चात 1 अक्तूबर, 1991 को पहल बार अतं रराटट्र य बुजगु ा ददिस मनाया गया, जजसके बाद से यह ददिस पूरे विश्ि में मनाया जाता है। समाज को चादहए कक िे िररटठ नागररकों के बारे में धचतं ा करें, उनका मान-सम्मान करें, उनकी मलू भतू सवुिधाओं का ध्यान रखें। कल हम भी इसी जस्थनत को प्राप्त होंगे। अत: उनकी जगह िध्ृदाश्रमों में नह ं बजल्क हमारे ददलों में और घरों में होनी चादहए। आज का ददन हम समाज के िररटठ नागररकों को समवपता करते हैं। अपने सम्मान के जिाब में दादाजी ने कहा, “भाइयों, मैंठहरा गाँि का आदमी, ये जो काम हम सबने समलकर ककया है, िो तो हमार नैनतकता का एक दहस्सा था। जीिन भर स्कूल में बच्चों को हम यह पाठ पढ़ाते रहे। आखखर हम बुजगु ों को अब दसू रा काम ह क्या है? रह –सह जज़दं गी यदद नेक काम में लग जाए तो हमारा जीिन भी साथाक हो जाएगा। पेड़ जजतना बड़ा होता है, िह उतना ह अधधक झकु ा हुआ, विनम्र और िल देने िाला होता है। ककसी पर बोझ बनने से अच्छा है कक हम अपने अनुभि का लाभ दसू रों को दें, उनका सहारा बनें। आप सभी ने स्िच्छता के इस समिन को अपना काम मानते हुए जजस ज़ज़्बे के साथ राटट्र यता के दानयत्त्ि को ननभाया है उसे मैंनमन करता हूँ। इस सम्मान के असल हकदार तो आप सभी लोग हैं।” यह कहते हुए दादाजी की आँखें भर आईं। तासलयों की गड़गड़ाहट से सारा पाका गँजू उठा। तनुअपनी सहेसलयों तथा समिों के बीच इतरा रह थी पर उसकी भी आँखें भर आई थीं। **********
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 67 नन्ही नगलहरी सचत्रा गप्तु ा, सिगं ापरु सिंगापरु मेंढाई दिकों िेभी लम्बेिमय िेसचत्रा गप्तुा सिंगापरु मेंरि रिी िैं| इन्िोनेसिंगापरु केकई सवद्यालयों मेंसिदं ी सििण कायषसकया िै| ‘फन सिदं ी’ नामक वेबिाइट के माध्यम िे सििण मेंिसक्रय रिती िैं| िासित्य की कई सवधाओंमेंसलखती िैं| सचत्रा जी के कई िाझा िंकलन प्रकािासित िो चकुेिैं| इनके िम्पादन मेंसिंगापरुनवरि काव्य िंग्रि भी प्रकासित िुआ िै| सिसिका, लेसखका िोनेकेिाथ िी वेअसभनय मेंभी दखल रिती िैं| िपं कष - [email protected] एक धगलहर छम-छम करती डालों पर इतराती | कुतर-कुतर कर िल खा जाती, नीचे बीज धगराती | िर्ाा के झम-झम जल से, बीज अकं ुररत होते | िसधु ा के ये नन्हे पौधे , एक ददन ििृ बने होते | तरह-तरह के िलों को पाकर , िाखाएँझकु जातीं | अनजाने में यह नादान, खेतों का मान बढ़ाती | झब्बेदार पँूछ हैइसकी , कुछ नटखट सी आँखें | लम्बे कान नुकीले, मखु के दाएँ-बाएँसहुाते | हल्के पीले पंजों से छलांग लगाती ऊँ ची |
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 68 बाल कषवता— सि िंगापुर िे आहट होते ह िुतील , पत्तों में नछप जाती | ऊँ चाई पर ननभाय होकर , अपना नीड़ बनाती | समय न ननजश्चत सोने का , जब मजी सो जाती | ननगाह बहुत ह पैनी , मजबूत पकड़ पंजों की | आगे के दो पैरों को, हाथ प्रिस्त बनाती | दाँतों की धार से उसकी, नह ं बीज बच पाता | कठोर आिरण से बीजों को, झट से मक्ुत कराती | ददखाई देती है अब कम , खुले बगीचे रह गये कम | िहर सीमेंट के हो गये, पेड़ विलप्ुत से हो गये | पयाािरण की रक्षिका धगल्लूके , ददन भी पूरे हो गये | *******
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 69 प्यार कभी ना होगा कम आलोक समश्रा , भारत कानपरु मेंजन्मेआलोक समश्रा सपछलेबीि वर्ों िेसिंगापरु मेंसनवाि कर रिेि|ैंवे एक बिुराष्ट्रीय सिसपंग कंपनी मेंकायषरत िैं| उनके कई िाझा काव्य-िंग्रि प्रकासित ि|ैंदिे -सवदेि की सवसभन्न पत्र-पसत्रकाओं में काव्य की सभन्न सवधाओंके िाथ िी किानी लेखन मेंभी िसक्रय िैं| िपं कष - [email protected] चन्दा मामा, चन्दा मामा उर में कुछ सिं य ना लाना प्यार कभी ना होगा कम | कुछ ददन बीते आया है प्रज्ञान आपके घर उसने कुछ तस्िीरें भेजी अद्भतु अनत सन्ुदर लेककन आपके चहरे पर ददखते चेचक के दाग अपने घर से जब देखूँतो नह ं द खते दाग चेचक के ये दाग देख मेर आँखें हैंनम प्यार कभी ना होगा कम | पापा कहते िैज्ञाननक गण करते अनुसन्धान
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 70 बाल कषवता— सि िंगापुर िे आप तलक आने-जाने के बना रहे हैंयान कुछ ददन में माँ-बाबूके सगं हम भी आएँगे इक अच्छा सा डॉक्टर अपने सगं में लाएँगे िल्य चककत्सा से चेहरे के दाग समटाएँगे उस ददन का ह इंतज़ार अब करते रहते हम प्यार कभी ना होगा कम | आपके बारे में मम्मी अक्सर बतलाती हैं चन्दा मामा दरू के कह पररचय बतलाती हैं जब आिा-जाह के सब रस्ते खुल जाएँगे चन्दा मामा टूर के कह सबको बतलाएँगे बैठ यान में जब चाहें हम तो आ जाएँगे मम्मी-पापा डांटेंगे तो आपके घर आएँगे हम पर आप बनाए रखना प्रेम भाि हरदम प्यार कभी ना होगा कम | तुमसे समलकर मझु को ढेरों बातें करनी हैं मन में उठती जजज्ञासाएँ साझा करनी हैं हाँ, यह तो बतलाओ क्यूँबस रात को आते हो कौन नौकर करते हो क्या पीते-खाते हो तारों के संग कौन-कौन से खेल खेलते हो कम-ज़्यादा तुम िज़न भला कै से कर लेते हो पापा को बतलाना कै से पेट करें िह कम प्यार कभी ना होगा कम | *******
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 71 हृदय पररवतषन इसंदरा अग्रवाल, सिगं ापरु इसंदरा अग्रवाल लगभग 26 िाल िेसिंगापरुमेंसिदं ी सििण िेजड़ुी ि|ैंसिदं ी सवद्यालय की पसत्रका में िमय-िमय पर लेखन करती रिती ि|ैंसिदं ी िासित्य पठन मेंइनकी सविेर् रुसच िै| िपं कष - [email protected] ककसी गाँि में द नूनामक एक लकड़हारा रहता था | िह प्रनतददन जंगल से लकड़ड़याँ काट कर लाता था और उन्हें बेच कर अपना गजु ारा करता था | उसके दो प्यारे- प्यारे बच्चे थे | िह अपने पररिार से अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था | जब िह िाम को घर आता था दोनों बच्चे दौड़ कर आते और उसके गले लग जाते थे | उसकी पूरे ददन की थकान दरू हो जाती थी | उसकी पत्नी श्यामा गमाागमा स्िाददटट खाना अत्यंत प्यार से बनाती थी, जजसे सब समलकर एक ह थाल में खाते थे | खाना खाते समय ददन भर की बातें एक दसू रे को सनु ाते थे | मम्मी- पापा सोते समय दोनों को मजेदार कहाननयाँ सनु ाते थे | उन कहाननयों को सनु ते- सनु ते ह बच्चे ननिा देिी की गोद में सो जाते थे | द पािल का त्यौहार नजद क आ रहा था बच्चों ने आज पापा को जाते समय कहा-” पापा- पापा हमारे सलए पटाखे लाओगे क्या ? “द नू ने कहा बेटा तुम्हारे सलए नए कपड़े और समठाई भी लेकर आऊँ गा | यह सोचते-सोचते िह जगं ल में लकड़ड़याँ काट रहा था उसे आज इतनी सार चीज़ें खर दनी है इससलए बहुत जल्द -जल्द लकड़ड़याँ काट रहा था ताकक ज़्यादा लकड़ड़याँ काट सके | उसकी आँखों के सामने दोनों प्यारे प्यारे बच्चों की भोल -भाल सरूत आ रह थी: पापा आप हमारे सलए पटाखे लाना मत भलू ना | अचानक उसके हाथ से कुल्हाड़ी किसल गई और उसके पैर पर धगर गई, िह बुर तरह जख्मी हो गया और पैर से खून बहने लगा | उसे बहुत पीड़ा हो रह थी लेककन िह अपने ददा को भलू कर लकड़ड़याँ काटने लगा | उसने लकड़ड़यों को बेचकर िुलझड़ी ,अनार ,चकर , रॉके ट पटाखे ,द पक और नए कपड़े भी खर दे | िह खुिी -खुिी बच्चों के सलए सामान खर द कर घर गया | बच्चे इतने सारे पटाखे ,समठाई, नमकीन और नए- नए कपड़े देखकर खुिी से नाचने लगे | द नूकी पत्नी ने उसके घाि पर हल्द और घी के िाहे की पट्ट बाँधी जजससे उसे बहुत राहत समल और ददा में थोड़ा आराम समला | िह सोते समय बार-बार सोच रहा था कक मझु े
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 72 बाल किा— सि िंगापुर िे इतनी सी चोट लगी किर भी इतना ददा हो रहा हैऔर मैंतो पेड़ों को पूरा का पूरा काट देता हूँ उन्हें ककतना ददा होता होगा ? यह सोचते - सोचते उसे गहर नींद आ गई | नींद में उसे लगा कक सारे पेड़ उससे कह रहे हैं कक तुम हमें इतना कटट क्यों देते हो ? हम तो तुम्हें खुसियाँदेते हैं| जसै े सारे पेड़ों ने उसे घेर सलया और उससे बार-बार पूछ रहे हैंतुम इतना कटट क्यों देते हो ? हमारे कटट के सलए ससिा तुम जजम्मेदार हो | िह पसीने में तरबतर हो गया और घबराकर बैठ गया | उसकी पत्नी ने पूछा- क्या हुआ ? उसने कहा मैंपेड़ काटकर बहुत गलत काम कर रहा था | अब मैं एक नसरा खोलँगू ा और छोटे-छोटे पौधे बेचँूगा | उसकी पत्नी ने उसे नसरा खोलने के सलए जो भी पैसे बचाएँ थे सब दे ददए | िह गलु ाब, चंपा, चमेल और मोगरा के िूलों के पौधे भी लाया | उन्हें िह बहुत कम दाम पर बेचने लगा | गाँि के लोगों को कहता अपने आँगन में पेड़- पौधे लगाओ, ककचन गाडना , टेरेस गाडना बनाओ | अपने घर में सजब्जयाँ और िल लगाओ | उसकी पत्नी भी मदद करने लगी | उसने गाँि की मदहलाओं को ससलाई करना, स्िेटर बुनना सदुं र-सदुं र ड्रसे बनाना भी ससखा ददया था | उनका जीिन ह बदल गया उसने पूरे गाँि में जंगल बचाओ और पेड़ लगाओ का जनु ून पैदा कर ददया | हर घर के बाहर सगु धं धत िूलों के पौधों का बगीचा और वपछिाड़े िलों का बगीचा लग गया था | इस गाँि पंचिट को लोग बगीचों का गाँि पंचिट कहने लगे थे | उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से पूरे गाँि के अदं र सििा के प्रनत लगाि, आत्मननभार बनने की भािना भी पैदा कर द थी | उसके हृदय पररितान ने गाँि की काया ह पलट द थी | हमार सकारात्मक सोच क्या नह ं कर सकती है ? उसका पररिार अब उसकी पत्नी और दो बच्चे नह ं बजल्क परूा गाँि एक पररिार की तरह था और सब के ददल में एक दसू रे के प्रनत प्यार और समपणा की भािना थी | **************
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 73 लूना और सलयो की दोस्ती िेमा कृपलानी, सिगं ापरु दो दिकों िेभी असधक िमय िेभारत िेबािर रि रिी िमेा कृपलानी सिंगापरुमेंसिदं ी सििण िेसपछलेकई वर्ों िेजड़ुीि|ैं वेस्वतंत्र लेसखका, असभनेत्री एवंकुिल प्रस्तोता भी ि।ैंकई पत्र -पसत्रकाओंमेंइनकेआलेख प्रकासित िो चकुेि|ैं िपं कष- [email protected] एक समय की बात है, एक छोटे से मोहल्ले में, दो जानिर रहते थे - एक काल त्रबल्ल जजसका नाम लनू ा था और एक सनु ेहरा ररट्र िर कुत्ता जजनसा नाम सलयो था। लनू ा सदुं र और ग्रेसिुल थी, जबकक सलयो बड़ा और स्िभाि से िरारती था। िे दोनों एक-दसू रे से बहुत अलग थे लेककन उनकी कहानी बहुत अनोखी थी। लनू ा एक छोटे ि सखु ी गप्ुता पररिार के साथ रहती थी। बच्चे अक्सर लनू ा की आकवर्ता करने िाल हर आँखों की कहाननयाँ सनु ाने के सलए इकट्ठा होते थे। उनका मानना था कक लनू ा की आँखें अधं ेर रात के रहस्यों को देख सकती हैं। दसू र ओर, िमाा पररिार का प्यारा और लाडला, सलयो ककसी ऊजाािान गेंद की तरह सारा-ददन उछल-कूद मचाए रहता था। मोहल्ले के सभी बच्चों का पसंद दा साथी था। उसकी दहलती पँूछ और कूद-िाँद को देख बच्चे खुिी से पागल हुए जाते और बच्चों को खुि देख, सलयो और ज़्यादा मस्ती में आ जाता था। दोपहर में एक ददन लनू ा घर के बाहर झपकी ले रह थी तभी उसे बच्चों के खेलने और हँसी की आिाज़ सनु ाई द । उसने सोचा, ज़रा पता तो लगाऊँ, कौन खेल रहा है? लनू ा झट उठ खड़ी हुई और िमाा जी के बगीचे में चल आई। लनू ा ने देखा कक बच्चे सलयो के साथ मज़े से खेल रहे हैं। इसी मौज-मस्ती के बीच सलयो की नजर लनू ा पर पड़ी। िह एक पल के सलए दठठक गया, अचानक कह ं से प्रकट हुई खूबसरूत-सी त्रबल्ल को देखकर मिं मग्ुध हो गया। हमेिा से िांत रहने िाल लनू ा ने अपनी आकवर्ात करने िाल हर -हर आँखों से सलयो को ऐसे देखा कक सलयो तो मोदहत ह हो गया। सलयो लनू ा के पास आया, उसकी पँूछ इतनी जोर से दहल रह थी कक मानो िह हेल कॉप्टर की तरह उड़ान भर सकता है। उसने कहा "हैलो, मैंसलयो हूँ! तुम्हारे साथ खेलना चाहता हूँ, तुम भी खेलोगी ?" और ऐसा कह िह उत्साह से भौंकने लगा।
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 74 बाल किा— सि िंगापुर िे लनू ा ने, अपने नए पड़ोसी के उत्साह से अप्रभावित होकर, अपनी िांत और सरु ल आिाज़ में उत्तर ददया, "हैलो सलयो ! मैंलनू ा हूँ। आप क्या खेलना पसदं करते हैं?" लनू ा ने स्िगै से भरकर पूछा। उस ददन से, लनू ा और सलयो पक्के दोस्त बन, जजन्हें कभी कोई अलग नह ं कर सकता था। अपने मतभेदों के बािजूद, िे हर ददन एक साथ खेलते थे। लनू ा बगीचे में उड़ते हुए पत्तों का पीछा करती थी जबकक सलयो खिु ी से उसके पीछे भागता था। लनू ा खखड़की से पक्षियों को देखती थी और सलयो उसके पास बैठकर पक्षियों पर ऐसे भौंकता था मानो िे पुराने दोस्त हों। तो कभी-कभी बगीचे में पेड़ के नीचे दोनों साथ में बैठकर बच्चों को खेलते हुए ननहारते रहते। उनकी दोस्ती िाम को खेल के समय पर समलने से भी आगे बढ़ गई। लूना अक्सर सलयो के साथ रात के समय की रहस्यमयी कहाननयाँ साझा करती थी, जजसमें िह अधँ ेर रात के आश्चयों का िणना करती थी जजसे उसने खोजा था। बदले में, सलयो लनू ा को आस-पड़ोस के बच्चों के साथ अपने रोमांचक खेल की कहाननयाँसनु ाता था। उनकी दोस्ती से न केिल उन्हें फ़ायदा हुआ बजल्क इसने गप्ुता जी और िमाा जी के पररिार को भी एक-दसू रे के कर ब ला ददया। दोनों पररिार अब साथ में वपकननक पर जाते और पाटी भी करते थे। अपने-अपने पालतू जानिरों की मज़ेदार कहाननयाँ एक-दसू रे से साझा करते और उनका आनंद उठाते थे। सददायों का मौसम था और ऐसी ह एक िाम को, जब लनू ा और सलयो तारों की मलु ायम कंबल के नीचे एक साथ दबुक कर घर के कोने में बैठे हुए थे, लनू ा ने अपने दोस्त सलयो से एक बात कह । "सलयो, कुछ ऐसा है जो मैंहमेिा से करना चाहती थी, लेककन मैंबहुत डर हुई हूँ।" सलयो ने उसकी तरि देखा और पूछा, "ऐसा क्या है, लनू ा? तुम्हें पता है कक तुम मझु े कुछ भी बता सकती हो।" लनू ा ने कुछ कहने से पहले सलयो की तरि देखा और किर खझझकते हुए कहा, "मैं हमेिा से पेड़ पर चढ़ना चाहती थी और पेड़ के ऊपर चढ़ दनुनया को देखना चाहती थी। लेककन मझु े ऊँचाई से बहुत डर लगता है।" सलयो की आँखें दृढ़ सकं ल्प से चमक उठीं। "लनू ा, तुम अकेल नह ं हो। मैंतुम्हारे डर पर विजय पाने और उस पेड़ पर चढ़ने में तुम्हार मदद करँगा!" चलो, अब घर जाते हैंऔर कल समलते हैं। अगले ददन, सलयो के प्रोत्साहन और लनू ा के दृढ़ संकल्प के साथ, िे पेड़ पर चढ़ने के अपने साहससक काया पर ननकल पड़े। यह आसान नह ं था और लनू ा को डर भी लग रहा था, लेककन सलयो का साथ पाकर उसे पेड़ पर चढ़ने और ऊपर तक पहुँचने की ताकत समल । जब लनू ा आखखरकार पेड़ की सबसे ऊँची िाखा पर जा बैठी, तो उसे ऐसा महससू हुआ जसै े िह दनुनया के िीर्ा पर थी। सलयो ठीक उसकी बगल
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 75 बाल किा— सि िंगापुर िे में था, उसकी उपलजब्ध में उसे अपनी जीत का एहसास हो रहा था। उस ददन के बाद, लनू ा का ऊँचाई से डर गायब हो गया। उसकी जीत में उसके प्यारे दोस्त ने उसका साथ ददया और लनू ा का मन कृतज्ञता की भािना से भरा था। जैसे-जसै े साल बीतते गए, लनू ा और सलयो एक-दसू रे के जीिन को हँसी, प्यार और अतं ह न रोमांच से भरते रहे। िे हर ककसी को याद ददलाते थे कक दोस्ती मतभेदों से परे हो सकती है और ऐसे ररश्ते भी खबूसरूत हो सकते हैं। एक काल त्रबल्ल और सनु हरे कुत्ते के बीच एक असाधारण दोस्ती की कहानी थी - एक ऐसी दोस्ती जजसने हम सब को याद ददलाया कक दोस्ती की कोई सीमा नह ं होती और यह त्रबल्कुल ज़रर नह ं कक दोस्ती के िल अपने जैसे लोगों के साथ ह हो सकती है। दोस्ती तो कभी भी ककसी के साथ हो सकती हैऔर िह सच्चे दोस्त होते हैंजो न केिल हर जस्थनत में आपका साथ देते हैं बजल्क आपको आगे बढ़ने में भी मदद करते हैं। *********
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 76 रपट — पुस्तक षवमोिन रपट-पुस्तक षवमोिन “देखो मैं गाँव िा” और “जहाज़ी” काव्य िंग्रह, िावन उत्सव , िार्हत्य के ख़ज़ाने िे- ५ का आगाज़
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 77 भारतीय उच्चायोग के तत्िािधान में ससगं ापुर सगं म द्िारा 8 जलु ाई 2023 को ससगं ापुर के आया समाज भिन में सादहजत्यक सभा आयोजजत की गई| यह सभा वििेर् थी क्योंकक इसमें ससगं ापुर के प्रनतजटठत दो रचनाकारों विनोद दबूे और िांनतप्रकाि उपाध्याय के नए प्रकासित काव्य सग्रं ह का औपचाररक विमोचन हुआ। इस अिसर पर मख्ु य अनतधथ के रप में भारतीय उच्चायोग में चांसर प्रमखु श्री सििजी नतिार का साजन्नध्य प्राप्त हुआ| भारत की प्रनतजटठत सादहत्यकार िन्दना देि िुक्ल जी विसिटट अनतधथ के रप में उपजस्थत थीं|आयसा माज और डीएिी दहदं स्कूल के अध्यि ओ पी राय जी भी विसिटट अनतधथ के रप में हमारे साथ थे| कायक्रा म का प्रारंभ ससगं ापुर सगं म की अध्यि डॉ संध्या सस ंह ने ककया| द प प्रज्िलन के पश्चात इस कायक्रा म का िुभारंभ ईि िंदना से हुआ जजसे ससगं ापुर से डॉ आराधना सदासििन ने प्रस्तुत ककया। नत्ृय प्रस्तुनत ससगं ापुर के निभािस नाट्ट्यपल्ल में गरु. श्रीमती राजेश्िर विश्िनाथन द्िारा नत्ृय सीख रह सधैंिी अनबणगन द्िारा की गई। दोनों ह कायाक्रमों ने दिाकों का मन मोह सलया| ससगं ापुर सगं म द्िारा प्रनतिर्ा सादहत्य के खज़ाने से नामक कायक्रा म आयोजजत ककया जाता है जजसमें अपने अग्रज रचनाकारों के रचना ससं ार पर काया होता है। ससगं ापुर सगं म ने इस बार डॉ. धमिा ीर भारती जी और सभु िाकुमार चौहान जी के रचना ससं ार को चुना है। ससगं ापुर सगं म की अध्यि डॉ सध्ं या ससहं ने दोनों रचनाकारों के विर्य में अनत सक्षं िप्त जानकार और आगामी कायक्रा मों की सचू ना द । इसके पश्चात िांनत प्रकाि उपाध्याय द्िारा रधचत कविताओं के संग्रह “देखो मैं गाँि था” का विमोचन करने के सलए मचं पर सम्माननत अनतधथगण उपजस्थत हुए जजनमें चांसर प्रमखु सििजी नतिार जी, उनकी पत्नी मीना नतिार जी, आया समाज और डीएिी दहदं ूस्कूल के अध्यि श्री ओपी राय जी, भारत की प्रनतजटठत सादहत्यकार िंदना देि िुक्ल जी, ससगं ापुर से िीणा िमाा जी और ससगं ापुर सगं म से नीसलमा गप्ुते थीं| श्री सििजी नतिार के कर कमलों से काव्य सग्रं ह “देखो मैं गाँि था” का विमोचन हुआ| िांनत प्रकाि जी ने तत्पश्चात अपनी रचना प्रकक्रया और काव्य सग्रं ह के बारे में कुछ बातें बताई और रचनापाठ ककया। रपट — सि िंगापुर िे
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 78 रपट — सि िंगापुर िे दसू रा काव्य सग्रं ह “जहाज़ी” जजससे विनोद दबूे जी ने रचा है के विमोचन के सलए मचं पर पुन: अनतधथ गण उपजस्थत हुए। श्री सििजी नतिार के कर कमलों से काव्य सग्रं ह जहाज़ी का विमोचन हुआ और विनोद दबूे जी ने अपनी रचना प्रकक्रया साझा करने के साथ ह एक रचना का पाठ ककया | हमारे मख्ु य अनतधथ श्री सििजी नतिार जी ने दोनों रचनाकारों को हाददाक िुभकामनाएँ द ं और अपने उद्बोधन में काव्य ि गद्य लेखन को बढ़ािा देने की बात की। अब समय था दोनों काव्य संग्रह से अन्य व्यजक्तयों द्िारा रचना पाठ का। “देखो मैंगाँि था” से डॉ सदासििन ने रचनापाठ ककया और “जहाज़ी” से र ता पाण्डेय ने रचनापाठ ककया| चँूकक सािन का मह ना चल रहा है जजसका सादहत्य से िैसे भी गहरा नाता हैतो सािन की िुहार में सभगोने के सलए ससगं ापुर से रजनी कुमार ने बागडोर सभं ाल | अपनी मधुर िाणी में सािन के गीत गाये| मधुर िाणी और सािन के गीत ने बहुत ह मधुर समापन ककया| नीसलमा गप्ुते, पूनम चुघ, प्रनतमा ससहं , डॉ आराधना सदासििम, र ता पाण्डये , ददव्या त्रिपाठी, रजनी कुमार, िांनतप्रकाि उपाध्याय, विनोद दबूे, पर क्षित िुक्ला, रजश्म जनकराज आदद के सहयोग से खूबसरूती से कायक्रा म सपं न्न हुआ|
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जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 80 सित्र -िार्हत्य के ख़ज़ाने िे-५
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 81
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 82 सित्र -िार्हत्य के ख़ज़ाने िे-५
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 83 रपट- र्ह िंदी र्दवि सि िंगापुर 17 ससतंबर 2023 को ससगं ापुर में दहदं ददिस बड़े ह धूमधाम से मनाया गया। भारतीय उच्चायोग ससगं ापुर के तत्िािधान में ससगं ापुर सगं म पत्रिका और सगं म ससगं ापुर सस्ं था ने सबके साथ दहदं ददिस ससगं ापुर का िहृत’ रप से आयोजन ककया। इसमें विश्ि दहंद सधचिालय मॉररिस का भी सहयोग समला| इस आयोजन में 200 से भी अधधक लोगों ने भाग सलया और प्रनतयोधगताओं और विसभन्न कायाक्रमों में 70 से भी अधधक लोगों की भागीदार रह । कायक्रा म में प्रनतभाधगता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कक 6 िर्ा से लेकर 60 िर्ा तक के लोगों को मंच पर ककसी न ककसी रप में देखा गया। मख्ु य अनतधथ के रप में भारतीय उच्चायोग ससगं ापुर से महामदहम उच्चायुक्त महोदय डॉ सिल्पक अम्बुले जी की उपजस्थनत ने सबका मनोबल बढ़ाया| उनके उद्बोधन ने सभी को प्रोत्सादहत ककया| चांसर प्रमखु श्री सििजी नतिार की विसिटट उपजस्थनत ने कायक्रा म में उच्चायोग के भरपूर सहयोग पर अपनी महुर लगा द । इस िर्ा कायक्रा म में बड़ी विविधता रह । हमार पौराखणक विरासत विर्य पर 6 से 9 िर्ा के बच्चों के सलए प्रनतयोधगता रखी गई जजसमें कोई जटायु बनकर आया तो कोई असभमन्यु। कह ं मदं ोदर की आिाज सनु ाई द तो कह ं िबर बेर खखलाने को आतुर थी। ककसी ने राम बनकर प्रत्यंचा चढ़ाई तो कोई कणा बनकर अपनी दानिीरता ददखा गया, रपट — सि िंगापुर िे
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 84 रपट — सि िंगापुर िे नारदमनुन की चुहलबाजी के साथ ह मयै ा सीता की सौम्यता ने सबका मन हर सलया| कह ं माँअबं ा, तो कह ं भरत जी अपने अपने गणु ों को ददखाते हुए ददखे| जब कै कई, मंदोदर जैसे पािों को इन छािों ने जीिंत कर ददया तो लगा िाकई यह विर्य सिल हो गया, क्योंकक भले ह महाभारत ि रामायण के पाि ह ज़्यादा चुने गए थे क्योंकक िे ह इनकी उम्र के सलए सट क भी थे लेककन उन पािों में विविधता ने सबका मन मोह सलया। दसू र प्रनतयोधगता बॉल िुड सिं ाद जजसमें 9 से 12 िर्ा के अलग-अलग विद्यालयों के विद्याधथया ों ने बड़ी ह कुिलता से कफ़ल्म के एक दृश्य को अपनी असभनय कला के माध्यम से प्रदसिात ककया। कफ़ल्मों के िौकीन लोगों के साथ ह अन्य सभी ने इन दृश्यों का भरपूर आनंद उठाया क्योंकक कह ं सीक्रेट सपु रस्टार मचं पर थे तो कह ं मोहब्बतें के िाहरुख खान, कह ं थ्री इड़डयट्स के रैंचो की रौनक थी, तो कह ं देिदास ने सबका ददल जीत सलया था। ियस्क िगा के सलए प्रनतयोधगता नह ं रखी गई थी बजल्क ससगं ापुर प्रिासी सादहत्य के अतं गता कुछ रचनाओं को चुना गया था और कविता, गज़ल रैप सॉन्ग के साथ ह गीत भी इस भाग में सबको बांधे हुए थे। सांस्कृनतक कायक्रा म की बात करें तो सिि तांडि स्रोत, ऐ धगर नंददनी गीत पर नत्ृय के साथ ह ज्िलंत विर्य पर नाटक का आयोजन हुआ| प्रेमचदं की बहुचधचता कहानी “बढ़ू काकी” पर छािों ने मंचन ककया जो आज के समय में बुढ़ापे की समस्या और पररिारों के बदलते व्यिहार पर करारा प्रहार था। इस िर्ा दहंद ददिस का खास आकर्णा ससगं ापुर दहंद सम्मान’ का िुभारंभ
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 85 रपट — सि िंगापुर िे करना रहा। ससगं ापुर सगं म ने इस िर्ा से दहंद सम्मान देने की घोर्णा की। इस िर्ा इसे स्थानीय राटट्र य स्तर पर ह रखा गया लेककन भविटय में इस को अंतरराटट्र य स्तर पर ददये जाने की बात तय की गई है। इस िर्ा इसे ससिा दो िगों में ददया गया पहला ‘ससगं ापुर दहदं सिखर सम्मान’ जो कक ससगं ापुर का दहदं में ददया गया सबसे बड़ा सम्मान होगा और इस सम्मान के सलए इस िर्ा स्िगीय श्री ससिाकांत नतिार जी और श्री ओपी राय जी का चयन हुआ। दसू रे िगा में ससगं ापुर दहदं सेिी सम्मान के अतं गता इस िर्ा आठ लोगों को यह सम्मान ददया गया। सम्मान का प्रारंभ हुआ हैतो ज़ादहर है सख्ं या कुछ अधधक होगी और आने िाले िर्ों में हर िगा में एक या दो सम्मान ह ददए जाएँगे| सम्मान के नामकरण में भी विविधता लाई जायेगी और दो िर्ों के अतं राल पर इसे रखा जाएगा| ससगं ापुर दहदं सेिी सम्मान प्राप्त करने िालों में अरुणा ससहं , डॉ बीना समश्रा, पनू म चुघ,, नीसलमा गप्ुते, ममता मण्डल ससहं , विनोद दबुे, हर्िा धना गोयल और सौरभ श्रीिास्ति हैं। कई लोग जजन्हें आप ‘अनसंग ह रोज’ कह सकते हैं, की श्रेणी में हैंक्योंकक िे ज़्यादातर पीछे रहकर दहदं की सेिा कर रहे हैंइसीसलए ससगं ापुर सगं म ने ढूंढकर ऐसे लोगों को सामने रखना अपना दानयत्ि समझा| दहदं ददिस आयोजन के अतं गता ससगं ापुर से प्रनतमा ससहं के नए काव्य सग्रं ह ‘संदेि प्रेम का’ का विमोचन महामदहम उच्चायुक्त डॉक्टर सिल्पक अम्बुले जी के कर कमलों द्िारा सपं न्न हुआ। ससगं ापुर में प्रिासी सादहत्य ददन ब ददन ननखर रहा हैऔर यह आगे बढ़ने का द्योतक है। इस पूरे कायक्रा म में मचं सचं ालक की भसूमका में नेिनल यूननिससटा ऑि ससगं ापुर के विदेिी मलू के छाि जो दहदं भार्ा सीख रहे हैंरहे। विदेिी मलू के छािों द्िारा दहदं में मचं सचं ालन सभी के सलए ददलचस्प रहा और सभी ने इसकी भरपूर सराहना की। इस आयोजन में ससगं ापुर की विसभन्न संस्थाओं के अध्यिों ने अपनी उपजस्थनत
जुलाई-सितम्बर २०२३, सि िंगापुर िंगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 86 रपट — सि िंगापुर िे दजा कराई जजनमें डीएिी दहदं स्कूल, दहदं सोसायट , एनपीएस इंटरनेिनल स्कूल, ग्लोबल इंड़डयन इंटरनेिनल स्कूल, जीआईजी इंटरनेिनल स्कूल, समडल्टन इंटरनेिनल स्कूल, िाइज ऑक्स इंटरनेिनल स्कूल, ककंडल ककड्स इंटरनेिनल स्कूल, श्री लक्ष्मीनारायण मदं दर, ससगं ापुर उत्तर भारतीय दहदं ू सभा, त्रबजहार सस्ं था, भोजपुर असोससएिन, आया समाज ससगं ापुर, मधैथल सस्ं था, कमला क्लब, महाराटट्र मण्डल, जीएसिी टेक, तबला समाचार पि आदद प्रमखु नाम हैं। Video Houze ने कायक्रा म की अत्यंत सन्ुदर तस्िीरें खींच अपना समथान ददया| इसके सलए डेविड अननल िमाा और ददव्या धर जी का हाददाक आभार| साथ ह सौरभ श्रीिास्ति और उमा श्रीधरा ने भी अपने कैमरे में इस आयोजन को बड़ी सन्ुदरता से कैद ककया| समदुाय के सहयोग से ह आयोजन सिल होते हैं| अवपता गप्ुता , सौरभ श्रीिास्ति और युिराज आयान का तकनीकी सहयोग इस कायाक्रम को सिल बना सका| रत्नेि पाण्डये द्िारा बनाये गए पटृठभसूम आिरण ने सबका मन मोह सलया| अनुसयू ा साहूऔर रुपांिी चुघ ने प्रनतधगताओं में समय का ध्यान रखने से प्रमाण पि पर स्थान सलखने की जज़म्मेदार बड़ी कुिलता से ननभाई| ससगं ापुर सगं म की कोर ससमनत ने इस पूरे कायक्रा म की रपरेखा बनाने से लेकर आयोजन और प्रबंधन की जज़म्मेदार सभं ाल जजसमें मख्ु य रप से अध्यि डॉ संध्या सस ंह, सधचि अरुणा सस ंह, कोर्ाध्यि नीसलमा गप्ुते, उप कोर्ाध्यि प्रनतमा ससहं , पूनम चघु , बीना समश्रा, आभा मदूं डा और सौरभ श्रीिास्ति थे। कोर ससमनत ने समलकर ससगं ापुर में दहदं ददिस आयोजन का एक अलग ह मानक उपजस्थत कर ददया है| ससगं ापुर में बड़ी सखु द दहदं हलचल मचा द है | *******
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