जिज्ञासा-समाधान स्थान ः डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय सभागार दिनांक ः 23 सितंबर, 2022 ‘संकल्प’ की अष्टम व्याख्यानमाला में प्रत्येक सत्र के पश्चात जिज्ञासा- समाधान कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी से कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछे गए। इस संबंध में प्रथम सत्र के पश्चात पूछे गए प्रश्न और उत्तर नीचे दिए जा रहे हैं— प्रथम सत्र प्रश्नकर्ता : ब्रिगेडियर के.डी. मल्होत्रा प्रश्न : राष्ट्रीयता विषय किसी भी देश की प्रेणा के लिए मूलभूत आवश्यकता है। इस स्पष्टता को किशोर और तरुण पीढ़ी के मस्तिष्कों में स्थापित करने के लिए देश में हो रहे प्रयासों और दिशा पर कृपया प्रकाश डालें। उत्तर ः सबको प्रयास तो करने पड़ते हैं। यह केवल जानकारी का विषय नहीं है, संस्कार का विषय है। इसका बौद्धिक कयास लगाने से कुछ फायदा नहीं है। ऐसा सबका व्यवहार होना चाहिए। उसके लिए संस्कार चाहिए और संस्कार परिवार से, समाज से आते हैं। ये बातें शिक्षा में लानी चाहिए। यह बहुत आसान है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर हमारे सब महापुरुषों, नेताओं और लगभग सभी विचारकों द्वारा कभी-न-कभी इस बात के संबंध में बोला गया है। इतिहास में भी ऐसी बातें सामने आई हैं। हरियाणा के हिसार जिले में राखीगढ़ी
50 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गाँव में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) लगातार खुदाई कर रहा है। यहाँ पर की गई खुदाई में राखी खास और राखी शाहपुर में 5 हजार साल पुरानी हड़प्पाकालीन सभ्यता के चिह्न मिले हैं। इन सबके लिए जो तथ्यात्मक साक्ष्य हैं, वे भी आ रहे हैं। यह जानना और समझना चाहिए कि अभी तक हम जिनको दंत कथाएँ मानते थे, हमारे ग्थों में ये सारी बातें हैं। अने रं क महापुरुषों ने भारत की प्रशस्ति की है। दक्षिण की कंब रामायण में भारत का वर्णन मिलता है। असम में शंकरदेवजी ने भारत की प्रशस्ति की है। गुरुनानक देव साहबजी ने भी हिंदुस्तान के बारे में प्रशस्ति गाई है। रामायण में भारत का वर्णन है। महाभारत में भारत का वर्णन है। कालिदास का भी भारत वर्णन मिलेगा। इसमें जो भौगोलिक बातें हैं, ये सारी आज के भूगोल से मेल खाती हैं। ये कपोल कल्पित बातें नहीं हैं। जैसे सोमनाथ मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे बाण-स्तंभ है, यह बेहद ही प्राचीन है। जिसके ऊपरी सिरे पर एक तीर (बाण) बनाया गया है, जिसका मुँह समुद्र की ओर है। इस बाण-स्तंभ पर लिखा है, आसमुद्रान्त दक्षिण ध्वपरु र्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग। अर्थात् समुद्र के इस बिंदु से दक्षिण ध्व त रु क सीधी रेखा में एक भी अवरोध या बाधा नहीं है। इस दिशा में दक्षिण ध्व त रु क बीच में कोई जमीन नहीं है। आप गूगल मैपिंग करके देख लीजिए, आपको वहाँ उस रास्ते पर एक इंच द्वीप नहीं मिलेगा। यह घर बैठे तो नहीं पता होता है, कोई-न-कोई गया होगा? हमारे पूर्वजों का विश्व संचार, राष्ट्रबोध सब हमारे पास है। वेद काल से अभी तक वह एक सतत चलने वाली परंपरा है, वह हमारी शिक्षा में आनी चाहिए। वर्तमान में सरकार द्वारा पहल की गई है, पर कुछ कारणों के चलते उसकी गति थोड़ी धीमी होती है। लेकिन अपने घर में तो हम कर सकते हैं न? अपने घर में हम भारत-बोध जगाएँ। अपनी संस्कृति का, संस्कार का बोध जगाएँ। जो भी पूजा आपके घर में चलती हो, जो भी प्रवर्तक हों, आचार्य हों, गुरु हों, उनकी सीख बच्चों को बताइए। जब भी कहीं सामाजिक-धार्मिक कार्यक्रम हों, उनमें यह विषय शामिल करें। दुर्गापूजा जैसे अनेक उत्सव होते हैं, रामलीलाएँ होती हैं, व्याख्यानमालाएँ होती हैं, अन्य कई प्रकार के समाज व जनप्रबोधन के कार्यक्रम होते हैं। इन
जिज्ञासा-समाध • 51 सब जगह यह नहीं आता, इसलिए विपरीत विषय चलता है। इसलिए हम सबको सक्रिय होना पड़ेगा। हम यह अपने घर से प्रारंभ करेंगे और समाज के विभिन्न मंचों तक जाएँगे। हमारे पूर्वजों को महाप्रयास करना पड़ा होगा। हमारे पूर्वजों ने सीमित साधनों में ऐसा किया। अब हमारे पास व्यापक संचार माध्यम हैं, यह सहज संभव हो जाएगा। बस हमें सक्रिय होना पड़ेगा। एक बार निश्चय करके सबको लगना पड़ेगा। फिर यह बात स्थापित हो जाएगी। हम इन जानकारियों को पहुँचाने के लिए किसी पर निर्भर न हों, क्योंकि हम भी जानते हैं, हम उसकी खोज कर सकते हैं और हम बता सकते हैं। हम शुरू करें, यह सब तक पहुँच जाएगी। प्रश्नकर्ता : श्री विजय कुमार गुप्ता जी (भारतीय सेवा के पूर्व अधिकारी) प्रश्न ः यह विषय सीधा इतिहास, विशेष रूप से मध्यकालीन इतिहास से जुड़ा है, जिस समय देश पर आक्रमण हुए। भारत का मुसलिम समाज लगभग मतांतरित समाज है और इस संबंध में अस्पष्टता के कारण इस देश का विभाजन भी हो गया। इस दृष्टि से समाज में स्पष्टता लाने के लिए आपके वक्तव्य अत्यंत लाभकारी हुए हैं। आप पूरे देश का भ्रमण भी करते हैं और सभी वर्गों से मिलते हैं। अतः इस दृष्टि से हो रहे प्रयासों की कृपया जानकारी देने का कष्ट करें। उत्तर ः समरस होने की प्रक्रिया हमारे देश की संस्कृति की एक स्वाभाविक सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन इस प्रक्रिया में दो-तीन बार खलल डाले गए। एक तो कट्टरपंथ उभरता है, तब यह इसको अलग करता है। औरंगजेब के समय में कुछ ऐसा हुआ। अकबर के समय में दीन-ए-इलाही तक लोग आ गए थे, दारा शिकोह ने उपनिषदों का भाषांतरण किया। लेकिन वह चक्र उल्टा घुमाया गया। जब अपने अलग अस्तित्व और अलग लाभों की सुरक्षा पर खतरा महसूस होता है, तभी ऐसा किया जाता है। हम अलग रहेंगे तो हमको अलग मिलेगा, अन्य लोगों से ज्यादा मिलेगा। यह लालच उसके पीछे रहता है। इसलिए यह हुआ। सन् 1857 में सब लोग फिर से एक हो गए। अब जब अंग्रेजों ने देखा कि ये आपस में झगड़ने वाले लोग हमारे खिलाफ एक
52 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ होकर लड़ रहे हैं, उन्होंने योजनाबद्ध प्रयास शुरू किए। अपनी जनगणना से लेकर प्रत्यक्ष अलग राजनीतिक लाभों का लालच दिखाकर लोगों को एकदूसरे से अलग किया। आज हम जितनी जातियाँ सुनते हैं, जितने अलग-अलग संप्रदायों के शब्द सुनते हैं, ये सब समाज में तो थे, पर ये अभिलेखबद्ध नहीं थे। ये बाद में आए। एक योजनाबद्ध षड्यंत्र के तहत हमको एक-दूसरे से दूर रखा गया। उसकी परिणति पाकिस्तान के रूप में हुई। सन् 1940 के बाद अलग राष्ट्र की प्रक्रिया गतिमान हुई। उससे पहले तो पाकिस्तान की माँग करने वाले लोगों को भी लगता नहीं था, पाकिस्तान बनने वाला है। सन् 1940 के बाद द्वितीय महायुद्ध से राजनीति बदली, उसके चलते भारत के राजनीतिक दलों के हित बदल गए और सबकी भाषा भी बदल गई। इसके चलते विभाजन हो गया। लेकिन अब उसके घोर परिणाम सबको पता चल गए। हम तो सुखी नहीं हैं, लेकिन जिन्होंने अपने लिए वह किया, वे भी वहाँ दुःखी हैं। अखंड भारत में सभी सुखी थे। जो छोड़कर गए, वे सभी दुःखी हैं। अलग-अलग में दुःख है। एक माल में मिलते जाना, दुःख है अलग-अलग में। एक माल में मिलने की प्रक्रिया हमें फिर से चलानी पड़ेगी। पर उसमें डर रहता है कि मेरा नाम मिट जाएगा, मेरी पहचान मिट जाएगी। लेकिन हमारी परंपरा ऐसी है, किसी की पहचान को मिटाते नहीं। उसे बढ़ावा देते हैं, स्वीकार करते हैं, मान्यता देते हैं। यह डर बीच में से हटाना आवश्यक है। इसके लिए संवाद होना चाहिए और संवाद करने वाले भाव के पीछे शक्ति होनी चाहिए। संवाद के चिरकाल चलने के बाद लोग संवाद के विषय को देखते हैं कि यह सत्य है या असत्य है। यह सही है या गलत है। लेकिन उसके पहले जो बोल रहा है, उसकी ताकत क्या है, यह देखा जाता है। यह दुनिया का नियम है। इस विषय में देश में गांधीजी को छोड़कर और कौन है, जिसका हम अनुसरण करें। उन्होंने वही सब बातें बोली हैं। लेकिन एक भ्रमित समाज उनके पीछे था, जिनके मन में स्पष्टता नहीं थी। जो बिखरा हुआ था। इसीलिए गांधीजी के सभी प्रयासों का उचित फल हमें नहीं मिला। आज के समय में वे होते, तो उनके बहुत थोड़े प्रयास में जैसा भारत उनको चाहिए था, वैसा
जिज्ञासा-समाध • 53 खड़ा हो जाता। भारत को अपना मानने वालों की जागृति, उनका मेलजोल उनका संगठित बल है। इस बल के आधार पर जब हम बात करेंगे तो समझ में आएगी। दुर्बलता के आधार पर बात करेंगे, लोग उसको मजबूरी समझेंगे। शक्तिमान होकर हम दोस्ती की बात करेंगे, लोग मानेंगे कि हाँ, इनके मन में कुछ काला नहीं है। इनको जरूरत नहीं है, फिर भी अपना मानकर ये हाथ बढ़ा रहे हैं। यह होने की आवश्यकता है और यह हो रहा है। आज सब लोग जान चुके हैं कि यह ठीक नहीं है। आपस का झगड़ा ठीक नहीं है। एक माल में मिलना है, लेकिन निहित हित के कुछ कृत्रिम आवरण रहते हैं, उनमें किसी-किसी को रहना पड़ता है। उससे मुक्त कैसे हों? ऐसे में यह जो भारत को अपना मानने वालों का बल है, वह ऐसे सब लोगों को सहारा देगा और उनका बल वहाँ पर बढ़ेगा। तब वहाँ परिवर्तन आएगा। यह प्रक्रिया चलनी चाहिए। संवाद हम सब शुरू करें। यह ठेका देने वाली बात नहीं है। किसी एक का नहीं, यह हर भारतवासी का कर्तव्य है। मैं छोटी सी बात बताता हूँ। आपके अपने और आपके परिवार के मित्र, भारत में जितने प्रकार के भी समाज माने जाते हैं, उन सब में से हों, जैसे मित्रों का, मित्रों के कुटुंब का एक-दूसरे के घर में आना-जाना होता है, ऐसे ही अनौपचारिक संबंध स्थापित हों। कोई तत्त्वज्ञान बताने की जरूरत नहीं। हम देश के लिए कोई बड़ा काम कर रहे हैं, इस भाव को लाने की जरूरत नहीं। कुछ उद्देश्य नहीं है। ये हमारे हैं, इसलिए हमारी दोस्ती होनी चाहिए। यह अगर आप सभी लोग शुरू कर देते हैं, इसका बहुत बड़ा परिणाम सामने आएगा। असली एकता यही है। किसी उद्देश्य के लिए समयानुकूल की गई एकता, एकता नहीं है। स्वार्थके लिए एकता, एकता नहीं है। हम पर भी संकट आएगा, इस डर से एकता, एकता नहीं है। एकता वही है, जो आत्मीयता के बल पर होती है। आत्मीयता की रक्षा वही करता है, जिसमें शक्ति होती है। यह दुर्बलों का काम नहीं है। अब हम सबल हैं। हमने एक दिशा पकड़कर चलना प्रारंभ किया है। एक सही रास्ता हमने पकड़ा है। हमको अपने स्तर पर सभी वर्गों में परिवारों और व्यक्तियों की मित्रता को बढ़ाना चाहिए। इसका परिणाम सुखद व सार्थक होगा।
54 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रश्नकर्ता : श्री नंद किशोर गर्ग प्रश्न ः इस देश में जनसंख्या नियंत्रण एक ज्वलंत समस्या है। इससे हमारी राष्ट्रीयता भी कहीं-न-कहीं खतरे में है। इस दिशा में क्या ठोस पहल की जा सकती है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इस विषय में क्या मत है? उत्तर ः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सन् 2017 की कार्यकारी मंडल की बैठक में हमने इस संबंध में एक प्रस्ताव रखा था। जनसंख्या एक बोझ भी है, एक साधन भी है। दोनों बातों का हमको विचार करना पड़ेगा। नियंत्रण ठीक से हो। अभी रिपोर्ट जो आई है, उसके अनुसार, हमने जो 2.1 तय किया था, बहुत कम समय में हम उसके भी नीचे आ गए। लेकिन बहुत नीचे जाना भी ठीक नहीं है। समाज, भाषा, इन सबके विस्तार (Continuation) का प्रश्न खड़ा हो जाता है। परिवार में आपसी व्यवहार से लोग सामाजिक व्यवहार को सीखते हैं। अपने स्वाभिमान प्रबंध को सीखते हैं। संस्कार भी कुटुंबी जीवन से मिलते हैं। लेकिन हमको यह विचार करना चाहिए कि आज हमारे पास जनसांख्यिकीय लाभांश है, तीस साल के बाद ये सब लोग जब बूढ़े हो जाएँगे, तब इनको खिलाने वाले कितने चाहिए! हमारा देश कितने लोगों को सहन कर सकेगा, हमारा पर्यावरण कैसा रहेगा? यह जैसे राष्ट्र का प्रश्न है, वैसे ही परिवार को भी आवश्यकता रहती है। हर परिवार को भी विचार करना पड़ेगा कि क्या यह ठीक है! पति-पत्नी के भी तय करने का प्रश्न है। विशेषकर हमारी माताओं को ये सब कष्ट झेलने पड़ते हैं। संस्कार भी उनको देने पड़ते हैं। उनकी क्षमता क्या है, उनका सशक्तीकरण कितना हुआ है, उनको हमने कितना साधन-संपन्न बनाया है, यह सब बातें विचार करनी पड़ती हैं। दूसरी बात है जनसांख्यिकी, क्योंकि हम जानते हैं कि जनसांख्यिकी की गड़बड़ से विभाजन का सामना हमको करना पड़ा। यह केवल हमारी बात नहीं है, सूडान में क्या हुआ, तिमोर में क्या हुआ! इसका भी विचार करना पड़ेगा। इसको लेकर हमको एक नीति बनानी पड़ेगी। जननक्षमता उतनी ही रहे, यह हो भी सकता है, लेकिन इन
जिज्ञासा-समाध • 55 सब बातों पर विचार करके एक नीति हमें बनानी होगी। समाज को उसके लिए मन बनाना पड़ेगा। वह नीति सभी पर समान रूप से, अनिवार्य रूप से लागू करनी पड़ेगी, क्योंकि यह देश के हित का सवाल है। संपूर्ण देश के हित में जो हो, वह होना चाहिए। जहाँ असंतुलन है, वहाँ यह नीति पहले लागू करनी पड़ेगी। विडंबना यह है कि जहाँ परवरिश करने की क्षमता नहीं है, वहाँ बहुत बच्चे हैं और जहाँ परवरिश की क्षमता है, वहाँ एक भी नहीं है। ऐसी आज स्थितियाँ हैं। सामाजिक जीवन की विसंगति को ठीक करना पड़ेगा। हमारी जनसंख्या जितनी है, उसके बहुत लाभ भी हैं। उसका ठीक से उपयोग करना चाहिए। हमारे लोगों में बहुत कृतित्व है। नई पीढ़ी को देश के लिए कुछ करना चाहिए। इनको अवसर मिलना चाहिए। किसी पर अन्याय भी नहीं होना चाहिए। देश के लिए यह करना है, ऐसा मानकर उसको सबको स्वीकार करना चाहिए। जब सबको समान रूप से देखकर हम यह लागू करते हैं, तो यह यशस्वी होगा। द्वितीय सत्र प्रश्नकर्ता : श्री एम.सी. गुप्ता (1960 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी) और श्री संतोष पाठक प्रश्न : अखंड भारत की क्या परिकल्पना है? वर्तमान स्थिति में इसका क्या अर्थ है तथा क्या यह सब संभव है? उत्तर ः अखंड भारत एक भावना है...एक परंपरा है...एक संस्कृति है। वह सब आज भी विद्यमान है, जो-जो अखंड भारत के समय में हुआ है। कल ही मैं इमाम साहब के यहाँ गया था। उन्होंने कहा कि वह पैगंबर साहब का जन्मदिन यानी मिलाद-उन-नबी मना रहे हैं। यह प्रथा अखंड भारत के बाहर नहीं है। जयंती और पुण्यतिथियाँ मनाना अखंड भारत की परंपरा रही है, उसका यह परिणाम है। उर्दू साप्ताहिक ‘नई दुनिया’ के मुख्य संपादक शाहिद सिद्दीकी साहब हैं। राज्यसभा के सदस्य भी रहे हैं। शायद उस समय समाजवादी पार्टी के सदस्य भी रहे होंगे। उन्होंने मुझसे पूछा था कि हम भारत
56 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुसलमान हैं तो हिंदू ही। हमारे यहाँ भजन-वजन तो नहीं हैं, पर कव्वाली चलती है। मूर्ति पूजा तो बिल्कुल निषिद्ध है, परंतु कब्र-मजारें हैं। ऐसा केवल भारत में ही चलता है। उन्होंने आवाज धीमी करके कहा कि मैं अखंड भारत की बात कर रहा हूँ। बर्मा से अफगानिस्तान तक; आज के भारत की बात नहीं कर रहा हूँ। यह बात सभी की समझ में आ जाए, तो सारे झगड़े ही समाप्त हो जाएँगे। तो शिक्षा के लिए सच्चर समिति चाहिए, आप लोग उसका विरोध क्यों करते हैं? मैंने कहा कि जो बात आप हमको समझा रहे हैं, वह हमें सन् 1925 से पता है। आप लोगों को समझाइए, इसके लिए वातावरण बनाइए, हम अपने विरोध से पीछे हट जाएँगे। इधर-उधर की बातें दिमाग में लाकर, आपस में दुर्भावना पैदा करके जो हालात बना लिये हैं, उससे सुखी तो कोई नहीं है। उस समय भी सब लोग कहते थे कि मातृभूमि का विभाजन कैसे हो सकता है! यह नहीं हो सकता। एक समाज का विभाजन कैसे हो सकता है! नहीं हो सकता। लेकिन उस समय हम ऐसे माहौल में थे कि जो अलग दिखते हैं, वे अलग हैं। हमारे यहाँ ऐसा नहीं है। एक होने के लिए एक-सा होने की जरूरत नहीं है। ये हमारी मान्यता है। लेकिन हमने उसको नहीं माना। अलग होने के बाद अब 70 साल में अनुभव तो कर लिया कि कोई सुखी नहीं है। कभी-न-कभी इस दुर्भावना को जाना है। अखंड भारत का अंग रहे देशों को कौन मदद करता है! अपने लिए कुछ ना रखते हुए मदद करने वाला दुनिया में कौन सा देश है! भारत के सिवाय कोई नहीं है। भारत यह जारी रखेगा, किसी कारण से बीच में तारें बँधी हों, लेकिन हैं तो अपने ही। पूजा अलग-अलग है, तो क्या हुआ! पूर्वजों की पूजा तो एक ही थी। कुछ लोग आना चाहेंगे, वापस आ जाएँगे। जो नहीं आना चाहेंगे, नहीं आएँगे। पूजा हमारे यहाँ महत्त्वपूर्ण बात कहाँ रही है! रामकृष्ण परमहंस जी ने तो इस्लाम और ईसाइयत की भी अंतिम छोर तक उपासना करके बताया—‘यतो मत ततो पथ।’ जितने भी मत हैं, उतने ही पथ हैं। हम यह बात दिखावे के लिए नहीं करते, यह प्रत्यक्ष है। सब लोग वहीं पहुँचेंगे, यह प्रत्यक्ष है। हमारे संतों ने करके देख लिया है। आज भी ऐसा
जिज्ञासा-समाध • 57 बताने वाले संत हमारे पास हैं। कौन सी बड़ी बात है। लेकिन एक-न-एक दिन यह वापस होगा, क्योंकि यह कृत्रिम है, अहितकारी है। अब सबको पता चल रहा है। अब स्वरूप क्या रहेगा! कुछ भी रह सकता है। सार्क की जब स्थापना हुई, उस समय हमारे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस थे। उन्होंने विजयादशमी के अवसर पर उसका स्वागत किया और कहा था कि हमारे लिए तो यह अखंड भारत की कल्पना की तरफ बढ़ाया गया कदम है। हो सकता है, राज्य अलग-अलग हों, लेकिन आपस में सहयोग होना चाहिए। दो साल बाद; यह ढाँचे के गिरने के बाद की बात है। उस समय यहाँ सार्क होने वाला था, लेकिन वह स्थगित हो गया। फिर छह महीने बाद ढाका में हुआ। उस समय वहाँ की जो वजीर-ए-आजम थीं, वे अध्यक्ष थीं। वे पद से निवृत्त होने वाली थीं। श्रीलंका के राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा पद पर बैठने वाले थे। उस समय हमारे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा हुआ था, मैं फुर्सत में था। मैं घर में अकेला बैठा था, तो टी.वी. चला लिया। टी.वी. पर उस समय प्रेमदासा का भाषण शुरू हो गया था। उसमें उन्होंने कहा, ‘हम सब लोगों को एक रहना चाहिए। अयोध्या में जो कुछ हुआ, उसके कारण सार्क सम्मेलन स्थगित करना पड़ा। यह ठीक नहीं है। ऐसी छोटी-मोटी बातों का असर हमारे सम्मेलन पर नहीं होना चाहिए। बड़े-बड़े देश छोटे देशों को आजकल निगलते हैं, हम लोगों को साथ रहना पड़ेगा। हमारे लिए यह बिल्कुल स्वाभाविक है, क्योंकि आज हम दुनिया के नक्शे पर अलग-अलग देश दिखाई दे रहे हैं, लेकिन हैं तो एक ही मुख्य भारत भूमि के अंग।’ यह उन्होंने कहा। यह सत्य है और कभी-कभी सत्य मुख से निकल ही जाता है। जो सत्य है, उस सत्य को मानकर हम आगे बढ़ेंगे। आज ही मैंने सुना था। किसी ने कहा कि सीमा नहीं रहेगी। कुछ दिन पहले नेपाल में ऐसा ही था। साइकिल लेकर बिहार से नेपाल में चले जाते थे। फिर वापस आ जाते थे। एक चलन रहेगा या वह भी नहीं रहेगा, लेकिन हमारे संबंध मैत्रीपूर्ण रहेंगे। हमारा एक गठबंधन बनेगा। किसी पर आक्रमण हुआ, सबकी सेना वहाँ पर जाएगी। कुछ भी हो सकता है, लेकिन यह जो नफरत और दुश्मनी है, उससे
58 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बाहर आकर हम अपनी एकता का एहसास मन में रखकर और निकट आने के प्रयास करने की दिशा में जाएँगे। यह संभव है। संभव से भी ज्यादा हम सब लोगों के सुख और सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है। यह होगा, क्योंकि यह सत्य है। हम विभाजित भारत देख रहे हैं, यह बुरा सपना है। हम सोए हैं, जिस दिन सब लोग जाग जाएँगे, यह सपना भी जल्दी टूट जाएगा। तब हम सत्य में आएँगे। जिस दिन यह होगा, अखंड भारत होना ही है। प्रश्नकर्ता : अमृत लाल रावल प्रश्न ः ज्ञानवापी और श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर कुछ संगठनों द्वारा उठाए गए विवाद पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की क्या प्रतिक्रिया है? उत्तर ः इस पर मैंने सार्वजनिक रूप से कहा है। मैंने कहा था कि हमारे देश में इस्लाम आक्रामकों के साथ आया। इस तथ्य को आप भी नहीं बदल सकते, मैं भी नहीं बदल सकता। जो हो गया, उसको मान लेना चाहिए कि ऐसा हुआ था। इसको परिभाषित करने की जरूरत नहीं है। इसको लेकर किसी पर आरोप लगाने की भी जरूरत नहीं है। उस समय धर्म स्थान टूटे, यह सही बात है। एक नहीं, हजारों टूटे। यह भी सत्य है। जो हो गया, सो हो गया। अब बीती को बिसार दो। लेकिन तीन स्थान ऐसे हैं, जिनका प्रतिस्थापन नहीं है। जन्मभूमि का प्रतिस्थापन नहीं है, शिवजी के घर का प्रतिस्थापन नहीं है। हिंदू समाज के सामान्य व्यक्ति के मन में यह इच्छा है। यह हमारा निकाला हुआ विषय नहीं है। किसी अन्य का निकाला हुआ विषय नहीं है। ज्ञानवापी पर चर्चा तो अभी हुई है। जब मैं विद्यार्थी था, तब भ्रमण के लिए काशी गया था। तब यह विषय चर्चा में नहीं था। मैंने देखा कि वहाँ मंदिर के ऊपर मस्जिद का गुंबद है। इसका साफ पता चलता है। यह देखकर वहाँ जाने वाले लोगों में प्रेम नहीं पैदा होता था, नफरत पैदा होती थी। इसलिए हिंदू समाज ने कभी कहा कि हमारे तीन धर्म स्थान हमें दे दो, बाकी नहीं चाहिए। संघ यह सब नहीं करता। संघ का यह काम भी नहीं है। राम जन्मभूमि समाज की माँग थी। उसमें विश्व हिंदू परिषद को बुलाया गया। उसमें विश्व हिंदू परिषद शामिल हुई। कुछ ऐतिहासिक कारणों की वजह से हमको उसमें
जिज्ञासा-समाध • 59 जाना पड़ा और राम जन्मभूमि का मामला हो गया। उस दौरान के अनुभवों के बाद हमने कहा कि हम कुछ और नहीं करेंगे। हमको ये नहीं करना है। विश्व हिंदू परिषद ने भी आंदोलन वगैरह नहीं किया है और करेंगे भी नहीं। परंतु यह हिंदू समाज के मन की बात है। अगर यह जगह बिना झंझट के लौटाई जाती है, तो झगड़ा खत्म होने की दिशा में जाएगा और झगड़ा नहीं बढ़ेगा। हमारे मुसलमान भाइयों पर कोई उँगली उठा नहीं सकेगा! वे भी जवाब दे सकेंगे कि एकता के लिए हमने भी यह किया है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि एक-एक जगह की सूची निकालकर कहें कि यह बंद करो। कई मस्जिदें तो बाद में भी बनी हैं। बाकायदा जमीन खरीदकर बनी हैं। मस्जिदों से, मुसलमानों या इस्लाम से दुश्मनी नहीं है। लेकिन उस समय इन सबके पूर्वज भी हिंदू ही थे। उन सबका मनोबल तोड़ने के लिए जो हुआ, उसको देखते हुए हिंदू समाज की इच्छा है कि तीन स्थान चाहिए। प्रेम से हो, दोस्ती से हो, तो बहुत अच्छा हो। लेकिन नहीं हुआ और हिंदू समाज हमेशा सोचता रहा, तो होगा कुछ! हम यह नहीं करेंगे, यह पक्का है। प्रश्न ः दहेज प्रथा जैसी कई दशकों से चली आ रही कुरीतियों के दमन के लिए तथा इस प्रकार के अन्य प्रयासों के लिए, संघ का क्या मत है? उत्तर ः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आम मामलों में आपसी भाईचारा, प्रेम, सौहार्द बनाकर संगठित होने का मूलमंत्र लेकर माँ भारती की सभी संतानों को लक्ष्य प्रेरित जीवन जीने के लिए प्रतिबद्ध करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने शस्त्र पूजन के अवसर पर दशहरे के उपलक्ष्य में एक महिला को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाने का उत्कृष्ट नवाचार भी किया है। वह नवाचार नहीं है। मैं विदर्भक्षेत्र के अकोला जिले का जिला प्रचारक था। हमने अकोला के विजयादशमी उत्सव में औरंगाबाद की समाजसेविका कुमुद ताई को अध्यक्ष के रूप में बुलाया था। डॉक्टर हेडगेवार जी के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में उस समय कांग्रेस की महिला विभाग की राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमारी अमृत कौर शिविर देखने के लिए आई थी। महाराष्ट्र की रहने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्य श्रीमती अनसूयाबाई काले
60 • हमारी राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी आई थी। महाराष्ट्र की प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ताकमलाताई होसपेट जी का अध्यक्षीय भाषण संघ शिविर में हुआ था। यह नवाचार नहीं है। उनका भी बराबरी का सहभाग राष्ट्र निर्माण में होना चाहिए। यह हमारा नियम है कि पुरुषों के लिए शाखा पुरुष चलाएँगे और महिलाओं के लिए शाखा राष्ट्र सेविका समिति चलाएगी। बाकी सब कामों में महिला-पुरुष सभी साथ काम करते हैं। हमारे उत्सव में वह भी आती हैं। ये जो कुप्रथाएँ हैं, अपने धर्मकी समझ कम होने के कारण उत्पन्न हुई हैं। दहेज प्रथा का आपने नाम लिया, हमारे यहाँ प्राचीर प्रथा रही है कि शादी के समय कन्या को स्त्री-धन देते थे, क्योंकि जो लड़की पराये घर जाएगी, आजीवन उसके पास कुछ धन रहेगा। विपत्ति के समय वह सहारा होगा। वह उसी का है। उसका उपयोग वही करेगी। मरते दम तक वह उसका ही रहेगा और अपने बाद किसको देना है, वह बताकर जाएगी। अब जो इस प्रथा का रूप है, वह हमारी विकृति के कारण है, पतन की बात है। हम लोगों को अपने आचरण में, अपने धर्मकी समझ में बहुत सुधार की आवश्यकता है। गत दो हजार वर्षों में हमने धर्मके नाम पर पहले जानबूझकर, बाद में अज्ञान में बहुत अधर्म किया है। वह सब हमको निर्ममता से ठीक करना पड़ेगा। तब समाज की सारी विसंगतियाँ ठीक होंगी। इसलिए इनके लिए जो प्रयास चलते हैं, उन सब प्रयासों में संघ का पूरा समर्थन और जहाँ जितनी शक्ति है, वहाँ उतना सहयोग रहता है और आगे भी रहेगा। ooo
संकल्प ः एक परिचय बीज रूप में ‘संकल्प’ का विचार उस समय आया जब देश आपातकाल की त्रासदी का सामना कर रहा था। देश में राजीतिक तानाशाही का बोलबाला था और चारों ओर फैले असंतोष को दबाने के लिए लोकतंत्र का हरण कर लिया गया था। देश के प्रति सोचने वाले समाज के हर वर्गकी घोर प्रताड़ना हुई। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो प्रशासकों के एक बड़े वर्ग ने भी संवैधानिक मूल्यों के अनुसार कार्यकरने में असमर्थता जताई। किंतु आपातकाल के पश्चात चंद प्रशासकों ने लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करने और प्रशासन को पटरी पर लाने के लिए अद्वितीय कार्य भी किया। इस पूर्व भूमिका के आधार पर वर्ष 1977 से 1986 तक हुए गहन चिंतन के पश्चात देश के प्रशासक वर्ग में संविधान और राष्ट्र के प्रति समर्पण, समाज के प्रति संवेदनशीलता, विश्वसनीयता और उत्कृष्टता के गुणों को विकसित करने के उद्देश्य से ‘संकल्प’ का विचार आगे बढ़ा। ‘विद्या भारती’ जैसे राष्ट्रीय संगठन के मार्गदर्शन में चल रहे हरियाणा के ‘हलवासिया विद्या विहार’ से ‘संकल्प’ का प्रारंभ हुआ। शनैः-शनैः अन्य विद्यालय, महाविद्यालय जो इस विचार के महत्त्व को समझते थे, ‘संकल्प’ के साथ जुड़ते गए और ‘संकल्प’ का वर्तमान स्वरूप उभरकर हमारे सामने है। आज गुवाहटी से लेकर बड़ौदा तक और जम्मू से लेकर कन्नूर तक देश भर में ‘संकल्प’ के 16 केंद्र संचालित हैं, जो विभिन्न सामाजिक संगठनों के मार्गदर्शन में जनकल्याण के भाव से गैर-व्यवसायिक आधार पर सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए विभिन्न गतिविधियाँ आयोजित करते हैं।
‘संकल्प’ द्वारा स्कूली विद्यार्थियों के लिए प्रतिवर्ष व्यक्तित्व विकास शिविर का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा सिविल सेवा उन्मुखीकरण शिविर और दिशा बोध शिविर के माध्यम से सिविल सेवा प्रतिभागियों का विभिन्न स्तरों पर मार्गदर्शन किया जाता है। नियमित ऑनलाइन एवं ऑफलाइन मार्गदर्शन कक्षाएँ, छात्रावास की सुविधा और भोजनालय की व्यवस्था भी प्रदान की जाती है। साक्षात्कार मार्गदर्शन कार्यक्रम ‘संकल्प’ की सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय गतिविधि है, जिससे प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में प्रतिभागी लाभान्वित होते हैं। समाज के वंचित वर्गके मेधावी विद्यार्थियों के लिए ‘संकल्प’ द्वारा गुरुकुल योजना प्रारंभ की गई है, जिसमें सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को पूर्ण रूप से निःशुल्क कोचिंग, छात्रावास एवं भोजन की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है। ‘संकल्प’ के साथ 250 से अधिक पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षाविदों और प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक समूह जुड़ा है। यह समूह सिविल सेवा प्रतिभागियों के मार्गदर्शन के लिए अपना बहुमूल्य समय समर्पित करता है। वर्ष 1994 से ‘संकल्प’ से लाभान्वित प्रतिभागियों का सिविल सेवा में चयन प्रारंभ हुआ और आज देश-विदेश में 8,500 से अधिक ऐसे सिविल सेवक कार्यरत हैं, जो किसी-न-किसी स्तर पर ‘संकल्प’ से लाभान्वित रहे हैं। समय-समय पर उनके कार्यों से जुडे समाचार प्राप्त होते रहते हैं, जो अत्यंत संतोषजनक हैं। अपने तीन ध्येय—‘विश्वसनीयता’, ‘संवेदनशीलता’, ‘उत्कृष्टता’ को लक्ष्य बनाकर यह संगठन निरंतर अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर है। संकल्प कार्यालय उदासीन आश्रम, आराम बाग, पहाड़गंज, नई दिल्ली-55 इ-मेल ः [email protected] वेबसाइट ः www.samkalp.org नलिनी सचदेव ः 9717411222 राजू चौहान ः 8588963296 ooo