अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 50 कहानी — भारत से "ठीक कहती हो सररता। लोगों ने मुझे समझाया भी था कक ददनकर, तयों अपनी सुख की जान दखु में डाल रहे हो। भविर्षय ककसने देखा है। कल के सुख के सलए अपना ितमा ान धगरिी रख देना, कहााँ की समझदार है। लेककन कफर भी मुझे भरोसा था कक मैंसभी को जोड कर रख सकाँूगा। अपने ददए गए संस्कार बच्चों को बांधकर रखेंगे।" "हााँ,जब हमने मकान बनिाया था तब द पक और मनोज ने समलकर ककतने उत्साह से काम करिाया था। आप तो अपनी नौकर पर चले जाते थे लेककन द पक और मनोज ने अपनी पढ़ाई पूर करते हुए मकान पूरा होने तक पूरा-पूरा ध्यान रखा। द िारों की तराई की बात हो या छत की, दोनों समलकर लगे रहते थे बक्ल्क अपनी पढ़ाई भी िह ं करते थे ताकक देखरेख अच्छी तरह से हो सके ।" "उनका यह उत्साह और उमंग मुझे प्रेररत करता रहा और हैससयत न होने के बािजूद अपनी जमा-पाँूजी के अलािा भार कजा लेकर मकान तैयार करिाया था,यह सोचकर कक बच्चों को भविर्षय में संघषा ना करना पड।े क्जस तरह की जद्दोजहद भर क्जन्दगी हमें जीना पडी, बच्चों पर उसका साया भी ना पड।े" "सह है, आपने बच्चों को ककसी तरह की कमी भी तो महसूस नह ं होने द । मुझे मालूम है कक कजा उतारने के सलए आपने अपनी नौकर के अलािा पाटा टाइम जॉब भी ककया था। नौकर में भी आपकी ईमानदार के चचे थे। आपको तो अपनी नौकर में ह दो नम्बर का पैसा कमाने के बहुत अिसर थे लेककन आप अपने ससद्धांतों से कहााँ समझौता करते थे।" "इसीसलए तो लोग इज्जत करते थे। बेईमानों की तब कहााँइज्जत हुआ करती थी। खैर, आज समय बदल गया है । चलो अच्छा है कक अब हमें इनका सामना नह ं करना पडता है।" "इस मकान से इसी कारण मोह-माया कुछ अधधक हो गई थी। िास्तु पूजन कर ह तो हमने घर में प्रिेि ककया था लेककन तया खबर थी कक हमार कोई ननिानी ह यहााँ िेष नह ं रहेगी।" सररता ने रैतटर में भरे जा रहे मलिे में 'ददनकर ननिास' सलखे टूटे पत्थर पर ननगाह डालते हुए कहा। "सररता, अफसोस इस बात का नह ं है कक यहााँ अब कुछ नह ं बचा। अफसोस है तो इस बात का कक हमने इतनी उम्मीद ह तयों रखी ।" "हमारा ददल तो द पक ने तभी तोड ददया था जब द पक ने अपने दोनों बच्चों की पढ़ाई के नाम पर इंदौर सिफ्ट होने की बात कह थी। िुरू के बारह-पन्द्रह िषा तो समलजुल कर अच्छे गुजरे थे लेककन जब
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 51 कहानी — भारत से द पक ने इंदौर जाने की बात कह तो बडा आघात लगा था। हमें कभी लगा ह नह ं था कक भविर्षय में दोनों अलग हो जाएाँगे। िायद मनोज की िाद के बाद से ह िे लोग आपस में एडजस्ट नह ं कर पा रहे थे। दोनों बहुएं अधधक स्ितंिता चाह रह थीं या हो सकता है कक हम पुराने खयालात के रहे, इस कारण हमने ऐसी धारणा बना ल थी।" " िायद तुम सह कह रह हो। आज की पीढ़ अधधक फ्रीडम चाहती है और उन्हें अपने कामों में अधधक दखल पसंद भी नह ं। लगता है कक आज की पीढ़ अधधक पढ़ -सलखी होने के कारण स्ियं ननणया लेने में सिम हो गई है। मुझे लगा था कक द पक बच्चों की पढ़ाई के बाद िायद लौट आएगा लेककन जब उसने अपना दहस्सा मााँगा और इंदौर में अपना मकान बना सलया तो मेरा ददल टूट गया था। इसी कारण मेर तबीयत त्रबगडती चल गई और मुझे हाटा अटैक भी आ गया था।" "हााँ, मैं आपकी क्स्थनत समझ रह थी लेककन तया ककया जा सकता था। कोई कुछ समझने को तैयार नह ं था। बच्चे कह रहे थे कक हम उनकी पररक्स्थनतयों को नह ं समझ रहे हैंऔर हम कह रहे थे कक िे हमार भािनाओं को नह ं समझ पा रहे हैं।" "मनोज ने भी ककतनी िीघ्रता की थी। मकान की कीमत ननकालकर आधी कीमत द पक को देकर मकान अपने नाम करिा सलया था। मनोज ने बकैं से लोन लेकर द पक के दहस्से का पैसा चुकाया था, इसी कारण मनोज के नाम मकान करने की मनैं े सहमनत दे द थी।" "आप उस समय तो पूर तरह से टूट गए थे जब मनोज ने अपनी एकमाि बेट के साथ मुंबई सिफ्ट होने की बात कह थी। मनोज अपने ससुर के त्रबजनेस में हाथ बाँटाने के सलए मुंबई जा रहा था और द पक िापस आना नह ं चाह रहा था। इसी सदमे में तो तुम सोए के सोए रह गए थे।" "हााँ, मुझे िह घडी याद है। मैंतुम्हें इस तरह अके ले छोड कर जाना तो नह ं चाहता था लेककन मेरा मन और िर र दोनों ह साथ छोड रहे थे। मुझे तुम्हार धचतं ा अलग सताए जा रह थी लेककन कुछ भी अपने िि में कहााँ रहता है। ईश्िर की मजी के आगे तो हाथ टेकना ह पडते हैं।" "आप साथ छोड गए थे, तब सभी कक्रयाकमा पूरे होने के बाद द पक मुझे अपने साथ इंदौर ले गया था। इसके पूिा दोनों भाईयों में बहुत लडाई झगडा भी हुआ था। उनकी बातों से लगा था कक द पक बेमन से मुझे इंदौर लेकर जा रहा था। मनैं े भी मनोज के साथ मुंबई जाने से इंकार कर ददया था। िह अपने ससुराल में जो रह रहा
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 52 कहानी — भारत से था,भला मैंिहााँकैसे ननभा सकती थी।" "तभी तो तमु ने िहााँ द पक के यहााँ भी ज़्यादा ददन रूकना ठीक नह ं समझा… साल भर भी पूरा नह ं हुआ और तुम मेरे पास दौडी चल आई।"ददनकर ने हाँसते हुए माहौल को बदलने के सलहाज से कहा। "चलो छोडो इन बातों को। अब तो हमें यहााँ से चल देना चादहए।" "हााँ सररता, पहले जब मनोज मकान को डडस्मेंटल करिा रहा था, तब मुझे लगा था कक िायद अब िह यहााँ नया मकान बनाना चाह रहा है लेककन आज जब मालूम पडा कक मकान को जमींदोज कर उसने प्लाट बेच ददया है तो अब यहााँ से माया-मोह खत्म सा हो गया।" "हम लोग नाहक ह उम्मीदें संजोए बैठे थे। और िायद इसीसलए हमें अभी तक मुक्तत नह ं समल पा रह थी।" "सह कह रह हो सररता। इंसान भी अपने और अपने बच्चों के भविर्षय की खानतर अपना ितामान त्रबगाड कर रख देता है। हमें अपने बच्चों को पढ़ा सलखा कर इस योग्य बना देना चादहए कक िे अपने पैरों पर खडे हो सकें। भविर्षय में तया होगा, यह समय पर छोड देना चादहए। धचडडया भी भविर्षय के सलए कभी घोंसले नह ं बनाती। हम यह गलती कर बैठते हैं। उम्मीदों के घोंसले ददा देते हैं। इसीसलए भविर्षय का ननधाारण हमें नह ं करना चादहए और यह गलती हम कर बैठे। चलो जो हुआ सो हुआ। हमें अपनी ग़लती का अहसास कराने और माया-मोह से दरू होने के सलए ह िायद यह सब हुआ है और इसी से हमार मुक्तत का मागा प्रिस्त हुआ।" "हााँ सह कह रहे हैंआप,चलो अब अपने संसार की ओर ह लौट चलते हैं।" और दोनों पंछी प्लाट के सामने खडे नीम के पेड को छोडकर नीले गगन की ओर उड गए। *****************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 53 समयकाल के िलते मुहावरों में िब्दों के बदलते स्वरूप गोविनष दाि सबन्नार्ी 'राजा बाब' ू, भारत बीकानेर सनवािी गोविषन जीपेिेिेसवत्तीय िेत्र िेजडुेरिेिैं| बिपन िेइनका रुझान िासित्य लेखन व भार्ा केप्रसत िमसपषत रिािै| सभन्न पत्र-पसत्रकाओंमेंिमय-िमय पर इनकेलेख प्रकासित िोतेरितेिैं| िपं कष- [email protected] जैसा हम सभी जानते हैंकक वििेष अथा प्रकट करने िाले िातयांि को ह हम सभी 'मुहािरा' कहते हैं। हालााँकक 'मुहािरा' िलद अरबी भाषा से सलया गया है लेककन ‘मुहािरे’ का पूणा पयाायिाची प्रचलन में है ह नह ं । यह सिाविददत है कक भाषा को सुदृढ़, गनतिील और रुधचकर बनाने में मुहािरा एक सितत माध्यम है। लेककन महत्िपूणा त्य यह भी है कक 'मुहािरा' अपने आप में पूणा िातय नह ं होता, इसीसलए हम इसका स्ितंि रूप से प्रयोग नह ं कर पाते हैं। जबकक मुहािरे का ठीक अथा समझ, सह प्रयोग रचना को न के िल सजीि बक्ल्क प्रिाहपूणा एिं आकषका बनाने में एक महत्िपूणा भूसमका ननभाता है। ककसी घटना वििषे के सारांि को एक िातय में इस तरह प्रकट कर देना क्जससे सुनने िाले को या पढ़ने िाले को उस िातयांि से अथा समझ में आ जाय यह मुहािरे की वििेषता होती है। लेककन मुहािरे के िलदों में पररितान या उलटफे र अनुभि-तत्ि को नर्षट कर देता है। इसी त्य पर आपका ध्यान आकवषता कर यह बताना चाहता हूाँ कक हम आज जो मुहािरे प्रयोग में पाते हैंउनमें से कुछ मुहािरे अपने असल रूप में नह ं हैं बक्ल्क समयकाल के चलते ये अपभ्रंि यानी त्रबगडते-त्रबगडते त्रबगडे रूप में ह प्रचलन में हैं । इसी त्य को स्पर्षट करने हेतुयहााँकुछ उदाहरण आपके समि रख रहा हूाँ -- एक मुहािरा सुनने में आता है - "अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलिान"। अब सिाल उठता है कक पहलिानी से गधे का तया िास्ता। खोजने पर पता चला कक दरअसल, मूल मुहािरे में गधा नह ं गदा िलद था। चाँूकक फारसी में गदा का अथा होता है सभखार जबकक दहन्द में हम गदा एक अस्ि के सलये प्रयोग करते हैं। चाँूकक आम लोग फारसी के गदा िलद से पररधचत नह ं थे इससलये कालांतर में गदा िलद के बदले गधा िलद प्रचलन
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 54 आलेख— भारत से में आ गया । मूल मुहिारे का अथाानुसार अल्लाह की मेहरबानी हो तो सभखार भी ताकतिर हो जाता है । इसी तरह आपने यह भी सुना होगा - 'ककस्मत मेहरबान तो गधा पहलिान' । यहााँ भी फारसी के गदा िलद से पररधचत नह ं होने के चलते कालांतर में गदा िलद के बदले गधा िलद प्रचलन में आया । यहााँ भी मूल मुहिारे का अथाानुसार ककस्मत मेहरबान हो तो सभखार भी पहलिान हो जाता है । इसी क्रम में एक दसू रा मुहािरा लेते है - "अतल बडी या भसैं "। अब यहााँ भी यह सिाल उठता है कक अतल से भसैं का तया ररश्ता। खोजने पर पता चला कक दरअसल, मूल मुहािरे में भसैं नह ं ियस िलद था अथाात मूल मुहािरा था "अतल बडी या ियस"। चाँूकक ियस का अथा होता है उम्र इससलये मुहािरे का अथा था अतल बडी या उम्र। लेककन यहााँ उच्चारण दोष के कारण ियस िलद पहले पहले िैस बना कफर कालान्तर में बदल कर भसैं बन प्रचलन में आ गया । आपके ध्याननाथा बता दाँूकक इसी ियस िलद से बना है ियस्क। इसी क्रम में एक अन्य मुहािरा लेते है - "धोबी का क ु त्ता न घर का न घाट का" । अब जब हम विचार करते है तब पाते हैंकक यदद ककसी धोबी ने कोई कुत्ता पाला है तो बेचारा कुत्ता धोबी के साथ घर में भी रहता है और घाट पर भी जाता है। तब िोध करने पर पता चला कक मूल मुहािरे में कुत्ता नह ं कुतका िलद है। लकडी की खूटाँ क्जस पर कपडे लटकाए जाते हैंको संिेप में कुतका कह कर पुकारते हैं। चाँूकक िह लकडी की खूटाँ घर के बाहर लगी होती है इससलये गंदे कपडे उस पर लटका देते थे और धोबी उस कुतके से गंदे कपडे उठाकर घाट पर ले जाता और धोने के बाद धुले कपडे उसी कुतके पर टााँगकर चला जाता। इससलये ह 'धोबी का कुतका ना घर का ना घाट का' मुहािरा बना । लेककन यहााँ भी कालांतर में कुतका िलद के बदले कुत्ता िलद प्रचलन में आ गया । अन्त में यह बताना चाहता हूाँ कक एक रचनाकार को संिेप में प्रभाििाल तर के से भाि प्रगट करने में मुहािरे बहुत ह सहायक होते हैं और सह मुहािरे का चयन तो रचनाकार की लेखनी में चार चााँद लगा देता है । **************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 55 "वो बरगद का पेड़" राजेि पाण्िेय, भारत सबिार मेंिीवान केरिनेवालेराजेि पाण्िेय मिात्मा गांिी केंद्रीय सवश्वसवद्यालय,मोसतिारी में िोिाथी िैं| िपं कष- [email protected] समय के साथ चीजें बदलती हैंआज चौराहे की िह पूर तस्िीर ह बदल गई है। रेलिे फाटक को नह ं रखने का प्रस्ताि ददल्ल से आ गया है। रेल गाडडयों को आने जाने में कोई परेिानी ना हो,इसके सलए ओिरत्रब्रज बनने का काया प्रारंभ हो गया है। इन सभी के बीच में एक परुाना बरगद का पेड है। दगु ाा बाबा जब तक जीवित थे तब तक बरगद के साथ लोगों की भी सेिा ककया करते थे। विकास के नाम पर बरगद का पेड उखाड ददया गया, उसकी जगह त्रबजल का रांसफामार लगा ददया गया है। जनता को जो चौबीस घंटे त्रबजल देने का िादा है। कहा जा रहा है कक पेड सरकार जमीन पर था,इससलए उखाड ददया गया है। फाटक के ऊपर से अब ओिर त्रब्रज बना ददया गया है। अब कोई सिार दगु ाा बाबा के दकु ान के सामने बरगद छांि में नह ं रुकती है। बाबा भी अब काल किसलत हो गए ,लेककन उनकी यादें अभी भी बरबस ताजा हो जाती है। क्जस तरह के यािी आए, तत्काल न समय में सेिा उपललध रहती थी। बैलगाडी अतसर दकु ान पर रूक जाया करती थी, गाडीिान बैलों को पानी वपलाता स्ियं सत्तू खाता, थोडा सुस्ता कर अपने गंतव्य स्थान की ओर चल देता। देर रात अधं ेरे में स्टेिन से उतरे यािी भी दगु ाा बाबा के झोपडीनुमा धमिा ाला में िरण लेते और पौ फटते ह अपने गांि की ओर चले जाते। जाडे की रात में ससनेमा देखकर देर रात लौटे युिक बरगद के पेड के नीचे सुलग रहे अलाि के सहारे पूस की रात काट लेते थे। सचमुच सब कुछ बदल गया है, ना ह दगु ाा बाबा रहे और ना ह िह बरगद का पेड, कभी कभार बैलगाडी ददख जाया करती हैपर अब िह यहााँरुका नह ं करती, बाबा की झोपडीनुमा धमिा ाला भी उनके लडकों द्िारा
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 56 लघुकथा— भारत से अपने पररिार के विकास की खानतर तोड डाल गई। सुदरू यािा से लौटे यािी भी देर रात तक स्टेिन पर ह रात गुजारने के सलए वििि होते हैं। युिक भी देर रात ससनेमा नह ं देखा करते अब मोबाइल इंटरनेट जो आ गया है,सबकुछ उनके हाथों मैं आ गया है। बहरहाल गााँि की एक तस्िीर िहर से सटे रेलिे फाटक के समीप देखने को समलती थी। उसे नगर सभ्यता ने ननगल सलया है। सब कुछ पैसे से प्राप्त करने की प्रिनृत में समाज भागता चला जा रहा है,प्रकृनत से दरू होता जा रहा है। ****************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 57 पुस्तक समीक्षा *ददष का िंदन* ददा जब चंदन बन जाये, ददा जब जीने का हौसला बन जाये, ददा जब जीने की िजह दे जाए, ददा जब कलम की स्याह बन जाये, तब सामने आती हैजो पुस्तक िह औरों के सलए प्रेरणा लेकर आती है। ऐसी ह पुस्तक हैडॉ. उषा ककरण की ` ददा का चंदन ‘ जो कक एक आत्मक्यात्मक उपन्यास है। जीिन के विसभन्न पडाि, सभन्न-सभन्न पररक्स्थनतयााँ, भाई के सलए असीम प्रेम ,असाध्य रोग से संघषा करते हुए आस्था के बल के सहारे दहम्मत बनाए रखना, जीिन के प्रनत दािाननक दृक्र्षटकोण और जाने ककतना कुछ है क्जन्हें कलमबद्ध कर पुस्तक का रूप देने का हौसला भी एक समसाल है और यह समसाल कायम की हैडॉ. उषा ककरण ने। पुस्तक समवपता की गई है परलोकिासी छोटे भाई को जो कक बडी बहन के सलए ककतना कदठन रहा होगा। स्ियम ्लेखखका द्िारा धचत्रित लुभािने मुखपर्षृठ पर मौन साधधका पािनता का संदेि देती धचत्रित हैं, मानो कहना चाह रह हो कक ददा जब तूसलका थाम ले तो भी सौंदया का ह धचिांकन करेगा…ददा जब चंदन बन जाये तो िह खुिबूह त्रबखेरेगा। लेखखका िह धचिांकन अपनी तूसलका से करके उस भाि को समादहत करने में पूर तरह से सफल रह हैं। धचिकला और िलदकला की अद्भुत स्िासमनी उषा ककरण ने यह पुस्तक सलख कर विपर त पररक्स्थनतयों से सकारात्मक रूप से लडने का सन्देि ददया है। मत्ृयु अंनतम सत्य है , िहााँ तक का सफर सभी को तय करना है। ककसने कैसे तय ककया यह अधधक महत्िपूणा है। 23 अध्यायों में बाँट इस पस्ुतक के प्रत्येक अध्याय का प्रारम्भ एक भािपूणा कविता के माध्यम से ककया गया है। पुस्तक में लेखखका ने बडी ह सादगी से अपने घर, अपने वपता, अपने पररिार की सौम्यता, राजसी ऋता िखे र 'मि' ु , भारत प ना मेंजन्मीं ऋता िेखर 'मि'ुसबिार िरकार मेंििायक सिसिका केपद िेिेवासनवत्तृ ि|ैंवे िाइकु, िाइगा, ताँका, िोका, िेदोका, कसवता, छंद, ग़़िल,लघकु था, किानी, आलेख आसद सभन्न सविाओंमेंसलखती ि|ैंउनकी सवसभन्न सविाओंकी िात एकल पस्ुतकेंप्रकासित ि|ैंउनके कई ब्लॉग्ि िैं-(मिरुगँजुन),(सिदं ी िाइगा),(िाइकुिी िाइकु)| िैं। िपं कष- [email protected]
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 58 पुस्तक समीक्षा — भारत से रहन-सहन, अनुिासन का िणना ककया है। वपता क्जन्हें लेखखका ताताजी कहती हैं, सिकार और बागिानी के िौकीन थे। तरह-तरह के ििृ ों के नाम लुभािने लगे। मायका अपने आप में एक लडकी का संसार होता है, जहााँ िह धचडडयों सी फुदक सकती है, उडान भर सकती है। िहााँजब प्रकृनत को भी संरिण समला हो और स्नेह माता- वपता की िीतल छााँि हो तो लेखखका को बार- बार उधर जाने का सम्मोहन भी स्िाभाविक है। वििाह के बाद पररिार बसाने के क्रम में नौकर लग जाने से आई परेिाननयों को बताया गया है जो इतना सहज स्िाभाविक है कक पाठक को जुडाि महसूस होने लगेगा। लेखखका ने बताया है कक ककस तरह बचपन से ह अन्तमुखा ी स्िभाि ने उनको धचिों एिं लेखन के साथ जोड सलया। समय के गुजरने के साथ बदलाि आते रहते हैं। जो मकान चहकते पररिार के साथ आकषाक लगता है िह कफर उनके न रहने से अपनी आभा खो बैठता है, ननर्षप्राण हो जाता है। लेखखका की यह बात मन के अंदर घर कर गयी। बचपन के खेल खखलौने, गड्ुडेगुडडया, कक्रकेट, पतंग, कं चे, धगल्ल -डंडा आदद का क्जक्र एक बार पाठकों को भी उनके अपने बचपन की सैर करा लाएगा। उम्र बढ़ने के साथ बीमाररयों का आ जाना-जाना दखु दायक है। क्जनके साथ जीिन के द:ुख-सुख साझा
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 59 पुस्तक समीक्षा — भारत से रहते हैं, जो वपता-भाई सदा साथ खडे समलते हैं,उनका अचानक से असाध्य बीमार से नघर जाना मन को कचोट गया। क्जंदगी के पन्ने आगे बढ़े। उसी क्रम में मुसीबत भरे पलों में मुझे ये पंक्ततयााँसाहसपूणा लगीं, जब मन में प्रश्न आया कक मुझे ह तयों ? उसके बाद सारे ररश्तेदारों में स्ियं को समथा समझकर ईश्िर की इच्छा के आगे नतमस्तक हो जाना, उन्हें विसिर्षट बना गया। दाम्पत्य-जीिन के सुखद ददनों के सलए भी मान सरोिर की राजहाँससनी जैसा खूबसरूत सा रूपक रच देने का कौिल अद्भुत लगा। यह पुस्तक कैंसर जैसी घातक बीमार ि उससे लडने िालों की माि मनोदिा ि हालात को ह बयााँ नह ं करती बक्ल्क इस बीमार में कैसे स्ियं में होने िाले पररितानों के प्रनत जागरूक रहकर बचा जा सकता हैतथा इसके उपचार के बारे में भी बताती है। कैंसर जैसी असाध्य बीमार को अपनी अन्तःप्रेरणा से पकडना जागरूकता का उदाहरण है। यह ं पर ककसी ददव्य िक्तत की बात की जाए तो स्िप्न में वपता का आते रहना एक चेतािनी जैसा था। बीमार कै से पनपती है, कैसे छुपकर िार करती है, इसे लेखखका ने बडे ह मनोरंजक ढंग से बताया है। पढ़ते हुए मुस्कान आ जायेगी। `टूटा-टूटा एक पररदं ा ऐसे टूटा कक उड न पाया…’ कथा के बीच में इस गाने का सन्दभा भी व्यधथत कर जाता है। बीमार के बीच तया करें या तया न करें का ननदेि भी ददया गया हैजो जागरूक करने िाला है। पुस्तक का आध्याक्त्मक पि भी पठनीय है। िाताालाप के मध्य संत रामकृर्षण परमहंस, स्िामी वििेकानन्द का क्जक्र और जीिन दिान, सांख्य दिान पर सलखे गए भाग लेखखका के आध्याक्त्मक रुझान ि समझ को भी प्रदसिता करते हैं। नेिदान का महत्ि भी सामने आया। जीिन के बाद भी दो लोगों के द्िारा उनके भाई दनुनया देख रहे हैं। इन सबको दनुनया के सामने लाने का उद्देश्य बेहद प्रेरणादायी है। जानेिाले के साथ जा नह ं सकते पर वप्रयजनों की भी आंसिक मत्ृयुतो हो ह जाती है। बहुत मासमका सलखा है कक तभी खखला देते मन भर जलेबी, अब हर पुण्यनतधथ पर जलेबी बााँटकर भी तया पा लेंगे ? संस्मरण के बीच अपने पालतूकुत्ते बूजो का क्जक्र करना भी िे नह ं भूल ं। ये पिुभी इंसानों के साथ भािनात्मक रूप से जुड जाते हैं। कॉलेज में सहयोधगयों द्िारा ककया गया पररहास भी अंदर तक दहला गया।
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 60 पुस्तक समीक्षा — भारत से जहााँलेखखका बेबसी में सलखती हैंकक - "जो गुजर जाते हैं, िे तो एक ददन गुजरते हैं िॉ. उर्ा सकरर्, भारत तसूलका एवम्लेखनी पर िमान असिकार रखनेवाली िॉ.उर्ा सकरर् लगभग िालीि वर्ों केअध्यापन अनभुव केिाथ िी मेरठ कॉलेज में लसलत- कला सवभाग की सवभागाध्यिा रि िकुी ि।ैंअनेक ििरों मेंआयोसजत कला- प्रदिषसनयों मेंउनकी कृसतयों को िरािा गया ि।ैउनका एक कसवता िंग्रि, िाझा-िंग्रिों मेंरिनाएँऔर एक आत्म-कथ्यात्मक उपन्याि प्रकासित िै| वे अनेक लब्ि प्रसतसित िंस्थाओंिेिम्मासनत व परुस्कृत िुई ि।ैं िपं कष- [email protected] पर क्जनके गुजरते हैं, उनपर तो रोज गुजरती है….!” िह ं लेखखका का हौसला भी मन द्रवित कर देता है- "कै से थक कर हार जाऊाँ उम्मीदों से बंधा मन्नतों के धागों से सलपटा िटििृ हूाँम…!” ैं आपका हौसला कायम रहे, िभु कामनाएाँ। पाठकों को यह पुस्तक पसन्द आएगी। चंदन तो ददा भरे हैंपर उन्हें लाने का हौसला पदढ़ए। पुस्तक में ममता कासलया, धीरेंद्र अस्थाना एिं हंसा द प के आिीिचा न हैं। पुस्तक क्फ्लपकाटा ि अमेजॉन पर डडस्काउंट के साथ उपललध है। -- ऋता िखे र 'मधु' पुस्तक- पररचयपुस्तक- ददा का चंदन लेखखका- उषा ककरण पर्षृठ - 142 मूल्य - 180/- प्रकािन - दहदं बुक सेंटर, आसफ़ अल रोड, नई ददल्ल
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 61 रपट- पुस्तक ववमोिन व काव्यगोष्ठी पन ू म िघ ु, सिगं ापरु िररयार्ा मेंजन्मीं पनूम िघु लगभग दो दिकों िेभी असिक िमय िेसिंगापरुमेंसनवाि कर रिी िैं। वेसिंगापरुकेसभन्न सििर् िंस्थानों मेंसिदं ी सििर् केकायषिेजडुीिुई िैं| सिंगापरु िंगम की िसिय िदस्य िोनेकेिाथ िी सिंगापरुमेंमीसिया और सवज्ञापन मेंभी उनकी दख़ल िै| िपं कष- [email protected] भारतीय उच्चायोग ससगं ापरु के तत्िािधान में ससगं ापुर संगम द्िारा श्री नारायण समिन ससगं ापुर के प्रांगण में भारतीय नििषा और इस समय आने िाले त्योहारों के स्िागत में सादहक्त्यक गोर्षठी का आयोजन हुआ क्जसमें भारत की प्रनतक्र्षठत सादहत्यकार और धचिकार डॉ. उषा ककरण जी के आत्मक्यात्मक उपन्यास ‘ददा का चन्दन’ का विमोचन हुआ। यह उपन्यास कैंसर से लडते हुए, कह ं जीतते, कह ं हारते हुए आगे बढ़ता है। उषा जी ने अपनी रचना प्रकक्रया पर भी बात की। उषा जी के िलदों में- “ये हौंसलों की कथा है ननरािा पर आिा की, हतािा पर आस्था की” कायक्रा म के विसिर्षट अनतधथ भारतीय उच्चायोग ससगं ापुर के चांसर प्रमुख श्री सििजी नतिार जी की गररमामयी उपक्स्थनत से इस कायाक्रम को अधधक संबल समला। काव्यगोर्षठी में अननल कुलश्रेर्षठ जी, िांनत प्रकाि उपाध्याय जी, विनोद दबूे, र ना दयाल, र ता पाण्डये , प्रनतमा ससहं , सीमा गोयल ने अपने रचना पाठ से सभी को बााँधे रखा। अननल कुलश्रेर्षठ जी द्िारा अपनी नई पुस्तक चांसर प्रमुख श्री सििजी नतिार जी को उच्चायोग के सलए भेंट की गई। परम्परानुसार कायक्रा म का िभु ारम्भ विसिर्षट अनतधथ श्री सििजी नतिार जी, मीना नतिार जी, डॉ. उषा ककरण द्िारा द प प्रज्िसलत करके ककया गया और ससगं ापुर संगम की अध्यि डॉ. संध्या ससहं द्िारा उन्हें िॉल पहनाकर सम्माननत ककया गया। कायाक्रम का रोचक प्रारम्भ और और सभी गणमान्य अनतधथगणों का स्िागत कर क्तिज के सलए सबको सचेत करने की क्जम्मेदार प्रसून ससहं ने ल और आगे बढ़ाते हुए गठा हुआ, सुन्दर संचालन पूनम चुघ ने ककया। सिप्रा थम रजनी कुमार द्िारा सस्िर और सुमधुर गणेि िंदना और सरस्िती िंदना प्रस्तुत की गई। काव्य-गोर्षठी के प्रारंभ में सबसे पहले काव्य पाठ के सलए िररर्षठ और श्रेर्षठ गजलकार, अननल कुलश्रेर्षठ जी को आमत्रं ित ककया
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 62 रपट — सस िंगापुर से गया। उनकी कई पुस्तकें भी प्रकासित हो चुकी हैं। आध्यात्म एिं ग़जल ि लघुकथा लेखन में उनकी वििेष रूधच है और लोग उनसे ग़जलें सलखना सीखते हैं। उन्होंने नििषा के स्िागत पर अपनी ग़जल..... गया संित िो उन्यासी उसे जाना मुबारक हो.....और आपसी ररश्तों में क्जतना फ़ासला बढ़ता गया, फेसबुक पर दोस्तों का दायरा बढ़ता गया.....प्रस्तुत कर कायक्रा म के प्रारंभ में ह ऊजाा का संचार कर ददया। कायाक्रम को आगे बढ़ाते हुए अगले रचनाकार, पेिे से जहाजी और ददल से लेखक - विनोद कुमार दबूे को आमंत्रित ककया गया। उन्होंने अपनी कविता का प्रारंभ रामनिमी के राम से ककया.....यह दिहरा, द िाल यह रामनिमी बस कुछ ददनों का इि है.....और नि िषा पर..... ददनों की धगनती में उलझे रहे कहााँ रहा रत्ती भर ख्याल कक पलक झपकते ह कब गुजर गया साबुत पूरा साल.... बहुत ह सुन्दर कविताएाँप्रस्तुत की। उनके पश्चात सिक्षिका और किनयिी प्रनतमा सस ंह ने अपनी खूबसूरत रचना.....आज कफर अपने देि से दरू बसे दहदं प्रेसमयों का संगम ससगं ापरु में हो रहा है.....प्रस्तुत की। सिक्षिका और किनयिी र ना दयाल की अपने देि की समट्ट से जुडी रचना.....मरलायन की इस धरती पर जब-जब लोगों से समलती हूाँ.....और आओ समलकर एक अलख जगाएाँ.....ने
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 63 रपट — सस िंगापुर से मानों पूरे कायक्रा म में ह एक अलख जगा द थी। िांनतप्रकाि उपाध्याय जी की प्रस्तुनत.....नत हो तुम्हारे द्िार पर.....और खूबसूरत भक्ततमय प्रस्तुनत.....पािन पिा पधारो राम..... ने पूरे कायक्रा म को ह भक्तत के रंग में रंग ददया। उनके पश्चात र ता पाण्डये ने भी भक्तत के रंग में समा को बांधे रखा और जनम सलए रघरुाई..... का सभी दिका ों के साथ समलकर मधुर भक्ततगान ककया। अंत में सिक्षिका सीमा गोयल ने अपनी रचना प्रस्तुत की.....नि िषा पर नाच रहा भारत सारा.....जो कक सीधे दिका ों के हृदय तक पहुाँची। सभी कवियों ने एक से बढ़कर एक कविताएाँ प्रस्तुत कर कायक्रा म में चार चााँद लगा ददए । दिका ों द्िारा कायक्रा म का जी भरकर लुत्फ़ उठाया गया और पसंद ककया गया। पूरे कायक्रा म के दौरान मंच संचासलका द्िारा अनेक त्योहारों और भारतीय सांस्कृनतक विरासत की सुन्दर जानकार से कायक्रा म को खूबसूरत स्िरूप ददया। अरुणा सस ंह द्िारा सभी का औपचाररक धन्यिाद ज्ञापन ककया और जल्द ह नए कायक्रा मों में पुनः समलने और ससगं ापुर में सादहक्त्यक, सांस्कृनतक, भाषाई विरासत को आगे बढ़ाने की बात भी रखी। सभी दिाकों का आभार प्रकट ककया कक सबने समय ननकालकर कायाक्रम को गररमा प्रदान की। कायाक्रम का संयोजन डॉ. संध्या ससहं और सहयोग पूनम चुघ, अरुणा ससहं , प्रसून ससहं , और प्रनतमा ससहं ने ददया। कायक्रा म का संचालन पूनम चुघ ने ककया। ~~~~~~~~~~~~~~~ माचा-अप्रैल के मह ने में जहााँ विक्रम संित् का प्रारंभ होता है िह ं अनेक त्योहारों का भी आगमन होता है। भारत के विसभन्न राज्यों में अलग -अलग नामों के साथ अलग-अलग त्योहार मनाये जाते हैंऔर इन सभी त्योहारों के पीछे अलग-अलग मान्यताएाँ और पौराखणक कथाएाँ हैं। मंच संचालन के दौरान इन कुछ त्योहारों के बारे में भी विसभन्न स्रोतों से प्राप्त जानकार को साझा ककया गया।
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 64 रपट — सस िंगापुर से चैि प्रनतपदा - उत्तर भारत के कई राज्यों में चैि प्रनतपदा को नििषा के रूप में मानते हैं। चैि िुतल प्रनतपदा की पौराखणक मान्यता है कक इस ददन ना ससफा भगिान ब्रह्मा जी ने सक्ृर्षट की रचना की बक्ल्क प्रमुख देिी देिताओं को भी ब्रह्मा जी ने रचा था। इसीसलए इस नतधथ को नि संित्सर भी कहा जाता है। इस नतधथ के कई अन्य ऐनतहाससक महत्ि भी हैं। कहते हैं कक इसी ददन सम्राट विक्रमाददत्य ने अपने राज्य को स्थावपत ककया इससलए प्रथम प्रनतपदा को विक्रम संित की िरुुआत हुई। एक दसू र मान्यता के अनुसार भगिान श्री राम का राज्यासभषेक इसी ददन हुआ था। िक्तत और साधना का महापिा निरात्रि भी इसी ददन से मनाया जाता है। निरात्रि में देिी जी के नौ स्िरूपों का पूजन ककया जाता है। गडु ी पडिा - दहदं ूनििषा के आरंभ पर गुडी पडिा मनाते हैं। गुडी का अथा है- विजय पताका। कई लोगों की मान्यता है कक इसी ददन भगिान श्री राम ने बाल के अत्याचार िासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्तत ददलाई थी। बाल के तरफ से मुतत होकर प्रजा ने घरघर में उत्सि मनाकर ध्िज यानी गुडी फहराए। आज भी घर के आंगन में गुडी खडी करने की प्रथा महारार्षर में प्रचसलत है। निरेह - यह िलद संस्कृत िलद नि से बना है। कश्मीर में नििषा नि चंद्रिषा के रूप में मनाया जाता है। यह ददन चैि निराि का प्रथम ददन है। निरेह उत्साह ि रंगों का त्योहार है। कश्मीर इसे बडे उत्साह से मनाते हैं। चेट चंड - ससधं ी समुदाय का त्योहार 'चेट चंड' के रूप में पूरे देि में हषोल्लास से मनाया जाता है। चैि ितु ल द्वितीया से सस ंधी नििषा का आरंभ होता है। चेट चंड को अितार युगपुरुष भगिान झूलेलाल के जन्म ददिस के रूप में जाना जाता है। धासमका मान्यता के अनुसार, भगिान झूलेलाल िरुण देिता के रूप हैं। कहते हैं सस ंधी समाज के लोग जलमागा से यािा करते थे। ऐसे में िे अपनी यािा को सकुिल बनाने के सलए जल देिता झूलेलाल से प्राथना ा करते थे और यािा सफल होने पर भगिान झूलेलाल का आभार व्यतत ककया जाता था। इस ददन लकडी का मंददर बनाकर उसमें एक लोटे से जल और ज्योनत प्रज्िसलत की जाती है और इस मंददर को श्रद्धालुचेट चंड के ददन अपने ससर पर उठाते हैं, क्जसे बदहराणा साहब भी कहा जाता है। गणगौर - गणगौर त्योहार मूलरूप से राजस्थान का एक लोक उत्सि है। होसलका दहन के दसू रे ददन चैि कृर्षण प्रनतपदा से चैि ितु ल ततृ ीया तक, 18 ददनों तक चलने िाला त्योहार है - गणगौर। यह त्योहार देिी गौर और सिि जी का वििाह, और प्रेम का जश्न मनाने के बारे में है। वििादहत मदहलाएाँ अपने पनत की लंबी उम्र और अच्छे स्िास््य के सलए देिी पािाती की पूजा करती हैं, जबकक अवििादहत मदहलाएाँ अच्छा पनत पाने के सलए देिी की पजू ा करती हैं। गणगौर त्योहार िसंत और फसल के उत्सि का भी प्रतीक है। गण भगिान सिि का प्रतीक है, और गणगौर भगिान सिि और पािाती का एक साथ प्रतीक है। वििु- वििुभारत के केरल राज्य में दहन्दूनििषा के
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 65 रपट — सस िंगापुर से मौके पर मनाया जाने िाला त्योहार है। इस ददन यहााँ के लोग नए िस्ि खर दते हैं। वििषे प्रकार से 'वििु कानी' सजाई जाती है। यह एक खास प्रकार की धासमका परंपरा है, क्जसमें ककसी पाि अथिा ननक्श्चत स्थान में विर्षणु के अितार भगिान श्री कृर्षण की मूनता लगाई जाती है। क्जस मूनता के आस पास फूल, फल, अनाज, िस्ि, सोना, चािल, सुनहरा नींबू, ककडी, नाररयल, काजल, सुपार जैसी अनेक िस्तुओं से सजाया जाता है। और प्रातः काल में जल्द उठने के पश्चात इसके दिना ककये जाते हैंऔर ईश्िर से सुख-समद्ृधध की कामना की जाती है। त्रबखोर उत्सि - नि िषा के उत्सिों की कडी में अगला है त्रबखोर उत्सि। यह उत्सि भारत के पहाडी राज्य उत्तराखडं में मनाया जाता है। जहााँ प्रातः काल उठकर स्नान ककया जाता है और दानिों के प्रतीक, पुतले आदद बनाकर उन्हें पत्थरों से नर्षट भी ककया जाता है। जो प्रतीकात्मक रूप से बुराई को समाप्त करने का सन्देि देता है। बोहाग त्रबहू - उसके साथ ह बोहाग त्रबहू एक और प्रससद्ध त्योहार हैजो कक भारत के उत्तर पूिी राज्यों, मुख्य रूप से असम राज्य में मनाया जाता है। जहााँ यह असामी नििषा के तौर पर भी मनाया जाता है। इसे 'रोंगाल त्रबहू' या हतत्रबहू भी कहते हैं। जो कक आमतौर पर विििु र संक्रांनत के सात ददन बाद १३ अप्रैल को पडता है। यह फसल कटाई के संके त के तौर पर भी देखा जाता है। जरुिीतल - जुरिीतल भारत और नेपाल के समथल िेि में नििषा के रूप में मनाया जाता है। इस ददन रसोई में लाल चने, सत्तू ,जौ और अन्य अनाज से प्राप्त आटे का भोजन बनता है। त्रबहार में यह समधथला ददिस के नाम से मनाया जाता है। जुरिीतल को ननरयण मेष संक्रांनत और नतरहुत नि िषा से भी संबोधधत ककया जाता है। पाहेला बेिाख - 14 अप्रैल के ददन बंगाल में दहन्दू नििषा को 'पाहेला बेिाख' के तौर पर मनाया जाता है। इस ददन पक्श्चम बंगाल, त्रिपुरा और बांग्लादेि में कई स्थानों पर मंगल िोभायािा भी आयोक्जत की जाती है। इस उत्सि को यूनेस्को (UNESCO) द्िारा विश्ि सांस्कृनतक धरोहर में िासमल ककया गया है। प ुत्थाडं -14 अप्रैल को ह तसमल नि िषा के रूप में पुत्थांड त्योहार भी मनाया जाता है। तसमल कैलेंडर के अनुसार पुत्थांड का मतलब नया साल होता है। पुत्थांड का ददन ककसान समुदाय के सलए खास होता है। ज़्यादातर ककसान इस ददन खेतों की जुताई कर नई फसल का िभु ारंभ करते हैं। घर के प्रिेि द्िार पर इस ददन सभी लोग बहुत ह आकषाक रंगोल बनाकर नए िषा का स्िागत करते है और पूरे पररिार के साथ समलकर इस त्योहार को मनाते हैं। ससगं ापुर में भी तसमल समुदाय में इस ददन ग़जब का उत्साह होता है। ************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 66 िॉ. आरािना िदासिवम, सिगं ापरु पसिम बंगाल मेंजन्मीं आरािना िदासिवम लगभग २२ वर्ों िेसिंगापरुमेंरि रिीिैं और बौसद्धक िंपदा असिकारों केिेत्र मेंकायषरत ि।ैंआरािना सिदं ी और अंग्रे़िी के अलावा गजुराती, तसमल, तेलगुुभी जानतीि।ैं सिंगापरुकेकई मंिों िेजडुकर िासित्य िजृ न कर रिीिैं| िपं कष- [email protected] लघुकथा-एक खूबसूरत जवाब एक बार मैंरेलगाडी से सफर कर रह थी। सामने की सीट पर एक बुजुगा बैठे थे। मेर ह सीट पर एक नौजिान भी बैठा हुआ था। जसै ा की अममू न होता है, उन बुजगु ा ने नौजिान से बातें करनी िुरू कर द । नौजिान भी बुजगु ा से बहुत घुल-समल कर बातें करने लगा। अगले स्टेिन पर एक और बुजगु ा हमारे डडलबे में सिार हुए। थोडी ह देर में िो भी पहले बुजगु ा और उस नौजिान की बातों में ददलचस्पी लेने लगे। बातों-बातों में, अचानक उन्होंने पहले बुजगु ा से पूछा - "इस नौजिान से आपका तया ररश्ता है?" पहले बुजगु ा ने जिाब ददया - "िह , जो आपका- हमारा है l" ककतना खूबसरूत जिाब! अपने सक्षं िप्त जिाब से ना तो उन बुजगु ा ने नौजिान को महज एक सह-यािी बताया, ना ह गरै बताया, बल्की अपने सक्षं िप्त जिाब से उन दसू रे बजु गु ा को भी अपना बना सलया। *************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 67 अपना देि िरोज राय, सिगं ापरु 35 वर्ों िेसिंगापरुमें सनवाि करने वाली िरोज राय सवगत 23 वर्ों िेसिदं ी अध्यापन िे जडुी ि।ैं वेवतषमान मेंसिदं ी िोिाइ ी सिंगापरुमेंअध्यापन कायषकर रिीिैं|उनकी रुसि कसवता लेखन में िै । िोिल मीसिया माध्यमों ने इनकी असभव्यसक्त को नया मंि सदयाि|ै िपं कष- [email protected] करें तया ससगं ापुर की बात , विश्ि में देि हैये विख्यात। स्िच्छता मन हर लेती आज , नह ं कोई होता कभी नाराज नह ं कोई दंगा कोई फसाद करें तया ससगं ापुर की बात , विश्ि में देि हैये विख्यात। सभी को भाता है ये देि िांत रक्षित इसका पररिेि। प्रकृनत का सुंदर ये उपहार मनाते सब समलकर त्योहार करें तया ससगं ापुर की बात , विश्ि में देि हैये विख्यात। नह है पीने का पानी कफर भी ये है सबसे ज्ञानी । सीखने आते हैंसब ज्ञान बना ये देि कै से महान । करें तया ससगं ापुर की बात , विश्ि में देि हैये विख्यात। यहााँ का यातायात वििाल बढ़ रहा एम आर ट का जाल
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 68 कववता— सस िंगापुर से महाँगाई बढ़ रह ददन और रात कफर भी आए सबको रास करें तया ससगं ापुर की बात , विश्ि में देि हैये विख्यात। युिा करते हैंअपने काया यहााँ सैननक सििा अननिाया नह ं करता कोई तकरार बनाकर रखता है व्यिहार करें तया ससगं ापुर की बात , विश्ि में देि हैये विख्यात। **************
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 69 ‘खुदा और विसाले सनम’ िो लंबे-लंबे कि खींच रहा था मगर उसकी खााँसी बदस्तूर जार थी। ससगरेट न पीने की उसकी आदत ससगरेट से गम गलत करने की उसकी ख्िादहि पर भार पड रह थी। खााँसते-खााँसते हुये लार उसके चेहरे पर सलपट गयी और आाँखें लाल हो गयीं। उसके साथ का धचलमची डर गया कक अगर ककसी ने उन दोनों को साथ देख सलया तो धचलमची पर आफत आ जायेगी। िाम का धुंधलका बढ़ रहा था। सामने की धीरज हाइट्स की आठ मंक्जला त्रबक्ल्डगं की लाइटें जगमगाने लगी थीं। तभी अजान हुई। उस जगह पर बज रहे गानों के स्िर धीमें पड गये। ईसा की नमाज का ितत हुआ तो दकु ान गुज्जूने कहा ‘‘कसूर भाई, नमाज का ितत हो गया। निा-पत्ती छोडो। अल्लाह की बारगाह में जाओ िायद कोई राह ननकले। मक्स्जदों में इबादत से िो तमाम मुकदमें हल हो जाते हैंक्जन्हें दनुनयािी अदालतें ठीक नह ं कर पाती’’। सहानुभूनत के फाहे समले तो मन के घािों की ट स कुछ कम हुई। कसूर ने हाथ माँुह धोया, खुद को पाक साफ ककया और इस बात की तस्द क की, कक उस पर कोई निा तार तो नह ं है। निा हुआ भले ह न था मगर निा ककया तो था कसूर ने भले ह गम गलत करने की नीयत से। उसकी अन्तरात्मा ने उसे धधतकारा कक िो पाक मुसलमान नह ं है कफलितत नमाज के सलये........... पाक सदलीप क ु मार , भारत बलरामपरुउत्तर प्रदिे केसदलीप कुमार जी लेखन की सवसवि सविाओंयथा किानी, कसवता, व्यंग्य,उपन्याि, लघकु था आसद िासित्य रि रिेि|ैंउनकी नौ पस्ुतकें सभन्न सविाओं में प्रकासित िो िकुी ि|ैंभारतीय भार्ा पररर्द केिाथ िी कई अन्य िंस्थाओंद्वारा अपनेरिना कमषकेसलए िम्मासनत िो िकुेि|ैं िपं कष- [email protected] खुदा और ववसाले सनम
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 70 कहानी— भारत से मुसलमान, मसु लमान, मुसलमान यह तो िो लफ्ज था क्जसने इस ितत उसके ककरदार को मथ कर रख ददया था। उसका ससर चकराने लगा। उस मुक्स्लम बहुल बस्ती बेहरामबाग पाडा में िो अजान के ितत सडक पर ददखकर खुद की ककरककर नह ं कराना चाहता था। सो िो उठकर दकु ान के वपछले दहस्से में चला आया। िह ं िीिे के पार उसने देखा कक तमाम पैर मक्स्जद की तरफ मुड रहे थे। बेहरामबाग की मक्स्जद में नमाक्जयों के सलये जगह कम पड जाया करती थी सो तमाम लोग मक्स्जद के सामने िाल सडक पर नमाज अता ककया करते थे। बेहराम बाग की घनी बस्ती, बहुत सारे मुसलमानों के घर, घाट , मराठी, गुज्जू, भैय्या, त्रबहार हर ककस्म के मुसलमान। लेककन सबके मसले जुदा-जुदा। अस्सलाम िालेकुम के अलािा उनमें कोई चीज साझी न थी। साझा था तो पहले अपना फायदा देखना कफर अपना प्रांतिाद। ददलचस्प है मुम्बई िहर यहााँबाहर से आने िाले लोग इस िहर की सलादहयतों के तो कायल हैंमगर ददन भर बातें अपने मुलुक (गािाँ ) की ककया करते हैं। कसूर हारकर अपने घर पहुाँचा तो उसकी बडी बेट रात्रबया ने दरिाजा खोला और दरिाजा खोलते ह बेसाख्ता बोल ‘‘अलबू, आप इस ितत यहााँ? नमाज पढ़ने नह ं गये, कफर अपने ह िलदों को चबाकर बोल ‘‘अब तो बहुत देर’’ तब तक िहााँरेिम आ गयी। दोनों ने एक दसू रे को देखा कसूर ने रेिम को प्यार और हसरत भर नजरों से और रेिम ने कसूर को कहर भर नजरों से। ‘‘जाओ यहााँ से’’ ये कहते हुये रेिम अंदर चल गयी और उसने अंदर के कमरे के दरिाजे को भडाक से बंद करके धचटकनी लगा द । पस्ती के आलम में थके कदमों से कसूर एक बािचीखाने पर चला गया। िो िहााँ खाने बैठा तो उसे लगा सब उसी को घरू रहे हैं। बमुक्श्कल उसने दो ननिाले हलक से नीचे उतारे और िहााँ से चल पडा। अपने घर से दो गल छोडकर उसकी एक और आठ बाई आठ की खोल थी क्जसमें िो जाकर अकेले लेटा। िो लेटा तो उसकी आाँखें नम थीं और उसका अतीत ससनेमा के फ्लैिबैक की तरह उसके सामने आ गया। याद आया उसे िो गोरखपुर का अपना गुजरा ितत, सुंदर कसा हुआ िर र, दधूधया गोरा रंग, घुंघराले बाल लोग कहते थे और िो खुद मानता था कक िो असभनेता िसि कपूर जैसा ददखता था।
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 71 कहानी— भारत से गोरखपुर िहर से कुछ दरू पर क्स्थत बघनी गााँि िद्ुध और उच्च कुलस्थ ब्राहम्णों का था। दररद्र मगर इज्जतदार पररिार था उसका। तब उसका नाम िषे सिरोमखण दबूे हुआ करता था। उसके कुल के लोग खुद को इतना श्रेर्षठ समझते थे कक िे अपने नाम के आगे सिरोमखण लगाते थे उनकी िद्ुध आचरण की समसालें द जाती थीं। पुजार वपता के देहांत के बाद िषे सिरोमखण दबूे ने अपनी तीन बीघे की खेती, पुजार की गद्द और अपनी बूढ़ मााँ चचेरे भाइयों की तका करके बम्बई की राह ल । बम्बई तब भी इतनी ह ददलफरेब थी क्जतनी आज ददलकि है। ऐसे सुंदर चमचमाते चेहरे तो बम्बई की गल -गल हर नुतकड हर चैराहे पर थे। कुछ मह नों में ह िषे सिरोमखण दबूे की जमा पाँूजी स्िाहा हो गयी। ह रो बनना तो बडी दरू की बात एकस्रा तक का भी रोल समलना नसीब नह ं हुआ। एकस्रा का रोल करने के सलये उसकी यूननयन से काडा बनिाना पडता था और काडा बनिाने के सलये क्जन पैसों की दरकार थी िो सिरोमखण के पास नह ं थे। पहले नाकामी समल कफर भूख से अतडडयां ऐंठी और उसने घर िापस होने की सोची। मगर ऐसे कैसे हो जाती िापसी। यह तो मुम्बई की अनूठी बात थी यहााँहर कामयाबी के पीछे ककस्से हैंसंघषों के अनथक दास्तानों की। यहााँ नाकामी क्जतनी बडी लोग उसको उतनी ह बडी कामयाबी की ददलफरेब हसरतें पालने को ताकीद करते हैं। उन्ह ं ददनों एक छोटे से ढाबे पर उधार बढ़ जाने के कारण गुल्लक सेठ ने सिरोमखण को धतके देकर ढाबे से बाहर भगा ददया था। भूख, पस्ती, नाकामी और बेबसी से परेिान था सिरोमखण। उसने तजबीज से पता लगाया कक दोपहर में गल्ले पर रेिम बैठा करती थी। रेिम एक बेपनाह कश्मीर हुस्न जो कक मुम्बई की इस गंद बस्ती में भी अपने िबाब पर था। रेिम के पुरखे कश्मीर के हुजां घाट के थे जो दनुनया में सबसे खूबसूरत लोगों के पैदाइि की जगह मानी जाती थी अब िो दहस्सा पाककस्तानी कश्मीर में है मगर गमे रोजगार ने कफलितत गुल्लक सेठ को मुम्बई के जोगेश्िर उपनगर के बेहराम बाग पाडा में पनाह द थी। कफर एक ददन जब भूखे और बेबस सिरोमखण रेिम के सामने धगडधगडाया कक उसे िो अपने ढाबे पर कुछ ददन उधार भोजन करने दे तो िो सुंदर स्िी द्रवित हो उठी। बाप की ताकीद उसे याद थी सो अपने उधार भोजन देना तो मना कर ददया मगर उधार पसै े देना जरूर कुबूल कर सलया। िो मुसलसल सिरोमखण को उधार देती रह । सिरोमखण संघषा झले चुका था काफी कुछ जान भी
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 72 कहानी— भारत से गया था। पेट भरा तो उसका आत्मविश्िास लबरेज हो गया उसने कफर से प्रयास करने िरूु कर ददए। टेल विजन उद्योग उन ददनों अपने पैर फै ला रहा था घर-घर सीररयल आ रहे थे। ये इतकीसिीं सद और ककक्रेट में सौरि गांगुल की कप्तानी के िरूु आती साल थे। सिरोमखण को तमाम ट 0िी0 धारािादहकों में एक आध ददन का काम समलने लगा। जोगेश्िर का बेहरामबाग पाडा अब सिरोमखण के सलये तीथा था िह ं तमाम कफल्म और ट 0िी0 प्रोडतिन कम्पननयों के दफ्तर थे। सुबह िाम िो गुल्लक सेठ के होटल पर अपना पेट भरता और श्री जी होटल पर ददन-रात आडडिन देता रहता। सिरोमखण अब अपने खचेआसानी से ननकाल लेता था। ससनेमा एक ऐसी फं तासी है जो सबको अपनी तरफ खींचती है इस मोह माया से रेिम भी बच न सकी। स्िी क्जससे सहानभूनत रखती है अमूमन प्रेम भी उसी से करती है। रेिम को बीते हुये कल का भुखमरा सिरोमखण आने िाले कल का ह रो नजर आ रहा था। उसे सहानभूनत हुई, सहानभूनत से संिेदना, सिं ेदना से आकषणा और आकषणा प्रेम में बदल गया। मुम्बई में अब चमत्काररक प्रेम नह ं होते जहााँकोई ककसी को समग्रता से चाहे, दोनों के समीकरण थे और दोनों को एक दसू रे से उम्मीदें नजर आ रह थीं। एक-एक ददन के बंधुआ मजदरू की तरह काम से उकताकर सिरोमखण अब अपना पोटाफोसलयो बनिाकर कफ़ल्मों के सलये प्रयास करना चाहता था। कफ़ल्मों में काम पाने के प्रयास के दौरान िो चाहता था कक न उसे रोजमराा के खचों की धचन्ता हो और न छोटे-मोटे रोल करने पड।े इसके सलये गुल्लक सेठ का ढाबा और उसकी दो तल्ला खोल सिरोमखण के सलये िरदान सात्रबत हो सकती थी। इसके अलािा रेिम का बेपनाह हुस्न भी उसे चैन से जीने नह ं देता था। मगर रेिम तो मुसलमान है मांस-मछल सब खाती है और ठहरे ठेठ पंडडत। ये और बात थी कक अब िो जनेउ और चोट िाले पंडडत नह ं थे मगर उनके मन में कह ं न कह ं ये बात जरूर थी कक िो एक पुजार का अंि हैं। िाह रे बंबई नगररया कहते हैं यहााँ हर सपने की एक कीमत होती है सो िो भी कीमत चुकायेंगे उन्होंने अपने रतत में पेिस्त दहन्दत्ुि के ज्ञान को टटोला तो ये पाया कक कन्या की कोई जात नह ं होती, िाद के बाद जो पनत का धमा और जानत िह सब कुछ कन्या को स्ितः प्राप्त हो जाता है। सिरोमखण ने खुद को तसल्ल द कक िो िाद के बाद रेिमा को दहन्दूधमा के तौर-तर के ससखा देंगे और उनका खुद का दहन्दत्ुि भी बचा रहेगा। ये सिरोमखण के मंसूबे थे। उधर रेिमा कुछ और सोचे बैठी थी िो मानती थी कक उसके ढाबे पर खाना खाने िाले लोग आम िहर थे कल को िो ककसी
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 73 कहानी— भारत से कफल्मी ह रो की बीिी हो गयी तो इस सोच से ह उसके िर र में खुिी और रोमांच का ससहरन दौड जाया करती थी। िो दोनों समलते और इस ररश्ते की ऊाँ च-नीच पर गुफ्तगुकरते, हलकान होते मगर उनकी आाँखें ख्िाबों के जुगनुओं से चमकती रहती थीं। इन फं ताससयों को यथाथा का धरातल ददखाया गुल्लक सेठ ने। गुल्लक सेठ जो दहन्दस्ुतानी कश्मीर के बांसिदे थे मगर आतंकिाद के कारण उनको अपने कुनबे के साथ अपना घर छोडना पडा था, मुसलमान होने के बािजूद। उसी आतंकिाद की भेंट चढ़ गयी थी गुल्लक सेठ की बीिी। त्रबना बीिी के दधु मुंह बच्ची बम्बई में गुल्लक सेठ ने कैसे पाला था ये बात या तो िे जानते थे या उनका खुदा। फुटपाथ पर रेहडी लगाकर ये खोल और होटल उन्होंने कै से बनाया था, ये सब याद करके िो ससहर जाते थे। अपनी बच्ची रेिम से उन्हें इतनी मुहलबत थी कक उन्होंने दसू रा ननकाह नह ं ककया कक सौतेल मााँ से कह ं बच्ची के लाड-प्यार में कोई कमी न रह जाये। आज अपनी इस खून-पसीने से कमाई गयी दौलत यूाँ एकदम से दहन्दू को सौंप देना उन्हें हधगजा गिारा न था। बेिक उन्हें बेट की पसंद का एहतराम था मगर िो थी तो बेट ह । आज गुल्लक सेठ क्जंदा हैतो रेिम की देखभाल है कल को िो क्जन्दा न रहें तो रेिम के साथ कुछ भी हो सकता है| हो सकता है, उसे कोई चेर या लौंडी बनाकर रखे। गुल्लक सेठ कफल्म और ट 0िी0 िालों के ककरदार से हधगजा मुतमइन न थे जो कपडों की तरह अपने हमसफर बदल ददया करते थे। मगर िो बेट की क्जद के आगे बेबस थे। बेट भागकर िाद कर ले तो िो तया कर लेंगे। सो उन्होंने अपना मास्टर स्रोक चला। बेट को द नदनुनया ऊाँच-नीच समझायी कक क्जस इश्क की दहुाई सिरोमखण दे रहा है अगर िो इश्क सच्चा है तो उसे इस बात से कोई एतराज नह ं होना चादहये कक लडकी दहन्दू तयों बने लडका मुसलमान तयों न बन जाये। ये बात रेिमा के ददमाग में घर कर गयी। कफर उसने बचपन से ह अपने माहौल में दहन्दओु ं के बुरे होने के जो ककस्से सुन रखे थे उसे अपनी उन धारणाओं से भी पार पाना था। िैसे भी स्िी प्रेम संबंध और धन की चाबी अपने पास ह रखना चाहती है उसके पास जो भी होता है उसे बटोरे रहना, मुट्ठी में सहेजे रहना स्िी का स्िप्न होता है, जबकक पुरूष अकल्पनीय पर ज़्यादा ध्यान देता है। संबंधों की रस्साकस्सी चलती रह , कस्में-िादें, िास्ते, दहुाइयां द गयीं मगर सब कुछ गड्मगड्ड ह रहा। गुल्लक सेठ टस से मस न हुये, उनका
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 74 कहानी— भारत से ननिाना ठीक बेट के ममा पर था रेिमा को भी उनकी बात जंची हुई थी कक अगर इश्क है तो कैसा भेद। सिरोमखण को गााँि से कोई सलाह-मक्श्िरा नह ं करनी थी। ककसी सिरोमखण ब्राह्मण का धमा पररितान कर मुसलमान बनना भी उस गााँि में अकल्पनीय था। क्जस गााँि के िो सिरोमखण ब्राह्मण थे यानी कक सिोच्च िे ननम्न कोदट के ब्राह्मणों से रोट -बेट का ररश्ता नह ं रखते थे। उस गााँि के ननिासी सिरोमखण को मुसलमान बनने की सोच ह ससहरा देती थी। मुम्बई आये हुये उसे पााँच साल हो चुके थे। उसने अपनी िापसी के सारे रास्ते खुद बन्द कर ददये थे। उसकी मााँ उसके चेचेरे भाइयों से कई साल तक उसकी खैर ख्िाह के सलए खत सलखिाती रह थी मगर उसे गोरखपुर की िापसी अपने सपनों का कत्ल लगती थी अब जबकक िो अपने मंक्जल के इतने कर ब था। िापस जाकर उसे अपने भाइयों की तरह मुट्ठी-मुट्ठी भर अनाज इकट्ठा नह ं करना था। यहााँ िो था उसके सपने थे, कफर मााँ को कब तक जीना था? उसे अपने सपनों की कीमत अपनों को खोकर चुकानी थी सो उसने चुकायी। हालात जीत गये मगर उन्हें इश्क की जीत का मलु म्मा पहनाया गया। सिरोमखण अब खुराम कसूर बन चुका था। खुराम खान या अंसार नह ं बना, कसूर ह बना तयोंकक गुल्लक सेठ का असल नाम गुल्बख्ि कसूर था। एक मजहब तया बदला, सब कुछ बदल गया। उसका भविर्षय इस बात की तस्द क की बुननयाद पर खडा था कक उसने मुसलामन होना रेिमा के इश्क के सबब से कबूल ककया था न कक अपने ह रो बनने के सपनो को पूरा करने के सलये। नतीजतन जरूर और एहनतयाती इस्लामी तौर-तर के ससखाये गये। कसूर ने कलमा पढ़ना सीखा, नमाज पढ़ने की रिायत को अपनाया, रोजे रखे। उसने खास तौर से मुसलमानों िाल टोवपयााँ और लुंधगयााँ खर द ं। मुक्स्लमों की तमाम मजसलस का दहस्सा बना, इस्लामी तकर र सुनी उन्हें समझा और कफर दसू रों को भी समझाना िुरू कर ददया। पुजार के बेटे को आत्मा ने फटकारा तो दनुनयादार के संस्कारों ने तसल्ल द कक ईश्िर एक है ससफा पूजा-पाठ का तर का बदला है। गहृस्थी की गाडी चलने लगी और चलता रहा साथ-साथ कसूर का कफल्मी दनुनया का संघष।ा गुल्लक सेठ मन ह मन कुढ़ते रहते थे उनका मास्टर स्रोक बेकार चला गया था। िे कसूर को अब भी गैर मुसलमान मानते थे और उन्हें इस दहन्दूपुजार के बेटे पर हधगजा यकीन न था। उन्होंने अपनी खोल , रूपया पैसा और होटल रेिम के नाम कर ददया था। गुल्लक सेठ ने जमाना देखा था इश्क का भूत चढ़ते देखा था, हुस्न का रंग उतरते देखा था। उन्होंने एक कदम और आगे जाकर अपनी जायदाद का ऐसा इंतजाम ककया कक रेिम और कसूर जायदाद से गुजर बसर तो कर सकते थे, मगर रेिम जायदाद को बेच नह ं सकती थी| ये हक उन्होंने रेिम के होने िाले बच्चों के नाम मुल्तिी कर ददया था बासलग होने तक। गासलबन कल को कसूर
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 75 कहानी— भारत से रेिम को ककतना भी आइने में उतार ले तो भी िो प्रापटी बेच न सके । रेिम भी मानती थी कक आखखर उसका िौहर जन्मजात तो दहन्दूह था और दहन्दओु ं के बारे में उसे अपनी िकं ाओं से ननमूला होना अभी बाकी था। सम्बन्धों की रस्साकस्सी चलती रह पााँच िषों के दरम्यान रेिम ने दो बच्चे पैदा ककये िो भी लडककयााँ। पररिार के खचेबढ़े तो क्जन्दगी डांिाडोल होने लगी। ससफा िाम को खुलने िाला होटल अब ददन ननकलते ह खुल जाता था और देर रात-रात तक आबाद रहता था। गुल्लक सेठ होटल पर तो होते थे मगर करते कुछ न थे। उन्हें एक दहन्दूके बच्चों को पालन-ेपोसने के सलये पसीना बहाना हधगाज गिारा न था। उनके ददल में इस बात की ट स थी कक उनकी बेट ने उनसे दगा ककया और एक गैर-मुक्स्लम से िाद कर ल । इसीसलये िो अपनी नानतनों से मन ह मन धचढ़ते थे कक कल को बडी होकर ये लडककयााँ भी ककसी दहन्दूसे िाद लयाह करें तो। सो गुल्लक सेठ अपनी संपनत की दहफाजत करते, काम कोई न करते और अपनी मेहनत की कमाई पर एक दहन्दू के कफल्मी सपने उन्हें हधगजा कबूल न थे। सिरोमखण को पररिार चलाने के खचे कम पडे े़ तो ददन में भी होटल खुला। इस तरह उसका ससनेमा को लेकर करने िाला संघषा धीरे-धीरे खत्म हो गया। इन्ह ं ददनों विश्िव्यापी मंद ने दहन्द कफल्मोद्योग को अपने लपेटे में सलया। बहुत से छोटे मझोले प्रोडतिन हाउस बंद हो गये और बडे े़ -बडे े़ ससतारों को भी काम समलना मुक्श्कल हो गया। जब बडे े़ -बडे े़ ससतारों को काम समलने के लाले थे तो एकस्रा कलाकारों की तया त्रबसात थी। रंग-त्रबरंगे आयोजन और प्रोडतिन हाउस बंद हुये तो जोगेश्िर की सडकें सूनी हो गयीं। ये दोहर मार कसूर पर पडी। अव्िल तो उसका नछट-पुट ससनेमा का रोजगार जाता रहा दसू रे जब स्रगलर नह ं रहे तो होटल का धंधा भी बंद की कगार पर पहुाँच गया। ये बेहद कडकी के ददन थे, कसूर और उसका पररिार बैठकर रोदटयााँ तोड रहे थे। ये मोहभंग का भी समय था तयोंकक पररिार की आमदनी घटती जा रह थी और खचे बढ़ते जा रहे थे। गुल्लक सेठ पत्ते नह ं खोल रहे थे क्जस पररिार में रोज सालन की खिबू उडा करती थी, िहााँ पर अब सूखी सक्लजयों के भी लाले थे। हारकर रेिम ने जैनब के प्रस्ताि पर उसके ससलाई कारखाने में काम करना कुबूल कर सलया। मंद की मार ऐसे पडी कक पगार न समलने पर कसूर के होटल के सब कार गर चलते बने। कसूर को कुछ खास नह ं आता था ससफा चाय और बडा पाि बनाना आता था। सो गल के अन्दर का होटल बन्द करके सडक पर एक ठेले पर रोजगार िरूु करके क्जंदगी की जंग लडने लगा। समय पंख लगाकर उडता गया इधर आठ िषों में
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 76 कहानी— भारत से रेिम तीन बार गभिा ती हुई एक लडके की उम्मीद से। मगर मंहगाई और गुल्लक सेठ के ननदेि पर अल्रासाउण्ड के जररये पता लगाकर रेिमा की अजन्मी बेदटयों को मार ददया गया। आठ िषों में चाय और बडा पाि बेचने िाले कसूर की रंगत भी जाती रह और सपने भी। कफर इण्डस्र की रौनक लौट मगर कसूर की रौनक तब तक जा चुकी थी। ये मायािी उद्योग या तो नये चेहरों पर दााँि लगाता है या कामयाब और कसूर न तो नया था ना कामयाब। तीन गभपा ात के बात गल्ुलक सेठ ने ये बात जान ल थी कक क्रोमोसोम्स एतस िाई का मुआमला तया है। ये बात उन्होंने रेिम को भी समझा द थी कक जन्में-अजन्मे पााँच संतानों से अगर कसूर लडका नह ं पैदा कर सका तो अब कभी कसूर के जररये रेिम लडके की मााँनह ं बन सकती। रेिम को एक लडके की मााँ बनना था। उसके भी सपने धरािायी हुये थे। कफ़ल्मी ह रो के बजाय ठेले िाले की पत्नी बनकर िो बहुत आहत थी। गुल्लक सेठ रेिम को मुसलसल उकसाते रहे और रेिम के क्रोधाक्ग्न में घी डालते रहे। इन घािों पर फैजन सहानभूनत के मल्हम लगाता रहा ितत बे ितत। ककिोरिस्था में कभी रेिम और फैजन एक दसू रे पर आकवषता थे मगर बीच में कसूर के आ जाने से सार तासीर बदल गयी थी। िह ं ककिोरािस्था का दबा-नछपा इश्क बेकार के इन ददनों में लडके की उम्मीद से खाद-पानी पाकर खखल उठा। चाय और बडा पाि बेच रहे कसूर को जब तक इसकी भनक लगी तब तक बहुत देर हो चकु ी थी। उनके इश्क के चचेखूब उड रहे थे। इस चचेऔर फैजन को िह दे रहे थे गुल्लक सेठ। इस बार जब रेिम हामला हुई तो कफर सलगं की जांच हुई सरकार पाबन्द के बािजूद सलगं जांच का ये गुनाह होता रहा। जो कक उम्मीद से उतर इस बार गभा में लडका था। गुल्लक सेठ ने ये खबर सुनी तो बक्ल्लयों उछल पडे े़ । फैजन और रेिम का, इश्क क्जस तथाकधथत भट्ठी में पक रहा था उसमें उन्होंने मानो पेरोल डाल ददया हो। उन्होंने रेिम से औलाद का जने ुइन िासलद पूछा तो उसने सर झुका सलया। गुल्लक सेठ की आाँखें जुगनुओं की माननदं चमक उठीं। उनका ददमाग बडी तेजी से कामकर रहा था उनके ह कुनबे का कश्मीर खून जैनब और िो भी मुसलमान तरुाा ये कक तलाकिदुा, बेऔलाद और कमाऊ और सबसे मुफीद बात ये कक उनकी बेट के इश्क में था। गुल्लक सेठ ने फैजन से बात की। फैजन ने अपनी गलती मानी तो मगर उसने कह ं न कह ं अपना िक गुल्लक सेठ से जादहर कर ददया कक िायद ये औलाद कसूर की ह हो। गल्ुलक सेठ ने
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 77 कहानी— भारत से अपनी िेखी बघार कक कै से उनको एतस और िाई का मामला मालूम है खुराम एतस ह एतस है इससलये ये औलाद फै जन की है। फै जन ननरुत्तर हो गया। गुल्लक सेठ ने कहा कक अगर िो रेिम से ननकाह कर ले तो िो अपनी खोल , होटल, बकैं -बैलेंस उन दोनों के नाम कर देंगे, िो अपनी िसीयत बदल देंगे और खुराम को धतके देकर बाहर कर देंगे। फैजन ने पूछा “ और रेिम, तया िो खुराम को तलाक देगी। गुल्लक सेठ ने कहा ‘‘िो सब इंतजाम मैंकर लाँूगा। “ ितत के साथ सब अपनी चालें-पतैं रे चलते रहे। कुछ मह ने बाद रेिम ने एक लडके को जन्म ददया। इस दरम्यान कसूर की लाख कोसििों के बािजूद रेिम चुप ह रह उसने कोई आश्िासन न ददया और कफर एक सुबह गुल्लक सेठ और फैजन की मौजूदगी में रेिम ने तीन तलाक कह कर कसूर को जमीन सुंघिा द । तब से कसरू मौलाना और िकीलों के चतकर लगा रहे हैं कक एक बार में तीन तलाक गरै कानूनी है लेककन उन्हें कुछ खास सफलता नह ं समल है। लोग उन्हें तसल्ल देते हैं कक रेिम का गैर मदा से ताल्लुक और एक बारगी का तलाक गैर कानूनी भी है और सामाक्जक रूप से भी गलत। इस चतकर में मह नों बीत रहे हैं, कसूर को दकु ान, घर और रेिम और उनके बच्चों के जीिन से ननकलिा ददया है गुल्लक सेठ ने। अफिाह है कक रेिम की इद्दत पूर होने िाल है, अब िो ननकाह करेगी फै जन से। गुल्लक सेठ जब तक कसूर को सिरोमखण कहकर धमकते रहते हैं कक िो यूपी की रेन से गोरखपुर लौट जाये िरना िे उसे या तो जेल करिा देंगे या मरिा देंगे। कसूर अब बेहद परेिान है तयोंकक उसके बच्चे भी उसको अब” सिरोमखण अंकल” कहकर पुकारते हैं। *******
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 78 पुस्तक समीक्षा- राजभार्ा दह िंदी के नवोन्मेर्ी आयाम िॉ. रािलु समश्र, भारत अध्यि, सिदं ी सवभाग केंद्रीय बौद्ध सवद्या िंस्थान(िम सवश्वसवद्यालय) लेि- 194101 (लद्दाख कें द्रिासित प्रदेि) http://bundela-desa-ke.blogspot.com िपं कष - [email protected] राजभाषा दहंद के कायाकार आयामों पर लंबे समय से कायरा त श्री राहुल खटे की हाल ह में प्रकासित कृनत है- राजभाषा दहंद के निोन्मेषी आयाम। राजभाषा दहदं के साथ ह दहदं के प्रयोजनमूलक पिों पर विचार-विमिा का आज एक नया दौर ददखाई देता है। दहदं केिल सादहत्य से संबद्ध नह ं है, िरन् अनेक िेिों में दहदं के प्रगामी और कायका ार उपयोग अक्स्तत्ि में आए हैं। दहदं के अध्ययन-अध्यापन में प्रयोजनमूलक दहदं का नया िेि विकससत हुआ है। सूचना और संचार क्रांनत के साथ इस िेि में नए आयाम सक्ृजत हुए हैं। इन निीन आयामों ने क्जन अपेिाओं को कायाकार दहंद ि उसके निोन्मेष के संदभों में अनुभूत ककया है, ऐसी अपेिाओं की पूनता के सलए यह कृनत विसिर्षट है। राहुल खटे जी राजभाषा दहदं के कायाालयी िेि से संबंधधत हैं। िररर्षठ अधधकार होने के साथ ह राजभाषा दहदं से जुडे विसभन्न कायक्रा मों, योजनाओं और प्रबंधन आदद में उनकी सकक्रयता रहती है। इस कारण उनके पास अनुभिों का विस्तार भी है, और क्जज्ञासाओं का संसार भी है। उनकी सद्यः प्रकासित कृनत उनके दैनंददन अनुभिों के साथ ह क्जज्ञासुओं की क्जज्ञासाओं के समाधान के समेककत स्िरूप के तौर पर पाठकों के बीच आई है। चाँूकक कृनत व्यािहाररक दहदं और दहदं के निोन्मेषी पि पर केंदद्रत है, इस कारण बडे महत्त्ि की है। दहदं के प्रयोजनमूलक पिों को लेकर विश्िविद्यालय स्तर की अनेक पाठ्यपुस्तकें उपललध हैं। इनमें पाठ्यक्रम के अनुसार विषय समल जाते हैं। लेककन इस पररधध से बाहर ननकलकर यदद कोई कृनत दहदं के निोन्मेषी आयाम पर खोजनी हो, तो प्रायः ननरािा ह हाथ लगती रह है। राहुल जी इस पि पर साधिु ाद के साथ ह दहदं की सेिा की दृक्र्षट से असभनंदन के पाि हैं, कक उन्होंने अत्यंत साथका , सबल, सितत और महत्त्िपूणा कृनत दहदं जगत्को द है। संस्कार सादहत्यमाला, मुंबई से प्रकासित इस कृनत में इतकीस ननबंध हैं। सभी ननबंध िैचाररक गहनता के
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 79 पुस्तक समीक्षा— भारत से साथ ह त्यपरक जानकार से पूणा हैं। संग्रह का पहला ननबंध स्ियंप्रभा नामक 32 चैनलों के घर बैठे अध्ययन की व्यिस्था देने िाले कायक्रा म पर केंदद्रत है। िषा 2017 में यह आनलाइन अध्ययन के सलए प्रारंभ ककया गया था। ऐसे अनेक विद्याधथायों के सलए यह उपयोगी बना, जो ककसी भी कारण से ननयसमत रूप से पढ़ने के सलए नह ं जा सकते। हम देखते हैं, कक िषा 2020 तक ऐसे पाठ्यक्रम बहुत उपयोगी और प्रचसलत नह ं हो सके , लेककन कोविड-19 की विभीवषका के समय ये पाठ्यक्रम विद्याधथया ों के सलए बहुत उपयोगी हुए। स्ियंप्रभा योजना की वििषे ताओं के साथ ह आनलाइन अध्ययन से संबंधधत अनेक जानकाररयााँ, जैसे- नेिनल डडक्जटल लाइब्रेर , रार्षर य िैिखणक डडपाक्जटर , मूक (एमओसीसी) आदद की जानकार विस्तार के साथ समलती है। संग्रह के दसू रे आलेख- ‘भारत की सििा नीनत और राजभाषा नीनत’ में दहदं के साथ ह अन्य भारतीय भाषाओं की सििा के िेि में उपयोधगता पर वििद धचतं न ककया गया है। भारत की नई सििा नीनत में दहदं को उसका सम्मानजनक स्थान देने की अननिायता ा का पि आलेख में ददखाई देता है। तीसरा आलेख- ‘भाषा संगम : एक भारत श्रेर्षठ भारत’ है। यह आलेख भारत सरकार द्िारा विसभन्न भारतीय भाषाओं को एकसाथ लाते हुए विसभन्न विद्यालयों, अलग-अलग किा-स्तरों में न केिल भाषायी विविधता को रार्षर य एकता का सूि बनाने के प्रयास का विश्लेषण करता है, िरन् भारतीय भाषाओं के माध्यम से भारत की सांस्कृनतक विविधता को जन-जन तक पहुाँचाने के भारत सरकार के प्रयासों के प्रनत अपनी सम्मनत प्रकट करता है। ‘माइक्रोसाफ्ट के उपयोगी एप्ल के िन’ संग्रह का बहुत रोचक आलेख है, क्जसमें त्रबगं , स्िे, एम एस िड,ा इंडडक ई-मेल एड्रेस जैसे उपयोगी साफ्टिेयसा की जानकार और प्रयोग के तर कों को बताया गया है। दहंद के साथ ह अन्य भारतीय भाषाओं में ‘माइक्रोसाफ्ट’ के ‘एप्ल के िन्स’ का कैसे उपयोग कर सकते हैं, यह भी इस आलेख को पढ़कर जाना जा सकता है। संग्रह का अगला आलेख- ‘दहंद विज्ञान-तकनीकी सादहत्य की
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 80 उपललधता और पाठ्यक्रम’ है। दहंद को देि की भाषा बनाने, रार्षरभाषा का स्थान ददलाने और साथ ह काया-व्यिहार में अंग्रेजी के स्थान पर दहदं को लाने की बातें तो बहुत होती हैं, लेककन तया विसभन्न िेिों में दहदं की पुस्तकों की, दहदं में अध्ययन सामग्री की उपललधता पर विचार ककया जाता है? इस प्रश्न का उत्तर खगाँ ालता यह आलेख लेखक द्िारा प्रस्तुत ककए गए आाँकडों ि त्यों की कसौट पर कसते हुए अनेक विचारों का उद्िेलन पैदा कर देता है। आज भी विज्ञान, तकनीकी, धचककत्सा के साथ ह अनेक विषयों में दहदं में सलखी हुई स्तर य पुस्तकों का अभाि धचनंतत करता है। ‘ईडडयट बॉतस (टेसलविजन) और ककसानों की आत्महत्याएाँ’ एकदम अलग तासीर का आलेख है। ककसानों की आत्महत्याओं के कारण एक अलग दृक्र्षट के साथ इस आलेख में धचक्ह्नत ककए गए हैं। सूचना-संचार के माध्यमों ने लोगों के अंदर महत्त्िाकांिाओं को जगाया है, और जीिन को जदटल बना ददया है। टेल विजन से इसकी िरुुआत को लेखक मानता है। आज का युिा िगा खेती- ककसानी जैसे काम को तुच्छ मानता है। जो ककसानी में लगे हैं, उनकी दिा देखकर भी ऐसा होना स्िाभाविक लगता है। खेती-ककसानी में निाचार हो रहा है, लेककन इसका प्रभाि आज भी अनेक ककसानों तक नह ं पहुाँच पाया है। ऐसी विसभन्न क्स्थनतयााँ ककसानों के जीिन के सलए, उनके अक्स्तत्ि के सलए संकट पैदा करती हैं। ऐसी विषमताओं की तरफ आलेख ध्यान खींचता है। ‘दिाितारों की िैज्ञाननकता’ और ‘सह तया? 84 लाख योननयााँ या डाविान का विकासिाद’ दोनों आलेख उन प्रचसलत धासमाक मान्यताओं के िैज्ञाननक संदभों को विश्लेवषत करते हैं, क्जनके बारे में विज्ञानसम्मत और तकापरक जानकार आज भी बहुत-से लोगों को नह ं है। प्रायः विज्ञान से दरू होने पर अंधविश्िास पनपता है। अंधविश्िास में ताकका कता नह ं होती, और विज्ञानसम्मत-तका सम्मत त्यों की अनुपक्स्थनत में अंधविश्िास कुतका के रूप में या विकृनत के रूप में पनपने लगता है। हमार धासमाक मान्यताओं को विज्ञान की कसौट पर कसना आधुननकता का एक अंग है। यह आिश्यक भी है। दोनों ह आलेख इस दृक्र्षट से अनेक समाधान दे जाते हैं। ‘बकैंकंग िेि के िलदों की व्युत्पवत्त और प्रयोग’ बहुत रोचक आलेख है। बकैंकंग िेि में अनेक ऐसे िलद प्रयोग में आते हैं, क्जनके बारे में जानकार कम होती है, और क्जज्ञासा अधधक...। यह आलेख ऐसे अनेक िलदों की गहर पडताल करता है, अनेक रुधचकर त्य भी सामने लाता है। ‘दहंद एिं अन्य भारतीय भाषाओं की प्रगनत में तकनीक का पुस्तक समीक्षा— भारत से
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 81 पुस्तक समीक्षा— भारत से योगदान’ अन्य महत्त्िपूणा आलेख है। सूचना और संचार तकनीक ने भारतीय भाषाओं को स्थानयत्ि ददया है। एक समय दहंद का काम भी अंग्रेजी पर ननभरा हुआ करता था। आज दहदं का तकनीकी िेि में खूब उपयोग होने लगा है, साथ ह दसू र भारतीय भाषाएाँभी समद्ृ ध हुई हैं। ‘भारतीय विज्ञान की परंपरा : रार्षर य विज्ञान ददिस के पररप्रेक्ष्य में’ और ‘भारतीय भाषा में विज्ञानलेखन’ दो ऐसे आलेख हैं, जो विज्ञान के िेि में दहंद और अन्य भारतीय भाषाओं के विस्तार को रेखांककत करते हैं। भारतीय ज्ञान-परंपरा में विज्ञान का अन्यतम स्थान रहा है। लेककन पाश्चात्य प्रभाि और अंग्रेजी को ह विसिर्षट मान लेने की नीयत ने स्िाधीनता के बाद भी दहंद और अन्य भारतीय भाषाओं को विज्ञान के व्यापक संदभों से संलग्न नह ककया था। पहला आलेख सरकार के स्तर पर ककए जाने िाले प्रयासों को, और दसू रा आलेख रचनाकारों, लेखकों के प्रयासों को विश्लेवषत करता है। ‘देिनागर सलवप में भी बन सकती है, ई-मेल आय डी’ और ‘दहदं कहाननयााँ सुनें अपने मोबायल पर’ ऐसे आलेख हैं, जो दहदं प्रेसमयों को प्रसन्न होने का अिसर देते प्रतीत होते हैं। प्रायः ई-मेल पते अंग्रेजी में होते हैं, और जब दहदं के यूननकोड फांट खूब प्रयोग में आ रहे हों, तो मेल पते दहदं में तयों नह ं हो सकते? और अगर हो सकते हैं, तो कैसे? ये प्रश्न आलेख में अपने उत्तर पा जाते हैं। और दहदं में कहाननयााँसुनने का सुख कैसे प्राप्त करें, इसका उत्तर दसू रे आलेख में समल जाता है। ‘रामचररत मानस में सादहत्य और विज्ञान का अंतसांबंध...’ और ‘तया हम अपने आपको सिाश्रेर्षठ भारतीय समझते हैं....’, ये दोनों आलेख भारत और भारतीयता के संदभा में विसिर्षट हैं। श्रीरामचररतमानस देि ह नह ं, दनुनया में अनेक लोगों के सलए पूज्य और मागदा िका ग्रंथ है। मानस में ननदहत विज्ञानसम्मत त्य जन-आस्थाओं को प्रगाढ़ करने में महत्त्िपूणा हैं। इस दृक्र्षट से अनेक त्यों को उके रता यह आलेख बडे महत्त्ि का है। इसी प्रकार विदेि से आयानतत विचारों और काया-व्यिहार पर कडी चोट करता दसू रा आलेख भारतीयता के प्रनत आस्थािान होने की सीख दे जाता है। ‘मूषक गया कू आया’, ‘आन स्क्रीन की-बोडा’ और ‘भावषनन : भारतीय भाषाओं में अनुिाद का प्लेटफामा’, में दहदं के सलए उपयोगी आधुननक ‘साफ्टिेयर’ और ‘एप’ के बारे में विस्तार से बताया गया है। ऑन स्क्रीन की- बोडा जहााँ टाइवप ंग की जदटलता को कम करने िाला है, िह ं भाषाओं के मध्य सेतु, अथाात् अनुिाद के सलए ‘भावषनन’ प्लेटफामा की उपयोधगता और कायिा लै के बारे में पता चलता है। संग्रह का अंनतम आलेख ’प्रोफे सर
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 82 पुस्तक समीक्षा— भारत से ऑफ प्रैक्तटस’ की नई योजना का विश्लेषण करता है। हमारे आसपास अनेक ऐसे कुिल लोग होते हैं, जो अपनी योग्यता और कायादिता को नए अध्येताओं के साथ साझा करके समाज का दहत कर सकते हैं। केिल उपाधध न होने पर ऐसे लोगों का कौिल समाज को विधधसम्मत ढंग से उपललध नह ं हो पाता था। केंद्र सरकार द्िारा उच्च सििा में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्तटस योजना को लागूकरना अनेक अथों में लाभकार हो सकता है। आलेख में व्यापक विश्लेषण इस योजना की साथाकता को ससद्ध करता है। समग्रतः, समीक्षित कृनत के सभी आलेख विविधता के साथ एकरसता का भान कराते हुए दहदं के निोन्मेषी आयामों पर गहन विश्लेषण करते हैं। अनेक नई जानकाररयों, तकनीकी अनुप्रयोगों, सूचना -संचार की बार ककयों, दहंद और अन्य भारतीय भाषाओं के साफ्टिेयर और एप्ल के िन्स की जानकाररयों के साथ ह रुधचकर त्यों को जानने के सलए यह कृनत महत्त्िपूणा है। समीक्षित कृनत के कृनतकार श्री राहुल खटे ने अपने अनुभिों को बडे रोचक ढंग से सलवपबद्ध ककया है, जानकाररयों की साझेदार की है। इन्ह ं विसिर्षटताओं के कारण यह कृनत पठनीय भी है, और संग्रहणीय भी है। समीक्षित कृनत- राजभाषा दहंद के निोन्मेषी आयाम लेखक- श्री राहुल खटे प्रकािक- संस्कार सादहत्यमाला मुंबई मूल्य- 199/- ********
अप्रैल-जून २०२३, सस िंगापुर संगम ◦ www.singaporesangam.com ◦ 83 आपकेविचार और प्रनतकक्रयाएाँ सादर आमंत्रित हैं : [email protected]