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Published by Himanshu Shekhar Hindi Poet, 2020-10-16 12:15:07

16.10.2020

16.10.2020

शब्द सत्ता शशल्पी संवाद
भाग 06

दोस्तों!

“शब्द सत्ता” के शशल्पी नामक व्हाटसएप
समूह मंे होने वाली दैननक कववता ववननमय
वववरण आपके सामने प्रस्तुत है| आज
ददनांका 16.10.2020 की एक झलक देखिए|

डॉ दहमााशं ु शेिर

इस अंका के आकर्णष

शशल्पी गण

सरु ेश वमाष
मीनू वमाष
सरु ेन्द्र प्रजापनत
अरूण कु मार दबु े

प्रेरणा
राके श वमाष
डॉ. सतीश चन्द्र भगत

कसक

हर बार, मेरे ही साथ
बरु ा क्यों होता है ?
पथ जो भी चनु ता हूँ,
इतना सख्त और
िुरदरु ा क्यों होता है ?
मैं तो अपनों के बीच शरु ू से ही
प्यार बाटां ता रहा,
पर अपनों की आस्तीन मंे
मेरे शलए कहो न छू रा क्यों होता है ?
ववश्वास पर अनवरत वार होता रहा

परछाईयों से शलपटकर
रात के अके ले अांधेरे मंे, बदहवास

होकर रोता रहा
और सोचता रहा
कक कु छ लोगों का ख्वाब
इतना आधा- अधरू ा क्यों होता है?
कल डरत-े डरते अपने नसीब से

पूछ ही शलया
कक दनु नयांा के तमाम दिु ों से
मेरा ही नाता जड़ु ा क्यों होता है ?

सुरेश वमाष

जीवन जांग नहींा काटां ों का

जीवन जंाग नहींा काांटों का
फू लों का यहांा बसेरा है।
कटु ता ही शसफष नहींा इसमें,
मधुरता का यहाां डरे ा है।
क्यों बठै े हो उदास होकर?
यहांा उमंगा ों का घेरा है।
क्यों भाग रहे हो,तपोवन से,
यह उपवन भी तरे ा है।

जीवन जगंा नहींा काटंा ों का

फू लों का भी यहांा बसेरा है।
हारना नहीां है, काम तुम्हारा

यह मधबु न भी तरे ा है।
उठो..साकार करो िदु को
यह जीवन शसफष तेरा है।
बेकार करो ना इसे रुक कर
यहअमूल्य समय धन तरे ा है।

डर जाओगे यदद बीच राह में,
मजंा जल को, कै से पाओगे?

पराजय से घबरा जाने पर ।
ववजयी कै से कहलाओगे?

अाधं कार से यदद डर जाओगे
रौशनी कै से पहचानोगें
डर जाओगे दरू ी से यदद

मजंा जल कै से पास लाओगे?

हारोगंे दहम्मत यदद अपनी
जीत को कै से पाओगे?

ववचशलत होगे यदद तफू ानों से
उड़ान कै से भर पाओगे?
जीवन जंाग नहींा कांाटों का
फू लों का यहाां बसेरा है।

मीनू वमाष।

आगमन कववता का

नूतन शब्दों के पररधान मंे
शलपटी कववता
नव प्रभात में

तरुण रजश्मयों में नहाई
मसु ्कु राती, गुनगुनाती
सजनष ा के गीत गाती

घनाकार अूँधेरे को चीरती
सुलगती, चहकती
आ रही है

सुभावर्तों में छा रही है

हो रहा है मंगा लाचरण
बबदहगां ावली के स्वर में
सुमन समूह के कर मंे

कववता !
अपने नए रूपकों मंे

आ रही है,
शाही शब्द सता के साथ
उदाशसयों के नतशमर को
ववर्ाद के कड़वे तीर को

करने अनां तम संास्कार

उस के शसर पर होगा
कवव का हाथ

सरु ेन्द्र प्रजापनत

मौत से साक्षात्कार

मौत सबको आनी है, कौन इससे छू टा है।
तूफ़ान नही होगा,ये ियाल झूठा है।।
सासूँ टू टते ही सब ररश्ते टू ट जायगंे े।
बाप माूँ बहन बीवी बच्चे छू ट जायगें े।।

तरे े जजतने हंै भाई वक़त का चलन देंगे।
छीनकर तरे ी दौलत, दो ही गज़ कफ़न
देंगे।।

जजनको अपना कहता है, सब ये तरे े साथी
हंै।

कब्र है तरे ी मांजज़ल और ये सब बाराती
हंै।।

ला के कब्र में तझु को मदु ाष बक डालेंगे।
अपने हाथों से तरे े मूँुह पे िाक डालेंगे।।
तरे ी सारी उल्फ़त को िाक में शमला देंगे।

तरे े चाहनेवाले कल तझु े भलु ा देंगे।।
इस शलये ये कहता हूँ िबू सोच ले ददल

में।

क्यूँ फंा साये बठै ा है जान अपनी मजु श्कल
मंे।।

कर गनु ाहों पे तौबा, आ के बस सम्भल
जाय।ंे

दम का क्या भरोसा है, जाने कब ननकल
जाये।।

अरूण कु मार दबु े

वन राह पर चलो पथथक

जीवन राह पर चलो पथथक
जीवन प्रवाह में बहो पथथक,

रुकना नहीां चलते जाना
ठोकर िाकर ना घबराना,
ववपदाएंा भी कु छ आएांगी

गम की रातंे डराएांगी,
छाएांगी कभी घटाएंा काली
कभी हकीक़तें रुलाएांगी,

जीवन राह पर चलो पथथक
जीवन प्रवाह मंे बहो पथथक।

सुि के भी पल आएांगे
कु छ जीवन से हम पाएांगे,
कु छ सपने सच हो जाएांगे
सफलता का परचम लहराएंागे,
पत्थर पर भी फू ल खिलाएंागे

गुलशन को महका सा बनाएंागे,
जो पल पाए हैं जीवन के

उनको जीभर के जी लें हम,
समय तो चलता रहता है
दिु जाता है सुि आता है,

वक़्त कभी ठहर ना पाता है,
अभी रात भले ही आयी हो
गम की बदली भी छाई हो,
कल कफर से सूरज आएगा

अधां ेरा दरू हटाएगा,
मन का हो नतशमर या ननशा काली

कोई भी दटक ना पायेगा,

जीवन राह पर चलो पथथक
जीवन प्रवाह है बहो पथथक।

प्रेरणा

एक संसा ्मरण

आज भी याद है वो तरे ा आसमानी सूट मंै
सामने आना

आकर बहुत सलीके से सामने बैठ जाना
वो िलु े हुए बाल से िशु बू का आना
और होंठो पर हल्के से मुस्कु राना
वो चोरी से मझु े देिना और

हल्की सी झलक पाकर शसर झकु ार बैठना

वो घर वालो का हमसे बात करने को
कहना

और बड़ी सहजता से तरे ा वो सारे उत्तर
देना

और कफर हमारे अलग जो जाने के पल का
आ जाना

मेरा तुम्हे चेहरे के ओर देिते रह जाना
इन सब बातों का वववरण हृदय मे आज

भी है

सारी छोटी छोटी बाते ददल मे आज भी है

इसशलए शायद हमारा प्यार अभी तक
धशू मल नही हुआ है

इतने उरर चढ़ाव के बाद और पररपकत्व
हुआ है

उस ददन जैसे देिा था धीरे धीरे कमरे से
बाहर आते हुए

आज भी देि लेता हूां वसै े ही नज़र आते
हुए

राके श वमाष

खिलकर महके

फू लों सी िशु बू
बबिराकर

काटंा ों के बीच भी

खिलकर महके |
बाधाओंा से डरकर

अपने मागष से
क्यों भटके |
सुस्त बनकर

क्यों चलें
नई उमगंा ें लेकर

बढ़ चलें
मीठी बोली की
िशु बू ननकले |
ववपदाओां के नघरे बादल
कफर भी क्यों घबरायंे

पग बढ़ायें
हंास- हांसकर
गले लगाकर
सबसे शमल लंे |
भेदभाव धमष के नाम पर
मानवता को क्यों भलू ायंे
धमष के झगड़े छोड़कर
कली- कली मानव बथगया की
सिु मय संासार लगे
बबिरे सुगंधा ननकले |

डॉ. सतीश चन्द्र भगत


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