त्रैमासिक सिन्दी पसत्रका अप्रैल-जन ू २०२३ - वर्ष-६, अक ं २२ ISSN: 25917773 www.singaporesangam.com वर्ष-6, अंक 22 स िंगाप ु र ेसिकलि ेवाली पहली सहन्दी पसिका www.singaporesangam.com
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 1 सस िंगापुर संगम सम्पादक: डॉ संध्या सस िंह तकनीकी सहयोग: अनमोल सस िंह युवराज आयषन आवरण सित्र: सिवाली ढाका संपकष : Email: [email protected] Facebook- https://www.facebook.com/singapore.sangam.3 , Page- sangam Singapore संगम ससगं ापुर sinagpore sangam Instagram: https://www.instagram.com/singaporesangamhindi/?hl=en YouTube: https://tinyurl.com/singaporesangamhindi Website: www.singaporesangam.com , Magazine- https://www.singaporesangam.com/magazines/ स िंगाप ु र प्रकासित रचनाओं के विचार लेखकों के अपने हैं| आिश्यक नह ं कक पत्रिका के संपादक या प्रबंधन सदस्य इससे सहमत हों। सिााधधकार सुरक्षित © Singaporesangam ▪ वर्ष ६ ▪ अकं २२ ▪ अप्रलै-जनू २०२३ स िंगापुर ेसिकलिेवाली पहली सहिंदी पसिका ISSN: 25917773
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 2 सम्पादकीय सस िंगापुर से नमस्कार! एक ओर पत्रत्रकाएँ एक स्थान पर कई ववधाओ ं और ववर्यों को संयोसजत कर पाठकों के सलए सुलभता प्रदान करती हैं तो दूसरी ओर रिनाएँ अपने समय को ही नहीं ददखातीं बल्कि वह पूवष-परंपरा के भी तमाम पहलुओं को अपने समय में सलवपबद्ध करती िलती हैं| ससगिं ापुर संगम भी इसी प्रयास मेंलगा है| इस अंक मेंसस िंगापुर, अमेररका, नेपाल, ऑस्ट्रेसलया, थाईलैंड, जमषनी और भारत मेंरिेजा रहे सादहत्य की ववववध ववधाओ ं को ददखाने का प्रयास वकया गया है| कहीं व्यंग्य के बाण सच्चाई सेरूबरू करवाएगी तो कहीं स्मृततयों की डोर आपको खींिेगी, कहीं समय-समाज के पररदृश्य में मुहावरों की पड़ताल वकये त्रबना आप पन्ने नहीं पलट सकें गे तो कहीं प्रासंगगकता आगे-आगे ले िलेगी| इस अंक से जुड़े सभी रिनाकारों के प्रतत आभार व्यक्त करती हँवक आपने समय गनकालकर ससगिं ापुर संगम के अंक को समृद्ध वकया है| भववष्य मेंभी इसी प्रकार का स्नेह बना रहे! इस अंक का आवरण सित्र बनाया है भारत से सिवाली ढाका जी ने| उन्होंने सस िंगापुर संगम के मूल उद्देश्य सादहत्य, संस्कृतत, कला व भार्ा के संगम को उके रा है| अगले अंक के सलए रिनाएँ, सित्र, पेंवटग आदद आमंत्रत्रत हैं| आपकी प्रततवियाएँ हमारे सलए बहुत ख़ास हैंअत: आपकी प्रततवियाओं का इंतज़ार रहेगा! धन्यवाद सदहत डॉ संध्या सस िंह
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 3 आवरण पृष्ठ सिवाली ढाका सादहत्य , सस्कं ृतत, कला व भार्ा का संगम भारतीय कला और िंस्कृसत की गिरी परख और िमझ रखनेवाली भारत िे सिवाली ढाका िासित्यकार, स्व-प्रसिसित सित्रकार एवं िामासजक कायकष ताषिैं। उनकेसित्र व रिनाएँसवसभन्न राष्ट्रीय-अंतराषष्ट्रीय स्तर की पत्र-पसत्रकाओंव काव्य-िंग्रि मेंप्रकासित िो िकुेिैं। उनकेद्वारा बनाई पेंस ंग्ि २०१४ िे लेकर अब तक देि के सवसभन्न ििरों में लगी बीि िे असिक कला प्रदिषसनयों का सिस्िा बन िकुी ि।ैं२०२० मेंकला व िस्ं कृसत सवभाग और राजस्थान लसलत कला अकादमी की ओर िेप्रदिे स्तर पर आयोसजत पेंस ंग प्रसतयोसगता मेंइनकी कलाकृसत को परुस्कृत सकया गया। उनकी पेंस ंग ‘असग्नपथ ऑल इसंिया आ ष एसग़्िसबिन 2015’ में स्वर्ष-पदक िेिम्मासनत की जा िकुी िI ै दो वर्षके अपनेसिंगापरु सनवाि केदौरान उन्िोनेंसिन्दी िोिाय ी, सिंगापरुकेकायषकताषकेतौर पर सिन्दी भार्ा सििर् केसलए भी कायषसकया। िाल िी मेंउनकेद्वारा सिंगापरुिेछपने वाली दसिर्ी एसिया भार्ाओंकी बाल-पस्ुतक के सलए सवसभन्न किासनयों पर आिाररत सित्रांकन भी सकया जा िकुा ि।ै िासित्य व कला केिेत्र मेंयोगदान केसलएउन्िेंसवसभन्न िंस्थाओंद्वारा िम्मासनत सकया जा िकुा |
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 4 इस अंक में स िंगापुर आलेख एक अिोखा शोध पि असदसि अरोरा, 5 भारि व्यिंग्य द्रोणाचाययफ़रार हैं प्रो. राजेश कुमार 11 भारि ग़ज़ल ग़ज़ल सवज्ञाि व्रि 16 भारि िवगीि बिा जमरूे!, पेट-पोंछिी सशवािन्द स िंह ‘ हयोगी’ 19 अमरीका कहािी बेमौ म की बफ़य डॉ. असिल प्रभा कुमार 21 जमयिी कहािी टोकरी डॉ . सशप्रा सशल्पी क् ेिा 32 िेपाल कहािी छोटी ी प्रेम कहािी डॉ श्वेिा दीसि 37 ऑस्ट्रेसलया िंस्ट्मरण सिज़्बि की खुशबू मधुखन्िा 43 थाईलडैं आलेख सहिंदी सशक्षण का अिुभव डॉ वुसथथफोंग थसवल मबि 46 भारि कहािी उम्मीदों केघों ले डॉ प्रदीप उपाध्याय 49 भारि आलेख मयकाल केचलिेमुहावरों में शब्दों केबदलिेस्ट्वरूप गोवधयि दा सबन्िाणी 'राजा बाब'ू 53 भारि लघुकथा वो बरगद का पेड़ राजेश पाण्डेय 55 भारि पुस्ट्िक मीक्षा ददयका चिंदि ऋिा शेखर 'मधु' 57 स िंगापुर रपट पुस्ट्िक सवमोचि व काव्यगोष्ठी पिूम चुघ 61 स िंगापुर लघुकथा एक खबू रूि जवाब डॉ. आराधिा दासशवम, 66 स िंगापुर कसविा अपिा देश रोज राय 67 भारि कहािी खुदा और सव ाले िम सदलीप कुमार 69 भारि पुस्ट्िक मीक्षा राजभाषा सहिंदी केिवोन्मेषी आयाम डॉ. राहुल समश्र 78
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 5 एक अनोखा िोध पत्र एक अनोखा िोध पि.. (कुछ पंक्ततयााँपढ़ जाइए ताकक आप स्ियं पर यह पर िण कर सकें) विषय कुछ घातक बीमाररयााँ, उनके लिण, कारण, ननदान और उपचार। प्रस्तािना आए ददन हम ककसी ना ककसी बीमार के सिकार होते रहते हैंऔर धचककत्सकों के पास चतकर काटते रहते हैं। आधुननक यंिों और ददन प्रनतददन िैज्ञाननकों के नए-नए अन्िेषण के कारण बहुत से असाध्य रोगों पर भी मानि ने विजय प्राप्त कर ल है, लेककन अभी भी बहुत सी ऐसी बीमाररयााँ हैंजो प्रायः अनदेखी रह जाती हैं। कुछ समय से ऐसी बीमाररयों पर मेरा िोध काया चल रहा था और बहुत सी ऐसी बीमाररयााँ उभर कर सामने आईं क्जनका समय रहते उपचार अत्यंत आिश्यक है। इस िोध पि में कुछ ऐसी घातक बीमाररयों का वििरण, उनके लिण, कारण, ननदान, प्राकृनतक उपचार और रोकथाम के विषय में जानकार द जा रह है। प्रमाण पि इन बीमाररयों के विषय में जानकार प्रदान करने से पहले यह बताना आिश्यक है कक यह िोध काया स्ियं पर ककया गया है। इस िोध के अंतगता ना तो ककसी दसू रे व्यक्तत और ना ह ककसी पिु चूहे, खरगोि, बंदर, कुत्ते या धगनी वपग को ककसी प्रकार की िनत पहुाँचाई गई है। असदसत अरोरा, सिगं ापरु बडौत उत्तरप्रदेि में जन्मीं असदसत अरोरा सपछले 26 वर्ों िेसिंगापरु मेंप्रवािी ि|ैं भारत में सदल्ली और उिके आिपाि के सवद्यालयों में अध्यापन कायष करने के बाद सिंगापरु मेंसिदं ी अध्यापन िेजडुी ि|ैंसिदं ी और अंग्रे़िी दोनों भार्ाओं मेंसनरंतर लेखन और प्रकािन कर रिी िैं| िपं कष - [email protected]
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 6 अनोखा िोध — सस िंगापुर से घातक बीमाररयााँ बहुत समय से स्ियं को अस्िस्थ पा रह थी। एक दो नह ं न जाने ककतनी बीमाररयों ने मुझे घेर रखा था, एक ददन सोचा थोडी फुसता में हूाँउनकी सूची बनाती हूाँ। कफर तया था स्ियं पर खोज आरंभ कर द और अपने को क्जतना अंदर तक टटोलती गई उतनी ह बीमाररयााँ समलती गईं। सबसे पहल जो बीमार उभर कर आई िह थी अहंकार की बीमार , उसके बाद तो ऐसा ससलससला िरूु हुआ कक रुकने का नाम ह नह ं ले रहा था… अब अहंकार की बीमार है तो भई ईर्षयाा और प्रनतस्पधाा की बीमार तो होनी ननक्श्चत ह है, जैसे फ्लू हुआ तो खााँसी जुकाम साथ-साथ आएाँगे ह ना। अहंकार की बीमार हो और अहम की तक्ुर्षट ना हो यह कैसे हो सकता है? यह बीमार भी मुझे भयंकर रूप से लगी हुई थी, जैसे मधुमेह के रोगी का हर समय समठाई खाने का मन करता हैउसी प्रकार अहम की तुक्र्षट की अभीप्सा भी उतनी ह बलिती रहती है। कुछ बीमाररयों के लिण तो ऐसे थे कक ऊपर से ह पकड में आ गईं। कुछ एतस रे से पकड में आईं और कुछ के सलए तो सी. ट . स्कैन और एम. आर. आई. भी करना पडा। अपनी प्रिसं ा सुनने की बीमार और दसू रों की ननदं ा करने की बीमार में तो अभी तक फैसला ह नह ं कर पाई हूाँ कक कौन सी ज़्यादा फैल हुई है। हैंतो बीमाररयााँ, पर सुख बहुत देती हैं। दसू रों की ननदं ा करके तो जो परमानंद समलता है िह अिणना ीय है, त्रबल्कुल ऐसे जैसे खुजल की बीमार , जब खुजाने लगो तो िाह तया आनंद आता है हाथ रुकते ह नह ं। बडे लोग तो कहकर भी गए *तया मजा राज में जो मजा खाज में।(१) त्रबल्कुल िह सुखानुभूनत होती है ननदं ा की बीमार में। अगल भयंकर बीमार जो पकड में आई उसने तो मुझे पूरा जला फुका कर राख ककया हुआ था, जैसे लकडी धीरे-धीरे सुलगती रहती है ना मेरा त्रबलकुल िह हाल था। एक बार क्रोध दधू में उफान की तरह आकार िांत हो जाए कफर भी अच्छा, लेककन यह अंदर ह अंदर सुलगते रहना बहुत ह खतरनाक बीमार है। क्रोध की यह बीमार तो युगों-युगों से ह चल आ रह है, भगिान श्री कृर्षण भी ककतना समझा कर गए कक क्रोध से और नई-नई बीमाररयों का भी जन्म होता हैऔर मनुर्षय नर्षट हो जाता है। क्रोधाद्भिनत संमोहः संमोहात्स्मनृतविभ्रमः। स्मनृतभ्रंिाद् बुद्धधनािो
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 7 अनोखा िोध — सस िंगापुर से बुद्धधनािात्प्रणश्यनत।। (२) क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मनृत विभ्रम। स्मनृत के भ्रसमत होने पर बुद्धध का नाि होता हैऔर बुद्धध के नाि होने से िह मनुर्षय नर्षट हो जाता है। (३) (दहदं अनुिाद - स्िामी तेजोमयानंद धचन्मय समिन) मनैं े गीता के सारे अठारह अध्याय तो कंठस्थ कर सलए, प्रनतददन ट िी के सामने बैठकर सत्संग भी चलता रहता हैपरंतुमजाल जो मनैं े क्रोध करना बंद ककया हो। काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ। सब पररहरर रघुबीरदह भजहुभजदहं जेदह संत।।(४) गोस्िामी तुलसीदास जी भी कुछ ऐसा ह कह गए। रामायण का पाठ भी आए ददन करती हूाँ और सुंदरकांड तो सबसे ह वप्रय है कफर भी मुझमें कोई पररितना नह ं। प्रायः सोचती हूाँ इतनी ज्ञान की सम्पदा होने के बाद भी सोचने, समझने और दसू रों के प्रनत दृक्र्षटकोण में पररितना तयों नह ं आता? संस्कार के रूप में यह ज्ञान व्यक्ततत्ि का िाश्ित अंग तयों नह ं बनता? बीमाररयों का ससलससला यह ं तक नह ं रुका था और भी इधर-उधर कोनों में नछपी बीमाररयााँ समल जैसे, दसू रों को नीचा ददखाकर स्ियं ऊपर उठने की बीमार , दसू रों के अंदर गलनतयााँ ढूाँढने की बीमार , स्ियं को सदा सह समझने की बीमार , दसू रों पर अपने विचार थोपने की बीमार , झूठ बोलने की बीमार , बदला लेने की बीमार , िमा न करने की बीमार , लालच की बीमार , दसू रों के काम में गलनतयााँ ढूाँढने की बीमार , दसू रों की चुगल की बीमार , घणृ ा की बीमार , दोषारोपण की बीमार , दसू रों को हर समय आाँकने की बीमार । भगिान का िुक्र है कक कुछ बीमाररयााँबहुत ह आरंसभक अिस्था में ह पकड में आ गईं िरना ना जाने आगे चलकर िायद िो कोरोना से भी बडी महामार का रूप ले लेती। लिण उपरोतत सभी बीमाररयों के बहुत से समल-ेजुले लिण होते हैं। क्जन्हें यदद पूणा जागरूकता के साथ देखा जाए तो आसानी से पकडा जा सकता है। जैसे मन में अिद्ुध विचार बनते रहते हैंऔर हर समय असंतुक्र्षट का भाि रहता है। मन विषातत रहता है, अंदर ह अंदर जलते रहते हैं। धन्यिाद और कृतज्ञता से बचते हैं। सहानुभूनत, दया और प्रेम की मत्ृयु
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 8 अनोखा िोध — सस िंगापुर से हो जाती है। दसू रों के सलए आदर समाप्त हो जाता है। मन दसू रों को ठेस पहुाँचाने के तर के ढूाँढता है। आलोचना में रस आता है। स्ियं को असुरक्षित महसूस करने लगते हैंकक कह ं कोई मुझसे आगे ना बढ़ जाए। देखखए तो विदरु जी भी महाभारत के युद्ध के दौरान यह कहते रहे कक इन सब बीमाररयों के पररणाम अच्छे नह ं होते। ईर्षयी घणृ ी न संतुर्षटः क्रोधनो ननत्यिङ्ककतः। परभाग्योपजीिी च षडते े ननत्यदःुखखताः॥ (५) ईर्षयाा करने िाले, घणृ ा करने िाले असतं ोषी, क्रोधी, सदा संदेह करने िाले तथा दसू रों के भाग्य पर जीिन त्रबताने िाले ये छह तरह के लोग संसार में सदा दःुखी रहते हैं। ननदान यदद ये सब बीमाररयााँप्रायः होती रहती हैंया ददन में कई बार इनका आक्रमण होता हैयह इनकी गंभीरता को दिााता है और समय रहते इनका ननदान खोजना बहुत आिश्यक है ताकक रोग को पकडा जा सके और उसकी उधचत रोकथाम की जा सके । इसके सलए सिप्रा थम इन बीमाररयों की जड तक जाना बहुत आिश्यक है कक इनकी उत्पवत्त ककस प्रकार होती है। उसके सलए मनैं े एक सूची बनाई * ककन-ककन पररक्स्थनतयों में ये उभरकर आती हैं? * ककन व्यक्ततयों के समि या माि उनके विषय में सोचते ह इनके लिण प्रकट होने लगते हैं? * इनका आक्रमण ककतनी देर तक बना रहता है? * तया ककसी व्यक्तत वििषे के संपका में जाने से इनका संक्रमण होता है? * तया कोई बीमार अनुिासं िक है? *तया आिश्यकता से अधधक खाल समय रहता हैऔर कुछ सकारात्मक करने को नह ं है? *तया ऐसे व्यक्ततयों से समिता हैजो इन बीमाररयों में साथ देते हैं? कारण इन सब बीमाररयों के कुछ प्रमुख कारण हैंजैसे अहंकार, धचत्त की अिद्ुधध, मन की दबुला ता, स्ियं से
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 9 अनोखा िोध — सस िंगापुर से ज़्यादा दसू रों में उत्सुकता, अपने दोषों को स्िीकार करने में साहस की कमी, मन में दसू रों के प्रनत गाठाँ े बनाए रखना, स्ियं को सिाश्रेर्षठ समझने का भ्रम, आदद। रोकथाम मन में चल रहे विचारों के प्रनत सदा जागरूक रहना चादहए, ननदं ा के संक्रमण से बचना चादहए, इन बीमाररयों से पीडडत व्यक्ततयों के संपका में आने से स्ियं का बचाि करना चादहए। उपचार उपरोतत सभी बीमाररयााँ स्िजननत हैंअपने अंदर से ह उत्पन्न होती हैंअतः इनका उपचार भी अपने ह भीतर है। इन बीमाररयों को जागरूक रहकर अपने अंदर ढूाँढ लेना इनके उपचार की प्रथम सीढ़ है। स्ियं पर ककये गए कुछ घरेलूउपचार यहााँ ददए जा रहे हैंआिा हैलाभकार ससद्ध होंगे। * रात्रि में सोने से पहले अपने ददन भर के कायका लाप को देखें, ककन-ककन व्यक्ततयों के संपका में आए थ,े उनके साथ अपना व्यिहार पुनः स्मरण करें और देखें कक कौन-कौन सी बीमाररयााँपररलक्षित हुई थीं कफर एकएक कर सबसे मन ह मन िमा याचना करें। * प्रनतददन प्रातः उठते ह संकल्प करें कक आज का ददन मेरे जीिन की एक नई िरुुआत है, मैंस्ियं प्रसन्नधचत्त रहकर अपने आस-पास भी प्रसन्नता का िातािरण बनाए रखूगाँ ा/ रखूगाँ ी। *प्रकृनत के मध्य अधधक से अधधक समय व्यतीत करने का प्रयास करें। * संपका में आने िाले व्यक्ततयों के अंदर अच्छाइयााँढूाँढकर उनकी मुतत हृदय से प्रिसं ा करें। * क्जन व्यक्ततयों से आपको भूतकाल में ककसी प्रकार का दःुख पहुाँचा हो उन्हें िमा कर मन में बाँधी सभी गााँठों को खोलने का प्रयास करें और स्ियं को क्रोध और घणृ ा की बेडडयों से मुतत करें। उपसंहार सतत प्रयास और पूणा जागरूकता से उपरोतत िखणता सभी बीमाररयों से स्ियं को बचाया जा सकता है। इन पर यदद ध्यान ना ददया जाए तो धीरे-धीरे इनका असर हमारे िार ररक स्िास््य पर भी पडने लगता है। इनके प्रकोप से रोगी को ह नह ं बक्ल्क उसके आसपास के लोगों और समाज को भी भार िनत पहुाँचती है। यहााँ
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 10 अनोखा िोध — सस िंगापुर से तक कक कई बार वििाह जैसे पविि बाँधन भी टूट जाते हैं। यदद हम सब स्ियं को स्िस्थ रखने का पूणा प्रयास करें तो ननक्श्चत ह आसपास एक स्िस्थ िातािरण का ननमााण ककया जा सकता। िास्ति में पररितान की आिश्यकता अपने अंदर होती है। इन बीमाररयों पर िोध काया अभी भी जार है। पाठकों से विनम्र ननिेदन है यदद ककसी ने अंतर यािा की हो या करने िाले हैंतो यदद ककसी और बीमार की जानकार प्राप्त हो, या इन बीमाररयों से बचने के कोई और उपाय ज्ञात हैंतो कृपया संपका करें और इस िोध काया में अपना सहयोग प्रदान करें। िोध कताा अददनत अरोरा उद्धरण तया मजा राज में जो मजा खाज में(१) (अज्ञात) भागित गीता अध्याय २ श्लोक ६३ (२) दहदं अनुिाद - स्िामी तेजोमयानंद धचन्मय समिन (३) रामचररत मानस सुंदरकांड दोहा ३८ (४) (गोस्िामी तलु सीदास जी) विदरु नीनत (५) ************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 11 द्रोणािाय षफ़रार हैं प्रो. राजेि क ु मार, भारत उत्तर प्रदिे के म़िुफ्फर नगर मेंजन्मेप्रो राजेि कुमार सवसभन्न िम्मानों िेअलंकृत प्रसतसित िासित्यकार और केंद्रीय सिदं ी सििर् मंिल, सििा सवभाग, भारत िरकार के िदस्य ि|ैंवेपवूषमेंभारत िरकार के िंस्थान राष्ट्रीय मक्तु सवद्यालयी सििर् िंस्थान केसनदिे क , रूि और अमरीका मेंसवस़िस ंग प्रोफ़ेिर रि िकुे ि|ैंउनकी दजषन भर िेभी असिक पस्ुतकेंसभन्न सवर्यों और सविाओं मेंप्रकासित िैं| सििर् में प्रौद्योसगकी, िम्पादन के िेत्र में उनके कायष उल्लेखनीय िैं| िपं कष – [email protected] द्रोणाचाया आजकल फ़रार चल रहे हैं। द्रोणाचाया अपना गुरुकुल पक्ललक स्कूल चलाते थे। राजा धतृ रार्षर की तरफ़ से उन्हें बडा अनुदान भी समलता था। नई सििा नीनत के चलते द्रोणाचाया के स्कूल में िैक्षिक विषयों के अलािा, िोकेिनल एजुकेिन पर भी जोर ददया जाता था, और इसमें भी तीरंदाजी की सििा को वििेष महत्ि ददया जाता था। द्रोणाचाया का पक्ललक स्कूल बहुत प्रससद्ध था, मतलब उसमें मोट फ़ीस ल जाती थी, और इससलए ग़र ब-गुरबे िहााँ दाखखला नह ं ले सकते थे। एकलव्य नामक तीरंदाजी का िौकीन एक आददिासी उनके स्कूल में दाखखला लेने के सलए आया, लेककन स्कूल के द्िारपाल ने उसे यह कहकर भगा ददया कक तुम्हारे जैसे लोग स्कूल में दाखखला नह ं सलया करते, यहााँ के चाकर बना करते हैं, क्जसके सलए पढ़ने की जरूरत नह ं होती। बेचारा एकलव्य अपना-सा माँुह लेकर लौट आया था। स्कूल की इसी प्रनतर्षठा को देखते हुए, धतृ रार्षर ने राजकुमारों को भी सििा लेने के सलए िह दाखखल करिा ददया था। द्रोणाचाया राजकुमारों का वििषे ध्यान रखते थे, और तयोंकक एक तो िे राजा के पररिार के थे जो खुद उनका ध्यान रखते थे, और दसू रे राजा ने उनका अलग से ध्यान रखने और पर िा, आदद में मदद करिाने के सलए द्रोणाचाया को उनके ट्यूिन पर भी रखा हुआ था। िैसे तो द्रोणाचाया का धंधा बहुत अच्छा चल रहा था, लेककन अपनी आमदनी बढ़ाने के सलए उन्होंने अपने स्कूल की एक डडस्टेंस एजुकेिन प्रणाल भी खोल ल थी। इसमें दरू-दराज के विद्याथी दाखखला ले सकते थे। डडस्टेंस एजुकेिन के विद्याधथया ों को के िल दाखखला ददया जाता था, और उनसे फ़ीस ल जाती थी। कफर उन्हें उनके हाल पर ह छोड ददया जाता था। इनमें से कुछ विद्याथी नकल करके पास हो जाते थे, कुछ पैसा देकर सदटाकफ़केट ले लेते थे, और इस तरह से िे अपनी सििा पूर करके
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 12 व्यंग्य — भारत से रार्षर के िक्षैिक इंडते स में अपना योगदान करते थे। राजकुमारों में अजुना बहुत क्जद्द ककस्म के राजकुमार थे, और उन्होंने द्रोणाचाया को क्जद करके यह िचन ले सलया था कक िे उसी को दनुनया का सबसे बडा तीरंदाज बना देंगे, और ओलंवपक में पदक ददलिाने में भी मदद करेंगे। राजा द्रोणाचाया का बहुत सम्मान करते थे, मतलब कहा जा सकता था कक िे राजा के माँुह लगे थे। िे उन्हें राजदरबार में होने िाल पादटायों में भी ननमंत्रित ककया करते थे। इन सबके चलते द्रोणाचाया का अहंकार पााँचिें आसमान तक चला गया था (यानी अभी दो आसमान बाकी थे), और िे सििा में निाचार के उमाह में त्रबना सोचे-समझे कुछ भी कर ददया करते थे, और इस तरह अपने सलए ककसी-न-ककसी समस्या को आमंत्रित करते ह रहते थे। एक बार िे तीरंदाजी की पर िा ले रहे थे, तो उन्होंने छािों (जी िहााँ कोई छािा नह ं थी, तयोंकक विश्ि को ददिा ददखाने िाल आदिा भारतीय संस्कृनत में कन्याओं की पूजा करने की परंपरा है, उन्हें सििा देने की नह ं) को एक ििृ पर धचडडया की आाँख का ननिाना लगाने के सलए कहा। सबसे पहले उन्होंने युधधक्र्षठर को बुलाया, और पूछा, “ित्स, तुम्हें तया ददखाई दे रहा है?” यह सिाल सुनकर युधधक्र्षठर मन-ह -मन हाँसा, लेककन गुरु का हर हालत में सम्मान करना चादहए की नैनतक सििा का पालन करते हुए, उसने प्रकट रूप से कहा, “गुरु जी, मैं आपको, अपने भाइयों और अन्य छािों को, जमीन को, आसमान को, पेड को, पेडों को, सूरज आदद को देख रहा हूाँ।” इस पर द्रोणाचाया ने उससे धनुष-बाण ले सलया, और कहा, “ित्स, तुम अभी पर िा के सलए तैयार नह ं हो। तुम्हें और सीखना होगा।” इसी तरह उन्होंने भीम, नकुल, सहदेि, और अन्य छािों को भी एक-एक करके बुलाया और उनसे यह सिाल ककया। अभी छािों ने कुछ फेरबदल करके लगभग िैसा ह उत्तर ददया, जैसा कक युधधक्र्षठर ने ददया था, तयोंकक िे जानते थे कक नकल करने से पास होना आसान होता है। द्रोणाचाया ने उनको भी कहा कक तुम लोग अभी पर िा के सलए तैयार नह ं हो, और तुम्हें और ज़्यादा सीखने की जरूरत है। अंत में द्रोणाचाया ने अजुना को बुलाया, और उससे भी िह सिाल ककया। इसके जिाब में अजुना ने पूरे आत्मविश्िास के साथ कहा, “गुरु जी, मुझे बस धचडडया की आाँख ददखाई दे रह है।” “िाबाि, तुम पर िा के सलए तैयार हो।” द्रोणाचाया गदगद हो गए कक सिर्षय ने िह उत्तर ददया है, जो उन्होंने उसे रटिाया था, और ननर्षपिता ददखाते हुए आदेि ददया, “चलाओ तीर।” अजुना ने तीर चलाया, और िह धचडडया की आाँख
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 13 व्यंग्य — भारत से में जाकर लगा। लेककन यह बात आई गई नह ं हुई, तयोंकक ठीक उसी समय िहााँ से जीिदया नामक एनजीओ का चेयरमेन गुजर रहा था, और ककसी मुद्दे की तलाि में था, ताकक उसकी रोजी-रोट बनी चलती रहे। जब उसमें धचडडया को तीर लगते हुए देखा, तो भागकर गया और उसे उठा सलया। उसने द्रोणाचाया और अजुना को बहुत बुरा-भला (मतलब सब बुरा ह ) कहा, क्जसके जिाब में द्रोणाचाया ने गिा और दहकारत के समले-जुले भाि से कहा, “जा- जा, तुझे जो करना है, कर ले! देख लेंगे।” चेयरमेन को बात चुभ गई, और उसने पिु कल्याण आयोग में द्रोणाचाया की सिकायत कर द । द्रोणाचाया पर पिु अत्याचार का केस बना ददया गया। िह तो भला हो धतृ रार्षर का, क्जन्होंने यह प्रचाररत करके उन्हें इस मामले से बचा सलया कक िह दरअसल असल धचडडया नह ं थी, बक्ल्क लकडी की धचडडया थी। चेयरमेन को भी बाद में अपनी ग़लती पता चल , और उसने सािाजननक तौर से मान सलया कक िह दरअसल लकडी की ह धचडडया थी, और उसे ग़लतफ़हमी हो गई थी। अलबत्ता इस ग़लतफ़हमी को पैदा करने के सलए, राजा ने उसे बहुत बडी धनरासि द थी। इधर नई सििा नीनत के ह चलते, एक ददन द्रोणाचाया सभी छािों को लेकर प्रयोगात्मक सििा के अभ्यास के सलए जंगल में गए थे, ताकक सििा को जीिन से जोडा जा सके , और छािों को व्यािहाररक सििा देकर उनके सिाांगीण विकास में मदद की जा सके। उन्हें उपयोगी नागररक बनाया जा सके, और उन्हें भािी जीिन और काया जगत के सलए तैयार ककया जा सके । इस दरप के सलए जाते समय, अजुना ने क्जद करके अपने कुत्ते को भी साथ ले सलया, क्जसे द्रोणाचाया ने नजरअंदाज कर ददया, तयोंकक उन्हें लगा कक इससे कोई बहुत ज़्यादा फका पडने िाला नह ं है। और उन्हें यह भी डर था कक अगर उन्होंने इस पर एतराज ककया, तो राजा उन्हें ट्यूिन से हटा न दे। जब द्रोणाचाया जंगल में अपने छािों को अभ्यास करिा रहे थे, तो अजुना का कुत्ता िहााँ से थोडी दरू जाकर भौंकने लगा, लेककन थोडी ह देर में िह दयनीय हालत में त्रबना चाँू ककए िापस आ गया। उसके माँुह में तीर घुसे हुए थे, क्जससे िह आिाज नह ं कर सकता था, हालााँकक उसे जरा सी भी चोट नह ं आई थी। इस अद्भुत दृश्य को देखकर द्रोणाचाया और सभी
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 14 व्यंग्य — भारत से छाि दंग रह गए, लेककन अजुना त्रबफर गया, “आपने तो मुझे दनुनया का सबसे बडा सिश्रा ेर्षठ तीरंदाज बनाने का िायदा ककया था, लेककन क्जस तरह की विद्या कुत्ते का माँुह बंद करने िाले तीरंदाज को आती है, िैसी तो मैंनह ं जानता।” द्रोणाचाया कहना चाहते थे कक भाई ऐसी विद्या तो मैंभी नह ं जानता, लेककन विद्याधथया ों के सामने अपने अज्ञान को प्रकट करना सििक की कमजोर होती है, इस ननयम के आधार पर उन्होंने यह बात अपने मन में ह रखी, और उत्सुकता, आश्चय,ा हतािा आदद अनेक भािों की िबलता से युतत होकर िे उस ददिा में चल पड,े क्जस ददिा से कुत्ता आया था। अन्य छाि भी उनके पीछे चले। िहााँउन्होंने देखा कक एक फटेहाल आददिासी युिक तीरंदाजी का अभ्यास कर रहा है। ककसी को यह समझने में देर नह ं लगी कक हो-न-हो इसी उजड्ड ने यह परिाह ककए त्रबना कुत्ते के माँुह को अपनी तीरंदाजी से बंद कर ददया है कक िह राजकुत्ता है। औपचाररक पूछताछ करते हुए, द्रोणाचाया ने एकलव्य की कला की भूर -भूर प्रिसं ा की, और पूछा, “तुम कौन-से पक्ललक स्कूल के विद्याथी हो, तुम्हारे गुरु कौन हैं?” इस पर एकलव्य ने उन्हें बताया, “गुरु जी, में तो आपका ह विद्याथी हूाँ। मैंआपके पास दाखखला लेने के सलए आया था, लेककन आपके द्िारपाल ने मुझे भगा ददया था। मनैं े आपकी डडस्टेंस एजुकेिन प्रणाल में दाखखला सलया है।” “हााँ, याद आया,” द्रोणाचाया ने सोचने की मुद्रा बनाते हुए कहा, हालााँकक उन्हें कुछ याद नह ं आया था। कफर अचानक बोले, “लेककन तुमने अपनी फ़ीस तो द नह ं।” द्रोणाचाया ने यह अंधेरे में तीर चलाया था, हालााँकक उनकी आमदनी इतनी थी कक उन्हें उसे धगनने तक का समय तक नह ं समलता था। “जी, मनैं े तो द थी।” एकलव्य ने सहमते हुए बताया, “और उसकी रसीद भी मेरे पास है।” “िो एडसमिन फ़ीस थी, मैंट्यूिन फ़ीस की बात कर रहा हूाँ।” द्रोणाचाया ने सख़्ती से कहा। उनके मन में एक षड्यंि जन्म ले चुका था, जो अगर सफल हो जाता, तो िे अजुना को ककया हुआ अपना िायदा पूरा कर सकते थे। “फ़ीस न देने के कारण तुम्हें दंड समलेगा।” द्रोणाचाया ने भरपूर कठोरता से कहा। इतने बडे गुरु को अपने सामने पाकर, िह आददिासी युिक िैसे ह असभभूत हो चुका था, जैसे ककसी व्यक्तत के सामने उसका आराध्य प्रकट हो जाए। उसने द्रोणाचाया की बात पर कोई आपवत्त नह ं की, तयोंकक उसके दहसाब से तो गरुु जी कभी ग़लत हो ह नह ं सकते थे। उसका पाला अभी
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 15 व्यंग्य — भारत से पक्ललक स्कूल के गुरुओं से नह ं पडा था। िह ससर झुकाए खडा रहा, और गरुु जी के आदेि की प्रतीिा करता रहा। “तो फ़ीस ननकालो!” द्रोणाचाया ने इस बात को अच्छी तरह से समझते हुए कहा कक क्जस व्यक्तत के पास अपना पेट भरने के सलए रोट तक नह ं है, िह भला फ़ीस कहााँ से लाएगा। “जी, इस समय तो फ़ीस मेरे पास नह ं है।” एकलव्य ने बहुत द नता से हाथ जोडते हुए कहा। “तो ठीक है,” द्रोणाचाया ने फ़ैसला सुनाया, “इसके बदले में तुम अपने दायें हाथ का अाँगठू ा मुझे दे दो, कफर तुम्हार सार फ़ीस चुकता मान ल जाएगी।” एकलव्य को लगा कक यह तो बहुत सस्ता सौदा है। उसे खुिी हुई कक उसके वपता के कुछ पैसे बच गए। उसने आि देखा न ताि, झट से चाकू ननकालकर अपना अाँगूठा काटकर द्रोणाचाया के चरणों में रख ददया। द्रोणाचाया को अाँगूठा पाकर ऐसी उपलक्लध हुई, मानो िे सििा मंिी बन गए हों। लेककन उनका दभु ााग्य देखखए कक िहााँ से उस समय भी िह एनजीओ का चेयरमेन जा रहा था, क्जसने उन्हें धचडडया के चतकर में फाँसा ह सलया था। जब चेयरमेन ने देखा कक द्रोणाचाया ने एक ग़र ब आददिासी का अाँगूठा कटिा सलया है, तो उसे लगा कक उसे कफर से एक मुद्दा समल गया है। द्रोणाचाया के दृश्य से हटते ह उसने एकलव्य से बात की, और बहला-फुसलाकर उससे राजा के पास सिकायत करिा द कक द्रोणाचाया ने उसे कॉपोरल पननिमेंट द है। विद्याधथया ों को कॉपोरल पननिमेंट देना अपराध की श्रेणी में आता था, और इस कारण राजा को न चाहते हुए भी, द्रोणाचाया को तत्काल धगरफ़्तार करने का आदेि देना पडा। दरबार में द्रोणाचाया के लोगों ने झट से उन्हें इस बारे में आगाह कर ददया, और कहा कक कफ़लहाल जब तक मामला ठंडा नह ं हो जाता, तुम फ़रार हो जाओ, िरना अगर पकड सलए गए तो कम-से-कम दस साल के सलए लंबे जाओगे। और द्रोणाचाया तभी से फ़रार चल रहे हैं। और ऐसा लगता है कक अजुना की इच्छा भी पूर नह ं होने िाल , तयोंकक एक दसू रे एनजीओ ने एकलव्य को नकल अाँगूठा लगिाने के सलए पैसा इकट्ठा करना िरूु कर ददया है। कफर बदल हुई पररक्स्थनत में अपनी विकलांगता की क्स्थनत के कारण एकलव्य िीघ्र ह पैरासलवंपतस में जाने िाला है, जहााँ उसे पदक जीतने से कोई द्रोणाचाया नह ं रोक सकता। ************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 16 सवज्ञान व्रत भारत प्रसतसित िासित्यकार व प्रसिद्ध सित्रकार सवज्ञान व्रत जी को छो ी बिर की ग़़िल सलखने में मिारथ िासिल िै| उनकी कई पस्ुतकेंप्रकासित िो िकुीिैं| उन्िें कई प्रसतसित िम्मानों िे भी िम्मासनत सकया जा िकुा ि|ै िपं कष - [email protected] ग़ज़ल-१ जब उन्हें महसूसता हूाँ रब उन्हें महसूसता हूाँ मैं रहा अहसास क्जनका अब उन्हें महसूसता हूाँ अब ककसी को तया बताऊाँ कब उन्हें महसूसता हूाँ आज जो हस्सास हूाँ कुछ तब उन्हें महसूसता हूाँ आज अपनी क्जन्दगी का ढब उन्हें महसूसता हूाँ
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 17 ग़ज़ल— भारत से मुझको समझा मेरे जैसा िो भी ग़लती कर ह बैठा उसका लहजा तौबा ! तौबा !! झूठा क़िस्सा सच्चा लगता महकफ़ल- महकफ़ल उसका चचाा आखखर मेरा क़िस्सा ननकला मैं हर बार ननिाने पर था िो हर बार ननिाना चूका आखखर मैं दाननस्ता डूबा तब जाकर ये दररया उतरा ग़ज़ल-२
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 18 ग़ज़ल— भारत से ग़ज़ल-३ मुझको लेकर सोचेंगे पर गाँूगे तया बोलेंगे काग़ज कोरा छोडेंगे िो जब मुझको सलतखेंगे मैं अब उनकी आदत हूाँ िो मुझको तया छोडेंगे क्जनसे मेरा झगडा है मेरे अपने ननकलेंगे क्जतना सुलझाओगे तुम ररश्ते उतना उलझेंगे ****************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 19 सिवानन्द सििं ‘िियोगी’, भारत बसलया केिरुजन छपरा ग्राम मेंजन्मेसिवानन्द सिंि ‘िियोगी’ जी वतषमान मेंपर्ूषरूप िेिासित्य िेवा में लगेि|ैंउनकी सभन्न सविाओंमें२४ िेभी असिक पस्ुतकेंप्रकासित ि|ैंसवसभन्न िम्मानों केिाथ िी उत्तर प्रदिे सिन्दी िंस्थान द्वारा ‘िासित्य भर्ूर्' िेअलंकृत ि|ैं िपं कष – [email protected] बता जमूरे ! बता जमूरे ! नाचेगी कबतक रस्सी पर ! छोट -सी यह बच्ची | एक मदार के कुनबे का, िह हैकुिल सदस्य, बना हुआ हैजीिन उसका, अबतक अटल रहस्य, धंधे पर बस लगी हुई है, उमर बहुत हैकच्ची | समझबूझ अनबूझ पहेल , रोट एक समस्या, पता नह ं, कबतक पूर हो, साधन ह न तपस्या, कबतक भूख करेगी रह-रह, झंझट, माथापच्ची | भूख-प्यास है एक कसौट , जीिन एक तमािा, बुद्धधिाद भी बजा रहा है, माि स्िाथा का तािा, आाँखों देखी एक खबर यह, और बात है सच्ची | ***********
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 20 नवगीत— भारत से पेट-पोंछनी पेट-पोंछनी भोर हो गया, आाँख खुल है, पुरिा चौक बहुार गई है | घर के बाहर जो मचान है, बडका सोया, छुट्टा उन पिओु ं का डर है, गेहूाँबोया, चारोंओर, अाँजोर हो गया, पाँिर 'उठो' पकु ार गई है | चौका-बासन हुआ, अभी घर सलपना बाकी, घर-घर पहुाँच बुलािा देती, 'बुधनी' काकी, जगी न अब तक, 'पेट-पोंछनी', ममता पहुाँच दलु ार गई है | अभी संक्रसमत पडी हुई है, आटा-चतकी, अबकी फागुन 'घरभरना' की, िाद पतकी, दह जमाया, ढाँकी हुआ है, ससकहर बहूउतार गई है | ***********
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 21 बेमौसम की बफ़ष िॉ. असनल प्रभा क ु मार, अमरेरका सदल्ली मेंजन्मीं िॉ. असनल प्रभा कुमार जी अमेररका मेंबिी प्रसतसित प्रवािी रिनाकार िैं। उनकेकिानी िंग्रि , कसवता –िंग्रि और उपन्याि “सितारों मेंिरूाख़” प्रकासित िो िकुा ि|ै कई सविेर् िम्मानों के िाथ िी उन्िें2018 मेंउत्तरप्रदिे सिन्दी िंस्थान द्वारा “सवदेि सिन्दी प्रिार” परुस्कार िेिम्मासनत सकया गया ि।ै िपं कष - [email protected] उसने धीरे से खखडकी का पदाा सरका ददया। रोज सबसे पहले िह यह करती है। धूप और रोिनी को न्यौता देती है, भीतर आने के सलए- मन के भीतर तक। िह मुग्ध होकर ननहारती है – आकाि का रंग, पेडों के रंग बदलते पत्ते। हर रोज सूरज सुबह हाक्जर देता आ रहा है, युगों से। िह अपने भीतर इस सूय-ा विश्िास को भर लेना चाहती है। चाहे कुछ हो जाए सूरज तो ननकलेगा ह । आज की सुबह कुछ अपररधचत-सी लगी। आकाि पर जैसे ककसी ने सुनहर के बजाए सफ़ेद की गाढ़ चादर तान द थी। ठोस सफ़े द , कह ं कोई हल्की –सी दरार तक नह ं। “हटो न मााँ, मुझे भी देखने दो।“ महक ने आाँखें मलते हुए अलसायी –सी आिाज में कहा। “गुड मॉननगां , उठ गई मेर त्रबदटया।“ िह लाड में भरकर महक के ससरहाने आकर बैठ गई। त्रबन बालों िाल महक, धचकने ससर के साथ कोई और ह लगती है। जैसे तीस साल की युिती कफर से पााँच साल की बच्ची हो गई हो। पील पडती रंगत के ऊपर बडी- बडी काल आाँखें जैसे मुखर हो उठी हों, बस मुझे देखो और कुछ नह ं। चारु ने उसके ससर के पीछे ससरहाना रख सहारा ददया। माथे को छुआ। कुछ गमा लगा, आाँखें भी चढ़ थीं। “कै सी है तत्रबयत?” “अंअ, ऐसे ह है।“ कहकर िह खखडकी के बाहर लगे मैग्नोसलया के पेड को देखने लगी। उसके चेहरे पर िांनत और मुस्कान आ गई। “महक, देख पेड ककतना कसलयों से लदा पडा है। बस अब ये कसलयााँ कुछ ददनों में खखल जाएाँगी तो ककतना सुन्दर लगेगा यह पेड।“ “तभी तो मैंऊपर अपने बेड-रूम में न सोकर नीचे आपके स्टडी–रूम में सोती हूाँ। आाँख खुलते ह मैग्नोसलया
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 22 कहानी— अमेररका से का यह पेड मुझे “हैलो” कहता है। अभी तो इसकी कसलयााँअपनी गुलाब-जामुनी मुट्दठयााँबन्द ककए बैठी हैं। जब खुलेंगी न तो लगेगा गुलाबीपन सलए सफ़ेद तश्तररयों का अम्बार लगा ददया है ककसी ने। और जब फूल झरेंगे तो पेड के नीचे गुलाबी फूलों की चादर त्रबछ जाएगी। मेरा जी चाहता है कक मैंउन धगरे हुए फूलों के त्रबस्तर पर जाकर लेट जाऊाँ ।“ चारु के मन में एक िलद घुमडता है- “सुहाग-सेज”। महक के पीले पडते चेहरे को देखने लगती है। पता नह ं कब से यूाँ ह लेटे-लेटे फूलों के त्रबछौने देखा करती है। जाने तया-तया घुमडता होगा इसके मन में? कभी सि़िायत नह ं करती, बस मुस्करा देती है। “आज की सुबह हैन मााँ?” िह पता नह ं उसे या अपने को ददलासा देती है। चारु मुस्करा नह ं पाती। ककतनी सुबहें और? सोचती है तो लगता है जैसे चूल्हे से जलती लकडी खींच कर ककसी ने उसके सीने के भीतर घुमा द हो। धुआंसा हो गया है अंतमना , जीिन , सभी कुछ। पर सााँस तो चल ह रह हैतयोंकक हेमन्त साथ हैं- दरू ददखती रोिनी की ओर इंधगत करते हुए। “महक ठीक हो ह गई थी न? कफर काम पर भी तो जाना िरुु कर ददया था। अलग अपॉटामेंट में भी रहने लगी थी। विश्िास रखो कफर ठीक हो जाएगी।“ हेमंत कहते। “कैसे सम्भालेगी सब कुछ?“ चारु का मन डगमग करता। “उसे स्िािलम्बी बनने दो। जीने दो उसे अपने दहसाब से। अपिाद भी हुआ करते हैं। बहुत सी िार ररक व्याधधयााँमनोबल से भी ननयन्िण की जाती हैं।“ “मनोबल”, बस इस एक िलद को पकड सलया था उसने जो अक़्सर उसके हाथ से कफसल जाता। िह टूटने लगती और कफर भागती उसी को पकडने के सलए। उसे इस अन्धेरे में ये जुगनूचादहए थे - ढेर सारे। चारु को भी उसने एक जुगनूपकडा ददया – अपने आिीष का। “तुम्हारे बेडरूम के बाहर भी तो इतना भरा-पूरा चीड का पेड है – सदाबहार। हर मौसम में हरा- भरा।“ “पर मुझे तो यह अच्छा लगता है। छोटा-सा मैग्नोसलया का पेड, धीरे-धीरे बढ़ता हुआ।“ महक खखडकी के बाहर िन्ूय में देखती रह । हेमंत एक हाथ में पानी का धगलास सलए दाखखल हुए। दसू रे में दिा की दो गोसलयााँथीं।
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 23 कहानी— अमेररका से “गुड मॉननगां स्िीटहाटा।“ उन्होंने पानी का धगलास महक की ओर बढ़ा ददया। वपछले छह िषों से िह यूाँह उसकी दिा लेकर आते हैं। महक ने यंिित पकड सलया। दसू रा हाथ बढ़ाकर दिाई भी ले ल । पानी से दोनों गोसलयााँ ननगलकर कफर अधलेट –सी हो गई। िह चुपचाप उसके चेहरे की ओर देखते रहे। कफर ननगाहें पत्नी की ओर उठीं। दोनों ने एक दसू रे को देखा। चारु के गले से हल्की-सी उछ्छिास ननकल और िह जल्द से कमरे के बाहर आ गई। “तत्रबयत ठीक नह ं? उन्होंने महक से बहुत कोमलता से पूछा। महक ने ससफ़ा दांये से बांये ससर दहला ददया।“ िह थकी लग रह थी। हेमंत कह ं गुम से हो गए। आज िननिार था उन्हें काम पर नह ं जाना। मौसम कैसा मनहूस-सा हो रहा है। धूप ननकलती तो िायद महक भी थोडा स्िस्थ महसूस करती। त्रबस्तर पर लेटकर मौसम ह तो देखती है। कुछ ठीक होती हैतो टेल विजन। िह िह ं पास रखी कुसी पर बैठ गए। मैडीकल एन्साइतलोपीडडया को उठाकर आाँखों के आगे रख सलया। ककमौथैरेपी के बाद मर ज पर तया-तया प्रनतकक्रयाएाँहो सकती हैं, पढ़ने लगे। उनका ददल और ददमाग़ अलग-अलग रास्तों पर भटकता है। िह संतुलन का नाटक ककए बैठे रहते हैं। उम्मीद जगी तो थी कक िायद कफर से सब सामान्य हो जाएगा। दोबारा सब गडबड हो गया। कोलोन का कैंसर, ककमौथैरेपी, रेडडएिन की प्रनतकक्रया, िमन, अस्पतालों के चतकर, टेस्ट, दिाइयााँ, परहेज। इस उमर में यह बीमार नह ं होती, क्स्ियों को तो और भी कम – सारे ससद्धांतों की अपिाद बन गई उनकी बेट । चारु महक के सलए पालक और गाजर का ताजा जूस ननकालकर लाई है। “महक” उन्होंने धीमे से पकु ारा तो उसने जिाब में आाँखें खोल द ।ं “बाथरूम िग़ैरह जाना है या मााँ सहारा दे?” “नह ं, मैंचल जाऊाँगी।“ िह धीरे से उठी और बाहर ननकल गई।
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 24 कहानी— अमेररका से “अच्छा खासा अटैच्ड बाथरूम है इसके अपने बैडरूम में, पर सबुह मैग्नोसलया के पेड को देखने के लालच में इस कमरे में आकर सो जाती है।“ चारु ने जैसे हिा में सि़िायत की पची सरका द । कफर िह खखडकी के पास आकर खडी हो गई। “लगता है बफ़ा पडने िाल है।“ “मैने न्यूयॉका टाइम्स में पढ़ा है कक आज बफ़ा के भार तूफ़ान आने की सम्भािना है।“ “इस ितत? अभी तो अततूबर चल रहा है। पतझड भी नह ं िरुु हुआ। अभी तो “हैलोिीन” भी नह ं मनाई गई। बफ़ा तो इस इला़िे में कक्रसमस के बाद ह पडती है।“ “कभी भी कुछ भी हो सकता है। प्रकृनत अपने ननयम खुद ह बनाती हैऔर खुद ह तोडती है।“ हेमंत कह ं खो जाते हैं।। सोचते हैंजब प्रकृनत ननयम तोडती हैतो सब कुछ टूट जाता है। महक कमरे में लौट तो और भी सिधथल लग रह थी। जूस के दो-तीन घूाँट भरे और धगलास सरका कर लेट गई। “कुछ चादहए हो तो बता देना।“ कह कर हेमंत कमरे से बाहर ननकल आए। चारु खखडकी के बाहर देख रह है। मोट -मोट बफ़ा की धचक्न्दयााँ नीचे धगरती हैंऔर सडक पर धचपकती जाती हैं। यह बफ़ा हल्की-फुल्की सफ़ेद धूल जैसी नह ं बक्ल्क पानी से भर भार बफ़ा है। कफर हिा गनत पकड लेती है। बफ़ा का गोल-गोल घेरा सा बनता है, घुमडता है और सब पर छा जाता है। धीरे-धीरे सब जगहों पर सफ़ेद त्रबछनी िरूु हो गई। घरों की छतें, कारों की छतें, पेड, पौधे, घास, सडकें- सब पर सफ़े द ने कलजा कर सलया। कफर तूफ़ान की हरहराती आिाज गाँूजने लगीं। पेडों की डासलयााँ, त्रबजल की तारें सब भर उठे बफ़ा से। सब ओर बफ़ा बस बफ़ा । चारु ने अभी तक बफ़ा पडती देखी है तो ससफ़ा पतझड के बाद। नंगी पडी कमजोर डासलयों पर ह बफ़ा की परतें चढ़ती, जमती और कफर बाद में धीरे-धीरे वपघलतीं। पर यूाँ जिान, पत्तों से लदे-फदे पेडों पर बफ़ा पडते कभी नह ं देखी। त्रबजल की तारों के ऊपर िायद एक इंच मोट बफ़ा की तह जम चुकी थी। महक िायद दोबारा सो गई । चारु रसोईघर की ओर बढ़ तो देखा हेमंत िह ं टेल विजन पर आाँख गढ़ाए बैठे थे, जो िह कम ह करते हैं। “यह मौसम का भविर्षयितता तो डरा रहा है।“ उन्होंने बडे ह सहज भाि से कहा।
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 25 कहानी— अमेररका से चारु रसोई में खाने-पीने का इंतजाम करते हुए रुक-रुक कर टेल विजन पर भी नजर डाल लेती । टेल विजन के पदे पर स्थानीय नतिा उभरा। पूिी –तट पर भार बफ़ा पडने की संभािना यथाथा में बदल रह थी। पदेके ननचले दहस्से पर तेजी से िलद दौड रहे थे। आपातकाल न सलाह थी। “त्रबना जरूरत के घर से न ननकलें।“ संिाददाता चेतािनी दे रहा था कक बफ़ा भार होती जा रह है। पेड पूरे यौिन पर हैं। हरे-भरे पत्तों से लदे िे बफ़ा के भार तले टूटते जा रहे हैं। भार -भार िाखाएाँटूट कर त्रबजल के तारों पर धगर रह हैं। तार कई जगहों से टूटने िरुु हो गए हैं। त्रबजल गुल हो सकती है। चारु की परेिानी बढ़नी िरुु हो गई। फ़ोन बजा। नगरपासलका की ओर से िहर के सभी फ़ोनों पर संदेि छोडे जा रहे हैं। “यदद आपकी त्रबजल चल जाए और आपके घर में कोई बूढ़ा, बीमार या बच्चा हो तो तुरंत नगरपासलका भिन में अस्थायी तौर से बनाए विश्राम- गहृों में चले जाएाँ।“ चारु के हाथ तो जल्द से कुछ खाने को बनाने के सलए फ़ुती से दौड रहे थे और आाँखें टेल विजन पर भटक जातीं और उससे भी ज़्यादा गनत से भटक रहा था मन। “अगर त्रबजल चल गई तो किज में रखी महक की दिाओं का तया होगा?” हेमंत के चेहरे पर कठोरता का ढतकन लगा है क्जसके नीचे एक प्रश्न केंचुए की तरह रेंग रहा है- “तया महक मौसम की इस मार को झेल पाएगी?” चारु ने जाकर महक को छुआ तो महसूस ककया, माथा तप रहा है। थमाामीटर लगाया। हेमंत पास आकर खडे हो गए। चारु ने खुद देखा और कफर उन्हें थमा ददया। “चारु, इसके डॉतटर को फ़ोन करो।“ खुद िह ं चहल-़िदमी करने लगे। चारु ने फ़ोन समलाया। कुछ परेिान ददखी। “इसका डॉतटर तो छुट्ट पर है। िह लोग कहते हैंकक इसे अस्पताल ले जाओ।“ िह िह ं डग भरते रहे, बेट को देखते हुए। “अभी इसके ककमो के सैिन खत्म हुए हैंन तो उसकी प्रनतकक्रया भी तो हो सकती है।“
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 26 कहानी— अमेररका से “िह लगता है।“ “इन हालात में अस्पताल कैसे ले जाएाँगे? चारु परेिान होकर पूछती है। “िह तो ऐम्बुलेंस भी बुला सकते हैं। सोचता हूाँ, इसका डॉतटर तो यहााँहैनह ं। अस्पताल में कोई नया डॉतटर होगा ड्यूट पर, उसे इसकी केस-दहस्र मालूम नह ं होगी। इतना आसान नह ं हैइसका केस।“ “तो?” “अभी टायलेनॉल देकर देखते हैं। पहले भी तो यह करते हैं, िायद बुखार उतर ह जाए।“ िह दिाई और पानी लेने खुद ह बढ़ गए। टेल विजन पर थीं खाल सडकों की धुंधल तस्िीरें और बफ़ा की हाहाकार करती गनत। पेडों की भार – भार िाखाएाँटूट कर रास्तों पर धगर हुईं, रास्ते अिरुद्ध। लोगों के घरों में त्रबजल नह ं। हर थोडी देर बाद आंकडे बढ़ रहे थे। दहमपात का स्तर भी तीन से पााँच इंच से लेकर अब आठ से दस इंच तक पहुाँच चुका था। अचानक एक भोंडी सी आिाज ननकालकर टेल विजन की तस्िीर अन्धेरे में गुम हो गई। “लो, हमार त्रबजल भी गई।“ िह अपने- आप में बुदबुदाई। हेमंत उठ खडे हुए। “चारु, तुम महक को थोडा सूप दे दो।“ “कैसे गरम करूाँ? िह हडबडा रह थी। “इस ितत ददयासलाई से गैस ऑन कर लो”। कफर कुछ सोचते रहे। “तुम सभी मोमबवत्तयााँ ढूाँढ कर रखो। मैंफ़ैसमल रूम में जाकर फ़ॉयर-प्लेस जलाता हूाँ। महक को भी िह ं सोफ़े पर सलटा देते हैं। घर तो अब धीर-धीरे ठंडा हो ह जाएगा।“ चारु सोचती है कक िक्रु है हमारा स्टोि गैस का है त्रबजल का नह ं। फ़ॉयर- प्लेस में भी गैस का पाइप जाता है। ह दटगं न रहने के बािजूद कुछ तो सहारा रहेगा ह । हेमंत ने फ़ॉयर-प्लेस में आग जला द । महक को बच्चों की तरह कम्बल में लपेटकर िह ं सोफ़े पर सलटा ददया। ससर के नीचे ससरहाना रख मुस्कराए।
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 27 कहानी— अमेररका से “इसे कैंप-फ़ॉयर ह समझो। यह ं आग के पास बैठकर गप्पें मारेंगे।“ “डडै ी, आपके सलए तो यह भी एडिेंचर होगा तयोंकक आप और मम्मी कभी ऐसे आराम से बैठ जाएाँ इसके सलए भी त्रबजल -विभाग का िकुक्रया अदा करना चादहए।“ “लगता है, बखु ार टूट रहा हैतेरा।“ कहकर चारु ने सूप का प्याला महक को पकडा ददया। कफर जाकर रे में अपने दोनों के सलए भी खाना ले आई। बेहद सादा, बेस्िाद सा खाना। अब घर में कुछ ह चीजें पकती हैंऔर िह भी त्रबना तले -मसालों के । तीनों चुपचाप खाते रहे। बाहर बफ़ा पूर रफ़्तार से धगरती रह । हिा की सांय-सांय िीिे के दरिाजों पर सर पटक जाती। लगा ठंड ने घर के भीतर घुसपैठ करना िरुु कर ददया। बाहर धुंधलका था। “ककतने बजे हैं?” चारु ने रुक गई घडी को देखते हुए हेमंत से पछू ा। “छह बजकर दस समनट”, उन्होंने कलाई-घडी से पढ़ ददया। िह जल्द -जल्द पलकें झपक रहे थे। उठ कर इधर-उधर चलते पर कमरे की सीमा के भीतर ह । चारु ने कई मोमबवत्तयााँएक ह प्लेट में जला द ं। कफर जाकर एक बाथरूम के अन्दर भी रख आई। बाहर बफ़ा की सफ़े द ने िहर पर कलजा कर सलया और भीतर अब अन्धेरा भी िह कोसिि कर रहा था। “अगर आज रात –भर त्रबजल न आई तो?” “हो सकता है आज रात तया कल रात तक भी न आए। सुना नह ं पॉिर कम्पनी िाले इतने बडे पॉिर फ़ेसलयर को संभालने के सलए तैयार नह ं हैं।“ “यह भी तो हो सकता है कक थोडी देर में आ ह जाए। पहले भी तो ऐसा होता है।“ चारु आिािाद थी। “पहले ऐसा कभी नह ं हुआ। यहााँअततूबर में इतना बडा बफ़ीला तूफ़ान कभी नह ं आया। यह बे-मौसम की बफ़ा है।“ प्रकृनत के स्िाभाविक ननयम और क्रम के विपर त जाने से िह नाराज थे। जैसे हर ़िदम पर कह रहे हों, ग़लत है, यह गलत है। ऐसा नह ं होना चादहए। महक चुपचाप आाँखें बन्द ककए लेट थी और िह प्रकृनत से जूझ रहे थे। चारु चुपचाप उन्हें देखती रह । धीरे से पास आकर बैठ गई। ससर उनके कंधे पर रख ददया। दोनों चुपचाप आग की लपटों को देखते रहे। ककतना कुछ सुलगा, बुझा, जलती धचगं ाररयों से भर गई क्जन्दगी। घर में
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 28 कहानी— अमेररका से अन्धेरा गहरा गया था और िह तीनों ननश्चल बैठे सोख रहे थे उस अन्धेरे को। जलती मोमबवत्तयों को, जो वपघल-वपघल कर ककनारों से नीचे बह चुकी थीं और अन्दर उनके गहरे गड्डे बनते जा रहे थे। “डैडी, ठंड लग रह है।“ महक कुनमुनायी। चारु ने उस पर एक और कम्बल डाल ददया। अपने और हेमन्त के ऊपर भी। थोडी देर बाद हेमंत सब झटक कर उठ खडे हुए। “ऐसे नह ं चलेगा।“ उन्होंने सेल-फ़ोन उठाया, काम कर रहा था। “रमेि, तुम्हारे यहााँतया अभी पॉिर है? “तो ठीक, हम आ रहे हैं।“ संक्षिप्त सी बात करके फ़ोन रख ददया। “चारु, रमेि और ल ना के यहााँ चलना होगा। तुम दोनों पूर तरह गमा कपडे पहन लो और महक की सभी दिाइयााँभी ले लो।मैंगाडी बाहर ननकालने के सलए ड्रॉइि-िे की बफ़ा हटाता हूाँ।“ चारु उन्हें खखडकी से बाहर फािडे से बफ़ा हटाते देख रह थी। वपडं सलयों तक बफ़ा मे धंसा एक प्रौढ़ आदमी फािडे के साथ बफ़ा से जूझ रहा है। झुकता है, बफ़ा उठाता है और अपनी दांयी – बांयी ओर फेंकता जाता है। माँुह पर बफ़ा की मार तमाचों की तरह पड रह है पर उसे रास्ता बनाना है। ससफ़ा इतना कक अपनी जिान बीमार बेट को यहााँ से ननकाल भर सके । चारु का मन भीग आया। जरा सा दरिाजा खोला. “मैंआऊाँ, मदद के सलए।“ “तुम अन्दर रहो, महक के पास।“ िह जिाब मे धचल्लाये। गाडी हेमंत बहुत ध्यान से चला रहे थे - इंच-इंच करके । गाडी कफसल-कफसल जाती। जादहर था कक नगरपासलका का रक अभी बफ़ा हटाने नह ं आया था। मोड पर आने से पहले ह गाडी रुक सी गई। सामने एक पेड धगरा पडा था- रास्ता बन्द। गाडी को पीछे मोडने में कफसलने का खतरा था। धीरे-धीरे उन्होंने गाडी को थोडा बांये मोडकर गोलाई काटते हुए िावपस कर सलया। दसू र सडक से ल ना- रमेि के घर का रास्ता सलया। एकदम सूनी सडक। पैदल दस समनट का और गाडी से तीन समनट का रास्ता इतना बीहड भी हो सकता है, कभी अनुमान भी नह ं लग सकता था। चारु दम साधे, महक को पकडकर वपछल सीट पर बैठी रह । रमेि की सडक पर घरों में त्रबजल नजर आई।
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 29 कहानी— अमेररका से हेमंत धीरे-धीरे गाडी को ड्रॉइि-िे पर लाए। खुद पहले उतर कर दरिाजा खोला। महक को दोनों पनत-पत्नी सहारा देकर दरिाजे तक ले आए। ---------- खाने की मेज पर बैठे हुए भी सबकी आाँखें टेल विजन पर ह धचपकी थीं। इस इला़िे में एक फ़ुट से ज़्यादा बफ़ा धगर चुकी है। सडकों पर पेडों की िाखाएाँया परूे के पूरे पेड ह जड से उखड कर धगरे पडे हैं। त्रबजल की तारों ने कई इला़िों में त्रबजल आपूनता को िनत पहुाँचाई है। विद्युत विभाग मुस्तैद से काम कर रहा है। रास्ते अभी परू तरह से अिरुद्ध हैं। एम्बुलसैं भी कई रास्तों तक पहुाँचने में असमथा हैं। राज्य के गिनरा ने आपातकाल न क्स्थनत घोवषत कर द है। अत्यन्त जरूर काम के त्रबना घर से बाहर न ननकलें। “लो अभी तक तो मौसम सम्बंधी परामिा ह दे रहे थे और अब िह चेतािनी में बदल गया। रमेि बोला। हेमंत ने कोई उत्तर नह ं ददया जैसे उनके ददमाग़ में गखणत की पहेसलयााँचलती हों। “तुम लोग हमारे बेटे िाले कमरे में सो जाओ और महक के सोने के सलए भी साथ िाला कमरा खोल देती हूाँ।“ ल ना पूर तरह से उन्हें आराम देने की ़िोसिि कर रह थी। “अभी देखते हैं। बफ़ा पडनी तो िायद रुक गई है।“ हेमंत टेल विजन के त्रबल्कुल पास जाकर बैठ गए। सभी समाचारों में डूबे थे। “बेचारे ये ररपोटार! इनकी नौकर भी ककतनी कदठन है।“ ल ना एक लाल रंग के भार कोट और हुड से ढके पिकार को देखकर बोल । जो इस बफ़ीले तूफ़ान में अकेला कैमरे के सामने खडा था और बोलते ितत उसके माँुह से भाप ननकल रह थी । “ऐसी बफ़ा में तो जहााँचाहे स्कीइंग करो, कोई रोक-टोक नह ं।“ महक की आिाज में चहक आ गई। “तो कर लेना इस आने िाल सददायों में।“ ल ना ने भी उसी उत्साह से कहा। “मैंकोलाराडो जाऊाँगी डडै ी। ठीक?” “जरूर जाना।“ कहकर उन्होंने माँुह घुमा सलया। चारु उनके चेहरे देख रह थी । हालात कैसे हमें इतना अच्छा असभनय करना ससखा देते हैं। कमरे में ससफ़ा टेल विजन पर चलती खबरें ह जीिन्त थीं- आिाज और गनत में। बा़िी सब क्स्थर था।
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 30 कहानी— अमेररका से चारु उठी और उसने ल ना के फ़ोन से अपने घर का नम्बर समलाया। दसू र ओर घंट बज रह थी कफर उसी की आिाज में ररकॉडा ककया हुआ संदेि था। “त्रबजल आ गई।“ उसने खुिी से ऊाँची आिाज में कहा। हेमंत उठ खडे हुए। “बस, अब चलते हैं।“ “यार, रात काफ़ी हो गई है और सडकों पर इतनी बफ़ा है। रात यह ं रुक जाओ।“ रमेि ने आग्रह ककया। “दो ललॉक तो हैंमुक्श्कल से। अपना घर ठीक रहता है।“ हेमंत ने रमेि की पीठ थपथपाकर समझा ददया। दरिाजे पर रुककर ल ना से बोले, “ज़्यादा ननक्श्चंत मत होइएगा, जरूरत पडी तो हम दोबारा भी आ सकते हैं।“ ------- हेमंत महक को कंधों से यूाँ छूकर अपने घर के अन्दर लाए जैसे िह बहुत नाजुक सी धातुकी बनी हो। चारु बाहर ह रुक गई। देखती रह असीसमत श्िेत विस्तार को। उस श्िेत ननस्तलधता को महसूस करती रह । नीचे फै ल बफ़ा की प्रनतच्छाया से सब जगमग था। आधी रात का समय और ऐसा उजाला जैसे चांदनी का लयाह रचा हो। हिा, िोर, बफ़ा, सब कुछ थम चुका था। िह मुग्ध होकर इस िीतलता को, रजत सौंदया को अपने में भर लेना चाहती थी। देखा उसके स्टडी-रूम की खखडकी के सामने जैसे कोई छोटा सा बफ़ा का ट ला उठ आया हो। कुछ ़िदम आगे बढ़ आई। मैग्नोसलया का पेड जड से उखडकर, पछाड खाकर औधं े माँुह धगरा पडा था। चारु िह ं जम गई। लगा सीने के खोखल में, कोई चीख एक अन्धे चमगादड की तरह सर पटक रह है। िह पथरायी आाँखों से देखती रह । एक जिान हरा-भरा पेड, बन्द कसलयों समेत धरािायी था। िह स्तलध थी। एक िास सा छा गया उस पर। महक सुबह उठकर तया देखेगी? िह रोकना चाहती थी उस सब को जो उसके बस में नह ं था। लगा, कोई भार अपिगुन हो गया। िह महक को यह सब ़ितई नह ं देखने देगी। पीछे से आकर ककसी ने कन्धे पर हाथ रख ददया, देखा हेमंत थे। “ठंड लग जाएगी, अन्दर चलो।“ मनुहार से कहा।
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 31 कहानी— अमेररका से “देखो ! अभी तो ये कसलयााँपूर तरह खखल भी नह ।ं “ चारु की आिाज भराा रह थी। हेमंत ने चारु को अपने सीने में समेट सलया। उसके सीने का फडफडाना अपने भीतर भी महसूस करते रहे। चारु को बााँहों में समेटे पता नह ं कब तक यूाँह खडे रहे। उन दोनों की साझी, लम्बी सी परछाईं बफ़ा पर बडी दरू तक खखचं गई। धीरे से उन्होंने चारु के ससर को चूमा और बााँहें ढ ल कर द ं। “महक अन्दर अके ल है, चलो।’ उन्होंने चारु को बााँह से सहारा ददया। दरिाजे के बाहर आकर चारु कफर रुक गई। “आती हूाँ।“ कहकर िह बफ़ा में पैर धंसाती घर के वपछिाडे तक चल गई। सब कुछ िैसा ह था। देखती रह , कफर पलट । चारु अन्दर आकर कमरे के एक कोने में खडी हो गई। महक को आाँखें मूंदे सोफ़े पर लेटे देखा तो बस देखती रह ं। ककतना कुछ अन्दर हाहाकार करता रहा। िह जिान पेड जैसे उसके सीने पर ह धगरा था और जूझते हुए िह धसाँ रह थी।ं हेमंत ने हाथ बढ़ाकर बेट को सहारा ददया। “चलो, तुम्हें बेडरूम तक ले चलाँू।“ महक अधनींद ह स्टडी-रूम की ओर जाने लगी। मााँ लपक कर खडी हो गई। “रुको, िहााँ नह ं।“ हेमंत के माथे पर त्यौररयााँ उभर ं, एक प्रश्नधचन्ह खझलसमलाया। “आज महक ऊपर सोएगी, अपने सोने के कमरे में।“ चारु ने दृढ़ता के साथ कहा। कफर हौले से बुदबुदायी, “िहााँ से सदाबहार ददखता है।“ *******************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 32 िॉ . सिप्रा सिल्पी िक्िेना , जमषनी सवगत एक दिक िे जमषनी के कोलोन ििर में सनवाि करने वाली िॉ.सिप्रा सिल्पी िक्िेना सििर्, पत्रकाररता, िासित्य, अनवुाद और िम्पादन िेजडुी ि|ैंवेसिदं ीिाला और िजृ नी ग्लोबल िैनल की िस्ं थापक ि|ैंउन्िेंकई अन्य परुस्कारों केिाथ िी गजुरात िासित्य फेसस् वल में'प्रवािी िजृ न अमतृ िम्मान' िेिमासनत सकया गयाि|ै िपं कष - [email protected] टोकरी वििेष - डॉ सतसेना द्िारा ये कहानी जमना एिं अंग्रेजी में सेंट मादटान ददिस पर सििकों के सलए बच्चों द्िारा आयोक्जत बाल कहानी लेखन प्रनतयोधगता के सलए सलखी गई है , क्जसको बच्चों द्िारा सिााधधक िोट देकर सम्माननत भी ककया गया । ये एक चैररट ईिेंट था, जो स्कूल के बच्चों द्िारा यूक्रेन के बच्चों की मदद के सलए आयोक्जत ककया गया था । प्रनतयोधगता में िोदटगं बच्चों से सम्बद्ध समान जैसे जूते , जैकेट , कंबल , कपडे , खाना आदद जरूरत का समान देकर की गई । ये मूल कहानी का दहन्द रूपांतरण है । ओह, 7 बज गए, कक्रस्ट ने आाँख खोलकर घडी पर नजर दौडाई, आाँखें समचसमचाते हुए चारों ओर देखा, पर सुबह 7 बजे भी गहरा अंधकार था। सददायों में 10 बजे सुबह तक जमना ी में ऐसा अंधकार होना स्िाभाविक है, पर कुछ था जो स्िाभाविक नह ं था, िो था ओमा मतलब कक्रस्ट की दाद का उसे न जगाना। 7 साल की कक्रस्ट का गरम रजाई से ननकलने का मन तो नह ं था, पर मन अंधेरे में डर भी रहा था। उसने रजाई से ह माँुह ननकाल कर अंधेरे में घडी की रोिनी में आिाज लगाई – ओ ओ मााँ.... , ओ मााँ.... डर लग रहा कहााँ हो आप। िो दहम्मत करके कफर चीखी कोई उत्तर न पाकर अब उसका डर घबराहट में बदल रहा था । िो तया करे समझ नह ं आ रहा था । उसने दहम्मत करके रजाई से ह त्रबजल का क्स्िच ढूाँढने का प्रयास ककया, जो कुछ देर की मितकत के बाद उसे समल गया। लाइट आते ह जान में जान आई । उसने चारों ओर नजर दौडाई पर ये तया उसकी चीख ननकल गई, ओमा कक्रस्ट की प्यार ओमा जमीन पर धगर हुई थीं । िो फुती से रजाई छोडकर ओमा की ओर भागी। ओमा बेहोि थीं, उनका माथा तप रहा था । उसने धगलास में रखे पानी को ओमा के माँुह पर नछडका,
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 33 बाल–कहानी — जमषनी से जोर- जोर से आिाज देने लगी। िो बहुत डर गई थी, एक ओमा ह तो थी उसकी क्जंदगी में, मा-ाँ पापा के अलग होने के बाद । दोनों अपने नए पररिार में उसे नह ं रखना चाहते थे । यूाँतो इन देिों में सरकार अकेले बच्चों को हर सुविधा देने को तैयार थी, पर ओमा मतलब उसकी दाद , उसे अपने साथ अपने गााँि ले आई थी । िहर से दरू उसकी ओमा ताजे फल- सक्लजयााँ उगाती और रोज सुबह िहर की हाट में जाकर बेच आती थी । जीिकोपाजान का यह साधन था उनके पास। कक्रस्ट के सलए ओमा और ओमा के सलए कक्रस्ट और उनके ताजे फलों की टोकर खुसियों का कारण थी । सुबह टोकर का भरा रहना और िाम को उसका खाल होना, ओमा के चेहरे की मुस्कान थी और उसके भी । ओमा का बुखार बढ़ता जा रहा था और माथे पर धचतं ा की लकीरें भी । सामने फलों की टोकर आधी भर रखी थी, िो बार - बार उसे देख रह थी और धच ंता कर रह थी कक अगर फल बाजार नह ं गए तो खराब हो जाएाँगे और पैसे भी नह ं आयेंगे । नन्ह कक्रस्ट ओमा की परेिानी समझ रह थी, कम उम्र में भी िो भर और खाल टोकर का महत्ि समझने लगी थी। उसने ओमा का हाथ हौले से पकडा । कफर फोन करके एम्बुलेंस को बुलाया, 10 समनट में डॉतटर आ गए उन्होंने ओमा को दिा द और त्रबल्कुल ना उठने की सलाह भी । ओमा का बुखार थोडी देर में कम होने लगा था, िो बाजार जाने की क्जद करने लगी, पर आज कक्रस्ट उनकी एक भी बात मानने िाल नह ं थी। उसने बफा िाले जूते पहने, जैकेट पहनी, कैप और मफ़लर पहना त्रबल्कुल क्जम्मेदार बडों की तरह, िैसे कपडे पहनते ितत उसने भीगी आाँखों से ओमा की ओर देखा, रोज िो ओमा की डााँट पर गुस्सा करती थी, पर आज िो ददल से चाह रह थी कक ओमा उसे हर बात पर रोकें - टोके । उसने बडी मुक्श्कल से ओमा को मीठी िाल डााँट लगाकर सुलाया, कफर बाहर जाकर फामा से बची टोकर को उसी कार ने से भरने लगी जैसे उसकी ओमा भरती है । पर ये तया टोकर तो बहुत भार हो गई , िो सोचने लगी अब तया करें इसे उठाकर तो िो बाजार तक नह ं जा पाएगी। तभी उसे मागेट की गुडडयों िाल रॉल का ध्यान आया, मागेट और कक्रस्ट एक साथ स्कूल में पढ़ते भी है और पडोसी भी हैं। उसके चेहरे पर ओमा की परेिानी दरू हो जाएगी, ये सोचकर ह खुिी की लहर दौड गई। िो धीरे से मागेट के दरिाजे पर गई और हााँ स्टूल भी साथ में लेकर
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 34 बाल–कहानी — जमषनी से गई थी, तयोंकक मागेट के दरिाजे की घंट ऊपर लगी थी । िो ओमा की परेिानी दरू करने में कोई लापरिाह और देर नह ं करना चाहती थी। उम्मीद के अनुसार दरिाजा मागेट ने खोला और कक्रस्ट की बात सुनने के बाद खुिी- खुिी उसको रॉल देने को तैयार हो गई । गलु ाबी रंग की रॉल में फूलों से सजी टोकर लगी थी, रंग - त्रबरंगे पदहये और मुलायम फ़र से ढाँका हुआ हैंडल भी । उस समय कक्रस्ट के सलए िो रॉल नह ं ओमा की खुिी उसकी खुसियों का रथ थी, पंखों िाला, उडने िाला, गुलाबी रथ। कक्रस्ट ने रॉल की टोकर में सारे फल सजा सलए मागेट की मााँको ओमा के पास बैठा कर िो गााँि के बाजार की ओर चल पडी। बाजार 4 बजे िाम तक ह लगता था और ये सब करते कराते ददन के 1 बज चुके थे , उसके नन्हे कदम हिाई जहाज की गनत से चल रहे थे, िो बस रॉल में रखी टोकर को खाल करके , घर ले जाना चाहती थी तयोंकक उसको देखकर ह ओमा के चेहरे पर खुिी आ जाएगी । बाल मन पैसा नह ं देखता, व्यापार नह ं जानता पर खुसियााँ लाने का हौसला जरूर रखता है। बाजार कुछ ककलोमीटर ह दरू था। लोकल रेन से आना जाना उसे आता है, जमना ी में बच्चे छोटेपन से ह अकेले आते जाते हैं ये बात अलग है, ओमा हमेिा कक्रस्ट के साथ साये की तरह रहती हैं। बाजार में िो बडे- बडे रकों के बीच अपनी रॉल लेकर खडी हो गई । िो ओमा के साथ अतसर रवििार को बाजार आती रहती थी। एक घंटे तक अपनी नील पुतसलयों िाल आाँखों से िो टुकुर - टुकुर लोगों को आता- जाता देखती रह । ककसी ने उसकी टोकर की ओर देखा भी नह ं । ठंड में पैर भी जमे जा रहे थे, मोजे भी िो उलटे पहन आई थी, जो अब गडने लगे थे । उसे जोर- जोर से ओमा की गरम बाहें याद आने लगी थी। जाडों मे अंधेरा भी जल्द हो जाता है, टोकर के सारे फल ऐसे ह रखे थे। िो रोने- रोने को होने लगी, अब कैसे िो अपनी बीमार ओमा के चेहरे पर हाँसी देख पाएगी ये धच ंता भी उसे सताने लगी थी। तभी उसे लगा कुछ कंबल ओढ़े बच्चे उसकी टोकर को लगातार ताक रहे है। िो डर गई, पहले तो उसने कोसिि की अपने स्काफा से फलों को ढकने की पर कफर उसे लगा लोगों को फल ददखेंगे नह ं तो िो खर देंगे कैसे। तभी उन बच्चों में से एक बच्चा उसके पास आया और बोला मनैं े और मेरे दोस्तों ने सुबह से कुछ खाया नह ं है, हम भूखे हैं, यहााँ सभी से हमने
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 35 बाल–कहानी — जमषनी से खाने को मागाँ ा सबने हमें भगा ददया। तुम दयालु लगती हो तया तुम मुझे खाने को अपनी टोकर से मीठे फल दोगी। कक्रस्ट सोच में पड गई, एक ओर िाम को फल बेचकर कुछ पैसे घर ले जाने पर ओमा के चेहरे की खुिी दसू र ओर ओमा की ह ससखाई बात की ककसी भूखे को खाना खखलाना ईिू को खाना खखलाना है। रात बढ़ रह थी, िैसे भी कोई फल खर द नह ं रहा था, उसने सोचा तयों न इन बच्चों को ह फल खखला ददए जाए कम से कम फल खराब तो नह ं होंगे। हााँ, िाम के सलए पैसे नह ं हो पाएाँगे, पर टोकर खाल हो जाएगी। िो जानती थी ओमा उसकी बात समझेंगी। भूख तो उसे भी लगी थी। उसने बच्चों को इिारे से पास बुलाया और पेट भर फल खाने को कहा। िो सब बहुत खुि हो गए उनकी खुिी देखकर िो भी खुि हुई और उनके साथ समलकर फल खाने लगी। कुछ ह देर मे उसकी टोकर खाल हो गई । कह ं न कह ं फल न बेचकर पैसे न कमा पाने का कक्रस्ट को अफसोस था, पर बच्चों के चेहरे पर रौनक देखकर संतोष भी था। रात गहर हो गई थी अब अके ले िापस जाने में उसे बहुत डर लग रहा था िो रूाँआसी हो गई , उन बच्चों ने उससे पूछा िो तयों रो रह है, तो कक्रस्ट ने सार बात उन बच्चों को बताई। िो हाँस कर बोले अरे, तुम त्रबल्कुल मत घबराओ, हम सब तुम्हारे साथ तुम्हें घर छोडने चलेंगे। तम्ुहार ओमा को िकुक्रया भी कह देंगे। तुमने त्रबना अपना नुकसान सोचे हमें फल खखलाए है जब हम भूखे थे। कक्रस्ट बहुत खुि हो गई कक अब उसे अकेले नह ं जाना पडेगा। सबने उसकी रॉल को ठीक ककया और साथ मे गाते हुए चलने लगे धगनीसेन दद लेबन – क्जंदगी आनंद से त्रबताओ । सामने घर था ओमा बाहर उसका इंतजार कर रह थी, िो दौड कर उनसे धचपक गई और ओमा के चेहरे पर खाल टोकर को देखकर आने िाल मुस्कान का इंतजार करने लगी, पर ओमा कौतूहल से अनजान बच्चों को देख रह थी। तभी एक बच्चे ने आगे बढ़कर ओमा के हाथ पर 100 यूरो रख ददए, ओमा ने पूछा, ये तया हैऔर तयों। बच्चों ने कक्रस्ट ने ककस प्रकार त्रबना अपनी भलाई सोचे उनको फल खखलाए उनकी भूख समटाई, ये सार घटना विस्तार से बताई और ये भी बताया कक हमारे स्कूल मे सेंट मादटान सुंदर मन खोज प्रनतयोधगता चल रह है, क्जसमें ननस्िाथा भाि से सेिा करने िाले बच्चों को हमारा स्कूल पुरस्कृत कर रहा है, क्जसकी खोज अनजान बनकर हम बच्चों को करनी होती है । आज हम सब ने कक्रस्ट से नेकी का ननस्िाथा भाि से सेिा का पाठ
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 36 बाल–कहानी — जमषनी से सीखा । िकुक्रया कक्रस्ट - सबने एक साथ बोला और अब से आप ससफा कक्रस्ट की ह नह ं हमार भी ओमा है। तो अब हम सब जब तक आप ठीक नह ं हो जाती रोज स्कूल जाने से पहले आपके फलों को बेचने में कक्रस्ट की मदद करेंगे। ओमा की आाँखों में खुिी के आाँसूथे, कक्रस्ट अपनी नील पुतसलयों में आाँसू भरकर उन्हें देख रह थी , इसी खुिी के सलए तो िो सुबह से जुट थी। उसे अब जमे हुए पैर, उलटे मोजों की चुभन, कई ककलोमीटर रॉल धकेलकर ले जाने से हाथों मे हो रहे ददा का आभास भी नह ं था । िो जानती थी कल सुबह ओमा की टोकर फल- सलजी के साथ, नए दोस्तों और खुसियों से भर होगी। **********************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 37 छोटी सी प्रेम कहानी िॉ श्वेता दीसि, नेपाल नेपाल के सत्रभवुन सवश्वसवद्यालय के के न्द्रीय सिन्दी सवभाग में प्राध्यापक िॉ श्वेता दीिी जी काठमान्िौ िे सनकलने वाली सिन्दी मासिक पसत्रका ‘सिमासलनी’ की िम्पादक भी िैं| उनकी कसवता िंग्रि, िमीिा, अनवुाद व सवश्लेर्र् िेिम्बंसित पस्ुतकेंप्रकासित िो िकुी ि|ैंवेसिदं ी के प्रिार-प्रिार में िसिय िैं| िपं कष - [email protected] “तया ददन भर मोबाइल में सर खपाती रहती हो । कॉलेज से आना और कफर मोबाइल लेकर बैठ जाना । बस यह रह गया हैतुम लोगों का और तो कोई काम ह नह ं है ।” सुरेखा बडबडाती हुई ककचन में चल गईं । “ओ मााँ तुम तो बस पीछे ह पड जाती हो । अभी तो सलया है । कुछ देर में कफर पढ़ने बैठ जाऊाँगी । बस थोडी देर मम्मा प्ल ज ।” ननिा ने माँुह बनाते हुए कहा । “ठीक है, ठीक है लो पहले नाश्ता करो, कफर कुछ करना ।” सुरेखा ने नाश्ते का प्लेट टेबल पर रखते हुए कहा। “ओ मााँ, मेर प्यार मााँ ।” कहती हुई ननिा पीछे से आकर गले में झूल गई । “अच्छा ये बताओ आखखर करती तया रहती हो तुम मोबाइल में ?” “कुछ नह ं फेसबुक चलाती हूाँ ।” “ये फेसबुक ककस बला का नाम है?” “बहुत अच्छी चीज है फेसबुक । जानती हो मा,ाँ इसमें तो पता नह ं ककतने लोग समल जाते हैंक्जनसे हम िषों से नह ं समले होते हैं। पर तुम ककचन की दनुनया से बाहर तो ननकलो तभी तो पता चलेगा कक दनुनया में तया हो रहा है ।” ननिा ने दािनानक मूड बनाते हुए कहा । सच तो कहा ननिा ने । सुरेखा की तो दनुनया ह ककचन है । सुबह से िाम और रात तक बस िह ं तो उलझी
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 38 कहानी— नेपाल से रहती है । राजन का डर, सास की ककचककच और ननदों की खुिामद में उसकी क्जन्दगी गुजर गई । िाद से पहले ससुर का ननधन हो चुका था । िाद हुई तो राजन के साथ ह तीन ननदों और सास की क्जम्मेदार सामने थी । बीस की उम्र में घर की होकर रह गई । राजन को घरेलू पत्नी चादहए थी जो उसके घर और और उसकी मााँ बहनों का खयाल रख सके । िाद के २५ साल कैसे गजु र गए पता ह नह ं चला । अब तो सास भी चल बसीं । ननदों की िाददयााँ हो गई । पर उसकी दनुनया तो ससमट कर रह गई । कभी िह सोचती, कहााँ होंगी मेर सार सहेसलयााँ । ककन्ह ं से कोई सम्पका नह ं । उसने बीए में एडसमिन सलया तो था पर आगे पढ़ नह ं पाई और न ह कभी पढ़ाई के टूटे हुए ससलससले को आगे बढ़ाने की सोच आई उसे । िैसे भी िह जानती थी कक राजन कभी इस बात के सलए सहमत नह ं होगा । िाद के आठ साल तक औलाद नह ं होने की तडप और उस पर सास के तानों ने जीने की सार ख्िादहि ह उसकी छीन ल थी । और कफर ननिा के जन्म ने घर की किमकि में भी उसे जीने का सुन्दर बहाना दे ददया था । और अब तो ननिा भी सिह की हो गई है । आज ननिा की बातों ने अन्दर तक उसे खझंझोड ददया था । इन पचीस सालों में कभी खुद का ख्याल ह नह ं आया उसे । उसे तया पसंद है यह तो अब याद भी नह ं । सुरेखा पता नह ं कब आईने के सामने जाकर खडी हो गई । सामने एक अस्त– व्यस्त चेहरा था । कनपट के बाल अब तो सफे द होने लगे हैं। आाँखों के ककनारे मकडे के जालों की तरह लकीरों ने घर बना सलया है । गेहुाँआ रंग कब सांिला हो गया पता ह नह ं चला । “मााँ...मााँ कहााँ हो ? पापा चाय मााँग रहे हैं। ओह यहााँ आइने के सामने खडी तया कर रह हो ?” दनदनाती हुई ननिा कमरे में दाखखल होती हुई बोल । खुद को सम्भालते हुए उसने कहा “यह ं हूाँ, कहााँ जाऊाँ गी ?” “िो पापा चाय मााँग रहे थे ।” “ठीक है मैं बना देती हूाँ ।” कहती हुई सुरेखा के कदम ककचन की तरफ बढ़ गए । आज सुरेखा का मन काम में नह ं लग रहा था । पर काम तो करना ह था । सारा काम ननबटा कर सुरेखा ननिा के पास चल गई । ननिा सोने की तैयार कर रह थी । उसे रोजाना सुबह कोधचगं जाना होता है इससलए जल्द ह सो जाया करती है। “ननिा एक बात पूछूाँ ?” “हााँ मााँ बोलो ?” “तया सचमुच फेसबुक में सभी समल जाते हैं?”
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 39 कहानी— नेपाल से ननिा के चेहरे पर एक िरारत भर मुस्कुराहट फैल गई । उसने सुरेखा को कर ब खींचते हुए कहा, “हााँ तयों नह ं । पर तुम्हें ककसे ढूाँढना हैमााँ। कोई.....खास दोस्त ?” “धत्। मार खाओगी । मैंतो ऐसे ह पूछ रह थी ।” “ओ मेर प्यार मााँ... चलो तुम्हारा फेसबुक अकाउंट बनाती हूाँ ।” “मेरा बन जाएगा ?” सुरेखा अचानक ह खुि होती हुई बोल । “त्रबल्कुल मैंअभी बनाती हूाँ, बस एक अच्छी सी तस्िीर चादहए तुम्हार ।” ननिा उत्सादहत होती हुई बोल । “अच्छी तस्िीर, अब कहााँ से अच्छी तसिीर समलेगी ?” ठण्डी सााँसे लेती हुई सुरेखा ने कहा । “अरे मााँबस अभी समल जाएगी । स्माटा फोन का जमाना है । स्टूडडयो थोडे ह जाना है ।” “हााँ िो तो है । पर..” सुरेखा सकुचाती हुई बोल । “कोई पर िर नह ं । इधर आओ । बस थोडी सी सलपक्स्टक, एक उलझी हुई लट और देखो तुम्हार ककतनी अच्छी तस्िीर आती है ।” िरारत से ननिा का चेहरा भरा हुआ था । कुछ ह देर में सुरेखा का फेसबुक अकाउंट तैयार था । ननिा ने कुछ पररिार के लोगों को जोड भी ददया और सुरेखा को फेसबुक चलाना भी ससखा ददया । आज सुरेखा की आाँखों में नींद नह ं थी । कई सिाल थे क्जसका जिाब िो खुद में तलाि रह थी । तया फेसबुक पर आनंद होगा ? पर अब तो िह भी काफी बदल गया होगा । िायद पहचान भी ना पाऊाँ । मन बार–बार तीस साल पीछे लौट रहा था । कमलेि भैया की िाद थी । कमलेि यानी सुरेखा का ममेरा भाई । नानी के यहााँ जाने का मतलब खूब सार मस्ती । ना मााँ की डााँट की धचन्ता ना पापा के रोक–टोक की परिाह । और कमलेि भैया तो िैसे भी सुरेखा के सबसे मनपसंद भैया थे । पूर तैयार के साथ सुरेखा िाद में गई थी । दसिीं की पर िा समाप्त हो गई थी, इससलए भी मन बेपरिाह था । मन ह मन सारे रास्ते ना जाने ककतने प्लानन ंग बन रहे थे । नतलक, हल्द और कफर िाद , बारात ककतना आनंद आने िाला था । बारात जाने का तो मजा ह कुछ और था और िो भी रेन से । दो बोगी ररजिा थी । रास्ते भर सब गाते
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 40 कहानी— नेपाल से बजाते रहे । छ सात घंटे के बाद ननयत समय पर बारात सुरेखा के भैया के ससुराल पहुाँची । स्टेिन से गााँि की दरू लगभग आधे घंटे की थी । बारात ठहराने की व्यिस्था गााँि के ह एक स्कूल में की गई थी । िो समय जब सब कुछ बनािट दनुनया से बहुत दरू था । जनिासे में लोग बारात के स्िागत में व्यस्त थे । िह ं पहल बार आनंद को देखा था सुरेखा ने । आनंद क्जसकी नजरें बार–बार सुरेखा से टकरा रह थीं । सोलह सिह साल का लम्बा, गोरा धचट्टा आनंद सबकी भीड में अलग ह लगा था उसे । दरिाजा लगने से विदाई तक आनंद उसके इदा धगदा रहा । सुरेखा से बात करने का कोई भी मौका िो नह ं छोड रहा था । स्टेिन पर पहुाँच कर अनायास सुरेखा को लगा कक िह उदास हो रह है । उसकी नजरें आनंद को खोज रह थीं । पर िह कह ं ददख नह ं रहा था । कफर रेन आई और सभी जल्द – जल्द रेन में चढ़ने और अपनी–अपनी सीट लेने में व्यस्त हो गए थे । िह भी खखडकी िाल सीट पर जाकर बैठ गई । तभी सामने आनंद आकर खडा हो गया था । अचानक ह सुरेखा के चेहरे पर मुस्कान खेल गई थी । उसने देखा आनंद के हाथों में बैग था । तो तया आनदं साथ जा रहा है? अभी कुछ समझ भी नह ं पाई थी कक तभी उसने कहा “मैंयहााँबैठ जाऊाँ ?” सुरेखा भी यह चाह रह थी कक िो उसके संग बैठे, कफर भी चुहल करते हुए उसने कहा “तयों और कोई जगह नह ं समल तुम्हें ?” िह बगल में बैठता हुआ बोला, “सिाल ह नह ं उठता कक मैंकह ं और बैठूाँ ।” आनंद के कंधे सुरेखा को छू रहे थे । एक अजीब सी ससहरन सुरेखा के अन्दर दौड गई थी । िायद ये उस कच्ची उम्र का पहला अहसास था, जो उसके गालों को सखु ा कर रहा था । पूरे रास्ते आनंद की बातें थीं, चुटकुले थे, गाने थे । सफर कैसे कटा पता ह नह ं चला । सुरेखा के सलए नानी के यहााँ के िो दस ददन क्जन्दगी के सबसे खूबसूरत ददन थे । तकरार, कभी टॉफी, कभी कासमतस की ककताबों के सलए झूठमूठ की लडाई, ससनेमा और ढेर सार बातों के बीच समय कैसे गुजर जाता पता ह नह ं चलता । दस ददनों तक आनंद रहा था िहााँ । जब भी भाभी उसे कहती कक अब तुमको जाना चादहए, तब–तब िो कोई ना कोई बहाना बना ददया करता था । सुरेखा जब पूछती तो कहता, “जब तुम अपने घर जाओगी, तब मैंभी चला जाऊाँगा ।” घर खाल हो गया था । सभी मेहमान जा चुके थे
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 41 कहानी— नेपाल से । सुबह सुरेखा को भी जाना था । आनंद बार–बार उससे अकेले में बात करने का अिसर तलाि कर रहा था । सुरेखा को उसने छत पर आने का इिारा ककया । सुरेखा भी समलना तो चाहती ह थी । िो जब छत पर गई तो आनंद पहले से िहााँ था । सुरेखा को देख कर उसके होंठो पर प्यार सी मुस्कान खखल गई थी । उसने सुरेखा के हाथों को ढेर सार मॉटान टाफी से भर ददया था । “इत्ता सारा, ये सब मेरे सलए ?” “हााँ ! सब तुम्हारे सलए है ।” संजीदा होते हुए आनंद ने कहा “सरु तुम मझु े याद करोगी ?” भरााई हुई आिाज को िह रोकने की कोसिि कर रहा था, ककन्तुआाँखों से धगरते आाँसूको िह नह ं सम्भाल पाया । सुरेखा की बंधी हुई मुट्ठी को आनंद अपने हथेसलयों में कस कर थामे हुए था । मानो िह उस बंधी मुट्ठी के साथ–साथ ितत को भी कै द कर लेना चाहता हो । दोनों अलग हो गए थे । िो रात और आज की इस रात के बीच ना जाने ककतनी रातें, ककतने ददन, ककतने मौसम गुजर गए । न कभी आनंद से दबुारा मुलाकात हुई न ह उसकी कोई खबर समल । िाद के बाद नानी के यहााँ जाने का ससलससला भी लगभग खत्म ह हो गया । चाह कर भी कभी भाभी से उसके बारे में पूछने की दहम्मत नह ं हुई । आज िषों बाद फेसबुक ने उस दबी हसरत को क्जंदा कर ददया था । िह जानना चाहती थी आनंद के बारे में । कहााँ है ? कैसा है ? उसकी िाद ककससे हुई, बच्चे ककतने हैं? पता नह ं कब आाँख लग गई उसकी । सुबह घर के सभी कामों को समेट कर िह मोबाइल लेकर बैठी । ददमाग में अभी भी बस एक ह नाम था ‘आनंद’ । अचानक उसने कमलेि भैया और भाभी का नाम देखा, जो ननिा ने जोड ददया था । िह भाभी के आईडी में जाकर उनके दोस्तों के सलस्ट को देखने लगी । तभी एक नाम पर नजर दटक गई जो आनंद था । ददल एक बार जोर से धडका था । उसने जल्द –जल्द उस प्रोफाइल को खोला । हााँ ये आनंद ह था । िह गहर आाँखें, जो हमेिा बोलती हुई लगती थी । उसने प्रोफाइल स्क्रोल ककया और जो उसने देखा िह अप्रत्यासित था । आनंद के फोटो के साथ ह जो िलद कमेन्ट में थे, उसकी तो कभी कल्पना भी नह ं की थी सुरेखा ने । उसने तार ख देखी जो एक
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 42 कहानी— नेपाल से साल पहले की थी, जब कोरोना का कहर पूरे विश्ि में फैला हुआ था । तया सचमुच आनंद अब नह ं है ? पर कैसे ? बस एक सिाल था सुरेखा के सामने क्जसका जिाब कह ं नह ं था । “ननिा मेरा फेसबुक अकाउंट बंद कर दो ।” “तयों मााँ कल तो इतने उत्साह से तुमने अकाउंट खुलिाया और आज कह रह हो बंद कर दो ।” “काि नह ं खुलिाया होता । एक भ्रम तो बना रहता ।” भरााती हुई आिाज में ननिा ने कहा और गले तक आती कडिाहट को पीती हुई रसोई की तरफ मुड गई । रेडडयो पर गाना आ रहा था, “जीिन के सफर में राह समलते हैं त्रबछड जाने को, और दे जाते हैं यादें तन्हाई में तडपाने को ।” ******************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 43 त्रिज़्बन की ख़ुिबू मि ु खन्ना, ऑस्रेसलया सदल्ली मेंजन्मी मिुखन्ना का सिज़्बन ऑस्रेल्या में सनवाि िै | वे सविेर् सिसिका' के तौर पर बौसिक अिमता व ऑस ़िम केबच्िों को पढातीिैं। बिपन िेसवसभन्नपस्ुतकों , पसत्रकाओं मेंउनकेलेख , किानी, िंस्मरर् इत्यासद प्रकासित ि।ैंऑस्रेलीयन इसंियन रेिीओ पर " बातें मिुकेिाथ " िािासिक कायषिम प्रिाररत करती ि|ैं िपं कष - [email protected] सोचा तो कभी क्जंदगी में ना था कक कंगारुओं के देि जा बसाँूगी। जहााँका अन्न जल सलखा था। बडी- बडी सडकें, हररयाल , खुल हिा । सुंदर लम्बी चौडी सडकें, तेज रफ़्तार से भागती गाडडयााँ। ५० समनट के सफ़र के बाद हम घर पहुाँचे। अभी तो नये घर में कदम ह रखा था। बहुत सदुं र घर था। घूम घूम कर हर कमरा देख रह थी। घर के बाहर देखा कक एक नाल पूर गल तक जा रह थी। थोडी दरू पर गटर भी बने थे। उत्सुकतािि झााँक कर देखा। हे भगिान यहााँ की तो नासलयााँ भी बहुत साफ़ थी। तसल्ल करने के सलये मनैं े खूब झुक कर देखा िाकई नाल बहुत साफ़ थी। नये देि में पहला मह ना तो घर में समान लगाने में ह लग गया। पनत के डॉतटर होने का कुछ तो फ़ायदा हुआ। मेडडकल कम्पनी की तरफ़ से हमें सफ़ाई िाल द गयी थी जो हफ़्ते में एक बार सफ़ाई करने आती थी। मेरे पनत ने मुझे फ़ोन पर बताया कक काम िाल सबुह नौ बजे आएगी । मनैं े कहा ठीक जनाब। सुबह नौ बजे जब घंट बजी तो मनैं े देखा गेट पर एक लम्बी सी सफ़े द गाडी आ कर रुकी है। कौन हो सकता है सोचते हुए मैंबाहर देखने गयी। लम्बी हृर्षटपुर्षट सुंदर सी एक औरत गाडी के बूट से बाल्ट , पोछा (मोप) िैकूयम ननकाल रह थी। हे भगिान…. माई के पास अपनी लम्बी सफ़े द कै मर गाडी भी है। क्जतनी देर िह सफ़ाई करती रह मैं ध्यान से देखती रह कक िह इस विधचि से पोछै से कैसे सफ़ायी कर रह है। आखखरकार मुझे अपने घर के सलये भी तो पोछा खर दना था। पोछे भी विसभन्न विसभन्न प्रकार के थे। ल क्जए अब पोछे के बाद बार आयी कूडदे ान की । मेरे दहसाब से तो नया घर बहुत सुंदर था। भले ह ककराये पर था। आगे खेलने को आाँगन था और पीछे कपडे सुखाने की जगह। िहााँ बडे बडे दो कूडदे ान रखे थे। पनत ने कह रखा था इसी में कूडा डालती रहना। एक ददन मनैं े पूछा – सुनो जमादारनी कब आएगी? कम से कम उस से समलिा तो दो। यह थोडा मुस्कुराए और बोले जमादारनी मंगलिार सुबह ६ से ७ के बीच में आती है। कल मंगलिार है सुबह समल लेना। मनैं े भी सोचा सबुह जल्द उठ
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 44 संस्मरण— ऑस्ट्रेसलया से कर उस से समल लाँूगी। अगल सुबह मैं रसोई में चाय बना रह थी। कमरे से इन की जोर की आिाज आयी – जमादारनी आने िाल होगी जाओ जा कर समल लो कह ं चल ना जाए। मैंभाग कर गयी तो देखा कोई औरत तो ददखलायी नह ं द अलबत्ता घाएाँ घाएाँघुर घुर की बडी तेज आिाज सुनायी द – गल के कोने से एक बडा सा रक अंदर आया और घर के सामने रुक गया। उस में से दो लम्बी लम्बी बाजू बाहर ननकल और उस ने कूडदे ान को उठा कर रक में उल्टा ददया। पीछे पलट तो यह कोने में खडे हाँस रहे थे। तो यह तो थी हमार जमादारनी से मुला़िात। अजब ग़जब की दनुनया हैतया बतलाए तया छोड?े यहााँ एक अच्छे सरकार स्कूल में मेर नौकर लग गयी चलो कम से कम मन को संतुक्र्षट हुई, पढ़ाई सलखाई का कुछ तो फायदा हुआ। दोनों बच्चों का नया स्कूल देखने जाना था। स्कूल त्रबलकुल घर के सामने था स्कूल में जब हम दोनों ने चलना िुरू ककया। बाप रे स्कूल इतना बडा था मानो कोई बहुत बडा मुहल्ला। खैर हर किा में २६ या २८ बच्चे थे। स्कूल के मैदान से एक दहस्सा और दसू रे दहस्से तक तो आदमी का चलते चलते दम ननकल जाये। खेल के मैदान में झूलों के आसपास रबर लगा था ताकी बच्चों को चोट ना लगे। स्कूल में बच्चों का दाखखला हो गया। प्रनतददन सुबह सुबह बडे प्यार से मैंउन के खाने के डलबे में आलू का पराठा बना कर डालती। उन्हें स्कूल छोडने के बाद अपने स्कूल को कूच करती। ददनचयाा बहुत व्यस्त रहती पर रोज बच्चों का खाने का डडलबा जरूर देखती कक उन्होंने खाना खाया है या नह ं। मैंसंतुर्षट थी कक खाने का डडलबा खाल घर आता है। कभी आलू का, कभी नमक अजिैन का। सब कुछ ठीक चल रहा था। मनैं े खास ख़्याल नह ं ककया जब तक कक मेरे बडे बेटे ने हर दसू रे ददन कहना िुरू ककया। मााँ मुझे दो तीन परााँठे खाने को ददया करो। मुझे कुछ िक हुआ। एक ददन जब स्कूल से िावपस आया तो मनैं े उस के खाने के डलबे में ब्रेड सड्ैंविच देखा। पछू ने पर सारा माजरा सामने आया कक जनाब अपना खाना ऑस्रेल यन बच्चों में अदला बदल करते थे तयों कक गोरे बच्चों को हमारा पराठाँ ा बहुत पसंद था। िह उसे १ डॉलर तक देते कक कल और लाना। नये देि की अनोखी बातें। सब कुछ स्िप्न सा प्रतीत हो रहा था। सोचा तो कभी स्िप्न में भी ना था कक दसू रे देि में आना होगा ककंतु ननयनत ले आयी थी। बहुत कुछ सीखना पडता है। कैसे तया खर दना है? लम्बी ़ितारों में से रॉल को ले कर गुजरना, सामान पढ़ना, ़िीमत देखना, सलजी, फल
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 45 संस्मरण— ऑस्ट्रेसलया से ऐसे सजा कर रखते हैंमानो कोई कला प्रदिना ी हो। हर चीज बेहद महाँगी। पूरा हफ़्ता काम में ननकल जाता है। अभी तो घर में सामान रखने में ह दो मह ने लग गये। एक चीज बडी विधचि लगी। जब भी माल में जाती हमेिा माल या सडक पर लडका लडकी हाथ थामें चलते नजर आये। जिान हों या बूढ़े, भले ह पााँि कब्र में हों बस हाथ जरूर थाम कर चलते। पहले तो कभी मन में ऐसी भािना ना आयी पर मनुर्षय हूाँ बहते भािो को कौन रोक सका है। तया मेरे पनत मुझे िास्ति में प्यार करते हैं? इन्होंने तो आज तक मेरा हाथ पकड कर सैर नह ं की। कह ं ना कह ं मन कंुदठत रहने लगा। संयुतत पररिार में रहते हुये सदा एक दहचकचाहट सी रह ककंतुविदेि के उन्मुतत िातािरण में यह बात बहुत चुभती आखखरकार भाग कर तो आयी नह ं। उन की धरमपत्नी हूाँ कफर हाथ पकडना तो बहुत बडी विधा नह ं हैजो बतानी पडगे ी। बच्चे भी सब कुछ देखते हैं। एक ददन बडा बेटा जो सातिीं किा में पढ़ता था उस ने पूछ ह सलया – “ तया पापा आप को प्रेम नह ं करते”? यह सुन कर मुख खुला का खुला ह रह गया। बच्चा दोस्तों के घर जाता था िह ं दसू रे दोस्तों के मााँ बाप को सहज रूप से सोफ़े पर बैठते देखता होगा। समस्या कुछ अजीब सी लग रह थी। हमारे यहााँतो साथ में बैठना तो दरू भारतीय पनत अपनी पत्नी से एक ककलोमीटर आगे ह चलता नजर आता है। अब हम ने भी ठान सलया था। अगल बार बाजार जाएाँगे तो हम भी हाथ पकड कर ह चलेंगे। अब हमें कोई युगल जोडी हाथ पकडे नजर आती तो हमारा माँुह उतर जाता। हम मन ह मन दखु ी होते पर इन को कुछ कह ना पाते। उन ददनों की बात है हमारे पास गाडी एक ह थी। जब छुट्ट होती तब हम समल कर सलजी भाजी लेने बाजार जाते। माल बहुत ह बडा और लम्बा था। थोडी थोडी दरू पर बीच में बैठने के सलये सोफ़ा रखा था। हमेिा की तरह हम दोनों चल रहे थे। आदतन यह हमेिा की तरह बहुत आगे चल रहे थे और मैंपीछे पीछे। हम से तो यह व्यथा सह ना गयी। यह चलते ह चले गये और मैंक्रोध से भर िह ं बीच रखे सोफ़े पर बैठ गयी। दरू जाते इन्हें देखती रह और कुछ पल बाद देखा कक यह बदहिासा घबराये हुये भागे आ रहे थे। तुम यहााँ तयों बैठी हो? मैंतो घबरा गया था। कह ं तुम खो जाती तो ? उन के चेहरे का एक रंग आ रहा था एक रंग जा रहा था। अब मुझे इन का हाथ पकडने की जरूरत ना थी। मैंइन के हृदय में जो बसी थी। मैं मुस्कुराती हुई उठी और इन के साथ चल पडी। इस क़िस्म के अनधगनत क़िस्सों से भर हैं हमार बातें। सफ़र जार रहेगा। क्जंदगी भी कभी रुकती है जनाब। कफर समलेगें। ****************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 46 िॉ. वस ु त्थफोंग थसवलिमबत , थाईलिैं थाईलैंि के सिल्पकोर्ष सवश्वसवद्यालय िे िंस्कृत मेंपीएििी करने वाली वसुत्थफोंग थसवलिमबत वतषमान मेंसिल्पकोर्षसवश्वसवद्यालय मेंप्राध्यापक केपद पर कायषरत िैं| वेसििर् को रोिक बनानेकेसवसवि प्रयाि कर रिीिैं| िपं कष - [email protected] दह िंदी सिक्षण का अनुभव मैं िुक्त्थफोंग थविलसमबत हूाँ । आजकल मैं सिल्पाकर विश्िविद्यालय में दहदं ससखाती हूाँ । भारत से एम.ए. दहंद करने के बाद 2014 से मेरा दहंद सििण प्रारंभ हुआ है । पहल बार मनैं े सिल्पाकर विश्िविद्यालय में दहदं ससखाई उसके बाद चुलालंकर विश्िविद्यालय के साथ-साथ पीत्रबक में दहदं ससखाने का मूल्यिान मौका समला । कहा जा सकता है कक मैंकर ब नौ सालों से दहंद का प्रचार-प्रसार और दहदं की सेिा कर रह हूाँ । मैं दहदं के विसभन्न विषय ससखाती हूाँ जैसे दहदं व्याकरण, दहदं िाताालाप, दहदं लेखन, दहदं अनुिाद, पयाटन और व्यापाररक दहंद , सामाक्जक-सांस्कृनतक दहदं आदद । मैं हमेिा अपने सिर्षयों के सलए महत्िपूणा और उधचत पाठ, अभ्यास और अनेक गनतविधधयााँ भी आयोक्जत करती हूाँ । ये बहुत सार चीजें मेरे सिर्षयों के सलए दहदं सीखने में सहायता करती हैंऔर िे बेहतर ढंग से दहदं समझ सकते हैं । उदाहरण के सलए, पयाटन और व्यापाररक दहंद । आजकल भारत-थाईलडैं में पयटा न एिं व्यापार एक साथ विकससत हो रहा है | इससलए इस विषय में सीखने और ससखाने की जरूरत है | इस विषय में मेरे सिर्षय भारत-थाईलैंड से संबंधधत व्यापार और पयाटन जैसे पाररभावषक िलदािल , पयाटन स्थान, पयाटन लेखन, पयटा न गाइड, विज्ञापन, बकैंकंग आदद सीखते हैं | वििषे रूप से दोनों देिों की सामाक्जकसांस्कृनतक अिधारणा का विश्लेषण भी अननिाया है | इससलए सभी सिर्षय िेि काया (field work) के रूप में बाहुरत या ककसी भारतीय समुदाय में जाते हैं| इस िेिकाया में मेरे सिर्षयों को भारतीय लोगों का सािात्कार करके किा के सामने प्रस्तुत करना पडता है | िे दहंद भावषक िमता या भाषा के कै िलों का विकास कर सकते हैंऔर िेि काया करके प्रभावित होकर दोनों देिों का तुलनात्मक रूप से विचार कर सकते हैं| उसके साथ मेरे सिर्षय पयटा न स्थान के बारे में एक दहदं ननबंध स्ियं सलखते हैं । िे एक कोई पसंद दा पयटा न स्थान चुनकर ननबंध सलखते हैंऔर किा के
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 47 सामने ऑनलाइन के माध्यम से अपने पयाटन स्थान प्रस्तुत करते हैं। दसू रा उदाहरण, सामाक्जक-सांस्कृनतक दहदं । इस विषय में मैंअपने सिर्षयों को भारतीय संस्कृनत के बारे में ससखाती हूाँ । मेरे सिर्षय दहदं सामाक्जकसांस्कृनतक पाठ पढ़कर उन पाठों के विषय पर संक्षिप्त दटप्पणी करते हैंजैसे भारत का भौगोसलक पररचय, भारत के राज्य, भारत के नत्ृय, भारत के त्योहार, भारतीय भाषाएाँ आदद । मेरे सिर्षय यह विषय सीखते हुए अभ्यास करते हैं । िे भारतीय भाषाओं के बारे में सीखकर अभ्यास करते हैं जैसे मनैं े संदेि के रूप में प्रश्न ददया कक “यह भाषा बहुत मीठी भाषा है । रिींद्रनाथ टैगोर इस भाषा के कवि और लेखक थे । उन्हें संसार का सबसे सम्माननत नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था” यह कौन-सी भाषा है । मेरे सिर्षय ने उत्तर सलखा कक “यह बांग्ला है” तो सह है । देखा जा सकता है कक अभ्यास करने से सब लोग भारतीय भाषाओं के बारे में आसानी से समझ सकते हैं। वििषे रूप से जब हमार दनुनया में कोरोना िायरस महामार होने के कारण सब लोगों को ऑनलाइन के माध्यम से काम करना है । जैसा कक मनैं े गूगल फ़ॉमा के रूप में मेरे सिर्षयों को अभ्यास कराया जो बहुत उपयोगी और आसान है । इसके अलािा मेरे सिर्षयों ने भारतीय िास्िीय एिं लोक नत्ृय के बारे में अनुसंधान ककया कफर उन्होंने किा के सामने अपने काम को प्रस्तुत ककया । इस विषय से मेरे सिर्षयों को अधधक ज्ञान समला है कक भारत विविधता का देि है । भारत में क्जतने विविध धमा हैंउतनी ह विविध भाषाएाँ एिं सस्ं कृनतयााँ हैं। इससलए कहते हैंकक भारतीय संस्कृनत में अनेकता में एकता है । अंनतम उदाहरण, दहदं अनुिाद । इस विषय में मैं अपने सिर्षयों को दहदं पाठ लगातार देती हूाँ कफर मेरे सिर्षय उस पाठ का विश्लेषण के साथ थाई में अनुिाद करते हैं । हम देख सकते हैं कक अनुिाद बहुत मुक्श्कल है । मेरे सिर्षयों को अनुिाद करते समय अलग-अलग समस्याएाँ उत्पन्न होती हैं । हमने अनुिाद के बारे में एक विचार प्राप्त हुआ है कक अनुिाद की तीन समस्याएाँ होती हैं पहल समस्या 1) भाषा की समस्या, दसू र 2) सामाक्जकसांस्कृनतक समस्या और तीसर 3) पाठ प्रकृनत की समस्या । स्पर्षट कह सकते हैंकक प्रत्येक भाषा में व्याकरण और संरचना का भी अंतर है । इसके साथसाथ विसभन्न पाठ में विसभन्न भाषा की िलै , पाररभावषक िलदािल , मुहािरे-लोकोक्ततयााँ होते हैं। विसभन्न देिों की संस्कृनत में भी अंतर हैं| प्रत्येक भाषा की विसिर्षट िलदािल होती है | जैसे हर देि का अलग-अलग खान-पान होता है और उनका भी प्रनतस्थापन करना असंभि हो जाता है | इससलए अनुिाद एक चुनौती का काम है । अतः मेरा विचार है कक मुझे अपने सिर्षयों को बहुत अभ्यास देने चादहए और दहंद व्याकरण के साथ सामाक्जकसांस्कृनतक समझ भी ससखाने की जरूरत है । आलेख — थाईलैंड से
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 48 आलेख — थाईलैंड से सभी उदाहरणों से मैंकहना चाहती हूाँ कक दहदं सििण में हमको अपने सिर्षयों का ननर िण करना चादहए और उनके सलए अच्छा और उपयुतत सििण देने की कोसिि करनी है । हम न केिल दहदं व्याकरण, दहदं िाताालाप ि दहदं के ससद्धांत ससखाते हैंलेककन सादहत्य और भारतीय संस्कृनत भी ससखाते हैं। हम दहंद की सभी जानकार नह ं ससखा पाते लेककन हम उनके दहदं रास्ते का मागदा िका बन सकते हैं। अंत में, मैंददल से कुछ कहना चाहती हूाँ कक हालााँकक कभी-कभी थाईलैंड की सििा व्यिस्था दहंद अध्ययनअध्यापन को बेहतर बनाने और प्रोत्सादहत करने की सहायता नह ं कर पाती होगी । पर हमारे सिर्षय सबसे महत्िपूणा हैं । इससलए मैंअपने दहदं सिर्षयों के साथ में सदैि रहूाँगी, ससखाऊाँगी और दहदं सििण का विकास करूाँगी । जय दहंद । जय दहंद । ***********
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 49 उम्मीदों के घोंसले िॉ प्रदीप उपाध्याय , भारत झाबआु मध्यप्रदेि में जन्में िॉ.प्रदीप उपाध्याय वर्ष 1975 िेलेखन में िसिय िैं। दिे केप्रमखु िमािार पत्र-पसत्रकाओंमेंकिानी,लघकु था,कसवताए,ँव्यंग्य आलेख तथा सवसभन्न िामासजक,राजनीसतक सवर्यों पर उनकेआलेख एवंिोिपत्र प्रकासित िुए ि।ैंिासित्य िजृ न केसलएउन्िेंसवसभन्न परुस्कारों िेअलंकृत सकया गया िै| िपं कष - [email protected] "तया अभी भी आपको कोई उम्मीद है!अब इस तरह रोजाना आकर यहााँ बैठने का तया मतलब है!" "सररता,अब तो मैंभी ननराि हो गया हूाँ। हााँ,जब तक इस घर को पूर तरह से जमींदोज नह ं ककया गया था तब तक तो उम्मीद का ददया दटमदटमाता रहा लेककन आज…!" "हााँ,आज आाँसुओं के ससिाय कुछ भी नह ं। तब उम्मीदें थीं, हसरतें थीं तो सपने भी थे और अपने भी। अब तो रूदन के ससिाय कुछ भी नह ं।" "सच कह रह हो,िायद हमने ह जरूरत से ज़्यादा उम्मीदें पाल रखी थीं। देखो,हमने ककतनी उम्मीदों से यह मकान बनाया था। तया उस समय प्लाट खर दना एक नौकर पेिा व्यक्तत के सलए इतना आसान था! सीसमत आय में मकान बनाना और बकैं से ऋण लेना ककतना कदठन था। कफर भी हमने िहर से दरू होने के बाद भी बडा प्लाट इसीसलए खर दा था कक दोनों बेटों के सलए अलग-अलग पोिना बना देंगे ताकक भविर्षय में दोनों के बीच कोई खट-पट भी हुई तो दोनों अलग रहकर भी साथ ह रहेंगे।" "हााँ,तब बच्चों ने विरोध ककया था कक इतनी दरू और िहर से बाहर प्लाट खर दने का तया मतलब हैऔर तब मनैं े भी उन्ह ं का समथना ककया था।" "लेककन तब मनैं े कहा था कक चलो आज न सह , कुछ सालों के बाद ह सह , यहााँ बस्ती हो जाएगी। और आज देखो, यह कॉलोनी िहर के बीचोंबीच आ गई है, आस-पास अच्छा-खासा बाजार भी विकससत हो गया है, जरूर सामान के सलए कह ं दरू जाने की जरूरत ह नह ं। यह ं सब कुछ समलने लगा है। पास में ह मॉल भी खुल गया है। यहााँ प्रापटी के दाम भी तो ककतने बढ़ गए हैं। यह िेि िहर की पॉि कॉलोनी में िमु ार हो गया है ककन्तुइंसान जो सोचता है,सब उसी के अनुसार कहााँहो पाता है।" "िाकई,हमने सोचा तया था और तया हमारे सामने आया। हमारे सपने भी तो धरािाई हो कर रह गए थे।"