जिससे आप वाक़ई मुहब्बत करते हैं उसके अनोखे
खिचं ाव से ख़दु को ख़ामोशी से खिचं ने द।ें
यह आपको भटकने नहीं देगा।
रूमी
प्ेरर ित हों
आदतंे छोड़ने और विकसित
करने की कला
भाग 1
इस नई शखंर्ृ ला में दाजी योग के ज्ञाान को उन तरीक़ों के साथ जोड़ रहे हैं जो हमारे व्यवहार व आदतें बदल
सकते ह।ंै वे हमंे अपने सोचने और महससू करने के तरीक़ों का मलू ्याँकन करने के लिए कहते हैं ताकि
हमारी प्रवृत्तियाँ परिष्ृकत हों और हम अपनी जीवन शलै ी को श्रेष्ठ व अच्छी बनाने की कोशिश करे।ं
प्रेरित हों
हम एक विचार बोते हंै और एक कर्म प्राप्त करते हं;ै हज़ारों वरष् पूर्व अपने योग सूत्रों मंे महान ऋषि पतंजलि ने यम एवं
हम एक कर्म बोते हैं और एक आदत प्राप्त करते ह;ैं नियम के अभ्यास के महत्व को प्रस्तुत किया था जो अष्टांग योग के
हम एक आदत बोते हंै और चरित्र प्राप्त करते ह;ंै पहले दो अंग है।ं इन दोनों अभ्यासों के पीछे का विचार वास्तव मंे
बहुत सरल है -
हम चरित्र बोते हैं और नियति प्राप्त करते ह।ैं
“ग़लत भावनाओं व विचारों को त्यागना ‘यम’ है। यम का
19वीं सदी की कहावत अर्थ है त्यागना। वास्तविकता जानने की चाहत और
वास्तविकता के बारे मंे सोचना ‘नियम’ है। यम का अर्थ है
विचार, कर्म, आदतंे, चरित्र एवं नियति उपहार न लेना, चोरी न करना, झूठ न बोलना आदि। ‘यम’
हृदय से अनचाही चीज़ों को निकाल देना है जबकि ‘नियम’
यह प्रसिद्ध और अक्सर उद्धृत की जाने वाली अंग्रेज़ी कहावत हृदय मंे आवश्यक गुणों को डालना है।” 2
‘कारण और प्रभाव’ के सरल से क्रम पर आधारित है। यही विचार
चीन के साहित्य मंे, बाइबिल में और बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग एवं दूसरे शब्दों में कुछ विशेष विचार, भावनाएँ और आदतें हमंे
ऋषि पतंजलि के अष्टांग योग मंे भी निहित है। दूसरे शब्दों मंे यह ईमानदारी का जीवन जीने के लिए प्रेरित करती हंै और अन्य हमें
सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से सभी संस्कृतियों मंे सराहा जाता है। उससे दूर ले जाती हं।ै हमारा उद्ेदश्य है, उन अनचाही आदतों को
छोड़ना जो हमंे उससे दूर ले जाती हैं और विकासपरक आदतें
इसके स्पष्ट सन्देश के बावजूद, पिछले कुछ दशकों मंे चरित्र को विकसित करना जो हमंे ईमानदारी की ओर प्रेरित करती हंै। बुराइयों
बहुत कम वरीयता दी जाती रही है जिससे संसार में भ्रष्टाचार, झूठी से छुटकारा पाने के लिए मैं संघरष् क्यों करता रहता हँू और उन
व ग़लत ख़बरे,ं डिजिटल उपकरणों की लत, अमीरी-ग़रीबी मंे अति चीज़ों को, जो मेरे लिए अच्छी हैं, अपनाना इतना कष्टदायी व
और वातावरण का अनियंत्रित विनाश बढ़ गया है। शायद इन सभी कठिन संघर्ष क्यों लगता है?
समस्याओं के कारण लोगों में मूल्यों व चरित्र निर्माण के प्रति रुचि
पुनर्जागृत हो रही है। इस पुनर्जागृति को ‘नैतिक क्रांति’ का नाम किसी भी शानदार फिल्म या महान उपन्यास का प्रभाव इस बात पर
दिया गया है। 1 एक बार फिर से नैतिकता का प्रचलन हो रहा है निर्भर करता है कि उसका अंत कसै े होता है विशेषकर इस बात पर
और जेम्स क्लियर की ‘एटॉमिक हैबिट्स’ जैसी क़िताबें सबसे कि अच्छाई बुराई पर कैसे हावी होती है। चरित्र का बहुत महत्व
ज़्यादा बिक रही हैं क्योंकि लोग अपनी समस्याओं का हल और होता है और अंदर ही अंदर हम सब यह जानते हैं। चाहे जेन
बदलने के तरीक़े ढढूँ रहे हंै। यहाँ हम मिलकर वैचारिक प्रदूषण के ऑस्टिन का उपन्यास हो, एक स्टार वॉर की फिल्म हो या मार्वल
कारणों को जानने का प्रयास करगें े जो कई बुराइयों के परिणास्वरूप की कॉमिक हो, हम हमेशा यही चाहते हंै कि बुराई पर अच्छाई की
पैदा होता है और कई बुराइयों का कारण भी बनता है। जीत हो। हम मंे अच्छाई बनाम बुराई की समझ अब भी मौजूद है
और ऐसा समाज के सभी वर्गों में है। जब बात हमारे बच्चों की आती
यम एवं नियम है तो हम चाहते हंै कि उनमें वो सद्गुण विकसित हों जिन्हंे हम
महत्व देते ह,ैं जैसे ईमानदारी, सच्चाई, करुणा, विनम्रता, विवेक
प्राचीन से लेकर आधुनिक दार्शनिकों व विचारकों ने चरित्र निर्माण और सहज दयालुता। इस समय, चरित्र-निर्माण समाचारों मंे चर्चा
और अच्छी आदतें बनाने की सराहना की ह,ै आलोचना या तिरस्कार का एक लोकप्रिय विषय भी बन गया है, शायद हाल ही के इतिहास
करने के उद्देश्य से नहीं बल्कि मारग्दर्शन व प्रेरणा देने के लिए। इस मंे सबसे ज़्यादा इस समय।
श्ंरृखला मंे मंै विशेष रूप से हमारी आधुनिक आवश्यकताओं के
सन्दर्भ में यम एवं नियम के युगों पुराने यौगिक सिद्धांतों पर केंद्रित फिर भी, यह सब कुछ जानते हुए भी हम में से अधिकांश लोग
रहना चाहूँगा। अपने आदर्शों पर खरा उतरने में जूझ रहे हैं। बहुत ही व्यक्तिगत
जनवरी 2021 59
प्ररे ित हों
स्तर पर, कभी हम अपने प्रियजनों पर क्रोधित होकर उन्हंे चोट नैतिक बुद्धिमत्ता के वल सही और
पहँुचाने वाली बातें कहते हंै अथवा सामना करने से बचने या ग़लत जानना ही नहीं है - हम में से
परिस्थितियों से बचने के लिए झूठ बोलते ह।ैं कभी हम स्वार्थी ढगं ज़्यादातर लोग इस फ़र्क को
से बर्ताव कर सकते ह,ंै दूसरों को धोखा दे सकते हैं, उनसे कछु जानते हंै - इसका अर्थ है हर दिन
चुरा सकते हैं और प्रगति के नाम पर मासूम जीवों की हत्या कर के हर पल मंे सही चनु ाव करना।
सकते है।ं फिर कुछ न करने वाला व्यवहार भी होता है जिसका यह उन चीज़ों के बारे मंे है जिन्हंे
अर्थ है कि अपने परिवारों में, समुदायों में और समाजों मंे होने वाली हम सोचते हैं, महससू करते हंै,
अनैतिक बातों को नज़रअंदाज़ करना और उन्हें रोकने के लिए कछु करते हंै और नहीं करते हंै।
न करना। नतै िकता का पालन करने से ही
चरित्र का निर्माण होता है।
नैतिक बुद्धिमत्ता
नैतिक बुद्धिमत्ता केवल सही और ग़लत जानना ही नहीं है - हम मंे
से ज़्यादातर लोग इस फ़र्क को जानते हंै - इसका अर्थ है हर दिन के
हर पल मंे सही निर्णय लेना। यह उन चीज़ों के बारे मंे है जिन्हें हम
सोचते ह,ंै महसूस करते ह,ैं करते हंै और नहीं करते हैं। नैतिकता का
पालन करने से ही चरित्र का निर्माण होता है। इसमें हमारे व्यवहार
के देखे-अनदेखे, सभी पहलू शामिल होते ह।ैं यू.एल.सी.ए.
(ULCA ) के महान बास्केटबॉल कोच, जॉन वुडन ने एक बार
कहा था, “इंसान के चरित्र की सच्ची परीक्षा इस बात से होती है कि
वह उस समय क्या करता है जब उसे कोई भी देख न रहा हो।”
नैतिकता व चरित्र-निर्माण मंे अपने व दूसरों के प्रति हमारे कर्तव्य
और उत्तरदायित्व भी शामिल होते हैं। इसे योग में ‘धर्म’ कहा जाता
है। हम सामाजिक प्राणी हंै और यदि हम मानव जाति के सक्रिय
सदस्य बनना चाहते हैं तो हमें अपने आप से यह प्रश्न पूछने की
ज़रूरत है - “मुझे किस तरह की जीवन शैली को अपनाना चाहिए
ताकि मंै अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने में सक्षम बनँू?” शुरू करने
के लिए, हमारा जैविक कर्तव्य है अपने बच्चों की देखभाल करना
जैसा कि सभी वयस्क स्तनधारी जीव करते हैं। यह इंसानों के मामले
में बहुत ज़रूरी है क्योंकि बच्चों को कई वर्षों तक देखभाल की
ज़रूरत पड़ती है। फिर भी आजकल आमतौर पर हम देखते हंै कि
माता-पिता इस कर्तव्य को व्यावसायिक लोगों व शिक्षकों को सौंप
देते हैं ताकि दोनों पूरे दिन नौकरी कर पाएँ। माता-पिता, दादा-दादी
और नाना-नानी अक्सर मुख्य रूप से अपने बच्चों की देखभाल
करने वाले नहीं होते हैं। मैं इस प्रचलन का आँकलन नहीं कर रहा
हँू, कवे ल साक्षी भाव से देख रहा हँू। यह बात ध्यान देने योग्य है कि
60 हारट्फलु नसे
प्ेरर ित हों
हम एक ऐसी स्थिति में पहुँच चुके हैं जहाँ अपने ही बच्चों के देखंगे े, आपको कोई नयापन नहीं महसूस होगा। वास्तव म,ें योग ने
पालन-पोषण करने के नैतिक कर्तव्य की उपेक्षा की जाती है। यह सदैव उन्हीं मूलभूत मानवीय मूल्यों का समर्थन किया है जिन्हंे हम
हमारे समाज के बारे में क्या बताता है? हमें अपने बच्चों को दिन भर आज भी अत्यधिक महत्व देते ह।ैं इससे हम यह अनुमान लगा
अजनबियों, शिक्षकों और डिजिटल बेबीसिटर जैसे टीवी, मोबाइल सकते हंै कि उस समय के लोग भी उन्हीं कमियों, कमज़ोरियों और
की देखभाल मंे छोड़ने की नैतिकता के बारे मंे अपने आप से प्रश्न चरित्र के दोषों के साथ जूझते होंगे जिनके साथ हम आज जूझ रहंे
पूछना चाहिए। हं।ै शायद हम आज उन्हंे कछु अलग नामों से पुकारते हंै लेकिन
पारम्परिक रूप से हमारी कछु ज़िम्मेदारी अपने विस्तृत परिवार के वास्तव मंे अपने आदर्शों के बारे में हमारी जागरूकता तब से लेकर
सदस्यों के प्रति, अपने स्थानीय समुदाय के प्रति, इसके आगे समाज आज तक क़ायम है।
के प्रति और अपने विस्तृत पर्यावरण - पृथ्वी एवं उसके वायुमंडल इसके विपरीत, पतंजलि के युग से अब तक इन आदतों को
के प्रति भी है। पृथ्वी की ज़िम्मेदारी उठाने के सिद्धांत को सभी धर्मों विकसित करने के बारे मंे हाल ही मंे कछु बड़े बदलाव हुए हैं। उनमें
के साथ-साथ ग़ैर-सांप्रदायिक समूहों - जैसे पर्यावरण परिवर्तन से एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि प्रतिदिन के गृहस्थ जीवन को
अभियान तथा बकमिन्स्टर फलु र की ‘ऑपरेटिगं मैन्युअल फॉर अब यौगिक अभ्यास, विशेषकर ‘यम’ व ‘नियम’ को विकसित
स्पेसशिप अर्थ’ - ने महत्व दिया है। करने के लिए बहुत ही उपयुक्त जीवन शैली माना जाता है। पतंजलि
के समय में योगी प्रायः ब्रह्मचारी, सन्यासी और भिक्षु थे जो आश्रमों,
ये अनेक विषयों में से कछु विषय हंै जो नैतिक बुद्धिमत्ता के अंतरग्त मठों, जंगलों और पहाड़ों में रहते थे जबकि आधुनिक योगी शहरों मंे
आते हंै और ये एक गहरी समस्या की केवल छोटी सी
रहकर परिवार और व्यवसाय को एकसाथ
झलक हैं। लेखों की इस श्रृंखला का उद्ेदश्य किसी
संभालने के साथ-साथ ज्ञानोदय के
व्यक्ति या समाज पर उंगली उठाना नहीं है
मार्ग का भी अनुसरण करते ह।ंै
बल्कि हमें प्रेरित करना है जिससे हम
थोड़ा रुककर उन आदतों के लिए अस्तेय वास्तव म,ंे गृहस्थ जीवन
अपने हृदय से सहायता लंे जिन्हें और नौकरी की चुनौतियाँ
ईमानदारी चरित्र-निर्माण और
हम अपने दैनिक जीवन में आदतों को बनाने के
विकसित करना चाहते हैं सत्य ब्रह्मचर्य लिए उत्तम कर्मभूमि
और फिर बदलना चाहते हंै। ह।ंै इसके
यदि हम वर्तमान के इस सच्चाई इन्द्रियों का परिणामस्वरूप
अनिश्चिततापूर्ण समय का संयम ‘यम’ एवं ‘नियम’
यम
उपयोग समझदारी से करें तो के बारे मंे हमारा
यह एक अहम अभ्यास होगा दृष्टिकोण भी
जो हमंे भविष्य के अनुकलू अहिसं ा अपरिग्रह विकसित हुआ है
बनने में मदद करेगा। किसी को हानि संग्रह न करना और जिससे मानवीय रिश्तों
न पहुँचाना अधिकार न जमाना और सामूहिक जागरूकता
आदतंे विकसित करने में के क्षेत्र भी इसमें शामिल हो गए
योग की भूमिका हैं। हमारी कने ्द्रीयता ‘मंै से हम
तक’ विकसित हुई है।
इस अन्वेषण का आरम्भ पतंजलि योगसूत्रों के ‘यम’ एवं चलिए पहले हम पतंजलि के पाँच यमों - अहिंसा, सत्य, अस्तेय,
‘नियम’ से होता है। पतंजलि ने किन आदतों और गुणों को अच्छे ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के संक्षिप्त विवरण से शुरू करते ह।ंै
जीवन के लिए ज़रूरी माना है? जैसे-जैसे आप उनकी सूची को
जनवरी 2021 61
प्ेरर ित हों
आतं रिक रूपांतरण से ही बाह्य
परिवर्तन उत्परेर् ित होता है।
प्राचीन काल मंे इन पाँच यमों का अभ्यास बहुत कठिन हुआ करता आदतंे विकसित करने का मनोविज्ञान
था। जिज्ञासुओं से अपेक्षा की जाती थी कि अन्य यौगिक अभ्यास
शुरू करने से पहले वे सबसे पहले नियमों के साथ-साथ इन यमों एवं तंत्रिका-विज्ञान
को अपनाकर इनमें निपुण हो जाएँ। वे तपस्या और चरित्र-निर्माण में
अनगिनत वरष् बिता देते थे। प्रथम स्तर तक ही पहँुचने के लिए दृढ़ मनोविज्ञान व तंत्रिका विज्ञान के पाश्चात्य शिक्षण के माध्यम से
इच्छाशक्ति, धैर्य व अनुशासन की आवश्यकता पड़ती थी। कल्पना लोगों में आदतों को बनाने और अवचेतन नियोजन के विज्ञान के
करें कि भगवान बुद्ध अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए महीनों जंगलों साथ-साथ दृष्टिकोण के विकास के प्रति भी जागरूकता बढ़ रही है।
मंे रहे, भोजन के लिए भटके, हर प्रकार के मौसम का सामना किया हम यह जानते हैं कि हमारी कई आदतंे बचपन मंे ही बन जाती हैं
और सभी सुविधाओं को त्याग दिया। क्या हम ऐसे कष्ट भोगने और जिससे हमारे कछु व्यवहार स्वतः होने लगते हंै जिनके प्रति हम
त्याग करने में सक्षम हंै? प्रायः सचेत भी नहीं होते है।ं प्रत्येक चेतन विचार के लिए हमारे अंदर
कम से कम दस लाख अवचेतन विचार होते हैं और हमारे अवचेतन
शुक्र है कि वर्तमान युग मंे यौगिक चरणों के क्रम ने इसे हमारे लिए विचार हमारी गतिविधियों को 95 % तक प्रभावित करते हंै। 3
कहीं ज़्यादा आसान बना दिया है। हम पहले हारट्फलु नेस ध्यान,
सफ़ाई और प्रार्थना से शुरू करते हंै जिनमंे प्रत्याहार, धारणा, ध्यान दुर्भाग्य से, तंत्रिका विज्ञान मंे अधिकांश अनुसन्धान उन बदलावों
और समाधि के पतंजलि के अंतिम अंग शामिल ह।ैं इनसे मन पर कंेद्रित हैं जो मस्तिष्क में प्रसन्नता बनाम अप्रसन्नता और
परिष्कृत, नियंत्रित और शुद्ध हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप सकारात्मकता बनाम नकारात्मकता से सम्बंधित बदलाव हैं। नैतिक
चीज़ों को समझने का हमारा साधन अर्थात् मन, जिसका उपयोग बदु ्धिमत्ता को ध्यान मंे रखते हएु हम प्रसन्नता की अपनी आत्म-केदं ्रित
हम चरित्र-निर्माण के लिए करते ह,ंै शुद्धतर और अधिक प्रभावकारी आवश्यकता के परे देखने की कोशिश कर रहे हं।ै हम केवल
हो जाता है। आंतरिक रूपांतरण से ही बाह्य परिवर्तन उत्प्रेरित होता प्रसन्नता के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विकास के लिए इसे पुनः
है। यह क्रम बहुत व्यावहारिक है क्योंकि जब मन शुद्ध और भली व्यवस्थित कर रहे हैं। वर्तमान में हारट्फुलनेस के अभ्यासियों के
भांति नियंत्रित हो जाता है तो व्यवहार मंे बदलाव लाना बहुत साथ, जिनके जीवन का उद्देश्य विकासपरक है, कई अनुसंधान
आसान हो जाता है। निश्चित रूप से ऐसा व्यक्ति जिसका हृदय किए जा रहे ह।ंै इनके निष्कर्षों को देखना दिलचस्प होगा। विकास
अब भी इच्छा, चिंता, क्रोध, भय या अपराध-बोध से भरा हो, के उद्देश्य से की जाने वाली पुनर्व्यवस्था मस्तिष्क को किस प्रकार
उसका आतंरिक रूपांतरण एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाता है । प्रभावित करती है?
कई लोग सोचते हंै कि ध्यान व योग स्वास्थ्य, सुख, शांति एवं
प्रसन्नता विकसित करने के लिए होते हैं लेकिन यह केवल पहले
62 हार्फट ुलनेस
प्ेरर ित हों
चरण की तैयारी है - अपनी इच्छाओं, नापसन्दों व कमियों पर
प्रभुत्व प्राप्त करना और स्थिरता के आंतरिक भण्डार से जुड़ना जो
चक्रवाती तूफ़ान के कदंे ्र की तरह होता है।
प्राणाहुति का यौगिक विज्ञान
पिछले 100 वर्षों में योग के क्षेत्र मंे हुए व्यापक शोध के साथ-साथ
दृष्टिकोण में भी बदलाव हुए हंै। सहज यौगिक अभ्यासों का
विकास हुआ है और प्राणाहुति की प्राचीन यौगिक तकनीक की
पुनः खोज हुई है जिसे ‘ट्रांसमिशन’ भी कहते ह।ंै उपनिषदों मंे
प्राणाहुति का वर्णन ‘प्राणस्य प्राणः’ के रूप में किया गया है।
इसका उपयोग प्राचीन समय मंे हुआ करता था लेकिन यह सदियों
तक मुख्यतः अज्ञात ही रही जब फ़तेहगढ़ के श्री रामचंद्रजी ने पुनः
इसकी खोज करके इसके उपयोग मंे निपुणता प्राप्त की ताकि
इससे अन्य लोगों को रूपांतरित होने मंे मदद मिल सके।
हालाँकि प्राणाहुति के साथ ध्यान हमारी प्रगति के मारग् में आने
वाली बाधाओं को ख़त्म करके और हमारे अवचेतन में हुए
मानसिक नियोजन को जड़ से निकालकर हमारी आंतरिक प्रगति
में तेज़ी लाता है, लेकिन हमें भी अपनी आदतों को बदलने की
ज़रूरत है ताकि आंतरिक रूपांतरण व्यवहार में होने वाले
बदलावों से मेल खाए। अन्यथा आंतरिक और बाह्य में कोई
सामंजस्य नहीं होगा। संभवतः हमारा आंतरिक संसार विस्तार करे
और विकसित हो लेकिन यदि हमारा चरित्र और जीवन शैली पीछे
प्राणाहुति के साथ ध्यान हमारी प्रगति के मार्ग में आने वाली बाधाओं को ख़त्म
करके और हमारे अवचेतन में हुए मानसिक नियोजन को जड़ से निकालकर तज़े ी
से हमारी आंतरिक प्रगति करता है, लके िन हमंे भी अपनी आदतों को बदलने की
ज़रूरत है ताकि आंतरिक रूपांतरण व्यवहार में होने वाले बदलावों से मले खाए।
जनवरी 2021 63
प्ररे ित हों
रह जाएँ तो हम अटके रह जाते हैं और आगे नहीं बढ़ पाते है।ं यदि
हम एक व्यक्ति के रूप मंे अटके रह जाते हंै तो हमारा समाज भी
अटका रह जाता है।
कमल के सामान बनना - निकालने और
परिष्करण की प्रक्रिया
‘यम’ शब्द के अनेक अर्थ ह।ैं संस्कृत में इसका अर्थ है ‘संयम’ या
‘आत्म-अनुशासन।’ हिन्दू पुराणों के अनुसार मृत्यु के देवता भी
‘यम’ ह।ैं मृत्यु का आत्म-अनुशासन और जीवन शैली के परिष्करण
से क्या सम्बन्ध? आत्म-रूपांतरण के पीछे यह रहस्य है कि हम
अपनी उलझी हुई मानसिक व भावनात्मक जटिलताओं को मार दंे
और हम ‘मैं-पन’ से उबरकर अपनी चेतना को सार्वभौमिक बनने
दंे। यह वैयक्तिकता अर्थात् अहम् की मृत्यु है। ध्यान में हम
वैयक्तिक स्व से परे जाकर सार्वभौमिक स्व मंे विलय हो जाते हंै
और परमतत्व के साथ अनुनादित होने लगते हैं।
मृत्यु के रूप में ‘यम’ का विचार शायद घृणास्पद लगे लेकिन
अनचाही जटिलताओं को निकालने और अहम् के ‘मं-ै पन’ से
उबरने में बहुत महत्वपूर्ण ज्ञान छपु ा है। यह हमारी अपनी पहचान के
स्व-निर्मित भाव अर्थात् अपनी विभिन्न छवियों की परतों की मृत्यु
है। अहम् बहुत ही प्रतिबंधक बल हो सकता है जो हमें अपनी दृढ़
मान्यताओं तक सीमित कर देता है। इसके कारण हम स्थिति के
अनुरूप नहीं ढल पाते हैं और नए व उदार तरीक़ों से विकसित नहीं
हो पाते ह।ैं लेकिन यह सब कुछ बदलने के लिए कछु विधियाँ
उपलब्ध ह।ैं जब हम अपनी मान्यताओं की बाधाओं को पार करके
उन चीज़ों को छोड़ देते हंै जो किसी काम की नहीं रह जाती हैं, तो
अहम् हमारा मित्र बन जाता है। हम व्यक्तिगत मान्यताओं की
सीमित केन्द्रीयता से आगे बढ़कर सार्वभौमिक चेतना के लिए तैयार
हो जाते ह।ैं
64 हारफ्ट लु नेस
प्रेर ित हों
ऐसा करने के लिए हम अपने मन को, जिसे सूक्ष्म शरीर भी कहते घूमता रहता है - ख़त्म करना, पुनः बनाना, ख़त्म करना, पुनः
है,ं परिष्कृत करते हंै ताकि यह शुद्ध, हल्का, विस्तारी और असीमित बनाना। यह एक अंतहीन चक्र है, जब तक कि हम अपने व्यवहार
हो जाए। और जीवन शैली को नहीं बदलते।
इस परिष्करण के दो मूलभूत पहलू हंै - 2. सूक्ष्म शरीर का अविरत परिष्करण -
1. सूक्ष्म शरीर से जटिलताओं को हटाना - दूसरा पहलू है सूक्ष्म शरीर के चार मुख्य कार्यों - चित्त, बुद्धि, मनस
और अहंकार का परिष्करण।
हम सूक्ष्म शरीर मंे मौजूद हर जटिलता और भारीपन को निकाल देते
हैं - वो छापंे जो हमने अतीत में एकत्रित की थीं - ताकि यह हल्का हृदय पर ध्यान करने से सोच गहरी और विस्तृत होती जाती
और शुद्ध हो जाए। इन छापों को योग मंे संस्कार कहते हैं। इन्हंे है जिससे इसमें हमारे एहसास शामिल होने लगते हंै। इसके
निकालने से मान्यताओं, भावनाओं, भय, आदतों, इच्छाओं और बाद यह और भी ज़्यादा विस्तृत होती है जिससे इसमें वो
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के हमारे व्यक्तिगत जाल का अंत हो अवस्थाएँ भी शामिल हो जाती हैं जो अनुभव से परे ह।ैं
जाता है। कई लोग मनोविश्लेषण और मानसिक स्तर पर होने वाली हृदय से मार्गदर्शन पाकर हमारी मानसिक प्रक्रिया सूक्ष्मतम
व्यक्तिगत चिकित्सा द्वारा ऐसा करने की कोशिश करते हैं लेकिन संभव अवस्था प्राप्त करती है।
सामान्यतः यह एक लम्बी और धीमी प्रक्रिया है क्योंकि संस्कारों
और प्रवृत्तियों की अवचेतन जड़ें बहुत गहरी होती हैं। हारट्फलु नेस बुद्धि, बुद्धिमत्ता के रूप म,ंे फिर अंतर्ज्ञान, विवेक और
मंे सफ़ाई की प्रक्रिया मूल संस्कारों को स्पंदनीय स्तर पर सीधे सूक्ष्म उसके परे तक गहन होती जाती है - पुनः यह सूक्ष्मतर से
शरीर को साफ़ करके निकाल देती है। यह प्रक्रिया इतनी असरदार है सूक्ष्मतर होती जाती है। चूँकि हम सार्वभौमिक चेतना से
कि एक सम्पूर्ण जीवन की छापंे एक प्रशिक्षक के साथ कवे ल एक जुड़े रहते ह,ैं विवेक इस तरह प्रवाहित होता है जैसे यह
ध्यान सत्र में निकाली जा सकती ह।ंै परलोक से आने वाला कोई प्रवाह हो।
इसमंे सहयोग देने के लिए हमंे उन आदतों व व्यवहारों को भी ख़त्म अहंकार ‘म’ंै पर आधारित स्वार्थी केन्द्रीयता से हटकर
करना होगा जो इन आंतरिक छापों की बाह्य अभिव्यक्ति हैं ताकि ‘हम’ पर आधारित निस्स्वार्थी केन्द्रीयता की ओर, फिर
हम बार-बार उन्हीं स्वरूपों को बनाते न चले जाएँ। अन्यथा हम हृदय की उदारता की ओर, उससे आगे अधिक विनम्रता व
एक घूमते पहिए पर पिंजरे मंे मौजूद चूहे की तरह होंगे जो गोल-गोल स्वीकार्यता की ओर और अंततः अस्मिता (होने का भाव)
की सूक्ष्मतम अवस्था की ओर निर्ेदशित हो जाता है।
जब हम अपनी मान्यताओं की बाधाओं को पार करके उन चीज़ों को छोड़
देते हैं जो किसी काम की नहीं रह जाती हैं तो अहम् हमारा मित्र बन जाता
है। हम व्यक्तिगत मान्यताओं की सीमित के न्द्रीयता से आगे बढ़कर
सार्वभौमिक चेतना के लिए तयै ार हो जाते हैं।
जनवरी 2021 65
प्ेरर ित हों
हृदय पर ध्यान करने से सोच गहरी और विस्तृत होती जाती है जिससे इसमें हमारे
एहसास शामिल होने लगते हंै। इसके बाद यह और भी ज़्यादा विस्तार करती है
जिससे इसमें वो अवस्थाएँ भी शामिल हो जाती हैं जो अनुभव से परे हंै।
जैसे-जैसे ये तीनों मानसिक कार्य परिष्कृत होते जाते ह,ंै चेतना जैसे-जैसे हम हल्केपन और स्वतंत्रता की ओर बढ़ते जाते हैं, हम
अनंत मंे विस्तार करती जाती है जो निर्बाधित हो जाती है और हृदय से जीवन की वास्तविक जीवंतता का अनुभव करने लगते है।ं
सार्वभौमिक चेतना के साथ विलय हो जाती है। हम परमात्मा के साथ जुड़ा जीवन जीने लगते हैं। ऐसे जीवन को
आत्म-अनुशासन के साथ जीने मंे विवेक का सहयोग प्राप्त होता है
यदि हम कवे ल ध्यान के अभ्यास से ही यह सब कर पाएँ तो जल्द जिसे हम ‘यम’ के रूप में जानते ह।ंै
ही हम बहुत ऊपर पहँुच जाएँगे लेकिन अहंकार स्वार्थ से उदारता
की ओर संघरष् किए बिना नहीं बढ़ता है। यह भी एक प्रक्रिया है। हमें आत्म-अनुशासन की इस अवस्था का वर्णन बहुत ही सुन्दर तरीक़े
अपनी अनुभूतियों और हृदय के विवेक पर भरोसा करने में और से दुनिया मंे रहते हुए लेकिन दुनिया के न होने के रूप मंे किया गया
अपनी नियोजित मान्यताओं के संस्कारों द्वारा निर्धारित तरक्संगत है। इसे कीचड़ मंे रहने वाले कमल के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया
मन के तरक्-वितरक् को नज़रअंदाज़ करके किसी उच्चतर पर पूरी गया है जो उसकी गंदगी से दूषित नहीं होता है और अपनी शुद्धता
तरह निर्भर हो जाने मंे समय लगता है। इसके लिए अभ्यास के और सौंदर्य बिखेरता रहता है। मंै इन यमों को एक जिज्ञासु के पाँच
साथ-साथ चरित्र को सुधारने और बार-बार व्यवस्थित करने की प्रण कहना चाहूँगा। ये बहादुरी से और सही मार्ग से न भटकते हुए
ज़रूरत है। जीवन जीने के लिए आत्म-अनुशासन के पाँच प्रण हं।ै अगले लेखों
मंे हम अपने दैनिक जीवन में उनकी प्रासंगिकता के बारे में जानगंे े।
1 नोवोग्रैत्ज जे. 2020. मैनिफे स्टो फॉर ए मोरल रे वोल्यूशन - प्रैक्टिसेज टू बिल्ड ए बेटर वर्ल्ड. मैक्मिलन पब्लिशर्स
2 रामचंद्र 2013. रामचंद्र की सम्पूरण् कृ तियाँ, भाग 2 . श्री रामचंद्र मिशन, भारत
3 लिप्टन बी. एच. , 2005, द बायोलॉजी ऑफ़ बिलीफ - अनलीशिंग द पावर ऑफ़ कांशसनेस, मैटर और मिरै क्ल्स. हे हाउस, यु.एस.ए.
66 हारफट् ुलनसे