भरनी चाहिए कई-कई किताबें, हमारी दूसरी मोहब्बत सेभी, गलत है मोहब्बत करना, सिर्फ पहली मोहब्बत सेही। ख़ामोश पड़ा है मीर, ग़ालिब और गुलज़ार, शायरों का लश्कर कर न पाया कोई इज़हार, क्या जोड़ी सिर्फ एक थी, कृष्ण और राधा? प्रेम तो हरगिज़ नहीं था रुक्मिणी का भी आधा। दूसरी मोहब्बत के उदाहरण की, मेरे पास आज भी कमी है,है मेरी भी याद्दाश्त पर, धूल की मोटी परत ज़मीं है।है हकदार है हहै मारे ज़िक्र का, दूसरा मोहब्बत भी हमारा, चाहे कितना भी ख़ास हो पहला, दूसरा भी नहीं है कम है प्यारा। पहली मोहब्बत की पहली, वह बारिश तो याद है,है पर दूसरी मोहब्बत का वो सावन, उससेभी क्या ही फ़रियाद है ?है माना पहली मोहब्बत में, मुश्किल सेही पर, दिल तो मिला था, और आखिर दूसरी मोहब्बत मेंभी, पंक पर किसलय तो खिला था। आज दूसरी मोहब्बत को, अहमियत दे दो ज़रा, कह दो यह अद्वैत है,है एकबार मासूमियत सेज़रा। दिला दो हक उसको, जिसकी वह हकदार है,है आखिर साथ निभानेमें, एक वही तो ईमानदार है।है बेशक खड़ी होगी ये, आपके हरेक पैमानेपे, फैला दिया है पैगाम इसका, मैंनेसारे ज़मानेमें। इतनेमेंतीसरी मोहब्बत हुई खड़ी, पूछा क्या है उसहै का क़सूर, क्यों ज़मानेमें कर रहा मैं, सिर्फ पहली-दूसरी को मशहूर? उसकी संक्षिप्त मगर संपूर्णबात ने, मुझे अपनी भूल का आभास कराया, कितना गलत था मैं और मेरा मन, मेरे हृदय को यह एहसास कराया। बारिश हो कहीं भी या कभी भी, बस कलियाँखिलनी चाहिए, मोहब्बत हो कोई भी या कभी भी, बस मोहब्बत होनी चाहिए। मोहब्बत तो बस एक एहसास है,है जैसेमृत पड़े वन मेंकोई कस्तूरी, मोहब्बत तो आखिर मोहब्बत है,है चाहे पह हे ली हो या हो कोई दूसरी।। 144
हमा रे पा ठकों की प्रस्तुति याँ हमा रे पा ठकों की प्रस्तुति याँ
कह जाऊँगा हो श उड़ जा ए, ऐसे कपटी शब्द मैं, तुम्हें सुना ऊँगा , दि ल तड़पेगा , मन भड़केगा , ऐसे कटा क्ष कह जा ऊँगा । तुम्हा री दबी आवा ज़ में, मैं गंभी र भा र भर जा ऊँगा , थो ड़ा कम चमको गे, पल-पल तरसो गे, ऐसी घो र दुर्दशा , तुम्हा री कर जा ऊँगा , ला श सा जी वि त पा ओगे ख़ुदख़ु को , तुम्हें ऐसा जी वन दे जा ऊँगा हला हल वि ष के घूंटघूं, मैं तुम्हा रे लि ए ले आऊँगा , रेशमी आँखें लि ए बैठे हो गे तुम, मैं नग्न बेशर्म सा आऊँगा उम्मी द लगा ए बैठे हो , तो सुन लो इतना कि , मैं सुखद सन्देश नहीं ला ऊँगा , तुम्हा रे लौ ह रूपी मन में, मैं भी षण जंग सी कथा एँ गा ऊँगा । बसंत की आस लगा ए बैठे हो , मैं पतझड़ सा सूना पन दे जा ऊँगा , पल-पल का कतरा मैं, तुमसे छी न ले जा ऊँगा , तुम्हा रे मखमली मन में, फाँ स सा फँस जा ऊँगा , और कि तना भी समझ लो तुम, मैं ख़ा स समझ नही आऊँगा , मत बुला ओ मुझे, मैं पहले सा बनकर नहीं आऊँगा ।। – जि तेंद्र 1 4 6
कल बिस्तर मेंलिपटे मुझे यह ख़्याल आया, ख़्यालों ही ख़्यालों में, दिन के तीसरे पहर में, खुली आँखों सेतुम्हारा ख़्वाब आया। — कु छ वजह — – सुशां त उधेड़ दूँ तेरी चुनरी का रेशा-रेशा और मिटा छोड़ूँ उस ठेहरी धूल को ज़मीं पर से कहीं इतनी ताकत मेरी हथेलियों मेंहोती, या कम से कम, तेरा मुझमें यह खालीपन उढ़ेलकर, यूँदूर चलेजानेकी, कुछ तो वजह होती। बाहर आँगन के तप रहे फ़र्श पर, अपना मुखड़ा अपनेबालों से पर्दाकिए, नंगेपाँव तुम चलकर आती हो, अपनेपीलेसूती दुपट्टे की, सिलवटें मखम टें ली हाथों सेसुलझातेहुए झाड़कर उसेतार पर फैलाती हो। फिर पलक झपकते एक ही ये सब बन इक तस्वीर गई, तेरी चुन्नी, नर्मधूप के साए में लहरानेमें मग्न है,है पता यह न चला कि तुम किस ओर गई। उस चुनरिया सेछंटती हुई नम हवा ने तेरे बदन के नमकीन स्वाद को मुझे अभी था ही चखाया, कि दहलीज़ पर जमी सफ़ेद धूल की चादर ने, अपना संदेसा मेरे कानों मेंचीखकर दे सुनाया थोड़ा झुक कर देखूँ, तो उस धूल पर छपी तेरे तलवों की नासाफ़ आकृति मेरी आँखेंमुझे हर बार दिखाती हैं,,हैं उतरतेहुए, सीढ़ियों पर से, मद्धम होती तेरे कदमों की आहट येख़ामोशी मुझे आज भी सुना कर जाती है।है 147
अधूरी है – जि तेंद्र मैं लि खता हूँ हता श रह जा ता हूँ, लेकि न क्या करूं! लि खना मेरी मजबूरी है, क्यों कि मेरी सो च और मेरी कलम में, इतनी सी ही तो दूरी है, कवि हूँ मैं, पन्ने को कुरेद देता हूँ, अपने शब्दों से, यही मेरी कलम से दस्तूरी है, मेरे शब्दों का असर फी का न रह जा ए, भले ही इस महफ़ि ल में जा न पूरी है, लेकि न मेरी कवि ता अभी अधूरी है, क्यों कि समझ और समा ज मे अभी दूरी है, कहीं दि ल पत्थर है, तो कही कि सी की जुबाँ छुरी है, जि स्म पा स है लेकि न दि लों में दूरी है। कि तनी सा री लैंगि कता एँ हैं, लेकि न लगा ओ ज़ा हि र करने के लि ए, मेल संग फि मेल वा ला कॉ नसेप्ट ही हो ना , क्यों इतना ज़रूरी है, प्रेम पर बंदि शें लगा कर, हॉ नर कि लिं ग करना , इस लंगड़े समा ज की कौ न सी मजबूरी है, करना है बदला व मुझे ,औ' इसकी भी उम्मी द पूरी है, लेकि न मेरी कवि ता अभी अधूरी है । इस पि तृसत्ता त्मक समा ज में, ना री तुम नि रंतर अपने भा ग्य को मत को सना , समय आएगा अपने हक़ को पा ने के लि ए, ख़ुद को मत रो कना , क्यों कि ना री , तेरी टूटी चूड़ि यों में धा र पूरी है, रुकना मत, ये सुनकर, कि समझ और समा ज में अभी दूरी है। ग़री बी की मा र ने, कुपो षण की कुदा र से, न जा नें कि तनी कब्रें उकेरी है, और भूख से भरी आँखों ने, दुका नों पर पकती रो टि याँ केवल घूरी है। ख़ूबसूरती को रंगों से मा पना क्या ज़रुरी है, बो लते हो , ये चमड़ी का ली और ये भूरी है, अरे! क्या ये चमड़ी का अंतर करना भी ज़रूरी है। बड़ी -छो टी , ऊँची -नी ची , छूत-अछूत जा ति , ये तेरी ये मेरी है, क्यों ये भेदभा व की बा तें हमा रे समा ज में, इतनी गहरी है, का ली रा त है अभी और सुबह हो ने में भी देरी है, सच कह रहा हूँ, मेरी कवि ता अभी अधूरी है, क्यों कि अभी भी समझ और समा ज में दूरी है।। 148
आज मैं अपना नहीं, कमरे का हाल बताऊँगा, उजड़ती दीवारों के , गिरते हुए रंगों की दशा बताऊँगा, कोनेमें पड़े, मुरझाए, पौधों के बारे में बताऊँगा, चादर में पड़ी, गहरी सिलवटों, की लाचारी को बताऊँगा, दर्पण पर जमी धूल को, पसीजते, मटके के आशुँओं से हटाऊँगा, आज मैं अपना नहीं, कमरे का हाल बताऊँगा। मकड़ी के जालेमें फँसीं सूखी रूह के बारे में बताऊँगा, कमरे में आते प्रकाश मेंमौजूद चमकते कणों के बारे में बताऊँगा, इस बेजान से कमरे मेंकोनेमें चलती मग्न चीटियों के बारे में बताऊँगा, अधूरे सेदानेंको खानें आती-जाती गिलहरी के बारे में बताऊँगा, लेकिन कितना भी पूछ लो, आज मैं अपना नहीं, कमरे का हाल बताऊँगा।। हा ल – जि तेंद्र 1 4 9
मैं एक आम सा लड़का हूँ, हूँ जुगनू पकड़े हैं, हैं और कि ए झगड़े हैं।हैं रहा हूँ मैं, फटे लि वा सों में, घा स-फूस के बने नि वा सों में। मेरी चप्पलों में अभी भी कुछ काँ टें हैं, हैं और दा ल-भा त खा ते समय, मैंने बहुत थरि या -बर्तन चा टें हैं।हैं दूध-रो टी खा ने का शौ क़ है, है मेरी जॉ मेटरी बॉ क्स में अभी भी , टूटी हुई पेन्सि ल की नो क है।है मेरी कमी ज़ की बटनों में अलग-अलग रंग के धा गे हैं, हैं अमरूद और खेतों की सब्ज़ि याँ चुरा कर भी भा गे हैं।हैं नदी कि ना रे मेरी शा म है और, हाँ , कह सकते हो यह लड़का आम है।है। आम लड़का – जि तेंद्र 150
कहते हैं त्यो हा र के दि न सब मि लने आते हैं,हैं लेकि न मेरी माँ मुझसे नहीं मि लने आई। उसने इस बा र गुझि या नहीं बना ई, न अपने हा थों से खि ला ई। तेरे सिं दुर की डि ब्बी खुली पड़ी थी , कमबख़्त हवा आई और अब वो भी खा ली हो गई। माँ तेरी पा यल की कि ना री का ली हो गई, माँ तू आई नहीं , मेरी आँखें जो भा री थी , अब वो भी रो -रो कर खा ली हो गई। माँ अब मैं बि गड़ भी गया , और अब मेरे मख़मली शब्दों में गा ली हो गईं। पहले मैं छो टी कटो री में खा ता था न माँ , अब वो कटो री भी था ली हो गई। तेरे न हो ने से, मेरे चेहरे पर, जो ला ली आती थी , अब वो ला ली भी न जा ने कहाँ खो गई। तू आजा न माँ , समय बी तता जा रहा है,है तेरे बि ना हो ली थी , दी पा वली भी हो गई। माँ बता न, तू कहाँ खो गई।। त्यो हा र– जि तेन्द्र 1 5 1
वो फ़ि र आएँगे – जि तेंद्र वो फ़ि र से आएँगे, कुछ या दें बना एँगे, दी गई या दों में, फ़ि र से उदा सी भर जा एँगे, वो फ़ि र से आएँगे। तुम्हा री रूह के ग्री ष्म में, हेमंहे मंत सी शी तलता दे जा एँगे, वो फ़ि र से आएँगे, कि तने भी मज़बूत हो जा ओ तुम, लेकि न टटो ल-टटो ल के, तुम्हा री कमज़ो र नीं व को , ध्वस्त कर जा एँगे, वो फ़ि र से आएँगे। अपने सा थ जो भी ला एँगे, अरे! जो भी हो , कुछ देर दि ल तो बहला एँगे, कर सूर्य सा बुलंद तुम्हें,हें खुद शा म की तरह ढल जा एँगे, चिं ति त मत हो , वो फ़ि र आएँगे। भी ड़ में अकेला ख़ुद को पा कर, तुम्हा री तरफ मुस्कुरा कर हा थ बढा एँगे, और तुम्हा रे घा व, तुम्हा री आँखों से पि घलकर, बहने लग जा एँगे। चिं ति त मत हो , वो फ़ि र आएँगे।। 1 5 2
मेरा पता आज मैंने अपने घर का नम्बर मिटाया है और गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है और हर सड़क की दिशा का नाम पोंछ दिया है पर अगर आपको मुझेज़रूर पाना है तो हर देश के, हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ यह एक शाप है, यह एक वर है है और जहाँभी आज़ाद रूह की झलक पड़े – समझना वह मेरा घर है।है — अमृता प्री तम
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