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हिंदी परियोजना कार्य2

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Published by atharvadwivedi5sep2007, 2021-05-21 23:58:50

हिंदी परियोजना कार्य2

हिंदी परियोजना कार्य2

ह दंि ी परियोजना कायय

परिचय

•नाम - अथर्व द्विर्ेदी
•कक्षा - नर्ी
•र्र्व - आई
•द्वर्षय - द्व ंिदी परियोजना कायव
•अध्यापक - डॉक्टि श्री देर्ेश कु माि द्वरिवर्ेदी जी

प्रस्तावना

कोई भी कायव द्विना द्वकसी लक्ष्य के सुव्यर् रूप से परू ्व न ीं ोता।

यद्वद द्वर्षय सुर्द्वित, सुलद्वलत औि उदेश्य परू ्व ोर्ा तो र् प्रेिर्ाप्रद द्वसद्ध ोर्ा मैं इस
परियोजना के सिंकलन के द्वलए सर्वप्रथम अपने द्वर्द्यालय की प्रिानाचायाव डॉक्टि श्रीमती
द्वर्नीता कामिान जी र् अपने द्व िंदी द्वर्षय के अध्यापक डॉक्टि श्री देर्ेश कु माि द्वरिवर्ेदी जी
का अत्यंित आभािी ँू द्वजनकी छरिव छाया में र् कु शलद्वनदेशन को पाकि ी मंै इस परियोजना
को सफल रूप दे पाने मंे सफल ो पाया ूँ। इसके साथ मंै अपने माता-द्वपता का भी ि ुत
आभािी ँू द्वजन् ोंने इस परियोजना को समाप्त किने में मेिी मदद की औि अपने द्वर्द्यालय की
पुस्तकालय सनकाद्वलका को िन्यर्ाद देना चा ता ँू द्वजन् ोने मुझे अनेक सद्व योर्ी पुस्तके
उपलब्ि किाई।

ईश्वि की असीम अनुकम्पा एर्िं र्ुरुजनो का कु शल द्वनदेशन, स पाद्वियो र् माता-द्वपता के
स योर्ात्मक आचिर् िािा ी मैं इस परियोजना को समाप्त किने मंे सक्षम ो सका ँू।

ववषय सचू ी

चचत्र अध्ययन
कबीिदास जी का जीवन परिचय
काकी पाठ का उदेश्य
काकी पाठ का चरित्र चचत्रण

कबीिदास जी का जीवन परिचय

भाित के म ान संित औि आध्याद्वत्मक कद्वर् किीि दास का जन्म र्षव 1440 मंे ुआ
था। इस्लाम के अनुसाि ‘किीि’ का अथव म ान ोता ।ै इस िात का कोई साक्ष्य
न ीं ै द्वक उनके असली माता-द्वपता कौन थे लेद्वकन ऐसा माना जाता ै द्वक उनका
लालन-पालन एक र्िीि मुद्वस्लम परिर्ाि मंे ुआ था। उनको नीरु औि नीमा
(िखर्ाला) के िािा र्ािार्सी के एक छोटे नर्ि से पाया र्या था।

ये शािंद्वत औि सच्ची द्वशक्षर् की म ान इमाित ै ज ाँू पिू ी दुद्वनया के संित
र्ास्तद्वर्क द्वशक्षा की खाद्वति आते ।ै किीि के माूँ-िाप िे द र्िीि औि अनपढ़ थे
लेद्वकन उन् ोंने किीि को पिू े द्वदल से स्र्ीकाि द्वकया औि खुद के व्यर्साय के िािे
में द्वशद्वक्षत द्वकया। उन् ोंने एक सामान्य र्ृ स्र्ामी औि एक सफू ी के सिंतुद्वलत
जीर्न को जीया।

कबीिदास जी का जीवन परिचय

ऐसा माना जाता ै द्वक अपने िचपन मंे उन् ोंने अपनी सािी िाद्वमवक द्वशक्षा
िामानिंद नामक र्ुरु से ली। औि एक द्वदन र्ो र्ुरु िामानिंद के अच्छे द्वशष्य के
रुप में जाने र्ये। उनके म ान कायों को पढ़ने के द्वलये अध्येता औि द्वर्द्याथी
किीि दास के घि में ि िते ।ै ये माना जाता ै द्वक उन् ोंने अपनी िाद्वमवक द्वशक्षा
र्ुरु िामानिंद से ली।

उनकी म ान िचना बीजक मंे कद्वर्ताओिं की भिमाि ै जो किीि के िाद्वमवकता
पि सामान्य द्वर्चाि को स्पष्ट किता ।ै किीि की द्व न्दी उनके दशवन की ति
ी सिल औि प्राकृ त थी। र्ो ईश्वि मंे एकात्मकता का अनुसिर् किते थे। र्ो
द्व न्दू िमव मंे मदू्वतव पजू ा के घोि द्वर्िोिी थे औि भद्वि तथा सफू ी द्वर्चािों में पिू ा
भिोसा द्वदखाते थे।

कबीिदास जी का जीवन परिचय

किीि के िािा िद्वचत सभी कद्वर्ताएँू औि र्ीत कई सािी भाषाओिं
मंे मौजदू ।ै किीि औि उनके अनुयाद्वययों को उनके काव्यर्त
िाद्वमवक भजनों के अनुसाि नाम द्वदया जाता ै जसै े िद्वनस औि
िोली। द्वर्द्वर्ि रुप मंे उनके कद्वर्ताओंि को साखी, श्लोक (शब्द)
औि दो े (िमेनी) क ा जाता ।ै साखी का अथव ै पिम सत्य को
दो िाते औि याद किते ि ना। इन अद्वभव्यद्वियों का स्मिर्, कायव
किना औि द्वर्चािमग्न के िािा आध्याद्वत्मक जार्दृ्वत का एक
िास्ता उनके अनुयाद्वययों औि किीि के द्वलये िना ुआ ।ै

कबीिदास जी का जीवन परिचय

किीि दास के अनुसाि, जीर्न जीने का तिीका ी असली िमव ै द्वजसे लोर् जीते ै
ना द्वक र्े जो लोर् खुद िनाते ।ै उनके अनुसाि कमव ी पजू ा ै औि द्वजम्मेदािी ी िमव
।ै र्े क ते थे द्वक अपना जीर्न जीयो, द्वजम्मेदािी द्वनभाओ औि अपने जीर्न को
शाश्वत िनाने के द्वलये कडी मे नत किो। कभी भी जीर्न मंे सन्याद्वसयों की ति
अपनी द्वजम्मेदारियों से दूि मत जाओ। उन् ोंने पारिर्ारिक जीर्न को सिा ा ै औि
म त्र् द्वदया ै जो द्वक जीर्न का असली अथव ।ै र्ृ स्थ के रुप में जीना भी एक म ान
औि र्ास्तद्वर्क सन्यास ।ै जसै े, द्वनर्वुर् सािु जो एक पारिर्ारिक जीर्न जीते ,ै
अपनी िोजी-िोटी के द्वलये कडी मे नत किते ै औि साथ ी भर्र्ान का भजन भी
किते ।ै किीि ने लोर्ों को द्वर्शुद्ध तथ्य द्वदया द्वक इिंसाद्वनयत का क्या िमव ै जो द्वक
द्वकसी को अपनाना चाद्व ये। उनके इस ति के उपदेशों ने लोर्ों को उनके जीर्न के

ि स्य को समझने में मदद द्वकया।

काकी पाठ का उदेश्य

काकी क ानी में द्वसयािामशिर् र्ुप्त जी ने अत्यंित माद्वमवक ढिंर्
से एक अिोि तथा मासमू िालक की मात-ृ द्वर्योर् की पीडा को
व्यि द्वकया । क ानीकाि ने य द्वचद्वरिवत द्वकया ै द्वक िालकों
का हृदय अत्यिंत कोमल, भार्ुक तथा सिंर्ेदनशील ोता ।ै र्े
मात-ृ द्वर्योर् की पीडा को स न न ीं कि पाते ।ै जसै ा द्वक
क ानी मंे द्वदखाया र्या ै द्वक श्यामू अपनी माूँ की मतृ ्यु द्वक
िाद ि ुत दुखी ि ता ै औि उनको लाने के द्वलए पतंिर् िािा
िाल सुलभ चेष्टा किता ।ै

काकी पाठ का चरित्र चचत्रण

श्यामू - श्यामू काकी क ानी का मुख्य पारिव ै र् अपनी माूँ से िे द
प्याि किता ै तथा उनका द्वर्योर् न ीं से सकता ।ै माूँ की मतृ ्यु के
पश्चात् र् काफी उदास ि ता ै । र् माँू की ममता के द्वलए तिसता ै
औि माँू से द्वमलने के द्वलए व्याकु ल ि ता ।ै जि उसे पता चलता ै द्वक
उसकी माूँ िाम के य ाूँ चली र्यी ै तो उसके द्वदमार् मंे य आता ै द्वक
र् पतिंर् के स ािे माँू को नीचे िुलाये। श्यामू मात-ृ स्ने के कािर् द्वपता
की जेि से पतंिर् र् िस्सी मिंर्ाने के द्वलए पसै े चुिाता ै ालाूँद्वक श्यामू
चोि न ीं ंै य र् द्वसफव इसद्वलए किता ंै उसे अपनी माूँ से द्वमलना ।ै
इस प्रकाि श्यामू अत्यिंत सिंर्ेदनशील ।ै

काकी पाठ का चरित्र चचत्रण

भोला- भोला सुद्वखया दासी का लडका था औि भोला श्यामू का
समर्यस्क था, पि र् श्यामू से अद्विक समझदाि था। जि
उसने श्यामू की िात सुनी तो क ा द्वक पतंिर् मंे मोती िस्सी ो
तो िीक ि ेर्ा क्योंद्वक पतली डोि को पकड कि काकी नीचे
न ीं आ सकती र् टूट जाएर्ी। भोला अत्यंित डिपोक भी था।
इसद्वलए जि द्वर्श्वेश्वि ने डाूँटकि पसै े चुिाने दे सम्िन्ि में पछू ा
तो उसने सािी िात सच सच िता दी। श्यामू की ति र् भी
भार्ुक था।

काकी पाठ का चरित्र चचत्रण

द्वर्श्वेश्वि- द्वर्श्वेश्वि श्यामू के द्वपता ै जो अपनी पत्नी की
असामद्वयक मतृ ्यु के कािर् अन्यमनस्क ि ते ंै , एक द्वदन
जि उन् ोंने देखा द्वक उनके कोट से कु छ पसै े र्ायि ै तो
उन् ंे क्रोि आ र्या औि जि भोला ने उन् ंे सािी िात िता दी
तो क्रोि मंे आकि उन् ोंने श्यामू को दो तमाचे भी जड द्वदए।
पि जि उन् ोंने पतिंर् पि 'काकी' द्वलखा देखा तो उनका
क्रोि काफु ि ो र्या औि उसका स्थान पीडा ने ले द्वलया।

धन्यवाद


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