अरुणमय गोधूमल शाम हो तुम।
मेरा संीबल गुमनाम हो तुम।
तरे पलक पखेरू बने जाग ।
िोट िदीं न से मलपटा नाग।
तरे मुस्कान िसींत का आना है।
तरे रुदन को पािस माना है।
तू जो 'हा'ूँ कर दे तो क्रफर, जीने मरने का ना ग़म है।
इस जग मंे तो सबसे सदु दर, सशु ील मेर वप्रयतम है।।
हेमदत लोदहया, बूदद
21. *वप्रय दहदद * 51
दहदद नह ंी माि एक भाषा
हम सींतनत िो जननी है,
नतलक सी शोमभत माथे पर
भारत माँू सजी अींजनी है।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
सिशय ्रेष्ठ है जग मंे सबसे
आओ हम इसके गुण गाएूँ,
ननज भाषा का मान करें
अमभमान से जीिन मंे अपनाए।
भर माधरु उच्िारण में
सनु मन को शीतलता आए,
श्रिण नह ंी आभास भी है
हृदय के अदतभायि जगाए।
अनत प्रािीन भाषा पर ननत
नतू न अनसु धीं ान कराए,
ससीं ्कृ नत की नेपथ्य सी है
आयायितय की मान बढाए।
ननज भाषा से उदननत है
पररत्यजक्त से पतन मसद्ध,
गहन अथय शब्दों के इसके
िेद ऋिाओंी मंे प्रमसद्ध।
52 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
यदद प्रेमी हम दहदद धरा के
दहदद को प्रणाम करंे,
करें आरती भारती की
दहदद की जयगान करंे।
द पक िौरमसया, बस्ती
22. *हम एक हंै*
कौन रहेगा अपना होकर इसकी है कु छ खबर नह ।
दनु नया लगती एक सी है पर, एक है सबकी डगर
नह ।।
दहददू मजु स्लम मसख ईसाई अगंी देश के िारों है
सबको लगता अलग अलग पर संगी देश के िारों हंै
बाूँट रहे है िो हमको बस ठीक है जजनकी नजर नह ।
दनु नया लगती एक सी है पर, एक है सबकी डगर
नह ।।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 53
राजनीत के िक्कर मे तो
खोए सबने अपने क्रकतने
टू ट गए हंै घर सबके ह
और न जाने सपने क्रकतने
सत्ता आती है और जाती, इसकी है कु छ ठहर नह ।
दनु नया लगती एक सी है पर, एक है सबकी डगर
नह ।।
अलग हैं सबके मजहब लेक्रकन
मन तो सबका एक हुआ
दवू षत कर दंेगे िे उसको
थोड़ा सा जो नेक हुआ
अड़डग रहें हम पितय से बस, तोड़ सके कोई लहर
नह ।
54 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
दनु नया लगती एक सी है पर, एक है सबकी डगर
नह ।।
नमै मष त्रििेद , लखीमपरु खीर
23. *आपसे क्या कहूीं*
आपसे क्या कहूीं, कै से मेरे गम आते हंै,
मसु कु राते हुए दबे पाँूि िले आते हंै ।
मनंै े अपने आगीं न में, लगाये थे जो उम्मीदों के दरख़्त,
उनपे फल तो आये कभी, अब फू ल भी कम आते हैं।
मैं ना जाने कब से कब तक, शायद तब से अब तक,
उसी मोड पे खड़ी हूँ, जहाँू से एक रोज,
ये आिाज आई थी, क्रक हम आते है,
आपसे बेिफाई का चगला करु भी तो क्या,
आपको प्यार के अददाज ह कम आते है ।
रस्म मेहमान निाजी का, ननभाऊंी कब तक,
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 55
ददल िो बस्ती है, जहाूँ रोज ह गम आते आते ।
आपसे क्या कहूंी कै से मेरे गम आते है,
मुसकु राते हुये दबे पािंी िले आते हैं!!
आशा शमाय, नोयडा
24. *भारत की एकता का मधरु गान है दहदंी *
मेरे ितन की, आन-बान-शान है दहदीं ,
भारत की एकता का मधुर गान है दहदीं ।
कश्मीर को कदया कु मार , से बाधंी ती है जो,
दहमचगर से सागर तक, अविरल बहे है जो,
उस सुरसरर गींगा की बहती धार है त्रबदीं ,
भारत की एकता का मधरु गान है दहदीं ।
56 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
तलु सी की काव्य प्रेरणा, रत्ना का अमर त्याग,
मीरा के पायलों की, छम छम छमा छम राग,
रसखान प्यारे कृ ष्ण की रसखान है दहदीं ,
भारत की एकता का मधुर गान है दहदंी ।
भीिं रों का गुंीजन, चिड़ड़यों की िहक है,
नददयों की मधरु कलकल, बादल की गरज है,
काींटो में खखले फू लों का, एक ताज है दहदंी ,
भारत की एकता का मधुर गान है दहदीं ।
गीतों की गगंी ा है, कथाओंी का है सागर
प्रीनत का पनघट है, ज्ञान का है गागर,
कोदट-कोदट कीं ठ क्रक फररयाद है दहदीं ,
भारत की एकता का मधुर गान है दहदीं ।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 57
कवि िंदी की भाषा यह , कबीरा की है साखी,
ददनकर की ओज क्रकरणें, बच्िन की है साकी,
त्रबना आखीं के भी सरू का सरु आज है दहदंी ,
भारत की एकता का मधरु गान है दहदीं ।
यह राष्रभाषा भारत की, यह न भलू ना,
राष्र प्रेममयों का त्याग, ये न भूलना,
माीं भारती की बालसभा त्रबदीं है दहदीं
भारत की एकता का मधरु गान है दहदीं ।
मेरे ितन की, आन-बान-शान है दहदंी ,
भारत की एकता का मधरु गान है दहदीं ।
सुधा जयप्रकाश िमाय, पणु े
58 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
25. *मुजश्कल है*
जबसे मनंै े देखा तुझको,
मेरा जीना मुजश्कल है।
ददिस त्रबतता क्रकसी तरह ,
पर रात त्रबताना मुजश्कल है।।
रजनी के सपनों में तुझको,
पल भर खोना मुजश्कल है ।
सब लोग जहाूँ के सो जाते,
पर मेरा सोना मुजश्कल है।।
िाूँद से तलु ना करूँू जब तरे ,
कु छ भी कहना मुजश्कल है ।
क्योंक्रक ननत ढलता है िह,
लेक्रकन तेरा ढलना मजु श्कल है।।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 59
हृदय बीि रखता हूँ तुझको,
ज्यादा कहना मजु श्कल है।
जलता हूँ विरह ज्िाला मंे,
जलकर जीना मुजश्कल है।।
अरूण कु मार दबु े, पटना
26. *ऐ जजदीं गी*
ऐ जजींदगी जरा ठहर जा थोड़ा और जी लेने दे...
जो छू ट गए हैं अपने
जो टू ट गये हैं सपने
थोड़ा उदहें सीिं ार लेने दे
ऐ जजींदगी जरा ठहर जा थोड़ा
और जी लेने दे...
खामोश है ये आखीं ें
बेिनै नयाूँ बड़ी है
60 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
ददल कह रहा है, होठों को मुस्कु रा लेने दे
ऐ जजदीं गी जरा ठहर जा थोड़ा
और जी लेने दे...
खुमशयों की ऐसी बाररश कर
डू ब ह जाऊूँ मंै उसमें
उस खुमशयों के समदंी र मंे
थोड़ा डू बा ह रहने दे
ऐ जजंीदगी जरा ठहर जा थोड़ा
और जी लेने दे...
ननिेददता, पटना
27. *दहदद अपनी मातभृ ाषा*
मीठी- मीठी प्यार -प्यार भाषा ऐसी दहदद है
इक दजू े को जोडे रखती भाषा ऐसी दहदद है
प्यार मोहब्बत अपनेपन और जज्बातों की भाषा है
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 61
परू ा बिपन जड़ु ा है भाषा की उन यादों से
उस भाषा को कै से भलू ँू , जजससे मुझे पहिान ममल
मीठी- मीठी प्यार प्यार
भाषा ऐसी दहदद है
मभदन- मभदन भाषाएंी ददखती,
क्रफर भी दहदद लगती अपनी
िारों ओर ह दहदद ददखती, कलम भी मेर दहदद
मलखती
जजसने हमको द पहिान, जजससे बढती देश की शान
मीठी- मीठी प्यार प्यार , भाषा ऐसी दहदद है
भािों को जो व्यक्त करे, भाषा ऐसी दहदद है
हर गमलयों और िौबारों में, बसती भाषा दहदद है
दोहों और िौपाई मंे, ददल की हर गहराई मंे
देती जो आनदद है ,िो भाषा ऐसी दहदद है
मीठी- मीठी प्यार प्यार , भाषा ऐसी दहदद है
सभ्यता की झलक है दहदद ,
62 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
सीसं ्कृ नत की पहिान है दहदद
रामायण का सार बताती, गीता की पहिान है दहदद
दहदद दहदद दहदद दहदद , भारत की तो शान है
दहदद |
सशु ीला मसहंी , पुणे
28. *सॉर हनी*
आज मनैं े सुबह की िाय नह ीं पी,
वपया इसके बदले नीींबू पानी,
नीींबू पानी में डालें दो बंूीद शहद के ।
अरे भाई!
शहद का उपयोग अब उदनत िगय का,
प्रतीक जो बन गया है,
अपनी वििेक शजक्त से यदद हम करंे वििार,
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 63
तो शहद पीने के बहाने हमने ध्िस्त क्रकया है एक
शहर,
जजस शहर में एक रानी थी और थी उसकी प्रजा,
राज्य को सुदृढ करने के मलए,
परू प्रजा करती थी पररश्रम अथक ।
हमने जीव्हा को संती षु ्ट करने हेतु,
कर डाला उनके शहर पर हमला,
तोड़ डाले उनके महल और मीनारें,
अब नह ीं ददखाई देती झरोखों से,
मधमु क्खी की दनु नया ।
एक रोज क्रफर िाय पीने के ह बहाने,
जब सड़क क्रकनारे रुकिाई मनैं े अपनी गाड़ी,
तो कू ड़े मंे पड़े एक नलास में जूठी िाय को,
िाट रह थी एक मधुमक्खी ।
िह मधुमक्खी जजसका शहर मनंै े ध्िस्त क्रकया था,
अब िह जठू ी िाय पी कर क्रफर से शहद बनाएगी,
64 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
जजसे हम क्रफर अपना बड़प्पन ददखाते हुए,
उससे छीन लंेगे ।
पर हम कह ंी िाय से बनी शहद तो नह ंी पी रहे हैं,
इस सोि से मन बोखझल हो गया,
मेरे ददल से क्षमा यािना में यह शब्द ननकले:
"सॉर हनी"
जस्मता कु मार, दबु ई
29. गजल* मौसम तार है*
गपु िपु रहना होठों की फनकार है,
सब कह देना आखों की लािार है।
जोर भला गैरों पर क्या ददखलाएंी हम,
अपना ददल काबू करना ह भार है।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 65
उल्फत में उम्मीद को दाख़िल मत करना,
जान ह ले जाए ये िो बीमार है।
कोई राज छु पाना िाहें ये पलकें ,
अश्कों ने की हरदम ह गद्दार है।
हमने ररश्ते और ररिायत सब समझे,
हमको समझे अब दनु नया की बार है।
जब रूमानी सदय हिाएीं िभु ती हों,
"मधु" समझना गम का मौसम तार है।
माधिी मधु, गाजजयाबाद
30. *सोिा है तुम्हारे जदमददन पर एक कविता
मलखींू*
सोिा है तमु ्हारे जदमददन पर एक कविता मलख।ंीू
66 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
पर लगा क्रक क्या तुम इतने सीममत हो क्रक तुम्हे
शब्दों में िखणतय कर दीं।ू
नह ंी ! तमु िह असीम विशालकाय आकाश हो जजसे
बताने में मेर लेखनी असमथय है।
क्या रेखाकीं ्रकत कर सकती हूंी मंै तुम्हार िह ननश्छल
हींसी, िह भोले पररहास,
िह कहकहे और उपहास।
तुम्हार िह त्रबना थके , ननरंीतर पढते रहने की प्रिवृ त्त।
हमेशा सबसे आगे आगे और आगे बढने की आिवृ त्त।
नह ीं ऐसा कोई शब्दकोष, ऐसी कोई मलवप नह ीं बना
पाए हम अब तक।
जजसमें मैं तुम्हार छोट सी उम्र की बड़ी-बड़ी
उपलजब्धयों को पररभावषत कर पाऊंी ।
गखणत की कदठन पररजस्थनतयांी हों या भौनतक विज्ञान
के दबु ाधय समीकरण।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 67
तुम्हारे सामने सब हो जाते थे एकदम सरल वििरण।
रसायन की प्रयोगशाला मंे जब अपने ममिों के साथ
करते थे प्रयोग ।
िह भी धदय हो जाते थे करके तुम्हार बुद्चधमत्ता का
उपयोग।
अंीग्रेजी व्याकरण बहुत अच्छी है, कौन पढाता है।
ट िर मदर इंीड़डया के कड़क लहजे के सामने कौन
त्रबना पढे रह पाता है।
मैं न भी करना िाहूीं पर डर के मारे सब अपने आप
हो जाता है। एस एस ट मंे भी कभी न रहे पीछे ।
अब दहदीं और मराठी के बारे मंे कु छ कै से पछू े ।
मलखने में कदठनाई होती है पर याद तो सब रहता है
आगे पीछे ।
कम्प्यूटर मंे शत प्रनतशत अींक लाना नह ंी रहा कभी
दलु भय ।
68 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
ये तो िह क्षिे जहांी कोई भी कर सकता है काम
दलु भय ।
सामादय ज्ञान प्रश्नोत्तर मंे न रहा कोई जिाब।
इसमंे तो तुम सदैि से थे लाजबाि।
मांी सरस्िती की थी सदैि अनुकम्पा विस्ततृ ।
उनकी कृ पा से ह तो बना था तुम्हारा अजस्तत्ि।
डॉ कलाम सा िैज्ञाननक बनीूं, आई आई ट में
इंीजीननयररगीं करूीं यह सपना ददखा कर िले गए।
सोिा है तुम्हारे जदमददन पर एक कविता मलखीूं----!
डॉ रेखा मसहीं , पणु े
31. * गजल समझाने लगी*
मेर मुझसे ह ठनने लगी।
बात त्रबगड़ी थी बनने लगी ।।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 69
तरे े शब्दों ने मन को छु आ।
और मैं भी वपघलने लगी।
मेर सूरत भी क्यों इन ददनों।
तरे सूरत में ढलने लगी।।
भेद का भाि जब ममट गया।
जजींदगी क्रफर सूँिरने लगी।
प्रेम जीिन का आधार है।
ये भी पूनम समझने लगी।
पनू म मसदहा श्रेयसी, पटना
32. *इत्तफाक*
जजदंी गी इत्तफाक है
शानतर है िालाक है
रहनमु ा हरचगज नह ीं
70 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
कानतल है कज्जाक है
हाीं बोलता बहुत मगर
पर आदमी बेबाक है
दोस्तों की शमशीर से
छाती उसकी िाक है
ये मींजर खौफनाक
और दृश्य ददयनाक है
शोहदे अपराचधयो का
इस शहर मंे धाक है
प्रनतभा की अनदेखी
बेहद ह शमनय ाक है
बाज आओ खेल से
ये खेल खतरनाक है
सरु ेश िमा,य सीतामढ
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 71
33. *लक्ष्य*
मानि हंै तो जीिन में कु छ ऐसा करना िादहए,
करने के मलए पिू य ननजश्ित लक्ष्य होना िादहए |
लेक्रकन जीिन की मींजजल होती है बहुत लींबी,
मजीं जल तक पहुूँि के मलए दृढ सकीं ल्प िादहए |
हो हृदय में अदम्य साहस कायय योजनाबद्ध भी,
ननजश्ित लक्ष्य को लेकर आगे पग उठाना िादहए|
लक्ष्य का ननधारय ण करने में हो रुचि ि प्रनतभा,
सफलता के मलए इसे भी स्िीकारना िादहए |
जो भी काम करना है मन लगाकर कु शलता से,
आत्मानुशासन के महत्त्ि को समझना िादहए |
ममलेगी मंीजजल ननजश्ित लक्ष्य के अनुरूप ह ,
72 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
मानि जीिन में सींभि है ऐसा समझना िादहए|
डॉ िदद्र सतीश भगत, दरभीगं ा
34. *उड़ान*
होती अगर मै चिड़ड़या उड़ान देख लेती।
फै लाती पखीं अपने आसमान देख लेती।
है उग्रता से पररपणू य िसधंुी रा का आिँू ल,
अबंी र में जाके अपने अरमान देख लेती ।
फै लाती पंखी अपने.....................
िादँू सा िमकना िाहते है यहाँू लोग,
मै जगु नुओंी में अपनी पहिान देख लेती।
फै लाती पंीख अपने.....................
अपना न कोई होता,होता न कोई पराया 73
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
मै सरहदों का टू टा बधीं ान देख लेती।
फै लाती पंखी अपने................
आिँू ल दबु े, फै जाबाद
35. *झील का पानी*
झील का पानी
स्िखणमय हो जाता
जब होती सबु ह
िह झील दोपहर आते-आते
धारण कर लेती
िाींद सा रूप
पर जैसे ह उतरती सांीझ
डू बता सरू ज
त्रबखेरता ताींबई-रंीग
झील लाल-लाल हो जाती
74 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
पाकर उपहार
भलू जाती
अदय सभी रंीगों को...
व्यग्र पाण्डे, गंीगापुर मसट
36. *सम्मान दहदद का*
आओ ममलकर सम्मान करे दहदद का, यह हमार
मातभृ ाषा,
जो ममलाती देशिामशयों के ददलों को यह, पूर करती
अमभलाषा।
दहदीं भाषा की यह कथा परु ानी लगभग एक हजार
िष,य
जो बनी क्रानंी त की ज्िाला तो कभी स्ितींिता
सेनाननयों का संघी ष|य
आजाद भारत में भी इसका कम नह योगदान,
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 75
इसमलए दहदीं ददिस के रुप में इसे ममला यह विशषे
स्थान|
विनती बस यह दहदीं को ना दो तुम यह दोयम दजे
का मान,
दहदंी से सदा करो प्रेम तमु दो इसे विशेष सम्मान|
रोज मनाओ दहदीं ददिस, यह अपना अमभमान,
दहदंी है राजभाषा, इसका हृदयों मंे विशषे स्थान|
हमारे प्रधानमिीं ी के दहदद भाषण का लो संीज्ञान,
ममल हमारे देश को इससे, जगत मंे एक पहिान।
अींग्रेजी की माला जपकर ना करो दहदीं का अपमान,
आओ ममलकर प्रण ले ननत्य करेंगे दहदीं का सम्मान|
स्नेह कु मार, पुणे
37. *संीकल्प*
सींकल्प सजृ ष्ट का मूल है,
सींकल्प सजृ ष्ट आधार,
76 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
सींकल्प ह जीिन तत्ि है, 77
संीकल्प ह जीिन सार ।
संकी ल्प कमय का कारण है ,
सकंी ल्प कमय पतिार,
सकंी ल्प प्रगनत संीसाधन है,
संीकल्प प्रगनत सींसार ।
संीकल्प लक्ष्य का साधन है,
संकी ल्प मोक्ष का द्िार,
सकंी ल्प से संीभि लक्ष्य भेद,
हर मानि का उद्धार ।
कु छ करने का संीकल्प करंे,
पूरा हो ये, दृढ संीकल्प करें,
असींभि को मदटयामेट करें,
हर शपथ लें अब आखेट करें,
इसमलए
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
सकीं ल्प करंे,
संीकल्प करें,
संकी ल्प करंे...
आशतु ोष कु मार, नोयडा
38. * स्ितंिी ता सेनाननयों की गाथा*
आजाद की गाथा को मंै आज सुनाने आया हूंी,
देश के खानतर कु बानय ी के नाम जुबाीं पर लाया हूीं।
आजाद के द िाने जो हींसकर फासंी ी झूले हैं,
याद उदहें करता हूंी अबतक, जजनको ना हम भलू े हैं।
भगत मसहंी की कु बानय ी को कौन भुला अब सकता है,
राजगुरु,सखु देि की दहम्मत कौन ड़डगा अब सकता
है।
अगीं ्रेजों के दातीं खट्टे कर खाट खड़ी कर डाल थी,
ऐसे िीरों की जननी भी, देखो दहम्मत िाल थी।
78 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
मंीगल पांडी े आजाद का पहला परिम लाया था,
मेजर ह्यूसन की हत्या पर क्राीनं त पराक्रम आया था।
इस कारण से अंीग्रेजों को, मगंी ल पाींडे खटक गए,
देश की आजाद के खानतर हींसकर फांीसी लटक गए।
कौन भलु ा सकता है अब, िंीद्रशेखर की कु बानय ी को,
इनतहास ममटा ना सकता है, इन िीरों की कहानी को।
काकोर की रेन लूट कर अंगी ्रेजों को जकड़ा था,
कसम इदहोंने खाई थी जजदंी ा कोई ना पकड़ा था।
अींग्रेजों से लड़त-े लड़ते होल खनू की खेल थी,
अल्रे ड पाकय मंे जजसने, खुद की गोल झेल थी।
सभु ाष िीदं ्र ने युिाओंी को आजाद पर खड़ा क्रकया,
आजाद दहदीं की फौज से नाम देश का बड़ा क्रकया।
त्रबजस्मल,अशफाक उल्ला को भी कै से भूल जाएंीगे,
जब तक रक्त रहेगा तन पर उनकी गाथा गाएंीगे।
अंगी ्रेजों को टक्कर द िह झासंी ी िाल रानी थी,
अींत सासीं तक खबू लड़ी िह ऐसी ह मदानय ी थी।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 79
नार को तमु यूंी ना समझो ये िंीडी का रूप है,
भारत के िीरों को जनने िाल देिी का स्िरूप है।
स्िामभमान पर लड़ने िाले महाराणा की धरती है,
जो मर ममटे है स्िामभमान पर उनका िींदन करती हैं।
देश के सनै नक सरहद पर खनू की होल खेल रहे,
देश प्रेम के खानतर िो सीने पर गोल झेल रहे।
खून खौलता है सनै नक, मेरा शह द जब होता है,
काश्मीर की के सर िाल क्यार का ददल रोता है।
भलू िकु े हम सार बातें क्रफर दहु राने आया हूंी,
आजाद की गाथा को मंै आज सनु ाने आया हूीं।
हररराम मीणा, बदू द
39. *गुरु को सलाम करता हूीं*
गुरु को सलाम करता हूंी
बहुत कु छ मलया है आपसे
80 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
कु छ तो आपके नाम करता हूीं।
जदम से मतृ ्यु तक
जीिन एक पाठशाला है
सीखने की इच्छा हो तो
हर इंीसान में गुरु ददखने िाला है ।
जदम लेते ह पाया हमने
माँू-बाप गरु ुशीषय है जाना हमने
ऊूँ गल पकड़ के जजसने िलना मसखाया
कदठन रास्तों पे बढना मसखाया
जो सीखा बिपन में उदह ीं वििारों से
आज मनैं े मशखर पे अपने आप को पाया ।
स्कू ल में जजदहोंने मझु े मशक्षा प्रदान क्रकया
उदहोंने मझु े जीिन और प्रकृ नत का भेद समझाया
इंीसान सभी एक समान है
विज्ञान से खोल मेरे आखँू ो को
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 81
मानिता का अथय समझाया ।
दोस्तों से बहुत कु छ सीखा
गामलयांी देके अपनापन िखा
गलनतयाीं बहुत होती है जजींदगी मंे
गलनतयों को भूल एक साथ
िलने का हुनर उनसे सीखा ।
मोहब्बत करने की जब घड़ी आई
हर जगह से ननराशा ह पाई
जजससे की मोहब्बत
उसने जजीदं गी जीने की िजह समझाई
मशक्षा मसफय क्रकताबों से नह
जीिन में आये िढ उतार से समझ मंे आई ।
पैसा- प्रनतष्ठा ये सब माया है
िक़्त और हर इींसान हमारे मलए गरु ु है
82 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
जजीदं गी मंे िक़्त ने हमको समझाया है
सीखने के मलए कोई उम्र नह ीं होती
हर इींसान में गरु ु को ह मनैं े पाया है ।
सुजीत उके , पणु े
40. *स्िी िाता*य
झक सफे द उजल माींग िाल एक स्िी
मांी दगु ाय के टह -टह लाल मसदीं रू को
ननहार रह थी,जाने क्या सोि रह थी
जींगल के बीहड़ त्रबयािान में
बैठी दो स्िी प्रनतमा आमने-सामने
एक देि मूनत,य दसू र जजदीं ा अजस्थ-पीजं र
िातािरण कु छ रहस्यमय सा था 83
दोनों मसर की दो लकीरंे उद्िेमलत-सी थीीं
मौन िाताय की कु छ सुगबुगाहट हो रह थी
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
अिानक िह अजस्थ-पींजर बोल उठी
नह ंी िादहए तरे ा यह लह-लह मसदीं रू मुझे
नह ंी िादहए िड़ू ी, त्रबदीं और तरे ा भैरि भी
मझु े िादहए तरे ा फरसा, भाला और त्रिशलू
इस झक सफे द उजले मांगी को िादहए
उस मदहषासरु का कटा हुआ मसर
उस मदहषासरु का कटा हुआ मसर
डॉ र ता मसहंी , दरभगंी ा
41. *व्यथय नह ंी जाती प्राथनय ा*
व्यथय नह ंी जाती प्राथनय ा
प्राथनय ा से -
खुलते हैं हृदय पट
होता है
84 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
समग्रता में - 85
विश्िास बोध ।
ठीक कहा आपने,
कोई नह ीं उतरता आकाश से
उतरती है एकाग्रता - प्राथनय ा से
उतरता है मसकते ममसय ्थल में
सात नछद्रों से ननकलता संीगीत।
तब खुलते हैं हाथ
िमकता है हंीमसया
मुस्कु राता हैं खेत
हंीसता है खमलयान और बच्िा ।
प्राथनय ा व्यथय नह ीं जाती
व्यथय जाती है - -
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
शींकाएंी, भ्रम और अविश्िास
श्यामल श्रीिास्ति, मजु लफरपरु
42. *विरहाजनन*
विरह की आग मंे तरे े, मैं जलता ह सदा रहता
त्रबना पानी के मछल हूँ , मिलता ह सदा रहता।
हो मसू लाधार बाररश भी, मगर मुझको नह ंी राहत
ये पानी की है बीदंू े पर, सुलगता ह सदा रहता।
जजस ददन से तू दरू हुआ है
तब से ददल मजबूर हुआ है ।
ना खाना अच्छा लगता है
ना सोना अच्छा लगता है
गमु समु सा बठै ा रहता हूँ
बस रोना अच्छा लगता है ।
करिटे भी मंै रातों को, बदलता ह सदा रहता।
86 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
उसे मैं भलू जाऊूँ ये , इरादा ह सदा रहता।
िदद्र मोहन पोद्दार, दरभंगी ा
43. *सुनहर यादंे* 87
आज भी मंै उन सुनहरे
ददनों को याद करता हूंी
िो बिपन के ददन सनु हरे
और स्कू ल मशक्षक याद करता हूीं
माीं बाप से कई ज्यादा करते
िो हम सब छािों को प्यार
मशक्षा और सभ्यता संसी ्कृ नत
का महत्ि समझाते बार बार
आज हुआ मै जो सभ्य नागररक
है उनकी मशक्षा का प्रतीक
ऐसे गरु ुिर मेरे सभी खूब महान
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
याद करते हुए करता हूीं लाख लाख प्रणाम
शरद कु मार सुमन ज्ञानेश्िर िेदपाठक मीदं ्रपु कर, सोलापरु
44. *ममिों को साथ रखता हूँ *
मैं अब भी अपने ममिों को,
कभी - कभार िीट काटता हूँ ।
ऐसा करके थोड़ा बिपना,
हरदम साथ रखता हूँ ।
उम्र का काम है बढाना ,
उसकी मंै क्रफक्र नह ंी करता ।
िह अपनी मजी से बढती है,
मैं अपने रौब मंे बढता हूँ ।
कल की चितंी ा को मंै कभी,
88 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
मसर पर लेकर नह ंी घूमता ।
जसै ा है, जो है उसके साथ,
अपने को सिदय ा मस्त रखता हूँ ।
मंै कभी उदास नह ीं होता,
क्योंक्रक िेहरे पर हँूसी,
ददल मंे ननमलय ता और ,
ममिों को सदा पास रखता हूँ ।
दोस्त कहते हैं तुम बढू े नह ीं लगते?
तो मैं हूँसकर कहता हूँ
थोड़ी शरारत, थोड़ा बिपना,
मंै सतत अपने साथ रखता हूँ ।
उदय नारायण मसहंी , मुजलफरपरु
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 89
45. *नयनों मंे बस जाओ*
लुक नछप मत खेलो खेल वप्रय
ननै ों मंे बस जाओ प्राण वप्रय
तुम त्रबन जग सूना लगता वप्रय
ददल मत तोड़ो प्राण वप्रय।
नेह छािंी छवि छाय वप्रय
देख देख दहया जड़ु ाए वप्रय
कल कल खखले खलु े वप्रय
मन तुम में रमा रहे वप्रय
तन मन शुद्ध स्नेह वप्रय
अवपतय ननत नि नेह वप्रय ।
अममताभ कु मार मसदहा, दरभीगं ा
46. *तुम आओ*
तमु आओ जैसे आती है सबु ह मंे धूप,
90 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
और त्रबखर जाती है 91
ऊूँ िे पितय से लेकर छोटे तणृ तक
कर देती है आलोक्रकत
धरती का कोना कोना !
िसै े ह तुम भी आओ ।
तमु आओ !
आती है जैसे गममयय ों में बाररश ,
मभगंी ोती हरेक मन को ,
कर देती है शीतल
तप्त धरा का कोना-कोना !
िैसे ह तमु भी आओ ।
तमु आओ !
क्रक आती है जसै े शीतल हिा ,
भाती है सबको,
कर देती है सुगचीं धत
हृदय का कोना -कोना
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
िैसे ह तमु भी आओ!
तमु आओ!
सधीं ्या शाह , मोकामा
47. *गजल राजसी मगरुर सी*
लगती है रुखसार से िो मुझको नरू सी
जजस्म को सासीं े है िैसे ह िो जरूर सी
उसको खोजता क्रफरता हूँ इस जमाने मंे
मगर िो तो बसती है मुझमंे कस्तूर सी
उसके अहसास से खखल उठती है मेर
ये जजंदी गी जो अधूर है होकर परू सी
उसके त्रबन हालत ऐसी हो जाती मेर
92 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
लगती है ़िुद से ह मुझको दरू सी
उसकी तार फ क्या बोलके मैं कर दँू ू
िाँूद मंे स्याह दाग और िो है भूर सी
जो ममला मुझको बहुत को नसीब नह
पर बेिनै करती है ख्िादहशें अधरू सी
सोिता हूँ उसके बारे में न सोिूँ कु छ
मगर उसकी यादे बन गई मजबरू सी
ऐसा रूप रनत रंीभा उिशय ी फीके लगे
िो मसर से पाँू तलक लगती अगीं ूर सी
कहाँू ऋषभ मुफमलसी की भटकन है
और कहाँू िो है राजसी मगरूर सी
ऋषभ तोमर, मुरैना
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 93
48. *इंीसान होना बाकी है*
बन िुके बहुत कु छ हम
बस इंीसान होना बाकी है,
इींसाननयत और जज्बातों से
पहिान होना बाकी है ।
धन - ऐश्िय,य सुख - साधन
पा िुके क्रकतने आराम,
अपने फजों - कतवय ्यों को
जान लेना बाकी है ।
बन िुके बहुत कु छ हम
बस इींसान होना बाकी है।
प्रेरणा पाररश, ददल्ल
49. *कविता की हत्या*
दहदीं ददिस के अिसर पर
ददशा सामलयान की आत्मा ने पकु ारा।
94 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
है कोई दहदंी -प्रेमी,
कविता और गीत का रखिारा ?
तो सनु ो मेर पुकार
दोनों की हत्या का
मलखिा दो एफ आई आर।
दोनों को मेर ह तरह
मसने जगत ने मारा है।
क्या यह आपको गिीं ारा है?
कविता की जुड़िांी बहन
गीत,
मसनेमा के पदे से कर बैठी
प्रीत।
क्रकसी ने पूछा -"कब आएगी तू ?"
तो क्रकसी ने पछू ा-"संीगम होगा क्रक नह ंी?"
एक ने तो पछू मलया -" हम-तमु एक कमरे में बींद
हों... ?"
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 95
िाह रे जमाना !
एक ने तो -"तू िीज बड़ी है मस्त-मस्त" कह डाला।
कविता ने बहुत समझाया।
अपने जीिन का हाल सनु ाया।
मंै भी थी प्यार भोल कविता।
लोगों की दलु ार कविता।
जिान हुई तो बनी-"नयी कविता।"
क्रफर साठोत्तर और सत्तरोत्तर कविता।
छंी दों के बधीं न टू ट गये
चितंी क,मनीषी हमसे रूठ गये।
लुच्िे-लफीं गों का आया जमाना।
मुझे कहने लगे तराना।
कवि जैसे ददखने िाले
मदहलाओंी पर अश्ल ल मलखने िाले।
दसू रों की शैल िुराते रहे
मुझे भी फु सलाते रहे।
96 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
मेर यह हालत इदह ीं का काम है।
आज अतकु ादत और अकविता ह मेरा नाम है।
गीत ने कविता की एक न मानी।
अब तो उसकी फू ट रह थी जिानी।
लफंी गे पड़ गये पीछे ,
देखने लगे ऊपर से नीिे।
गीत के उभारों को घरू -घूर
पछू रहे थे ड्रग के नशे में होकर िरू -िूर।
"िोल के पीछे क्या है?"
लहंीगे के नीिे क्या है?"
उसी ददन कविता और गीत को
समाज की परु ानी र त को।
लोक-लाज की उीं िाई से
फें क ददया सड़क पर लफीं गों ने।
सभी ने एक साथ आिाज उठाई।
दहदंी कविता और गीत ने
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 97
अिसाद मंे मौत को गले लगाई।
पर सि की आिाज ददशा ने क्यों उठाई?
पछू ता है भारत "दहदीं ददिस" पर
दहदीं गीत और कविता की हत्या
क्या इसी मसने जगत ने करिाई?
राम प्रताप िौबे, पणु े
50. *पररणनत*
टप-टप, टप-टप, चगरती बदंीू े, टू ट गगन से चगरते तारे,
खो जाते धरती पर दोनों, नीिे चगर कर त्रबना सहारे ।
ऊपर ऊपर िढते जबतक, गिय असीममत होता मन में,
कभी पराभि होगा उनका, आता नह ीं तननक चितीं न मंे
।
नह ंी सोिते के िल कु छ ददन, होती है रंीगीन बहारें,
टप-टप, टप-टप, चगरती बंूदी े, टू ट गगन से चगरते तारे ।
ऊपर से जब देखा करते, सब कु छ छोटे छोटे लगते,
98 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
अपने कद के आगे कोई, अदय जीि अदना ह लगते
।
उछल कू द करते अींबर में, अपनी पररखणनत त्रबना
वििारे,
टप-टप, टप-टप, चगरती बदींू े, टू ट गगन से चगरते तारे ।
शीतल कोमल बंदीू जलद की, अजनन वपडंी तारक के
टु कड़े,
धरती देती शरण उभय को, जो अपने मूलों से त्रबछड़े
।
हो जाता अजस्तत्ि लुप्त तो, अपना कोई नह ीं पुकारे,
गौरि भजीं न है दोनों का, जब खोते जीिन बेिारे ।
जयप्रकाश, मजु लफरपुर
51. *कविता*
िदद लफ़्जों की कला-बाजी, 99
िदद आकषकय शब्दों का समूह,
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
िदद पींजक्तयाँू, कोर काग़ज पर उके रे गए अल्फ़ाज!
नह ंी, नह ीं, इसको नह ंी कहते कविता.
लुभािने सददभय – शब्दों का जाल,
विद्िता का पररिय!
जी नह ीं, इसको नह ीं कहते कविता.
भखू े त्रबलखते बच्िों का चििण,
अबला ि दमलत का शोषण,
हृदय विदारक दृश्य,
जी नह ीं, इसको नह ंी कहते कविता.
ननराश माल – खेतों का हाल ,
सखू ी बचगया – गािूँ का मखु खया,
हर जन दखु खया,
इसको नह ंी कहते कविता.
100 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020