दखु ी मन – उमड़ता यौिन,
वपया से दरू – लम्बी मजबूर ,
इसको नह ीं कहते कविता.
खोया बिपन – टू टे ररश्त,े
छू टा गाूिँ – बरगद की छािँू ,
कौिे की काूिँ -काूँि,
इसको नह ीं कहते कविता.
नार का शोषण,
करुणा का चििण – व्यथय क्रददन,
इसको नह ंी कहते कविता.
कविता िह नह ीं जो मन को अशादत कर दे,
कविता,
जो हृदय मंे प्यार जगा दे,
आशा की इक आस जगा दे.
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 101
अिसाददत को हवषतय कर दे.
मलै ा आिूँ ल सुख से भर दे,
तन मन को आनींददत कर दे,
दबु लय को साहस से भर दे.
अपमाननत को सम्माननत कर दे.
बाला को मधबु ाला कर दे,
शाला को मधुशाला कर दे.
कविता िह नह ंी जो मन को अशादत कर दे
कविता िह है, जो दबु लय हृदय में प्राण भर दे.
महेश बजाज, पणु े
52. *एक नया गीत गाता हूँ*
इनतहास के पदनों को एक बार घुमाता हूँ
एक नया गीत गाता हूँ ।
एक नया गीत गाता हूँ।।
102 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
जीिन की दहल ज पर, मानि मसु ्कु राता था
अपनी ह करनी पर इतना इतराता था
तन-तन से मन-मन से हाथ जोड़े घबराता हूँ
एक नया गीत गाता हूँ।
एक नया गीत गाता हूँ।।
अथहय न व्यथय सब ननज लाभ के विलाप मंे धयै य खोया
जाता था
अचधक धन सिंी य कर भविष्य के भॅिर में िह फंी सता
िला जाता था।
सीबं धंी ों के जाल मंे मैं सब कु छ भलू जाता हूँ
एक नया गीत गाता हूँ ।
एक नया गीत गाता हूँ।।
आन-बान-शान शौकत सब ढल ह गया।
ज्ञान- प्रज्ञ सब छल ह गया, विद्या मीदं दर मुख
ममलन हो ह गया
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 103
यह सोि-सोि आत्मित मशष्य - मशक्षक शोक मनाता
हूँ।
एक नया गीत गाता हूँ ।
एक नया गीत गाता हूँ।।
एक मन दो थे तन भािना परु जोर थी
सागर के लहरों पर सिार हो अपने आत्मबल को
समझाता था बस अनतीं ितमय ान देख ददगभ्रममत हुआ
जाता हूँ
एक नया गीत गाता हूँ ।
एक नया गीत गाता हूँ।।
ए•के • कश्यप, दरभगंी ा
53. *मैं समय हूीं*
मैं समय हूीं! शाश्ित हूीं! ननरंीतर हूंी !
मनंै े ब्रह्मा को ब्रह्मांडी रिते हुए देखा है,
मनंै े देिताओीं को िेदों की ऋिाएंी गाते देखा है,
मनंै े बाल्मीक्रक को रामायण रिते हुए देखा है,
104 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
मनैं े सतयगु को कलयुग मंे बदलते देखा है।
मैं समय हूंी! शाश्ित हूंी! ननरींतर हूंी !
मनैं े त्रिलोक विजेता रािण को धमू ल धसू ररत होते देखा
है,
मनंै े त्रिलोक पनत राम को िन िन भटकते हुए देखा
है,
मनैं े सीता को अशोक िादटका में राम के मलए
मससकते हुए देखा है,
मनंै े शहींशाह को दो गज जमीन के मलए तड़पते हुए
देखा है।
मंै समय हूीं! शाश्ित हूीं! ननरींतर हूंी !
मनैं े जराय ए गबु ार को आफताब होते हुए देखा है,
रास्ते के कीं कर को ताज होते हुए देखा है।
मंै समय हूीं! शाश्ित हूीं! ननरींतर हूंी !
मनैं े राज सभाओीं मंे कु लिधओु ंी का िीर हरण होते हुए
देखा है,
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 105
मनैं े बड़-े बड़े नीनतिानों की नीनत का क्षरण होते हुए
देखा है।
मैं समय हूंी! शाश्ित हूंी! ननरंीतर हूीं !
मनैं े बड़-े बड़े िकृ ्षों को समूल उखड़ते हुए देखा है,
लताओीं को भकू ीं प में जड़े पकड़ते हुए देखा है।
मंै समय हूीं! शाश्ित हूंी! ननरंीतर हूंी !
ितमय ान भूत से कहाीं मभदन नजर आता है,
आज भी मानि खखदन नजर आता है,
आज भी मानि खखदन नजर आता है।
मैं समय हूीं! शाश्ित हूीं! ननरींतर हूीं !
डॉ पषु ्पा पुष्पध, पुणे
54. *अजीब है ये जजदीं गानी के ये पल*
अजीब है ये जजंदी गानी के ये पल
कभी धपू तो कभी छाीिं बनकर ढले
106 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
कभी सखु -दखु की लहरों में ये पले
कभी लगे उजले ननखरे से ये पल
तो कभी सूने-सूने से लगे ये पल....
अजीब है ये जजदंी गानी के ये पल
कभी लगे ररश्तों के मेले
कभी अके लापन दरू तक ठे ले
कभी हंीसते -हींसते बीते
कभी उदासी मन से न र ते
अजीब है ये जजींदगानी के ये पल
डॉ स्िानत कपरू िढ्ढा, पुणे
55. *माततृ ्ि*
मनंै े तुम्हें जीिन ददया,
तुमने मेरे जीिन को अनमोल बना ददया।
मनंै े तुम्हंे दनु नया मंे जीने के तर के मसखाए,
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 107
तमु ने तो मुझे जजंीदगी जीने का तर का मसखा ददया।
छोट -छोट बातों मंे खमु शयांी ढूंीढना, अपनी बातों से हर
क्रकसी को खुश रखना,
जो मनंै े भी कभी सीखा था, िह सब मझु े क्रफर से याद
ददला ददया।
तुमसे और क्या उम्मीद रखूीं, जो मंै कभी भी तमु ्हंे ना
दे पाई,
तुमने मझु े िह सब हामसल करा ददया।
भागती रलतार भर जजंीदगी मंे, जाने कहांी मेर मसु ्कान
खो गई थी,
तमु ने तो मझु े क्रफर से खशु रहना मसखा ददया।
मनैं े तुम्हें जीिन ददया,
तुमने मेरे जीिन को अनमोल बना ददया।
प्रीनत, बगंी लोर
108 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
56. *सपनों से आगे*
सबु ह की पहल क्रकरण बालों को सहला कर िुपके से
यह कह गई,
देख मलया न सपना? कर लो इदहें अब अपना।
जागो! अब यह ददन तुम्हारा है,
ये धरती, आकाश, ये सारा विस्तार तुम्हारा है।
मीठी मीठी हिा कानों मे गनु गनु ा गई,
मौसम सहु ाना है, अब कोई नह ीं बहाना है।
करने हंै तुम्हंे अगर अपने सपनों को साकार,
तो उठो, त्याग के अपने आलस एिीं विकार।
उड़ िलो पनंी छयों की तरह उदमुक्त गगन मंे
जहाूँ सपनों को ममले उड़ान और जजंीदगी को एक नई
पहिान।
आरम्भ कहाूँ से करंे और कहाूँ हो अदत?
गनत तजे हो या हो मदद,
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 109
रास्ते सुगम हों या हों तंीग,
ऐसे प्रश्न हैं अनचगनत और अनदत।
लक्ष्य को जानो, गदतव्य को पहिानो
और बढते रहो ननरींतर ननविकय ार
तभी होंगे तुम्हारे सपने साकार।
रत्नेश सहाय, राँूिी
57. *एक कदया*
तमु ्हारे घर आना िाहती है,
तुम्हार पिु ी बन,
प्रेम देना और पाना िाहती है,
पर क्षा न दे,
ऐसी ह कोख मंे समाना िाहती है,
जदम से पहले,
ह िह नह ंी मौत पाना िाहती है ।
110 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
िह कदया,
अपने अपनों से बि जाना िाहती है,
उस दृजष्ट से,
जो उसे हर िक़्त हेय बताना िाहती है,
उस छु अन से,
जो उसे शोवषत कर जाना िाहती है,
दरू घणृ ा-भेद से,
िह भी खेलना-खखलखखलाना िाहती है ।
िह कदया,
उन परायों से भी बि जाना िाहती है,
उस कु दृजष्ट से,
जो जबरन ह उसे टटोलना िाहती है,
उस सोि से,
जो व्यिहार की सीमा बाूँधना िाहती है,
छू ट बदधनों से,
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 111
तारे गगन से िह भी तोड़ लाना िाहती है ।
िह कदया,
अपने जायों से भी बि जाना िाहती है,
उस समझ से,
जो उसे घर की दासी बताना िाहती है,
उस दृजष्ट से,
जो वपता को, ऊँू िे आसन बठै ाना िाहती है,
अपने सिसय ्ि के ,
बदले िह जरा आदर भी तो पाना िाहती है ।
क्या दोगे उसे,
ये थोड़ा कु छ, जो िह कदया पाना िाहती है,
त्याग दोगे क्या,
मानमसकता जो उसे नीिा ददखाना िाहती है,
बनाओगे समाीं,
जजसमंे िह त्रबना भय के , जी पाना िाहती है,
112 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
समान जानोगे उसे,
जो हरदम तुम्हें मशखर पर पहुूँिाना िाहती है ।
आकाश सेठी, मुीबं ई
58. *सपनों की उड़ान*
अगर सपनों में, मंै खोती तो
उड़ती नभ में, मंै भी,
कभी हिा के साथ िल
बादलों में नछपती मै भी।
िषाय की बदंूी ों में ढलकर
छम छम चगरती मैं भी
नददयों की कल-कल मंे घलु कर,
मनिल होती मंै भी।
बच्िों की गजंूी ों में खोकर 113
फू लों सी हींसती मंै भी,
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
कभी पतंीगों पर िढ कर
मस्ती में चथरकती मैं भी।
कभी झरनों के साथ हो
पितय से उतरती मैं भी।
लोगों के दखु ददय से हटकर
पल भर सोती मंै भी।
और सपनों मंे खोकर क्रफर,
नभ मंे उड़ती मंे भी ।
लेक्रकन.......?
मीनू िमाय, नोयडा
59. *आत्म मथंी न 2020*
नि कोपलंे फू ट , जल नि तरींगंे;
नि उम्मीदों सगीं रखा धरा पर कदम ,
आया साल दो हजार का बीसिाूँ
114 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
साल है महाकाल का ; िक़्त यह दरु ाल है ;
मरुस्थल सा अकाल है ; प्राण हुए बहे ाल हंै ।
लगता है क्रक बैठी थी जुबाीं पर माूँ शारदा ;
जब छू कर लम्हो को कहा था ऐ िक़्त तू ठहर जा ;
काल के रनिे पर लगे ह थे उड़ने क्रक लगा झटके से
है ब्रेक
उड़ते रहे सदा हो बेक्रफकरे, क्षक्षनतज को मापने िले
अवििेक ।
उड़ िले थे गगन को िमू ने हो मदहोश , सफलता के
मद मे खो होश।
उड़ ले िाहे लाख ऊीं िा लौटता घर-हर पररदीं ा।
गाींि की सनू ी गमलयांी सूने घोसले बांीटते हंै जोह।।
खत्म होने को है जसै े सारे त्रबछोह।
सीमेंट के घने जंीगलों से गािंी को जाती हुई डगर
आते हुए त्रबखरा ददए थे हमने कु छ पत्थर इधर उधर।
जदमभूमम की रगड़ ने िमका ददया उनको ननखर।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 115
खझलममलाती सी रोशनी दटमदटमाती डगर।
बुलाती है तमु ्हें आओ अब लौट आओ घर ।
सींकट के कालका जब मिा कोलाहल,
सकु ींू के आगे खाक हो गए सपनों के महल।
काश क्रक गािीं मंे ह बना लेते हम अपना आमशयाीं।
खा लेते दो जून की रोट सह , सुकींू का होता आसमा।ंी
ममट्ट की महक ,दोस्तों का िेहरा,
याद आता है बड़ा, ररश्तो का घेरा
िलो छोड़ के इन छलािों को िले,
जदम भमू म की धूल अपने माथे पर मले।
सौम्या श्रीिास्ति, पणु े
60. *बेदटयों की पुकार*
गुलामी ने छीने थे अचधकार,
कदया को रत्न कहते हंै इनतहासकार,
बदलें हम अपने संीस्कार,
116 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
यह है बेदटयों की पकु ार ।
िैष्णो देिी, विधंी ्यािल मांी की
सब करते हंै जय जयकार,
पर घर मंे ह ममले न प्यार,
यह है बेदटयों की पकु ार ।
िीशं िदृ ्चध करती है ये सब,
उनसे ह िलता संीसार,
रखे इनके प्रनत श्रेष्ठ वििार,
यह है बेदटयों की पकु ार ।
रैक्रफक्रकीं ग का रोज होता खेल,
करोड़ों मंे होती है सेल,
ऐसा ना हो कोई व्यापार,
यह है बेदटयों की पकु ार ।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 117
प्रायः हर जगह होता उनका अपमान,
जजसे रोज प्रकामशत करता है अखबार,
बदलना होगा अब दक्रकयानसू ी वििार,
यह है बेदटयों की पकु ार ।
सगे संीबंधी ी भी नह ीं छोड़ते,
शोषण बलात्कार का बनती मशकार,
सरकार करे दयाय व्यिस्था में सधु ार,
यह है बेदटयों की पुकार ।
अननिायय मशक्षा हो बेदटयों का,
और ममले जदम का अचधकार,
बंीद हो इन सब पर अत्यािार,
यह है बेदटयों की पकु ार ।
यह है बेदटयों की पुकार ।
यह है बेदटयों की पकु ार ।
रूसो सेन गपु ्ता, के िट
118 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
61. *िोले पहने हजार*
हजारो रूप बदले
औरत कहाूँ बदल पायी है
करछी िमिा छोड़
कलम हाथ उठायी है
हाूँ औरत देहर लाींघ आयी है
साड़ी के पल्लू से अब नह ंी बीधं ी है
जीदस की सादगी मंे खदु को
ढाल लायी है
क्रकतने भी ऑक्रफस संीभाले
क्रफर भी घर को िो ह मंदी दर सा सजाये है
शाम को थक के लौटे तो
खाना शायद न भी बनाये िो
बच्िो में जान बसती है उसकी
प्यार से उदहें गले लगाए है
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 119
सबकी परेशानी त्रबन कहे समझे
अपना दःु ख खुद से भी छु पाये है
माला की िो छु पी हुई डोर है
जो सारे मोनतयों को साथ लायी है
सख्त ददखती है थोड़ी
पररजस्थनत से लड़ना सीख आयी है
आज भी शजक्त का है प्रतीक
पर प्यार करना कहाँू भलू पायी है
िोले पहने हजार
हजारो रूप बदले
औरत कहाूँ बदल पायी है
सुवप्रया पाण्डे, ददल्ल
62. *बहती हुई धारा*
बहती हुई धारा
देखते ह िह थम गयी
उसने देखा,
120 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
उसकी बाहीं पकड़ कर 121
खीिीं मलया और
उसको बाहों में मलया।
िह भी आया था
देखने, एक जगह
अपने मलये
जहाीं से िह कू द सके
बहती धारा मंे।
बाहों में अब िह
मसमट गयी
उसे लगा उसे
आधार ममला,
जीिन साथी ममला।
उन दोनों ने शाद की
जीिन की धारा मंे
शाममल हो गये।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
अब िे
बाररश के
ददनों मंे जातें हैं,
बहती हुई धारा
देखने।
उसे कहने
कै से तुमको हमने
िकमा ददया,
और जीिन साथी बने.
प्रभाकर जोशी, पणु े
63. *नौकर *
बड़ी हसीन होगी तू ऐ। नौकर ,
सारे युिा आज तुझ पर ह मरते हंै।
सखु -िैन खोकर, िटाई पर सो कर,
सार रात जाग कर, पदने पलटते हैं,
ददन में तहर और रात में मैगी,
122 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
आधे पेट ह खाकर तरे ा नाम जपते हंै।
बड़ी हसीन होगी तू ऐ। नौकर ,
सारे युिा आज तुझ पर ह मरते हैं।
अनजान शहर में छोटा सस्ता रूम ले के ,
क्रकिन, बेडरूम सब उसमें ह सहेजे,
िाहत में तरे अपने मांी-बाप और,
सगे - संीबंीचधयों ि दोस्तों से दरू रहते हंै।
बड़ी हसीन होगी तू ऐ। नौकर ,
सारे युिा आज तुझ पर ह मरते हंै ।
राशन की गठर मसर पर उठाए,
अपनी मायूसी और मजबरू रयों को छु पाए,
खिाखि भरे रेन में त्रबना दटकट सफर करते हंै,
क्रकसी तरह बेड़ा पार हो जाए यह सोिा करते हैं।
बड़ी हसीन होगी तू ऐ। नौकर ,
सारे युिा आज तुझ पर ह मरते हंै।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 123
इींटरनेट अखबारों मंे तुझको तलाशते,
तरे े मलए पि - पत्रिकाएीं पढते - पढाते,
मौकों की तलाश मंे खाक छाना करते हैं ,
बत्तीस साल तक के यिु ा कु मारे क्रफरते हंै।
तू क्रकतनी हसीन होगी ऐ। नौकर ,
सारे युिा आज तुझ पर ह मरते हंै ।।
डॉ अजश्िनी कु मार ममश्र, पणु े
64. *मेरा छठ*
मैं त्रबहार सौ पर भार
छठ के अिसर पर
घर जाने की बार
छु ट्ट के मलए अजी
मसलाई के मलए दजी
इदतजाम की सार
124 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
जम के की तयै ार 125
रात करिटों में कट
प्रातःकाल का था सफर
छः घदटे का, पूना से पटना
जहाँू लगे सभी अपना
न नीद हुई, ना देखा कोई सपना
पहुींिी अपनी धरती
हंीसती, मसु ्कु राती, ईठलाती
स्िागत क्रकया भाई ने
ममता का आिंी ल ददया माई ने
दठठोल क्रकया भाभी ने
ना कोई ददनियाय
बस ििाय ह ििाय
गप्पें मारना, िाय पीना, घमू ना, क्रफरना
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
न क्रफक्र न चिदता
हुई आजाद पररददा
छोडा नह ीं भाईयों से लड़ना
खाने के कटोरे को छीनना
मेरे हंीसी का रहा न दठकाना
जब भाई ने कहा रोट नह ंी है बनाना
भात और सेिई है खाना।
सगंी ीता प्रसाद, पुणे
65. *एक पररिार*
दो या तीन बच्िे, होते हंै घर मंे अच्छे ।
इसकी प्रामाखणकता मनैं े अपने घर मंे पाया है,
दो बेदटयों और एक बेटे ने मेरा घर िमकाया है।
दोनों की प्यार सजृ ष्ट द द , उनके झगड़े सलु झाती है,
उनके क्रक्रयाकलापों से िो, अपना मन बहलाती है ।
126 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
ऊीं िी मशक्षा प्राप्त सजृ ष्ट तो, सबके मन को भाती है ।
पापा का इकलौता बेटा, शुभींकर उनकी शान है,
खेल खेल में भाीनं त भांनी त का, करता अनसु ंीधान है।
कृ ष्ण-कंी स, राम-रािण, ह उसके मन को भाते हंै,
मीिं मुनध हो देखा करता, िे ट िी पर जब आते हैं।
कोक्रकल कीं ठी शभु ्रा बेट , उसकी अलग कहानी है,
बातंे कर िह बड़ी-बड़ी, करती अपनी मनमानी है।
नखरे िाल यह बेट है, इसकी अदा बड़ी सहु ानी है।
विदषु ी सघु ड़ सींुदर मदहला, अपने घर की शान है,
पाक कला में ननपणु है मम्मी, रिती सब पकिान है।
अपने और परायों का भी, करती यह सम्मान है।
ऊंी िे पद पर पदासीन, इन बच्िों के पापा हंै,
मुजश्कल घड़ड़यों में भी िो, ना खोते अपना आपा हैं।
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 127
घर बाहर को रोशन करना, इनका अपना काम है,
दलतर बाहर सब है जपते, वपटीं ू जी का नाम है।
कु मदु मसदहा, पटना
66. *मेर अपनी कहानी के िल कु छ ददन पुरानी*
अजी सनु ते हो क्या क्या मन मंे बोलते रहते हो,
यहांी बच्िे रोते रहते हंै और तुम कविता मलखते रहते
हो।
कु छ पररिार का अमभमान है या के िल यह कविता ह
महान है,
कभी तो कु छ सह सोिा करो सह क्रकया करो,
कम से कम जब घर पर रहो तो बच्िों का तो ख्याल
क्रकया करो।
अभी तो मनैं े कविता मलखने का मन ह बनाया था,
क्रक श्रीमती जी का गसु ्सा दाना पानी मलए उनकी
आखंी ों में खनू उतर आया था।
128 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
मरता क्या न करता अब बच्िे को खखला रहा था,
मेर हालत पर मेरा बच्िा भी मसु ्कु रा रहा था।
पता नह ीं क्या है घर पर भी ऑक्रफस का काम करते
हो,
क्रकन क्रकन खयालों मंे हर िक्त खोए रहते हो।
अब ऐसा नह ंी होगा घर का काम घर पर करना होगा,
और ऑक्रफस का काम ऑक्रफस मंे ह करना होगा।
कान खोल कर सुन लो अब यह सब नह ीं होगा नाटक
ऑक्रफस का काम उधर ह कर लो नह ंी तो बदंी रहेगा
घर का फाटक ।
इस कविता के िक्कर में आलू प्याज भी भलू जाते
हो,
और ज्यादातर समय िॉशरूम मंे त्रबताते हो।
इस घर गहृ स्ती के िक्कर मंे मैं अके ले ह पूछती
रहती हूीं,
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 129
तभी तपाक से मेर त्रबदटया बोल और मैं खेलने के
िक्कर मंे रहती हूीं।
पत्नी बोल मुझे तो कोई काम नह ीं मुझे अभी खाना
बनाना है,
बेट बोल आप भी न पापा मीहू का ध्यान दो मझु े
भी खेलने जाना है।
मंै कह ीं खोया बच्िे को खखलाता रहा, दबी दबी आिाज
में मन मंे ह कविता बनाता रहा।
आज यह जो कविता है के िल कविता ह नह ंी मझु
पर बीती िह सार सच्िी कहानी है,
मेरे द्िारा मलखी गई मेर अपनी जबु ानी है।
कमोबेश ऐसी ह सब की कहानी है,
कविता में ह सह मझु े अपनी बात बतानी है।
मैं कोई दखु खयारा नह ंी घर गहृ स्ती में व्यस्त हूंी,
ऑक्रफस मंे भी व्यस्त हूंी और घर पर भी मस्त हूीं।
130 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020
मझु े आपसे भी यह कहना है जीिन कदठन नह ंी
खुमशयों का गहना है,
खुशी हो या गम मस्त होकर सहना है।
दयानींद कु मार, पणु े
67. *बहुत याद आती है पापा*
जजंदी गी के इस सफर में, सब मसखाया था कभी,
और िलकर दौड़ना भी, आप से सीखा कभी,
ऐसे अिानक छोड़ दंेगे आप, सोिा ना कभी,
एक पल में जैसे िलना, भलू बैठा हूँ अभी|
यूँ तो जीिन का सफर, हम सब अके ले तय करें,
साथ जब था आपका तो, सकु ू न सीने में भरंे|
सीने में धड़कन भर पर, ददल गया है खो कह ंी,
आपके सपनों को जीना, ह मेरा लक्ष्य है अभी |
शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020 131
उदह ंी कदमो को मंै ढूंीढा, करता हूँ तदहाईओंी मंे,
जजसके नक्शे कदम पर, िलने को सिीं रा था कभी,
याद और अनुपजस्थनत, ना सहन होती है अभी,
हौसलो को क्रफर से खोजूी,ं साहस ना आता है अभी |
वपता को खोने से सजृ ष्ट रो रह है आज की
याद आती है मुझे, पापा के हर एक आस की
याद आती है बहुत, पापा मुझ को आपकी
याद आती है बहुत, पापा मुझ को आपकी |
कु मार सौरभ, नोयडा
132 शब्द सत्ता, प्रथम अकं , 2020