शब्द सत्ता शशल्पी संवाद
भाग 14: दीवाली
दोस्तों!
“शब्द सत्ता” के शशल्पी नामक व्हाटसएप
समूह में होने वाली दैननक कववता ववननमय
वववरण आपके सामने प्रस्तुत है| आज
ददवाली पर साझा की गई कववताओं की एक
झलक देखिए|
डॉ दहमांशु शेिर
दीवाली ववशषे ाकं
इस अंक के शब्द शशल्पी गण
मीनू वमाा
सौम्या
डॉ. सतीश चन्द्र भगत
आशीष दीक्षित
प्रेरणा पाररश
सुरेन्द्र प्रजापनत
दीपों का त्योहार
हमारे देश में,हर ददन...
कोई न कोई पवा होता है।
पर....
दीपों का त्यौहार
सबसे सदंु र होता है।
अंधेरी रात,
दीपों से.....,
प्रकाशमान होती है,
िेतों मंे िडी, फसल,
जब, जवान होती है।
िुद तो आता है,
साथ,अपने....
कई त्यौहार लाता है।
धनतरे स ,भैया दजू से,
मन को िशु कर जाता है।
हर घर मंे िुशशयों का
माहौल सजाता है।
हषोल्लास से.....
वातावरण को पणू ा बनाता है।
नरशसहं का रूप, लेकर
ववष्णु जी ने....,
प्रहलाद को,
इसी ददन बचाया था।
भगवान राम भी....,
ववजयी हो....
अपने घर को आए थे।
इसी ददन ....
ववक्रमाददत्य,अपने..
शसहं ासन पर बठै े थे।
प्रकाश....
दीपकों का....
चारों ददशाओं मंे फै ले थे।
हमारे देश मंे, हर ददन
कोई ना कोई पवा होता है,
पर .....
दीपों का त्यौहार,
सबसे अलग होता है।
अमावस्या की रात,
पूखणमा ा की रात,
बन जाती है।
दीपों से सुसज्जजत .…
जब सारा ससं ार होता है।
हर तरफ मेलों....,
जैसा माहौल होता है।
रंग-बबरंगे पटािों से सजा
जब हर दकु ान होता है।
हमारे देश में हर ददन
कोई न कोई पवा होता है
पर....
दीपों का त्यौहार ....
सबसे संदु र होता है।
मीनू वमाा
दीपावली की धूम
नभ के बदले,
धरती पर है,
आज तारे उतरे हुए।
दीपावली का
पवा है, आया।
सबने शमलकर,
धूम मचाया।
अनार फु लझडडयां,
चल रहे हंै।
बच्चे िुशी से
उछल रहे हंै,
आसमान में है
राकाँ े ट की झडी
जमीन पर अनार
रोशनी , कर रही।।
िुशशयों की है,
लडी लगी,
देिो- देिो..
वह फु लझडी।
घर मंे,
लक्ष्मी पूजा हो रही
शमठाइयों की है,
नहीं कोई कमी..
एक दसू रे को सब
शभु कामनाएं है, दे रहे
शमठाइयों का,
आदान-प्रदान है, कर रहे
नभ के बदले,
धरती पर हँै,
आज तारे उतरे हुए।
दीपावली का पवा आया,
सब ने,
शमलकर दीप जलाया।
मीनू वमाा
त्योहार
घर बार गशलयां चौबारे
दीप जला हुए रोशन सारे
हम भी बठै े पलक बबछा के
िशु शयों की राह ननहारे
शमलजुल कर उडने वाली फु लझडडयां
धमू धमाके भरे पटािों की चचगं ाररयां
पकवानों की िुशबू से भरे रसोडे
ककतने बम बच्चों ने फोडे
मां ने िोला ररवाजों का ककवाड
द्वार सजी रंगोली ने बढाई शान
नये कपडों में सजे हम इठलाते गनु गुनाते
बैठक में लगते हुए हंसी ठहाके ।।
सौम्या
दीप जले हंै माटी के
घर- द्वारे आगं न चौबारे
नन्द्हें- नन्द्हें क्यारी -क्यारी
दीप जले हैं माटी के |
खझलशमल- खझलशमल
दहलशमल- दहलशमल
घुलशमल -घुलशमल
दीप जले हैं माटी के |
छाई घर- घर
िबू िशु ी है
दलु ्हन जसै ी
रात सजी है
दीप जले हैं माटी के |
सभी जगह ही
चहल- पहल है
डगर- डगर में
गाँाव- शहर मंे
दीप जले हैं माटी के |
इनकी मदहमा को पहचानंे
िदु जलकर
चमकाता जग को
दीप जले हैं माटी के |
डॉ. सतीश चन्द्र भगत
िशु शयों का त्योहार ददवाली
िुशशयों का त्योहार ददवाली
जगमग- जगमग दीपों वाली
ले जगमग दीपों की माला
भू को पहनाने आयी है |
घर आगं न सब सजे- धजे हंै
हर घर मंे पकवान बने हैं
शलए साथ में िबू उजाला
तमस भगाने आयी है |
छू टे बम नाची फु लझडडयां
मन में भर िशु शयों की लडडयाँा
दिु के घर में डाले ताला
सुि बरसाने आयी है |
डॉ. सतीश चन्द्र भगत
1. आज दीप जले है
श्री राम के धाम मंे
अद्भतु है मदहमा
श्री राम के नाम में
2. अब दीप चमकते
आज अयोध्या धाम में
अद्भतु है मदहमा
सीता पनत श्री राम में
3. दनु नया के हो पुरुषोत्तम तुम
मानवता के उदधारक तमु
सस्य ् श्यामला बसधु ा के
असली ही जग नायक हो तमु
आशीष दीक्षित
दीपावली
मनाओ तमु दीवाली को
बहुत पावन सा ददन है ये
जगाओ तुम दीवाली को
बहुत आनं द शमलता है
जगमगा सी उठी धरती
प्रसन्द्न मन आज होता है
शमठाई घर में भी शमलती
मजा बाहर भी होता है
िुसी चेहरे पर हर ददिती
हमारे प्रभु राम आए है
प्रभु जी आज आए है
अयोध्या धाम आए है
बच्चे जवान या हों बजु गु ा
अशभनन्द्दन श्री राम का करते है
कष्टों मंे पडे हर एक व्यज्क्त
वो सीि श्री राम से लेते है
आशीष दीक्षित
अबकी ददवाली कु छ ऐसे मनाएं
आओ अबकी ददवाली कु छ ऐसे मनाएं,
जग ही नहीं
मन का तम भी भगाएं,
उम्मीदों का हो दीपक
और ववश्वास की हो बाती,
आत्मा जो हो रोशन
और जले ज्ञान जयोनत,
कै सा कफर अधं ेरा,कै सी कफर उदासी,
आओ अबकी ददवाली कु छ ऐसे मनाएं
जग ही नहीं
मन का तम भी भगाएं ।
आज लौटे थे वापस
मयादा ा पुरुषोत्तम,
संग सगं सीता मैया
और थे भ्राता लक्ष्मण,
दीए जल उठे थे
उमंगे खिली थीं,
अयोध्या की धरा को
श्री चरणों की धूली शमली थी,
छवव राम की हम ददलों में बसाएं
मयादा ा को उनकी आचरण में समाएं,
आओ अबकी ददवाली कु छ ऐसे मनाएं
जग ही नहीं
मन का तम भी भगाएं।
प्रेरणा पाररश
जलते ही रहना है
शमट्टी का तन, मस्ती का मन
मैं दीप ! जलते ही रहना है,
आशा की बाती नेह मंे भींगी
जगमग, नतशमर मंे दहना है।
मैं दीप ! जलते ही रहना है
पवता सा हो घनाकार अंधेरा
चाहे मागा मंे ववघ्न हो घेरा
तफू ानों से सामना हो मेरा
सागर की लहरों मंे मचल
ननभीक पोत सा बढना है,
मंै दीप ! जलते ही रहना है।
न राजमहल का वैभव प्यारा
न शभिकु का झोपडी तारा
न इसका सिु , न उसका कारा
उत्सव में श्री है जीवन राग का
शसतारों मंे उन्द्मत सजना है,
मैं दीप ! जलते ही रहना है।
घर की चौिट पर जगमग हूाँ
धरा की हर आगाँ न, पगपग हूँा
नव प्रकाश रव, नव उमगं हूँा
अमर कृ नतयों का यश दपणा
ले दीज्प्त प्रभा आलोक चलना है,
मैं दीप ! जलते ही रहना है
िुशशयों का शलए तराना गाए
नफरत की टहनी भी गाना गाए
नवीन सजृ न का लौ झुम के आए
स्नेह, प्रेम, बंधुत्व, राष्र पताका
शलए उजाला का गहना है,
मंै दीप ! जलते ही रहना है।
सुरेन्द्र प्रजापनत
जगमग दीपक, पगपग उजाला
आज अमतृ बनेगा हर-हर हाला,
नेह की बाती, समपणा की उमगं
उमगं ों में गाए राचगनी मतवाला।
आगाँ न की तुलसी मंे, आशा जला
प्रकाशशत मन, जो उदासी में पला,
श्री वैभव का हर दर जयोनत से भरे
दीया-अश्व नतशमर साधने को चला।
उमगं ों और िुशशयों का मेला लगा
कौन है ? प्रभा से जो दृगों को ठगा,
आशा कक ककरणंे, समु धुर राग में
ककया अशभवादन, लौ भी हषाना े लगा।
सुरेन्द्र प्रजापनत
कफर से दीप जला देना
जो बझु चुका है दीप उसे
आज कफर से उसे जला देना,
ननष्प्राण पड चुका अतं मना
अमर स्वर से उसे जगा देना।
वह अज्नन में दाह नहीं है
जो जला दे शमट्टी का तन,
वह तजे मंे जवाल नहीं है
जो सलु ा दे हौसले का मन।
हृदय का शसतार संिृ शलत हो
राचगनी, ककरण राग सजा देना
आज कफर से उसे जला देना।
तुम नवीन प्रभा भरो जीवन मंे
नतशमरमयी कठोर अंध सघन में
नवीन स्फू नता मंे अहो ! नहाओ
सिु स्वप्न के हर हर नंदन में
आज ददवाली, जगा जगत को
हर घर उपवन जगमग कर देना
आज कफर से दीप जला देना ।
मैं दीघा अधं कार मंे पलने वाला
उत्सव जयोनत की प्यास मझु े है,
वात मचलता प्रणय तफू ान में
उददत शज्क्त पर ववश्वास मझु े है।
ननमला स्नेह से आिं ों का जल
नव ववभा दे तुम चगरा देना
आज कफर से दीप जला देना
तमु नतशमर भेदना, नवीन रचना
करने को, उन्द्मत मैं आऊाँ गा,
कल प्रलय का प्रहार रोकने
आचँा धयों से लडने मंै जाऊाँ गा।
आज आभा का अशभनन्द्दन है
दे उज्जयाला ! घूटाँ वपला देना
आज कफर से दीप जला देना।
सुरेन्द्र प्रजापनत
दीपक एक जला दँागू ा
क्यों जलाऊाँ , मंै दीप वप्रय
वीरान तटों पर पलने वाला,
घोर ननशा के सघन कि में
सौ-सौ पीडा से छलने वाला।
है िशु ी का उन्द्माद हृदय में
जहाँा ननराशा के शलु शमले,
ईष्याा की जलती जवाला मंे
वेदना के ननममा फु ल खिले।
जला दीप था कभी आगँा न में
शोखणत तफू ान ने बझु ा ददया,
आशा की प्रजवशलत दीज्प्त को
दृग के आसँा ू ने सुला ददया ।
मंै वववश अजीणा द्वार पर
िोलो-िोलो प्रकाश सिे,
थोडी उमंग बच्चा लाया हूाँ
रचने को इनतहास सिे ।
नहीं यश सुकृ नत मुझे चादहए
चादहए स्नेह का नुतन आग,
न्द्योछावर कर दँागू ा, बावरी !
शमले जो जोत का ननमला राग।
नव जीवन ने पंि पसारा
लहरों पर प्रेम उगा लँाूगा,
तुम देना एक शशिा संुदरी
मैं दीपक एक जला दँागू ा।
सरु ेन्द्र प्रजापनत