शब्द सत्ता शशल्पी संवाद
भाग 11
दोस्तों!
“शब्द सत्ता” के शशल्पी नामक व्हाटसएप
समहू मंे होने वाली दैननक कववता ववननमय
वववरण आपके सामने प्रस्तुत है| आज
ददनाांक 24.10.2020 को “नारी शक्तत”
ववषय पर साझा की गई कववताओां की एक
झलक देखिए|
डॉ दहमांशा ु शेिर
नारी शक्तत ववशेषाकां
इस अकंा के शब्द शशल्पी गण
प्रेरणा पाररश
डॉ सतीश चन्द्र भगत
शरदकु मार समु न – ज्ञानशे ्वर वेदपाठक (मांरपु कर )
सवु प्रया पाण्डे
सरु ेन्द्र प्रजापनत
मीनू वमाा
आशीष दीक्षित
सौम्या श्रीवास्तव
दीपक चौरशसया
मीनू वमाा
नारी : एक शक्तत
नारी शसर्ा सुांदरता नहींा
पषु ्प सम कोमलता नहींा,
नारी तो एक शक्तत है
नहीां महज आसक्तत है,
नारी गररमा की है उपमा
नहीां शसर्ा सुकोमल ललना ,
रूप और उसका यौवन
ईश्वर प्रदत्त हैं ये गुण,
बदु ्धि, वववेक और िमता
स्वयशंा सद्ि उसके ये गुण,
मतै ्रईे , गागी,अपाला,लोपामुरा
महादेवी ,सरोक्जनी,महाश्वेता,
उच्च शशक्षित नाररयों के हैं कु छ नाम ,
काशमनी है कोमलांागी है
संाग सगंा ववदषु ी वीरांगा ना है,
कभी झांासी की ये रानी है
कभी दगु ाा कभी भवानी है,
कभी सीता है कभी साववत्री
मडै म तयूरी,मैरी कॉम भी स्त्री,
सेवा मंे मदर टेरेसा है ये
सशु ्रषु ा में फ्लोरेंस नाइदटगां ेल,
वीरता में गाुंजन सतसेना है
हर िते ्र मंे दख़ल अब है इसका
अछू ता कोई ना कोना है।
महज सौंदया नहींा नारी
ये तो लोगों इक शक्तत है,
सुदां र शरीर से कहीां ऊपर
होती नारी की हस्ती है।
कोमल है कमजोर नहीां तू ,
शक्तत का नाम ही नारी है।
प्रेरणा पाररश
पग-पग िमा ननभाती नारी
पग-पग िमा ननभाती नारी,
प्रगनत राह पहुँचाती नारी |
अपनी भूल मान लेने मंे,
कहाुँ अधिक शमाता ी नारी |
हो जाए िट्टी- शमठी बातंे,
अनत मनहु ार कराती नारी |
मिरु वचन सनु ाकर अपनी,
धचतां ा दरू भगाती नारी |
मन -मयूर हवषता 'सतीश' हो,
यदद शमले मसु ्काती नारी |
डॉ. सतीश चन्द्र भगत
नारी शक्तत
नारी कभी नही होती अबला I
हरदम ये सबला होती है ॥
राम कृ ष्ण और ककतने मदों को I
रोज जनम ये देती है ॥१॥
शक्तत बुक्दद और युक्तत के I
भंाडार नछपे है इस नारी मंे ॥
माां बेटी बहन पत्नी ये बनकर I
हर पल प्यार से सम्हालती है हमे ॥१॥
कभी शशिा प्रदान है करती I
कभी डॉतटर नसा बनती है I
जब आरोग्य हमारा है ढलता ॥
प्यार से दहर्ाजत करती है ॥२॥
कभी बन देवता मांददर में I
ये हमें है भक्तत शसिलाती II
कभी होती है ये शरू शसपाही I
स्व-रिा का पाठ देती है ॥३॥
देश हमारा है ससंा ्कारी I
हरदम है देता नारी को सम्मान ॥
नारी तो नारायणी हो तमु I
शक्तत प्यार से सबसे महान ॥४॥
के शीराज ..
शरदकु मार समु न -ज्ञानेश्वर वेदपाठक ( मंारपु कर )
चादँु तक पहुांच है उसकी
कर्र भी हाथो में तरे ा हाथ चाहती है
ये पहेली सलु झाऊ मंे
आओ तुम्हे बताऊ औरत आखिर तया
चाहती है
सजती है सवरती है
तरे ी एक नजर को तरसती है
ऐना ककतनी भी तारीर् करे
तरे े बबना अिरू ी है, तरे ी नजर मंे ख़ूबसूरत
होना चाहती है
चाँदु तक....
ददन ढले जब शाम हो
तरे ा रास्ता ननहारती है
बहोत थकी लग रही हो और गले से
लगाना तरे ा
बस तरे ा इतना ख्याल चाहती है
चादँु तक...
क्जन्द्दगी की हो कोई मकु ्श्कल
डर कोई जब सताए उसे
हो कोई ऐसी उलझन
तुझसे कह भी न पाए वो
उस वक़्त बबना शता
सर झकु ाने को तेरे काुँिे का सहारा चाहती
है
चाुँद तक....
िशु शयाां तो तझु से ही बाटंा ेगी तुझपर ही
लटु ाएगी
जब तक सेह पायेगी तझु े कु छ न बताएगी
िुद से टू टने लगे हार से अांदर ही अांदर
घुटने लगे
तमु ्हारी उुँ गशलयों के बीच अपनी उुँ गशलयों
की धगरह
तरे ा ववश्वास तरे ा साथ शसर्ा और शसर्ा
तरे ा प्यार चाहती है
चादँु तक....
सवु प्रया पाण्डे
तमु सबल हो
तयों हो बेवस, तयों बेहाल हो
तयों मायूस ही ववलिती हो,
लज्जा वसन छीन गई , वथृ ा
कहो तयों,मौन शससकती हो ।
तमु ममता, त्याग की महामनू ता
वववश तयों ? जीवन जीने मंे,
तयों हार चकु ी अपनी बाजी
अतंा र न जला, ववष पीने में।
अपने अतीत के पन्द्नों पर
तयों लाचार, बलहीन हो तुम,
तमु जनक सुता सुकु मारी हो
अनरु ाग त्याग, तजे हीन हो तुम ?
तोड़ो मौन का व्रत सज लो
चंडा ी, दगु ाा, भी नारी थी,
पद्मा, लक्ष्मी को दनु नयांा जाने
वो अद्भतु शौया की न्द्यारी थी।
तुम सबला बन आािं ों मंे, अब
नीर नहीां, नव अनल बसा ले,
कोमल, मिरु ी, सरल वीणा पर
हो, बशलदान का राग सजा ले।
वतत नहींा, वप्रय-प्रेशमका बन
वासना मंे डु ब उतरने की,
वप्रये, बनो तुम महाजीवन का
अक्स्मता की वाण, बरसने की।
तुम सबल हो ननमाणा सकृ ्ष्ट का
माता बन अमतृ , वपलाने वाली,
ददनकर से कु छ ऐसी प्रभा लो
जगमग िरती , हरसाने वाली।
तुम कांानत बन इस दनु नयांा में
दहम शशिर पर जा सकती हो,
कु छ नई उशमया ाँु, कु छ नई कलाएां
ब्रहमांडा को ददिला सकती हो।
सुरेन्द्र प्रजापनत
थोड़ी शक्तत हमें भी दे दो
मझु गरीब को भी, हे अंबा े,
थोड़ी शक्तत दे दे तू आज,
बरु े लोगों को जड़ से शमटा दां,ू
ऐसा कर दंाू ,कु छ चमत्कार।
आिां ें भी सब देि सके मांा,
अपादहज भी चल सके आज,
इस अमंगा ल दनु नया मंे ,मांा
कर दंाू ,कु छ ऐसा ववनाश।
दहमालय में लग जाए आग माां,
झरनों के जल भी,
जल जाए आज,
जाड़े में भीषण गमी का,
िड़का दो मांा ,तमु प्रलय िार,
क्जसमें जलकर हो जाए, ख़ाक
क्जतने हैं लोगों के , कु ववचार,
इस दनु नया मंे पािंाडओंा का
कर दे अांत, मांा आज की रात।"
मीनू वमाा
नारी शक्तत
शक्तत का स्वरुप है नारी
भक्तत का प्रनतरूप है नारी
प्रेम का पयााय हैं नारी
मन को चदां न करती है नारी
कदठन राह में थकी रगो में
नया रतत दौड़ाती नारी
कई रूप में ददिती है यह
मांा बेटी पत्नी बनती है
नारी तो बहती जलिारा
ननमला मन और शुद्ि ककनारा
हर रूपों मंे ढल जाती है
सकृ ्ष्ट का वरदान यही है
अवरोि नहीां वरदान है नारी
जीवन का आिार है नारी
प्रकृ नत का दजू ा नाम है नारी
देवों में सवोच्च है नारी
आदद शक्तत का रूप है नारी
वतत पड़े तो िड़क उठा ले
नारी दगु ाा बन जाती है
दशु ्मन ज्यादा आतताई हो
नारी काली बन जाती है
तुम्हींा सुभरा, तुम्हींा अवांती
झलकारी बाई हो तुम
राष्र चेतना की अलि जगाने
वाली लक्ष्मीबाई हो तुम
आशीष दीक्षित
बेटी तरे ी कहानी
वह आयी तो बोले , वपता के घर आई
लक्ष्मी है।।
प्यारी बेटी, वपता के अिरो पर छाई िुशी
है
बेटी है तो वपता का क्जदां ा स्वाशभमान है
भाई की कलाई बांिे िागे की पहचान है
बेटी है तो प्रकृ नत है ,सजृ न है
बेटी है तो प्यार से परोसा व्यंजा न
बेटी है तो ककलकाररयाां और उमगां है
बेटी है तो संास्कार और ननयम है
बेटी है तो इनतहास मंे क्जांदा कहाननयांा है
बेटी है तो लक्ष्मीबाई सी राननयांा है
मांददरों में पत्थरों मंे देवी माां को पजू ते हो
और जीती जागती बेबस को उन्द्हींा पत्थरों
मंे र्े कते हो
शमल गए गर कभी यंाू पत्थरों में प्राण,
उन प्राणों का तया क्जनका तमु ने ककया
अपमान?
बशलदान की देहरी पर तयों बेदटयांा ही दम
तोड़ती ?
तयों ऐसा है कक आज भी बेदटयांा ही
शससक शससक के रोती हंै?
सौम्या श्रीवास्तव
हे नारी! हे सदा सबल!
हे नारी!
अब रूप िरो
दगु ाा, काली, शतचाडं ी का,
जग के असरु ों का नाश करो
सहंा ार करो पािाडं ी का।
तमु बन मदहषासुरमददानी,
ववनाशशनी हे कवपददानी।
जग में असखां ्य हैं रततबीज
व शुम्भ ननशाुभं के प्राण हरो,
कलवु षत ववचार को हर लेना
जन जन के दहय में प्रणय भरो।
हे नारी!
हे जगजननी!
तुम सजृ नकार हो सवशा ्रेष्ठ,
तमु जन्द्मदात्री मातशे ्वरी
चर अचर जीव मंे परम ज्येष्ठ।
नारी महान हर रूपों में
भधगनी, भायाा, तनया, माता,
बबन नारी के सकृ ्ष्ट शून्द्य
और कोई नहीां जीवन पाता।
तमु मंे रािा सा प्रीत भी है,
पररत्यक्तत, ववरह का रीत भी है।
तुम सदहष्णुता की मूनता सी हो,
हर िेत्र कमा की पूनता सी हो।
हे नारी!
हे सदा सबल!
तुम हो ववनम्र
तुम हो प्रबल,
सकृ ्ष्ट के काज और कमा
होते हैं तमु से ही सर्ल।
तुम हो असीम तुम ही अनतां ,
तुमसे ही सजृ न तुममें ही अंता ।
दीपक चौरशसया
नारी शक्तत
मत समझो
लाचार हमें,
टू टी हुई,
कु छ डाल हमंे,
अनपढ़, बेबस
असहाय हमंे
ननराश, नन:शस्त्र
बेकार हमंे।
उठ गए क्जस ददन
ये हाथ सभी,
गढ़ लेंगे,
वही आकाश नई,
काँपु ेगंे बुरे ,पािाडं ी सभी
थराायेगी ये
अबंा र -जमी।
एक -एक शब्द
वपरोकर हम,
शंािनाद बनाएंागे ऐसा,
सुनकर सहमेगी क्जससे
यहांा क्स्थत
दशु ्मन की सेना।
अन्द्याय सहन ना
होगा अब,
टू टेगा पावपयों का घमडां ।
एकजटु होकर जब
उठंे गे हम,
हो जाएांगे
पािांडडयों के िडां ।
माागं ेंगे कु कृ त्यों की
मार्ी जब
शसर्ा ....,
कठोर दांड,
उसे ददलवाएंागे हम।"
मीनू वमाा