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Published by Himanshu Shekhar Hindi Poet, 2021-09-04 08:42:34

Indexed Shabd Satta 3

Indexed Shabd Satta 3

पर वो तोड़ नहीं कती उ मिबत डोर को
िो ममता ने बाधँू रखा है,

बहुत मजु मकल है स्िी का बदु ्ध का होना।

कल अनाय टहलते ये ख्याल आया..
बगीचा फलों े भरा था,

मन्त्द चलती हवाओ ने हर तरफ खुशब त्रबखेर रखा
था,

हर तरर्फ शाजन्त्त ही शाजन्त्त
कहीं कु छ नहीं.....

अपनी ाूँ ो को खीँची कर
खशु बओ को अपने अदं र उतार सलया
यही वो क्षण था िब बुद्धत्व ने खींचा था मुझे

शायद
ऐ े ही मय बदु ्ध ने भी बुद्धत्व को स्वीकार क्रकया

होगा,
उनके सलए भी शायद मजु मकल ही रहा होगा

50 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

पर स्िी के सलए माँू होना बुद्ध होने े भी बड़ा है।

शब्दों की आवािाही,
त्रबना रोक टोक के थी...
भावनाओं ने भी मचा रखी थी मन में उथल पथु ल
शायद कहीं कु छ दरक गया था।

ररमतो ने बाँधू रखा है जस्ियों को
या यँू कहे जस्ियों ने ही बाँधू रखा है ररमते को

कदठन है स्िी का बुद्ध होना।

ुधा, गाजियाबाद

दी की ब े बड़ी घटना..

इन मामली

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 51

ाधारण ददखने वाली घटनाओं को
इततहा भले ही र्ख का दे
एक तरफा
हासशए पर ही ,

भारी-भरकम ऐततहास क पोधथयां
ार्फ इंकार कर दे

इन्त्हंे दस्तावेि मानने े ,
यकीन मानों

िबक्रक गुिर रहें हैं हम
अब तक के ब े पीड़ादायक

महा िं मण के दौर े ,
इतने पर भी

मोर पंखों का हेिा िाना
अपनी वप्रय क्रकताबों मंे
अब तक की
ब े बड़ी घटना होगी
इ दी की !!

52 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

नसमता गुप्ता "मन ी", मेरठ

कारधगल वविय ददव

कारधगल वविय ददव यं ही नहीं मनाया िाता।
यह ददव वीरों के रतत की खुशब ाथ लाता।

वीरों ने रतत बहाया अपना।
वविय का देखा पना।
देकर अपनी शहादत।

रतत े असभषेक क्रकया भारत मां का मस्तक।
अपनी मां की गोद खाली कर गए।
पत्नी की मांग नी कर गए।
बहन की राखी अनाथ कर गए।
वे घर े मुस्कु राते हुए गए।

यह रणबांकु रे ब को स्तब्ध कर गए।

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 53

देकर हमको वविय का निराना,
यह वीर ना िाने कहां चले गए।
इन वीर शहीदों को शत-शत प्रणाम।

मेरे देश की आन बान शान।
कभी नहीं भलंेगे हम उनका अतलु नीय बसलदान।

किदा ार रहंेगे हम उनके हमेशा।
जिनकी वीरता देती देश प्रेम का ंदेशा।

िय दहदं िय भारत

ुलेखा कु लश्रेष्ठ, बेंगलुरु

अकाल

हो िाए बंिर िब धरती, उपिे नहीं अनाि।
खाना ही पड़ता आयाततत, काम न आती लाि॥

54 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

वै ा ही कु छ हुआ लगे है, त्यौहारों के ाथ।
खे हो गए अपने ारे, नए हुए आयात॥

फलां ददव पर बधाई दे कर, फलां को करो पषु ्ट।
अथा प्रयोिन त्रबना ववषय के , हुए अन्त्यथा रुष्ट॥

'वेलेन्त्टाइन' हुआ अग्रणी, स्टेट की छाप।
नहीं कोई कं ोच, धड़ल्ला हुआ प्रेम आलाप॥
मात-वपता को यदा-कदा, बतलाने वाला पजमचम।
स खा रहा है नवधा ववधधयाँू, बधाई दे दो अधग्रम॥
बहन-भाई िो भावहीन हैं, मँूुह तक ना ददखलात।े
उन्त्हंे तया पता रक्षाबन्त्धन, भाई-दि के नात॥े
भौततकता की यही पद्धतत, 'वुमन्त् ' डे को घेरे।
वो तया िानें ात िनम के , कै े लेते फे रे॥
अपनी ही बेटी को एक ददन, दशना देने वाले।
पैर धो कर नौ कन्त्या को, देंगे कहाँू तनवाले॥
पतत के हेतु प्रेम व तनष्ठा, एक ददन हो तो ववकस त।
व्रत-उपवा करे िो नारी, उनको लगती शोवषत॥

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 55

वट-पीपल-तुल ी पिंे हम, हर उत् व त्यौहार।
'अथ'ा 'नेचर' ददव मना कर, वो करते उपकार॥
गुरु का वन्त्दन करते हैं हम, पसु ्तक मस्तक लाते।
एक डे 'बकु ' का एक 'टीचर' का, वो हम को स खलाते॥
उन की ये ही चतरु ाई िो, परे िग पर थोपी।
अपनी िो भी रही मस्या, हर माि को ौंपी॥
अब भी िो पहचानें उनके , उत् व हंै व्यापार।
अपनी िड़ े िुड़ िाएूँ, तो ंस्कार ाकार॥

प्रतीक 'भारत' पलोड़ (दपणा (, बेंगलरु ु

ुख ार

जिदं गी चलते रहना है
लोग समलते ही िाएंगे
उन्त्हे गले े लगाओ

56 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

ददल मंे उतरते िाएंगे।
उन्त्हें िब मन के धागे

में वपरोए िाएगा,
उ का एक ंदु र ा
हार बन िाएगा ।
पहनो और खशु रहो
महक अततशय रहेगी
जिंदगी मंे खशु ब े
खु द ी वविय रहेगी।

प्रभाकर िोशी, पणु े

त्रबक गई बाजार मंे

बेब और लाचार थी
गरीब बेघरबार थी,

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 57

त्रबक गई बाजार मंे
बेटी िो घर की लाि थी,
शरम थी उ ने तोड़ दी
िीवन की राह मोड़ दी,

घघंु रू िाए पावं मंे
बदनाम हुई गांव मंे,
पायल े ररमता तोड़ सलया
खुसशयों को गम का मोड़ ददया,
थाप े तबले की अब
कदम को वो समलाती थी,
छोड़ रामधुन वो अब
प्रेमगीत गाती थी,
लटके झटके ,ठु मके दके
आये थे, लाि को बदल के
खोखला था उ का स्वर

बेअथा श्रगंृ ार था,
लेटती अगं ारों पे थी

58 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

छता िो खरीदार था,
उपयोग क्रकया, फें क ददया

िै े के ामान थी,
महि पुतली ही थी
तया ना कोई इं ान थी !!
बेचा जरूर उ ने था तन
बेचा भी तया जमीर था?
अपमातनत ही ब क्रकया क्रकए
मझा ना कोई पीड़ था ,
िब तक रहा था तन िवाूँ
बोसलयाँू लगती रहीं
ढला बदन , रूठा यौवन
उपेक्षाएं समलती रहीं
मान सलया ये भी चलो

हेय हंै तवायर्फें ,
कधथत भ्य माि पर

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 59

दाग ये तवायफें ,
िाते है पर कोठों पे िो
तया परु ुष वो महान हैं?
उनके ये ऐ े कमा तया
आदशा की पहचान हैं?
तयँू इनका ना बदहष्कार हो !
कटघरे मंे खड़े तयूँ नहीं
इनके भी सं ्कार हों !!!

प्रेरणा पाररश, नई ददल्ली

कवव, जिदं गी और कववता

यहां हर कोई खुद मंे एक कवव है , और उनकी
जिदं गी

अपने आप मंे एक कववता ।

60 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

जि में शब्दों की िगह कभी - कभी भावनाएं ले लेती
हंै ।

और कभी कभी हमारी भावनाओं की िगह हमारे
शब्द ले लेते हंै ।

िै े एक कववता की पंजतत भावनाओं े राबोर
रहती है ।

ठीक उ ी प्रकार हमारे अल्फािों में भी
भावनाएं जम्मसलत होती हैं ।

िब हम अपनी भावनाएं अल्फािों मंे बयां नहीं कर
पाते है ,

तो उ े शब्दों मंे वपरोते हैं ।
और कभी - कभी अल्फािों में ही बयां कर देते हंै
कु छ यं अपने े लगते हैं ये कवव , जिंदगी और

कववता ।

समसलशा समश्रा, स वान

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 61

दपणा ............

इं ान पत्थर को भी पानी कर कता है।
खुद िाल बुन, खुद ही फं ता है।।

जि मंे हंै िवाला, धारा ा वो बेहता है।
पार हंै वो, तप -तप के ोना बनता है।।

िल नहीं, बुलबलु ों का स्वप्न देख।
क्रफर उन्त्हीं बलु बुलों े खेलता है।।
मदं र मे डब ज्ञान ंधचत करता है,
दीवाना है मस्ती मे आगे बड़ता है।

हजारो अह ा लीन है उ मे,
मस्तक पर तेज, नैनो मे लै ाब सलये चलता है।।

मनषु ्य अगर एक बार ठान ले तो,
पथृ ्वी - आकाश एक कर कता है।
खुद िाल बनु , खदु ही फस्ता है।।

62 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

भागीरथी गगं ा धरा तलपे लाया था ,
रावण ने दहमालय पवता दहलाया था।

ब मय और बदु ्धध का खेल है,
अहंकार मे ही ब कु छ गवाया था।।

ाम - दाम - दण्ड - भेद के चलते,
महाभारत तक का मखु ददखलाया।

एक माि अिनुा के चलते,
बने गीता का ज्ञान हैं पाया।।

मय का पदहया न कभी रुकता है।
इं ान पत्थर को भी पानी कर कता है।।
इं ान पत्थर को भी पानी कर कता है।

खदु िाल बनु , खुद ही फं ता है।।

ेिल गोस्वामी, नई ददल्ली

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 63

पि

हर पुराना पि यादगारों का वपटारा खोलता है…
मीत कोई दर का,त्रबछु डा हुआ पा आता सलपटता

बोलता है….

पि कोई पुराना यादगारों का वपटारा खोलता है..
कान मंे फु फु ाता हृदय का भेद खोलता है..

हर पुराना पि यादगारों का वपटारा खोलता है…

मशीनी मानव whats app करने लगा..
ंबधं whats up तया हुआ तक स मेटने लगा..

तभी तो Mothers day,Fathers day,daughters day
मनाने लगे…

64 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

अंग्रेि चले गए उनकी प्रथा को िाने लगे..

भावनाएं facebook ,insta ,status पर छाने लगे….
आर्खर मतलबी Day तयों नही मनाने लगे..

सलकं न का पि सशक्षक के नाम,िवाहरलाल का पिु -
पिु ी के नाम,रामप्र ाद त्रबजस्मल का पि मां के नाम
भगत स हं का पि समिों के नाम आि भी झगझोडता

है..

क्रफर तयों ,कै े ,कब, पि मचु ाया, शमााया E-Mail
Whats-app,Insta,Face book पर आया …..

उ का रुप आि भी मझु े मझ में न आया ….

ववनीता शमाा, बेंगलुरु

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 65

जजंदगी के मौ म

जजंदगी ऐ ी ही तो है ात इंद्रधनुषी रंगो ी
जि मे कभी पतझड़ है कभी है ब तं ा उत् व!

कभी बाररश का लै ाब है तो कभी है ,
ावन के झले

कभी खुशी , कभी गम

कभी आखूँ ें नम , और कभी गुलाबों ी रंगत।
कभी बहारों का मौ म , कभी क्रर्फजा मे
न्त्नाटा ....

कभी शामों के ढलने का इंतजार और क्रफर उ मीठी
बु ह का इंतजार,

पर जजंदगी उ ी की है मु ाक्रर्फर ...... िो हर हाल मे
िीना िाने और हर मजु मकल मे खुद को ंभाले।

आशा मेहता, उत्तराखंड

66 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

देव मनिु तो बनना होगा

राष्र महान नहीं होता है
ं द के काननों े,

राष्र महान होता है के वल
च्चररि इं ानों े!

पुण्यात्मा तया होती पदै ा,
कभी कहीं काननों े,
वह के वल पैदा होती है

नतै तकता और शधु चता े!

िो त्य छु पे हैं शास्िों में , 67
उपतनषदों और पुराणों मंे
उनको तनकाल बाहर,
विा त्रबखेर देना होगा!

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

देव मनिु तो बनना होगा!

आध्याजत्मकता प्लाववत कर दो,
भारत की ीमा के बाहर,
द्वतै द्वैत वैष्णव शैव को,
धासमका िाबध कर दो!

हमंे िरूरत उ सशक्षा की,
िहाँू ब्रम्हचया हो, श्रद्धा हो,

वैज्ञातनकता, गरु ुकु ल हो,
पततत उठंे नारी िागतृ हों!

भारत मदहमा-मडं डत होगा,
यदद िागतृ हो ारे िन,
प्रबदु ्धता व्यावपत होगी,
स हं मान गरिेन्त्गे हम!

ं ार तनहारता है हमको,

68 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

अववचल आग्रह पणा दृजष्ट े!
धमा रूप रत्नों की आशा,
भारत रूपी रत्नाकर े!

पशु मानव को देव मनुि अब,
तनजमचत बनना ही होगा!
िय होगी शांतत की,
नहीं यदु ्ध की,

यक्ष प्रमन यह समटाना होगा!
देव मनुि तो बनना होगा!

कववता का शीषका : देव मनिु तो बनना होगा

स्व श्री िगदीश चंद्र पाटनी 'अबोध ', चम्पावत,

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 69

एक सशक्षक का प्रण

हे भगवन, दे मुझमें इतनी शजतत,
बनी रहे मझु मंे सशक्षा की भजतत,
एक आदशा सशक्षक ववरल बना रहँू ,
ज्ञान, चररि, म्पणता ा े भरा रहँू ,
काया ईमानदारी,तनष्ठा े तनभाता रहँू ।

ीधा- ादा , तनरसभमान,कमठा बन
िीवन तनमला बन पववि बना रहूँ,
कलात्मकता, गु मता गं डटा रहूँ,
ुन्त्दर सशक्षण पद्धतत े कदठन-नीर
ववषयों को रुधचकर बना पढ़ाता रहूँ।

सशक्षण काया को कारगर करता रहँू,
ह्रदय े उदार, हानुभतत े भरा रहूँ,
तनधना ों को तनुःशलु ्क सशक्षा देता रहँू,

70 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

स्वाथपा रक रािनीतत े दर रहकर,
छाि- सशक्षा के बीच ेतु बना रहँू।

ददव्यांग छािों-छािाओं की ेवा कर,
म्मातनत, मागदा शका सशक्षक बन,

पथप्रदशका िीवन भर कराता रहूँ ,
ाथका सशक्षक बन भारत का गौरव,
गं - गं माि ेवा भी करता रहँू।

ददनशे कौशल, दरभंगा

शादी कहाँू करे

िहाूँ हर बात मंे आनं द हो;
हर चीि का प्रबंध हो।

िहाूँ "ब" े आती गु ंध हो ।

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 71

वहीं रिामदं हो ।

िो काम को मझाए;
एक द रे को मझ पाए,
बीच मंे अहं को न लाए।

अपने को परख पाए
वहीं ररस्ता बनाए।

िहाूँ हम, हम न रह पाए;
तुम ,तुम न रह िाए ।
िहाँू कोई न हो पराय।
उ ी को अपना बनाए

जिय उ ी के सलए ;
हर काम हो खशु ी के सलए ।

ददन मसु ्कु राय,
शाम हो खशु ी के सलए ।

72 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

िो अपनों का ाथ न छु डवाए।
हम उ ी के सलए समट िाए ।

त्रबन्त्दु श्रीवास्तव, पु ौल

अफगातनस्तान हालत

1-उफ ये आग का दररया ,उफ ये खौफ का मंजर ।
कीड़ी के हाथ मे पत्थर, क्रक ी के हाथ मे खिं र।
न हम दम रह गया कोई न रह गया रहबर ।।

2-कहाूँ मिहब में क्रर्फतरत, कहा मजहब में नर्फरत।
यह देखो एक रंग का है , न कोई लहु अन्त्तर,

खुदा के वास्ते अब थाम लो,यह खौर्फ का मंिर।

3- तासलबानी हुतमरानो को ,न ीहत दे ना का कोई


शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 73

दतु नया मक दर क है ,कहा इं ातनयत ोई।
मार कोड़ो की खवातीन रहती है, कु दरत भी लह के

अमक है रोइ।
4 - दहटलर समटा औरंगिेब समटा , समटा दतु नया े

स कन्त्दर भी ,
िहा े लड़ गया लादेन , कोई तगु लक तो कोई तैमर

था बे क ,गजनबी चंगेज भी ।
समटकर बन गए थे , छछन्त्दर नया पैदा हुआ देखो

तासलबान का मुल्ला बरादर..

ुरेश चन्त्द्र, कानपरु

कृ ष्ण..

क्रक ने देखी रत तरे ी,
िो ब े ननै ो में वही, रत तरे ी।।

74 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

धुन बािे िो राधा राधा ,
रा रचाता त नजर आता ।।

छसलया बन कभी छलता है ,
क्रफर राधा के श्रगार में ब ता है।।

प्रकृ तत के रंगों में भी त है
व्याकु ल हो मन िो, क्रफर छन्त्दों मंे त है ।।

ववरह पल का काि भी त है
उल्लास त हृदय का राज भी त है।।

क्रक ने देखी रत तरे ी ,
िो ब े ननै न मंे वही मरत तरे ी।।

भारती वमाा, पणु े

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 75

भाषा के रूप अनेक

शब्दों में वपरोकर तनखर िाती हो,
सलख दं तो रचना बन िाती हो,

ोचं तो ख्यालों मंे आ िाती हो,
पढं िब ददल मंे मा िाती हो।

एक नई पहचान बन िाती हो,
हृदय में बके ब िाती हो,
मरु ली की धनु मंे घुल िाती हो
बोलं िब भाषा बन िाती हो।

माध्यम असभव्यजतत की बन िाती हो,
मन को मखु ररत कर िाती हो,
अंधेरा अज्ञान का समटा िाती हो

चाहं िब ोच में बदल िाती हो।

ोचं तो ख्याल बन िाती हो,

76 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

काव्य के रुप मंे ढल िाती हो,
ादहत्य पर आधार बन िाती हो,
अध्ययन े ज्ञान बढ़ा िाती हो।

बका पालनहार बन िाती हो,
िीवन को प्रकासशत कर िाती हो,

ोचं तो अपनी बन िाती हो,
िानने पर तारणहार बन िाती हो।

सलखं तो भाषा बन िाती हो,
हृदय को आनदं दत कर िाती हो,
वातयों मंे खुद को वपरो िाती हो
बोलं िब पहचान बन िाती हो।

मीन वमा,ा नोएडा

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 77

आओ ना माूँ

आओ ना माूँ
तरे ी गोद को स रहाना बनाऊूँ
आचं ल तले चनै े ो िाऊँू ,

भल िाऊूँ ारी परेशातनयां
करने दे ना माूँ , थोड़ी नादातनयाूँ,

च है अब बच्चा नहीं हूँ
अतल का भी कच्चा नहीं हूँ,
िी चाहे बन िाऊूँ क्रर्फर छोटा
ीने े लगाना , ददखूँ गर रोता,

आओ ना मा.ँू ......

मजु मकलंे मुझको िब िीने ना दंे
नाकासमयाँू कु न े ोने ना दें,
िब समले ना उलझनों का हल
आता है याद ब तरे ा आचूँ ल,

78 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

त ही एक हारा है माँू
जि को ददल ने पकु ारा है माँू ,

आओ ना माँू....

तरे ी बाहों मंे झमं क्रफर े
तरे े गालों को चुमं क्रफर े

च है, अब मैं भी वपता हूँ
बच्चों के सलए अब मैं िीता हँू ,

बोझ उठाए घर भर का मंै
थक गया , ुस्ताना चाहूँ ,

तरे ी बाहों के झले मंे
अपने गम भुलाना चाहँू,

क्रफर तरे ा गुड्डा बन िाऊूँ
बेक्रर्फिी े नाचूँ और गाऊँू

आओ ना माूँ.....

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 79

मेरी ही थी गलती मयै ा
छोड़ तुझे परदे को गया ,

तरे ी याद ताती हर पल
समलूँ तुझ े, आए कब वो कल,

पनों मंे त ददख िाती है
हौले े र हलाती है,
मनंै े तो धु ना ली तरे ी
त्रब राया, खबर ना पछी तरे ी,
तझु को ददया ना मनैं े हारा
क्रर्फर भी वै ा ही प्यार ततहारा,

आओ ना माू.ँ ....

कल िो ख्वाबों में त आई
िी भर प्रेम े मुझे तनहारा,

मेरा बेटा ब े अच्छा
कहकर स्नेह े मुझे पकु ारा,

आओ ना माँ.ू ....

80 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

अपनी भल धु ारूूँ गा मैं
पा तरे े लौट आऊँू गा म,ंै
तरे ी ममता की वो छै यां
लौटा देना , पकडँू मंै पयै ां,

आता हूँ मा.ँू .....

प्रेरणा पाररश, नई ददल्ली

आिादी

ये धरा भी आि हवषता है,
और गगन भी हषााया है ।
नीले ववतान के तले आि,
यह प्यारा ततरंगा लहराया है ।।

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 81

वीरो के रतत े सलखी हुई है,
इ ततरंगे की असमट कहानी ।
ततरंगे की शान न िाने पाए,
चाहे देनी हो हमको कु बाना ी ।।

िब तक धरती पर चादं य,ा
यह ततरंगा ऐ े ही लहराता रहे ।

कल ववमव के सशखरों तक,
ियगान भारत का गंिता रहे ।।

खोया िो गौरव हमारा था,
पाया है उ े स्वासभमान े ।
समली हमें िो आिादी यह,
हमारे वीरी के बसलदान े ।।

गंि रही है दशो ददशाओ,
शहीदों के ियगान े ।

82 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

नददयां भी कर रही यशोगान,
कल कल करती तननाद े ।।

ाररका अवस्थी, रायबरेली सशवगड़

देश वंदना

मेरा देश ,प्यारा देश 83
ब देशों े न्त्यारा देश।
कावेरी, कृ ष्णा, तलिु
और गगं ा यमुना वाला देश।
परब में अरुणाचल इ के ।
पजमचम मंे गिु रात है ।।
के रल दक्षक्षण में है इ के
उत्तर की तया बात है ।।
खड़ा दहमालय प्रहरी बनकर
दमु मन को ललकारता ।

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

ाथ रहो ब प्यार करो ब ।
हरदम यही पकु ारता ।।

िब तक तन मंे प्राण है यारों
तब तक इ े िाएंगे ।
आने वाली भी मु ीबत
े हम इ े बचाएंगे ।।
ववमव गरु ु है देश हमारा
फै लाएंगे यह दं ेश।
मेरा देश प्यारा देश ।
ब देशों े न्त्यारा देश ।।

राम प्रताप चौबे, पणु े

घर लौट आइये

कोई ब ा है शहर में कोई ववदेश मंे।

84 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

माँू बाप बेचारे हुए अपने ही देश।
ने पड़े माूँ बाप घर में तर खाइये
वक़्त े कु छ वक़्त चनु कर गाँूव आइये।
तड़कते पररवेश ररमते िोड़ िाइये।
बझु ते धचरागों को पनु ुः अब िगमगाइये।

वीरान गसलयों में हुए एकांत चौवारे।
चहक धचडड़यों की समटी उिडे चमन ारे।

बंिर हुए बागों को आकर लहलहाइए।
गावूँ घर की याद कर तुम अब लौट आइए।

खी थकी निरें दटकी आहट को तर ी हैं।
द्वार आगूँ न तनुःशब्द हंै बेव ी ी प री है।

बेरंग चौबारे प्रेम के रंग िाइये।
ददल याद अपनों को करे तो मसु ्कु राइए।

आम आगँू न में पके आकर के खाईए।

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 85

बेब बड़े पतके मकां आसशयां बनाईए।
यदद हार े ररमते िुड़े तो हार िाइये।
ौगंध बचपन की तुम्हंे अब लौट आईये।

भरत स हं ोलंकी, ियपरु

झकु गईं पलकंे ये मेरी

त्य पराजित खड़ा
अ त्य की ियकार है,

भ्रष्ट म्मातनत हुए
ततरस्कृ त आदशा दाचार हंै,

मात वपता वदृ ्धाश्रम पड़े
उपेक्षक्षत हैं,लाचार हंै

ंतान है मगन खुद में ही
ना शमा ना सलहाज है,

86 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

स्वाथसा लप् ा, अधग्रम प्राथसमकता
बचे क्रफर कै े कोई ररमता,
पै ा ही, अब शीषा बठै ा
इं ातनयत बदहाल है,
झुक गईं पलकंे ये मेरी
तया माि का ये हाल है!

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
म्मान उ को, पर दे ना पाओ
घर े कदम रखे िो बाहर
रु क्षक्षत लौटे, खरै रयत मनाओ,
आददम भी युग में िो हुआ न

है देखती बेब नजर,
बड़ी बड़ी ब बातंे होती
होता कोई ना काि है,
झकु गईं पलकें ये मेरी

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 87

तया माि का ये हाल है!

कु ी कु ी, हाय री कु ी
छीना झपटी, नरा कु मती,

िात पात धमा पंथ
आरक्षण िै े ववषलै े दंश,
चतकर मंे अदद कु ी के
आदशों की ही कर दी मातमपु ी,

देश िा रहा है गता
धु र के गा ना, लगाऊँू शता
पतनोन्त्मुख माि हुआ
उलझा रवायतो ररवाज है,
झकु गईं पलकें ये मेरी
तया माि का ये हाल है !

प्रेरणा पाररश, नई ददल्ली

88 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

कहानी हैं उ बर ात की

अधमरे खपरैल के नीचे खड़ा,
भीगा हुआ कं धों े,

बूँदों े बचता - बचाता
नौ - े - बारह ाल का लड़का।।

कमीि - पतलन ठीक थे,
िान पड़ता सभखारी नहीं।
बर ात मे स कता रहा,
भीगा बदन, रंग गेहुंआ ।

हाथ मे था एक पकै े ट,
क के मुट्ठी मे दाबे हुए।

कं िी हरी आखँू े उ की ,
बर ते गगन क्रक ओर थी
मानो मन चाहता भीगने को,
कद - कद कर झमने को।

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 89

रोका था खुद को उ ने,
स र झुकाये!

देख रहा ब पकै े ट को।
टटे हुए खपरैल े,
टपक रही बँूदे थी,

क सलया वो मुट्ठी अपनी
दाबे बचाता एक पैके ट।।
थम कर िो पानी रुका,
ठं डी मदहोश हवा चली,
मसु ्काया वो!
गहरी उ ने ां भरी।।

उ की गं मरमर ी मुस्कान,
िै े कहती, थमे पानी े
तरे े ठहरने की खशु ी हुई।।
डीली क्रफर मुट्ठी क्रकया,
पकै े ट खोला!
कु छ था िो तनकाल रहा।

90 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

बी - बी के तनकले नोट,
गीले नोट,

अलग - अलग वो करता गया।
फक मार नोट ुखाता,

क्रफर मदं - मंद मुस्काता।
प्र न्त्न था,

उ ने ब बचा सलया।
हथेली पर रख नोट खु ाता रहा।।

चार नोट थे बी के ,
कु ल समला कर अस् ी हुए।

वो के वल चार नोट नहीं,
कमाई थी उ के मेहनत की,

पाई - पाई को िोड़ा था,
घं षा था उ के िीवन का।।

गरीबी का बोझा,
देखो क्रकतना भारी।

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 91

जिम्मेदार जि ने बचपन क्रकया।।

ेिल गोस्वामी, नई ददल्ली

पंखुडड़यां
पंखुडड़यां पुष्प की
र -धारा, खु ा प्यारी
पवन, क्रकरणंे, भौंरे
व्याकु ल िै े रे आली।
पखं डु ड़यां यौवन की
िल में तड़पती मत्स्य।
प्रेमपथ मग्न मुग्ध नतृ ्य
त्याग वसा ्व प्रेम त्य।

92 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

पखं ुडड़यां पालकों की
मनभावन यवतनका।
स्वगा द्वार मोहक दृमय
बदं द्वार पने अदृमय।

पंखडु ड़यां अधर की
ब े हष,ा बहे अमतृ ।
अथाह भावों े मदृ ्ध
मधुर वाणी हृदय तु ।

पंखडु ड़यां प्रेम की
शंगृ ार, उल्ला , उमंग ।
जृ ष्ट पलु क्रकत प्रफु जल्लत
प्रेम आदद, प्रेम अतं ।

पंखडु ड़यां तनशा की 93
रवव व्याकु ल द्वार खड़ा।

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

नभ शोसभत चादूँ - तारे
ववयोग चाूँदनी तनकट वेरा।

पखं डु ड़यां व ुंधरा की
ौंदय,ा नीरद, ावन।

रवव, िल, वन, कलरव,
माततृ ्व भाव, यशस्वी मानव।

ावन कु मार, मधबु नी

तनगाहों तनगाहों मंे

हुए िब हम एक-द रे े रुबरु,
तनगाहों ने तनगाहों े की गुफ्तग,

धगरते उठते पलकों ने
पहले तो प्रततकार क्रकया।

94 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

चंचल नयनों की चचं लता देख,
होंठों ने भी मौन स्वीकार क्रकया।

तनगाहों की आखँू समचौली में,
हो गए दोनों ही गमु ।

खो कर नयनों की हं ी दठठोली मंे,
क्रफर न वो मंै रही न वो तुम।

पढ़ झुके नयनों की भाषा,
ददल ने भी क्रफर कहां इंकार क्रकया।

आखँू ों आँूखों में वादे हुए कई,
एक-द रे पर दोनों ने एतबार क्रकया।

आरती वमा,ा नवी मबुं ई

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 95

आिाद पररदं ा हं म.ंै ...

आिाद पररदं ा हं म.ंै .....
बंधन मुझे नहीं चादहए,
ोने की हो या पीतल की,
वपिं रा मझु े नहीं चादहए।
चाहत है उड़ान भरने की...
बंधन मुतत हर चीि चादहए,
थोड़ी ी िगह नहीं....
मझु े उन्त्मुतत गगन चादहए।

आत्म म्मान के बदले मुझे...
पाबदं ी क्रक ी की नहीं चादहए,

स्वतंिता प ंद है मुझे...
घटु न वपिं रे का नहीं चादहए।

आिाद पररदं ा हं मैं
बधं न मुझे नहीं चादहए।

96 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

िीवन को िीने के सलए..
अथाह प्यार प्रकृ तत का चादहए
रि की र्झलसमल क्रकरण चादहए,

नयन खु फलों े चादहए,
बाररश की ररमर्झम फु हार चादहए,

स्वच्छं द खुला आ मान चादहए,
आिाद पररदं ा हं म.ंै ....
बंधन मुझे नहीं चादहए।

खलु ी हवा में ां ले कं ... 97
हर एक पल मुझे ऐ ा चादहए।

पानी प्याले का नहीं......
बहता झरने का िल चादहए,

रोता हुआ िीवन नहीं ....
हं ता हुआ हर एक पल चादहए,

आिाद पररदं ा हं म.ैं ...

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

बधं न मुझे नहीं चादहए।

आिादी प ंद है मुझे...
अन्त्न गलु ामी का नहीं चादहए,
स्वासभमान े िीना है मझु े,
वपिं रे की घटु न नहीं चादहए,

ेि मखमली नहीं मझु .े ..
पेड़ों की झुरमुट ही चादहए,

वपिं रे का बधं न नहीं...
आिादी भरा िीवन चादहए,

आिाद पररदं ा हं म.ैं ...
बंधन मुझे नहीं चादहए।

बाग- बगीचों े मुझे....
अपनी प दं ीदा कं द चादहए,

ऊं ची उड़ान भर कं .....
रुकावट मुझे कोई नहीं चादहए,

98 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021

अपनी स्वतंिता पर मझु े...
हस्तक्षेप क्रक ी का नहीं चादहए,

फलों का स्पशा और...
खुशब क्रफिाओं वाली चादहए,
आिादी े उड़ान भर कं ...
ऐ ा खुला आ मान चादहए।
आिाद पररदं ा हं म.ैं .........

बधं न मुझे नहीं चादहए।

मीन वमाा, नोएडा

बेटी बचाओ

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ बहुत लगाते नारे हैं,
पर तया हमने ोचा है क्रक हम में े ही चंद लोग

इनके हत्यारे हैं।

शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 99


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