शब्द सत्ता शशल्पी सवं ाद
दोस्तों!
“शब्द सत्ता” के शशल्पी नामक व्हाटसएप
समूह में होने वाली दैननक कववता ववननमय
वववरण आपके सामने प्रस्तुत है| आज
ददनांाक 11.10.2020 की एक झलक देखिए|
डॉ दहमाशंा ु शेिर
कृ ष्ण भक्तत
*ऐसे भक्तत मोहे भावे उद्धवजी,*
*ऐसी भक्तत मोहे भावे !*
*सरवस त्याग मगन होय नाचे,*
*जनम-करम गुन गावे॥*
*कथनी कथे ननरांतर मेरी,*
*चरन कमल चचत लावे।*
*मुि मुरली, बहे नयन जलधारा,*
*जब वे कर से ताल बजावे।।*
*ऐसे भक्तत मोहे भावे उद्धवजी......।*
*जहाां चरन देत ऐसो जन मेरो,*
*सकल नतरथ चली आवे ।
*उनके पदरज अंाग लगावे,*
*कोटी जनम सिु पावे ॥*
*उनकी मुरनत मेरो हृदय बसत है,*
*जो मोरी सूरत लगावे ।*
*बशल बशल जाऊां श्रीमिु बानी,*
*सूरदास बशल जावे ॥*
*ऐसे भक्तत मोहे भावे उद्धवजी.......।*
श्री अरूण कु मार दबु े, पटना
शाम के नाम : .....दपणप दे
ईश्वर !
तन ददिा ददया तूने मझु को
मन ददिा नहीां पर, हे दपणप !
मत मकू िड़ा रह, यों समक्ष
मझु को ददिला, मेरा अतां मनप .
देिूँ मंै अपने ववगत कमप
देिूँ अपने कलवु ित ववचार,
कु छ ऐसा दपणप दे ईश्वर !
देिूँ अंातमनप बार बार ….
मेरे जीवन की भािा को
मंै िुद ही समझ नही पाया
जो शसिलाया औरों ने हमे
जीवन भर उसको दोहराया ।
पढने दे ब्रह्म का लेिन भी
अब पढने दे अपना जीवन
मंै अांतमनप मे झाकँू सकूँ
दे ईश्वर! दे ऐसा दपणप ।
- प्राणेन्द्र नाथ शमश्र, कोलकाता
ददिता सब को जो अांतमनप
पववत्र हो जाता सबका जीवन,
राग द्वेि बरै शमट जाते
गंजाू ती िुशशयों की तरांग।
प्रेरणा पाररश, ददल्ली
मैं तरे ी दहदंा ी भािा हूंा
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समदृ ्ध रसीली भािा हूां
मधरु हूंा राजभािा हूां,
संुादर शब्दों का कोि हूां मंै
सासं ्कृ नत का उदघोि हूंा म,ैं
अपमाननत फिर भी हूंा पड़ी हुई
ववरोध से अपने डरी हुई,
सम्मान क्जसका बहुप्रतीक्षक्षत है
अपने घर ही जो उपेक्षक्षत है
मैं ही वो बेबस दहदां ी हूंा।
सरू के पदों की शोभा हूां
महादेवी की नीरजा हूंा म,ंै
प्रसाद की हूंा मैं कामायनी
कबीर के दोहों की राचगनी हूां ,
जनकवव ददनकर की कृ नतयांा
मझु से ही हुंाकार भरंे,
पंता ननराला की रचनाएां
मेरा ही श्रगांृ ार करें ,
मैं हूंा रैदास की वाणी मंे
मैं प्रेमचदंा की कहानी में,
मैं ही भूिण की हूंा शक्तत
मंै ही हूंा मीरा की भक्तत,
बच्चन की मैं मधुशाला हूंा
ससंा ्कारों की पाठशाला हूंा,
जनमानस की आशा हूंा
मैं तरे ी दहदां ी भािा हूंा।
सवापचधक प्रयोग मंे आती हूंा
ददलों में सब के मैं समाती हूंा,
देिो मुझको पहचानो तमु
महत्ता को मेरी जानो तमु ,
मेरा यथोचचत सम्मान करो
मझु को उचचत स्थान भी दो,
शशमदंि ा तयूंा हो गवप करो
प्रयोग मेरा सहिप करो,
मंै तरे ी अपनी भािा हूंा
मैं तरे ी दहदां ी भािा हूंा।
प्रेरणा पाररश, ददल्ली
एक राधा कृ ष्ण की प्रेम कहानी
दजू ी सधु बधु िोये है मीरा दीवानी
उसकी मरू त को ही मान वपया जी
मोहन की दलु ्हन बनी थी सयानी
कै से प्रमाखणत करती वो जग को
कृ ष्ण को ही है सब कु छ माना
हो माधव को भी उसके प्रेम पर भरोसा
बबन सोचे वपया उसने ववि भरा प्याला
कै से ददिाए ववरह की वो पीड़ा
आिँू ों से बहती हुई अश्रु धारा
जो है वो कन्द्हैया वो छशलया बड़ा है
हर ओर गोवपयों ने पहरा है डारा
कृ ष्ण मूरत को मन मंे बसाये हुए है
सुबह शाम उसमे समाये हुए है
इस पावन प्रीत का कभी तो उसे भी
एहसास होगा
यही एक आशा लगाए हुए है....
सवु प्रया पााडं ये (" शसया "), ददल्ली
चलते चलते :-
चाहे पथृ ्वी हो या हो अबला
देती तुमको अनंा तम पुकार,
मेरा क्षय, तेरा मतृ ्यु-ददवस
हे मानव! तरे ा ही संाहार…
प्राणेन्द्र नाथ शमश्र, कोलकाता
छोटी कववता गहरा सांदेश
तूने तया सोचा था मानव
पथृ ्वी अब ये तरे ी है,
पालनहार धरा का तू ही
सकृ ्ष्ट भी ये तरे ी है,
सांभल भी जा अब
तज दे भुलावा,
अपनी भलू ों से ले कु छ सीि
जो अब ना सुधरा तो सधु रेगा कब
जब प्रकृ नत छीनेगी जीवन की भीि!!!
प्रेरणा पाररश, ददल्ली