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Published by krishna kumar lodhi, 2020-01-19 17:33:05

KV ITBP Shivpuri M.P.

अनुरणन



सूची

विषय पृष्‍ठ

1. अधिकार 1


2. अमर शहीद 2

3. अजादी के साल हुये कई 3

4. अनमोल धिध ि़या 4-5

5. अनुभूधिय ॉं 6-7

6.बेटी बिाओॉं 8

7.एकरूपिा 9

8. इरादा िो कर वादा िो कर 10


9. क ू ि़े दान 11

10. बिपन के धदन 12

11. मेरी कलम से 13

12. नन् हा धसपाही 14

13. नया वर्ष 15

14. नूिन वर्ष अधभनॉंदनम् 16

15. प्रसन् निा सब गुणों की जननी हैं 17


16. साजन होली आई हैं 18-19

17. धििली से भी प् यारी 20

18. बेधटय ॉं िो धजॉंदा रहनी िाधहए 21

19. धवद्यार्थी और धशक्षक 22

20. मािृभूधम 23

अधिकार


वे मुस् काते े ल , नहीं


धिनको आते ा है मुर्ााना ,


वे ते ानो के दीप, नही


धिनको भाते ा है बुर् िाना।


वे नी म के मेघ, नही


धिनको है घु िाने की चाह,


वह अनन् ते िरते ुराि, नही


धिसने देखी िाने की राह।


वे स ने से नयन, नहीं


धिनमें बनते े ऑंस मोते ी,


वह प्राणों की सेि , नहीं


धिसमे बेसुि पीडा सोते ी।


ऐसा ते ेरा ोक, वेदना नहीं,


नहीं धिसमें अवसाद,


ि ना िाना नहीं,


नहीं धिसने िाना धमटने का स् वाद।

क् या अमरों का ोक धम े ा


ते ेरी करूणा का उपहार।


रहने दो है देव ! अरे


यह मेरा धमटने का धअ िकार।


महादेवी वमाा

अमर शहीद


राम –कृ ष्‍ण की धरती पर , पापी ने प ाव पसारा



बढ़ो जवाऩोों आज ववदेशी ने हमक़ो ललकारा


इस धरती क़ो हवियाने का, उसने आज ववचार वकया


इस भारतक़ो धमकाने का, उसने बडा प्रचार वकया


उत्‍तर में व़ो खड़ा वहमालय टक्‍कर लेनेवाला है


जह ा हजाऱोों वीर लड़ेंगे उसने हमें न जाना हैं

वीर वशवाजी की गािाऍ, हमने घर-घर गाई हैं


महाराणा प्रताप क े मेवाड़ीय़ोों ने बाजे खूब बजाए हैं


रण-भूवम बज उठी कट्टाब़ोम्मन ने हमें पुकारा है


हमलावर...... गद्दाऱोों का अब काम न बनने वाला है


हम न वकसी का मुल्‍क चाहते हमें वकसी से वैर नही


कश्‍मीर से अोंतरीक्ष तक, यही हमारा नारा है


वहन्‍द महासागर की लहऱोों ने सुन ल़ो यही पुकार है


सुन ल़ो यही पुकार है ।

पारस गुप् ता
10 ‘अ’

आजादी क े साल हुए कई


पर क्या हमने पाया है सोचा था क्या होगा लेकिन सामने पर क्या आया है


रामराज्य सा देश हो अपना, बापू िा था सपना

चाचा बोले आगे बढ़िर िर लो सबिो अपना


आजादी किर छीने ना अपनी कदया शास्त्ी ने नारा

जय जयिार किसान िी अपनी जय जवान हमारा

सोचो इन ि े सपनों िो हम ि ै से सािार िरेंगे


भ्रष्टाचार हटा देंगे हम आगे तभी बढ़ेंगे

मुककिल नहीं पूरा िरना इन सपनों िा भारत


अपने अंदर िी शकि िो िरो अगर तुम जागृत

आओ कमलिर िसम यह खाएं


ऐसे सभी िरेंगे कशकित हो अगर हर बच्चा उन्नकत तभी हम िरेंगे!

देशभिों से ही देश िी शान है


देशभिों से ही देश िा मान है

हम उस देश ि े ि ू ल है यारो


कजस देश िा नाम कहंदुस्तान है !!

मेरे देश तुझिो नमन है मेरा


कजयुं तो जवाब पर नाम हो

तेरा बस यही आखरी है तमन्ना मेरी


मरू तो कतरंगा ििन हो मेरा!!

लहराएगा कतरंगा अब सारे आसमान पर


भारत िा ही नाम होगा सबिी जुबान पर

ले लेंगे उसिी जान या खेलेंगे अपनी जान पर िोई जो उठाएगा आंख कहंदुस्तान पर


गुलाम बने इस देश िो आजाद िराया है सुरकित जीवन देिर तुमने िजज अपना चुिाया है कदल से तुमिो नमन िरते हैं

हम सब भारतीय!! अमर उपाध्याय

अनमोल चिचिया



चार ों ओर पहाड ों से घिरा हुआ एक वन था। उस वन में पीपल का एक वृक्ष भी था

। उस वृक्ष पर एक घवघचत्र घचघिया रहती थी ज स्‍वघणिम घवष्‍ठा (बीट) करती थी,

अथाित घवष्‍ठा क े रूप में वह स्‍वणि घनष्‍काघसत करती थी । उसकी धरती पर घिरते
ही स्‍वणि में बदल जाया करती थी। एक बूढेे़ व्‍याध ने जब अपनी आोंख से इस

आश्चयि क देखा त उसे अपनी आोंख ों पर घवश्वास ही नही हुआ। वह स चने लिा घक
यह कै से सोंभव ह सकता है घक एक जोंिली घचघिया की घवष्‍ठा धरती पर घिरते ही

स्‍वणि में पररवघतित ह जाये। लेघकन उसके सामने त प्रत्यक्ष और प्रमाण द न ों ही
मौजूद थे, इसघलए उसे घवश्वास करना ही पडा। व्‍याध स चने लिा घक अिर यह

घचघिया मेरे जाल मे फों स जाये त मे माला माल ह जाऊों िा । इस घचघिया क खूब

खखलाउोंिा ताघक यह ज्‍यादा से ज्‍यादा स्‍वघणिम घवष्‍ठा करे। यह घवचार कर व्‍याध ने
पीपलके उस वृक्ष पर अपना जाल डाल घदया और घचघिया क े फ ोंसने की प्रतीक्षा

करने लिा। घचघिया ने वृक्ष पर पडे जाल क नहीों देखा और उसमें फों स िई। व्‍याध
घचघिया क अपने अघधकार में लेकर खुशी-खुशी िर की ओर चल घदया । परोंतु

अचानक ही उसके बढ़ते कदम रूक िए । वह स चने लिा घक घचघिया घवघचत्र
है। उसे लिा घक घचघिया स्‍वणि घवष्‍ठा करने वाली अवश्‍य है लेघकन यह घकसी

भूतप्रेत अथवा घपशाच का रूप हुई त कों ही मैं धनवान ह ने क े बजाय घकसी सोंकट
में न फों स जाउों । काफी देर स च-घवचार करने क े बाद व्‍याध ने यह घनष्‍कर्ि

घनकाला घक इस घचघिया क िर न ले जाकर राजा क द े द ें और पुरस्‍कार प्राप्‍त
कर लूूँ। उसके घदमाि में यह घवचार आते ही वह राजमहल की ओर चल

घदया।राजमहल में पहुोंचकर वह राजा से ब ला, “महाराज यह एक घवघचत्र घचघिया

है। इसकी घवष्‍ठा धरती पर घिरते ही स ने की ह जाती है। इसघलए मैंने स चा घक

इसे अपने अघधकार में लेकर आपक द े द ें,ताघक इसकी स्‍वघणिम घवष्‍ठा से राजक र्

में बढ़ त्तरी ह ।” राजा घचघिया क पाकर बहुत खुश हुआ और उसने व्‍याध क
बहुत-सा धन पुरस्‍कार क े रूप में प्रदान घकया । राजा ने अपने सेवक ों क बुलाकर

कहा, “यह घचघिया अनम ल है। इसकी देखभाल में क ई कमी न रहने पाए।”

सेवक ने राजा का आदेश मानकर उस घचघिया क एक सुदर से घपोंजरे में कै द

कर घदया और खाने–पीने का सामान भी उसमें रख घदया। उस घवघचत्र घचघिया क े

घवर्य में जब मोंत्री क पता चला त उसने राजा क े पास जाकर घनवेदन घकया-

“महाराज यह व्‍याध इस जोंिली घचघिया क अनम ल और स ने की घवष्‍ठा करने

वाली बताकर आपक मूखि बना िया । अिर यह स ने की घवष्‍ठा करने वाली ह ती
त वह व्‍याध स्‍वयों इसे पालकर धनवान न बन जाता । राजा क मोंत्री की बात ों में

सच्‍चाई नजर आई और उसने अपने सेवक ों क बुलवाकर उस घचघिया क

बोंधनमुक्‍त करने का आदेश द े घदया। बोंधनमुक्‍त ह कर उस घचघिया ने उपने घनवास
पर पहुूँचकर सारी बात राजा क ब ल दी और घफर वह घचघिया खुशी से पीपल क े
वृक्ष पर एक डाल से दू सरी डाल पर फु दकती हुई उडान भरने लिी।

अनुभूतिय ाँ



जमीन पर रहने की आदत है मुझे



क्योंकक मुझे मेरी औकात से प्यार है


और फिर वह औकात फकस काम


की जो जमीन पर ना फिक े


और फिर इंसान फकस काम का


जो अपनी औकात पर िक्र ना करें



मुझे बस कोई एक बार बता दे


फक अगर मेरा खुदा नहीं तो फिर


इस दुफनया में फजक्र क्यों है और अगर खुदा है भी तो फिर इस दुफनया वालों को

इतनी फिक्र क्यों है अगर मैं अपने उत्तर पर आऊं !



तो यह तो बस अनुभूफतयों का खेल है ,


तभी तो यह दुफनयादारी इंसानों



क े फलए जेल और एक बच्चे क े फलए खेल है! मुझे बस मेरे ईश्वर से एक ही खेद है फक,


हे प्रभु मैं अगर तेरी संतान


हे प्रभु मैं अगर तेरी संतान


तो तू मेरे फलए भेद क्यों है


कहते हैं लोग फक तू सववस्व है और कोई तो समझाते इन्हे फक तू ही तो है वह



जो इनकी अनुभूफतयों में है और अगर तू इनकी अनुभूफतयों में है तो फिर उन्हें इतनी

फिक्र क्यों है तेरा शुफक्रया अदा क ै से करं मैं प्रभु

तेरे उपकार मुझ पर इतने हैं!



क्योंफक


करता नहीं मैं क ु छ भी


मेरा नाम हो रहा है



इस पहेली को तो शायद प्रभु मैं कभी ना बुझा पाऊं पर एक तमन्ना है मेरे फदल में ,


फक बस एक बार मुझे मेरी अनुभूफतयों में



कभी तेरी अनुभूफतयां ही करा दे!



अमर उपाध्याय



बेटी बचाओ


कहती है बेटी हमें निहार ,


मुझे चानहए प् यार-दुलार ।

बेनटयों को क ययूँ.....

प्यार िहीं क रता संसार ।


सोनचए सभी क या बेटी नबि ,

बि सकता है घर पररवार ।


बचपि से लेकर जवािी तक,




मुझ पर लटक रही तलवार ।

मेरे दददऔर वेदिा का


कब हो स् थायी उपचार ।।

बहते पािी में मैं बह गई


कौि करेगा िदी क े पार ।

मैं बेटी माता भी मैं ह ूँ ,

मैं ही दुगाद , काली अवतार ।


मेरे प् यार में सभी सुखी हैं

मेरे नबिा धरती अंनधयार ।।


बेटी की ददद और वेदिा का

कब होगा स् थायी उपचार ।।



आरोही

4 ’अ’

एकरूपता



ह िंदू मुस्लिम ने अपने स्वार्थ क े ह साब पर

बािंट हदया देश को अपने अपने मज ब क े नाम पर

देश क े समक्ष वर्तमान में है समस्या

हो रामलला का मंददर या अल्लाह की मस्जिद

एक ही राम और एक ही है रहीम

दिर भी न जाने क्ों प्रेम की है कमी

देश का प्रत्येक नागररक ै दहंदुस्तानी

चाहे कोई माने या ना माने इदर्हास की कहानी


दहंदू मुस्जिम क े त्यो ारोिं में भी है एकरूपता

दिर हर धमत को भारर् में क्ों मानर्े नहीं एक सा

हिर भी जाने क्ोिं लोग ईश्वर क े नाम पर लड़ते ैं

सबका माहलक एक ोने क े बावजूद भी बेवज अकड़ते ैं

छोड़ो भेदभाव और ो जाओ एक |

बढ़ जाएगा देश आगे जब ो जाएिं गे म सब एक |


अभय भार्गव

दसव ीं ‘ब’

*इरादा तो कर वादा तो कर *



तेरी सोच में मोच नहीीं ,


तेरा मजबूत इरादा होना चाहहए |



कक तेरे हौसलों की इमार‍त हो सबसे आगे,


पीछे सारा जमाना होना चाहहए |



तो आगे बढ़ और सफर का इरादा कर


अपनी हर कोशिि से तू थोड़ा ज्‍यादा कर |



हारीं गा ना हौसला मैं उम्र भर,


यह दूसरों से नही तू खुद से वादा कर |


इस आसमान की ऊचाईयों को तुझे छ ू ना आना चाहहए



इस रठी ककस्‍मत को तुझे मनाना आना चाहहए |


क्‍योंकक जो पत्‍थर हथौडे की मार से डर जाए

वह कीं कड़ कही खो जाता है



और जो वह मार सह ले,


वह कीं कड़ –िींकर हो जाता है |



तो कर क े हदखा तू काम इस कदर,


कक तेरे नाम की तो शमसालें होनी चाहहए |



बींद आखों से सपने तो सब देखते हैं


तेरे सपने तो खुली आखों मे होने चाहहए।



श्रुतत िुक्‍ला

क ू ड़ेदान



सुनो सुनो मै ह एक क ू ड़ेदान,


सब लोगों को हो म़ेरी पहचान ।

क ू डा तुम मुझमें डालो


इधर उधर न बबखराओं,


पर्ाावरण की साफ सफाई का रखो ध्‍र्ान


सुनो सुनो मै ह एक क ू ड़ेदान


सरकार का एक प्रशंसनीर् कदम
े़
गील़े कचऱे क ़े ललए हरा क ू ड़ेदानसूख़े कचऱे


क ़े ललए नीला क ू ड़ेदानघर-घर में है रखना,


सुनो सुनो मै ह एक क ू ड़ेदान।

अब तो सरकारी कचरा गाडी भी आती


घर-घर स़े क ू डा ल़े जाती,


उस क ू ड़े का प्रर्ोग करक़े


बबजली बना घर - घर उजलाती,


सुनो सुनो मै ह एक क ू ड़ेदान।




आओ सब लमलकर करो म़ेरा उपर्ोग


मुझ क ू ड़ेदान का र्ही है सन्‍द़ेश,


क ू डा इधर उधर न बबखराकर

क ू डा तुम मुझमें डालो ।


द़ेखो इसी में है अपनी शान


द़ेश बनाओ अपना महान।


वैभवी शमाा, प ं च ‘अ’

क्या खूब थे वो बचपन क े दिन


वह धूप में घूमना वो पेड़ पर चढ़ना

वह हर रोज खाने में आनाकानी करना

वह हर काम में अपनी मनमानी करना

क्या खूब थे वो बचपन क े दिन.....


वह हर रोज सुबह माां का जगाना

वह हर रात माां का लोरी गाकर सुलाना

पापा क े साथ मेला जाना

िािा क े साथ पाकक जाना

व िािी से हर शाम कहानी सुनना

िीिी क े साथ खेलना

क्या खूब थे वो बचपन क े दिन


नही थी कोई चचांता न तनाव

न थी पढ़ाई की टेंशन

पूरा दिन ननकल जाता था यूां ही खेलने
में

वह पूरा दिन बस खेलना…….

हर बात पर गुस्सा हो जाना और माां का
मनाना

क्या खूब थे वो बचपन क े दिन.....


वह बचपन वह यािें रह गई बन क े क ु छ ककताबें

अब तो भाई बस चलनी है अपने भववष्य को बनाने की तैयारी

भगवान से बस यही िुआ है रहती

एक बार किर लौटा िे मेरे बचपन क े खजाने

क्या खूब थे वो बचपन क े दिन

“ अभय भागकव

IX B”

मेरी कलम से ……….







पुराने दोस् तों की याद तब आती हैं


जब नए दोस् त भाते नहीं


भीड में भी अक े लेपन का अहसास तब होता है


जब साथ देने क े ललए कोई होता नहीं



अपने सपनों में तो सब शहंशाह होते है


लेलकन असल लजंदगी में


क ु छों को छोड़, हम लकसी को भाते नहीं


असललयत ख् यालों में खोजोगे तो झूठ लमलेगा



उस झूठ में लजंदगी लजओगे तो


समय आने पर लदल टूटेगा


सच भले ही कड़वा हो मान लेना चालहए


झूठ भले ही मीठा हो उसे जाने देना चालहए


असललयत को अपनाक े , ख् वाबों तक पह ुचने का अलग ही मजा है


ये जो मजा है लकसी और में कह ां है ।



स् नेहा रावत

9’अ’

नन्‍हा सिपाही





मम्‍मी कहती हमसे, बेटा क्‍या बनोगे


पापा कहते हमसे , बेटा क्‍या बनोगे



ससपाही!


मैं नन्‍हा ससपाही हूँ ,


देश की खासतर लड़ता हूँ



आगे है बंदू क मेरी


सीना तान क े चलता हूँ




दाऍ- बाऍ , दाऍ- बाऍ


ठ - ठ - ठ ।


















शौर्यजीत


1’ब’

नया वर्ष



नया वर्ष है आया ,


संग खुशियााँ घरों में लाया।



नए साल पर सजता है घर,


अपने मन को, खुशियों की झोली से तू भर ।



नया साल है खुशियों का संगम,



इस साल दौड़कर भागेंगे तुम्‍हारे सारे गम।


खुशियों की बौछार यह लाया है अपने संग।



भूल जाओ ननरािाएाँ जो करती है तुम्‍हे तंग।



कभी हार न मानना,


यह मंत्र ववश्‍व में फै लाना।



करो तुम ऐसा काम,


हो जजससे देि का ऊाँ चा नाम ।



तू ककसी की भी मत सुन,


अपनी कला को तू बुन।



हर बार नया बर्ष आता है।



हर दुख को वह भगाता हैा


और दुख क े अंधेरे में,



खुशियों का प्रकाि फै लाता हैा

अनन्‍या गुप्ता


सात ‘ब’

नूतन वर्ष अभिनंदनम ्







नूतन वर्ष अभिनंदनम्


आगत का कर वंदनम्



िर कर िावना –सुमन अंजभि से


कर नवि वर्ष का स्‍वागतम्।






भमटाकर शोक-शूि ववगत क े


खििाकर हर्ष –क ु सुम जगत क े ।



स्‍वाखणषम स्‍वप्‍न संजोए संध्‍या



िाई प्रात: बेिा अतत सुंदरम्।















तनत नव संकल्पित िावों से



नव वर्ष का गा गौरवम् ।



नई उजाष नवोत्‍साह अतत मधुरम्


नूतन वर्ष अतत मंगिम्।


मधु गुप् ता
टी. जी. टी. हिन् दी

प्रसन्नता सब गुणों की जननी है

























आज कल प्रसन्‍नता भी दुललभ होती जा रही हैं |सब ओर लोगो क े चेहरों पर तनाव, चचिंता, दुख उदासी



ही अचिकतर ददखाई देती है। प्रसन्‍न चेहरों का मानो अकाल ही पड गया है। यही कारण है आजकल


क े तनावपूणल जीवन में मनुष्‍य अनेक घातक बीमाररयों का शिकार होता जा रहा है। प्रसन्‍न रहना


स्‍वास्‍्‍य क े शलये उतना ही आवश्‍यक है जजतना कक भेाजन करना । प्रसन्‍नता वह औषचि है जो एक



रोगी व्‍यजतत में भी उमिंग एविं उत्‍साह का सिंचार कर देती है। प्रसन्‍न रहने से िरीर में रत‍त-सिंचार


भली पूवलक होता है। प्रसन्‍नता अनेक प्रकार क े रोगों एविं तनावों से लडने की क्षमता प्रदान करती है।



प्रसन्‍नता स्‍वत: ही कई अन्‍य सद्गुणों को जन्‍म देती है। प्रसन्‍न व्‍यजतत सकरात्‍मक उजाल से पररपूणल


होता है। वह स्‍वयिं भी प्रसन्‍न रहता है और जह िं जाता है , वहीिं प्रसन्‍नता बािंटता है। चाहे आप ककतने


भी तनाव में हों, दुखी हो; ववपवि में हो जीवन क े हर क्षण का प्रसन्‍नतापूवलक स्‍वागत करें। जीवन को



खुिहाल बनाने का नारा होना चादहये-




“प्रसन्‍न रहों, प्रसन्‍नता बढाओ,



जीवन को स्‍वस्‍थ एविं, खुिहाल बनाओिं |”




ददपाली सेन

9 ‘ अ’

साजन होली आई



है।





साजन! होली आई है


सुख से हँसना जी भर गाना

मस्‍ती से मन को बहलाना


पर्व हो गया आज-


साजन!होली आई है।

हँसाने हमको आई है।


साजन होली आई है

इसी बहाने


क्षण भर गा ले दुखमय


जीर्न को बहला ले

ले मस्‍ती की आग-


साजन! होली आई है।

जलाने जग को आई है।


साजन! होली आई है।


रंग उड़ाती

मधु बरसाती

कण-कण में यौर्न बबखराती,


ऋतु र्संत का राज-

लेकर होली आई है


जजलाने हमको आई है।


साजन! होली आई है।

खूनी और बबवर


लड़कर–मरकर


मथकर नर-शोणणत का सागर

पा ना सका है आज –


सुधा र्ह हमने पाई है।

साजन! होली आई है।




साजन! होली आई है।

यौर्न की जय!


जीर्न की लय!


ग ूज रहा है मोहक मधुमय

उड़ते रंग-गुलाल


मस्‍ती जग में छाई है


साजन! होली आई है

शशर्ा खन्ना


दसर्ी ‘अ’

तििली से भी प्‍यारी






पंख अगर मिलिे तििली क े,

दूर-दूर उड़ जािी िैं।


क ंठ अगर पािी कोयल का,

िीठे गीि सुनािी िैं।

पर िम्‍िी –पापा कहिे,

िैं तििली से भी प्‍यारी ह ।

राजक ु िारी से भी बढ़कर

उनकी राजदुलारी ह ।



रंग –बबरंगे फ् ाक पहनकर

















जब िैं गीि सुनािी हूँ ।

सब कहिे है िैं कोयल से भी,

बढ़कर िीठा गािी हूँ। सौम्‍या पाटिल

5 ‘अ’

बेटिय ाँ तो ट िंद रहनी च टहए




ॉं
राखी ब धने क े लिए बहन

चालहए।

कहानी सुनाने क े लिए दादी

चालहए |


लिद पूरी करने क े लिऐ

मौसी
चालहए।


खीर खखिाने क े लिए मामी


चालहए।


साथ लनभाने क े लिए पत्‍नी


चालहए।


पर यह सभी ररश्‍ते लनभाने क े लिए

ॉं
बेलिय तो लिॉंदा रहनी चालहए।।





टनश वर् ा


दसवी- “अ”

स्वच्छता पखवाड़ा








































K

विद्यार्थी और विक्षक




आज क े विद्यार्थी न करते

विक्षक का कोई मान,

इसविए हो रही है गुम,

विक्षा की पहचान |
एक समय ऐसा भी र्था

जब दोनोों में र्था िाड़,
सम्‍बन्‍ध ऐसा दोनो में,

मानो विष्‍णु प्रहिाद |

आज स्थर्थवत क‍योों है उिट,

कोई समझ न पाए |
विक्षक, विद्यार्थी न समझे,विद्यार्थी न विक्षक

न जाने कौन बनेगा विक्षा का अब रक्षक |
क‍योों न समझे विद्यार्थी ,

जब विक्षक है समझाए |

क‍योों आज का विद्यार्थी,
अपने पाठोों से घबराए |

क‍या करें ऐसा वक,

ये समथ‍या हि हो जाए,उपचार करने हेतु
क‍योों न ढढे कोई उपाय |
़ू
विक्षक द े विक्षा िो,जो विद्यार्थी मन भाये,,

विद्यार्थी िह पाठ पढेे़ ,जो विक्षक उसे पढाये |
ों
विद्यार्थी का ध्‍यान हो,जब विक्षक ब टे ज्ञान,

तभी भविष्‍य में बना पाऐगे अपनी नई पहचान|
इन बातोों से िायद होगा दोनोों का उद्धार,

वमिकर दोनोों देंगे विक्षा प्रणािी को सुधार,

तभी तो होगा, 21िीों सदी में, विक्षा का बेड़ा-पार,
विक्षा उत्तम होगी, बढेगा देि का नाम अपार |

नेहा

पी.आर.टी.

मातृभूमम



मातृभूमम करती हूँ अमभनंदन उस धरती का

मिस धरती पर मैंने िन्म मिया


यह िननी ही है मातृभूमम

इस मातृभूमम को िन्नत से
भी ऊं चा समझती हूँ



भारत माता मेरी िननी
भारत माता की गाथा सुर गाथा

की िय में मैं खो िाती हूँ


ऋमि मुमनयों की धरती को

मनत शीश झुकाती हूँ


इस मातृभूमम पर नाि कर

मैं भारतवासी कहिाती हूँ


िब हृदय गमत हो रुकने को
मां-मां मैं पुकारं



मेरी मां िो अपना आंचि फै िा द ें,
मनर्णय में मैं गवण से सो िाऊं ,



|| भारत माता की िय ||
मिशु उपाध्याय

पुस्तकालयाध्य््षा,


कें द्रीय मिद्यालय मशिपुरी


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