हैवातनयत के चेहरे पर इं ातनयत का मखु ौटा लगाकर
क्रफरते हैं , अंदर शैतान तछपा रहता है और हमददा
होने का दावा करते है ।
धधतकारती हं माि के ठे के दारों को िो होते तो
भक्षक हंै पर रक्षक बने हुए क्रफरते हैं।
हो चुके िो इतने अंधे क्रक एक मा म को नहीं छोड़ते
,इन चेहरों मंे तया वह अपनी बहन या बेटी की छवव
को नहीं देख पाते है ?
तया हर एक बेटी की चीख में वह अपनी बेटी की
आवाि नहीं नु पाते हंै।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ नारे बहुत लगाते हंै,
रक्षाबंधन पर राखी पहनने वाले हाथ तया अपने देश
की बहनों की रक्षा कर पाएंगे?
100 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
तया कभी हम बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ नारे को
परा कर पाएंगे?
या क्रफर प्रदशना ी और नारे लगाकर के वल अपने
व्हाट् एप के स्टेट को अपडटे करते िाएंगे
रंजिता कु लश्रेष्ठ, बेंगलरु ु
मजदर का ददा
ये भी एक भारत है............
हाूँ मे मजदर हु, और मिबर भी
हूँ मजबत पर .. हूँ तो मजदर ही
िब भी कोई ंकट आता पहले वो मेरे घर िाता
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 101
हर-रोज मेहनत ,मजदरी करता
पर द रे ददन अगर काम पे ना िा पाया तो मनैं े
अपने आप को भखा पाया....
महामाररयों का घर भी मेरा घर और पै ों की तगं ी
भी मेरा घर।
तयों इतनी मेहनत करके मझु े ना समलती ही
पगार??????
तयों होता हन्त्न मेरे अधधकारों, हर बार
य तो एक बच्चा है बालश्रम अधधकार,
क्रफर भी उ े छोट-२ कह के करवाया िाता हर काम
पेट की भख इतनी है की मेरे माूँ-बाबा भी है
मिबर...,..........
तयोंक्रक आर्खर वो भी तो है एक मजदर।।
आशा मेहता, उत्तराखंड
102 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
कं ल्प
पता नहीं मंै प्रमाण हूँ या पीडड़त।
पता नहीं अब तक तयों और कै े हँू िीववत॥
तया मुझे न्त्यायालय तक ले िाया िा के गा?
तया मुझे इ दशा में फंे कने वाला
दण्ड या शाजन्त्त पा के गा?
यदद समल भी गया, तो मझु े तया?
हानुभतत का फल र्खल भी गया, तो मझु े तया?
मैं तो अगले दर और देह के सलए भटकँू ।
जिन्त्हंे दया भी न आई, उन के सलए कहाूँ स र पटकँू ?
उन्त्होंने िाना क्रक मंै बीि नहीं हँू, धरा हँू।
स्वप्न बनु ने वाली हूँ, अप् रा हूँ॥
िन्त्म लेते ही मूँहु तक तौसलये में लपेट ददया था।
िाने क्रक ने त्यागने का तनणया सलया था॥
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 103
पर उन्त्हें पहचानोगे या खोिोगे भी कै े?
जिन्त्हंे लगा मुझे पालने मंे व्यथा होंगे पै े॥
जिन्त्होंने मेरी िच्चा के ,
ारे श्रम और कष्ट को, व्यथा िाना।
जिन्त्हें व्यावहाररक नहीं लगा, मुझे अपनाना॥
मेरी देह पर तो मेरी माँू की
उं गसलयों के तनशान भी नहीं हंै।
चलती हूँ इ आ में,
क्रक मेरे सलए कोई और िननी कहीं है॥
वो जि के सलए मेरा होना ही पयापा ्त होगा।
कन्त्या को िनने पर जि में,
दुु ःख नहीं व्याप्त होगा॥
िो आत्मा की नु ेगी, शजतत के ाथ अड़ के गी।
मेरे अजस्तत्व के सलए, ं ार े झगड़ के गी॥
यदद म,ैं मंै नहीं मेरा भाई होती।
तो यँू भख े मरती नहीं, ब कु छ देर रोती॥
104 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
क्रकन्त्तु नही.ं .. मंै तो क्रफर े कन्त्या ही बनँूगी।
तब तक बनूँगी, िब तक स्वीकार नहीं हो िाती।
िब तक कत्तवा ्य े बढ़ कर,
मानस क बोझ े लड़ कर,
अधधकार नहीं हो िाती॥
तब तक म.ंै .. क्रफर े, कन्त्या ही बनूँगी...
प्रतीक 'भारत' पलोड़ (दपणा (, बेंगलरु ु
तनधना
ाि- स गं ार की......
चाहत नहीं करते है,
कोई ऐ ों- आराम भी...
नहीं िटु ाते हैं।
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 105
पेट की ज्वाला शातं करने की,
ददन-रात स फा ....
िगु त लगाते हैं।
कभी भख े नहीं ो पाते हंै,
कभी भववष्य की...
धचतं ा मंे डब िाते हंै,
दौलतमदं उन्त्हीं के कमों े....
आराम महलों में फरमाते हंै।
मदद के नाम पर.....
तनधना तो,
अत र ही छल सलए िाते हैं,
धनवानों की कु दटल चालों को,
बेचारे..
मझ तक नहीं पाते हैं।
ददा में िीना ीखते है,
गरीबी े हर वतत...
लड़ते रहते हैं,
106 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
अच्छे िीवन की इच्छा में...
ताउम्र तर ते रहते हंै।
क्रकनारे ड़कों के भी........
रात गुिारा सलया करते है,
जिन पकवानों की...
ख्वाइश तक वे कर कते नहीं,
रई अत र उ े....
कड़दे ानों में फंे क ददया करते है।
ढेरों काम ददन भर कर के ,
रात को थककर......
गहरी नींद ो िाया करते हंै,
ये वही तनधना है िो...
छोटे-बड़े हर कामों को......
मंजिल तक पहुंचाने का,
हुनर रखते हंै।
माना ....
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 107
अमीरों े अलग है थोडंे,
पर दतु नयां े िुदा नहीं है,
उम्मीद के दीपक े...
रौशन कर खुद को...
खशु होकर िीते रहते हंै।
भखे पेट कभी......
कभी आधे तनवाले े काम....
अपना चलाया करते हंै।
तनधना है वो.....
पेट की ज्वाला शांत करने की,
लड़ाई तनत्य लड़ते रहते हंै।
मीन वमाा, नोएडा
ज्ञान का तनवाला
कववत्त वयै ा हो या दोहा हो या छं द हो,
108 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
कववता में काल की कहानी भी तो चादहए।।
ुरों की रु ीली तान, तबले मंे लय ताल,
ददल का मधुर राग र्फटना तो चादहए ।। 1।।
ड़कों की रानी हो या लौह पथ गासमनी हो,
ध्वतन वायु दषण की ीमा भी तो चादहए!
िल हो या वायु हो और िंगल िमीन हो,
स्वच्छता की बात को बताना भी तो चादहए!
हास्य के गीत हो या व्यंग के यह बान हों ,
ऑक्रफ हो की घ हो या िगं ल कटान हो
नेतागण मंच मंे हों श्रोतागण ंग में हों,
शा कों की चोरी को धगनाना भी तो चादहए!
ादहत्य की िो बात है प्रबुद्ध िन ाथ हों,
चेतना िगाने की वो थात भी तो चादहए!
लट की ये गाडड़यां हों, धन रूपी बाड़ीयाँू हों,
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 109
ज्ञान रूपी रोटी का तनवाला भी तो चादहए!
तन में तरंग न्त्यारी, मन में उमंग धारी,
श्रम े फलता का रंग भी तो लाइए!
गाधं ीवादी वस्ि नहीं गांधी की मझ हो,
िीने की कला है प्यारी, मन में ब ाइए!
स्व श्री िगदीश चंद्र पाटनी 'अबोध ', चम्पावत,
स्िी, तमु वही हो ना....
स्िी, तमु वही हो ना
क्रकतने ध्रुवों को पार करके
पररधधयों को लाघूँ कर
क्रफर वावप अपनी खोह मंे आ िाती हो|
यं ोग और ववयोग े परे
110 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
वपै ्रधचवत्त ी
अपनी ही भावनाओं का अपहरण करने वाले
रावण के ाथ कै े मझौता कर लेती हो|
हर बार तुम्हें मुतत कराने राम नहीं आएँूगे|
चिी- ी घणना करती कभी थकती नहीं हो तुम
पर... ना िाने तयों
इन ाथ फे रों ने तुम्हें क्रकतना थका ददया|
खदटयों पे लटकी रहती तमु ्हारी ह रतें
िो िीवन चिवात में म लाधार झेलती
कच्ची भीत- ी बह िाती हैं।
ररमतों की उष्मा मंे व्याकु ल अतं मना के
रर ते घावों को ेकती रहती हो।
स्िी, तमु वही हो ना
िीवन रचतयता, कष्टों की ढाल
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 111
तम में िलती हुई मशाल
प्रेम ुधा े अनवरत असभस धं चत करती
अपने आगँू न की तलु ी को
ििरा होते ंबधं ों पर टाँकू ती हो पबै दं ।
जजम्मेदाररयों के चिव्यह में फँू ी
अपने विद के सलए घं षरा त।
देह े परे ववस्ततृ शन्त्य में
भौततकता की पररधध को लाघँू कर
नव ब्रह्माण्ड को तलाशती हो।
स्िी, तमु वही हो ना
दगु ाा, काली कहकर पिा िाता
परंतु कोख में ही मारा िाता
कभी तंदर मंे, कभी तजे ाब फें ककर
कभी दहेि के सलए िलाकर
अपना पौरुष दशााया िाता है।
112 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
तुम्हंे हराने वाला
इ ं ार में कोई िन्त्मा नहीं
अंतमना के द्वंद्व मंे
क्रफर तयों हर बार
स्वयं को हरा देती हो|
स्िी, तुम वही हो ना
मनरूपी घाट के मुहाने पर
उद्वेसलत ंवेदनाओं और पीड़ाओं को
अतं मना की गठरी े बाहर तनकाल
िल नयन कोरों े बहा आगे बढ़
मड़ु कर वावप नहीं देखती हो।
ओ स्िी!!!!
इक बार इच्छाओं के हाथ
बढ़ाओ तो ही
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 113
ददल की अरमानों की अलमारी मंे
तह दर तह लगाकर रखी
पीडाएूँ, ढेरों ख़्वाब िो िमा हैं
उन्त्हें उिली धप ददखाओ तो ही|
कब तक?
रूहानी स्पशा को आतुर
अपनी उ अंतहीन प्रतीक्षा में
मौन के उ अंधकप मंे
पुरुष के भीतर की उ स्िी
के िागने का इंतिार करती रहोगी|
उठो! िागो! और आगे बढ़ो
परछाइयों को पीछे छोड़
उ लक्ष्य की ओर
िहाँू मंजजल बाहें प ार
तमु ्हारा इंतजार कर रही है|
114 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
अतनता तोमर ' अनपु मा ', बंेगलुरु
नीरि का ोना
भाला भाल दहमालय ा
स न्त्दर िे माँू भारती ।
नीरि ोना श्रंगृ ाररत कर
अस्तुततत करते आरती।
कभी यदु दजष्ठर के वाहों मंे
भाला बहुत प्रततजष्ठत था।
नव ओलजम्पक मदै ानों मंे
नीरि उ े मवपता था।
त्याग और बसलदान उ े
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 115
ेना ने रोि स खाया है।
नीरि मेहनत के दम पर
भारत में ोना लाया है।
क्रकतनी ही मंजिल पार हुई
नीरि को ोना पाने मंे।
िब चढ़ा ततरंगा ओलजम्पक
मन लगा राष्ट धुन गाने में।
भरत स हं ोलंकी, ियपुर,
तयों रे मनुष्य
आि धरा चीखी धचल्लायी मझु े क्रकया वाल,
तयो मनुष्य मेरी छाती पर तुमने क्रकया बवाल?
िीवन मनैं े िना तो तमु ने मझु को िननी माना,
पर तया तुम ऐ ा करते हो तनि िननी का हाल?
116 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
उन्त्नतत के पदे के पीछे धधक रहा अगं ार,
घोल गरल नभ में, छीना मझु े प्रेमी का प्यार।
कोप हुआ जि ददन अम्बर को अग्नी भी बर ेगा,
और स्वतुः मुझमंे भी होगा लावा का उद्गार।
घाव ददया है गहरा मझु को, खोद रहे हो काया,
नाश क्रकया प्रकृ तत का तमु ने माया को अपनाया।
िो थे तरु मरहम के िै े मेरे इन घावों के ,
तनि स्वारथ समथ्या उन्त्नतत में उनको काट सलया है।
ददव घटाया िीवन का बहु रोग दोष को लाया,
व प्र ाद मतृ ्यु का ारे िग में बाटँू ददया है।
और कहा व ुधा ने क्रक मंै हूँ िननी नारी म,
हनशील, ुंदर, ववनयी, बंक्रकम धचतवन वाली भी।
प्रबल, बल, प्रीतत के ंग पररत्यजतत हा करती हूँ ,
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 117
िृ नकार के ाथ ाथ हँू ववनासशका काली भी।
मेरे तन को चीर तनकलता अंकु र तरु बीिों का,
िै े िनती है नारी तनि सशशु को पीर प्र व े।
पर हवषता होती हँू मैं उ नारी के िै े िो,
तनि पीड़ा को भल हँू े, सशशु रोदन के अनभु व े।
कहीं-कहीं मेरे तन पर उत्तगंु शलै सशखर है,
और कहीं कहीं पर गहरे े गहरा ागर है।
बना तं लु न इन दोनों गहराई ऊूँ चाई मंे,
स्वयं खड़ी हँू और कल िीवन को खड़ा क्रकया है।
तमु ्हीं अपरदन करते मेरे तन के रि पेशी का,
भल गए तया इ ी मदृ ा मंे तमु को बड़ा क्रकया है।
यह िल, मीर ,तरु ,िीव-ितं ु ब मुझ े मैं इन े हँू,
खैर छोड़ दो यह ब, मनंै े तमु को िान सलया है।
यदद वाक् िननी की तुमने दगु ता त कर डाली तो,
118 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
मेरी होगी यही दशा अब मनैं े मान सलया है।
िननी की दगु ता त करते चाहे हो नर नारी,
और त्रबचारी मक पड़ी हती ववपदाएूँ ारी।
धरती मतलब धैयवा ान व दहष्णतु ा की प्रततमा,
पर अपने भीतर वो बल का ज्वार सलए रखती हंै।
बाकी िन के सलए अगर िो दैत्य बने ंताने,
उन दैत्यों की हत्या को हधथयार सलए रखती हंै।
स्यात ् धररिी ने हम पर कोई हधथयार चलाया,
तनि कमों का हमने मधु या कड़वा फल है पाया।
दीपक चौरस या, बस्ती
ब कु छ िानता ह,
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 119
ब कु छ िानता ह,
क्रफर भी अनिान बन रहा ह...
क्रफर इक बार उ ी े,
ददल लगाने की बात कर रहा ह...
िो कभी हो ही नही कता मेरा,
उ े अपना बनाने की जिद कर रहा ह...
मे अब बार-बार उ ी े,
ददल लगाने की नाकाम कोसशश कर रहा ह...
िो हमराह हो गए है कभी क्रक ी और के ,
मे उ े हम फर बनाने की बात कर रहा ह...
मे ददल लगाने की बात कर रहा ह,
उ े अपना बनाने की दआु कर रहा ह...
ब कु छ िानता ह,
क्रफर भी अनिान बन रहा ह...
क्रफर एक बार उ ी े,
ददल लगाने की बात कर रहा ह।
120 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
ववका वमाा, नरस हं पुर
यह अतं ही अगर शरु ुआत हो िाए तो..
मंै कु छ कहं या न कहं, पर बात हो िाए तो
ये मौन ही हमारा अगर " ंवाद" बन िाए तो..
उलझे- ुलझे रहतंे हैं अपनी ही उलझनों में हम
ये उलझनें ही "समलने के आ ार" हो िाएं तो..
न िानें तयों अपनों मंे भी चुप-चपु ही रहे मगर
क्रक ी एक अिनबी पे ही एतबार हो िाए तो..
नहीं पता क्रक तया खोिने को तनकले घर े हम
ये "रास्त"े ही मंजिलों की पहचान बन िाए तो..
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 121
क्रक ी े कु छ कहं या न कहं, हाल-ए-ददल मगर
ब एक तरे ा नाम ही राज उिगार कर िाए तो..
िं ोए क्रकतने ही पनें और ये अनधगनत उम्मीदंे
मगर क्रकस् े तरे े-मेरे ही एक क्रकताब बन िाएं तो..
"क क" ी इक ददल मंे रह िाती है हर बार ही
क्रफर भी खब रत अगर ये "इंतजार" हो िाए तो..
न कहना क्रफर कभी क्रक जिदं गी यं ही "बीत" गई
मन ी, ये अंत ही अगर "शुरुआत" बन िाए तो !!
नसमता गुप्ता "मन ी", मेरठ
आिादी
तया सलखं आिादी के सलए,तया होती है आिादी
122 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
मैं सलख दु बसलदान भगतस हं का या महाराणा का
त्याग सलखं
मंै सलख दु आिादी आिाद के सलए या
नेतािी का गौरव गान सलखुं
मंै सलख दु आिादी दहमालय की या हल्दीघाटी का
बसलदान सलखं
नहीं भलु ायी िा कती आिादी के उ लड़ाई को
ना िाने क्रकतने हं ते-हं ते झल गये फां ी पर
ना िाने क्रकतनो ने ीने पर गोसलयां खाई थी
कौन कमबख्त कहता है क्रक आिादी एक पररवार ने
ददलाई थी
अरे तया भुल गए तमु उ मदाना ी को
झां ी वाली रानी को, िो यदु ्धभसम में अपना कौशल
ददखला गई
और नारीशजतत तया होती है
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 123
दतु नया को स खला गई
आिादी के उन दीवानों की तया बखान करे
एक गला कटता तो हिार तयै ार समलते
िगं -ए-आजादी का तया दृमय बयान करंे
अरे आिादी के उ लड़ाई मंे क्रकतने रत्न हमने खो
ददए भला उ का तया करंे
िब-िब भारत मां का बेटा शहीद हुआ है
भारत मां का आचं ल रोया था
अरे देश के गद्दारो ने हमें गुलाम बनाया था
वरना िो खदु धंधा करने आए थे
वो खुद हम े तया धधं ा करवाते
और िो खुद हमारे टु कड़ों पर पलने आए थे
वो भला अपने टु कड़ों पर हमंे कै े पाल िाते
आिाद हुईं ंस्कृ तत न ् 47 मंे
124 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
समल गईं आिादी भारत को उन शैतानों े
मेरी कववता है उन वीरों की गाथा
जिन्त्होंने ददलाई आिादी हमें अपने प्राणों का बसलदान
देकर
चार पकं ्ततयां िीरों के सलए
शहीदों के शहादत को नमन, मां के उन लालो को
नमन
अरे नमन है उन वीर गाथाओं को जिन्त्होंने ततरंगे का
मान रखा
खुद फां ी पर झल गए पर आ मान े ऊं चा ततरंगे
का मान रखा
सशवम स हं , वाराण ी
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 125
ववरह
ददल के धागे प्यार के हैं, टट िाते
आते आूँ आखूँ ों मे, क्रफर ख िाते
यों टटे तो, धागे क्रफर भी, िटु ही िाते
यों खे तो, आँू क्रफर-क्रफर छलक िाते
यों तो धागा ीध है, इक लकीर है,
समट न पाती वेदना, यह वेदना वो तीर है
िो छट पड़े तो, चुभ गए तो, क म ाते
तनकले भी तो, फफक पड़ते, छटपटाते
लह ददल के , आूँ बनकर उफन पड़ते
ां ें रुककर, धड़कनों े, धचमट पड़ते
गीत के ददन, प्रीत के ददन, बर पड़ते
आ बनकर, प्या बनकर, यूँ ताते
र्झलसमलाते ओंठ भी िब, थरथराते
पंखड़ु ी बन, रु ्खया ों े, त्रबखड़ िाते
ये भी आूँ , प्रीत में भींगी हुई है
126 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
भीनी-भीनी, रंगीनीयों की, फु लझड़ी हैं
आहं े मेरी, रूह बनकर, भटक िातीं
तरे े ाये, े धचपककर, अटक िातीं
गम के बादल, नहीं छं टते, धन्त्ध कै ी
ढु लक पड़ते, अश्रओु ं के बूँद िै ी
के शओु ं े, िब भी छं कर, हवा तनकली
खशबुओं की, मेरे ददल की, दवा तनकली
ये हवाएँू, ददल मे मेरे, झाँकू ती हंै
वेदना के , तन्त्तु कों, पहचानती हैं
वेदना के , तीर चुन-चुन, हट रही हंै
इ कु मकु े, इ क क े, फट रही हंै
आओ भी, अब प्राण मेरे, लद रहे हैं
ममा मेरे, पा बनकर, डं रहे हैं
आन मेरा, मान मेरा, धल-ध ररत
त िो छ दे, पद्म बनकर, हो ववभवषत
स लवटों की, धल का, चन्त्दन लगा लूँ
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 127
आि अपने, प्रेम कों म,ंै अमर कर लूँ
तरे ी खुसशयाँू, मेरी दतु नया, बन गयी है
हं ी तरे ी, पतु सलयों में, परत बनकर, िम गई है
लग रहा अब, त गगन े, आ रही हो
प्राण बन, स्पदं नों मंे, छा रही हो
मंै कहाँू था! त कहाँू थी! खेल कै ा!
इ समलन का, उ ववरह े, मेल कै ा !
इ समलन का, उ ववरह े, मेल कै ा !!
रजमम रंिन, बंेगलरु ु
जिदं गी
तया कहूँ, मैं तझु े तया चाहता हँू;
जिदं गी मंै तुझे बहुत चाहता हूँ।
गरमी की तवपश हो या शीत की लहरें
128 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021
शरद का मलय और ब तं की बहारें
बाररश वह ररमर्झम
हु ानी चाहता हूँ;
जिदं गी मैं तझु े बहुत चाहता हँू।
म जिद की अिानंे, मदं दर की घदं टयाँू
धगरिाघर की वह मोम की बवत्तयाँू
अमन की क्रफिाएं
रूहानी चाहता हूँ;
जिंदगी मंै तुझे बहुत चाहता हँू।
अबं र की नीसलमा, इंद्रधनुष की छटाएं
उमड़ती घुमड़ती वह बादल की घटाएं
त्रबखेरे रंगों की
रंगीनी चाहता हूँ;
जिंदगी मंै तुझे बहुत चाहता हूँ।
शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021 129
डॉ असमय कु मार ाहु, पणु े
130 शब्द सत्ता, ततृ ीय अकं , ससतम्बर 2021