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Published by Surya Foundation, 2023-09-20 08:56:17

Hamari Rashtriyata aur rss

Hamari Rashtriyata aur rss

हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ


डॉ. मोहन भागवत हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ


संकलन एवं संपादन सहयोग • अनिल जोशी • राजेंद्र आर्य • विश्व संवाद केंद्र भारत Âý·¤æàæ·¤ • y/v~ ¥æâȤ ¥Üè ÚUæðÇU, Ù§ü çÎËÜè-vv®®®w âßæüçÏ·¤æÚU • Üð¹·¤æÏèÙ â¢S·¤ÚU‡æ • ÂýÍ×, w®wx ÂðÂÚUÕñ·¤ ×êËØ • ¿ãUžæÚU L¤Â° ×é¼ý·¤ • ¥æÚU-ÅðU·¤ ¥æòȤâðÅU çÂý¢ÅUâü, çÎËÜè Hamari rashtriyata aur rashtriya Swayamsevak sangh Ed. Shri Anil Joshi • Shri Rajendra Arya ` 75.00 (PB) Published by Prabhat Prakashan Pvt. Ltd., 4/19 Asaf Ali Road, New Delhi-2 e-mail: [email protected] ISBN 978-93-5521-574-1


दो शब्द भारतीय संस्कृति में वक्ता-श्रोता के बीच संवाद का एक पुरातन इतिहास है। वक्ता-श्रोता के बीच हुए संवाद से हमारे समाज को अनेक विशद चिंतन और दर्शन प्राप्त हुए। हमारे अनेक पुराण वक्ता-श्रोता के बीच हुए संवाद पर आधारित हैं। कभी यह ज्ञान भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच हुए संवाद के माध्यम से श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में हमें मिला, तो कभी ऋषि याज्ञवल्क्य और भारद्वाज मुनि के बीच हुए संवाद के माध्यम से श्रीरामचरितमानस के रूप में मिला। जब-जब विषयों के अधिकारी वक्ता और उपयुक्त एवं सुपात्र श्रोताओं का संयोग बनता है, तब-तब समाज को ऐसा वृहद् चिंतन और दर्शन प्राप्त होता है, जो लंबे समय तक लोक का मार्गदर्शन करता है। आज भी भारत में वक्ता-श्रोता के बीच की संवाद परंपरा कायम है। उसी परंपरा का अनुसरण करते हुए वर्ष 2015 में ‘संकल्प’ द्वारा वार्षिक ‘व्याख्यानमाला’ का आयोजन प्रारंभ किया गया, जो निरंतर चल रहा है। सौभाग्य से संकल्प व्याख्यानमाला के अष्टम सोपान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के उद्बोधन का संयोग बना। इन्होंने अपने तीनों विषयों के साथ पूर्ण न्याय किया। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब ‘हमारी राष्ट्रीयता’ के स्वरूप को अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ने का प्रयास किया जा रहा है, तब एक अधिकारी पुरुष द्वारा इस विषय पर विस्तारपूर्वक व्याख्यान हम सबको दिशा प्रदान करने वाला है। इसी प्रकार


‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के विषय में भी स्थापना से लेकर अब तक समाज में अनेक भ्रांतियाँ फैलाने का प्रयास किया गया, तब विश्व के इस सबसे बड़े संगठन के विषय को स्वयं पूज्य सरसंघचालक से बेहतर कौन रख सकता है। संघ पर डॉ. मोहन भागवत जी का व्याख्यान अनेक जिज्ञासाओं को शांत और संशयों को दूर करने वाला है। भारतीय परंपरा में ‘नारी’ को सर्वाेच्च स्थान दिया जाता था, किंतु पराधीनता के लंबे काल से होकर निकले हमारे देश में स्त्री को कमजोर या बोझ समझा जाने लगा। नारी शक्ति पर डॉ. मोहन भागवत जी का तीसरा व्याख्यान ‘स्त्री विमर्श’ को एक नई दिशा देता है। इन व्याख्यानों की विशेषता यह थी कि अत्यंत सरल शब्दों एवं स्वभाविक शैली में डॉ. भागवत जी ने विषयों को सर्वग्राही बना दिया। श्रोताओं में उपस्थित बुद्धिजीवियों द्वारा प्रश्नों को रखना और मा. मोहन भागवत जी द्वारा बहुत सहज एवं प्रभावी ढंग से जिज्ञासाओं को शांत करना व्याख्यानमाला का अत्यंत आकर्षक पक्ष रहा। उन प्रश्नोत्तरों को भी इस पुस्तक में समाहित किया गया है। मुझे विश्वास है कि पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के व्याख्यानों पर आधारित यह लघु पुस्तिका एक वृहद् पाठकवर्गको नया चिंतन प्रदान करने वाली सिद्ध होगी। (संतोष तनेजा) अध्यक्ष, संकल्प फाउंडेशन 6


भूमिका ‘संकल्प’ संस्था द्वारा आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय सभागार में दिनांक 23 सितंबर, 2022 को आयोजित अष्टम व्याख्यानमाला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माननीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा पूर्व सिविल सेवकों, बुद्धिजीवियों और अकादमिक समाज के सदस्यों के बीच दिए गए व्याख्यानों का विशेष महत्त्व है। उनका पहला व्याख्यान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण संकल्पना राष्ट्रीयता के संबंध में है। आज राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की चर्चाको विवाद के घेरे में लाए जाने के प्रयास हो रहे हैं। बीसवीं शताब्दी में लड़े गए दो विश्वयुद्ध पश्चिम में राष्ट्रवाद की परिकल्पना के बारे में अलग और नकारात्मक तसवीर प्रस्तुत करते हैं। डॉ. मोहन भागवत जी का कहना है कि हमारा राष्ट्रीयता का विचार पश्चिम की राष्ट्रीयता के विचार से बिल्कुल अलग है। वे कहते हैं कि पश्चिमी समाज की धर्मकी परिभाषा और हमारे देश की परिभाषा में बहुत अंतर है। हमारी राष्ट्रीयता संपूर्ण विश्व को एक कुटुंब बनाकर चलने के लिए काम करती है। विविधताओं को हम प्रकृति का शृंगार मानते हैं। हमारी राष्ट्रीयता महर्षि अरविंद की परिकल्पना के अनुसार व्यापक, आध्यात्मिक, सबके लिए न्यायपूर्ण और शुभ है। आज के समय में राष्ट्रीयता के संबंध में यह स्पष्ट परिकल्पना अत्यंत प्रासंगिक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संबंधी व्याख्यान में डॉ. मोहन भागवत एक दृष्टांत देते हुए कहते हैं कि सन् 1884 में सर सैयद अहमद ने लाहौर में


आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि हमें हिंदू ही कहा जाना चाहिए। वे कहते हैं कि हिंदू का समानार्थी शब्द भारतीय है, यह हमारी राष्ट्रीयता का निर्देशक शब्द है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संपूर्ण समाज का संगठन है। हमारी परम वैभव की संकल्पना के पीछे ‘विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम’ का भाव है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का केंद्रीय भाव निस्‍स्वार्थ भाव से समाज का संगठन और सेवा है। संघ की कार्य पद्धति है नित्यता से आदत, आदत से स्वभाव, स्वभाव से शील। इसे जन-जन तक पहुँचाना हमारा लक्ष्य है। वास्तव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश को बुनियादी बातों की तैयारी और आधारभूत संरचना दे रहा है। वे कहते हैं कि नव भारत के निर्माण के लिए आवश्यक है कि हम महिलाओं की बराबरी के स्थान पर पूरकता शब्द का उल्लेख करें। पूरे समाज के लिए आवश्यक है कि नारी शक्ति को प्रशासन सहित सभी स्थानों पर यथायोग्य स्थान मिले। महिलाओं की स्थिति को लेकर एक कालखंड में जो हुआ वह हमारी दृष्टि का परिचायक नहीं है, वास्तव में जैसा स्वामी विवेकानंद ने कहा महिलाओं को उपदेश या संदेश नहीं देना है। उन्हें केवल सशक्त बनाना है। संकल्प द्वारा प्रशासन वर्ग में महिलाओं के प्रशिक्षण के लिए वे कहते हैं—‘यह भावी भारत के भारतीय आधार पर दम के साथ खड़ा होने के संकल्प की पूर्तिके लिए एक बड़ा चिह्न‍ है।’ इन व्याख्यानों की एक विशेषता यह थी कि इन व्याख्यानों के साथ डॉ. मोहन भागवत जी ने आज के महत्त्वपूर्णकई चर्चित विषयों पर प्रश्नों के उत्तर दिए। यह प्रश्न इतिहास, भावी पीढ़ी, नारी शक्ति, ज्ञानवापी, जनसंख्या नियंत्रण आदि के संबंध में थे। ज्ञानवापी के संबंध में उनका उत्तर समाज में फैलाई जा रही बहुत सी शंकाओं का समाधान करता है। इस प्रामाणिक व्याख्यानमाला के आयोजन और प्रकाशन को संकल्प के प्रमुख श्री संतोष तनेजा का संरक्षण और सतत सहयोग मिला। इसकी केंद्रीय धुरी हमारे सहयोगी एवं साथी संपादक श्री राजेंद्र आर्य हैं। इसकी तैयारी और इसके समयबद्ध प्रकाशन को लेकर उनकी चिंता का परिणाम ही यह पुस्तिका 8


है। पुस्तक लोगों तक पहुँचे, इसके लिए अमेरिका के समाजसेवी और हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक श्री ब्रह्म‍रतन अग्रवाल जी का योगदान महत्त्वपूर्ण और प्रेक है। इसके संकलन और संपादकीय सहयोग में ‘विश्व संवाद केंद्र भारत’ की टीम का सक्रिय सहयोग रहा। संपादकीय सहयोगी के रूप में श्री निकुंज सूद, श्री ए.वी.एस. राव, श्री सचिन राठौर, श्री मंगलेश जी, कवर डिजाइन की संकल्पना के लिए श्री अशोक कुशवाह और टंकण व संयोजन के लिए श्री मदन कुमार का आभार। सत् साहित्य के प्रकाशन के लिए विशेष रूप से प्रयत्नशील प्रभात कुमार जी और प्रभात प्रकाशन का विशेष आभार! आशा है यह पुस्तक समाज जीवन के कई भ्रमों और शंकाओं का निवारण करेगी और नए विकसित हो रहे नैरेटिव और चिंतन की दिशा में महत्त्वपूर्ण और प्रामाणिक योगदान करेगी, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ। (अनिल जोशी) इ-मेल ः [email protected] 9


अनुक्रम दो शब्द 5 भूमिका 7 1. हमारी राष्ट्रीयता 13 2. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 29 3. भारतीय परिप्रेक्ष्य मंे नारी शक्ति 42 जिज्ञासा-समाधान 49


हमारी राष्ट्रीयता यहाँ प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त, वर्तमान में सेवारत और आगे सेवारत होनेवाले तीनों प्रकार के लोग उपस्थित हैं, जो भाषण देते नहीं, लेकिन इनके लिखे हुए भाषण अपने भाषण के नाते राजनेता इत्यादि बहुत से लोग पढ़ते हैं। कहा जाता है कि कल्पनाएँ, विचार और आदेश; अन्य लोगों के हो सकते हैं, पर प्रत्यक्षतः जो होना है, वह इन्हीं के द्वारा होना है। हमारे यहाँ प्रशासक वर्गका ऐसा महत्त्व है। इनको प्रशिक्षण देने वाली संस्था ‘संकल्प’ द्वारा मुझे कहा गया कि व्याख्यान दीजिए। अब सवाल था कि विषय क्या होगा? मेरे मन में आया कि आखिर देश का विकास, देश की प्रगति; इन सबका आधार क्या होता है? किसी भी चीज का विकास, किसी चीज की प्रगति उसकी पहचान होती है। मनुष्य के विकास की दिशा अलग होगी, परिभाषा अलग होगी। बंदर का विकास दूसरी दिशा में जाएगा। कोई बात कितनी अच्छी-बुरी, उन्नत या अनुन्नत है, इसका सवाल नहीं, सवाल है कि वह किसकी है? आजकल तो साइकिल की बात पुरानी हो गई है, पर पहले स्कूल जाने वाला बच्चा साइकिल सीखता था। मैं जब स्कूल में था, तो उस समय साइकिल चलाना उपल‌ब्धि थी। तैरना, साइकिल सीखना प्रगति मानी जाती थी। कोई बच्चा जब साइकिल चलाना सीखता है, तो यह उसकी प्रगति है, सर्कस में हाथी साइकिल चलाता है, यह उसकी प्रगति नहीं मानी जाती। यह तमाशा है, जो लोग पैसा देकर देखते हैं। इसलिए हर देश के लिए यह एक महत्त्व की


14 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बात होती है कि विकास करना है, लेकिन विकास किस आधार पर करना है, उसके बारे में स्पष्ट होना चाहिए। दुनिया के सब देश उस स्पष्टता का अनुभव करते हैं, लेकिन हमारे देश में इस विषय पर भ्रम अभी भी है, ऐसा लगता है! यह राष्ट्रीयता का विषय वर्तमान परिदृश्य में उचित व सार्थक है। राष्ट्रीयता क्या है? उसकी परिभाषा, उसका अर्थक्या है? यह विषय गहन और विस्तृत है। यह जानना सभी के लिए महत्त्वपूर्ण है, परंतु अभी इस झंझट में न पड़कर थोड़ा हम शब्दों के जंजाल से बाहर आएँ और विषय-वस्तु क्या है, इस पर विचार करते हैं। हमको वह बात स्पष्ट हो जाती है और हमको यह भी ध्यान में आता है कि हम मानें या न मानें, हम सबके हृदय में वह बात स्पष्ट है। उदाहरणार्थ, तमिलनाडु में एक राजनीतिक विचारधारा चलती है द्रविड़वाद, जो कहती है कि हम तमिल अलग हैं। यह ठीक है, अपनी-अपनी विचारधारा होती है, लेकिन जब सन् 1962 में चीन का आक्रमण हुआ, तो कांग्रेस को पराभव करके अलग प्रकार की विचारधारा वाली पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम पूर्ण बहुमत से सत्तारूढ़ हो गई और मुख्यमंत्री श्रीमान अन्नादुरई बने। उन्होंने कहा कि हिमालय पर आक्रमण तमिलनाडु पर आक्रमण है। ये उनके सार्वजनिक भाषण के शब्द हैं। यह उनकी राजनीतिक आवश्यकता नहीं बोल रही थी, यह उनके हृदय की बात थी, जो जुबान पर आ गई थी। हमारे देश में ऐसे भी लोग हैं, जो कहते हैं कि हम एक राष्ट्र थे ही नहीं, हमको एक राष्ट्र बनना है। अंग्रेजों के आने से ही हम एक राष्ट्र बने। हिंद स्वराज में गांधीजी ने तो इसका उत्तर दिया ही है, परंतु थोड़ा हम अध्ययन करें, तो हमारे ध्यान में आएगा कि सन् 1940 तक हमारे देश में हर विचारधारा के लोगों में भारत क्या है, राष्ट्र क्या है, इसकी स्पष्ट कल्पना थी। कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में श्रीमान रजनी पाल्मे दत्त हुए। वे एक अग्रणी पत्रकार और सिद्धांतकार थे। इन्होंने सन् 1937 में एक किताब लिखी, जिसका पुनः प्रकाशन सन् 1972 में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा हुआ। उसमें जो मैं अभी बोलने वाला हूँ, वह बात बदली नहीं है। उस पुस्तक में एक जगह रजनी पाल्मे दत्त अंग्रेजों को कहते हैं कि आप इस अहंकार में मत पड़ो कि आपके


हमारी राष्ट्र • 15 कारण हम एक देश बने और हमारी यह भौतिक प्रगति हो रही है। आप नहीं भी आते, तो हमारे वेदों के आधार पर हम ये सब कर लेते। सार्वजनिक जीवन में इधर-उधर की बातें होती हैं, बहुत सारी बाध्यताएँ रहती हैं। बहुत सारी बातों का विचार करके बोलना व कदम रखना पड़ता है। उसमें जो शब्द निकलते हैं, वह एक बात है, लेकिन गफलत में अंदर की बात कभी-न-कभी बाहर आ ही जाती है। इसलिए सँभलकर बोलना, चलना आवश्यक है। ऐसा करने से पहले हमें ‘राष्ट्र’ शब्द को समझना पड़ेगा, क्योंकि प्रायः हम नेशन का भाषांतर राष्ट्र के रूप में करके उस पर विचार करते हैं। लेकिन पाश्चात्य देशों में नेशन का विकास और हमारे देश में राष्ट्र का विकास—दोनों का विकासक्रम एकदम अलग है। मनुष्य एक दुर्बल प्राणी है। इतना दुर्बल है कि उसके पास उसकी बुद्धि को अगर छोड़ दिया, तो फिर एक मच्छर भी उसको परेशान कर सकता है और मार भी सकता है। ये हम जानते हैं। इसलिए मनुष्य ने सदैव यह आवश्यकता समझी है कि हमको इस दुनिया में जीना है, तो मिलकर रहना पड़ेगा, समूह बनाना पड़ेगा। इस प्रक्रिया से समूह बने, कबीले बने। लेकिन जब वो भटकने वाली जीवन की अवस्था को छोड़कर एक जगह स्थायी होने लगे, तो गाँव बसे। अब जीवन निर्वाह के लिए जो कुछ मिलना है, भूमि से मिलना है, तो अपनी म‌िलकियत की भूमि चाहिए। हमारे अधिकार की भूमि, ऐसा शब्द प्रयोग होने लगा। हमारे अधिकार की यानी 25 लोगों के समूह के अधिकार की भूमि। बाद में विचार आया कि पास-पड़ोस में 50 लोगों का गाँव हैतो इनको जीतना। कारण, बड़े-से-बड़ा समूह बनाओ और म‌िलकियत का बड़े-से-बड़ा क्षेत्र अपने अधिकार में रखो। यह मनुष्य ने जीवन के बचाव के लिए आवश्यकता समझी। ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ और ‘स्ट्रगल फॉर द एक्जिस्टेंस’ का अनुभव उनको हुआ। जब हम कहीं भी भौतिक वैभव के पीछे जाते हैं, तो यह अनुभव आता है। इसमें गलत कुछ नहीं है। लेकिन इसमें एक अधूरापन है। उस पर आगे चर्चाकरेंगे। लेकिन यह


16 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अनुभव होने से फिर अधिक-से-अधिक सब लोगों को एक साथ रखना है, तो कोई आधार चाहिए, क्योंकि साथ मिलकर रहें, इसके लिए कुछ समानता होनी चाहिए। मानवनिर्मित एक समानता उत्पन्न करना जरूरी हो जाता है, जैसे भाषा हो गई। अंग्रेजी भाषा स्कॉटलैंड, इंग्लैंड, आयरलैंड और वेल्स इन चारों के संघर्ष के समय विकसित हुई और विलियम द कॉन्करर ने इंग्लैंड को जीता, तब भाषा के आधार पर उन्होंने सबको एक किया। वह भाषा जब तक प्रभावी है, तब तक यूनाइटेड किंगडम है। अगर वह ढीली होने लगती है, तो स्कॉटलैंड अलग संसद माँगता है। यह सब होता है। अरब के कबीलों को पैगंबर साहब ने इकट्ठा किया और उनको इस्‍लाम के नाम पर एक बनाया। अब पूरी दुनिया में इस्‍लामिक वर्ल्ड हैं, तो वह इस्‍लाम के आधार पर टिका है। इस्‍लाम ढीला होने लगा, तो वह खतरे में पड़ जाएगा। फ्रांस में ओडो (Odo) जैसा शासक आया, जिसने इधर-उधर सबको इकट्ठा करके पुनः सत्ता प्राप्त की। इंग्लैंड के राजा के नियम हमारे व्यापार के लिए असुविधा पैदा करते हैं और वे बदलने के लिए तैयार नहीं हैं, इसलिए समान आर्थिक हितों को लेकर हमारे विचार से हम अलग चलेंगे, ऐसा विचार अमेरिका ने किया और अमेरिका अलग हो गया। अब ये आर्थिक हित संबंध जब तक अमेरिका के बने रहेंगे, तब तक अमेरिका है। द्वितीय महायुद्ध से पहले अमेरिका की विदेश नीति में यह स्पष्टता से कहा गया है कि जो हमारी नीति का निर्धारण करता है, हमारे जो दुनियाभर के व्यापारिक हित हैं, वह हमारा मार्गदर्शी तत्त्व है। उसके अनुसार उनकी नीति चलती है, क्योंकि वह नहीं रही, तो टूट जाएँगे। यह आधार मानवनिर्मित है और मानवनिर्मित कोई भी चीज सबको सुहाती नहीं है और सबको नहीं सुहाने के कारण उसको छोड़कर कोई बाहर जाए, तो संख्या कम होती है। संख्या कम होती है, तो बल कम होता है। इसलिए इसको जारी रखने का, इसको लागू करने का आधार दंड है, बल है, सत्ता है। सत्ता के आधार पर, एक मानवनिर्मित आधार को लेकर लोगों को इकट्ठा रखने, उनके बलबूते भूमि को अपने अधीन रखने से नेशन विकसित हुआ। ऐसा होने के कारण उन नेशंस में झगड़े भी होते हैं, और ये नेशन ज्यादा प्रभावी


हमारी राष्ट्र • 17 बनें, तो विश्वयुद्ध की आपदा आती है। इसलिए पश्चिम आज भी नेशनलिज्म से डरता है। कुछ समय पहले किसी काम से मुझे इंग्लैंड भेजा गया था। दो-तीन सार्वजनिक भाषण करने थे, तो मैंने पूछा कि यहाँ क्या, कैसे बोलना है? तो उन्होंने कहा कि बोलना तो वही है, जो आप बोलते हैं, लेकिन शब्दों का उपयोग जरा ध्यान से कीजिए। नेशनलिज्म मत कहिए, नेशनलिटी चल जाएगा। क्योंकि वह वाद (इज्म) बन जाता है, फिर वह बंद हो जाता है। फिर अस (us) वाली मानसिकता आ जाती है। हमारा लाभ, हमारा स्वार्थ, हमारा अस्तित्व, ये अहम हो जाता है। इसमें स्पर्धा है, तो संघर्ष भी है। ‘लीग ऑफ नेशंस’ बना, नहीं चल पाया। ‘यूनाइटेड नेशंस’ बना, इसे यूक्रेन में हो रहे युद्ध से समझा जा सकता है। युद्ध टल नहीं सका। जो नेशन है, उसकी प्रेणा स्वार्थ है या इसे सामूहिक स्वार्थकह सकते हैं। उसकी प्रेणा भौतिक उपभोग के साधन का लाभ है। इसके अलावा उसमें जोड़ने वाली दूसरी कोई बात नहीं है। भाषा एक है, तभी आप हमारे हैं। भाषा दूसरी है, तो आप बदल गए, दूसरे हो गए, आपकी पूजा एक होनी चाहिए, नहीं तो आप दूसरे हो गए। ऐसा उसमें अस (us) और दे (They) वाला भाव आना ही है। लेकिन हमारे यहाँ राष्ट्रीयता विकसित हुई है। दुनिया में दो प्रकार के समूह थे। कुछ लोग बली थे, वे कहते थे कि आप हमारे बल के अधीन रहो। हमारी आज्ञा के अनुसार रहो, आपको सब प्रकार की सुरक्षा हम देंगे और नहीं रहे, तो फिर आप समझ लो! अगर आड़े आओगे, तो समाप्त कर दिए जाओगे। जो हमारे अधीन रहेंगे, हमारी मानेंगे, केवल उनकी रक्षा करेंगे। इसलिए वे राक्षस हो गए। दूसरे लोग जरा और उच्चतम भावनाओं के अनुसार जाने वाले थे। प्रकाश की ओर जाने वाले थे, दिव्य विचार करने वाले थे। इसलिए वे देव हो गए। सब मनुष्य ही थे। दो प्रवृत्तियाँ हैं—एक अधिकार वाली प्रवृत्ति है, एक सबको लेकर चलने वाली प्रवृत्ति है। ये दोनों अपनी-अपनी पद्धति से भौतिक वैभव के चरम शिखर पर थीं। हमारे यहाँ छांदोग्य उपनिषद् में एक कथा आती है कि ये सब होने के


18 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बाद भी मन में संतोष नहीं था। सब सुखी थे, लेकिन ज्यादा सुख के कारण सुख भी दुःख हो जाता है। रसगुल् पचास खा स ले कते हैं, लेकिन सौ खाएँगे तो दुःखदायी हो जाते हैं। देवताओं के मन में आया कि ऐसा क्यों हो रहा है? तब वे अपने-अपने गुरु के पास गए। शुक्राचार्यके पास भक्तश्ष्ठ रे प्रहलाद के पुत्र दैत्यराज विरोचन गए, इंद्रदेव बृहस्पति के पास गए और पूछा, ‘ये क्या है?’ तो उन्होंने कहा, ‘देखो, ब्रह्म‍ाजी के पास जाओ। उनके पास एक आत्मविद्या है। आत्मा को जानते हैं, तो कभी फीका न पड़ने वाला शाश्वत सुख मिलता है और उसको पाने के बाद कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती, सब कुछ मिल जाता है।’ ये दोनों वेश बदलकर, वल्कल पहनकर, हाथ में समिधा लेकर ब्रह्म‍ाजी के पास पहुँचे। वे ध्यान में थे। दोनों ने कोने में समिधा रख दी। साष्टांग प्रणाम किया और बैठ गए। थोड़ी देर बाद ब्रह्म‍ाजी ने आँखें खोलीं और दोनों को देखा। वे बोले, ‘तुम वल्कल पहनकर आए हो, समिधा रखी है। कुछ सीखने आए हो, क्या चाहिए?’ तो उन्होंने कहा, ‘आपने आत्मा को देखा है! हमें आत्मा को देखना है, क्योंकि उसको पाने के बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता।’ ब्रह्म‍ाजी ने कहा, ‘देखते कैसे हो तुम?’ दोनों बोले, ‘आँखों से देखते हैं।’ तब ब्रह्म‍ाजी ने कहा, ‘नहीं! आँखें देखने वाला एक उपकरण मात्र है। उसके अंदर कोई देखने वाला बैठा है, वही आत्मा है। उसको देखो।’ ब्रह्म‍ाजी ने जो बताया, वह उनको सहज लगा। दोनों खड़े हो गए और एक-दूसरे की आँखों में देखने लगे, कौन बैठा है? दोनों को एक-दूसरे की आँखों में अपना ही प्रतिबिंब दिखता है। तो उन दोनों ने मान लिया कि बस यही जो हाड़-मांस की हमारी देह दिख रही है, वह जिस बुद्धि से संचालित होती है, वह बुद्धि और अंदर भाव-भावनाओं को विकसित करने वाला मन है, मनुष्य का इतना ही अस्तित्व रहता है, तो यही आत्मा है। तो उन्होंने कहा, ‘चलो, इसी को बड़ा बनाना, इसी को ठीक करना है।’ इसी से मान लिया कि आत्मा अमर है, शाश्वत है। दोनों वापस नाव से लौटने लगे। विरोचन चप्पू से नाव चला रहे थे, तो इंद्र ने देखा कि वह प्रतिबिंब, जो आत्मा है, वह चप्पू चलाने से नष्ट हो जाता है। तब इंद्र ने विरोचन से कहा, ‘विरोचन! कुछ गड़बड़ है। वह तो नष्ट


हमारी राष्ट्र • 19 हो रहा है। चलो, वापस चलो, फिर पूछते हैं।’ विरोचन ने कहा, ‘नहीं! अब कोई पूछने की आवश्यकता नहीं, उन्होंने बता दिया। हम समझदार लोग हैं, अपने समाज के प्रमुख हैं। वैभवसंपन्न समाज के राजा हैं। हमको और क्या पूछने की आवश्यकता है, हम समझ गए।’ विरोचन वापस नहीं गए, इंद्र गए। उपनिषदों में एक जगह ऐसा कहा गया है कि कभी किसी ऋषि को अपने अंदर झाँकने की बुद्धि आई, उस दिन अध्यात्म का जन्म हुआ। हम उपनिषद् देखते हैं, तो सबसे प्राचीन उपनिषद् सत्य की खोज बाहर करते हैं और जैसे-जैसे वो अर्वाचीन होने लगते हैं, वैसे-वैसे वो अंदर देखते हैं। ये खोज हमारे यहाँ चली। दुनिया बाहर की बातों की खोज करने को पर्याप्त मानकर रुक गई। आज भी बाहर की बातों की खोज बहुत करती है, लेकिन हमारे यहाँ अंदर की खोज हुई, उस खोज से हमारे प्राचीन ऋषियों को एक सत्य मिल गया कि दुनिया दिखती अलग-अलग और विविध है, लेकिन अभिव्यक्ति एक ही है। हम लोग आजकल विविधता में एकता कहते हैं। उन्होंने सोचा कि यह एकता की ही विविधता है। इसीलिए सारा विश्व अपना है। यहाँ कोई संघर्ष नहीं है। हम ही सर्वत्र हैं। सुख सबका है, एक का सुख नहीं हो सकता। सबका सुख ही एक का सुख हो जाता है। ‘मैक्सिमम गुड ऑफ द मैक्सिमम पीपुल’, ऐसा हमारे यहाँ नहीं सोचा। हमारे यहाँ ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ कहा गया है। फिर ऋषियों ने सोचा कि यह सत्य हमको मिल गया, इस सत्य के कारण शाश्वत सुख मिलता है। इस सत्य के कारण सब कलह-द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं, यह सारी दुनिया को मिलना चाहिए, क्योंकि सारी दुनिया, सारी दुनिया नहीं है, वह हम ही हैं। लेकिन सारी दुनिया को इस सत्य तक लाना, उनके पास सत्य पहुँचाना है, तो यह इक्के-दुक्केका काम नहीं है। इसके लिए पूरे देश को खड़ा करना पड़ेगा और इसलिए उन्होंने प्रयास किए। वेदों में उल्लेख है— ॐ भद्रमिच्छंत ऋषयः स्वर्विदस्त्पो दीक्षामुपनिषेदुराग्रे। ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसन्नमंतु॥ सारे विश्व का कल्याण चाहनेवाले ऋषियों ने दुर्धर तप किया। उससे


20 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमारे राष्ट्र की, बल की, ओज की उत्पत्ति हुई। प्राचीन भारत में एक महान उद्यम हुआ होगा। इतिहास तब सो रहा था, इसलिए कहीं पर उसका सबूत माँगेंगे तो नहीं मिलेगा, लेकिन बहुत सी बातों के सबूत नहीं हैं, पर वे हैं। ऐसा यह जरूर हुआ होगा, क्योंकि उसके अवशेष तो मिलते हैं। गाँव-गाँव में जाकर लोगों को प्रत्यक्ष रूप से संस्कृति सिखाने वाले घुमंतू जमात के लोग आज भी मिलते हैं। यह उनकी आजीविका नहीं है। आप उनको जरा जाकर देखिए, वे लोगों को कसरत दिखाने के लिए घर से निकलते हैं। आज की स्थिति में उनको माँगना पड़ता है। पहले वे जाते थे गाँव-गाँव में, पूजा करके निकलते थे। अब जब उनको कहते हैं कि जमाना बदल गया है, पढ़ो-लिखो, बड़े हो जाओ, तो उनमें कुछ लोग कहते हैं कि यह तो हमारा धर्म है। ऐसे ही उस समय के विज्ञान के अनुसार, जड़ी-बूटी का ज्ञान रखने वाले, ग्रह-ज्योतिष काे बताने वाले—वे सब आज एकदम प्रासंगिक हैं। उस ज्ञान को फिर से लाओ, मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ। आज का विज्ञान बहुत प्रगत‌िकर गया है। जितना उस समय का विज्ञान हमको पता था, वह हमारे यहाँ केवल वैज्ञानिकों को पता नहीं था, केवल पढ़े-लिखे लोगों को पता नहीं था, वह तो झोंपड़ी में रहने वाली बुढ़िया भी जानती थी। कौन सी जड़ी-बूटी देने से दस्त बंद हो जाते हैं। सब जानते थे। इसके लिए डॉक्टर के पास नहीं जाना पड़ता था। इसके लिए हमारे पास नानी का, दादी का बटुआ था। ये छोटी-छोटी बातें हर घर तक, हर चूल्हे तक पहुँचाई गईं और हमें एक उद्देश्य के लिए प्रेरित किया गया। हमारा राष्ट्र जीवित रहने के डर से खड़ा नहीं हुआ। क्यों यह सब हो सका? इसका पहला कारण है—हमारी भूमि। उस जमाने में हम प्राकृतिक दृष्टि से सब ओर से सुरक्षित थे। सागर लाँघकर और हिमालय को पार करके कोई नहीं आता। सुजलाम, सुफलाम् मलयज-शीतलाम् भूमि थी। उस समय जनसंख्या भी कम थी। सब कुछ भरपूर था। जीवन के लिए झगड़ा करने की नौबत नहीं थी। कोई भूला-भटका अगर आ जाता, तो हम कहते—‘आओ भाई! इतने लोग खा रहे हैं, तुम भी आओ! बैठो! झगड़ा किस बात का!’ भाषा सबकी


हमारी राष्ट्र • 21 अलग है, हमारे यहाँ पहले से ही अलग है। पृथ्वी पर अनेक धर्मों के मानने वाले, अनेक भाषाओं के बोलने वाले लोग रहते हैं। अथर्ववेद में कहते हैं— जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्र धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती।। सहस्रधाराओं से सबको दूध देने वाली गाय के जैसे, हे पृथ्वी माता! हमको सह‌िष्‍णु‌ता प्रदान करो। यह हमारी प्रार्थना है। प्राचीन काल से हम विविधता के देश थे, क्योंकि लंबा-चौड़ा देश था। अनेक प्रकार की आबोहवा, खान-पान, अलग-अलग रीति-रिवाज और अलग-अलग देवी- देवता। पहले से ही 33 करोड़ हैं। नए-नए आते-जाते हैं। पाँच सौ साल पहले साईं बाबा नहीं थे, संतोषी माता भी नहीं थीं। कहते हैं कि सत्यनारायण की पूजा सात सौ साल पुरानी है। प्राचीन देवता इंद्र, यम, मरुत वगैरहवगैरह, ये अभी मिलते नहीं। यह चलता रहता है, लेकिन हम सब लोग साथ रहते हैं। हमारी भूमि ऐसी है कि वह हम सबको देती है और उसके वायुमंडल ने तथा उसके भूगोल ने हम सबको शांति से, मिल-जुलकर रहना सिखाया है। इसलिए हम उसको माता कहते हैं, क्योंकि वह अन्न-जल तो देती है, हमको संस्कार भी देती है, वह हमारी भारत माता है। उस भारत माता की भक्ति पहला आधार बना। उसके चलते हम आत्मा को खोज सके। हम एकता को खोज सके। विविधता को स्वीकार करना, मिल-जुलकर चलना, यह हमारा स्वभाव बन गया। स्वभाव का प्रतिशब्द संस्कृत में धर्म भी है। कर्तव्य को भी धर्म ही कहते हैं। स्वभाव और कर्तव्यों के आधार पर मिल-जुलकर रहने के लिए जो प्रेरित करता है, जो धारणा करता है, धारणा करके उन्नत करता है, बिखरने नहीं देता है, उसको धर्मकहते हैं। बहुत बाद में हमने उसके साथ पूजा जोड़ी। अपनी भाषा भूल गए, अंग्रेजों ने कहा, ‘तुम्हारा धर्म यानी हमारा रिलीजन।’ उनका रिलीजन यानी हमारा धर्म। जब से ऐसा उल्टा समझना हमने शुरू किया, तब से यह गड़बड़ हो गई। नहीं तो धर्म किसी एक पूजा, एक भाषा को पुरस्कृत नहीं करता। वह सबको जोड़ता है, सबको ऊपर उठाता है।


22 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई’ हिंदी में यह केवल तुलसीदास जी का वचन नहीं है। ‘पुण्य पर उपकार, पाप पर पीड़ा’ मराठी में भी तुकाराम महाराज ने कहा है और ‘परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्’ व्यास महर्षि जी ने भी कहा है। ये वचन भारत की सभी भाषाओं में आपको मिलेंगे। यही मिल-जुलकर रहने के लिए हमारे धर्मकी कल्पना है। कैसे रहना चाहिए, मिल-जुलकर क्यों रहना है; क्योंकि हम एक हैं। हमको एक होना नहीं है, हम एक हैं, उसको पहचानना है। वास्तव में हम में एकत्व का सूत्र है और इसलिए दुनिया में कोई पराया नहीं है। ये नक्शा, सीमाएँ और देश वगैरह-वगैरह जो बातें हैं, वे बातें बहुत बाद की हैं। हम तो कहते थे—वसुधैव कुटुंबकम्, स्वदेशो भुवनत्रयः। ये केवल बोलने की बातें नहीं हैं। उस समय, जब कोई संचार का साधन नहीं था, वाहन नहीं थे, हमारे पूर्वजों ने मैक्सिको से साइबेरिया तक पैदल जा-जाकर लोगों को सिखाया। यह हमारी राष्ट्रीयता बनी, हमारी राष्ट्रीय पहचान बनी। उसको समय-समय पर बदल-बदलकर नाम मिलते रहे, लेकिन बात यही रही। भारत वर्ष की चारों ओर की सीमाओं के अंदर यह विकसित हुआ, इसलिए भारत माता की भक्ति उसका आधार है। यह जो सत्य है, अस्तित्व की एकता, उसके आधार पर जीवन कैसा जीना चाहिए! उपभोग के पीछे नहीं भागना। उस अस्तित्व की एकता का साक्षात्कार करो। सत्य अनुसंधान, सत्य का वर्णन नहीं हो सकता और हर एक का वर्णन अलग रहता है। हर एक की दृष्टि अलग है। इसलिए ‘एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’। उसका अनुसंधान तुम करो, अपना-अपना करो, अपना-अपना उसको समझो, लेकिन तुम्हारे जीवन का उद्देश्य उसको प्राप्त करना है। भौतिक लाभ के पीछे भागना नहीं है। दूसरी बात कही कि यह सत्य बड़ा कठोर है, क्योंकि वह आत्मा है, अमर है, शाश्वत है, कभी मरता नहीं। देह आती है, जाती है। भगवान श्रीकृष्ण ने कठोर कर्म के लिए अर्जुन को यही बताया कि अरे, ये पहले ही मरे हुए हैं, मैंने इनको पहले ही मार दिया है। यह क्रूर कर्मके लिए प्रवृत्त कर सकता है, यह न हो, इसके लिए सत्य के


हमारी राष्ट्र • 23 साथ करुणा है, संवेदना है, दूसरों के ऊपर दया है। इन सब गुणों का समुच्चय करुणा कहलाता है। करुणा से व्यवहार करो और ऐसा वही कर सकता है, जो अपने आप को तन-मन से शुद्ध करता है। इसलिए शुचिता तीसरा मूल्य है और इसके लिए जीवनभर परिश्रम करना पड़ता है। व्रतस्थ रहना पड़ता है। तपस चौथा मूल्य है। यह चार मूल्यों का शाश्वत धर्म है। बाकी जो आचार धर्म है, वह अलग-अलग रूप-देशकाल-परिस्थिति के अनुसार स्वरूप लेगा। अलगअलग पूजाएँ होंगी, अलग-अलग व्यवहार होगा। लेकिन सबको यह चार मूल्यों का आधार चाहिए, नहीं तो वह धर्म नहीं है। पोथी में लिखा हो, वेदों में भी लिखा हो, लेकिन इन चार मूल्यों को छोड़कर है, तो वह धर्म नहीं है। इस धर्मके आधार पर एक आचरण की पद्धति चली, जो सर्वत्र समान हो गई। जैसे अपने यहाँ आप कुछ लेने जाएँगे, तो भारत जहाँ-जहाँ है, भारत जहाँ-जहाँ था, वहाँ सर्वत्र आपने सौ आम लिये, तो ऊपर से पाँच वैसे ही मिलते हैं। उसका पैसा नहीं देना पड़ता और न आपको माँगना पड़ता है। सब्जी बाजार में आप सब्जी खरीदोगे, तो चार धनिए की जोड़ी ऐसे डाल देते हैं या दो मिर्ची ही डाल देते हैं। यह पूरे भारत में अभी भी चलता है। जहाँ भारत है, जहाँ भारत था, वहाँ भी। ऐसी और कई बातें हैं। कोई माँगने वाला आया और उसको कुछ देते हैं, तो बच्चेको भेजते हैं, मुट्ठी भर चावल देकर या पैसे देकर, क्योंकि उसको यह संस्कार मिलना चाहिए। हमारे घर में जो रखा है, वह सबके लिए है, केवल हमारे लिए नहीं है। ऐसे छोटे-छोटे आचरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कारों के द्वारा हमारे खून में रच-बस गए हैं। यह हमारी संस्कृति है, जो हम सबकी समान है, पर पूजाएँ सबकी अलग-अलग हैं। धर्म पर व्याख्यान देंगे, उसके बारे में भी अलग-अलग मत हो सकते हैं। आत्मा है कि नहीं है, इसके बारे में भी मतभेद है। लेकिन सत्य, करुणा, शुचिता और तपस के बारे में एक व्याख्या है। शाश्वत धर्म सबको पता है। सब पंथ, संप्रदाय उसी का उपदेश देते हैं। सब पंथ, संप्रदाय ‘सबमें एक देखो’ से शुरू होते हैं और यम नियमात्मक शुद्ध आचरण पर आकर ठहर जाते हैं। यह


24 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संस्कृति, उसका प्रत्यक्ष आचरण हमारी एकता का सूत्र है। यह कब हुआ, यह इतिहास पूर्वकाल की बात है। यह बारह हजार साल पहले से भी हो सकता है। वैसे हमारे पुराणों में तो लाखों वर्षों की गणना है, लेकिन शास्त्र के अनुसार भी कहना है, तो आज उसको 12 हजार साल तक कह सकते हैं। 12 हजार साल से यह सब चलता रहा है। यह चलता रहा है, क्योंकि इसे सुरक्षित व सुचारु रखने के लिए लोगों ने परिश्रम किया, त्याग किया और बलिदान दिया। इसकी सुरक्षा के लिए लड़ाइयाँ लड़ीं। रक्तपात हुआ, जौहर हुआ, लेकिन इसको नहीं छोड़ा। यह हमारा इतिहास है, हम सबका इतिहास है। हमारे पूर्वज, हम सबके पूर्वज हैं। जैविक रूप से भी वे हम सबके पूर्वज हैं। हमारी पहचान इन तीन बातों से बनकर बनती है। कोई एक भाषा हमारी पहचान नहीं है। कोई एक देवी-देवता, पूजा हमारी पहचान नहीं है। ये हमारे देश में है और रहेगी, क्योंकि हमारी पहचान का यह हिस्सा है। यह सब रहेगा, स्वीकार होगा, उसका सम्मान होगा और सबको अवसर मिलेगा। हम लोग भारत, पूर्वज और संस्कृति को कभी नहीं छोड़ेंगे। आज संवाद कुछ भी चलता हो, लेकिन आप जाकर देखिए कि हमारे देश में प्रत्येक व्यक्ति का जीवन कैसे चलता है! यहाँ पंथ, संप्रदाय अनेक हैं, अनेक पूजाएँ चलती हैं और बाहर से भी आने वालों की पूजाएँ हैं, लेकिन सब पूजा वाले लोगों में ये तीन बातें आपको मिलेंगी। कौन क्या बोलता है, इस पर मत जाइए, उसके दिल को देखिए, तो आपको यही मिलेगा। सामान्य व्यक्ति तो बिल्कुल यही करेगा। क्योंकि यह मजबूरी तो बड़े लोगों की होती है, मेरे जैसों की होती है। आपके सामने बोलना है, तो क्या बोलना है, नाप-तोलकर बोलना पड़ता है? घर में बात करने के लिए यह बाध्यता नहीं रहती। घर में यही सब बातें होती हैं। यह हमारी राष्ट्रीयता है। चाणक्य ने इसको परिभाषित किया। राष्ट्र क्या होता है? जनपदवती भूमि, राज्य, दुर्ग, अमात्य, बल, कोष, सुरुत; ये राष्ट्र के अंग हैं। राज्य यानी राजा, बल यानी सेना, दुर्ग यानी सीमा सुरक्षा-तारबंदी आदि। कोष, ये सब चलाने के लिए अर्थव्यवस्था चाहिए, अमात्य, इसको चलाने वाला राज्यकर्ता


हमारी राष्ट्र • 25 चाहिए और अंतरराष्ट्रीय जगत में मित्र चाहिए। लेकिन ये सब बदलते रहते हैं, मुख्य घटक है—जनपदवती भूमि। वह भूमि, हमारी भूमि है, हमारा राज्य नहीं है। हमारे बाप-दादाओं की कमाई नहीं है। न हमने उसको कमाया है। हम इसके मालिक नहीं हैं। हम इसके पुत्र हैं। हम इससे अपनेपन का नाता जोड़ते हैं। वह हमारे लिए पवित्रभूमि है, पुण्यभूमि है, कर्मभूमि है, धर्मभूमि है। जनपद समाज से बनता है और समाज मनुष्यों के समूहों से बनता है, लेकिन वह केवल समूह नहीं होता। उसका एक समान उद्शदे्य होना चाहिए। आज भी आप भारत के व्यक्ति से पूछिए कि दुनिया में क्या करने आए हो? वह आकांक्षाएँ बता सकता है कि वह लखपति बनेगा, करोड़पति बनेगा आदि। लेकिन आखिर करेंगे क्या, वह बोलता है कि क्या करना है भैया! खाली हाथ आए हैं, खाली हाथ जाएँगे। इतना सब कमाएँगे और चार लोगों का भला करके जाएँगे। यह अपने देश में बिल्कुल सामान्य भावना है। और अगर थोड़ा पढ़-लिखकर कोई कुछ जान जाते हैं, तो कहते हैं कि इन छोटी बातों में हमको नहीं फँसना है। पूरा विश्व एक कुटुंब बनना चाहिए। यह आकांक्षा और किसी देश की नहीं हो सकती। तो विश्व बाजार की बात कर सकते हैं, विश्व परिवार की बात केवल हम करते हैं। हम केवल बात नहीं करते, हम वैसे रहते भी हैं। जहाँ युद्ध है, वहाँ कौन जाता है? वहाँ से लोगों को सुरक्षित निकालकर लाना है। केवल अपने देश के नहीं, अन्य राष्ट्रों के लोगों को भी सुरक्षित निकालकर लाने के लिए यह काम जान का खतरा मोल लेकर कौन जाकर करता है! यह काम भारत करता है। श्रीलंका डूब रहा था तो श्रीलंका के दोस्त कहलाने वाले देश सहायता के लिए नहीं दौड़े, भारत दौड़ा। यह सर्वत्र भारत का स्वभाव है, क्योंकि हम ही सारे जगत को एक अस्तित्व की विविधतापूर्ण अभिव्यक्ति मानते हैं। अब इसको शब्द क्या देना है, तो आप दीजिए। हम लोग संघ में कहते हैं, हिंदू राष्ट्र। किसी को आपत्ति है और दूसरे शब्दों में भारतीय आपने कहा, तो भारतीय भी ठीक है। हम भारतीय हैं, यह बात सही है। लेकिन 14 अगस्त, 1947 के भारतीय हैं या 15 अगस्त, 1947 के भारतीय हैं? ऐसे कोई पूछ


26 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सकता है। धीरे-धीरे लोगों की समझ में आ रहा है, शुरुआत हो गई है, लेकिन लोगों को समझना चाहिए कि जहाँ भारत था, वहाँ आज भी भारत ही है। विभाजन की रेखाएँ तो नक्शे पर की गई करामात है। डॉक्टर प्रणब मुखर्जी से मेरी मुलाकात होती रहती थी। एक बार मैं उनके यहाँ गया, तो उन्होंने एक मेज दिखाई, जहाँ पर विभाजन का नक्शा खींचा गया था। उन्होंने बताया कि जो अंग्रेज आए थे, उनको इसका कुछ ज्ञान नहीं था और बहुत जल्दी उनको विभाजन करना था, समय बहुत कम था, तो उन्होंने अपनी पेंसिल रखकर जैसी रेखा खींची, वैसा विभाजन हो गया। मनुष्यता का विभाजन, यह केवल अपने देश की बात नहीं कर रहा हूँ। मनुष्यता का विभाजन कृत्रिम बात है। व्यवहार के लिए कुछ हद तक चलानी पड़ती है, ऐसा मानने वाले हम लोग हैं। हमारा नेशनलिज्म किसी के लिए खतरा नहीं बनता। वैसे हमारा नेशनलिज्म नहीं है, हमारा राष्ट्रवाद भी नहीं है। हमारी राष्ट्रीयता है और वह राष्ट्रीयता संपूर्णविश्व को एक कुटुंब में बनाकर चलाने के लिए काम करती है, केवल वकालत नहीं करती। इसलिए भारत बड़ा होगा, तो भी उसमें से कभी हिटलर पैदा नहीं होगा। अगर हिटलर के बीज भारत में किसी में पड़े हों, तो भारत के लोग उसकी टाँग पकड़कर उसको पहले ही नीचे दबाकर रखेंगे। भारत में हिटलर पैदा होने नहीं दे सकते, क्योंकि यह हमारा स्वभाव है। हम ऐसे ही रचे गए हैंऔर हम जैसे रचे गए हैं, वही हमारी पहचान है, वही हमारी राष्ट्रीयता है। इसको समझना पड़ेगा। राष्ट्र यानी नेशन नहीं है। बाकी देशों में राष्ट्रीयता का जो विकास हुआ, वैसा हमारे यहाँ नहीं हुआ है। हमारा विकास परोपकार के लिए हुआ है, दुनिया की सेवा के लिए हुआ है। यही हमारा जीवन लक्ष्य है। अपने अंदर उस सत्य को देखो और विश्व के जड़-चेतन में उसी को देखो और उसकी सेवा करो। एकांत में आत्म साधना, लोकांत में परोपकार, हमारे यहाँ यह जीवन की रीति है, यही हमारी पहचान है। इसको हम सबको सोचना पड़ेगा, क्योंकि हम विकास की बात करेंगे, तो यह ध्यान में रखकर हमको चलना पड़ेगा। हमको अपने देश में विकास और पर्यावरण का झगड़ा


हमारी राष्ट्र • 27 खड़ा नहीं करना है। ये दोनों हाथ-में-हाथ मिलाकर साथ चल सकते हैं, यह हमें दुनिया को अपने विकास से दिखा देना है। हमारे यहाँ तकनीकी मनुष्यों का विरोध नहीं करती और मनुष्य तकनीकी से दूर नहीं रहते। ये दोनों साथ चल सकते हैं, यह हमको दिखाना है। व्यवस्था की बात तो समय-समय की रहती है। आज संघ है, पहले तो राज्य, राजा भी अलग रहते थे। साम्राज्य, भोज्य, स्वराज्य, वैराज्य, महाराज्यम्, अधिपत्यम्, ऐसे कितने ही राज्य व्यवस्था के प्रकार हमारे यहाँ चल रहे थे। फिर भी पृथिव्यै समुद्रपर्यन्ताय एक राष्ट्र—पृथु राजा के कारण से जो भूमि रहने योग्य बनी, कृषि योग्य बनी, उसमें समुद्रपर्यंत राष्ट्र एक है। यह हमारी प्रार्थना रही है। व्यवस्थाओं की भिन्नता, खान-पान, रीति-रिवाजों की भिन्नता, पूजाओं की भिन्नता, भाषाओं की भिन्नता, इसको तो हम प्रकृति का शृंगार मानते हैं। ये सब होने के बाद भी इसके ऊपर हम सब लोग एक हैं। ऐसा सारी दुनिया में करना है और करने का उपकरण हमारा राष्ट्र है। योगी अरविंद ने 15 अगस्त, 1947 को एक संदेश दिया, उसमें पाँच सपने बताए थे। उन्होंने कहा कि पहला सपना था—एक, भारत स्वतंत्र हो, वह हो गया। भारत में एकता रहे, संविधान के आशीर्वाद से सबको एक किया गया, यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन फिर विभाजन कहाँ से आ गया? हिंदू-मुसलमान की एकता की तरफ जाने के बजाय एक स्‍थायी राजनीतिक विभाजन ख्‍ाड़ा हो गया। इसको कभी-न-कभी जाना पड़ेगा! जब तक ये है, तब तक भारत नहीं बनता। ऐसा उन्होंने उस समय कहा है। उस पत्र में दूसरा उन्होंने कहा था, मेरा सपना था कि एशिया के देशों की मुक्ति और वह भी अब होने लगा है कि हमारे साथ चीन भी मुक्त हुआ है। समाजवादी बन गया, मुक्त तो पहले ही हुआ था। अनेक राष्ट्रों के मुक्त होने का क्रम प्रारंभ हो गया था। हमारी राष्ट्रीयता अरविंद जी के मुख से बोल रही है। तीसरा, उन्होंने कहा कि हमारी आकांक्षा है कि सारे विश्व में एक न्यायपूर्ण साम्राज्य चले, सारा विश्व एक हो जाए। दुनिया में कुछ फटुकर प्रयास हो रहे हैं, लेकिन जब तक भारत उसमें अपनी भूमिका अदा नहीं करेगा, तब तक वे सफल नहीं होंगे।


28 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत जल्दी बड़ा होकर अपनी भूमिका अधिक अदा करे, यह तीसरी बात थी। चौथी बात उन्होंने बताई कि सारे विश्व में भारत की आध्यात्मिकता का संचार हो, आध्यात्मिकता हमारी राष्ट्रीयता का प्राण है और पाँचवीं अंतिम बात उन्होंने बताई कि ऐसी दुनिया में अतिमानस का अवतरण हो। इसके स्पष्टीकरण के झंझट में मैं नहीं पड़ता, वह एक उच्च बौद्धिक विषय है। आप मूल में पढ़िए, आपको पता चलेगा। तो ये पाँच आकांक्षाएँ लेकर हम स्वतंत्र हुए हैं। हमारी राष्ट्रीयता इस उद्देश्य के प्रयोजन को सफल करने के लिए है, इसको हम समझें। इसके आधार पर हम अपने लोगों को एक करें। उनमें पुरुषार्थका संचार करें और इसके आधार पर भारत के बड़े होने का रोडमैप हम तैयार करें। छोटी सी बात से लेकर बड़ी-से-बड़ी बात में हमारी बुनियाद को हम न भूलें, इसकी आवश्यकता है। ये जब करते हैं, तब भारत आगे बढ़ता है। ये जब नहीं करते हैं, तो प्रयत्न प्रामाणिक होने के बाद भी कहीं-न-कहीं कुछ गफलत हो जाती है। करने गए कुछ और हो गया कुछ! ऐसा हो जाता है। वह न हो, इसलिए इस बात की एक स्पष्टता होनी आवश्यक है। उस स्पष्टता में कुछ मदद करने की बुद्धि से मैंने आपके सामने कुछ बातें रखी हैं। यह मेरा विचार है। आपको इसका चिंतन करना है। जो उचित लगे, वह लेना है। इससे उलझन न बढ़े, ऐसी आशा मैं करता हूँ। o संकल्प फाउंडेशन द्वारा 23 सितंबर, 2022 को डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय सभागार, जनपथ, दिल्ली में आयोजित व्याख्यानमाला के अष्टम सोपान में ‘हमारी राष्ट्रीयता’ विषय पर रा.स्व. संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन QR कोड मोबाइल कैमरे से स्कैन करके यू-ट्‍यूब पर सुना जा सकता है।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संघ ने अपनी पहचान बना ली है। उद्घाटित किया जाए, संघ में ऐसा कुछ नया नहीं है। वैसे ही संघ अब प्रसिद्ध है। संघ के बारे में थोड़ा-थोड़ा धूसर चित्र सबकी आँखों के सामने रहता है। ये हिंदूवादी लोग हैं, सामान्यतः ऐसा लोग कहते हैं। लेकिन थोड़ा बारीकी से समझना-सोचना आवश्यक इसलिए है कि ऐसा न करें, तो ये समझ में नहीं आएगा; क्योंकि यह उल्टी चलने वाली धारा है। जैसे संघ समाज में एक प्रभावी संगठन है, ऐसा वर्णन आजकल होता है। दुनिया का सबसे बड़ा अनुशासित संगठन, भारत वर्ष में बहुत प्रभावी संगठन वगैरह-वगैरह। यह सुनकर हमको दुःख होता है, क्योंकि हमको समाज में एक अलग संगठन नहीं बनना है। यह पूरे समाज को संगठित करने के लिए चला हुआ कार्य है। विदर्भ में साहित्य संघ के 75 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने मुझे बुलाया। एक सभा हुई, उसमें एक विषय था—सौ साल पूरे करने वाली संस्थाओं के सामने कौन सी चुनौतियाँ हैं? उसमें मैंने कहा कि संघ कोई ऐसी संस्था ही नहीं है, जिसको कुछ प्राप्त करना है और मार्ग में चुनौतियाँ हैं। जो कुछ चुनौतियाँ समाज के मार्ग में हैं, संघ के सामने भी वही हैं। चुनौतियों वाली रूढ़ भाषा में संघ सही नहीं बैठता। यह समझने की बात है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज में संगठन नहीं है। इसका कार्य संपूर्ण समाज को संगठित करना है। हम जानते हैं कि इसी समाज में हमारे विरोधी भी हैं, लेकिन उनको भी हमको आगे चलकर संगठित करना है। यही एक मूल बात है।


30 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीयता का वर्णन किसी एक शब्द से बिल्कुल ठीक-ठीक व्यक्त होता है, ऐसा एक ही शब्द है—हिंदू। आप इतिहास को देखेंगे तो सन् 1860 से पहले किसी को इस शब्द से कोई आपत्ति नहीं थी, क्योंकि यह बिल्कुल स्वाभाविक माना जाता था कि हम लोग हिंदू हैं। सर सैयद अहमद अली को बैरिस्टर बनकर आने पर लाहौर में सम्मानित किया गया। आर्य समाज द्वारा उनका सम्मान हुआ और उसमें उनका परिचय दिया गया कि बैरिस्टर बनकर बहुत सारे हिंदू आए हैं और मुसलमानों में ये पहले हैं, इसलिए इनका अभिनंदन हम कर रहे हैं। उन्होंने अपने अभिनंदन का उत्तर देते समय प्रारंभ यहाँ से किया कि मुझे बहुत दुःख हुआ कि आपने हमको हिंदू शब्द से बाहर रखा। क्या हम भारत माता के पुत्र नहीं हैं? आगे चलकर वे मुसलिम अलगाववाद के जनक बने। उनका सन् 1884 के व्याख्यान में यह कहना था कि हमारी पूजा अलग हुई तो क्या हुआ, हम भी तो हिंदू हैं। अब हम भारत के हैं, भारतीय हैं, ये दोनों समानार्थी शब्द हैं। इन शब्दों का कोई उपयोग करता है, तो गलत नहीं करता। हम उसके साथ बिल्कुल सहज हैं, हम उससे सहमत भी हैं। लेकिन, ऐसे जो शब्द हैं, उन शब्दों के बारे में अंग्रेजों ने कुछ नहीं किया। उनको हमारी कमर को तोड़ना था। हम विदेशियों के खिलाफ एक होकर लड़े। अपने धर्मका स्वाभिमान लेकर खड़े होकर लड़े। उनको यह ताकत समाप्त करनी थी, तो उन्होंने प्रयास किया कि इस शब्द से लोग अलग हो जाएँ। यह सब सन् 1925 से कुछ पहले हुआ। यानी 30 साल हुए होंगे, जब ये सारे षड्यंत्र चले और लोगों के ध्यान में आने लगे। इसलिए संघ ने हिंदू संगठन की बात की, क्योंकि हम हिंदू हैं। किसी को बुरा भी लग सकता है, लेकिन यह वास्तविकता है। हिंदू नहीं, तो दूसरा कौन सा शब्द है? ‘भारत’ बिल्कुल उपयुक्त शब्द है, लेकिन भारत के साथ एक भूगोल भी जुड़ा है। 15 अगस्त, 1947 से पहले हम कराची में भी भारतीय थे, लाहौर में भी भारतीय थे, गुजराँवाला में भी भारतीय थे, लेकिन रात को 12 बजे क्या हो गया कि दूसरे दिन हम वह नहीं रहे। हम पीछे जाते हैं, तो काबुल-जाबुल के


राष्ट्रीय स्वयंसेवक• 31 पश्चिम से चिंदविन नदी के पूर्व तक और तिब्बत के चीन की तरफ ढलान से श्रीलंका के दक्षिण तक हम जो थे, हिंदुस्तान के हिंदू लोग थे और उनमें ये सारी पूजाएँ वगैरह होना बिल्कुल स्वाभाविक बात थी। किसी का किसी से कोई झगड़ा नहीं था। किसी के अस्तित्व को संकट नहीं था। इतना ही नहीं, यह देश वैसा ही कायम रहता, तो यहाँ ईसाई-मुसलमान आने पर भी उनको कोई खतरा महसूस नहीं होता। वैसे कभी ऐसा हुआ ही नहीं। ‘विश्व का हर देश जब भी दिग्भ्रमित हो लड़खड़ाता, सत्य की पहचान करने इस धरा के पास आता।’ यहूदियों को कहीं पर भी स‌िर ढकने की जगह नहीं मिली, केवल भारत में मिली। पारसियों ने कहीं पर भी अपना डेरा नहीं डाला। अपने देश से निकलकर भारत में आकर बसे। बहुत से देशों पर इस्‍लाम का आक्रमण हुआ। उनको लौटाया भी गया। उसके बाद वहाँ मुसलमानों की यह स्थिति नहीं थी। प्रयासपूर्वक उनको वापस किया। हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ। जो आए, बस गए; वे हमारे साथ हैं, हमारे साथ चलेंगे। हम भी कहते हैं यानी संघ वाले भी कहते हैं कि साथ में चलना है। ऐसा और कहीं नहीं होता है। क्यों नहीं होता है, क्योंकि हम हिंदू हैं! इस शब्द को भूलने से हम भारत से कटते हैं। हिंदू भाव को जब-जब भूले, आई विपद महान, भाई टूटे, धरती खोई, मिटे धर्म, संस्थान। आप बताइए, पिछले सौ साल का इतिहास, दो सौ साल का इतिहास, ये है कि नहीं है? क्या था, जो पाकिस्तान अलग हो गया? क्या कारण था, बांग्लादेश पाकिस्तान से बांग्ला भाषा के आधार पर अलग हुआ, लेकिन भारत नहीं बना। हिंदू भाव नहीं था अथवा हिंदू भाव रखने वाले लोगों की जनसंख्या कम हो गई थी; और तो कोई कारण नहीं था। क्या है, जिसको लेकर आज उससे अलगाववादी अपनी ताकत पाते हैं! वह यही है कि आप इस भाषा के हो या आप इस धर्म के मानने वाले हो, इसलिए आप अलग हो, खुद को अलग मानो। हमको एक करने वाला वही शब्द हैऔर इसलिए डॉक्टर हेडगेवार ने हिंदू संगठन की बात कही। उसको उन्होंने राष्ट्रीय कहा, क्योंकि


32 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वह हमारी राष्ट्रीयता का निर्देशक शब्द है। भारत में हिंदुओं का काम, राष्ट्रीय काम है। वह किसी धर्मका काम नहीं है। अमुक पूजा को करो, यह हिंदुओं का काम नहीं है। हिंदुओं का काम है, इतनी भव्य विरासत हमारे पास है, उसके लायक बनो। दूसरी बात आती है, वह भी समझने की बात है, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कम दिखता है, उसके स्वयंसेवक दिखते हैं। वह भारतीय जनता पार्टी में हैं, आज प्रधानमंत्री, गृहमंत्री—ये सब लोग स्वयंसेवक हैं। वे किसान संघ में आंदोलन करते भी दिखते हैं, वे विद्यार्थी परिषद नाम का संगठन चलाते हुए भी दिखते हैं। वे सेवा करते हैं। बहुत सारी बातें वे करते हैं, जिसमें आज वे अग्रणी हैं। दुनिया उनका स्वागत करती है, उनका अभिनंदन करती है। इससे लगता है कि यही संघ है, लेकिन यह संघ नहीं है। यह स्वयंसेवकों का किया हुआ है, वे संघ के स्वयंसेवक हैं। स्वयंसेवक क्या करते हैं, वह संघ नहीं है। स्वयंसेवक क्या हैं, वह संघ है। यह एक समझने की बात है कि संघ के निर्माता सब कामों में थे। वे राजनीति में थे, बहुत कुशल राजनीतिज्ञ थे। वे आंदोलन चलाने में अनुभवी थे। कलकत्ता में नेशनल मेडिकल कॉलेज से डिग्री मिलेगी या नेशनल स्कूल से जो डिग्री मिलेगी, वह रद्द मानी जाएगी—ऐसा ब्रिटिशों ने कानून निकाला था, क्योंकि आंदोलन में भाग लेने पर जो दंडस्वरूप निष्कासित हो जाते थे, वे सब वहाँ से डिग्री लेकर आ जाते थे। यह बंद हो, इसलिए अंग्रेज बिल लाने वाले थे। यह बिल नहीं आना चाहिए! यह सभी चाहते थे, लेकिन आंदोलन करने की किसे फुरसत है। तब कलकत्ता में डॉक्टरी पढ़ रहे डॉ. हेडगेवार ने क्या किया कि कलकत्ता की बस्ती-बस्ती में जाकर वहाँ के प्रमुख लोगों को बताया कि आपके पास पुलिस आएगी। पूछेगी कि यह सभा हुई? आपको कहना है—हाँ। अमुक-अमुक प्रस्ताव पारित हुआ? आपको कहना है—हाँ। आप गए थे—हाँ। कितने लोग थे तो 4-5 हजार से ऊपर बोलना। आपने भी भाषण दिया, तो बोलना कि हाँ, मैंने भी भाषण दिया। उसके बाद उन्होंने रोज समाचार-पत्रों में समाचार भेजना प्रारंभ किया। अमुक मोहल्ले में इस बिल के विरोध में सभा हुई, इसमें तीन हजार लोग थे।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक• 33 अंत में यह प्रस्ताव पारित हुआ, इन-इन लोगों के भाषण हुए। दो-चार दिन ऐसे समाचार आने लगे, सी.आई.डी. पहुँची। हर मोहल्ले में उन्होंने वहाँ के प्रमुख लोगों से पूछा। लोगों ने कहा—हाँ, ऐसा हुआ है। जबकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था। एक महीने ऐसे ही चला। उसके बाद ब्रिटिश सरकार ने जनक्षोभ के डर से बिल वापस ले लिया। ऐसी कुशलता उनमें थी। यह उनकी आंदोलन की शैली थी। वहीं वे क्रांतिकारी भी थे। अनुशीलन समिति की कोर कमेटी के मेंबर थे। कोकेन उनका कोड नेम था। उन्होंने गौरक्षा के लिए काम किया। उन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए काम किया। बाल विवाह को रोकने का काम किया। एक प्रसिद्ध संपादक थे—मार्खोलकर जी। उन्होंने कहा था—‘मेरा प्रेमप्रसंग हुआ, तो सारी दुनिया मेरे खिलाफ खड़ी हो गई। तब अकेले डॉक्टर हेडगेवार ने मेरा समर्थन किया और उसी लड़की से मेरा विवाह हो गया।’ बाबा आमटे को सभी जानते हैं। उन्होंने कहा था—‘मैं क्रांतिकारी विचारों का था। मुझे कुछ करना था, तो मैं एक पिस्तौल लाया था। सब लोगों ने मुझे बोल-बोलकर नाउम्मीद कर दिया। मेरे पास अकेले डॉक्टर हेडगेवार आए। उन्होंने कहा कि तुम्हारा विचार बहुत अच्छा है। तुम्हारी प्रखरता स्वागत योग्य है, लेकिन यह थोड़ा जल्दी हो जाएगा। तुम सोच-समझकर करो। उन्होंने मुझे नाउम्मीद नहीं किया, ऐसे थे वे’। डॉक्टर हेडगेवार ‘वृत्त-पत्र’ के संपादक थे, ‘वृत्त-पत्र’ के मैनेजर भी थे। उन्होंने सहकारी बैंक भी चलाया, कॉ-ऑपरेटिव स्टोर चलाया। वे गणेश उत्सव, दुर्गा उत्सव में भाषण करते थे। समाज सुधार की बातें, स्वतंत्रता की बातें करते थे। स्वतंत्रता संग्राम में दो-दो बार कारावास भुगता। यह सब उन्होंने किया है। यह बात वे समझ गए थे कि हमारे समाज में कुछ मूलभूत त्रुटियाँ घुस गई हैं, उनको ठीक किए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता। यह जो लगातार सिलसिला चल रहा है, कोई बाहर से आता है, हमको जीतकर शासक बन जाता है। फिर हम खड़े हो जाते हैं, उनके जाने के बाद सो जाते हैं। फिर दूसरा आता है। यह बंद करना है, तो पूरे समाज को तैयार करना होगा। सबके मन


34 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ऐसा है, लेकिन फुरसत किसी को नहीं है, तो मैं ये काम करता हूँ। उन्होंने सारे आंदोलन वगैरह छोड़कर संघ का प्रारंभ किया। संघ यह सब करने के लिए नहीं है, यह सब करने वालों को तैयार करने के लिए है। यह एक समझने की बात है। यह सब करने वालों को तैयार करना है, तो इन सब बातों से आपको अलग होना पड़ता है। मनुष्य को तैयार करना है, मनुष्य में सद्गुणों को, मानवीय गुणों को भरना है, उसके हृदय में समर्पण की भावना जगानी है, यह जो दुनियादारी का मामला है, इससे दूर रहना होगा, क्योंकि इसमें कई दूसरे प्रभाव भी आते हैं। कुछ काम करते हैं, नाम होता है। नाम होता है, फोटो निकलती है। फोटो निकलती है, देख रहे हैं, ऐसा मन करता है—फिर फोटो निकले, यही देखते हैं, बाकी कुछ नहीं देखते। पूरे समाज को संगठित करना है, एकाध महापुरुष है, वह सब बातों को, मोह-आकर्षण को ठुकराकर आगे बढ़ता है। लेकिन यह कोई महापुरुषों का संगठन नहीं है। यह संपूर्ण समाज का संगठन है। इन सारे पथ्य-परहेज में रखकर उनको बड़ा करना, एक ताकत बन जाएगी, उसके बाद बाहर जाकर वे काम करेंगे। लेकिन वे जो काम करेंगे, वे संघ के नहीं होंगे, क्योंकि यह कर्तृत्व उनका है, परिश्रम उनका है। दूसरा, संघ ने वहाँ उनको कुछ अच्छा करने के लिए तैयार किया है। सब मनुष्य हैं, हो सकता है, एक-आध व्यक्ति ऐसा न कर पाए। एक-आध व्यक्ति अपनी शिक्षा को भूल जाए। वह संघ की बात नहीं है। मुझे कॉलेज ने प्रशिक्षण देकर वेटनरी डॉक्टर बनाया, पर मैं संघ का प्रचारक बना। इसमें मेरा कॉलेज कुछ नहीं कर सकता। कॉलेज ने मुझे प्रशिक्षण देकर वेटनरी डॉक्टर बनाया, लेकिन मैं संघ का प्रचारक बन गया, वे क्या करेंगे! हमने ध्यान रखकर स्वयंसेवकों को बनाया, अब वे काम कर रहे हैं। अच्छा काम कर रहे हैं। अभी तक संघ को नीचा देखना पड़े, ऐसा कुछ नहीं हुआ है। थोड़ी-बहुत उलटफेर चलती है। ऐसा हो सकता है, लेकिन ठीक चल रहा है। किए हुए काम का यश उनका है, गड़बड़ हो गई, थोड़ा अपयश हमारा भी होता ही है। वह थोड़ा ही हो, इसलिए सारे कार्य अलग, स्वतंत्र, स्वायत्त चलते हैं। संघ उनको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित नहीं


राष्ट्रीय स्वयंसेवक• 35 करता। एक तो उनका अनुभव है, उनकी दक्षता है, हमारी नहीं है। लेकिन होती तो भी, हम यह नहीं करते। राजनीति में भाजपा के संगठन मंत्री रहने के बाद आज रामलाल जी संघ के अधिकारी हैं, यहाँ बैठे हैं। भाजपा में संगठन मंत्री थे, वहाँ ध्यान देते थे। अब इधर आ गए, वहाँ ध्यान नहीं देते। उनकी दक्षता है, इतने साल संगठन मंत्री रहे। अब संघ में हैं, उसका एक अनुशासन है। संघ के सारे संगठन स्वतंत्र, स्वायत्त और स्वावलंबी हैं। संघ उनको नियंत्रित नहीं करता, संघ उनका पोषण करता है। संघ सब अच्छेकामों का पोषण करता है। किसी को कोई अच्छा काम करना है और उसकी सहायता करने की हमारी क्षमता है, तो हम जरूर करेंगे। समाज की गुणवत्ता सारी बातों का निर्णय करती है। अपने इतिहास को देखो, नेता और अनुयायी दोनों की एक गुणवत्ता रही, तब अच्छा हुआ। इसमें से एक भी गड़बड़ हुआ, तो सब गड़बड़ हो जाएगा। पूजनीय बाला साहेब बताते थे, कमांडर अच्छे चाहिए, सैनिक भी अच्छे चाहिए। सैनिक अच्छे हैं और कमांडर रोने वाले हैं, कुछ नहीं हो सकता। कमांडर बहादुर हैं, लेकिन सैनिक भाग जाने वाले हैं तो भी कुछ नहीं हो सकता। देश को बड़ा करने की भूमिका में, देश में कुछ अच्छा करने की भूमिका में नेता भी होता है, नीति भी होती है, प्रशासक भी होते हैं। लेकिन समाज पहले है। समाज सर्वोपरि इसलिए है कि ये सब लोग समाज से ही आते हैं। जातपात का झगड़ा समाप्त कर, सबको एक जैसा मानना, ऐसा विचार लेकर मैं राजनीति में जाऊँ, मेरा विचार तो वही रहेगा, लेकिन मैं उसको कर नहीं सकूँगा। जब तक समाज जात-पात का विचार करता है, तब तक मुझे भी किसके कितने वोट हैं, यह गिनना ही पड़ेगा। इसलिए समाज में परिवर्तन होता है। तो तंत्र में, व्यवस्था में, नीतियों में अपेक्षित परिवर्तन आता है। नहीं तो वहाँ आने पर भी वह प्रभावी नहीं होता है। ये सर्वत्र, सदा-सर्वदा इतिहास के साक्षी हैं। प्राचीन समय से लेकर आज भी, डॉक्टर अब्दुल कलाम ने भी यही कहा है। प्रोफेसर वर्गीज कूरियन ने भी यही कहा है। सर्वत्र इतिहास में यही हुआ है। डॉक्टर बाबा साहेब आंबेडकर कहते थे कि जहाँ कोई बड़ा परिवर्तन आता है,


36 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वहाँ पहले आध्यात्मिक जागरण होता है। उसके बाद समाज का जागरण होता है। फिर वह परिवर्तन आता है। आप किसी भी देश का इतिहास देख लीजिए। रूस, क्यूबा, फ्रांस, अमेरिका, चीन, इजराइल; ये सब लोग जागे, बड़े हुए। कुछ-कुछ लोग बड़े होकर नीचे गिरकर धँस भी गए। सारी बात आप देखेंगे, तो आपको ध्यान में आएगा कि समाज पहले जागा। फिर नेता, नीति सब काम में आए। फिर परिवर्तन हुए। जब तक समाज जागृत रहा, यह सब ठीक रहा। इसलिए समाज के संगठन का बड़ा महत्त्व है। संगठन यानी केवल जोड़ना नहीं है, जोड़कर काम बाँटना नहीं है। अंग्रेजी में जिसे ऑर्गेनाइजेशन कहते हैं, संगठन उससे आगे जाता है। संगठन के लिए आपको ठीक प्रतिशब्द चाहिए, तो भगवत गीता में इसको लोकसंग्रह कहा गया है, वह संगठन है। लोगों को गलत मार्ग पर जाने से रोकना, सही मार्ग पर अग्रसर करना और इसके लिए लोगों को जोड़ना। इसलिए इसमें एक लक्ष्य होना चाहिए, क्योंकि लोग तभी जुड़ते हैं, जब कोई भव्य लक्ष्य होता है। संघ ने लक्ष्य लिया, ‘परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं’। परम वैभव तो अपनी पहचान पर निर्भर है और हम धर्मपरायण हैं। इसलिए ‘विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्’ को जोड़ा गया है। हम रोज प्रार्थना कहते हैं, उसमें ये है। ये जो परम वैभव हमको प्राप्त करना है, वह बाय हुक और बाय क्रुक नहीं (by hook or by crook)। लंदन शहर में आप जाएँगे, बड़ी-बड़ी इमारतें देखेंगे। वहाँ का रहने वाला कोई भारतीय आपके साथ है तो हर इमारत किस देश को लूटकर बनी, वह आपको बताएगा। परम वैभव उन्होंने भी प्राप्त किया, लेकिन धर्म से नहीं। हम धर्मका संरक्षण करेंगे और समाज की संगठित कार्यशक्ति के बल पर करेंगे। हमको भगवान को बुलाना नहीं पड़ेगा कि हे भगवान! अवतार लो, हमारा उद्धार करो। हम ऐसे बन जाएँ कि भगवान चाहे कि इस बार यहाँ पर अवतार लें। और इसलिए हम कहते हैं—‘विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्’। संहत कार्यशक्ति, वह विजयशाली है, उसको पराजय का पता नहीं होता है, क्योंकि उसकी पराजय होती ही नहीं। सारा समाज खड़ा होता है तो कौन हराएगा!


राष्ट्रीय स्वयंसेवक• 37 विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्, विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्। परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्।। योग्य बनेंगे, यह संघ है। योग्य बनने का संघ का काम है और बाकी पहली तीन पंक्तियों में जो कहा, वह स्वयंसेवकों को करना है। संघ वह नहीं करेगा। संघ स्वयंसेवकों को तैयार करेगा, बाकी कुछ नहीं करेगा। स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ेंगे। ऐसी देश के उद्धार की योजना है। उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्था भवत्वा वाला हिस्सा है। यह कैसे होता है? एक भव्य लक्ष्य सामने है, उसको प्राप्त करना है। यह उत्कटता मन में आती है। मन में आती है तो आदमी अपने आप को तैयार करता है। अनुशासन का उसको पता चलता है कि यह करना है, क्या करना है, वह अपने आप उसको स्वीकार करता है। बहुत लोग मेरे से आयु में बड़े हैं, अनुभव में बड़े हैं, कर्तृत्व में भी बड़े संघ में हैं। मुझे सरसंघचालक बनाया था, तब और भी थे। सरकार्यवाह बनाया तो उनकी और ज्यादा संख्या थी। लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि ये तो बच्चा है! संघ में अनुशासन है, जिसको बनाया, उसको मानना। मैं सरकार्यवाह बना, मेरे पिताजी विभाग संघचालक थे। मैं घर में जाता था, उनके चरण स्पर्श करता था। मैं शाखा में जाता था, वे मुझे प्रणाम करते थे, यह अनुशासन है। यह एक पद्धति बनी है। पद्धति क्यों बनी है, संगठन को ठीक रखने के लिए बनी है। सब लोग उसका पालन करते हैं, उनको बताना नहीं पड़ता। इसलिए संघ में अनुशासन है, लेकिन अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं है। शाखा में रोज जाना चाहिए, स्वयंसेवक जाते हैं। जो नहीं जाते हैं, उनका हम क्या करते हैं! हम कुछ नहीं करते हैं। हम क्या कर लेंगे! हमारे पास क्या है! हम संघ में आह्व‍ान करते हैं—देश के लिए आओ। देश के लिए आओ और दो, लेना कुछ नहीं है। यहाँ मिलेगा कुछ नहीं। आपको कोई धन्यवाद भी नहीं बोलेगा। आजकल जरा कठिन हो जाता है, क्योंकि स्वयंसेवकों को मिल रहा है। स्वयंसेवकों का नाम भी हो रहा है। नए आने वाले स्वयंसेवकों


38 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझाना पड़ता है कि भई, संघ के स्वयंसेवकों का नाम होता है, लेकिन संघ से नहीं होता है। वह अपने कर्तृत्व से होता है। देश की आवश्यकता के लिए कुछ होता है। यहाँ तो कुछ नहीं मिलेगा। सब करो और क्यों नहीं किया, इसका जवाब दो, बस यही है। कबीरा खड़ा बाजार में, लिये लुकाठी हाथ। जो घर फूँके आपनौ, चले हमारे साथ।। यही संघ की अपील है। लेकिन यह चलता क्यों है, वह लक्ष्य है और उसके चलते यह अनुशासन लोग अपने ऊपर लाद देते हैं और उसमें चलते हैं। कष्ट तो होता ही है, कठोर भी है। ये सारी बातें ठीक हैं। इतने मोह-आकर्षणों में भी सामान्य रूप से स्वयंसेवक ठीक इसलिए रह पाता है कि हमारे संबंध आत्मीयता के संबंध हैं। हम सबको मिलकर अपने देश को बड़ा करना है। इसलिए हम एक-दूसरे के हैं। संघ किस आधार पर चलता है, आत्मीयता के आधार पर चलता है। शुद्ध सात्विक प्रेम के अलावा दूसरी कोई संघ में मिलने वाली बात नहीं है। वह आत्मीयता का व्यवहार दिन-प्रतिदिन लोग अनुभव करते हैं। ऐसा हमारा व्यवहार है। उस आत्मीयता के आधार पर संघ चलता है। ‘संपूर्ण’ हिंदू समाज को संगठित करेंगे, ये ‘संपूर्ण’ विशेषण महत्त्व का है, क्योंकि हिंदू शब्द की कक्षा में अपने आप को मानने वाले हिंदू ही हैं। लेकिन जो हिंदू हैं और अपने आप को मानते नहीं या जानते नहीं कि वे हैं और हम कहें कि आप हिंदू हैं, तो विरोध करते हैं, ऐसे भी हिंदू हैं। हमारे लिए जो भारत माता के पुत्र हैं, जिनको विरासत में भारत की संस्कृति मिली है और जो भारतीय पूर्वजों के वंशज हैं, वे सब हिंदू हैं। उनको जानना चाहिए कि वे हिंदू हैं और हिंदू सहित सबको अच्छे, पक्के, सच्चेहिंदू बनना चाहिए। इसलिए संघ एक्सक्लुसिव (केवल कुछ लोगों के लिए, अनन्य) नहीं है। इसको कोई दुश्मन नहीं चाहिए। हिंदुओ! जागो, वह तुमको मारेगा, संगठित हो जाओ, संघ की यह अपील नहीं है। अपील यही है कि हिंदुओ, तुम हिंदू हो, इसलिए जागो, हिंदुस्तान को बड़ा करो। संघ का कोई दुश्मन नहीं, हिंदू का कोई दुश्मन नहीं। लेकिन हमारे कारण जिनके स्वार्थ पूरे नहीं होते, वे हमारे


राष्ट्रीय स्वयंसेवक• 39 बारे में दुश्मनी खड़ी करने का प्रयास करते हैं। कुछ लोग जान-बूझकर, कुछ लोग भोलेपन में, अज्ञान में हमसे दुश्मनी करते हैं। पर हमारा भाव है कि कल उनको भी हम स्वयंसेवक बनाएँगे और कुछ नहीं, उनको जोड़ना है। हमारा काम जोड़ने का है, जीत का नहीं है। हमने प्रार्थना में शक्ति माँगी है। हम कहते हैं—‘अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं’। इसका अर्थ होता है कि हमको कोई न हरा सके, ऐसी शक्ति चाहिए। हमने यह नहीं कहा कि हम सबको जीत सकें, ऐसी शक्ति हमको चाहिए। दो दिन के चिंतन के बाद सोच-समझकर इन संस्कृत शब्दों का उपयोग किया गया है। ऐसा नहीं है कि मैं अपने अनुमान से आज तर्क दे रहा ह। इस ूँ के लिए सन् 1939 में सिंध में बैठक हुई। उसमें प्रार्थना के आशय पर चर्चा हुई, क्या- क्या होना चाहिए? फिर उस आशय को लिखकर भेजा गया और फिर संस्कृत शब्द की योजना संस्कृत के विद्वान् भिड़े जी ने दी। उसमें ये शब्द भी हैं, हम सुरक्षित रहें। सब अच्छी बातें, जोड़ने वाली बातें, सारी पृथ्वी अपना कुटुंब है, आपस में झगड़ा नहीं चाहिए, इसको करने के लिए हम जीवित तो रहें, दुष्टों- जालिमों की दुनिया में जीवित रहना पड़ेगा, इतनी शक्ति चाहिए कि हम न मरें, हम यह सब करने के लिए बच जाएँ और साथ में सुशील माँगा है, यह शक्ति के उचित उपयोग की दिशा देता है, दुर्बलों की रक्षा करना। ऐसे यह संघ का संगठन चलता है और जैसा मैंने कहा यह बड़ा सामान्य है या अनौपचारिक है। सबकी जो पद्धति है, वह हमारी नहीं है। संघ शुरू हुआ, उस दिन उद्शदे्य पक्का था। कार्यक्रम सुबह साढ़े पाँच बजे डॉक्टर साहब के घर में शुरू हुआ। करीब 25-30 लोग इकट् आए, उन ठे ्होंने कहा कि आज से यह संघ शुरू हो रहा है। ऐसा नहीं कहा कि मैंने शुरू किया है। हम शुरू करने जा रहे हैं, ऐसा भी नहीं कहा। यह भगवान का काम है, यह यशस्वी होना है, वह शुरू हो रहा है। ऐसा उन्होंने कहा। बाद में लोगों ने पूछा, करना क्या है, तो बोले कि तय कहाँ किया है, बैठो और तय करो। संघ का नाम भी उस समय तय नहीं था। बाद में आया, जब नाम की जरूरत पड़ने लगी। संघ शब्द क्योंकि बहुत से संगठनों के नाम में आता है। तब नाम तय किया गया, फिर उसके


40 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अधिकारी तय किए गए। संघ के सरसंघचालक अधिकृत रीति से सन् 1929 में बने और संघ सन् 1925 में शुरू हुआ। डॉ. हेडगेवार तो प्रमुख थे, संस्थापक भी वही थे, लेकिन उनको नवंबर 1929 में सरसंघचालक कहा गया। संघ का नाम बाद में तय हुआ, कोई संविधान भी नहीं था। एक पद्धति बनती चली गई। बाद में सन् 1950 में उसको लिखित रूप दिया गया। जैसे एक मनुष्य की सहज-स्वाभाविक उत्पत्ति होती है, फिर उसका नाम रखा जाता है, फिर उसके गुणवर्धन होते हैं। जो वह अच्छा करता है, बुरा करता है, यह लोगों के सामने आता है। फिर वह अपने आप को बनाता है, अपने घर को सँभालता है। वैसे ही संघ धीरे-धीरे एक स्वाभाविक प्रक्रिया में से बना है। यह संगठन है, इसमें कृत्रिम कुछ नहीं है। जो हम सब हैं, उसी को हम कहते हैं कि ये आप करो, तो हम बन जाएँगे, एक-दूसरे से जुड़ जाएँगे। हम हैं, क्या हैं, उसको हम भूल गए, इसलिए एक-दूसरे से झगड़ा कर रहे हैं। हम सब हैं, जो अपने आप को हम मानते हैं। हम सब हैं, यह सबको स्वीकार करना बताता है। मैं अमुक जाति का हूँ। हमारा वजूद है, वह कहता है, बिल्कुल ठीक बात है। तुम उस जाति के हो। मैं अमुक-अमुक पूजा करता हूँ, ठीक है। वह भारत की नहीं, हाँ, ठीक है। भाषा, ठीक है। लेकिन यह सब होने के बाद भी इसके ऊपर तुम ये हो। वह हम हैं, उसकी याद हिंदू शब्द से संघ देता है और सबको अच्छा बनाता है। बड़ा होना और अपने बड़प्पन का उपयोग समाज को बड़ा करने के लिए करना। ‘तेरा वैभव, अमर रहे माँ, हम दिन चार रहे ना रहें’ और यह भाषण से नहीं होता। इसके लिए आदत बनानी पड़ती है। इसलिए रोज आना पड़ता है। रोज अपना समय निकालकर, देश के लिए प्राणार्पण बाद में करना, पहले देश के लिए एक घंटा निकालो। मिलेगा कुछ नहीं, आओ। वहाँ बाहर का बाकी सब भूल जाओ, महँगाई भूल जाओ, जीएसटी भूल जाओ और क्या-क्या है, पाकिस्तान भूल जाओ, चीन भूल जाओ, सब भूल जाओ। अंदर आकर केवल भारत माता की भक्ति के गीत गाओ। अपने देश के लोगों की जात-पात, भाषा-पंथ, कुछ भी विचार मत करो। उनके साथ मातृभूमि की धूल में लोट-


राष्ट्रीय स्वयंसेवक• 41 पोट हो जाओ। मिलकर काम करना सीखो, मिलकर खेल खेलना सीखो, अपने मन को खोलो, तो मनुष्य बनता है। यह रोज करो। फिर उन कृतियों से आदत, आदत से स्वभाव, स्वभाव से शील, यह संघ की पद्धति है। ऐसा संघ आपके सामने है और उस संघ के लोग यहाँ पहुँचे, वहाँ पहुँचे, नहीं पहुँचते तो भी संघ अपना काम करता रहता है। वे पहुँच गए, तो भी हमने, हो गए कृतार्थ, शाखा बंद करो, ऐसा नहीं किया। हमको समाज के प्रत्येक व्यक्ति को जोड़ना है। वह जब तक हम नहीं करेंगे, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा। पूरा होने तक हमको करना है। जल्दी-से-जल्दी करना है, लेकिन पूरा होने से पहले छोड़ना नहीं है। ऐसा एक संघ अपने देश में चल रहा है। वास्तव में, वह अपने समाज को, अपनी पहचान पर ठीक से खड़ा करने का काम है। देश की सारी समस्याओं का उपाय उसी में से निकलता है। बुनियादी बातों की तैयारी और आधारभूत संरचना चाहिए, उसके निर्माण का काम संघ करता है। बाकी सारा काम स्वयंसेवक समाज को साथ लेकर, अन्य सब लोगों को जोड़कर, मिलकर करते हैं। वह उनकी शक्ति उनके पास है। संघ अपना काम करता है। o संकल्प फाउंडेशन द्वारा 23 सितंबर, 2022 को डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय सभागार, जनपथ, दिल्ली में आयोजित व्याख्यानमाला के अष्टम सोपान में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ विषय पर रा.स्व. संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन QR कोड मोबाइल कैमरे से स्कैन करके यू-ट्‍यूब पर सुना जा सकता है।


भारतीय परिप्रेक्ष्य मंे नारी शक्ति वैसे तो बोलने को विशेष कुछ है नहीं। आपने अभी तक जो सुना है, मैं वही बोलने का मन बनाकर आया था। आप सब लोग कुछ-न- कुछ योगदान कर रहे हैं, तो मुझे बोलना पड़ेगा। मैं हर जगह बोलने का ही योगदान करता हूँ और आजकल बोलने के योगदान के अलावा कुछ और करने का मौका ही नहीं मिलता। शायद कुछ कर नहीं सकता, इसलिए मुझे बोलने का काम दिया है। यह भी हो सकता है! हम सब लोग यहाँ इसलिए एकत्रित हुए हैं कि हम चाहते हैं कि भारत की दृष्टि से भारत में प्रशासन चले। ‘संकल्प’ उसका प्रशिक्षण देता है। उसकी आवश्यकता इसलिए है कि मुगलों के आने से पहले, अंग्रेजों के आने से पहले जो प्रशासन संरचना थी, वे हमारी संरचनाएँ अलग थीं। केंद्रीय प्रशासन नहीं होता था। स्थानीय प्रशासन होता था। गाँव के ही लोग रहते थे। अपना-अपना काम करके गाँव को चलाते थे। सब एक-दूसरे को जानते थे। इसलिए सबको कुछ लिहाज के साथ एक-दूसरे के साथ व्यवहार करना पड़ता था। एक तरह से हर एक ग्राम स्वायत्त था और सब एक-दूसरे को जानते थे। इसलिए एक-दूसरे को समझकर सारा प्रशासन चलता था। प्रशासन कहने से उसमें जो कठोरता शब्द में है, ध्यान में आती है, वह प्रत्यक्षतः जब चलता था, तो उसमें यह कठोरता नहीं आती थी, आत्मीयता आती थी। लेकिन उस जमाने के लिए ठीक था। डॉ. आंबेडकर साहब कहते हैं, उसका एक नुकसान यह हुआ कि प्रत्येक गाँव स्वायत्त था और सारे


भारतीय परिप्रेक्ष्य मंे नारी• 43 देश को कभी भी, कोई भी आक्रामक जीत नहीं सका। गाँव-गाँव स्वतंत्र रहा। देश परतंत्र हुआ, तो भी उसका लेना-देना गाँवों से कुछ रहा नहीं, ऐसा भी हुआ। ये दोनों प्रकार से विचार कर सकते हैं। लेकिन आज का समय, हमारा केंद्र शासन, राज्य शासन, ग्राम पंचायत तक नीचे तक जाता है और उसमें प्रशासक होते हैं और यह ढाँचा हमको क्रमशः मिलता गया है और अंग्रेजों ने उसको एक बहुत सुदृढ़ रूप बनाकर हमारे यहाँ रखा। ढाँचा कुछ भी हो सकता है, लेकिन उसका उद्देश्य क्या था? अंग्रेजों को भारतीय प्रजा का पालन नहीं करना था। अंग्रेजों को भारत पर अपना राज चलाना था। उसके लिए जैसा आवश्यक ढाँचा चाहिए, उन्होंने बनाया। उसके लिए जैसा आवश्यक प्रशासन, प्रशिक्षण था, वे देते रहे। अब जब हम स्वतंत्र हो गए, तो इन बातों से बाहर निकलने की आवश्यकता है। यह केवल ढाँचा बदलने से नहीं होगा, मानसिकता भी वैसी ही बनानी पड़ेगी। क्योंकि जो प्रशासन चलता है, लोगों का, लोगों पर राज करने के लिए, उसको लोगों के सुख-दुःख का ध्यान नहीं रहता है। राज्य जनता से अपनी संपत्ति वसूल कर सके, इसलिए उसको शांत रखना, कानून की मर्यादा में रखना, केवल इतनी उसकी चिंता करता है। बाकी उनको क्या लेना-देना! इसलिए उसमें कुछ रुक्षता भी आ जाती और वे लोगों के जीवन से भी कुछ दूर रहते हैं। उसके कारण बड़े मजेदार किस्से भी बनते हैं। अभी-अभी हमारे साथी नागपुर में थे। उनका देहांत हो गया। पेंशनभोगी थे, कुछ महीने पहले मिले थे। उन्होंने बताया कि इस साल की पेंशन मैं अभी लेकर आया हूँ। मैंने कहा, ‘अब इसमें बताने की क्या बात है! आप पेंशनभोगी तो हैं ही।’ तो उन्होंने कहा, ‘नहीं, पिछले दो साल की मिली नहीं।’ पूछा, ‘ऐसा क्यों हुआ?’ तो बोले, ‘मुझे विभाग का पत्र आया था कि इस साल की पेंशन आप लेकर गए हैं, लेकिन पिछले साल की पेंशन आपको नहीं मिलेगी। क्योंकि पिछले साल आप जीवित थे, इसका कोई प्रमाण-पत्र नहीं है।’ यह घटी हुई घटना है। उन्होंने उत्तर में पत्र भेजा कि ‘मैं इस साल जीवित हूँ, यह मुझे पता है और आपको भी पता है,


44 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्योंकि आपने पेंशन दी है, लेकिन पिछले साल मैं जीवित था कि नहीं, यह मैं अब नहीं बता सकता।’ प्रशासन में अभी भी ऐसी रुक्षता शेष है। इसलिए लोगों को भी, समाज को भी यह सिखाने की आवश्यकता है कि आज जो राज चलता है, राज्य सरकार है, केंद्र सरकार है, वह किसी की भी हो, पार्टी से मतलब नहीं। लेकिन यह अपना संविधान, अपनी व्यवस्था है। मुझे कुछ नहीं मिला, तो मैं जाकर चार बसें जला दूँ, दो ट्रेनें रोक दूँ। यह अंग्रेजों के जमाने में आप कह सकते थे, क्योंकि वह एक विदेशी राज था। लेकिन अपने राज्य में तरीके एकदम अलग होंगे, क्योंकि बस सरकार की नहीं है, बस जनता की है। रेल सरकार की नहीं, रेल हमारी है, क्योंकि राज हमारा है। हम लोगों को चुनते हैं। ऐसे प्रशासन को भी सिखाना पड़ता है कि यह हमारी प्रजा है, उसका पालन हमें करना है। इसलिए प्रधानमंत्री की जगह ‘प्रधान सेवक’ शब्द उपयोग में लाया गया। यह मानसिकता का बदलाव है। शासन में जो लोग हैं, प्रशासन में जो लोग हैं, वे अफसर और मंत्री नहीं हैं। वे सेवक हैं। अब इस प्रकार का प्रशिक्षण कहाँ मिलता है? लोक सेवा में जाने के लिए परीक्षा में कैसे पास होना है, विषय कौन से लेने हैं, कौन सी पुस्तकें पढ़नी हैं, कौन से भाषण सुनने हैं आदि महत्त्वपूर्ण हैं। चयन प्रक्रिया लोक सेवा आयोग के तहत होती है, तो उसमें सेवा होनी चाहिए। ये लोक सेवा के लिए करना है, इसका प्रशिक्षण देने वाली संस्था दूसरी नहीं है, केवल ‘संकल्प’ ही है। ‘संकल्प’ का विकल्प अभी तक मुझे कोई मिला नहीं। यह एक राष्ट्रीय कार्य है, इसकी आवश्यकता है। यह छोटा है, बड़ा है, यह सवाल नहीं। छोटा-बड़ा काम नहीं होता, विस्तार नहीं होता, जो फल मिलता है, वह छोटा-बड़ा होता है। संतोष जी हमको संघ में गीत कराते थे। पहले वे शायद तब दिल्ली के बौद्धिक प्रमुख थे। उसमें एक पंक्ति थी— भव्य-दिव्य लक्ष्य की प्राप्ति ही महान है। धर्मभूमि, जन्मभूमि, कर्मभूमि महान है।।


भारतीय परिप्रेक्ष्य मंे नारी• 45 ये भव्य-दिव्य लक्ष्य है। नए भारत के निर्माण में भारत की व्यवस्था में भी परिवर्तन जरूरी है। व्यक्ति की गुणवत्ता बनानी पड़ेगी। समाज की मानसिकता, समाज की गुणवत्ता में परिवर्तन लाना पड़ेगा। व्यवस्थाओं में भी परिवर्तन लाना पड़ेगा। स्वतंत्र भारत की ‘स्व’ पर आधारित भारतीय व्यवस्था बनानी पड़ेगी। यह बहुत भव्य-दिव्य कार्य है। यह तो ठीक ऐसे है, जैसे हमको पुराण कथाओं में मिलता है कि असुरों का बहुत उत्पात हो गया, फिर सारे देवगण और ऋषिगण सब गए और क्षीरसागर में शेष शैया पर बैठे भगवान ने कह दिया कि मैं आने वाला हूँ, लेकिन आने वाले हैं तो कैसे आएँगे? वामन बनकर आएँगे, बुद्ध बनकर आएँगे, नृसिंह बनकर आएँगे, राम बनकर या कृष्ण बनकर आएँगे। यह तय करना पड़ा और उसके अनुसार उनका धरती पर अवतरण हुआ। स्वतंत्रता ने, स्व ने हमको बता दिया कि मैं आ रहा हूँ। लेकिन वह आज के जमाने में किस अवतार में आने वाला है, कैसे आने वाला है? उसका विचार करके उसके उस स्वरूप को खड़ा करना पड़ेगा। यह आसान कार्य नहीं है। यह बहुत भव्य-दिव्य कार्य है। यह कार्य ‘संकल्प’ संकल्प के साथ कर रहा है। अब तक करीब साढ़े सात हजार लोग प्रशिक्षित करके आपने भेजे हैं। अब यह चिंता भी आपको करनी पड़ेगी कि प्रशिक्षण तो हम दे देते हैं, लेकिन बाद में इसका उपयोग ठीक होता रहे। इसलिए भी कुछ परवरिश करनी पड़ती है, वह ठीक से हो जाए। दूसरी बात है, जो हरदीप सिंह जी के संदेश में भी आ गई, महिलाओं की बराबरी। ‘बराबरी’ शब्द मुझे अच्छा नहीं लगता। भाव वही है, भाव बिल्कुल ठीक है। मैं कहता हूँ, महिला-पुरुषों की बराबरी नहीं, महिला- पुरुषों की पूरकता होनी चाहिए। सृष्टि बननी और चलनी है, तो इनके बिना चल नहीं सकती। दोनों ही चाहिए। इसमें सृष्टि का क्रम देखते हैं, तो उत्पत्ति और लय का काम तो पुरुष के पास हो सकता है, लेकिन पालन का जो काम है, वह बिना महिला के नहीं हो सकता। सृष्टि अगर ठीक चलनी है तो महिलाओं के हाथों में कारोबार होना चाहिए। ये मैं नहीं कह


46 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रहा हूँ, अपनी परंपरा कहती है। आप थोड़ा पुराना जमाना, यानी बहुत पुराना नहीं, 50 साल से पहले का देखें। उस समय हमारे समाज में सब पुरुष कमाते थे, कमाई घर की लक्ष्मी के हाथ में रहती थी। तिजोरी की चाबी उसके पास रहती थी। यह कमाई कैसे और कहाँ खर्च करनी है, यह कार्य वह करती थी। घर में किसी को भोजन पर बुलाना है, उससे स्वीकृति लेनी पड़ती थी। कौन आ रहे हैं, कैसे आ रहे हैं, कितने आ रहे हैं, यह बताना पड़ता था और उसमें कुछ उल्टा-सीधा है, तो मना भी होता था। अपने यहाँ पर पुराने जीवन की परंपरा यह रही है कि व्यवस्थापन, घर को देखना, ये सारी बातें महिला ही करे। जहाँ पुरुष की नहीं चलती, ऐसे सब कामों में महिलाओं की नहीं चलती, ऐसा कभी नहीं हो पाया है। युद्ध के मैदान में लड़ते-लड़ते राजा दशरथ बेहोश हो गए। राजा दशरथ तो बेहोश हो गए, लेकिन कैकेयी बेहोश नहीं हुई। उसने उस रथ में अपना हाथ लगा दिया और युद्ध लड़ा गया। ये प्रतीकात्मक कहानियाँ हैं। लेकिन ऐसा ही है, जो-जो काम पुरुष कर सकते हैं, वे सब काम महिलाएँ कर सकती हैं। सारे काम जो महिलाएँ कर सकती हैं, वे सारे काम पुरुष नहीं कर सकते। अपने समाज में प्रतिशत को देखें तो भी पचास प्रतिशत महिलाएँ हैं। संपूर्ण समाज को खड़ा करना है, संपूर्ण समाज के किसी भी क्रियाकलाप को करना है तो पचास प्रतिशत महिलाओं का पूर्ण सक्रिय योगदान अनिवार्य है और इसीलिए उनका बराबरी का सहभाग हो। उनका पूरक सहभाग हो। इसके लिए उनके सशक्तीकरण, प्रशिक्षण सब बातों की आवश्यकता है और प्रशासन की सेवाओं में भी उनको आना चाहिए, उतनी ही मात्रा में आना चाहिए। ज्यादा मात्रा में आईं, तो अधिक लाभ होगा। लेकिन कम-से-कम उतनी मात्रा में आना चाहिए, जितनी मात्रा में पुरुष हैं, क्योंकि ऐसा होने से सब ठीक चलेगा। जगत्धात्री, जगत जननी और जगत का पालन करने वाली प्रकृति के हाथ में जब सूत्र आते हैं, तो सबका लालन-पालन होता है और संकट


भारतीय परिप्रेक्ष्य मंे नारी• 47 प्रबंधन में बहुत अच्छा हो जाता है। यह अपने घर से लेकर दुनिया तक अपना सर्वत्र अनुभव है और इसीलिए यह जो एक सुविधा महिलाओं के प्रशिक्षण के लिए आवश्यक रहती है, उसके अभाव में ही वे पीछे रहती हैं। इस पर भी विचार होना चाहिए। हम जहाँ भी हैं, जो भी काम कर रहे हैं, हमारे यहाँ भी महिलाएँ काम पर आती होंगी, कुछ काम करती होंगी। उनके लिए सुविधा है कि नहीं! यानी स्कूल में शिक्षिकाएँ हैं, लेकिन स्कूल में जो सुविधाएँ बनी हैं, उसमें केवल पुरुषों का विचार है कि महिलाओं के लिए भी बनी हैं, यह देखना पड़ता है। दो हजार वर्षों में हमारी आदत चली गई। पहले हमारे यहाँ ऐसा ही था। सब बराबरी का था और सब परस्पर पूरक था। लेकिन कुछ बात हम भूल गए और कुछ आक्रमण ने हमको एक औचित्य दे दिया, महिलाओं को घर के अंदर बंद रखने के लिए। उनको घर के अंदर बंद रखने की आवश्यकता नहीं, घर के प्रति उनका लगाव स्वयंसिद्ध है। आप कहो, न कहो, घर की चिंता वह करेंगी ही करेंगी। कुछ भी हो, सीमा पर लड़ रही हों, तो भी यहाँ उनका ध्यान रहता ही है। यह तो पुरुष की ही प्रकृति है कि थोड़ा इधर-उधर का मिल गया, तो वह सब भूल जाता है। महिला ऐसा नहीं करतीं, उनका वात्सल्य उनको यह करने नहीं देता। लेकिन खतरा है, अबला हो, हम रक्षा करेंगे, इस तर्ज में उनको घर में बंद रखा गया और अब घर से बाहर निकलने का मौका है, तो भी पुरुषों की मनोवृत्ति यही रहती है कि चिंता मत करो, हम तुम्हें सशक्त बनाएँगे। हम तुम्हारा उद्धार करेंगे। अरे! तुम क्या उद्धार करोगे, तुम्हारी उद्धारक वह है। एक साक्षात्कार के दौरान स्वामी विवेकानंद से पत्रकारों ने महिलाओं के बारे में पूछा। पत्रकार ने विवेकानंद जी से अंतिम प्रश्न पूछा कि आपका भारत की महिलाओं के लिए क्या संदेश है? विवेकानंद जी तपाक से उत्तर देते हैं—‘संदेश, मैं क्या संदेश दूँगा! भारत की माताओं को संदेश देने की औकात मेरी नहीं है और तुम भी मत दो। उनको क्या करना है, उनको पता है। कैसे करना है, पता है। उनको


48 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करने दो। कुछ सिखाना है, सिखाओ। कुछ सशक्त करना है, सशक्त करो। उनके रास्तेका रोड़ा मत बनो। इतना तुम करो, बाकी कोई संदेश वगैरह देने की आवश्यकता नहीं है।’ इसलिए महिलाओं के सहभाग को सुविधाजनक बनाने वाला एक काम ‘संकल्प’ द्वारा जो हो रहा है, वह एक बहुत अच्छी बात है, अच्छी शुरुआत है। प्रशासनिक सेवाओं में आना चाहने वाली लड़कियों के लिए कुछ हो रहा है, यह भावी भारत के भारतीय आधार पर दम के साथ खड़ा होने के संकल्प की पूर्तिके लिए एक बहुत बड़ा सुचिह्न‍ है। उस सुचिह्न‍ के हम सब साक्षी हैं। अपने इस सौभाग्य के लिए अपने साथ आप सबका भी मैं अभिनंदन करता हूँ। o संकल्प फाउंडेशन द्वारा 24 सितंबर, 2022 को धीरपुर, नई दिल्ली‌स्थित कन्या छात्रावास के शिलान्यास समारोह में रा.स्व. संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन QR कोड मोबाइल कैमरे से स्कैन करके यू-ट्‍यूब पर सुना जा सकता है।


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